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Wednesday, September 30, 2009

रात के राही थम न जाना....लता की पुकार, साहिर के शब्दों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 218

'मेरी आवाज़ ही पहचान है' शृंखला की आज की कड़ी में लता जी के जिस दुर्लभ नग़मे की बारी है, उसके गीतकार और संगीतकार हैं साहिर लुधियानवी और सचिन देव बर्मन, जिन्होने एक साथ बहुत सारी फ़िल्मों के गानें बनाए हैं। और लगे हाथ आप को यह भी बता दें कि बहुत जल्द हम इस गीतकार- संगीतकार जोड़ी के गीतों से सजी एक पूरी की पूरी शृंखला आप की सेवा में प्रस्तुत करने जा रहे हैं। तो आज जिस गीत को हमने चुना है, या युं कहें कि आज के लिए जिस गीत को लता जी के अनन्य भक्त नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे ने हमें चुन कर भेजा है, वह गीत है फ़िल्म 'बाबला' का, "रात के राही थक मत जाना, सुबह की मंज़िल दूर नहीं"। एक बहुत ही आशावादी गीत है जिसके हर एक शब्द में यही सीख दी गई है कि दुखों से इंसान को कभी घबराना नहीं चाहिए, हर रात के बाद सुबह को आना ही पड़ता है। इस तरह आशावादी रचनाएँ बहुत सारी यहाँ बनी हैं और जिनमें से बहुत सारे बेहद लोकप्रिय भी हुए हैं। लेकिन फ़िल्म 'बाबला' के इस गीत को बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया है और समय के साथ साथ मानो इस गीत पर धूल सी जम गयी है। आज हमारी छोटी सी कोशिश है इस धूल की परत को साफ़ करने की और इस भूले बिसरे गीत की मधुरता में खो जाने की तथा इसमें दी गई उपदेश पर अमल करने की। फ़िल्म 'बाबला' बनी थी सन् १९५३ में एम. पी. प्रोडक्शन्स के बैनर तले, जिसका निर्देशन किया था अग्रदूत ने। दोस्तों, आप को एम. पी प्रोडक्शन्स की बारे में पता है ना? यह वही बैनर है जिसने सन् १९४२ में कानन बाला को लेकर बनाई थी फ़िल्म 'जवाब' जिसमें कानन बाला का गाया "दुनिया ये दुनिया तूफ़ान मेल" उस ज़माने का सब से हिट गीत बन गया था। इससे पहले कानन बाला न्यु थियटर्स से अनुबंधित थीं, लेकिन फ़िल्म 'जवाब' से वो 'फ़्रीलांसिंग' पर उतर आईं। ख़ैर, एम. पी. प्रोडक्शन्स की फ़िल्म 'बाबला' के मुख्य कलाकार थे मास्टर नीरेन, शोभा सेन, मंजु डे, हीरालाल और परेश बैनर्जी। ये सभी कलकत्ता फ़िल्म इंडस्ट्री के कलाकार थे। इस फ़िल्म में लता जी के साथ साथ तलत साहब ने भी कुछ गीत गाए थे।

आज जब बर्मन दादा और लता जी की एक साथ बात चली है तो आज हम जानेंगे लता जी क्या कहती हैं इस सदाबहार संगीतकार के बारे में, जिन्हे वो पिता समाम मानती हैं। लता जी और दादा के बीच में हुई अन-बन की बात तो हम एक दफ़ा कर चुके हैं, आज कुछ और हो जाए। अमीन सायानी के उस इंटरव्यू का ही हिस्सा है यह अंश - "बर्मन दादा हमेशा डरे रहते थे। उनको लगता था कि लता अगर नहीं आई तो गाना मेरा क्या होगा! वो जब ख़ुद गा कर बताते थे तो हम लोगों को थोड़ी मुश्किल होती थी कि हम दादा की तरह कैसे गाएंगे। तो उनकी आवाज़ ज़रा सी टूटती थी। तो वो हम नहीं, मतलब मैं नहीं कर सकती थी। पर मैं उनसे हमेशा पूछती थी कि दादा, ये कैसे गाऊँ? तो वो बताते थे कि तुम इसे इस तरह गाओ तो अच्छा लगेगा। जब वो बहुत ज़्यादा 'ऐप्रीशिएट' करते थे तो उनकी एक ख़ास बात थी कि वो पान खिलाते थे, (हँसते हुए), क्योंकि वो ख़ुद पान खाते थे। पर वो पान किसी को नहीं देते थे, पर जिसको दिया वो समझ लीजिए कि उससे वो बहुत ख़ुश हैं। और वो पान मुझे हमेशा देते थे।" दोस्तों, आज बर्मन दादा तो नहीं रहे लेकिन लता जी की यादों में वो ज़रूर ज़िंदा हैं और ज़िंदा हैं अपने अनगिनत लोकप्रिय गीतों के ज़रिए। लता जी की तरफ़ से बर्मन दादा के नाम हम यही कह सकते हैं कि "तुम न जाने किस जहाँ में खो गए, हम भरी दुनिया में तन्हा रह गए"। तो आइए, आप और हम मिल कर सुनते हैं फ़िल्म 'बाबला' से लता, साहिर और दादा बर्मन की यह बेमिसाल रचना "रात के राही थक मत जाना, सुबह की मंज़िल दूर नहीं"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक मस्ती भरा गीत शैलेन्द्र का लिखा, लता का गाया.
२. धुन है शंकर जयकिशन की.
३. गीत चुलबुला है पर इस शब्द से शुरू होता है -"दर्दे.."

पिछली पहेली का परिणाम -

वाह वाह लता जी के दुर्लभ गीतों की मुश्किल पहेली का जवाब देने आये नए प्रतिभागी, मुरारी पारीख....बधाई आपका खाता खुला है ३ शानदार अंकों से. आशा है आगे भी आप इसी तरह सक्रिय रहेंगें...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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