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Thursday, January 1, 2009

वार्षिक गीतमाला (पायदान २० से ११ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या २० से ११ तक

पिछले अंक में हम आपको ३०वीं पायदान से २१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

२० वीं पायदान - पिछले सात दिनों में(रॉक ऑन)

रॉक ऑन उन चुंनिदा फिल्मों में से एक है,जिसमें धुन तैयार होने से पहले गीतकार ने अपने गीत लिखे और फिर संगीतकार ने संगीत पर माथापच्ची की है, अमूमन इसका उल्टा होता है। गीत के बोल लीक से हटकर हैं। गाने की पहली पंक्ति हीं इस बात को पुख्ता करती है(मेरी लांड्री का एक बिल)। "दिल चाहता है","लक्ष्य", "डान" जैसी फिल्में बना चुके फरहान अख्तर ने इस फिल्म के जरिये अपने एक्टिंग कैरियर की शुरूआत की है। "अर्जुन रामपाल" को छोड़कर इस फिल्म में फिल्म-जगत का कोई भी नामी कलाकार न था,फिर भी "राक आन" बाक्स-आफिस पर अपना परचम लहराने में सफल हुई। इस फिल्म के सारे गीतों में संगीत दिया है शंकर-अहसान-लाय की तिकड़ी ने तो बोल लिखे हैं फरहान के पिता और जानेमाने लेखक एवं शायर जावेद अख्तर ने। इस गाने को गाया है खुद फरहान ने।



१९ वीं पायदान - खुदा जाने(बचना ऎ हसीनों)

यूँ तो इस फिल्म में रणबीर-दीपिका के सारे दृश्य सिडनी में फिल्माये गये हैं,लेकिन इस गाने की शुटिंग इटली के विशेष एवं चुने हुए लोकेशन्स पर की गई है। मनमोहक सीनरी के मोहपाश में बंधी दीपिका खुद इस बात का बखान करती नहीं थकती। अनविता दत्त गुप्तन की लेखनी का जादू भी कमाल का है और उस पर से विशाल-शेखर के संगीत का तिलिस्म। लेकिन इस गाने की खासियत और प्रमुख यु०एस०पी० है के०के० की आवाज। ऊपर के सुरों पर के०के० की आवाज नहीं फटती,जो अमूमन बाकी गायकॊं के साथ होता है।"एक लौ" फेम शिल्पा राव ने इस गाने में के०के० का बखूबी साथ दिया है।


१८ वीं पायदान - तू राजा की राजदुलारी(ओए लकी लकी ओए)

जबर्दस्त एवं अप्रत्याशित पब्लिक वोटिंग ने इस गाने को १८वीं पायदान पर पहुँचाया है। राजबीर की आवाज अलग ढर्रे की है,इसलिए कहा नहीं जा सकता कि किसे पसंद आ जाए या फिर कौन नापसंद कर जाए। मंगे राम ने इसके बोल लिखे हैं तो संगीत स्नेहा खनवल्कर का है। इस गीत को अभय देओल एवं नीतु चंद्रा पर बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है।


१७ वीं पायदान - फ़लक तक चल(टशन)

इस गाने के साथ उदित नारायण बहुत दिनों बाद सेल्युलायड पर नज़र आए। वैसे दिल को छूते बोल और मधुर संगीत से सजे गानों के लिए उदित नारायण परफेक्ट च्वाइस हैं। इस गाने में उनका साथ दिया है चुपचुप के(बंटी और बब्ली) और बोल न हल्के-हल्के(झूम बराबर झूम) फेम महालक्ष्मी अय्यर ने। अक्षय और करीना पर फिल्माया गया यह गीत निस्संदेह "टशन" का सबसे यादगार गीत है। इस गाने के बोल लिखे हैं कौसर मुनीर ने तो संगीत से सजाया है विशाल-शेखर की जोड़ी ने।


१६ वीं पायदान - पप्पू कान्ट डांस(जाने तू या जाने ना)

"लव के लिए साला कुछ भी करेगा" लिखकर फिल्म-इंडस्ट्री में प्रसिद्ध हुए अब्बास टायरवाला "पप्पू कान्ट डांस" से अपनी पुरानी शैली को दुहराते प्रतीत होते हैं। गाने के बोल कालेज जाने वाली जनता को आकर्षित करने में सफल है और गाने की तर्ज पार्टियों में लोगों को थिरकने पर मजबूर करती है।गाने में अंग्रेजी की पंक्तियाँ ब्लेज़ की हैं तो संगीत ए०आर०रहमान का है ।इस गाने को सात गायकों -अनुपमा देशपांडे, बेनी दयाल, ब्लेज़, दर्शना, मोहम्मद असलम (अजीम-ओ-शान शहंशाह फेम), सतीश सुब्रमन्यम एवं तन्वी, ने अपनी आवाजें दी है ।


१५ वीं पायदान - हाँ तू है(जन्नत)

इस गाने की भी सफलता का मुख्य श्रेय के०के० को जाता है। इस गाने में नब्बे की दशक के नदीम-श्रवण की धुनों की हल्की-सी छाप दीखती है। प्रीतम का संगीत इस गाने को रिवाइंड करके सुनने को बाध्य करता है। गाने के बोल लिखे हैं सईद कादरी ने। वैसे भट्ट कैंप के बारे में यह प्रचलित है कि फिल्म कैसी भी हो, फिल्म के गाने दर्शनीय एवं श्रवणीय जरूर होते हैं। पर्दे पर इमरान हाशमी एवं सोनल चौहान की मौजूदगी इस गाने को दर्शनीय बनाने में कहीं से भी कमजोर साबित नहीं होती।


१४ वीं पायदान - सोचा है(रॉक ऑन)

आसमां है नीला क्यों,पानी गीला-गीला क्यों, सरहद पर है जंग क्यों, बहता लाल रंग क्यॊं....... ऎसे प्रश्न लेकर जावेद अख्तर पहले भी कई बार आ चुके हैं। इस बार अलग यह है कि इन बातों की नैया की पतवार थामी है रौक म्युजिक ने। "राक आन" के आठ गानों में से पाँच गानॊं में पार्श्व गायन किया है स्वयं नायक फरहान ने। इस गाने में भी फरहान अख्तर की हीं आवाज़ है और रौक धुन से सजाया है शंकर-अहसान-लाय ने। वाकई फरहान अख्तर, अर्जुन रामपाल, ल्युक केनी और पूरब कोहली की रौक बैंड "मैजिक" का मैजिक बाक्स-आफिस के सर चढकर बोलता दिखा।


१३ वीं पायदान - ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा(जोधा-अकबर)

जोधा-अकबर फिल्म के लेखक "हैदर अली" चाहते थे कि इस फिल्म में उनकी कैमियो इंट्री हो,लेकिन माकूल रोल नहीं मिल रहा था। तभी फिल्म के निर्देशक "आशुतोष गोवारिकर" ने सुझाया कि "ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा" गाने में जो दरवेशों की टोली आती है,उसमें "हैदर अली" सबसे आगे रह सकते हैं और पूरा का पूरा गाना उन्हीं पर फिल्माया जा सकता है। विचार अच्छा लगा और ए०आर०रहमान की आवाज़ को "हैदर अली" का शरीर मिल गया। यह तो थी इस गाने के फिल्मांकन के पीछे की कहानी, अब बात करें गाने की तो गाने का संगीत दिया है "मोज़ार्ट आफ मद्रास" ए०आर०रहमान ने एवं बोल लिखे हैं जावेद अख्तर ने। यह गाना ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और हज़रत निजामुद्दीन औलिया को समर्पित है। "तेरे दरबार में ख़्वाजा , सर झुकाते हैं औलिया...चाहने से तुझको ख़्वाजा जी मुस्तफ़ा को है चाहा......."


१२ वीं पायदान - तुझमें रब दीखता है(रब ने बना दी जोड़ी)

शायद हीं कोई संगीत-प्रेमी होगा, जिसने फिल्म "अनवर" का गीत "आँखें तेरी" न सुना हो और जिसे यह गीत पसंद न हो। "रूप कुमार राठौर" की आवाज़ का यही असर है, जो आसानी से नहीं उतरता। फिल्म "वीर-ज़ारा" के "तेरे लिए" में लता मंगेशकर के साथ रूप कुमार राठौर की जुगलबंदी को कौन भुला सकता है। हाल में हीं प्रदर्शित हुई "रब ने बना दी जोड़ी" का यह गाना भी इसी खासियत के कारण चर्चा में है। वैसे इस गाने की प्रसिद्धि में एक बड़ा हाथ सलीम-सुलेमान के रूहानी संगीत और जयदीप साहनी( चख दे इंडिया फेम) के सरल एवं सुलझे हुए शब्दों का भी है। इस गाने का फिल्मांकन भी बड़ी हीं खूबसूरती से किया गया है।


११ वीं पायदान - कहने को जश्ने-बहारां है(जोधा-अकबर)

एक बार फिर ए०आर०रहमान। "कहने को जश्ने-बहारां है" सुनने वालों को सोनू निगम की आवाज़ का संदेह होना लाज़िमी है। दर-असल "जावेद अली" की आवाज़ सोनू निगम से बहुत हद तक मिलती है और इसी कारण जल्द हीं असर करती है। फिल्म-इंडस्ट्री में आए हुए जावेद अली के सात साल हो गए,लेकिन पहचान तब मिली जब उन्होंने "नक़ाब" का "एक दिन तेरी राहों में" गाया। फिर तो उनके खाते में कई सारे गाने जमा होते गए। "कहने को जश्ने-बहारां है" को अपने संगीत से सजाया है ए०आर०रहमान ने और बोल लिखे हैं जावेद अख्तर ने। नायक के दिल के दर्द और नायिका से दूरी को बेहतरीन तरीके से इस गाने में दर्शाया गया है। वाकई मुगलकालीन उर्दू का अंदाज-ए-बयाँ है कुछ और....।



साल २००८ के सर्वश्रेष्ठ १० गाने लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे। तब तक इन गानों का आनंद लीजिए।



चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

आप अपनी पसंद यहाँ टिपण्णी कर दे सकते हैं या फ़िर मेल करें podcast.hindyugm@gmail.com पर

Wednesday, December 31, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ३० से २१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ३० से २१ तक

पिछले अंक में हम आपको ४०वीं पायदान से ३१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

३० वीं पायदान - मेरी माटी (रामचंद पाकिस्तानी)

पाकिस्तान के जानेमाने निर्देशक महरीन जब्बार ,जिन्होंने पहचान, कहानियाँ, पुतली घर जैसे नामचीन टीवी धारावाहिकों एवं नाटकों का निर्देशन किया है, "रामचंद पाकिस्तानी" लेकर फिल्म-इंडस्ट्री में उपस्थित हुए हैं। यह फिल्म अपने अनोखे नाम के कारण दर्शकों को आकर्षित करती है। नगरपरकर गाँव में रहने वाली "चंपा"(नंदिता दास द्वारा अभिनीत) की जिंदगी में तब उथलपुथल मच जाता है,जब उसका पति एवं उसका लड़का "रामचंद" अनजाने हीं सरहद पारकर भारत आ जाता है और भारतीय फौज उन्हें घुसपैठिया मान लेती है। यह फिल्म उसी चंपा की दास्तान है। देबज्योति मिश्रा द्वारा संगीतबद्ध एवं अनवर मक़सूद द्वारा लिखित "मेरी माटी" गायकों (शुभा मुद्गल एवं शफ़क़त अमानत अली) की अनोखी जुगलबंदी के कारण श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित होती है।



२९ वीं पायदान - बंदया(खुदा के लिए)

यूँ तो बुल्ले शाह की नज़्में साढे तीन सदियाँ पुरानी हैं,लेकिन उनकी नज़्मों का नूर अब भी ताज़ातरीन है। नब्बे की दशक में पाकिस्तानी रौक बैंड "जुनून" ने पहली मर्तबा बुल्ले शाह की नज़्मों को युवाओं के दरम्यान मौजूद कराया था,उसके बाद उनके कलामों पर सबसे ज्यादा काम "रब्बी शेरगिल" ने किया है। "बुल्ला की जाना" इसका जबर्दस्त उदाहरण है। "खुदा के लिए" का "बंदया" भी इसी कड़ी का एक अनमोल मोती है। इस गाने को अपने संगीत से संवारा है खवर जावेद ने तो अपनी गलाकारी से सजाया है खवर जावेद एवं फराह ज़ाला ने।


२८ वीं पायदान - जी करदा(सिंह इज किंग)

आलोचकों की मानें तो प्रीतम ने धुन की चोरी में अन्नु मल्लिक एवं बप्पी लहरी को अगर पीछे नहीं छोड़ा है तो बराबरी तो कर हीं ली है और अगर जनता की माने तो प्रीतम की धुन सबके दिलॊ को अपनी-सी लगती है। इसी उहाफोह के बीच का गीत है "जी करदा"। धुन कितनी मौलिक है,यह तो पता नहीं,लेकिन इसके सूत्रों का अब तक पता नहीं चला है और इसी कारण यह गीत हमारे गीतमाला में शामिल है। "सिंह इज किंग" यूँ तो हाँगकाँग की एक फिल्म "जी जी" की सर से पाँव तक नकल है ,लेकिन अक्षय कुमार की बिंदास अदायगी ने इसे इस साल की दूसरी सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म बना दिया है। रही बात गाने की तो इस गाने के बोल लिखे हैं मयूर पुरी ने और इसे अपनी आवाज़ दी है लभ जंजुआ (सोणी दे नखरे, प्यार करके पछताया फेम) एवं सुज़ी ने।


२७ वीं पायदान -सीता राम सीता राम(वेलकम टू सज्जनपुर)

समानांतर-सिनेमा के बेताज बादशाह श्याम बेनेगल की पहली हल्की-फुल्की एवं पूर्णतया व्यावसायिक फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" आशा के अनुरूप दर्शकों को गुदगुदाने में सफल साबित होती है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे - श्रेयस तालपडे एवं अमृता राव, लेकिन अपनी अदायगी से सबसे ज्यादा प्रभावित किया रवि झंकल ने। इस फिल्म में सामाजिक असामानता एवं राजनीतिक तनावों को हास्य का पुट देकर प्रस्तुत किया गया है एवं हँसाकर हीं सही फिल्म असर तो कर हीं जाती हई। "लगे रहो मुन्नाभाई","खोया खोया चाँद" एवं "लागा चुनरी में दाग" के बाद संगीतकार शांतनु मोइत्रा एवं गीतकार स्वानंद किरकिरे की जोड़ी एक बार फिर अपना कमाल दिखाती है। कृष्ण कुमार की आवाज झूमने पर मजबूर करती है।


२६ वीं पायदान -मम्मा(दसविदानिया)

दिल को छूता कैलाश, नरेश और परेश का संगीत एवं कैलाश के बोल किसी भी संवेदनशील इंसान को रूलाने के लिए काफी है। कैलाश की आवाज एक झटके में असर करती है। इस गाने का फिल्मांकन विनय पाठक, गौरव गेरा एवं सरिता जोशी पर किया गया है और जिस तरह से इन कलाकारों ने अपने इमोशन एक्सप्रेस किए हैं, देखकर हृदय रोमांचित हो जाता है। हैट्स आफ टू कैलाश एंड विनय पाठक..........


२५ वीं पायदान -दिल हारा(टशन)

यूँ तो टशन इस साल की सबसे बड़ी फ्लाप फिल्मों से एक है और आलोचकॊं की मानें तो यश राज फिल्म्स के लिए एक धब्बा है,लेकिन विशाल-शेखर का संगीत डूबते के लिए तिनका साबित होता है। यह साल विशाल-शेखर के लिए बहुत हीं सफल रहा है। "दिल से" एवं "मक़बूल" जैसे फिल्मॊं में अदायगी कर चुके एवं "लीजेंड और भगत सिंह" के पटकथा-लेखक "पियुष मिश्रा" ने इस फिल्म के गीत लिखे हैं। रही बात इस गाने की तो "छप्पन तारे तोर नाच लूँ" की स्वरलहरियाँ जैसे हीं हवाओं में उतरती है, "सुखविंदर" के अज़ीम-ओ-शान आगमन का अंदाजा हो जाता है।


२४ वीं पायदान -मन मोहना(जोधा अकबर)

कुछ सालों पहले जी०टी०वी० के "सा रे गा मा" में (जब सोनु निगम उद्घोषक हुआ करते थे) बेला शिंदे ने अपनी गायिकी से सबको मोहित किया था और विजेता भी हुई थी। लेकिन उसके बाद बेला शिंदे कुछ खास नहीं कर पाई। इस साल आई
"जोधा अकबर" से इस गायिका ने अपनी वापसी की है। "मन मोहना" यूँ तो एक भजन है,लेकिन जिस खूबी से जावेद अख्तर ने इसे लिखा है, निस्संदेह हीं नास्तिकों पर भी असर करने में यह समर्थ है। इस गाने से ए०आर०रहमान अपने रेंज का अनूठापन दर्शाते हैं।


२३ वीं पायदान -कभी कभी अदिति(जाने तू या जाने ना)

मीठी-सी पतली आवाज़ सुनकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि इस गाने को किसी २०-२२ साल के युवा ने आवाज़ नहीं दी,बल्कि ४२ साल के युवा(?) की मैच्युर आवाज़ है। जी हाँ, मैं रहमान की नई खोज राशिद अली की बात कर रहा हूँ। रहमान से राशिद अली की मुलाकात लगभग छह साल पहले हुई थी, बड़ी ही कैजुअल मुलाकात थी वह। इसके बाद रहमान के ट्रुप में राशिद गिटारिस्ट के तौर पर शामिल हो गए और "बाम्बे ड्रीम्स" की सफलता के भागीदार बने। यहाँ तक कि "कभी कभी अदिति" का गिटार पीस भी राशिद के म्युजिकल आईडियाज से प्रेरित है। इस गीत के बोल लिखे हैं "आती क्या खंडाला" फेम अब्बास टायरवाला ने।


२२ वीं पायदान -बाखुदा(किस्मत कनेक्शन)

आतिफ असलम(पहली नज़र फेम) की आवाज़ का जादू खुद हीं सर चढकर बोलता है,उस पर अल्का याग्निक की मीठी आवाज का तरका.... माशा-अल्लाह! इस गाने में प्रीतम अपने रंग में नज़र आते हैं। खुदा की गवाही देकर प्यार का इकरार करने की अदा काबिल-ए-तारीफ है, वैसे तो यह काम सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पहले हीं कर चुके हैं "खुदा गवाह" में। इस गीत के बोल लिखे हैं सब्बीर अहमद ने। वैसे तो यह फिल्म बाकस-आफिस पर कुछ खास नहीं कर सकी,लेकिन शाहरूख के बिना पहली मर्तबा अजीज मिर्जा को देखना अलग अनुभव दे गया। शाहिद और विद्या की जोड़ी भी लीक से हटकर लगी।


२१ वीं पायदान -जलवा(फैशन)

सलीम-सुलेमान जब "फैशन" के लिए टाईटल ट्रैक बना रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि "फैशन" से राईम करता हुआ (फैशन की तुक में) शब्द खोजना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है, तभी सलीम ने "जलवा" शब्द सुझाया। वही से आगे बढते हुआ बना "फैशन का है यह जलवा" और यह पंक्ति कमाल कर गई। मज़े की बात यह है कि "फैशन" फिल्म की पूरी कहानी इसी पंक्ति के इर्द-गिर्द घुमती है। इस गाने के बोल लिखे हैं अतिथि गीतकार "संदीप नाथ" ने और अपनी आवाज़ से सुसज्जित किया है सुखविंदर सिंह, सत्या हिंदुजा और रोबर्ट बौब ओमुलो ने। रैंप पर चलती प्रियंका,कंगना,मुग्धा और पृष्ठभूमि में बजता यह गीत रोमांचित कर देता है।



बाकी के गीत लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे।

सभी गानों को यहाँ सुनें:


चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

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