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Sunday, October 6, 2019

राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 437 : RAG JOGIYA






स्वरगोष्ठी – 437 में आज


भैरव थाट के राग – 3 : राग जोगिया


पण्डित राजन-साजन मिश्र से राग जोगिया में खयाल तथा कमल बारोट और महेन्द्र कपूर से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित राजन और साजन मिश्र
कमल बारोट
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। 

महेन्द्र कपूर
इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “जोगिया” पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के तीसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल-स्वर में राग जोगिया में निबद्ध खयाल प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर के युगल स्वर में सुनवाएँगे। 1962 में प्रदर्शित फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” से शैलेंद्र का लिखा और एस.एन. त्रिपाठी का संगीतबद्ध किया एक गीत – “हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- अहीर भैरव, गौरी, नट भैरव, वैरागी, रामकली, गुणकली, कलिंगड़ा, जोगिया, विभास आदि। आज के अंक में हम राग जोगिया पर चर्चा कर रहे हैं। राग जोगिया, भैरव थाट का जन्य राग माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार तथा निषाद स्वर वर्जित तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित किया जाता है। अतः इस राग की जाति औड़व-षाड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग जोगिया का गायन समय प्रातःकाल सन्धिप्रकाश के सय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। कुछ विद्वान राग जोगिया में तार षडज को वादी और मध्यम को संवादी मानते हैं। किन्तु दोनों दृष्टियों में यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग जिया में बहुधा बड़ा खयाल नहीं गाया जाता। यह छोटा खयाल और ठुमरी के उपयुक्त राग माना जाता है। कभी-कभी राग के आकर्षण को बढ़ाने के लिए अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग कर लिया जाता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप के दिग्दर्शन के लिए अब हम आपको इस राग में एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, बनारस घराने के सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र।

राग जोगिया : “मोरे अँगना कागा बोले...” : पण्डित राजन और साजन मिश्र


आज हम भैरव थाट के जन्य राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे(कोमल), म, प, ध(कोमल), सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध(कोमल), प, ध(कोमल), म, रे(कोमल), सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। गीत का फिल्मी संस्करण गीतकार शैलेन्द्र ने रचा है। यह गीत वास्तव में शिव-वन्दना है। अनेक विद्वानों का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग जोगिया : “हे नटराज गंगाधर शम्भो भोलेनाथ...” : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 437वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 12 अक्तूबर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 439 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 435वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – अहीर भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – अद्धा तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने भैरव थाट के जन्य राग जोगिया का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल स्वर में इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। राग जोगिया के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध युगल गायक और गायिका कमल बारोट और महेन्द्र कपूर के स्वर में फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम भैरव थाट के एक अन्य जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 437 : RAG JOGIYA : 6 अक्तूबर, 2019

Sunday, January 27, 2019

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 404 : RAG KAMOD






स्वरगोष्ठी – 404 में आज

कल्याण थाट के राग – 2 : राग कामोद

पण्डित राजन-साजन मिश्र से राग कामोद की बन्दिश और लता मंगेशकर से एक फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित राजन और साजन मिश्र
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के एक जन्य राग “कामोद” पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “चित्रलेखा” से लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं।



आज के अंक में हम आपसे राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक और प्राचीन ग्रन्थकार बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं; सा, रे, प, म(तीव्र), प, ध, प, नि, ध, सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, नि, ध, प, म(तीव्र), प, ध, प, ग, म(शुद्ध), रे, सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- “एरी जाने न दूँगी...”। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 



श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। इन रागो की चर्चा हम इसी श्रृंखला के आगामी अंकों में करेंगे। ऊपर आपने राग कामोद की जो बन्दिश सुनी है, उस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने भी साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 404थे अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित एक फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। पहेली क्रमांक 410 तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 2 फरवरी, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 406 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 402 की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म “मृगतृष्णा” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मोहम्मद रफी

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 402 की पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने राग कामोद का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र इस राग की एक लोकप्रिय बन्दिश का रसास्वादन किया। इसी बन्दिश को ही आधार बना कर 1964 में प्रदर्शित फिल्म “चित्रलेखा” में एक गीत शामिल किया गया था। गीतकार साहिर लुधियानवी बन्दिश के स्थायी को बरकरार रखते हुए अन्तरे जोड़े थे। संगीतकार रोशन ने इस गीत को राग कामोद में ही संगीतबद्ध किया है और इसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछले अंकों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग कामोद : SWARGOSHTHI – 404 : RAG KAMOD : 27 Jan, 2019

Sunday, February 4, 2018

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS




स्वरगोष्ठी – 355 में आज

पाँच स्वर के राग – 3 : “मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”

राजन-साजन मिश्र से श्रृंगाररस की बन्दिश और मुहम्मद रफी से भक्तिरस का गीत सुनिए





नौशाद, मुहम्मद रफी और शकील बदायूनी
पण्डित राजन और साजन मिश्र
"रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग मालकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात युगल गायक राजन और साजन मिश्र के स्वरों में राग मालकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। अनेक फिल्मी गीतों में राग मालकौंस का प्रयोग किया गया है। राग मालकौंस में ही निबद्ध 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से एक विख्यात गीत –“मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”, मुहम्मद रफी के स्वर में सुनवा रहे हैं।



पाँच स्वर के राग अर्थात औड़व-औड़व जाति के रागों की श्रृंखला के अन्तर्गत आज की कड़ी में हम बेहद लोकप्रिय राग मालकौंस की चर्चा कर रहे हैं। राग मालकौंस भैरवी थाट का एक लोकप्रिय राग है। पहले आपको सुनवाते है, राग मालकौंस का एक आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण। संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए एक कालजयी भक्तिगीत रचा था। नौशाद की भक्तिरस प्रधान गीतों की रचनात्मक कुशलता के बारे में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग, अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “नौशाद के संगीत के दो पहलू रहे हैं- एक तो शास्त्रीय आधार का सरस, सुगम्य रूपान्तरित लोकसंगीत और दूसरा शास्त्रीय आधारित आभिजात्य संगीत जिसमें कभी मुगलिया या लखनऊ की नवाबी संस्कृति की खूबसूरत भंगिमाएँ रहती थीं, तो कभी ईश्वर की आराधना करता उदात्त भक्ति-संगीत। साहित्य में भक्ति-साहित्य भले ही लोकरंजक और लोकसंस्कृति से प्रेरित रहा हो, पर नौशाद के भक्ति-गीतों में शुद्ध, गम्भीर शास्त्रीय सुर ही लगे हैं। नौशाद के संगीत की मूल प्रवृत्ति भारतीय शास्त्रीय संगीत-परम्परा की तरह ही कलावादी रही है।” फिल्म ‘बैजू बावरा’ के भक्तिपरक गीत यदि नौशाद को शिखर तक ले जाते हैं, वहीं गायक मुहम्मद रफी को उनके भावपूर्ण गायन के लिए प्रथम श्रेणी के गायकों में शामिल कराते हैं। प्रस्तुत है, गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायक मुहम्मद रफी द्वारा सृजित आस्था, समर्पण और पुकार से युक्त फिल्म ‘बैजू बावरा’ का यह गीत।

राग मालकौंस : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मुहम्मद रफी : फिल्म - बैजू बावरा



थाट भैरवी, वादी म सा, रखिए रे प वर्ज्य,
तृतीय प्रहर निशि गाइए, मालकौंस का अर्ज।

राग मालकौंस की गणना भैरवी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इसमें ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में सर्वाधिक अनुकूल होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से किया जाता है। सुविख्यात इसराज और मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से इस राग पर हमारी विस्तृत चर्चा हुई। उन्होने बताया कि राग भैरवी के कोमल ऋषभ और पंचम को हटा देने पर बचे हुए भैरवी के स्वरों- कोमल गान्धार, मध्यम, कोमल धैवत और कोमल निषाद में मध्य व तार सप्तक के षडज का संयोग कर देने से जिस राग का रूप निर्मित होता है वह मालकौंस है। औड़व जाति के इस इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस सागर की भाँति है। विविध नदियों का मानों इसमें समागम है। इसके मन्द्र धैवत को षडज मान कर यदि मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली का दर्शन होने लगता है। मन्द्र निषाद को जब षडज मान कर मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाता है तब राग मेघ मल्हार का आभास होने लगता है। इसी प्रकार गान्धार स्वर को यदि षडज मान कर प्रयोग किया जाए तो राग दुर्गा और मध्यम को षडज मान कर चलने पर राग धानी की झलक मिलने लगती है। राग भूपाली का आत्मनिवेदन, मेघ मल्हार का नैसर्गिक गाम्भीर्य, राग दुर्गा में व्याप्त भक्तिभाव की विनयपूर्ण अभिव्यक्ति और राग धानी का वैचित्र्य भाव, इन सभी के समागम से राग मालकौंस का गम्भीर चिन्तनशील स्वरूप कायम होता है। राग मालकौंस में षडज स्वर आधार है। कोमल गान्धार स्वर से पुकार का भाव और मध्यम स्वर पर ठहराव से मन व्यापक चिन्तन की दिशा में अग्रसर होने लगता है। राग मालकौंस में कोमल ऋषभ और पंचम स्वर के न होने से मध्यम के साथ शेष तीनों कोमल स्वर गान्धार, धैवत और निषाद के मिलाप से गाम्भीर्य कायम होता है। कोमल ऋषभ के विषाद भाव और पंचम की जागृति दोनों ही दार्शनिक गाम्भीर्य निर्मित करने में व्यवधान उत्पन्न न करें, इसीलिए इनका प्रयोग निषिद्ध है। राग मालकौंस में प्रयुक्त स्वरों को निरन्तर दुहराने से राग भूपाली, मेघ मल्हार, दुर्गा और धानी झलक जाएँगे। इसलिए राग मालकौंस को बरतना सरल नहीं होता। मध्यम के साथ मिल कर स्वरात्मक व सहयोगी क्रियाकलाप होंगे तो मालकौंस का स्वरूप कायम रहेगा। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग मालकौंस के शास्त्रीय स्वरूप को प्रदर्शित करने के लिए इस राग की एक बन्दिश। अब आप सुनिए, सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में द्रुत तीनताल में निबद्ध एक खयाल रचना। आप इस रचना का आस्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की की अनुमति दें।

राग मालकौंस : “आज मोरे घर आइल बलमा...’ : पण्डित राजन और साजन मिश्र



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 355वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक और गायिका की युगल आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 357वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 353वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

वर्ष 2018 की पहेली क्रमांक 353 का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, आज हम आपको एक चिन्ताजनक सूचना देना चाहते हैं। "स्वरगोष्ठी" की पहेली प्रतियोगिता की पिछले कई वर्षों की महाविजेता और हमारी नियमित पाठक व श्रोता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया अवस्थ हैं। आगामी 12 फरवरी, 2018 को अमेरिका में उनकी स्पाइनल सर्जरी होने वाली है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक और सम्पादक मण्डल के सभी सदस्य उनके इस कष्ट से उदास हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि विजया जी को शीघ्र स्वस्थ करें। ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस अंक में आपने राग मालकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए हमने पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में राग मालकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन कराया। राग मालकौंस के स्वरों का उपयोग करते हुए कई फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “बैजू बावरा” से राग मालकौंस के स्वरों में पिरोए एक चर्चित गीत मुहम्मद रफी के स्वर में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS : 4 Feb., 2018

Sunday, June 25, 2017

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 323 : RAG KAMOD




स्वरगोष्ठी – 323 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 9 : राग कामोद

रोशन की जन्मशती वर्ष में मिश्र बन्धुओं और लता मंगेशकर से कामोद की बन्दिश सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की नौवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हमने 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘चित्रलेखा’ का एक खयालनुमा गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग कामोद में निबद्ध किया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में एक खयाल पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
रोशन ने अपनी कई फिल्मों में रागों की बन्दिशों को फिल्मी गीत के रूप में शामिल किया था। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश आपके लिए प्रस्तुत कर चुके हैं। आज की कड़ी में भी हम आपको रोशन द्वारा चुनी गई राग कामोद की बन्दिश का रसास्वादन करा रहे हैं। यह राग कामोद की एक परंपरागत बन्दिश है, उसका उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। फिल्म ‘चित्रलेखा’ के गीतों में लोकप्रियता के साथ-साथ रचनात्मकता का गुण भी उपस्थित है। फिल्म में रोशन के स्वरबद्ध किये कई लाजवाब गीत हैं। साहिर लुधियानवी और रोशन की जोड़ी ने -“संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे...” सुन कर यह कहना कठिन है कि साहिर लुधियानवी के शब्द प्रभावी हैं या रोशन की धुन। मुहम्मद रफी की आवाज़ में राग यमन कल्याण पर आधारित गीत –“मन रे तू काहे न धीर धरे...”, राग कलावती पर आधारित और आशा भोसले व उषा मंगेशकर के स्वरों में –“काहे तरसाए जियरा...”, लता मंगेशकर की आवाज़ में –“सखी री मेरा मन उलझे तन डोले...” रंजकता की दृष्टि से श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। इसी फिल्म में रोशन ने राग कामोद की एक पारम्परिक बन्दिश को थोड़े शाब्दिक परिवर्तन के साथ फिल्मी गीत का रूप दिया था। मूल बन्दिश के अन्तरे की पंक्तियाँ हैं –“चमक बिजुरी मेहा बरसे...” जबकि फिल्म गीत का अन्तरा है –“अलकों में कुण्डल डालो और देह सुगन्ध बसा लों...”। मूल बन्दिश वर्षा ऋतु का गीत है जबकि साहिर लुधियानवी ने इसे श्रृंगार रस प्रधान गीत बना दिया। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा



राजन और साजन मिश्र
आज के अंक में हम आपसे दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग कामोद पर चर्चा कर रहे हैं। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक प्राचीन ग्रन्थकारों के आधार पर बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘ए री जाने न दूँगी...’। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है। अब आप पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में राग कामोद की इस पारम्परिक रचना को सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 323वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1965 में प्रदशित रोशन की एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का आधार परिलक्षित हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – यह किस मशहूर पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 1 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 325वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 321वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल ही तो है’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – मन्ना डे

इस अंक की पहेली में हमारे सभी पाँच नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस नौवें अंक में हमने आपके लिए राग कामोद पर आधारित फिल्म ‘आम्रपाली’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत किया। 'स्वरगोष्ठी' के 322वें  अंक में हमने राग भैरवी की चर्चा की थी। इस अंक में आपको राग भैरवी पर आधारित एक कालजयी गीत का रसास्वादन कराया गया था। हमारी एक नियमित पाठक और श्रोता पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने उसी गीत के सितार वादन का एक वीडियो भेजा है। गीत -"लागा चुनरी में दाग..." को सितार पर चन्द्रशेखर फानसे और उनके शिष्य प्रस्तुत कर रहे हैं। आप पहले यह संगीत सुनिए। 


रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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