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Saturday, November 5, 2016

"मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ...”, इस गीत का मुखड़ा हसरत जयपुरी ने नहीं बल्कि जयकिशन ने लिखा था।


एक गीत सौ कहानियाँ - 98
 

'मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 98-वीं कड़ी में आज जानिए 1969 की फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ के मशहूर गीत "मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता...” के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।  

1968 में शंकर जयकिशन को भारत सरकार द्वारा प्रदत्त पद्मश्री पुरस्कार से समानित किए
From right to left - Rajaram, a guest, Satish Wagle, O P Ralhan, Dharmendra, Jaikshan, Bhappi Soni (in goggles) 
जाने की घोषणा हुई। इस वर्ष फ़िल्म और संगीत के क्षेत्र में जिन कलाकारों को यह सम्मान दिया गया था उनमें शामिल थे बेगम अख़तर, सुनिल दत्त, दुर्गा खोटे, एन. टी. रामाराव, और वैजयन्तीमाला। उन्हीं दिनों फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ की प्लानिंग चल रही थी। फ़िल्म के निर्माता थे सतीश वागले और राजाराम। निर्देशक थे भप्पी सोनी और संगीत निर्देशक थे शंकर-जयकिशन। पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण करने शंकर-जयकिशन और इसी फ़िल्म की नायिका वैजयन्तीमाला दिल्ली पहुँच गए। तो साथ में सतीश वागले भी दिल्ली चले आए। वागले साहब शंकर-जयकिशन के साथ ही ओबरोय होटल में रुके थे। फ़िल्म ’प्यार ही प्यार’ की कहानी जयकिशन सुन चुके थे और उन्हें पता थी कि फ़िल्म में नायक की भूमिका में धर्मेन्द्र का नाम विजय और नायिका वैजयन्तीमाला का नाम कविता है। “कविता” नाम जयकिशन के मन-मस्तिष्क पर जैसे छा गया था और अंजाने में ही इस नाम का जाप उनके मन में चल रहा था। और इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ ही समय के अन्दर “कविता” पर एक पंक्ति उनके दिमाग़ में आ गया। सुबह नाशते के समय जयकिशन गुनगुना रहे थे, केवन धुन ही नहीं बल्कि शब्दों के साथ कुछ गुनगुना रहे थे। वो गुनगुना रहे थे “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता”। सतीश वागले को धुन भी पसन्द आई और बोल भी बहुत भा गए। वो जयकिशन से बोले कि यह तो कमाल का गाना है यार! जयकिशन ने कहा कि धुन भी मेरी है और बोल भी मेरे ही हैं। अगर आपको पसन्द है तो यह तोहफ़ा है आपके लिए मेरी तरफ़ से, यह आपकी फ़िल्म का एक गाना होगा। और वापस पहुँचते ही हम इसे रेकॉर्ड करेंगे। बम्बई पहुँच कर हसरत जयपुरी साहब से अन्तरे लिखवा कर गाना पूरा करवाया गया। हसरत जयपुरी ने मुखड़े को ज़रा सा भी नहीं छेड़ा और ना ही कोई दूसरी लाइन जोड़ी। जैसा जयकिशन ने लिखा था “मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता”, वैसा ही ज्यों का त्यों रखा गया मुखड़ा। यही नहीं अन्तरे से मुखड़े पर आने वाला कनेक्टिंग्‍लाइन भी नहीं रखा गया। सीधे सीधे तीन अन्तरे लिख डाले –

“तुझे दिल के आइने में मैंने बार बार देखा,
तेरी अखड़ियों में देखा तो झलकता प्यार देखा,
तेरा तीर मैंने देखा तो जिगर के पार देखा”;

“तेरा रंग है सलौना तेरे अंग में लचक है,
तेरी बात में है जादू तेरे बोल में खनक है,
तेरी हर अदा मोहब्बत तू ज़मीन की धनक है”;

“मेरा दिल लुभा रहा है तेरा रूप सादा सादा,
ये झुकी झुकी निगाहें करे प्यार दिल में ज़्यादा,
मैं तुझ ही पे जान दूँगा है यही मेरा इरादा।“

Jaikishan & Rafi
रफी साहब की आवाज़ में गाना रेकार्ड हो गया। पर एक समस्या आ गई। 'प्यार ही प्यार' फिल्म के निर्माता, यानी सतीश वागले साहब के पार्टनर राजाराम जी को गाना ज़रा सा भी पसन्द नहीं आया। और तो और फ़िल्म के वितरक ताराचन्द बरजात्या ने भी गाने को सीधा रीजेक्ट कर दिया और इस मुद्दे पर कोई भी बहस करने से मना कर दिया। सतीश वागले को बहुत बुरा लगा। उड़ते-उड़ते ख़बर जयकिशन के कानों तक भी पहुँच ही गई कि गाना कई लोगों को बेकार लगा है। जयकिशन जी को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ताराचन्द बरजात्या ने ’दाग़’ फ़िल्म के गाने को भी रीजेक्ट कर दिया था, पर वही गाना जो उन्होंने रीजेक्ट किया था आज भी लोगों को याद है, और वह गाना था “ऐ मेरे दिल कहीं और चल, ग़म की दुनिया से जी भर गया”। जयकिशन ने यह भी कहा कि बरजात्या को संगीत की कोई समझ नहीं है, इसलिए मेरी बात मानो, गाना अच्छा है और ख़ूब चलेगा। लिहाज़ा जयकिशन की बात मान ली गई और जो बात मान ली गई थी वह सच भी हो गई। आज भी यह गाना फ़िल्म के बाक़ी गीतों से ज़्यादा याद किया जाता है। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 









Saturday, October 15, 2016

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?



एक गीत सौ कहानियाँ - 95
'जाने कहाँ गए वो दिन ...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुकेश ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।

मुकेश, दत्ताराम, हसरत
फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के तमाम गीतों में से जो दिल सबसे ज़्यादा दिल को छू लेता है, वह गीत है "जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछायेंगे..."। इस गीत में हमें भले दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं, पर असल में इस गीत के लिए तीन नहीं चार नहीं पूरे के पूरे पाँच अन्तरे लिखे गए थे। जो हमें सुनाई देते हैं, वो दो अन्तरे ये रहे...

मेरे क़दम जहाँ पड़े सजदे किए थे यार ने,
मुझको रुला रुला दिया जाती हुई बहार ने।

अपनी नज़र में आजकल दिन भी अन्धेरी रात है,
साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है।


लेकिन जब इस गीत को रेकॉर्ड किया गया तब दो नहीं पूरे पाँच अन्तरों के साथ रेकॉर्ड किया गया था। बाद में, फ़िल्म की लम्बाई बहुत ज़्यादा हो रही थी, इसलिए तीन अन्तरे हटा दिए गए। गीत लिखा था हसरत जयपुरी ने और उन्होंने सिचुएशन के हिसाब केवल दो ही अन्तरे लिखे क्योंकि फ़िल्म में इस गाने के बाद सर्कस के कलाकार स्टेज पर एन्ट्री करते हैं और दूसरा गाना "जीना यहाँ मरना यहाँ" शुरु हो जाता है। म्युज़िक सिटिंग् में हसरत साहब ने जब यह गाना सुनाया तो वहाँ मुकेश जी भी मौजूद थे। मुकेश जी बोले, गीत तो बहुत अच्छा है मगर बहुत छोटा लग रहा है। इसे थोड़ा लम्बा होना चाहिए। उस वक़्त सभी को लगा कि मुकेश जी ठीक कह रहे हैं। सब ने कहा हसरत साहब से कि कुछ और अन्तरे लिख दीजिए। ये तीन अन्तरे लिखे गए... 

इस दिल के आशियाने में उनके ख़याल रह गए,
तोड़ के वो दिल चल दिए हम फिर अकेले रह गए।

मेरे निगाह-ए-शोख़ में आँसुओं के मेले रह गए,
आँसू भी मेरे कह रहे साथी तेरे किधर गए।

हमने तो अपना जानकर उनको गले लगाया था,
पत्थर को हमने पूज कर अपना ख़ुदा बनाया था।


ये तीन अन्तरे लिखे और रेकॉर्ड किए गए, पर फ़िल्म में नहीं लिए गए। मगर मुकेश जी जब भी भारत में या विदेश में शो करते थे, तो इन एक्स्ट्रा तीन अन्तरों के साथ ही पूरा गाना गाया करते थे। उन्हीं के कहने पर हसरत साहब ने ये अन्तरे लिखे थे, इसलिए उन्होंने कभी भी इन अन्तरों को अपने आप से अलग नहीं किया। भले ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर ये अन्तरे नहीं आए, पर हसरत साहब की मेहनत को मुकेश ने कभी नहीं भुलाया। मुकेश जी के जाने के बाद नितिन मुकेश ने भी यह गाना पाँच अन्तरों के साथ ही पर्फ़ॉर्म करना शुरु किया। 1983 में जब हसरत जयपुरी साहब विविध भारती पर जयमाला प्रस्तुत करने के लिए तशरीफ़ लाए थे, तब इस गीत को बजाने से पहले उन्होंने ये कहा था - "हाँ फ़ौजी भाइयों, फिर होशियार, अबके दिल थाम लीजिए, फिर वही एक शेर पहले अर्ज़ करूंगा। अर्ज़ किया है, आइना क्यों ना दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझसा कहें जिसे। "तुझसा कहें जिसे" मैंने क्यों कहा, आप ख़ुद सुन लीजिए!"

राज कपूर, हसरत, शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र - जाने कहाँ गए वो दिन
60 के दशक के अन्त तक आते-आते राज कपूर की टीम जैसे टूटने लग गई थी। शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन चल बसे। ऐसे में ’मेरा नाम जोकर’ में यह गीत जैसे पुकार पुकार कर इस टीम के दिल की बात बयाँ कर रही हो। तभी तो जब शंकर जी विविध भारती पर जयमाला प्रस्तुत करने आए थे, तब उन्होंने न केवल इस गीत को बजाया, बल्कि भूमिका भी बड़े मार्मिक रूप में दी। आप भी पढ़िए - "आज जब आपको अपनी पसन्द के गाने सुनाने का मौक़ा मिला है तो एक अजीब कश्मकश में फँस गया हूँ। पिछले 25-30 सालों में इस शंकर-जयकोशन ने आपकी सेवा में इतनी सारी धुनें तैयार की हैं कि उनमें से कुछ गीतों को चुनने बैठा हूँ तो उलझ कर रह गया हूँ। किसे भूल जाऊँ, किसे याद रखूँ! सामने रेकॉर्ड्स का ढेर लगा है, हर गाने के साथ मीठी यादों के सपने सजे हैं। आँखों के सामने मानो बीती हुए दिन यूं उभर रहे हैं जैसे कोई फ़िल्म चल रही हो! पहला दृश्य उभरता है जब मैं, जयकिशन, शैलेन्द्र, हसरत, मुकेश और राज कपूर आर.के. स्टुडिओज़ में बैठे हुए हैं और हो रही है गीतों की बरसात। ’बरसात’ के बाद ’आवारा’, ’आह’, ’बूट पालिश’, ’संगम’, ’कल आज और कल’, ’जिस देश में गंगा बहती है’ और ’मेरा नाम जोकर’। और तभी जैसे फ़िल्म टूट जाती है, रोशनी हुई तो देखा कि शैलेन्द्र नहीं है, जयकिशन भी बहुत दूर जा चुका है, और जो रह गए हैं वो भी बेगाने से लगते हैं। हर एक आह पर सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ कि "जाने कहाँ गए वो दिन"! जाने वाले कभी नहीं आते, आती हैं तो बस उनकी यादें। जयकिशन मेरा केवल पार्टनर ही नहीं बल्कि वो मेरा भाई, मेरा हमदम था। एक दूसरे के बिना हम अधूरे थे। इसलिए आज भी मैंने जय को अपने से अलग नहीं किया। आज भी डिवान पर दो हारमोनियम रखे हुए हैं। जब पुराने साथी बेगाने से लगते हैं, तब ऐसा लगता है कि जैसे जय कह रहा हो कि शंकर भाई, हिम्मत हारने से काम नहीं चलेगा, तुम हँसते रहो और आगे बढ़ते रहो!"



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, February 28, 2015

INTERVIEW OF LYRICIST HASRAT JAIPURI'S DAUGHTER KISHWARI JAIPURI

 बातों बातों में - 05

 गीतकार हसरत जयपुरी की पुत्री किश्वरी जयपुरी से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे..." 






नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज फ़रवरी माह का चौथा शनिवार है और आज प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार हसरत जयपुरी की पुत्री किश्वरी जयपुरी से की गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश।




किश्वरी जी, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर।

नमस्कार, और शुक्रिया मुझे याद करने के लिए।

हम बता नहीं सकते कि हमें कितनी ख़ुशी हो रही है कि हसरत जयपुरी साहब जैसे दिग्गज और लीजेन्डरी गीतकार की पुत्री, यानी कि आप आज हमारे बीच हैं और हमें आप के ज़रिए हसरत साहब की ज़िन्दगी और उनके गीतों से सम्बन्धित तमाम बातचीत करने का मौका मिल रहा है।

मुझे भी यकीनन बेहद ख़ुशी होगी, अपने डैडी के बारे में बताते हुए। 

किश्वरी जी, हसरत साहब के बारे में जो आम जानकारी है वो सब तो इन्टरनेट पर उपलब्ध है, उनके लिखे गीतों की फ़ेहरिस्त भी आसानी से मिल जाती है, इसलिए हमने सोचा कि आज के इस साक्षात्कार में हम आपसे कुछ ऐसे सवाल पूछें जो बिल्कुल एक्स्क्लूसिव हों। मेरा मतलब है कि एक बेटी की नज़र से हसरत साहब की शख़्सियत को हम जानना चाहेंगे।

जी ज़रूर! आप पूछ सकते हैं अपने सवाल।

शुक्रिया! सबसे पहले तो आप यह बताइए कि कैसा लगता है हसरत जयपुरी की बेटी कहलाना, वो हसरत जयपुरी जो हिन्दी फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के सबसे लोकप्रिय गीतकारों में से एक थे?

मुझे अपने डैडी की एकलौती बेटी बनने का जो मौका मिला है, इससे मैं अपने आप को बहुत ही ज़्यादा ख़ुशनसीब समझती हूँ, I feel extremely privileged। मैं अल्लाह का शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे इस धरती पर रोमान्स के मशहूर शहंशाह की एकलौती बेटी बना कर भेजा है। इससे ज़्यादा और इससे बेहतर मैं कुछ नहीं माँग सकती थी। 

वाह, क्या बात है! वाकई आप ख़ुशक़िस्मत हैं कि आप हसरत जयपुरी की बेटी हैं। अच्छा किश्वरी जी, यह बताइए कि आपका जो बाल्यकाल था, यानी जब आप एक बच्ची के रूप में बड़ी हो रही थीं, वह दशक कौन सा दशक था?

मेरा जन्म साल 1963 को हुआ था और यह वह दौर था जब डैडी अपनी लोकप्रियता और कामयाबी की बुलन्दियों को छू रहे थे। 

जी, मेरा इशारा भी उसी तरफ़ था, मैं भी इसी बात पर आ रहा था कि हसरत साहब की उस सफल दौर में जब आप बड़ी हो रही थीं, तब क्या आपको यह अहसास था, क्या इतनी समझ थी उस वक़्त कि आप इतने बड़े गीतकार की बेटी हैं?

हसरत जयपुरी नन्ही किश्वरी के साथ
जी, जैसे जैसे मैं बड़ी हो रही थी, मेरा रिश्ता डैडी के गीतों के साथ जुड़ता और पनपता चला जा रहा था। मैं, मेरी माँ, मेरे दोनों भाई और डैडी, हम सब बैठ कर हमारे Philips Record Player पर उनके गीतों को सुना करते थे। अफ़सोस की बात है कि हम 40 और 50 के दशकों के उनके गीतों का आनन्द नहीं ले सके और उनकी कामयाबी के जश्नों को अपनी आँखों से नहीं देख सके। क्योंकि मेरा जन्म 1963 में हुआ, इसलिए 60 का दशक भी बहुत कम उम्र होने की वजह से समझ ही नहीं सकी। पर जैसे-जैसे बड़ी हुई, मैं उनके गीतों की तरफ़ खींचती चली गई, आकर्षित होती चली गई। उनका लहू मेरे रगों में दौड़ रहा है, इसलिए बाद में ही सही, पर मैं उनके गीतों से जुड़ ज़रूर गई।

हसरत साहब एक पिता के रूप में कैसे थे? किस तरह का सम्बन्ध था आप दोनों के बीच?

मेरा मेरे डैडी के साथ जो सम्बन्ध था वह इस दुनिया से परे था। यह रिश्ता बहुत ही ज़्यादा मज़बूत और बहुत ही ज़्यादा प्यार भरा था। क्योंकि मैं उनकी एकलौती बेटी थी, इसलिए लाड़-प्यार कुछ ज़्यादा ही करते थे। मैं उनकी आँखों का तारा थी, वो मुझसे इतना ज़्यादा प्यार करते थे कि अगर मैं कहती कि पिताजी, अभी दिन है, तो वो कहते हाँ दिन है, फिर चाहे वह रात ही क्यों न हो!

जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे... 

जी बिल्कुल! और फिर हर रात को सोने जाने से पहले वो हमारे बेडरूम में आते और हम तीनों से कहते - "अल्लाह इनकी हज़ारी उमर करे"। मैं क्या बताऊँ, वो एक बहुत ही ज़्यादा प्यार करने वाले पिता थे। आज भी मैं उन्हें बहुत ज़्यादा मिस करती हूँ, उनकी कमी को महसूस करती हूँ।

किश्वरी जी, मैं यही कह सकता हूँ कि भले वो शारीरिक रूप से हमारे बीच में नहीं हैं, पर उनका जो काम है, उनके जो लिखे हुए गीत हैं, वो हमेशा-हमेशा इस धरती पर गूँजते रहेंगे। इसलिए यह कहना अनुचित होगा कि आज वो हमारे बीच नहीं हैं। कलाकार भले इस फ़ानी दुनिया से चला जाए, पर उसकी कला अमर रहती है।

बिल्कुल सही कहा आपने!

पिता की गोद में किश्वरी; माँ और बड़े भाई के साथ
अच्छा किश्वरी जी, यह बताइए कि घर में सारे लोग जब मौजूद होते थे, पिताजी, माँ, दोनों भाई और आप, तो किस तरह का माहौल हुआ करता था घर में? अपनी यादों को ताज़ा करना चाहेंगी आप?

ज़रूर, पिताजी तो बड़े ही सीधे-सादे इंसान थे, फ़कीर थे, he was very down to earth। उन्हें मम्मी के हाथों से बना अच्छा मुग़लई खाना बहुत पसन्द था। शायरी तो ख़ैर उन्हें पसन्द थी। उन्होंने अपने तमाम सुनहरे हिट गीत हमारे खार स्थित एक बेडरूम-हॉल फ़्लैट में लिखे थे। 

यानी आप यह कहना चाहती हैं कि भीड़ में बैठ कर वो गाने लिखते थे, उन्हें एकान्त में लिखना पसन्द नहीं था? 
जी हाँ, क्योंकि वो God-gifted थे, उन्हें लिखने के लिए किसी तरह की प्राइवेसी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। मैंने उन्हें किसी गीत को मिनटों में लिखते हुए देखा है। वो छन्दों को इस क़दर लिख जाते थे कि जैसे ये छन्द उपर से उतार दिए हों किसी ने उन पर। जब वो किसी गीत के मुखड़े और अन्तरों को लिख डालते, तो वो माँ को बुलाते और कहते - "अजी सुनती हो, लो यह गाना सुनो"। अगर माँ उस कमरे में मौजूद ना हों तो ख़ुद किचन में चले जाते थे और खाना बनाती हुई मेरी माँ को उसी वक़्त अपना लिखा गाना सुनाने लग जाते।

बहुत ख़ूब! अच्छा आपने तो यह बता दिया कि हसरत साहब आपकी माँ को अपना लिखा हुआ गीत पढ़ कर सुनाते थे। क्या वो आप बच्चों को भी सुनाते थे या फिर किसी गीत को लिखते समय आप से सुझाव माँगते थे या आपकी राय लेते थे?

वो ज़्यादातर माँ के साथ ही अपने गीतों की चर्चा किया करते थे। कभी-कभार वो मुझे या मेरे भाइयों से अपने गीत को हिन्दी में लिखने के लिए कहते थे क्योंकि उन्हें हिन्दी लिखना और पढ़ना नहीं आता था।

"हिन्दी लिखना और पढ़ना नहीं आता था", मतलब???

जी हाँ, वो उर्दू में अपनी शायरी और गीत लिखते थे। उन्हें हिन्दी नहीं आती थी।

बहुत ही आश्चर्य हुआ यह जानकर। हिन्दी फ़िल्मों के सफलतम गीतकारों में से एक, और हिन्दी भाषा पढ़ना और लिखना नहीं जानते थे। कमाल की बात है! किश्वरी जी, यह बताइए कि क्या आपने कभी उन्हें किसी गीत में असिस्ट किया है?

एक गीत याद है मुझे जिसमें मैंने उनकी मदद की थी क्योंकि बहुत ही कम समय में उन्हें वह गीत तैयार करना था। और वह गीत था ’राम तेरी गंगा मैली’ फ़िल्म का "सुन साहिबा सुन प्यार की धुन"। "सुन साहिबा सुन" जुमला तैयार था, पर आगे का गीत उन्हें पूरा करना था। इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि "सुन" से तुकबन्दी करते हुए कुछ शब्द मैं सुझाऊँ। मैंने उन्हें "धुन", "चुन", "पुन", "बुन", "शगुन" जैसे शब्द सुझाए।

वाह क्या बात है, क्या बात है! इसका मतलब यह कि इस बेहद मशहूर गीत की सफलता में आपका भी योगदान रहा है। यह बड़ी ही अनोखी जानकारी आपने दी हमें। अच्छा उसके बाद क्या हुआ?

उसके बाद डैडी ने फ़टाफ़ट अन्तरों को पूरा किया और निकल गए। रेकॉर्डिंग् से वापस आकर उन्होंने मुझे 5000 रुपये इनाम में दिए, और मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा।

बहुत ख़ूब! गीतों की जब बात चल ही पड़ी है तो किश्वरी जी, यह बताइए कि हसरत साहब के लिखे अनगिनत गीतों में से वह एक गीत कौन सा है जिसे आप सबसे उपर रखना चाहेंगी, या जो आपको सबसे ज़्यादा अज़ीज़ है?

सबसे पसन्दीदा गीत तो वही गीत है जिसे Song of the Century कहा गया है, "बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है"। जैसे ही मेरे कानो में यह बात पहुँची कि डैडी के लिखे इस गीत को Song of the Century का ख़िताब दिया गया है, मैं तो जैसे आसमान में उड़ने लगी। डैडी हम सब से दूर जाने के बाद भी अमर हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं! अच्छा यह बताइए कि इस गीत की क्या ख़ास बात है?

इस गीत की सबसे बड़ी ख़ासियत तो यही है कि भले यह एक रोमान्टिक गीत है, पर डैडी ने इसे किसी ख़ूबसूरत लड़की की कल्पना करते हुए नहीं लिखा था। यह गीत तो उन्होंने हमारे प्रोफ़ेट मोहम्मद की शान में लिखा था। यह मुझे डैडी ने ख़ुद एक बार बताया था।

क्या बात है! यानी कि इस गीत को अगर गहराई से समझा जाए तो इसे एक आध्यात्मिक गीत का दर्जा भी दिया जा सकता है। 

जी हाँ।

मुझे याद है ऐसा ही एक गीत एस. एच. बिहारी साहब का लिखा हुआ है "है दुनिया उसी की ज़माना उसी का, मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का", इस गीत के साथ भी इसी तरह का क़िस्सा जुड़ा हुआ है।

जी।

किश्वरी जी, आपका सबसे चहीता गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में "बहारों फूल बरसाओ" है। पर एक टीम हुआ करती थी राज कपूर, शैलेन्द्र-हसरत, शंकर-जयकिशन और मुकेश की। तो मुकेश का गाया और आपके पिताजी का लिखा हुआ वह कौन सा गीत है जो आपके दिल के बहुत क़रीब है?

वह गीत यकीनन फ़िल्म ’संगम’ का है, "ओ महबूबा, तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए-मक़सूद"। यह दरअसल राज जी के जज़्बात थे वैजयन्तीमाला जी के लिए, जिसे डैडी ने इस ख़ूबसूरत रूमानी शायरी का जामा पहनाया। और आपको बताऊँ, यह गीत बिल्कुल उस वक़्त लिखा गया था जब राज जी और वैजयन्तीमाला जी का रोमान्स सर चढ़ कर बोल रहा था फ़िल्म ’संगम’ के निर्माण के दौरान।

किश्वरी जी, हमने अभी-अभी टीम की बात की, तो उस ज़माने में क्या आपकी भी मुलाक़ातें हुईं शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र जी, लता जी, मुकेश जी, और रफ़ी साहब जैसे दिग्गज हस्तियों के साथ?

जब मैं छोटी थी, तब मैं शंकर अंकल, जय अंकल, मुकेश जी और राज कपूर जी से कई बार मिली जब ये लोग डैडी से मिलने हमारे घर पर आते थे। जय अंकल तो दीवाली पर हमारे घर आनेवाले लोगों में सबसे पहले होते थे अपने एक बड़े से मिठाई के डब्बे और ड्राई फ़्रूट्स के साथ। मैं बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मुझे ग्रेट रफ़ी साहब और मन्ना दा से भी मिलने का मौका मिला जब मैं डैडी के किसी गीत की रेकॉर्डिंग् पर उनके साथ गई थी। रफ़ी साहब और मैंने एक दूसरे को सलाम किया और उन्होंने मेरे माथे को चूमा। आशा जी भी बहुत ही प्यार से मिलीं जब मैं अपने पति के साथ उनकी किसी रेकॉर्डिंग् पर गई थी। इस तरह से मेरी ख़ुशनसीबी ही कहूँगी कि मुझे ऐसे बड़े-बड़े कलाकारों से मिलने का मौक़ा नसीब हुआ अपने डैडी की वजह से।

हसरत साहब की बेटी बन कर जन्म लेना ही अपने आप में एक सौभाग्य है। अच्छा, किश्वरी जी, अब हम जानना चाहेंगे आपकी माताजी के बारे में। कहा जाता है कि हर कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है, तो बताइए कि आपकी माताजी का आपके पिता की सफलता में कितना बड़ा योगदान था?

मेरी माँ मेरे डैडी का ताक़त स्तम्भ थीं। वो डैडी और उनकी कमाई का उचित देख-रेख किया करती थीं और चाहे ख़ुशहाली हो या तंगी, हर तरह के दिनों में, बिना किसी शर्त के, वो उनका साथ दिया करतीं। माँ डैडी के कई गीतों की प्रेरणा भी बनीं। "ग़म उठाने के लिए" एक ऐसा पछतावा भरा गीत है जिसे डैडी ने माँ के लिए लिखा था जिन्हे वो बहुत ज़्यादा प्यार करते थे।

"ग़म उठाने के लिए", आपका मतलब है फ़िल्म ’मेरे हुज़ूर’ का वह गीत?

जी हाँ।

"ग़म उठाने के लिए मैं तो जिए जाऊँगा, साँस की लय पे तेरा नाम लिये जाऊँगा"। बहुत ही ख़ूबसूरत गीत है यह।

"तू ख़यालों में मेरे अब भी चली आती है, अपनी पलकों पे उन अश्क़ों का जनाज़ा लेकर, तूने नींदे करी क़ुरबान मेरी राहों में, मैं नशे में रहा ग़ैरों का सहारा लेकर, ग़म उठाने के लिए मैं तो जिए जाऊँगा"

बहुत ख़ूब! अच्छा किश्वरी जी, यह गीत तो एक ऐसा गीत था जिसे हसरत साहब ने आपकी माताजी की याद में लिखा था। आप की राय में उनका लिखा वह कौन सा गीत होगा जिसे आप अपनी माँ की तरफ़ से हसरत साहब को समर्पित करना चाहेंगे?

"हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे"

वाह! वाह! क्या बात है!

"हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे" महज़ एक गीत नहीं है बल्कि ये प्यार की धाराएँ हैं जो स्वर्ग से धरती पर बरसी हैं। ऐसा गीत और कोई नहीं सिर्फ़ रोमान्स का बादशाह ही लिख सकता था। "हम प्यार के गंगाजल में बमलजी तन मन अपना धो बैठे"। यह गीत मुझे बेहद पसन्द है।

हम बात कर रहे थे आपकी माताजी की। उनसे जुड़ा और कोई वाक्या बताना चाहेंगी?

एक बार एक पार्टी में भगवान दादा और नादिरा जी मेरे डैडी से कहने लगे, "हसरत मिया, आप बहुत ख़ुशक़िस्मत हो जो आपको ऐसी बीवी मिली है, वरना आप जयपुर में या तो भीख माँग रहे होते या मज़दूरी कर रहे होते"। डैडी का जो ड्रीम-हाउस बंगला है ’ग़ज़ल’ के नाम से, उसके पीछे भी माँ का ही सबसे बड़ा हाथ है। डैडी माँ को ’बिलक़िस-ए-ज़मानी’ जिसका अर्थ है दुनिया की राजकुमारी। मेरी माँ का नाम बिलक़िस था।

वाह! किश्वरी जी, जब ऐसी रूमानियत भरी बातें हो रही हैं तो ऐसे में हसरत साहब के किस गीत का ज़िक्र करना चाहेंगी?

फ़िल्म ’तुमसे अच्छा कौन है" का लता जी और रफ़ी साहब का गाया "रंगत तेरी सूरत सी किसी में नहीं नहीं, ख़ुशबू तेरे बदन सी किसी में नहीं नहीं। युं तो हसीं लाख ह दुनिया की राह में, आता नहीं है कोई नहीं मेरी निगाहों में, तुझमें है जो अगन किसी में नहीं नहीं..."। इस गीत का हर एक लफ़्ज़ मोहब्बत की ख़ुशबू से भरा हुआ है। और यह गीत मुझे मेरी पहली मोहब्बत की भी याद दिला जाता है। मैं इस गीत को लगातार सुनती चली जा सकती हूँ और दिन के किसी भी वक़्त गुनगुना भी लेती हूँ।

वाह! एक वह दौर था, एक आज का दौर है। फ़िल्म-संगीत की धारा में बहुत सारे बदलाव आए हैं। तो आज के रोमान्टिक गीतों के बारे में आपके क्या विचार हैं?

आजकल के गीतों में रोमान्स के बारे में मेरा ख़याल यह है कि अब रोमान्स का वजूद ही नहीं है। डैडी के शब्दों में आज के गाने महज़ तुकबन्दी बन कर रह गए हैं। आज जिस तरह के गीत लिखे जा रहे हैं, कोई भी गीतकार बन सकता है, मैं भी लिख सकती हूँ।

क्या आपको भी लिखने का शौक़ है?

जी हाँ, थोड़ा बहुत लिख लेती हूँ। 

कुछ सुनाइए ना?

एक कविता जो मैंने डैडी को डेडिकेट करते हुए लिखा है, वह सुनाती हूँ।

ज़रूर!

हर एक मनज़र तमाशा दिखाई देता है
तेरे बिना सबकुछ फीका दिखाई देता है
अब आयें भी तो कहाँ से सदायें तेरी
ना तू है ना तेरा साया दिखाई देता है।

वाह! बहुत ख़ूब! पर एक हक़ीक़त यह भी है कि अपने गीतों के ज़रिए हसरत साहब हमेशा जीवित रहेंगे। एक और सुनाइए किश्वरी जी?

एक और ग़ज़ल सुनिए...
किस तरह जान को रोकूँ मैं, क्या करूँ मुझको यह ख़याल सताता है,
जाने का नाम जब भी लेता है वो, मैं क्या करूँ दिल मेरा डूब जाता है।

बहुत सुन्दर ग़ज़ल है! वैसे आपको हसरत साहब की कौन सी ग़ज़ल बहुत पसन्द है?

एक ग़ज़ल है फ़िल्म ’मेरे हुज़ूर’ फ़िल्म में रफ़ी साहब की आवाज़ में, "वह ख़ुशी मिली है मुझको", यह मुझे बहुत पसन्द है और हर प्यार करने वाला अपने आप को इस ग़ज़ल के साथ जोड़ सकता है।

इस ग़ज़ल के तमाम शेर आपको याद हैं?

जो गुज़र रही है मुझ पर, उसे कैसे मैं बताऊँ,
वह ख़ुशी मिली है मुझको, मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

मेरे दिल की धड़कनों का यह पयाम तुमको पहुँचे,
मैं तुम्हारा हमनशी हूँ, यह सलाम तुमको पहुँचे,
उसे बन्दगी मैं समझूँ जो तुम्हारे काम आऊँ
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

वाह!

मेरी ज़िन्दगी में हमदम कभी ग़म ना तुम उठाना,
कभी आए जो अन्धेरे मुझे प्यार से बुलाना,
मैं चिराग़ हूँ वफ़ा का, मैं अन्धेरे में जगमगाऊँ, 
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

और जो तीसरा शेर है, वह तो जैसे मेरे जसबात है डैडी के लिए....

मेरे दिल की महफ़िलों में वह मकाम है तुम्हारा,
कि ख़ुदा के बाद लब पर बस नाम है तुम्हारा,
मेरी आरज़ू यही है मैं तुम्हारे गीत गाऊँ,
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

वाह! क्या बात है! बहुत ही सुन्दर! अच्छा किश्वरी जी, क्या आपके दोनों भाई भी लिखते हैं? उन्हें भी शौक़ है?

जी नहीं, सिर्फ़ मैं ही थोड़ा-बहुत लिखती हूँ।

क्या नाम हैं आपके दो भाइयों के?

मेरे बड़े भाईसाहब का नाम है अख़्तर हसरत जयपुरी और मेरा छोटा भाई है आसिफ़ जयपुरी।

अच्छा किश्वरी जी, और कौन कौन से गीत हैं हसरत साहब के जो आपको पसन्द हैं?

मुकेश जी का गाया फ़िल्म ’दीवाना’ का गीत "तारों से प्यारे दिल के इशारे, प्यासे हैं अरमान आ मेरे प्यारे" मुझे बहुत पसन्द है। इस गीत को डैडी ने इतने प्यार से लिखा है कि जब भी मैं यह गीत सुनती हूँ तो रोमान्स की एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाती हूँ। यह गीत सच्चे प्यार की ताक़त को बयान करता है...  आना ही होगा तुझे आना ही होगा...। फ़िल्म ’आख़िरी दाँव’ का एक गीत है "ऐसा ना हो कि इन वादियों में मैं खो जाऊँ, और तुम मुझे ढूंढा करो और मैं लौट के ना आऊँ", यह भी रफ़ी साहब का गाया हुआ है। डैडी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जी के ज़बरदस्त फ़ैन थे और उनकी एक दिली तमन्ना थी एल.पी के साथ काम करने की। इस तरह से लक्ष्मी-प्यारे जी की यह राजसी कम्पोज़िशन जिसे रफ़ी साहब की दिव्य आवाज़ ने संवारा है, मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि यह मुझे डैडी की याद दिला जाता है। एक और गीत, यह भी रफ़ी साहब का ही गाया हुआ, "रुख़ से ज़रा नक़ाब उठा दो, मेरे हुज़ूर"। शहद से भरी हुई यह ग़ज़ल, और शायद ’मेरे हुज़ूर’ फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में इससे बेहतर गीत नहीं सकता था। मिठास और ख़ुशबू लिए यह ग़ज़ल हर प्यार करने वाले को समर्पित है। फ़िल्म ’आरज़ू’ की ग़ज़ल "अजी रूठ कर अब कहाँ जाइयेगा" भी मुझे बेहद पसन्द है। डैडी ने प्यार के बेहद नाज़ुक शब्दों का इस्तेमाल इसमें किये हैं, जितनी भी तारीफ़ करूँ रुकती नहीं ज़ुबाँ। राजसी ग़ज़ल!

वाक़ई एक से बढ़ कर एक रचनाएँ हैं ये सभी, और आपकी पसन्द की भी दाद देता हूँ किश्वरी जी।

शुक्रिया!

किश्वरी जी, अब हम इस साक्षात्कार के अन्तिम चरण में पहुँच गए हैं। यह बताइए कि आपकी हसरत साहब से अन्तिम मुलाक़ात कब हुई थी?

डैडी से जो मेरी अन्तिम मुलाक़ात थी वह बहुत ही दिल को छू लेने वाली और दिल को मरोड़ कर रख देने वाली थी। मैं साल 1999 में भारत आई थी और यहाँ तीन महीने रही। तीन महीने ख़त्म हो गए और मेरे वापस जाने का समय आ गया। मुझे याद है कि जब मैं एअरपोर्ट के लिए निकल रही थी तब डैडी ने कस के मुझे गले से लगा लिया और ज़ोर ज़ोर से रोने लगे और कहने लगे कि बेटा, यह हमारी आख़िरी मुलाक़ात है। और हाँ, उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और मेरे चले जाने के एक महीने बाद ही उनका देहान्त हो गया। मैंने उन्हें उस तरह से रोते हुए कभी नहीं देखा था पहले। उस दिन को याद करते हुए आज भी मेरी आँखें भर आती हैं।

मैं समझ सकता हूँ। आपको बस हसरत साहब का ही लिखा एक गीत याद दिलाना चाहूँगा, "तुम मुझे युं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे.."

बिल्कुल सच बात है!

चलते-चलते हसरत साहब के किस गीत के ज़िक्र से इस मुलाक़ात को आप अंजाम देना चाहेंगी?

यकीनन "जाने कहाँ गए वो दिन...", एक बहुत ही दिल को मरोड़ कर रख देने वाला गीत, जो पैथोस से भरा हुआ है। इस गीत में डैडी ने जैसे अपनी निजी भावनाओं को ही गीत की शक्ल में उतार दिए हों, यह वह समय था जब उनके तथाकथित ’good friends' ने उनका साथ छोड़ दिया था। डैडी जब भी कभी यह सुनते, रोने लगते। मैं भी जब भी कभी यह गीत सुनती हूँ, मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

किश्वरी जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका, आपने हमें इतना लम्बा समय दिया, हसरत साहब की इतनी सारी बातें हमें बताईं, उनके गीतों की चर्चा कीं, ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से और अपने पाठकों की तरफ़ से, और मैं अपनी तरफ़ से आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ, नमस्कार!

आपका भी बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने मुझे याद किया और डैडी से जुड़ी बातें बताने का मौका दिया। नमस्कार!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, November 30, 2014

‘झनक झनक पायल बाजे...’ : SWARGOSHTHI – 196 : RAG ADANA



स्वरगोष्ठी – 196 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 5 : राग अड़ाना


फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उस्ताद अमीर खाँ ने गाया राग अड़ाना के स्वरों में यह गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के पाँचवें अंक में आज हम आपसे 1955 में प्रदर्शित, भारतीय फिल्म जगत की संगीत और नृत्य की प्रधानता वाली फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के एक शीर्षक गीत- ‘झनक झनक पायल बाजे...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग अड़ाना के स्वरों का ओजपूर्ण उपयोग किया गया है। भारतीय संगीत के उल्लेखनीय स्वरसाधक उस्ताद अमीर खाँ ने इस गीत को स्वर दिया है। खाँ साहब और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में राग देसी के स्वरों में पिरोया युगल गीत आपको इस श्रृंखला के दूसरे अंक में हम सुनवा चुके हैं। आज हम उस्ताद अमीर खाँ और समूह स्वरों में राग अड़ाना पर आधारित यह गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग ‘अड़ाना’ की कर्णप्रियता का अनुभव करने के लिए इस राग की एक भावपूर्ण रचना उस्ताद कमाल साबरी की सारंगी पर सुनेंगे। 
 


उस्ताद अमीर खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था।

वसन्त देसाई 
संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। दरअसल वसन्त देसाई फिल्मों के नायक बनने की अभिलाषा लेकर ‘प्रभात’ में शान्ताराम के पास आये थे। उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शान्ताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसन्त देसाई ने एक रेडिओ प्रस्तुतकर्त्ता को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूँही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने ही तो आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन। तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला-पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शान्ताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बाल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा। कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घण्टे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ। ऋषियों के आश्रम जैसा था 'प्रभात' का परिवेश। उनका हमेशा से ऐसा ही स्वभाव रहा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस विभाग में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा विभाग हो या संगीत विभाग। इसलिए आज मैं फिल्म निर्माण की हर इकाई का काम जानता हूँ। फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में मैं उनका सहायक तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चन्द्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" आरम्भ से ही शान्ताराम जी को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा प्राप्त था, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है। इसके बाद उनकी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सन्देश दिया है। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत।


राग – अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म – झनक झनक पायल बाजे : स्वर – उस्ताद अमीर खाँ और साथी : संगीत – वसन्त देसाई : गीत – हसरत जयपुरी





उस्ताद कमाल साबरी 
फिल्म के इस गीत में आपको राग अड़ाना के स्वरों का स्पष्ट अनुभव हुआ होगा। राग दरबारी से ही मिलता-जुलता राग है, अड़ाना। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। षाड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में कोमल गान्धार और शुद्ध मध्यम स्वर वक्रगति से प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। वीर रस के गीतों के लिए यह एक आदर्श राग है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अतिकोमल गान्धार स्वर का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, अर्थात इस राग के स्वर अधिकतर मध्य और तार सप्तक में चलते हैं। जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग अड़ाना, राग दीपक के आठ पुत्रों में से एक माना जाता है। इसे ‘रात की सारंग’ भी कहा जाता है।

वाद्य संगीत पर राग अड़ाना की सहज अनुभूति के लिए अब हम आपको यही राग सारंगी पर सुनवाते हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट होता है। आपके लिए सारंगी पर तीनताल में निबद्ध रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद कमाल साबरी। सारंगीवादकों के खानदान की सातवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे उस्ताद कमाल साबरी रामपुर-मुरादाबाद के सेनिया घराने की वादन परम्परा के प्रतिभावान संवाहक हैं। इनके पिता उस्ताद साबरी खाँ विश्वविख्यात सारंगीवादक थे। कमाल साबरी ने अनेकानेक अवसरों पर स्वतंत्र सारंगीवादन के माध्यम से संगीत-प्रेमियों को चमत्कृत किया है। हमारी आज कि गोष्ठी में कमाल साबरी राग अड़ाना की एक ओजपूर्ण रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रस्तुति में तबला पर साथ दिया है, सर्वर साबरी ने। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज का यह अंक यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – अड़ाना : सारंगी पर तीनताल की रचना : उस्ताद कमाल साबरी






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 196वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग साठ वर्ष पहले की एक फिल्म के जुगलबन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – जिस ताल में यह गीत निबद्ध है, उसे पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 6 दिसम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 198वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 194वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में गाये, फिल्म मुगल-ए-आजम के गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचंदी। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के क्षेत्र में किये गए योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



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