रविवार, 29 नवंबर 2020

राग नट भैरवी : SWARGOSHTHI – 490 : RAG NAT BHAIRAVI





स्वरगोष्ठी – 490 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 6 : संगीतकार - मदन मोहन 

एकमात्र गीत, जिसमें हेमन्त कुमार ने राज कपूर के लिए स्वर दिया और एकमात्र फिल्म में संगीत मदन मोहन ने दिया 






संगीतकार मदन मोहन 

विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की छठी कड़ी में हम 1953 में राज कपूर व नरगिस द्वारा अभिनीत फिल्म "धुन” से राग नट भैरवी पर आधारित एक गीत; "हम प्यार करेंगे...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत मदन मोहन ने और स्वर हेमन्त कुमार तथा लता मंगेशकर ने दिया है। यह गीत राग नट भैरवी पर आधारित है। राग नट भैरवी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग नट भैरवी में निबद्ध एक भक्ति रचना “ॐ नमः शिवाय...” सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथियों के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में हम उस फिल्म का उल्लेख करेंगे, जिसमें राज कपूर के साथ प्रथम और अन्तिम बार मदनमोहन ने संगीत दिया तथा हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर द्वारा राज कपूर और नरगिस के लिए गाया एकमात्र गीत शामिल था। वर्ष 1953 में प्रदर्शित यह फिल्म है ‘धुन’, जिसमें राज कपूर की सर्वप्रिय नायिका नरगिस थीं। नरगिस के साथ राज कपूर ने कुल 16 फिल्मों में अभिनय किया था, जिनमें 6 फिल्में आर.के. की थीं। राज कपूर के मित्र और लेखक जयप्रकाश चौकसे ने अपनी पुस्तक; “राज कपूर” में एक स्थान पर लिखा है; नरगिस, राज कपूर की फिल्मों की आत्मा थीं। महिलाओं के प्रति राज कपूर का जो दृष्टिकोण सामान्य जीवन में रहा, वही दृष्टिकोण उनकी फिल्मों में दिखाई पड़ता है। राज कपूर और नरगिस के सम्बन्धों के बारे में सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने अपने एक आलेख में लिखा था; राज कपूर ने पत्नी की हक़ीक़त को प्रेमिका के अफसाने से जोड़ दिया था। दरअसल राज कपूर ने अपनी कमजोरी और विशेषता को कभी छिपाया नहीं, बल्कि सहज रूप से जगजाहिर किया, यही कारण था कि फिल्म “आवारा” और “श्री 420” के प्रीमियर पर राज कपूर जब नरगिस सहित पत्नी कृष्णा कपूर के साथ गए तब इस त्रिवेणी को लोगों ने सहज रूप में स्वीकार किया। 


फिल्म "धुन" में राज कपूर 
अब हम राज कपूर और नरगिस अभिनीत फिल्म “धुन” के संगीतकार मदन मोहन की चर्चा करते हैं। वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म “आँखें” से फिल्म संगीत जगत में अपना हस्ताक्षर अंकित करने वाले मदनमोहन को आज भी फिल्मी ग़ज़लों का शाहंशाह माना जाता है। उन्हें ग़ज़लों के प्रति लगाव तब उत्पन्न हुआ, जब उन्होने सेना की नौकरी छोड़ कर आकाशवाणी, लखनऊ के संगीत विभाग में नौकरी की। यहीं पर उनकी भेंट बेग़म अख्तर के साथ उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ, रोशन आरा बेग़म, संगीतकर रोशन, पार्श्वगायक तलत महमूद और संगीतकार जयदेव से हुई। बेग़म अख्तर की गायकी से मदनमोहन अत्यन्त प्रभावित हुए थे। रेडियो की नौकरी के बाद ही वह फिल्मों की ओर उन्मुख हुए। 1953 में उन्हें फिल्म “धुन” का संगीत रचने का अवसर मिला। इस फिल्म के संगीत में उन्होने तत्कालीन प्रचलित शैली से अलग हट कर एक नया प्रयोग किया। पियानो की निरन्तरता के साथ रागों के स्वरों में गूँथी तर्ज़ों को खूब सराहा गया। फिल्म के गीतों में लता मंगेशकर का गाया; “तारे गिन गिन बीती रात...”, “सितारों से पूछो...” आदि गीत अत्यन्त मधुर थे, किन्तु गुणबत्ता की दृष्टि से राग भैरवी के स्वरों पर आधारित गीत; “निंदिया न आए...” फिल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत सिद्ध हुआ। फिल्म का एक हल्का फुल्का युगल गीत; “हम प्यार करेंगे...” अपने समय में बेहद लोकप्रिय हुआ था। यह गीत राज कपूर और नरगिस पर फिल्माया गया था। इस युगल गीत में लता मंगेशकर ने नरगिस के लिए और संगीतकार व गायक हेमन्त कुमार ने राज कपूर के लिए अपनी आवाज़ दी थी। “धुन” राज कपूर द्वारा अभिनीत एकमात्र वह फिल्म है जिसका संगीत मदनमोहन ने दिया। इस फिल्म के बाद फिल्म संगीत के इन दोनों दिग्गजों ने राज कपूर के साथ कभी कार्य नहीं किया। आइए अब हम सुनते है, फिल्म “धुन” का वही गीत, जिसे राज कपूर और नरगिस के लिए क्रमशः हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर ने पार्श्वगायन किया है। गीतकार हैं, भरत व्यास और संगीतकार हैं, मदनमोहन। 

राग नट भैरवी : “हम प्यार करेंगे...” : हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर : संगीत – मदन मोहन 


राग नट भैरवी की संरचना कुछ इस प्रकार है कि राग भैरवी में जब शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाता है तब यह आसावरी थाट का राग नट भैरवी कहलाता है। निश्चित रूप से इस राग का सम्बन्ध आसावरी थाट से होता है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग नट भैरवी के आरोह और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग में कोमल गान्धार, कोमल धैवत और कोमल निषाद के साथ शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाता है। आरोह के स्वर हैं; सा, रे, कोमल ग, म, प, कोमल ध, कोमल नि, और सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, कोमल नि, कोमल ध, प, म, कोमल ग, रे, और सा। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। राग का वादी स्वर कोमल धैवत और संवादी स्वर कोमल गान्धार होता है। इस राग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का प्रथम प्रहर माना जाता है। राग की एक विशेषता यह भी है कि कोमल धैवत कभी कभी शुद्ध धैवत का भी प्रयोग कर लिया जाता है। इस राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने के लिए अब हम आपके लिए राग नट भैरवी में पिरोयी एक भक्तिरचना सुनवाते हैं। इसे सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथियों ने प्रस्तुत किया है। गीत में संगति वाद्य के रूप में पाश्चात्य वाद्यों का प्रयोग भी किया गया है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग नट भैरवी : “ॐ नमः शिवाय...” : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथी 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 490वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग 64 वर्ष पूर्व प्रदर्शित राज कपूर की एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात इस अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन पार्श्वगायकों के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 5 दिसम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 492 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 488वें अंक में हमने आपको 1950 में प्रदर्शित फिल्म "दास्तान” से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुहम्मद रफी और सुरैया 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की छठी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "धुन” के एक युगलगीत का रसास्वादन किया और गीतकार भरत व्यास तथा संगीतकार मदन मोहन द्वारा तैयार गीत का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग नट भैरवी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथियों के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय भक्तिरचना का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग नट भैरवी : SWARGOSHTHI – 490 : RAG NAT BHAIRAVI : 29 नवम्बर, 2020 


मंगलवार, 24 नवंबर 2020

ऑडियो: चुड़ैल (बलराम अग्रवाल)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में उषा भदौरिया की लघुकथा नाव का धर्म का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं बलराम अग्रवाल की लघुकथा "चुड़ैल", जिसे स्वर दिया है, अनुराग शर्मा ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 16 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।




बलराम अग्रवाल:
26 नवम्बर 1952 को बुलंदशहर में जन्म; हिंदी लघुकथा के महारथी। प्रकाशित पुस्तकों में सरसों के फूल, ज़ुबैदा, चन्ना चरनदास, दूसरा भीम प्रमुख। अनेक संकलनों का सम्पादन। विदेशी कहानियों व लघुकथाओं का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद दो पुस्तकों को रूप में प्रकाशित।


हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"वह विचार मन में आते ही मिसेज़ खन्ना सिर से पाँव तक जैसे हिल सी गयीं।"
(बलराम अग्रवाल की "चुड़ैल" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
चुड़ैल mp3

#Twenty Second Story: Chudail; Author: Balram Agarwal; Voice: Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2020/22.

रविवार, 22 नवंबर 2020

राग खमाज : SWARGOSHTHI – 489 : RAG KHAMAJ





स्वरगोष्ठी – 489 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 5 : संगीतकार नौशाद

“दिल को तेरी तस्वीर...” राज कपूर के लिए जब नौशाद ने रफी से पार्श्वगायन कराया





उस्ताद निसार हुसैन खाँ 

संगीतकार नौशाद 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की पाँचवीं कड़ी में हम 1950 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "दास्तान” से राग खमाज पर आधारित एक गीत; "दिल को हाय दिल को, तेरी तस्वीर से...”, जिसका संगीत नौशाद ने और स्वर मुहम्मद रफी और सुरैया ने दिया है। यह गीत राग खमाज पर आधारित है। राग खमाज के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग खमाज में निबद्ध एक बन्दिश “कोयलिया कूक सुनावे...” को सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद निसार हुसैन खाँ के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



राज कपूर के प्रारम्भिक संगीतकार विषयक श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” की पाँचवीं कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत है। श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम यह उल्लेख कर चुके हैं कि राज कपूर ने अपनी पहली फिल्म “आग” के लिए “पृथ्वी थियेटर” के संगीतकार राम गांगुली को चुना था। बाद में जब उन्होने फिल्म “बरसात” के निर्माण की योजना बनाई तो राम गांगुली के स्थान पर उन्हीं के संगीत दल के तबला वादक शंकर और हारमोनियम वादक जयकिशन को संगीत निर्देशक के रूप में चुना। “बरसात” से लेकर “मेरा नाम जोकर” तक यह साथ निरन्तर जारी रहा, केवल फिल्म “जागते रहो” और “अब दिल्ली दूर नहीं” को छोड़ कर, जिनका संगीत निर्देशन क्रमशः सलिल चौधरी और दत्ताराम ने किया था। अपनी फिल्मों के स्थायी संगीतकारों के साथ ही राज कपूर ने आरम्भिक दौर के लगभग सभी संगीतकारों के साथ कार्य किया था। इन फिल्मों के निर्माता या निर्देशक स्वयं राज कपूर नहीं थे, बल्कि दूसरे निर्माता और निर्देशकों की फिल्मों में मात्र अभिनय किया था। ऐसी फिल्मों में राज कपूर अभिनय के साथ ही इन संगीतकारों के कार्यों से भी प्रभावित हुए थे। ऐसे ही एक महान संगीतकार नौशाद थे, जिनके संगीत निर्देशन में उन्होने 1950 की फिल्म “दास्तान” में अभिनय किया था। 


फिल्म "दास्तान" में राज कपूर 
राज कपूर ने अपने फिल्मी जीवन के पहले दशक में दो ऐसी फिल्मों में अभिनय किया था, जिसके संगीतकार नौशाद थे। 1949 की फिल्म “अन्दाज़” और 1950 की फिल्म “दास्तान” में राज कपूर मात्र अभिनेता थे, किन्तु उनकी पूरी दृष्टि नौशाद के संगीत पर टिकी हुई थी। फिल्म “अन्दाज़” में राज कपूर के साथ दिलीप कुमार और नरगिस को लिया गया था। नौशाद ने इस फिल्म के गीतों में एक प्रयोग किया था। उन्होने दिलीप कुमार के लिए मुकेश की, नरगिस के लिए लता मंगेशकर की और राज कपूर के लिए मोहम्मद रफी की आवाज़ में गीतों को रिकार्ड किया। लता मंगेशकर के गाये गीत: “उठाए जा उनके सितम...” की रिकार्डिंग के अवसर पर राज कपूर उपस्थित थे। गीत सुन कर उन्होने लता जी को अपनी फिल्मों के लिए स्थायी गायिका बना लिया। मुकेश, राज कपूर के लिए पहले भी अपनी आवाज़ दे चुके थे, परन्तु फिल्म ‘अन्दाज़’ में नौशाद का प्रयोग; दिलीप कुमार के लिए मुकेश के आवाज़ की असफलता के बाद वह स्थायी आवाज़ बन गए। इस फिल्म में नौशाद ने राज कपूर और नरगिस के लिए एकमात्र गीत; “यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं खफा होते हैं...” रिकार्ड किया था। दुर्भाग्य से राज कपूर के हिस्से का यह एकमात्र गीत असफल रहा, जबकि दिलीप कुमार के लिए मुकेश द्वारा गाये सभी गीत हिट हुए। नौशाद के संगीत निर्देशन में 1950 में बनी फिल्म “दास्तान” में राज कपूर एक बार फिर फिल्म के नायक थे। इस नायिका प्रधान फिल्म में सुरैया नायिका भी थीं और अपने गीतों की गायिका भी थी। इस समय तक नौशाद खूब चर्चित हो चुके थे। फिल्म “दास्तान” के पोस्टर और ट्रेलर में यह प्रचारित किया गया था; “चालीस करोड़ में एक ही नौशाद...”। फिल्म “दास्तान” उस दौर में “सिल्वर जुबली” मनाने में सफल हुई। इस फिल्म में सुरैया के गाये गीतों के अलावा राज कपूर और सुरैया पर फिल्माया गया गीत; “दिल को तेरी तस्वीर से बहलाए हुए हैं...” भी अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। नौशाद ने पूर्व की भाँति इस गीत में मोहम्मद रफी की ही आवाज़ राज कपूर के लिए ली। आइए, आज हम आपको राज कपूर द्वारा अभिनीत और नौशाद द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “दास्तान” का युगल गीत। गीतकार हैं शकील बदायूनी और स्वर मोहम्मद रफी तथा सुरैया के हैं। 

राग खमाज : "दिल को तेरी तस्वीर से..." : मुहम्मद रफी और सुरैया : संगीत - नौशाद


खमाज थाट के स्वर होते हैं; सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग “खमाज” कहलाता है। “खमाज” राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने रामपुर सहसवान घराने के प्रमुख स्तम्भ उस्ताद निसार हुसैन खाँ (1909 – 1993) के स्वर में प्रस्तुत एक दुर्लभ बन्दिश का चुनाव किया है। राग खमाज की यह अनमोल रचना 1929 में रिकार्ड की गई थी। उस्ताद निसार हुसेन खाँ को अपने पिता और गुरु उस्ताद फिदा हुसेन खाँ से संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। बहुत छोटी आयु में उन्हें बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ के दरबारी संगीतज्ञ होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आगे चलकर खाँ साहब ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े। 1977 में उन्हें आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में प्रधान गुरु नियुक्त किया गया। यहाँ रह कर उन्होने उस्ताद राशिद खाँ सहित अनेक योग्य शिष्यों को तैयार किया। भारत सरकार द्वारा 1970 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अलावा खाँ साहब को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान सहित गन्धर्व महाविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गया था। आइए गायकी के इस शिखर-पुरुष की आवाज़ में सुनते हैं, राग खमाज की यह बन्दिश। आप इस बन्दिश का रसास्वादन कीजिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग खमाज : “कोयलिया कूक सुनावे...” : उस्ताद निसार हुसेन खाँ 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 489वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल गायक और गायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 28 नवम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 491 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 487वें अंक में हमने आपको 1950 में प्रदर्शित फिल्म "बावरे नैन” से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश और गीता दत्त। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की पाँचवीं कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "दास्तान” के एक गीत का रसास्वादन और गीतकार तथा संगीतकार का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग खमाज पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद निसार हुसैन खाँ के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय बन्दिश का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग खमाज : SWARGOSHTHI – 489 : RAG KHAMAJ : 22 नवम्बर, 2020 









मंगलवार, 17 नवंबर 2020

ऑडियो: नाव का धर्म (उषा भदौरिया)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में कान्ता राॅय की लघुकथा चेहरा का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं उषा भदौरिया की लघुकथा "नाव का धर्म", जिसे स्वर दिया है, पूजा अनिल ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 27 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।




उषा भदौरिया:
उभरती हुई हिंदी लेखिका, लंदन में निवास।

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"तेरे जीजू दो दिन के लिये बाहर गये हैं।"
(उषा भदौरिया की "नाव का धर्म" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
नाव का धर्म mp3

#Twenty First Story: Naav-Ka-Dharm; Author: Usha Bhadauria; Voice: Pooja Anil; Hindi Audio Book/2020/21.

रविवार, 15 नवंबर 2020

राग काफी : SWARGOSHTHI – 488 : RAG KAFI

 


आपको दीपोत्सव पर हार्दिक मंगलकामना 

संगीतकार रोशन की पुण्यतिथि (16 नवम्बर) पर विशेष  
   




स्वरगोष्ठी – 488 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 4 : संगीतकार रोशन 

राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "बावरे नैन" के गीतों को रोशन ने संगीतबद्ध किया था। 





विदुषी मालिनी राजुरकर 

संगीतकार रोशन 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की चौथी कड़ी में हम 1950 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "बावरे नैन” से राग काफी पर आधारित एक गीत; "ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” यह एक युगल गीत है, जिसका संगीत रोशन ने और मुकेश व गीता दत्त ने स्वर दिया है। कल 16 नवम्बर को संगीतकार रोशन की पुण्यतिथि है। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उन्हीं का गीत समर्पित कर रहे हैं। राग काफी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग काफी में निबद्ध एक तराना रचना को सुविख्यात संगीत विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 




"बावरे नैन" में राज कपूर 

राज कपूर की प्रारम्भिक दौर की फिल्मों के संगीतकारों पर केन्द्रित हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” श्रृंखला में हम राज कपूर की फिल्म यात्रा के आरम्भिक एक दशक के उन संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके संगीत ने फिल्म इतिहास के कई पृष्ठों को रेखांकित किया है। राज कपूर के अभिनय में सहज रूप से हँसने और उतने ही सहज रूप में रोने की अद्भुत क्षमता थी। सम्भवतः इसी गुण के कारण उन्हें “भारत का चार्ली चैपलिन” कहा गया था। राज कपूर को प्रेम ने हँसने और रोने की क्षमता दी, तो स्वतन्त्रता के बाद तेजी से बदलते भारतीय मूल्यों ने हँसते हुए रोना और रोते हुए हँसना सिखा दिया। “आग” से लेकर “जिस देश में गंगा बहती है” तक राज कपूर की फिल्मों में प्रेम के स्थायी भाव के साथ देश की विसंगतियों पर दर्शकों ने आँसू के भाव को स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। परदे पर राज कपूर द्वारा गाये अधिकतर दर्द भरे गीतों में स्वर मुकेश के हैं। आज हम आपसे राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म ‘बावरे नैन’ के गीतों पर चर्चा करेंगे, जिसे रोशन ने संगीतबद्ध किया था। 

पाँचवें दशक के अन्त अर्थात 1949 में भारतीय फिल्म जगत में एक ऐसे संगीतकार का उदय हुआ, जो लखनऊ के मैरिस कालेज (वर्तमान में; भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से शास्त्रीय संगीत विधिवत प्रशिक्षित, मैहर के उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से गुरु शिष्य परम्परा में सारंगी वादन की शिक्षा प्राप्त और बारह वर्षों तक आकाशवाणी में संगीतकार के रूप में कार्य करने का अनुभव लेकर आए थे। फिल्म संगीत में नया रंग भरने वाले उस संगीतकार को हम रोशन के नाम से जानते हैं। मुम्बई में रोशन को पहला अवसर देने वाले फिल्मकार थे केदार शर्मा, जिन्होंने अपनी फिल्म “नेकी और बदी” में उन्हें संगीत निर्देशन के लिए अनुबन्धित किया। दुर्भाग्य से यह फिल्म चली नहीं और रोशन का बेहतर संगीत भी अनसुना रह गया। रोशन स्वभाव से अन्तर्मुखी थे। पहली फिल्म “नेकी और बदी” की असफलता से रोशन चिन्तित रहा करते थे, तभी केदार शर्मा ने अपनी अगली फिल्म “बावरे नैन” के संगीत का दायित्व उन्हें सौंपा। इस फिल्म के नायक राज कपूर थे। रोशन ने राज कपूर की अभिनय शैली और फिल्म में उनके चरित्र का सूक्ष्म अध्ययन किया और उसी के अनुकूल गीतों की धुनें बनाई। इस बार फिल्म भी हिट हुई और रोशन का संगीत भी। आज भी “बावरे नैन” एक बड़ी संगीतमय फिल्म के रूप में याद की जाती है। कल रोशन की पुण्यतिथि है। हम उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए उनका ही एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 

फिल्म “बावरे नैन” के नायक राज कपूर के लिए रोशन ने मुकेश की आवाज़ को प्राथमिकता दी। राजकपूर और मुकेश एक ही गुरु से संगीत सीखा करते थे, जबकि मुकेश और रोशन स्कूल के सहपाठी थे। फिल्म “बावरे नैन” में ये तीनों मित्र एकत्र हुए थे। परिणामस्वरूप फिल्म का गीत, संगीत उत्कृष्ट स्तर का बन गया। इस फिल्म में मुकेश और गीता दत्त का गाया युगल गीत; “ख़यालों में किसी के इस तरह...”, मुकेश और राजकुमारी का गाया; “मुझे सच सच बता दो...”, राजकुमारी के स्वरों में गाये गए अन्य एकल गीत अपने समय के लोकप्रिय गीतों में थे। परन्तु जो लोकप्रियता राज कपूर पर फिल्माए गए गीत; “तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं वापस बुला ले...” को मिली वह ऐतिहासिक थी। मुकेश के गाये इस गीत ने तहलका मचा दिया। इस गीत की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि लगभग तीन दशक बाद एच.एम.वी. ने अपने “बेस्ट ऑफ मुकेश” संग्रह में इस गीत को स्थान दिया। इसी प्रकार फिल्म के एक अन्य युगल गीत; “ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” ने भी लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया। आइए, यही गीत अब हम सब सुनते हैं, जिसे मुकेश और गीता दत्त ने गाया है। गीतकार हैं, केदार शर्मा और संगीतकार हैं रोशन। फिल्म “बावरे नैन” के इस गीत को सुनवाने का अनुरोध हमें “स्वरगोष्ठी” के अनेक पाठकों ने किया है। आइए सुनते हैं, राज कपूर के फिल्मी सफर का एक उल्लेखनीय गीत। 

राग काफी : “ख़यालों में किसी के इस तरह...” : मुकेश और गीता दत्त : संगीत – रोशन 


हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है; काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। पहले हम राग काफी के स्वरों की संरचना पर विचार करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा, रे, ग(कोमल), म, प, ध, नि(कोमल), सां, तथा अवरोह में सां नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर दीपोत्सव के अवसर पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए। आप यह तराना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग काफी : द्रुत तीनताल में निबद्ध तराना : स्वर – विदुषी मालिनी राजुरकर 





संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 488वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ठीक सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल गायक और गायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 21 नवम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 490 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 486वें अंक में हमने आपको 1949 में प्रदर्शित फिल्म "सुनहरे दिन” से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की चौथी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "बावरे नैन” के एक गीत का रसास्वादन और गीत और संगीतकार का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग काफी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय तराना का गायन प्रस्तुत किया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग काफी : SWARGOSHTHI – 488 : RAG KAFI : 15 नवम्बर, 2020 



मंगलवार, 10 नवंबर 2020

ऑडियो: चेहरा (कान्ता राॅय)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने कन्हैयालाल पाण्डेय के स्वर में उन्हीं की कहानी पूजाघर का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कान्ता राॅय की लघुकथा "चेहरा", जिसे स्वर दिया है, अनुराग शर्मा ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 16 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



कान्ता राॅय: हिंदी लेखिका संघ मध्यप्रदेश, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, मध्यप्रदेश लेखक संघ, कलामंदिर भोपाल, विश्व मैत्री संघ मुंबई. सेवाभारती, आनंद आश्रम भोपाल की आजीवन सदस्य, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की सम्मानित सदस्य।


हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"लेकिन उसकी अधेड़ावस्था के कारण विश्वास... या अविश्वास... शायद!"
(कान्ता राॅय की "चेहरा" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
चेहरा mp3

#Twentieth Story: Chehra; Author: Kanta Roy; Voice: Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2020/20.

रविवार, 8 नवंबर 2020

राग काफी : SWARGOSHTHI – 487 : RAG KAFI

 






स्वरगोष्ठी – 487 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार - 3 : संगीतकार ज्ञानदत्त 

"सुनहरे दिन" में राज कपूर के लिए कर्णप्रिय राग काफी पर आधारित गीत ज्ञानदत्त ने सँजोया 





पण्डित भीमसेन जोशी 

फिल्म 'सुनहरे दिन' में राज कपूर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आम तौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर के फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की तीसरी कड़ी में हम 1949 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" से राग काफी पर आधारित एक गीत; "बहारों ने जिसे छेड़ा..." प्रस्तुत कर रहे हैं। राग काफी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग काफी में निबद्ध एक रागदारी रचना "बावरे गम दे गयो..." को सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



इस श्रृंखला के अन्तर्गत इन दिनों हम सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार राज कपूर की फिल्म यात्रा के कुछ ऐसे पड़ावों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें संगीत के प्रति उनके अनुराग और चिन्तन का रेखांकन हुआ है। पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि राज कपूर को संगीत संस्कारगत प्राप्त हुआ था। बचपन में अपनी माँ से, किशोरावस्था में न्यू थिएटर्स के संगीत कक्ष से और युवावस्था में अपने पिता के पृथ्वी थिएटर के नाटकों से प्राप्त संगीत राज कपूर के रग-रग में बसा हुआ था। अपनी पहली फिल्म "आग" के लिए उन्होने पृथ्वी थियेटर के संगीतकार राम गांगुली को चुना था। इस फिल्म में शंकर और जयकिशन, संगीत दल के मात्र एक वादक थे। अपनी अगली फिल्म "बरसात" के लिए राज कपूर ने शंकर जयकिशन को ही संगीतकार के रूप में चुना था। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस फिल्म का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। "बरसात" (1949) से लेकर "मेरा नाम जोकर" (1070) तक पूरे 21 वर्षों के दौरान शंकर जयकिशन, राज कपूर की 20 फिल्मों के सफल संगीतकार रहे। इसके बाद आर.के. की फिल्मों; "बॉबी", "सत्यं शिवं सुन्दरम्", "प्रेम रोग" और "प्रेम ग्रन्थ" के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल तथा "राम तेरी गंगा मैली" और "हिना’ के संगीतकार रवीन्द्र जैन थे। इस श्रृंखला में हम राज कपूर के सर्वाधिक लोकप्रिय संगीतकारों के स्थान पर उनके फिल्मी सफर के प्रारम्भिक एक दशक के उन संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं, जिनका गहरा प्रभाव राज कपूर पर पड़ा। 1949 में जब राज कपूर फिल्म "बरसात" के निर्माण में व्यस्त थे उसी समय वे तीन अन्य निर्माताओं की फिल्मों; "सुनहरे दिन", "परिवर्तन" और "अन्दाज़" में अभिनेता के रूप में भी कार्य कर रहे थे। इतनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने किसी भी फिल्म में अपने अभिनय का स्तर गिरने नहीं दिया। इस वर्ष की फिल्मों में से आज हम फिल्म "सुनहरे दिन" में राज कपूर की भूमिका की और फिल्म के एक गीत के माध्यम से इस फिल्म के विस्मृत संगीतकार ज्ञानदत्त की चर्चा करेंगे। 1949 में प्रदर्शित फिल्म "सुनहरे दिन" का निर्माण जगत पिक्चर्स ने किया था, जिसके निर्देशक सतीश निगम थे। फिल्म में राज कपूर की भूमिका एक रेडियो गायक की थी। अपने श्रोताओं के बीच यह गायक चरित्र बेहद लोकप्रिय है। इस फिल्म का यह गीत वर्तमान में लगभग विस्मृत संगीतकार ज्ञानदत्त ने राग काफी पर आधारित किया है। इसके साथ ही राग काफी की एक शास्त्रीय रचना विख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में भी प्रस्तुत करेंगे। 


संगीतकार ज्ञानदत्त 
चौथे और पाँचवे दशक के चर्चित संगीतकार ज्ञानदत्त का फिल्मी सफर रणजीत मूवीटोन से आरम्भ हुआ था। 1937 में प्रदर्शित "तूफानी टोली" उनकी पहली फिल्म थी। श्रृंगार रस से परिपूर्ण संगीत रचने में उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं था। उनकी चौथे दशक की फिल्मों की प्रमुख गायिका वहीदन बाई (अपने समय की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री निम्मी की माँ) थीं। संगीत की दृष्टि से अनेक सफल फिल्मों की संगीत रचना करने के बाद पाँचवें दशक के अन्त में ज्ञानदत्त ने राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" की संगीत रचना की थी। इस फिल्म का संगीत ज्ञानदत्त के लिए विशेष उल्लेखनीय रहा। लोकप्रियता की दृष्टि से उस वर्ष की फिल्मों में राजकपूर द्वारा निर्मित, निर्देशित और अभिनीत "बरसात" तथा केवल अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" के गीत शीर्ष पर थे। "सुनहरे दिन" का नायक चूँकि रेडियो गायक है, अतः ज्ञानदत्त ने इन गीतों में वाद्यवृन्द (आर्केस्ट्रा) का अत्यन्त आकर्षक प्रयोग किया था। फिल्म में ज्ञानदत्त ने राज कपूर के लिए मुकेश को पार्श्वगायक के रूप में अवसर दिया था। मुकेश और राज कपूर एक ही गुरु से संगीत सीखने जाया करते थे। फिल्म "आग" में मुकेश और राज कपूर की जोड़ी साथ थी, किन्तु इन दोनों के आवाज़ की स्वाभाविकता का अनुभव फिल्म "सुनहरे दिन" के गीतों से हुआ। फिल्म में मुकेश के साथ सुरिन्दर कौर और शमशाद बेग़म की आवाज़ें हैं। फिल्म "सुनहरे दिन" के गीतों में मुकेश और सुरिन्दर कौर की आवाज़ों में; "दिल दो नैनों में खो गया...", "लो जी सुन लो...", मुकेश और शमशाद बेग़म के स्वरों में; "मैंने देखी जग की रीत..." अत्यन्त लोकप्रिय गीत सिद्ध हुए, परन्तु जो लोकप्रियता मुकेश के एकल स्वर में प्रस्तुत गीत; "बहारों ने जिसे छेड़ा है वो साजे जवानी है..." को मिली, उससे अपने समय का यह एक उल्लेखनीय गीत बन गया था। आज हम आपको उल्लास और उमंग से परिपूर्ण यही गीत सुनवाएँगे। "सुनहरे दिन" संगीतकार ज्ञानदत्त के फिल्मी सफर की सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म के बाद ज्ञानदत्त की संगीतबद्ध फिल्में व्यावसायिक रूप से असफल होती गई। अन्ततः 1965 में फिल्म "जनम जनम के साथी" के साथ ही उन्होने अपने संगीतकार जीवन से विराम ले लिया। 3 दिसम्बर 1974 को संगीतकार ज्ञानदत्त का निधन हुआ था। आइए आज हम आपको सुनवाते हैं, ज्ञानदत्त द्वारा संगीतबद्ध वह ऐतिहासिक गीत, जिसने गायक मुकेश और अभिनेता राज कपूर की जोड़ी को स्थायित्व दिया। गीतकार हैं, शेवन रिजवी। 

राग काफी : "बहारों ने जिसे छेड़ा..." : मुकेश : फिल्म - सुनहरे दिन : संगीत - ज्ञानदत्त 


काफी थाट के स्वर हैं; सा, रे, कोमल ग॒, म, प, ध, कोमल नि॒। इस थाट में गान्धार और निषाद कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। राग "काफी" में गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं; सा, रे, ग(कोमल), म, प, ध, नि(कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा। राग काफी की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है और इसका गायन अथवा वादन समय मध्यरात्रि होता है। परन्तु फाल्गुन मास में हर समय गाया जा सकता है। राग काफी में ठुमरी, होली और रंगोत्सव से सम्बन्धित रचनाएँ खूब निखरती हैं। अधिकांश ठुमरियों में ब्रज की होली का वर्णन मिलता है। इससे मिलता जुलता राग "सिन्दूरा" होता है। आइए, सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग काफी की एक बन्दिश सुनते हैं। आप राग "काफी" की यह रचना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग काफी : "बावरे गम दे गयो री..." : पण्डित भीमसेन जोशी 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 487वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ठीक सात दशक पुरानी एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल पार्श्वगायिका और गायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 14 नवम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 489 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 485वें अंक में हमने आपको 1948 में प्रदर्शित फिल्म "गोपीनाथ" से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - सिन्धु भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – नीनू मजूमदार और मीना कपूर। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इसका प्रकोप भी अब कम हुआ है। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की तीसरी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "सुनहरे दिन" के एक गीत का रसास्वादन और गीत का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग काफी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय रचना "बावरे गम दे गयो री..." का गायन प्रस्तुत किया। 

लखनऊ, दूरदर्शन की समाचार वाचक, उद्घोषक और सुप्रसिद्ध गायिका निर्मला कुमारी ने "स्वरगोष्ठी" के पिछले अंक के बारे में प्रशंसात्मक टिप्पणी की है। लिखतीं है; वाह वाह । संगीत की इस सुन्दर श्रृंखला की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं । आपको बहुत बहुत बधाई । 

फेसबुक पर हमारी एक श्रोता और पाठक राजश्री श्रीवास्तव ने लिखा; Krishn mohan ji aap bahut hi sarahniy kaarya kar rahe hain sageet me ruchi rakhne walon ke apki sajha ki gai jankariyan prashasaniya hai. Bahut babut dhanywad. 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया राग काफी : SWARGOSHTHI – 487 : RAG KAFI : 8 नवम्बर, 2020
 


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