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Monday, April 11, 2016

अमित कुमार - आर्टिस्ट प्रोफाईल - मेरे ये गीत याद रखना


मेरे ये गीत याद रखना 

आज जाने पार्श्व गायक अमित कुमार के सफ़र की दास्ताँ, और सुनें उनके कुछ यादगार गीत, आपके प्रिय आर जे विवेक श्रीवास्तव के साथ

Saturday, January 2, 2016

"याद आ रही है, तेरी याद आ रही है..." - क्यों पंचम इस गीत के ख़िलाफ़ थे?


नववर्ष पर सभी पाठकों और श्रोताओं को हार्दिक शुभकामनाएँ  



एक गीत सौ कहानियाँ - 73
 
'याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 73-वीं कड़ी में आज जानिए 1981 की फ़िल्म ’लव स्टोरी’ के मशहूर गीत "याद आ रही है, तेरी याद आ रही है..." के बारे में जिसे अमित कुमार और लता मंगेशकर ने गाया था। बोल आनन्द बक्शी के और संगीत राहुल देव बर्मन का।


गायक अमित कुमार ने लता मंगेशकर के साथ कई लोकप्रिय युगलगीत गाया है। अधिकतर लोगों का अनुमान रहा है कि इन दोनों ने साथ में पहली बार ’लव स्टोरी’ फ़िल्म में गीत गाये हैं, जबकि यह तथ्य सही नहीं है। लता-अमित का गाया पहला युगल गीत आया था साल 1979 में; फ़िल्म थी ’दुनिया मेरी जेब में’ और गीत के बोल थे "देख मौसम कह रहा है..."। फ़िल्म के फ़्लॉप होने और इस गीत में भी कोई ख़ास बात ना होने की वजह से यह गीत ज़्यादा सुना नहीं गया। ख़ैर, आज हम चर्चा कर रहे हैं फ़िल्म ’लव स्टोरी’ के गीत "याद आ रही है.." की जिसके दो संस्करण हैं, एक लता-अमित का युगल, और दूसरा अमित का एकल सैड वर्ज़न। इस फ़िल्म को अभिनेता राजेन्द्र कुमार ने बनाई अपने बेटे कुमार गौरव को लौन्च करने के लिए। राजेन्द्र कुमार जब स्टार थे तब उनकी ज़्यादातर फ़िल्मों के संगीतकार या तो शंकर-जयकिशन हुआ करते थे या नौशाद साहब। दोनों बर्मन, यानी कि एस.डी. और आर.डी, कभी भी उनकी पहली पसन्द नहीं रहे। अमित कुमार के अनुसार रमेश बहल (जो राजेन्द्र कुमार के रिश्तेदार थे) के सुझाव पर ’लव स्टोरी’ के लिए राजेन्द्र कुमार ने राहुल देव बर्मन को साइन कर लिया। राजेन्द्र कुमार के लिए यह जायज़ था कि वो किसी ऐसे संगीतकार को अपनी फ़िल्म के लिए चुने जिनके विचार उनसे मेल खाते। इसलिए अन्य वरिष्ठ संगीतकारों को चुनने के बजाय पंचम को चुनना जितना आश्चर्यजनक था उससे भी ज़्यादा आश्चर्य की बात थी अपने बेटे के पार्श्वगायन के लिए अमित कुमार जैसे नए और अनभिज्ञ गायक को चुनना जो अब तक एक हिट गीत के लिए तरस रहा था। ’लव स्टोरी’ में राजेन्द्र कुमार और किशोर कुमार के बीच में ’किशोर का लड़का, मेरा लड़का’ वाला समीकरण आ गया, और राजेन्द्र कुमार और किशोर कुमार जिस विश्वविद्यालय से उत्तिर्ण हुए थे, उनके बेटे भी वहीं पे पढ़ रहे थे। इस तरह से राजेन्द्र कुमार का मन साफ़ हो गया।


"याद आ रही है..." गीत में बांसुरी-नवाज़ पंडित रणेन्द्रनाथ (रोनु) मजुमदार ने पहली बार किसी फ़िल्मी गीत में बांसुरी बजाया था। और इस गीत के लिए अमित कुमार को 1982 के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। और रोचक बात यह है कि उस पुरस्कार के नामांकन में दो गीत उनके पिता किशोर कुमार के भी थे और दोनों गीत एक से बढ़ कर एक लाजवाब! वो गीत थे फ़िल्म ’कुदरत’ का "हमें तुमसे प्यार कितना..." और फ़िल्म ’याराना’ का "छू कर मेरे मन को..."। ये दोनों ही गीत इतने हिट हुए थे कि इन्हीं में से किसी को पुरस्कार मिलना स्वाभाविक था और लोगों का अनुमान भी। यहाँ तक कि ख़ुद किशोर कुमार भी हैरान रह गए थे। अमित कुमार ने ख़ुद एक बार इस बात का ज़िक्र किया है कि ’ल\व स्टोरी’ से पहले उनके पिता कभी उनकी तारीफ़ नहीं करते थे और हर गीत के बाद उससे बेहतर करने का सुझाव देते थे। पर ’लव स्टोरी’ के उस गीत ने जब ’कुदरत’ और ’याराना’ को मात दे दी तो उन्होंने अपने बेटे को शाबाशी दिये बिना नहीं रह सके और कहा कि आज तूने मुझे हरा दिया। और यह भी बताना आवश्यक है कि उसके बाद अगले चार सालों तक इस पुरस्कार पर किशोर कुमार ने किसी को भी हक़ जमाने नहीं दिया, यहाँ तक कि अपने बेटे को भी नहीं। 1983 में "कि पग घुंगरू बाँध मीरा नाची थी...", 1984 में "हमें और जीने की चाहत न होती...", 1985 में "मंज़िलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह..." और 1986 में "सागर किनारे दिल यह पुकारे..." के लिए किशोर दा को यह पुरस्कार मिला, और इसके अगले ही साल वो चल बसे। अमित कुमार से ’लव स्टोरी’ की सफलता के बारे में जब पूछा गया तब उन्होंने बताया कि ’लव स्टोरी’ के गीतों की अपार लोकप्रियता और खुशी को वो ठीक तरह से मना नहीं सके क्योंकि उन्हीं दिनों उनकी शादी टूट गई थी और पिता किशोर कुमार को दिल का दौरा पड़ गया था। कई महीनों तक अमित केवल अपने पिता के स्वास्थ्य की तरफ़ नज़र रख रहे थे। किशोर कमज़ोर हो गए थे, पर उनके मुख पर एक सुखद उत्तेजना थी जो बता रही थी कि वो ’लव स्टोरी’ की सफलता से कितने ख़ुश हुए हैं।


आइए अब बढ़ते हैं इस गीत के निर्माणाधीन समय की कुछ रोचक बातों की ओर। फ़िल्म के गाने रेकॉर्ड हो चुके थे। पर यह गाना पंचम को रेकॉर्ड होने के बावजूद जम नहीं रहा था। पंचम को यह गाना रोमान्टिक कम और भजन ज़्यादा लग रहा था। उनको धुन में मज़ा नहीं आ रहा था, लग रहा था कि धुन रोमान्टिक नहीं बल्कि भक्ति रस वाला है। और वो इस गाने को लेकर इतने पशोपेश में थे कि इस गाने को बदल देना चाहते थे। लेकिन सबको यह गाना बहुत अच्छा लग रहा था। इसलिए निर्माता, निर्देशक और तमाम लोगों के साथ बातचीत के बाद यह तय हुआ कि इस गीत को जैसा है, उसी रूप में फ़िल्म में रख लिया जाएगा। सबके फ़ैसले और सबके दबाव के बाद पंचम ने अनमने मन से अपने हथियार फेंक दिए और इस गाने को उसी रूप में फ़िल्म में जाने दिया जैसा रेकॉर्ड हुआ था। फ़िल्म रेलीज़ हुई और वह हुआ जो पंचम ने सोचा भी नहीं था। इस गाने को पंचम के सर्वश्रेष्ठ और कामयाब गानों में शुमार कर लिया गया। पंचम ने अमित कुमार से यह कहा कि "देख अमित, ज़िन्दगी में कुछ मोड़ कैसे आ जाती हैं; यह मेरे करीअर का सबसे ख़राब कम्पोज़िशन्स में से एक है और यह कितना बड़ा हिट हो गया"। 

फिल्म लव स्टोरी : "याद आ रही है..." : लता मंगेशकर और अमित कुमार : राहुलदेव बर्मन : आनन्द बक्शी



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Wednesday, May 18, 2011

क्या गजब करते हो जी, प्यार से डरते हो जी....मगर जनाब हँसना कभी नहीं छोडना रोने के डर से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 659/2011/99

'गान और मुस्कान' शृंखला में अब तक आपने आठ गीत सुनें जिनके भाव अलग अलग थे, लेकिन जो एक बात उनमें समान थी, वह यह कि हर गीत में किसी न किसी बात पर गायक की हँसी सुनाई दी। आज के अंक के लिए हमने जिस गीत को चुना है, उसमें भी हँसी तो है ही, लेकिन यह हँसी थोड़ी मादकता लिये हुए है। एक सेनशुअस नंबर, एक सिड्युसिंग् नंबर, और इस तरह के गीतों को आशा जी किस तरह का अंजाम देती हैं, इससे आप भली-भाँति वाकिफ़ होंगे। जी हाँ, आज आशा भोसले की मादक आवाज़ में सुनिए १९८१ की फ़िल्म 'लव स्टोरी' से "क्या ग़ज़ब करते हो जी, प्यार से डरते हो जी, डर के तुम और हसीन लगते हो जी"। युं तो फ़िल्म के नायक-नायिका हैं कुमार गौरव और विजेता पंडित, लेकिन यह गीत फ़िल्माया गया है अरुणा इरानी पर, जो नायक कुमार गौरव को अपनी तरफ़ आकर्षित करना चाह रही है, लेकिन नायक साहब कुछ ज़्यादा इंटरेस्टेड नहीं लगते। उस पर नायिका विजेता भी तो पर्दे के पीछे से यह सब कुछ देख रही है, और कुमार गौरव भी उसे देखते हुए देखता है, लेकिन अरुणा इरानी इससे बेख़बर है। इस गीत में आशा जी की शरारती हँसी गीत की शुरुआत में ही सुनाई दे जाती है। हँसी के अलावा गीत में आगे चलकर आशा जी अंगड़ाई भी लेती है, जिसका भी अपना अलग मादक अंदाज़ है। आनंद बख्शी और राहुल देव बर्मन इस फ़िल्म के गीतकार-संगीतकार रहे, और इस फ़िल्म का "कैसा तेरा प्यार कैसा ग़ुस्सा है तेरा" हम 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला में सुनवा चुके हैं।

१९८१ का साल राहुल देव बर्मन के लिए एक महत्वपूर्ण साल था। इस साल उनके संगीत से सजी फ़िल्मों में शामिल थे 'धुआँ', 'मंगलसूत्र', 'दौलत', 'जेल-यात्रा', 'कालिया', 'शौक़ीन', 'रक्षा', 'क़ुदरत', 'कच्चे हीरे', 'ज़माने को दिखाना है', 'सत्ते पे सत्ता', 'बीवी ओ बीवी', 'गहरा ज़ख़्म'। साल ८१-८२ में तीन और फ़िल्में आईं पंचम के संगीत से सजी जिसनें न केवल पंचम के करीयर को चार चांद लगाये, बल्कि तीन नये नायकों को भी जन्म दिया। ये तीन नायक हैं संजय दत्त (रॉकी), कुमार गौरव (लव स्टोरी) और सनी देओल (बेताब)। बिल्कुल नई पीढ़ी के लिए रचा संगीत ज़बरदस्त कामयाब रही, जिसने यह साबित किया कि इस नये दशक और नई पीढ़ी में भी उनका संगीत कितना जवान है! लेकिन आधुनिक शैली के ऒर्केस्ट्रेशन और नये नायकों के लिए धुन बनाने का मतलब कतई यह नहीं था कि मेलडी के साथ कोई समझौता किया जाये जो उस दौर के एक अन्य संगीतकार नें डिस्को के नाम पर किया था। पंचम नें इन फ़िल्मों में गीतों की कर्णप्रियता के साथ भी कोई समझौता नहीं किया। अब आज के प्रस्तुत गीत को ही ले लीजिये, अगर यह गीत आज के दौर में बना होता तो यकीनन इसको अश्लीलता से भर दिया गया होता, गायकी में भी अश्लील शैली अपनायी गई होती, लेकिन इस गीत को सुनते हुए कभी भी ऐसा नहीं लगता कि कहीं पे कोई ग़लत बात है। गीत मादक और सिड्युसिव ज़रूर है लेकिन अश्लील कदापि नहीं। लीजिए आप भी इसी बात को महसूस कीजिए आशा जी की चंचल, शोख़ और शरारती अंदाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि एक साक्षात्कार में राहुल देव बर्मन नें यह स्वीकार किया था कि ८० के दशक में एक के बाद एक २३ लगातार फ़िल्मों के लिए उनका संगीत फ़्लॉप रहा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका कौन है - २ अंक
सवाल ३ - निर्देशक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे अरे ये क्या हुआ, अनजाना जी कहाँ गायब हो गए. अमित जी ३ अंक ले उड़े हैं सर यानी आप दोनों को स्कोर अब बराबर है...यानी फैसला आज अंतिम गेंद पर ही होगा. अविनाश जी और दीप जी को भी बधाई. हिन्दुस्तानी जी आप आये यही बहुत है, अमित जी छूटी हुई फिल्म का नाम बताने के लिए धन्येवाद

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, March 6, 2011

मैदान है हरा, भीड़ से भरा खेलने चल दिए ग्यारह....और रोमांच से भरे कई मुकाबले हम अब तक इस वर्ल्ड कप में देख ही चुके हैं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 606/2010/306

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक नए सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। सप्ताह नया ज़रूर है, लेकिन चर्चा वही है जो पिछले सप्ताह रही, यानी क्रिकेट विश्वकप की। 'खेल खेल में' लघु शृंखला में आइए आज सब से पहले बात करते हैं विश्वकप ट्रॊफ़ी की। ICC क्रिकेट विश्वकप की ट्रॊफ़ी एक रनिंग् ट्रॊफ़ी है जो विजयी टीम को दी जाती है। इसका डिज़ाइन गरार्ड ऐण्ड कंपनी ने दो महीने के अंदर किया था। असली ट्रॊफ़ी को ICC के दुबई हेडक्वार्टर्स में सुरक्षित रखा गया है जब कि विजयी दल को इसकी एक प्रति दी जाती है। असली और प्रति में फ़र्क बस इतना है कि असली ट्रॊफ़ी में पूर्व विजयी देशों के नाम खुदाई किए हुए है। और अब २०११ विश्वकप के प्राइज़ मनी की बात हो जाए! २०११ क्रिकेट विश्वकप का विजयी दल अपने साथ घर ले जाएगा ३ मिलियन अमरीकी डॊलर्स; रनर-अप को मिलेंगे १.५ मिलियन अमरीकी डॊलर्स। लेकिन सुनने में आया है कि ICC इस राशी को दुगुना करने वाली हैं इसी विश्वकप में। यह निर्णय दुबई में २० अप्रैल २०१० के ICC बोर्ड मीटिंग् में लिया गया था। २०११ विश्वकप में १८ अम्पायर खेलों का संचालन कर रहे हैं, और इनके अतिरिक्त एक रिज़र्व अम्पायर एनामुल हक़ को भी रखा गया है। २०११ विश्वकप में अम्पायरिंग् करने वाले अम्पायरों के नाम इस प्रकार है:

ऒस्ट्रेलिया - सायमन टॊफ़ेल, स्टीव डेविस, रॊड टकर, डैरील हार्पर, ब्रुस ऒग्ज़ेनफ़ोर्ड
न्यु ज़ीलैण्ड - बिली बाउडेन, टॊनी हिल
दक्षिण अफ़्रीका - मराइस एरस्मस
पाकिस्तान - अलीम दर, असद रौफ़
भारत - शवीर तारापुर, अमिष साहेबा
इंगलैण्ड - इयान गूल्ड, रिचार्ड केटलबोरो, नाइजेल लॊंग्
श्रीलंका - अशोक डी'सिल्वा, कुमार धर्मसेना
वेस्ट इंडीज़ - बिली डॊट्रोव

दोस्तों, क्रिकेट पर बनने वाली फ़िल्मों की जब बात आती है, तो जिन चंद फ़िल्मों के नाम सब से पहले ज़ुबान पर आते हैं, वो हैं 'मालामाल', 'ऒल राउण्डर', 'अव्वल नंबर', 'लगान', 'इक़बाल' और 'हैट्रिक'। हाल में रिलीज़ हुई 'पटियाला हाउस' भी इसी श्रेणी में अपना नाम दर्ज करवाने वाली है। ये सभी फ़िल्में उस दौर की हैं कि जब फ़िल्म संगीत का सुनहरा युग बीत चुका था। लेकिन दोस्तों, क्योंकि यह शृंखला २०११ क्रिकेट विश्वकप को केन्द्रबिंदु में रख कर प्रस्तुत किया जा रहा है, ऐसे में अगर एक गीत हम क्रिकेट के नाम ना करें तो कुछ मज़ा नहीं आ रहा। इसलिए आज के अंक के लिए हमने चुना है १९९० की फ़िल्म 'अव्वल नंबर' का एक गीत, जिसके बोल हैं "ये है क्रिकेट"। वैसे दोस्तों, ५० के दशक में कम से कम एक फ़िल्म ऐसी ज़रूर आयी थी जिसमें क्रिकेट खेल पर एक गीत था। आगे चलकर इस गीत को हम शामिल करेंगे एक ख़ास प्रस्तुति के रूप में। वापस आते हैं 'अव्वल नंबर' पर। 'अव्वल नंबर' देव आनंद की फ़िल्म थी, निर्देशन भी उनका ही था, और जिसमें उनके अलावा अभिनय किया था आमिर ख़ान, आदित्य पंचोली, एक्ता सोहिनी और नीता पुरी प्रमुख। फ़िल्म की कहानी क्रिकेट और क्रिकेटर्स पर ही केन्द्रित थी जिसे लिखा भी देव साहब ने ही था। फ़िल्म में संगीत था बप्पी लाहिड़ी का और फ़िल्म के तमाम गानें ख़ूब चले थे उस ज़माने में। अगर आपको याद नहीं आ रहा तो इस फ़िल्म का सब से हिट गीत था "पूछो ना कैसा मज़ा आ रहा है", अमित कुमार और एस. जानकी की आवाज़ों में। आज का प्रस्तुत गीत गाया है बप्पी लाहिड़ी, अमित कुमार और उदित नारायण ने। इस फ़िल्म में आमिर ख़ान का प्लेबैक अमित कुमार ने किया था, लेकिन इस गीत में अमित कुमार बने आदित्य पंचोली की आवाज़ और देव साहब के लिए गाया बप्पी दा ने। 'क़यामत से क़यामत तक' से आमिर ख़ान की आवाज़ बने उदित नारायण ने इस गीत में भी उनके लिए ही गाया था। "मैदान है हरा, भीड़ से भरा, खेलने चल दिए हैं ग्यारह, विकेट है गड़े, तैयार हम खड़े, खेल शुरु होगा पौने ग्यारह, ये है क्रिकेट, ये है क्रिकेट"। तो लीजिए क्रिकेट फ़ीवर को बरकरार रखते हुए सुनते हैं आज का यह गीत जिसे लिखा है गीतकार अमित खन्ना ने।



क्या आप जानते हैं...
कि १९९० और २००० के दशकों में देव आनंद ने जिन फ़िल्मों का निर्माण किया था, उनके नाम हैं - अव्वल नंबर (१९९०), प्यार का तराना (१९९३), गैंगस्टर (१९९४); मैं सोलह बरस की (१९९८), सेन्सर (२००१), लव ऐट टाइम्स स्कुएर (२००३), मिस्टर प्राइम मिनिस्टर (२००५), और चार्जशीट (२००९)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आसान है.

सवाल १ - किस खूबसूरत अभिनेत्री पर है ये गीत - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वही जबरदस्त मुकाबला जारी है....शानदार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, July 21, 2010

कैसा तेरा प्यार कैसा गुस्सा है सनम...कभी आता है प्यार तो कभी गुस्सा विदेशी धुनों से प्रेरित गीतों को सुनकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 444/2010/144

किसी विदेशी मूल धुन से प्रेरित होकर हिंदी फ़िल्मी गीत बनाने वाले संगीतकारों की अगर चर्चा हो, और उसमें संगीतकार राहुल देव बर्मन का ज़िक्र ना करें तो चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। दोस्तों, पिछली तीन कड़ियों में हमने क्रम से १९६०, १९५७ और १९५८ के तीन गीत आपको सुनवाए, यानी कि ५० के दशक के आख़िर के सालों के गानें। आज हम एक छलांग मार कर सीधे पहुँच रहे हैं ८० के दशक में और सुनवाएँगे एक ऐसा गीत जिसकी धुन का राहुल देव बर्मन ने एक विदेशी गीत से सहारा लिया था। अब आप यह कहेंगे कि ५० के दशक से यकायक ८० के दशक में क्यों! दरअसल आज २१ जुलाई, गीतकार आनंद बक्शी साहब का जन्मदिवस। इसलिए हमने सोचा कि उन्हे याद करते हुए क्यों ना उनका लिखा एक ऐसा गीत सुनवा दिया जाए जिसकी धुन विदेशी मूल धुन से प्रेरित हो! तभी हमें ख़याल आया कि आर. डी. बर्मन के साथ उन्होने कई इस तरह के गीत किए हैं। हमने जिस गीत को चुना है वह है १९८३ की फ़िल्म 'लव स्टोरी' का "कैसा तेरा प्यार कैसा गु़स्सा है तेरा, तौबा सनम तौबा सनम"। लता मंगेशकर और अमित कुमार ने इस गीत को गाया था और अपने ज़माने की यह बेहद मक़बूल फ़िल्म थी कुमार गौरव और विजेयता पण्डित के अभिनय से सजी हुई। इस फ़िल्म का हर एक गीत सुपरहिट था, शायद आपको याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। जहाँ तक प्रस्तुत गीत की बात है, तो यह गीत स्वीडिश पॊप ग्रूप 'ए.बी.बी.ए' के गीत "आइ हैव अ ड्रीम" से लिया गया है। इस मूल गीत को लिखा था बेनी ऐंडरसन और जोर्ण उलवेऊस ने, और यह गीत आया था इस ग्रूप के १९७९ के ऐल्बम 'वूले-वू' (Voulez-Vous) में। इस गीत में मुख्य गायक थे ऐनी फ़्रिड लींगस्टैड। इसे दिसंबर १९७९ को सिंगल रिकार्ड के रूप में रिलीज़ कर दिया गया था और दूसरे साइड में "टेक अ चांस ऒन मी" का लाइव वर्ज़न डाल दिया गया था। 'ABBA Gold: Greatest Hits' और 'Mamma Mia!' जैसे हिट ऐल्बम्स में इस गीत को शामिल किया जा चुका है।

आज बक्शी साहब के जन्मदिवस के बहाने जब पंचम के गीत को हमने चुन ही लिया है तो लगे हाथ आपको पंचम के कुछ "प्रेरित" गीतों के बारे में भी बताना चाहेंगे। एक बार उषा उथुप जी विविध भारती के स्टूडियो में तशरीफ़ लाई थीं और उन्होने पंचम के बारे में बताते हुए कहा था कि वो और पंचम मिलकर बहुत से विदेशी गीतों से प्रेरणा ली और एक से एक सुपरहिट गीतों के कम्पोज़िशन्स तैयार किए। कुछ कुछ गीत तो उषा जी ही सुझाए थे पंचम को। आइए उसी इंटरव्यू से कुछ अंश यहाँ पर पढ़ें। "It is tuesday this must be Belgium, it is wednesday it must be Rome, it is thursday it must be Monteal, it is friday I must go home" - यह गाना मैंने उनको बहुत साल पहले दिया था, इस गाने से इन्स्पायर्ड होकर बना "चुरा लिया है तुमने जो दिल को, नज़र नहीं चुराना सनम"। एक और गाना था "When the moon is in the Jupiter.....", इससे बनाया "जब अंधेरा होता है आधी रात के बाद"। ऐसा ही एक और गाना था "ओ हंसिनी, मेरी हंसिनी, कहाँ उड़ चली"। ""When I was seventeen, it was a goody......" से बना "राजू, चल राजू, अपनी मस्ती में तू"। R D Burman was really a man of the world. उन्होने किसी धुन की कॊपी नहीं की, बल्कि उनसे इन्स्पायर्ड होकर he produced such nice music. Its not one man's thinking, its not like that. We two created so many songs. There was a song in French accent, "धन्नो की आँखों में रात का सूरमा, चाँद का चुम्मा"। और भी कितने गानें हम ऐसे, ऐसे ही बहुत सारे बैकग्राउण्ड म्युज़िक भी है, फ़िल्म 'शान', 'शालीमार', 'दि ट्रेन', 'कारवाँ' मे कितने ही पीसेस हैं। तो दोस्तों, आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' राहुल देव बर्मन और आनंद बक्शी साहब की सदाबहार जोड़ी के नाम, सुनते हैं फ़िल्म 'लव स्टोरी' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि गायक अमित कुमार का गाया पहला हिंदी फ़िल्मी गीत है "मैं एक पंछी मतवाला रे", जो उन्होने अपने पिता किशोर कुमार की फ़िल्म 'दूर का राही' में गाया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. पोलैंड के एक लोक गीत पर आधारित था ये गीत, संगीतकार बताएं - ३ अंक.
२. लता जी के साथ किस गायक ने दिया है इस युगल गीत में - २ अंक.
३. शैलेन्द्र का रचा ये गीत किस बिमल रॉय फिल्म फिल्म का है - २ अंक.
४. किस जोड़ी पर फिल्माया गया है ये शानदार सदाबहार गीत - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आप बिलकुल सही हैं, राजेन्द्र कुमार जी का जन्मदिन २० को ही आता है. पर अब आप समझ गए होंगें कि इस गीत से जुड़े किस कलाकार की जयंती आज यानी २१ जुलाई को है...जी हाँ आनंद बक्षी साहब. तो आज हम आपको ३ अंक नहीं दे पायेंगें...अवध जी को २ अंक अवश्य मिलेंगें, कुछ जी अभी भी शायद समझ नहीं आये हैं पहेली का स्वरुप ठीक से. ये बात हम अपने उन श्रोताओं के लिए भी एक बार फिर दोहरा रहे हैं जो हमें मेल करते हैं, विशेषकर पी के कुमार जी के लिए कि आपने सभी सवालों के जवाब नहीं देने हैं, मात्र एक सवाल का जवाब देना है, और बेहतर तभी रहेगा जब आप भारतीय समयानुसार ६.३० पर आवाज़ पर आयें ताकि, आपके जवाब पहले आ सकें.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, March 18, 2010

न बोले तुम न मैंने कुछ कहा....फिर भी श्रोताओं और ओल्ड इस गोल्ड में बन गया एक अटूट रिश्ता

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 377/2010/77

मानांतर सिनेमा के गानें इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बजाए जा रहे हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि इन लीग से हट कर गीतों का आप भरपूर आनंद उठा रहे होंगे। विविध भारती पर प्रसारित विशेष कार्यक्रम 'सिने यात्रा की गवाह विविध भारती' में यूनुस ख़ान कहते हैं कि ६० के दशक के उत्तरार्ध में एक नए क़िस्म का सिनेमा अस्तित्व में आया जिसे समानांतर सिनेमा का नाम दिया गया। इनमें कुछ कलात्मक फ़िल्में थीं तो कुछ हल्की फुल्की आम ज़िंदगी से जुड़ी फ़िल्में। इसकी शुरुआत हुई मृणाल सेन की फ़िल्म 'भुबोन शोम' और बासु चटर्जी की फ़िल्म 'सारा आकाश' से। ७० के दशक मे समानांतर सिनेमा ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। उस दौर में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, एम. एस. सथ्यु, मणि कौल, जब्बर पटेल और केतन मेहता जैसे फ़िल्मकारों ने 'उसकी रोटी', 'अंकुर', 'भूमिका', 'अर्ध सत्य', 'गरम हवा', 'मिर्च मसाला' और 'पार्टी' जैसी फ़िल्में बनाई। लेकिन यह भी सच है कि ७० के दशक के मध्य भाग तक हिंदी सिनेमा अमिताभ बच्चन के ऐंग्री यॊंग् मैन की छवि से पूरी तरह प्रभावित हो चला था। मोटे तौर पर अब सिर्फ़ दो तरह की फ़िल्में बन रही थी, एक तरफ़ 'शोले', 'दीवार', 'अमर अकबर ऐंथनी', 'त्रिशोल', 'डॊन' जैसी स्टारकास्ट वाली भारी भरकम फ़िल्में, और दूसरी तरफ़ कम बजट की वो फ़िल्में जो आम ज़िंदगी से जुड़ी हुई थी। अमुमन इन हल्की फुल्की फ़िल्मों में नायक के रूप में नज़र आ जाते थे हमारे अमोल पालेकर साहब। उनका भोलापन, नैचरल अदाकारी, और एक आम नौजवान जैसी सूरत इस तरह की फ़िल्मों को और भी ज़्यादा नैचरल बना देती थी। आज हम '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में सुनने जा रहे हैं अमोल पालेकर की ही फ़िल्म 'बातों बातों में' का एक बड़ा ही प्यारा सा युगल गीत आशा भोसले और अमित कुमार की आवाज़ों में "ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा"। बासु चटर्जी निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में अमोल पालेकर के अलावा मुख्य किरदारों में थे टिना मुनीम, असरानी, डेविड, लीला मिश्र, पर्ल पदमसी, टुनटुन और अर्वैंद देशपाण्डेय। राजेश रोशन का रुमानीयत से भरा संगीत था और गीत लिखे अमित खन्ना ने।

फ़िल्म की कहानी जहाँ एक तरफ़ एक आम परिवार की कहानी थी, वहीं दूसरी तरफ़ कई हास्यप्रद किस्सों का सहारा लिया गया कहानी के किरदारों में जान डालने के लिए। मूल कहानी कुछ ऐसी थी कि रोज़ी परेरा (पर्ल पदमसी) एक ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही विधवा है औरत हैं जो अपने गीटार पागल बेटे सावी और एक सुंदर बेटी नैन्सी (टिना मुनीम) के साथ रहती है। वह चाहती है कि नैन्सी की शादी एक अमीर लड़के के साथ हो जाए। रोज़ी की मदद करने के लिए उनके पडो़सी अंकल टॊम (डेविड) नैन्सी की मुलाक़ात टोनी ब्रगेन्ज़ा (अमोल पालेकर) से करवाते हैं सुबह ९:१० की बान्द्रा से चर्चगेट की लोकल ट्रेन में। अंकल टॊम के कहने पर नैन्सी टोनी को अपनी मम्मी से मिलवाती है। रोज़ी को शुरु शुर में तो यह जानकर टोनी पसंद नहीं आया कि उसकी तंख्व केवल ३०० रुपय है जब कि नैन्सी की तंख्वा ७०० रुपय है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि जल्द ही टोनी की तंख्वा १००० रुपय होने वाली है, तो वह मान जाती है और नैन्सी और टोनी के मिलने जुलने पर पाबंदियाँ ख़त्म कर देती है। नैन्सी अपनी मम्मी के कहे अनुसार टोनी से शादी कर लेना चाहती है, लेकिन टोनी को अभी शादी नहीं करनी है। और इस ग़लतफ़हमी से दोनों में अनबन हो जाती है। इधर रोज़ी नए लड़के की तलाश में जुट जाती है, उधर टोनी अपने फ़ैसले पर अटल रहता है। बीच में नैन्सी दोराहे पर खड़ी रहती है। यही है 'बातों बातों में' की भूमिका। इस फ़िल्म का पार्श्व इसाई परिवारों से जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसके गानें भी उसी अंदाज़ में बनाए गए हैं। राजेश रोशन ने कहानी के पार्श्व के साथ पूरी तरह से न्याय करते हुए कुछ ऐसे गानें बनाए हैं कि एक ऒफ़बीट फ़िल्म होते हुए भी इसके गानें ज़बरदस्त हिट हुए और आज भी बड़े चाव से सुने जाते हैं। आज का प्रस्तुत गीत जितना संगीत के लिहाज़ से सुरीला है, उतने ही कैची हैं इसके बोल। अमित खन्ना ने किस ख़ूबसूरती के साथ छो्टे छोटे शब्दों को फ़ास्ट म्युज़िक पर कामयाबी से बिठाया है। "ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा, मगर न जाने ऐसा क्यों लगा, कि धूप में खिला है चांद दिन में रात हो गई, कि प्यार की बिना कहे सुने ही बात हो गई"। आइए सुनते हैं। अमित कुमार की आवाज़ पहली बार गूंज रही है 'ओल इज़ गोल्ड' की महफ़िल में आज!



क्या आप जानते हैं...
कि 'बातों बातों में' फ़िल्म के गीत "उठे सब के क़दम त र रम पम पम" में पर्ल पदमसी का प्लेबैक किया था लता मंगेशकर ने जब कि लीला मिश्र का प्लेबैक किया था पर्ल पदमसी ने। है ना मज़ेदार!

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत में एक जगह कई फूलों के नाम हैं जिसमें मोगरे का भी जिक्र है, गीत पहचानें-३ अंक.
2. जगजीत कौर और पामेला चोपडा के गाये इस समूह गीत की धुन किसने बनायीं है- २ अंक.
3. समान्तर सिनेमा के सभी बड़े कलाकार मौजूद थे इस फिल्म में, कौन थे निर्देशक-२ अंक.
4. फिल्म की किस अभिनेत्री को उस वर्ष कि सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का फिल्म फेयर प्राप्त हुआ था -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
चलिए अब ज़रा स्कोर कार्ड पर नज़र डालें - शरद जी हैं ६५, इंदु जी ४५ और अवध जी हैं ३५ अंकों पर. पदम जी तेज़ी से चलकर २१ पर आ चुके है. अनुपम जी ८ रोहित जी ७ और संगीता जी ४ अंकों पर हैं, सभी को शुभकामनाएं
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, January 4, 2010

दूल्हा मिल गया...शाहरुख़ के कधों पर ललित पंडित के गीतों की डोली...

ताज़ा सुर ताल ०१/ २०१०

सजीव - गुड्‍ मॊर्निंग् सुजॊय! और बताओ न्यू ईयर कैसा रहा? ख़ूब जम के मस्ती की होगी तुमने?

सुजॊय - गुड्‍ मॊर्निंग् सजीव! न्यू ईयर तो अच्छा रहा और इन दिनों कड़ाके की ठंड जो पड़ रही है उत्तर भारत में, तो मैं भी उसी की चपेट में हूँ, इसलिए घर में ही रहा और रेडियो व टेलीविज़न के तमाम कार्यक्रमों, जिनमें २००९ के फ़िल्मों और उनके संगीत की समीक्षात्मक तरीके से प्रस्तुतिकरण हुआ, उन्ही का मज़ा ले रहा था।

सजीव - ठीक कहा, पिछले कुछ दिनों में हमने २००९ की काफ़ी आलोचना, समालोचना कर ली, अब आओ कमर कस लें २०१० के फ़िल्म संगीत को सुनने और उनके बारे में चर्चा करने के लिए।

सुजॊय - मैं समझ रहा हूँ सजीव कि आपका इशारा किस तरफ़ है। 'ताज़ा सुर ताल', यानी कि TST की आज इस साल की पहली कड़ी है, और इस साल के शुरु से ही हम इस सीरीज़ में इस साल रिलीज़ होने वाले संगीत को रप्त करते जाएँगे।

सजीव - हाँ, और हमारी अपने पाठकों और श्रोताओं से यह ख़ास ग़ुज़ारिश है कि अब की बार आप इसमें सक्रीय भूमिका निभाएँ। केवल यह कहकर नए संगीत से मुंह ना मोड़ लें कि आपको नया संगीत पसंद नहीं। बल्कि एक विश्लेषणात्मक रवैया अपनाएँ और इस मंच पर हमें बताएँ कि कौन सा गीत आपको अच्छा लगा और कौन सा नहीं लगा, और क्यों। ठीक कहा ना मैंने सुजॊय?

सुजॊय - १०० फ़ीसदी सही कहा आपने! और भई सीमा जी को टक्कर देने वाले भी तो चाहिए, वरना वो बिना गोलकीपर के गोल पोस्ट पर एक के बाद एक गोल करती चली जाएँगी, हा हा हा!

सजीव - आज तुम्हारा मूड कुछ हल्का फुल्का सा लग रहा है सुजॊय!

सुजॊय - जी बिल्कुल! नए साल में अभी तक ज़िंदगी ने रफ़्तार नहीं पकड़ी है न, इसलिए बिल्कुल फ़्रेश हूँ। और हमारे फ़िल्म जगत में भी साल का पहला महीना कुछ हद तक ढीला ढाला सा ही रहता है।

सजीव - ठीक कहा। तो चलो तुम्हारे इसी मूड को बरक़रार रखते हुए आज हम सुनते हैं और चर्चा करते हैं फ़िल्म 'दुल्हा मिल गया' के संगीत का। वैसे भी साल की शुरुआत 'लाइटर नोट' पे ही होनी चाहिए। बातें बहुत सारी हो गई, चलो जल्दी से इस फ़िल्म का शीर्षक गीत पहले सुन लेते हैं, फिर उसके बाद इस फ़िल्म की चर्चा शुरु करेंगे।

गीत: दुल्हा मिल गया...dulha mil gaya (title)


सुजॊय - यह तो दलेर मेहन्दी की आवाज़ थी ना?

सजीव - हाँ, कई दिनों के बाद किसी फ़िल्म में उनका गाया हुआ गाना आया है, और वो भी शाहरुख़ ख़ान पर फ़िल्माया गया है। शाहरुख़ ने इस फ़िल्म में अतिथि कलाकार के रूप में इस गीत में नज़र आएँगे। वैसे शाहरुख़ ने कई फ़िल्मों में इस तरह से एक गीत में नज़र आए हैं। कोई ऐसा गीत याद आता है तुम्हे?

सुजॊय - क्यों नहीं, फ़िल्म 'काल' के शीर्षक गीत "काल धमाल" में नज़र आए थे। अच्छा 'दुल्हा मिल गया' के इस गीत के अगर बात करें तो मेरा ख़याल है कि यह एक पेप्पी और कैची नंबर है जो शुरु से लेकर अंत तक अपने जोश और उत्साह को बनाए रखती है। पंजाबी रंग का गाना और उस पर दलेर साहब की गायकी, इसका असर तो होना ही था। और शाहरुख़ जो भी काम करते हैं उसमें पूरी जान लगा देते हैं।

सजीव - फ़िल्म 'दुल्हा मिल गया' में कुल १२ गानें हैं।

सुजॊय - १२ गानें? 'व्हाट्स योर राशी' में १३ गानें थे, क्या कोई होड़ सी चल पड़ी है? मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि ९० के दशक के उस टी-सीरीज़ का दौर वापस आने वाला है। याद है ना आपको कि जब हर फ़िल्म में ८-१० गानें होते थे, जिनमें गायिका होती थीं अनुराधा पौडवाल और अलग अलग गीतों में अलग अलग गायकों की आवाज़ें होती थीं?

सजीव - बिल्कुल याद है। लेकिन इस ऐल्बम की अच्छी बात यह है कि भले ही १२ गानें हैं लेकिन हर गाना अलग अलग क़िस्म का है। अब जो गाना हम सुनेंगे उसे गाया है अदनान सामी और अनुश्का मनचंदा ने। यह है "अकेला दिल", आजकल जो ट्रेंड चली है अंग्रेज़ी के बोलों को सुपरिम्पोज़ करने की, इस गीत में यह काम सौंपा गया है अनुश्का को। यह भी एक थिरकता गाना है, पहले गाने के मुक़ाबले थोड़ा स्लो। गाना ठीक ठाक है, बहुत कोई ख़ास बात भी नहीं है, चलो आगे इस गीत के बारे में राय श्रोताओं पर ही छोड़ते हैं।

सुजॊय - यह गाना कुछ कुछ वेस्ट इंडीज़ के कैरिबीयन के कैलीप्सो संगीत से प्रभावित लगता है, जिस तरह से अदनान सामी का ही एक मशहूर गाना था फ़िल्म 'ऐतराज़' में, "गेला गेला गेला दिल गेला गेला"। सुनिए यह गीत और दोनों गीतों के बीच समानता को महसूस कीजिए।

गीत: अकेला दिल..akela dil (dulha mil gaya)


सुजॊय - अब इस फ़िल्म से जुड़े लोगों की ज़रा बातें हो जाए? 'दुल्हा मिल गया' के प्रोड्युसर हैं विवेक वास्वानी। फ़िल्म का निर्देशन किया है मुदस्सर अज़ीज़ ने और ख़ास बात, उन्होने ही फ़िल्म के गानें भी लिखे हैं। यह उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म है। वैसे वो चर्चा में रहे हैं सुश्मिता सेन के बॊय फ़्रेंड होने की वजह से।

सजीव - मुदस्सर अज़ीज़ के ज़िक्र से मुझे फ़िल्मकार किदार शर्मा की याद आ गई। वो भी फ़िल्म निर्माण व निर्देशन के साथ साथ गीतकारी भी करते थे न?

सुजॊय - बिल्कुल ठीक। गुलज़ार साहब और कमाल अमरोही साहब भी इसी संदर्भ में याद किए जा सकते हैं। अच्छा, तो मैं 'दुल्हा मिल गया' के कास्ट से परिचय करवा रहा था। फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाए हैं फ़रदीन ख़ान और सुश्मिता सेन ने, तथा शाहरुख़ ख़ान का ज़िक्र तो हम कर ही चुके हैं। फ़िल्म में संगीत है ललित पंडित का। वही ललित पंडित जो कभी जतीन-ललित की जोड़ी के रूप में एक से एक सुपरहिट गानें दिया करते थे। 'फ़ना' इस जोड़ी की अंतिम फ़िल्म थी।

सजीव - और एक बात सुजॊय कि जतीन-ललित ने शाहरुख़ ख़ान के कितने सारे फ़िल्मों में सुपर डुपर हिट गानें दिए, जैसे कि 'येस बॊस', 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे', 'कुछ कुछ होता है', 'मोहब्बतें', और 'कभी ख़ुशी कभी ग़म'। और जब से ये दोनों एक दूसरे से अलग हुए हैं, किसी भी फ़िल्म में इन्हे सफलता अभी तक नहीं मिली है। ख़ैर, वापस आते हैं 'दुल्हा मिल गया' पर और तीसरा गाना जो हम अब बजाएँगे वह है "आजा आजा मेरे रांझना वे आजा आजा"।

सुजॊय - बोल सुन कर तो लग रहा है कि फ़िल्म में किसी शादी के सिचुयशन के लिए बना होगा यह गाना। गाने में मुख्य स्वर है नई आवाज़ सुनंदा का, और बाद में अनुश्का उनका साथ देती हैं। अनुश्का मनचंदा इन दिनों तेज़ी से कामयाबी के पायदान चढ़ रही हैं। सुनिधि और श्रेया के बाद अब तक कोई गायिका उस मुक़ाम तक नहीं पहुँच पायी हैं। हो सकता है वह मुक़ाम अनुश्का के इंतज़ार में है।

सजीव - इस गीत में वैसे कोई नई बात नहीं है, बल्कि 'कभी ख़ुशी कभी ग़म' के "बोले चूड़ियाँ बोले कंगना" का ही एक एक्स्टेन्शन जैसा लगता है। सिर्फ़ मुखड़ा ही नहीं, अंतरे में भी जब "साथिया हाथ दे, अब मेरा साथ दे" गाया जाता है, उसमें भी "बोले चूड़ियाँ" का अंतरा याद आ ही जाता है।

गीत: आजा आजा रांझना वे...aaja aaja ranjhna ve (dulha mil gaya)


सुजॊय - अब एक बेहद नर्मोनाज़ुक गीत हो जाए इस फ़िल्म से। सजीव, इस दौर की जो सब से अग्रणी गायिकाएँ है, यानी कि श्रेय घोषाल और सुनिधि चौहान, मैंने एक पत्रिका में एक बार पढ़ा था कि श्रेया को लता घराने का माना जाता है और सुनिधि को आशा घराने का। है न मज़ेदार ऒब्ज़र्वेशन?

सजीव - हाँ, कुछ हद तक सही भी है। श्रेया ज़्यादातर नर्मोनाज़ुक गानें गाती हैं और सुनिधि किसी भी तरह के गीत गानें से नहीं कतरातीं।

सुजॊय - तो चलिए अब एक ख़ास श्रेया वाले अंदाज़ का गाना हो जाए, यह गीत है "रंग दिया दिल"। लोक रंग में रंगा हुआ गाना है, जो उपर के तीन गीतों से बिल्कुल अलग हट के है।

सजीव - कैरीबीयन से हम सीधे अपनी धरती हिंदुस्तान में उतर आते हैं और इस गीत को सुनते हुए जैसे हम पंजाब के किसी गाँव में पहुँच जाते हैं जहाँ पीली सरसों के खेत में नायिका अपने प्यार के इंतज़ार में यह गीत गा रही होती है।

गीत: रंग दिया दिल...rang diya dil (dulha mil gaya)


सुजॊय - और अब पाँचवे और अंतिम गीत की बारी। और शायद यह फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत साबित होने वाला है। अजी गीत क्या, यह तो एक क़व्वाली है, "दिलरुबाओं के जलवे तौबा"।

सजीव - पहला गाना शाहरुख़ ख़ान पर फ़िल्माया हुआ था और यह क़व्वाली भी उन्ही पर और उनके साथ सुश्मिता सेन पर फ़िल्माया गया है। पिक्चराइज़ेशन भी ज़बरदस्त हुई है इस क़व्वाली का। इस क़व्वाली की तैयारी में हर किसी ने जी जान लगाई होगी, क्योंकि शाहरुख़ ख़ान इससे पहले फ़िल्म 'मैं हूँ ना' में एक मशहूर क़व्वाली "तुम से मिल के दिल का है जो हाल क्या कहें" कर चुके हैं जिसे अपार सफलता मिली थी। तो ज़ाहिर है कि लोगों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं।

सुजॊय - और शायद पहली बार गायक अमित कुमार शाहरुख़ ख़ान का प्लेबैक कर रहे हैं इस क़व्वाली में। 'अपना सपना मनी मनी' में "दिल में बजी गीटार" के बाद अमित कुमार की आवाज़ फिर से गूँज उठी है इस क़व्वाली में। वैसे सजीव, क्या आपको अमित कुमार की आवाज़ मे कोई और क़व्वाली याद आती है?

सजीव - नहीं भई मुझे तो कोई ऐसी क़व्वाली याद नहीं आ रही है।

सुजॊय - कोई बात नहीं, यह सवाल आज हम अपने ट्रिविया में पूछ लेंगे। "दिलरुबाओं के जलवे" में अमित कुमार के साथ आवाज़ मिलाई है मोनाली ठाकुर ने जिन्होने फ़िल्म 'रेस' का वह हिट गीत गाया था "ज़रा ज़रा टच मी टच मी"। रीयलिटी शोज़ के वजह से कई गायक गायिकाएँ सामने आ रहे हैं। लेकिन उससे भी बड़ी बात है कि इन्हे फ़िल्मों में चांस देने में संगीतकारों और फ़िल्मकारों की भूमिका। अनुश्का और मोनाली ऐसी ही रीयलिटी शोज़ से उभरी हैं। इस फ़िल्म में एक और गीत है जिसमें तुलसी की आवाज़ है, वो भी यही से आईं हैं। और फिर श्रेया सुनिधि भी तो रीयलिटी शो की ही उपज हैं!

सजीव - और एक मज़ेदार बात नोटिस की है तुमने इस क़व्वाली में?

सुजॊय - कौन सी?

सजीव - यही कि क़व्वाली के अंत के जो बोल हैं उनमें शाहरुख़ ख़ान और सुश्मिता सेन के कई फ़िल्मों और गीतों का ज़िक्र आता है जैसे कि शाहरुख़ की फ़िल्में बादशाह, कुछ कुछ होता है, दीवाना, कुछ कुछ होता है, बाज़ीगर, डर, अंजाम, देवदास, दिल तो पागल है, मैं हूँ ना। सुश्मिता की दस्तक, सिर्फ़ तुम और बेवफ़ा जैसी फ़िल्मों और "दिलबर" तथा "मस्त माहौल" जैसे गीतों का उल्लेख भी आता है क़व्वाली के अंतिम चरण में। मुदस्सर अज़ीज़ ने बतौर गीतकार भी अच्छा काम दिखाया है इस फ़िल्म में। अब उनकी क़िस्मत के सितारे कितने बुलंद हैं, वह तो फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद ही पता लगेगी!

सुजॊय - तो चलिए, हम सब मिलकर इस क़व्वाली का लुत्फ़ उठाते हैं। हमने १२ में से कुल ५ गानें यहाँ पे शामिल किए जो अलग अलग रंग-ओ-अंदाज़ के हैं। उम्मीद है आप सभी को पसंद आएँगे। नीचे पूछे गए सवालों के जवाब देने की कोशिश कीजिएगा लेकिन इन गीतों के बारे में अपनी राय टिप्पणी में लिखना हर श्रोता व पाठक के लिए अनिवार्य है। :-)

गीत: दिलरुबाओं के जलवे तौबा...dilrubaaon ke jalve (dulha mil gaya)


एल्बम "दूल्हा मिल गया" को आवाज़ रेटिंग **१/२
फिल्म में हालाँकि शाहरुख़ खान अतिथि भूमिका में हैं पर प्रचार प्रसार में उन्हीं का सहारा लिया जा रहा है. जैसा कि हमने उपर जिक्र किया, लगभग सभी गीत औसत ही हैं, "अकेला दिल" अदनान सामी के गायन अंदाज़ और अच्छे बोलों के कारण चर्चित हो सकता है. कुछ नयी आवाजों में संभावना नज़र आती है पर इन्हें और बेहतर गीत भी मिलने चाहिए, नए पन के अभाव में इस अल्बम को ढाई तारे की रेटिंग ही दी जा सकती है
.

और अब बारी है ताज़ा सुर ताल (TST) ट्रिविया की, जनवरी के पहले सोमवार से लेकर दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक हर सप्ताह हम आपसे पूछेंगें ३ सवाल. हर सही जवाब के होंगें ३ अंक. इसके अलावा जो श्रोता प्रस्तुत गीतों को सुनकर अपनी रेटिंग देगा (५ में से ) वो भी १ अंक पाने का हक रखेगा, तो खेलिए हमारे संग, नए गीतों पर आपनी राय रखिये और सवालों का जवाब तलाश कर अपना संगीत ज्ञान भी बढ़ायिये...

प्रस्तुत है आज के ३ सवाल

सवाल # १. अमित कुमार ने गायिका हेमलता के साथ १९८८ की एक फ़िल्म में एक क़व्वाली गाया था। आनंद बक्शी की रचना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत, फ़िल्म के मुख्य किरदार थे गोविन्दा और सोनम। बताइए इस क़व्वाले के बोल और फ़िल्म का नाम।

सवाल # २. क्योंकि आज ज़िक्र है संगीतकार ललित पंडित का, तो बताइए कि जतीन-ललित की जोड़ी ने अपना पहला फ़िल्मी ऐल्बम 'यारा दिलदारा' से पहले जिस ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम की रचना की थी, उस ऐल्बम का क्या शीर्षक था?

सवाल # ३. मुदस्सर अज़ीज़ ने 'दुल्हा मिल गया' में पहली बार अपने निर्देशन के जल्वे दिखाए हैं। गानें भी उन्होने ही लिखे हैं लेकिन बतौर गीतकार यह उनकी पहली फ़िल्म नहीं है। तो आप ही बता दीजिए कि इससे पहले उन्होने किस फ़िल्म में गीत लिख चुके हैं?



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, January 22, 2009

किशोर दा के संगीत का आखिरी दशक और १० सदाबहार प्रेम गीतों का गुलदस्ता

साथियो,
किशोर कुमार के जीवन के आख़िरी दशक (१९८०-१९८७)की कुछ झलकियों के साथ इस बार का किशोर नामा प्रस्तुत है |
उस दशक में किशोर कुमार गायकों में एक अनुभवी और सबसे मशहूर नाम था| लगभग हर गीतकार और संगीतकार के साथ उन्होंने काम किया| उनकी इस विभिन्नता (diversity)के कुछ नमूने -

१९८० - गीत - ओम शान्ति ओम - फ़िल्म - क़र्ज़, संगीत - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीतकार - आनंद बख्शी
१९८२ - गीत - पग घुँघरू बाँध - फ़िल्म - नमक हलाल, संगीत - बप्पी लाहिरी, गीतकार - अनजान
१९८३ - गीत - हमें और जीने की अगर तुम न होते, संगीत - राहुल देव बर्मन, गीतकार - गुलशन बावरा
१९८५ - गीत - सागर किनारे सागर, संगीत - राहुल देव बर्मन, गीतकार - जावेद अख्तर

अभिनेता के रूप में जिन मुख्य फिल्मों में काम किया वे कुछ ऐसे हैं -
चलती का नाम ज़िंदगी(१९८१)
दूर वादियों में कहीं (१९८२)
अपमान (१९८२)
सुन सजना (१९८२)
कौन जीता कौन हारा (१९८७)

संगीतकार के रूप में इन फिल्मों में छाप छोड़ी -
चलती का नाम ज़िंदगी (१९८१)
ममता की छाँव में (१९९०)

हरफनमौला की आख़िरी कोशिश-

१९९० में आयी फ़िल्म -"ममता की छाँव में" दादा की आख़िरी कोशिश साबित हुयी |यह फ़िल्म इस बात को मजबूत करती है कि एक कामियाब कलाकार हमेशा अपने हुनर को जिंदा और जवां रखता है | हरफनमौला किशोर ने इस फ़िल्म में निर्देशन किया,गीत लिखा और गाया भी | उनके रहते यह फ़िल्म पूरी नहीं हो पायी और बाद में उनके बेटे अमित कुमार ने बड़े मेहनत से इसे पूरा किया और इसे यादगार बनाया |इस फ़िल्म में लीना जी और अमित कुमार ने अभिनय भी किया था | दादा के चहिते राजेश खन्ना ने भी इसमे अपनी दादा के साथ अन्तिम छाप छोड़ी |

किशोर की आख़री सौगात-

८० के दशक में किशोर कुमार और संगीतकार बप्पी लहरी की जोड़ी अपने जड़ें ज़मा रही थीं | अफ़सोस, यह सफ़र लंबे समय का नही था | अक्टूबर १२,१९८७ के दिन किशोर ने बप्पी का एक गीत गाया |यह गीत फ़िल्म "वक्त की आवाज़" के लिए आशा भोसले के साथ एक युगल गीत था | गीत था "ये गुरु आ जाओ" |बप्पी लहरी जो दादा को अपना गुरु भी मानते थे, गुरु के लिए आख़िरी गीत दे रहे थे | १३ अक्टूबर १९८७ के दिन, किशोर कुमार एक बड़े ह्रदय अपघात(Heart Attack)से हमेशा के लिए चल दिए | उस समय उनकी उम्र ५८ की थी |अपने अन्तिम दिनों में दादा का मन शहरी जीवन से भर गया सा जान पड़ता था |शहरों के बनावटीपन से दूर रहने वाले किशोर अपने घर "खंडवा" लौटना चाह रहे थे |
उनका मन था कि वे अपनी आवाज़ में अपने रोल मॉडल "कुंदन लाल सहगल" के गीतों की रिकॉर्डिंग कर पेश करें | लेकिन यह सब अधूरा रह गया |

पुरस्कार और सम्मान-

किशोर कुमार को ८० के दशक में इन फिल्मों के लिए फ़िल्म फेअर पुरस्कार मिला |
१. १९८२ - गीत - "पग घुंगरू बाँध", फ़िल्म - नमक हलाल
२. १९८३ - गीत - "हमें और जीने की", फ़िल्म - अगर तुम ना होते
३. १९८4 - गीत - "मंजिले अपनी जगह है", फ़िल्म - शराबी
४. १९८५ - गीत - "सागर किनारे", फ़िल्म - सागर |

इसके अलावा 15 से अधिक बरस उनके नाम पुरस्कार के लिए आते रहें |
यह बात उस वक्त की है जब हिन्दी फ़िल्म जगत काफी जवां हो गया था और कई गायक,कलाकार पैर जमा चुके थे,फ़िर भी दादा अपने आप में एक मिसाल बने रहे |

भारत सरकार ने किशोर कुमार के नाम से डाक टिकट जारी करके उन्हें सम्मान दिया है |

आज भी अमित कुमार स्टेज शो और साक्षात्कार के ज़रिये अपने पिता की बातों को लोगों से बाँटते रहते हैं |
किशोर कुमार के दीवानों की कमी नही हैं,उनके नाम पर आज भी क्लब चलते हैं, संगीत प्रतियोगिता होती रहती है | कलाकारों का एक हुजूम उन्हें अपना प्रेरक मान कर याद करता रहता है |
कुमार सानु, अभिजित और बाबुल सुप्रियो जैसे हिन्दी फिल्मों के पार्श्व गायक दादा के गीतों से सीख ले आगे बढ़ते रहें हैं | किशोर के दुसरे बेटे "सुमित कुमार" ने भी गायकी में कदम बढ़ा दिया है |
इस तरह से किशोर कुमार आज भी हमारे बीच किसी ना किसी सूरत में गाता रहता है, आता रहता है |


कभी गीत -संगीत में सुनायी देता है,
कभी ऐक्टर - डेरक्टर बन दिखाई देता है,
कहीं नहीं गया किशोर कुमार अपना ,
वो तो हमारे दिलों में यहीं - कहीं रहता है
|

सुनते हैं किशोर दा के ये दस रोमांटिक गीत -
१. सागर जैसी आँखों वाली...
२. रात कली एक ख्वाब में आई...
३. तेरे चेहरे में...
४. सिमटी सी शरमाई सी...
५. ये नैना ये काजल...
६. पल भर के लिए...
७ हमें तुमसे प्यार कितना...
८. पल पल दिल के पास...
९. छूकर मेरे मन को...
१०.प्यार दीवाना होता है...



-- अवनीश तिवारी


Tuesday, October 7, 2008

देखा न हाय रे सोचा न...यही था किशोर का मस्तमौजी अंदाज़

दोस्तों,
१९७० -१९८० के दशक में किशोर कुमार को एक लेख में पेश करना बहुत मुश्किल है | इस महान शख्सियत की कुछ यादें -

किशोर का हॉलीवुड प्रेम -

कोई भी सच्चा कलाकार भाषा या देश की सीमा में नही बंधता है और अपने को मुक्त रखते हुए आगे चलता रहता है | किशोर इसका एक अच्छा नमूना पेश कर गए | किशोर कुमार अपने बेटे अमित कुमार के साथ हॉलीवुड की फिल्मे देखना पसंद किया करते थे | कुछ विशेष फिल्मों और कलाकारों के प्रति उनका काफी रुझान रहा | जैसे गोड फादर (God Father) फ़िल्म को उन्होंने १७-१८ बार देखा | हॉलीवुड अभिनेता जॉन वायने ( John Wayne) और मार्लोन (Marlon) उन्हें बेहद पसंद थे | उनकी फिल्में देखने के बाद किशोर उन कालाकारों के अभिनय के विषय में वे अमित से चर्चा करते | यह सब बातें उनके भीतर अभिनय की समझ को दर्शाता है | हॉलीवुड फिल्मो से प्रभावित होकर उन्होंने १९७१ में एक यादगार फ़िल्म भी बनायी - "दूर का राही " |




कलाकार पिता और कलाकार पुत्र -

यदि ऐसा कहे कि किशोर कुमार ने ही अमित कुमार के भीतर के कलाकार को संवारा और प्रोत्साहित कर प्रस्तुत किया, तो कोई गलत नही होगा | अमित शुरू के बरसों में अपनी माँ के साथ पश्चिम बंगाल में रहते थे और छुट्टियों में मुम्बई आते रहते थे | अपने पिता की गायकी उनकी प्रेरणा रही | किशोर कुमार को जब पता चला कि अमित को गाने में रूचि है तो उसे मुम्बई ले आए | १९ बरस के उम्र में अब पिता के साथ रहना अमित को खूब भाया | १९७१ में दूर का रही फ़िल्म में अमित कुमार से अभिनय करवा कर पिता ने अमित को कला के मैदान में उतार दिया | किशोर के साथ अमित भी स्टेज शो में जाते रहे और सीखते रहे | एक समय आया, जब लोगों ने स्टेज शो में दोनों को एक साथ गाते देखा और सूना | नौजवान अमित कुमार ने फिल्मों में गाने गाये और अभिनय भी किया |आज भी जब कभी भी हो, अमित कुमार अपने प्रेरक पिता को याद कर लोगों से उनके बातों को बड़े आदर से बाँटते हैं |

इस दशक में किशोर कुमार और आर.डी.बर्मन याने सबके चाहिते पंचम दा की युगल जोड़ी कामयाब रही |
१९७१ में आयी राजेश खन्ना के अभिनय से अलंकृत फ़िल्म "अमर प्रेम" इसका बेहतरीन नमूना है |
उसी दशक एक नौजवान कलाकार उभर रहा था,कभी बढ़ता तो कभी गिरता | उस नए कलाकार के लिए पहला हिट गाना पंचम दा ने किशोर कुमार से ही गवाया | यह फ़िल्म थी- "Bombay to Goa" और गीत था "देखा ना हाय रे सोचा ना ..." | उस नए तरुण अभिनेता याने अमिताभ बच्चन के शुरुवाती दिनों में उनके गाये गीत हिट हुए और अमिताभजी को लोकप्रिय बनाने में बड़े मददगार साबित हुए |

कुछ सुपर सुपर हिट फिल्मे जिनमे किशोर कुमार ने आज के बिग बी के लिए गाने गाये थे -

१९७३ - अभिमान,
१९७५ - शोले , मिली ,
१९७७ - अमर अकबर अन्थोनी ,
१९७८ - डॉन, मुकद्दर का सिकंदर,
१९७९ - मिस्टर नटवरलाल आदि ...

हमेशा की तरह राजेश खाना के लिए किशोर कुमार की आवाज़ इस दशक भी पहचान रही |कटी पतंग, अमर प्रेम, अनुरोध, महबूबा जैसी फिल्मों में गाये गाने आज भी पसंद किए जाते हैं |महबूबा फ़िल्म का एक गीत है - "मेरे नैना सावन भादो ..." इस गीत से किशोर कुमार की शैली और हुनर दोनों को परखा जा सकता है | धूम धडाके और मस्ती से गाने वाले किशोर कुमार के इतने भावुक होकर गाये गीतों से उनके बहु आयामी होने का पता चलता है |

मोहम्मद रफी और मुकेश जैसे मंझे हुए गायकों की मौजूदगी में भी किशोर कुमार ने अपनी जगह बना ली थी | लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और कल्याणजी-आनंदजी जैसे संगीतकारों के लिए किशोर कुमार का नाम एक पसंद बन गया था |




गुरु का साथ छूटा -

१९७५ में हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म "मिली",सचिन देव बर्मन और किशोर की अन्तिम फ़िल्म बनी | बीमारी में होते हुए भी बर्मन दा जाते जाते इतिहास रच गए | "आए तुम याद मुझे" और "बड़ी सूनी सूनी है" ये दो गीत इतने लोकप्रिय हुए की आज भी हिट हैं | किशोर कुमार ने बिछड़ते अपने गुरु के लिए अपनी भावनाओं में डूबे ये दो गीत गाकर अपनी श्रद्धांजली दी | एस. डी. बर्मन के साथ उन्होंने २७ फिल्मों में १०० से ज्यादा गीत गायें | हिन्दी फ़िल्म इतिहास में यह जोड़ी हमेशा याद की जाती रहेगी |

पुरस्कार -

१९७६ - अमानुष के गीत "दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा" और १९७९ - डॉन फ़िल्म के हिट गाने "खैके पान बनारस वाला" के लिए उनको फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिले |

किशोर की तीसरी शादी अभिनेत्री योगिता बाली से हुयी | १९७६ से १९७८ तक यह कामयाब नही हो सका | १९७९ में किशोर कुमार ने अपने इस उम्र में शादी के विषय से मिलती जुलती एक फ़िल्म बनाई - " शाब्बास डैडी " (Shabas Dady) | इसमे किशोर कुमार, अमित कुमार , योगिता बाली और महमूद ने अभिनय किया | संगीत और आवाज़ किशोर कुमार की रही |

मजाकिया किशोर कुमार के किस्से बड़े मशहूर थे | स्टूडियो में धूम मचाना, किसी पर अचानक कुछ कह हँसी करना, ख़ुद पर ही चुटकले करना, तरह तरह के रूप बनाकर रहना, लोगों को उनके ओर आकर्षित करता रहा | यदि उनके उस अनोखे शख्सियत की बातें करूँ तो सारा लेख सिर्फ़ उसी पर होगा |

कहने को बहुत कुछ है , लेकिन ठहरना तो होगा ही | इस बार के लिए किशोर के लिए मेरे चंद लफ्ज़ -

तुम्हारी धुन आज भी बजती है,
तुम्हारे सुर आज भी सजते हैं,
कभी आकर कोई नग़मा सुना जाओ...दुबारा |


इसी दौर के मशहूर,किशोर दा कुछ बेमिसाल गीत भी सुन लेते हैं -



-- अवनीश तिवारी

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