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Sunday, October 26, 2014

‘रस के भरे तोरे नैन...’ : SWARGOSHTHI – 191 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 191 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 10 : ठुमरी भैरवी

‘आ जा साँवरिया तोहें गरवा लगा लूँ, रस के भरे तोरे नैन...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर पिछले दस सप्ताह से जारी 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला के इस समापन अंक में आज आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः कृष्णमोहन मिश्र और संज्ञा टण्डन की ओर से हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हमने आपको कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन कराया जिन्हें फिल्मों में भी शामिल किया जा चुका है। पिछले अंक में हमने आपसे एक ऐसी ठुमरी पर चर्चा की थी, जिसमें नायिका की आँखों के सौन्दर्य का बखान किया गया है। परन्तु आज की ठुमरी में नायक की आँखों के आकर्षण का रसपूर्ण चित्रण किया गया है। आज हम जिस ठुमरी पर चर्चा करेंगे, वह है- ‘आ जा साँवरिया तोहे गरवा लगा लूँ, रस के भरे तोरे नैन...’। प्रत्यक्ष रूप से तो यह ठुमरी श्रृंगार रस प्रधान है किन्तु कुछ समर्थ गायक-गायिकाओं ने इसे कृष्णभक्ति से तो कुछ ने नायिका के विरह भाव से जोड़ा है। इन सभी भावों की अभिव्यक्ति के लिए राग भैरवी के अलावा भला और कौन सा राग हो सकता है? इस श्रृंखला में हमने आपके लिए पारम्परिक ठुमरी के एक या दो उदाहरण तथा उसके फिल्मी संस्करण का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, किन्तु श्रृंखला की इस समापन कड़ी में आज की ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ के परम्परागत स्वरूप के हम चार उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। दरअसल 1905 में गौहर जान की गायकी से लेकर आधुनिक काल में गिरिजा देवी की गायकी के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हम पिछली पूरी एक शताब्दी के दौरान ठुमरी गायकी की यात्रा को रेखांकित भी कर रहे हैं। आप इस ठुमरी का रसास्वादन गौहर जान, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी और हीरादेवी मिश्र की आवाज़ों में करेंगे। 



मारी आज की ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ की पहली गायिका हैं, अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका, गौहर जान। 26 जून 1873 को जन्मीं गौहर जान, आर्मेनियन माता-पिता की सन्तान थीं। हालाँकि उनकी माँ विक्टोरिया का जन्म भारत में ही हुआ था और उनका विवाह 1872 में विलियम रावर्ट के साथ हुआ था। विक्टोरिया भारतीय गायन और नृत्य शैली में पारंगत थी। रावर्ट के साथ विवाह सम्बन्ध टूटने के बाद विक्टोरिया ने अपने एक संगीत के कद्रदान खुर्शीद से निकाह कर लिया और बनारस आ बसीं। उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया और खुद का नाम बदल कर मालिका जान कर लिया और अपनी बेटी को गौहर जान नाम दिया। गौहर को ठुमरी, दादरा और गजल गायन में खूब शोहरत मिली। भारत का पहला डिस्क, ग्रामोफोन कम्पनी ने जो जारी किया, वह उनकी आवाज़ में ख़याल गायन का था, जो राग जोगिया में निबद्ध था। 1902 में जारी हुए इस पहले रिकॉर्ड से लेकर 1920 तक उनके लगभग 600 रेकॉर्ड्स बाजार में आए। हिन्दी, उर्दू के अलावा उन्होंने, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल, अरबी, पश्तो, फ्रेंच, और अँग्रेजी भाषाओं में भी गीत गाये थे। उन दिनों ग्रामोफोन कम्पनी के चलन के अनुसार गौहर जान अपनी हर रिकॉर्डिंग का समापन इस संवाद के साथ करती थी– 'My name is Gauha Jaan' (मेरा नाम गौहर जान है)। गायिका गौहर जान (1873-1930) की आवाज़ में ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ जिसे अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, ग्रामोफोन कम्पनी ने इसकी रिकॉर्डिंग 1905 में की थी।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका गौहर जान




बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जो ठुमरी गायिकाएँ संगीत-रसिकों की सिरमौर बनीं थी उनमें शीर्ष पर एक ही नाम था, रसूलन बाई (1902-1974) का। बात जब बोल-बनाव ठुमरी की हो तो रसूलन बाई का ज़िक्र आवश्यक हो जाता है। पूरब अंग की गायकी- ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी आदि शैलियों की अविस्मरणीय गायिका रसूलन बाई बनारस (वाराणसी) की रहने वाली थीं। संगीत के संस्कार इन्हें अपनी नानी से विरासत में मिले थे। रसूलन बाई के संगीत को निखारने में उस्ताद आशिक खाँ, नज्जू मियाँ और टप्पा गायकी के अन्वेषक मियाँ शोरी के खानदान के शम्मू खाँ का बहुत बड़ा योगदान था। पूरब अंग की भावभीनी गायकी की चैनदारी, बोल-बनाव के लहजे, कहन के खास ढंग और ठहराव, यह सारे गुण रसूलन बाई की गायकी में था। टप्पा तो जैसे रसूलन बाई के लिए ही बना था। बारीक मुरकियाँ और मोतियों की लड़ियों जैसी तानों पर उन्हें कमाल हासिल था। उनकी गायी ठुमरी भैरवी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’, आप सुनिए और श्रृंगार रस की सार्थक अनुभूति कीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका रसूलन बाई




जिस अवधि में गायिका रसूलन बाई सक्रिय थीं, लगभग उसी अवधि में ठुमरी के भक्ति और आध्यात्मिक भाव को उकेरने में सिद्ध गायिका सिद्धेश्वरी देवी का यश भी चरम पर था। पूरब अंग की ठुमरियों के लिए विख्यात बनारस के संगीत-प्रेमियों में सिद्धेश्वरी देवी का नाम आदर से लिया जाता था। संगीत-प्रेमियों के बीच वे ‘ठुमरी क्वीन’ के नाम से पहचानी जाती थीं। उनकी संगीत संगीत-शिक्षा बचपन में गुरु सियाजी महाराज से हुई थी। निःसन्तान होने के कारण सियाजी दम्पति ने सिद्धेश्वरी को गोद ले लिया और संगीत की शिक्षा के साथ-साथ उनका पालन-पोषण भी किया। बाद में उनकी शिक्षा बड़े रामदास जी से भी हुई। बनारस की गायिकाओं में सिद्धेश्वरी देवी, काशी बाई और रसूलन बाई समकालीन थीं। 1966 में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से अलंकृत किया गया था। नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत-शिक्षा प्रदान करने के लिए उन्हें 1965 में दिल्ली के श्रीराम भारतीय कला केन्द्र आमंत्रित किया गया। लगभग बारह वर्षों तक केन्द्र में कार्य करते हुए 1977 में सिद्धेश्वरी देवी का निधन हुआ। 1989 में फिल्मकार मणि कौल ने सिद्धेश्वरी देवी के जीवन और संगीत पर एक वृत्तचित्र ‘सिद्धेश्वरी’ का निर्माण किया था। आइए, आज की इसी ठुमरी को सिद्धेश्वरी जी के स्वरों में एक अलग ही अंदाज़ में सुनते हैं।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका सिद्धेश्वरी देवी 




उप-शास्त्रीय संगीत को वर्तमान में संगीत के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराने में विदुषी गिरिजा देवी के योगदान को सदियों तक स्मरण किया जाता रहेगा। आयु के नौवें दशक में भी सक्रिय गिरिजा देवी का जन्म 8 मई, 1929 को कला और संस्कृति की राजधानी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत से उनका विशेष लगाव था। मात्र पाँच वर्ष की गिरिजा के लिए उन्होने संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी ने स्वीकार किया है कि उनके प्रथम गुरु उनके पिता ही थे। गिरिजा देवी के प्रारम्भिक संगीत-गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की। नौ वर्ष की आयु में ही एक हिन्दी फिल्म ‘याद रहे’ में गिरिजा देवी ने अभिनय भी किया था। गिरिजा देवी का विवाह 1946 में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था। उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कौन रोक सका है? 1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया। यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूट रहीं थीं। संगीत के क्षेत्र में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता से पहले ही भारतीय संगीत को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का जो अभियान छेड़ा था, उसका सार्थक परिणाम आज़ादी के बाद नज़र आने लगा था। गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। 1949 में रेडियो से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई, वह आज तक जारी है। गिरिजा देवी ने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यों में भी अपना योगदान किया। 80 के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी ने आमंत्रित किया। वहाँ रह कर उन्होने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये, बल्कि शोधकार्य भी कराये। इसी प्रकार 90 के दशक में गिरिजा देवी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक विद्यार्थियों को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी। गिरिजा देवी को 1972 में ‘पद्मश्री’, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1999 में ‘पद्मभूषण’ और 2010 में संगीत नाटक अकादमी का फेलोशिप जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किये गए। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतन्त्रता से पूर्व काल के संगीत की विशेषज्ञ और संवाहिका हैं। ऐसी विदुषी के स्वरों में आप यह ठुमरी सुनिए और स्वर, रस, भाव की सुखानुभूति कीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : विदुषी गिरिजा देवी




श्रृंखला के शीर्षक के अनुसार अब हम प्रस्तुत करेंगे पारम्परिक ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ का फिल्मी प्रयोग। इस परम्परागत ठुमरी को उपशास्त्रीय गायिका हीरादेवी मिश्र ने अपने स्वरों से एक अलग रंग में ढाल दिया है। 1978 में प्रदर्शित मुज़फ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ में इस ठुमरी को शामिल किया गया था। मूलतः श्रृंगार रस प्रधान ठुमरी में संगीतकार जयदेव और गायिका हीरादेवी मिश्र ने श्रृंगार के साथ-साथ भक्तिरस का समावेश अत्यन्त कुशलता से करके ठुमरी को एक अलग रंग दे दिया है। गायिका हीरादेवी मिश्र पूरब अंग की ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती आदि की अप्रतिम गायिका थीं। मुजफ्फर अली जैसे कुछेक फ़िल्मकारों ने उनकी प्रतिभा का फिल्मों में उपयोग किया। फिल्म ‘गमन’ के लिए इस ठुमरी के प्रारम्भ में एक पद ‘अरे पथिक गिरधारी सो इतनी कहियों टेर...’ जोड़ कर भक्तिरस का समावेश जिस सुगढ़ता से किया गया है, वह अनूठा है। फिल्म के संगीतकार जयदेव ने ठुमरी के मूल स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं किया किन्तु सारंगी, बाँसुरी और स्वरमण्डल के प्रयोग से ठुमरी की रसानुभूति में वृद्धि कर दी है। इस गीत के सुनने के बाद कुछ पलों तक कुछ और सुनने की इच्छा नहीं होगी। इसे सुन कर आपको राग भैरवी के प्रभाव की सार्थक अनुभूति अवश्य होगी। आइए सुनते हैं, श्रृंगार और भक्तिरस के अनूठे मेल से युक्त आज के कड़ी की और लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की यह समापन प्रस्तुति- ‘रस के भरे तोरे नैन...’


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : फिल्म गमन : हीरादेवी मिश्र : संगीत – जयदेव




और अब प्रस्तुत है, इस श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के दसवें अंक के आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य संस्करण। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी : वाचक स्वर - संज्ञा टण्डन






आज की पहेली 



‘स्वरगोष्ठी’ के 191वें अंक की पहेली में आज हम आपको सात दशक से भी पहले की एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) और वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा। 




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 1 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 193वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 189वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की गायी एक लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सिन्धु भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। आज इस श्रृंखला की यह समापन प्रस्तुति थी। इस श्रृंखला के स्वरूप पर हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हुए है। इन सभी सुझाव पर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइशें नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 2 नवम्बर 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।  



वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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