स्वरगोष्ठी – ५६ में आज ‘और राग सब बने बराती दुल्हा राग बसन्त...’ भारतीय संगीत की मूल अवधारणा भक्ति-रस है। इसके साथ-साथ इस संगीत में समय और ऋतुओं के अनुकूल रागों का भी विशेष महत्त्व होता है। विभिन्न रागों के परम्परागत गायन-वादन में समय और मौसम का सिद्धान्त आज वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरता है। गत सप्ताह ऋतुराज बसन्त ने अपने आगमन की आहट दी है। इस ऋतु में मुख्य रूप से राग बसन्त का गायन-वादन अनूठा परिवेश रचता है। स मस्त पाठको-श्रोताओं का अभिनन्दन करते हुए मैं कृष्णमोहन मिश्र, आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में ऋतुराज बसन्त का स्वागत और महान संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में उनका स्मरण करने उपस्थित हुआ हूँ। हमारे परम्परागत भारतीय संगीत में ऋतु-प्रधान रागों का समृद्ध भण्डार है। छः ऋतुओं में बसन्त और पावस ऋतु, मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। आज के अंक से हम बसन्त ऋतु के रागों पर चर्चा आरम्भ कर रहे हैं। इस मनभावन ऋतु में कुछ विशेष रागों के गायन-वादन की परम्परा है, जिनमें सर्वप्रमुख राग है- बसन्त। आइए, आज सबसे पहले राग बसन्त पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत की चर्चा से सभा की...