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Wednesday, March 23, 2016

होली के रंग रंगा राग काफी


रेडियो प्लेबैक की पूरी टीम अपने पाठकों और श्रोताओं को संप्रेषित कर रही है होली की ढेर सारी मंगल कामनाएँ...रंगों भरे इस त्यौहार में आपके जीवन में भी खुशियों के नए रंग आये यही हमारी प्रार्थना है. हिंदी फिल्मों में राग काफी पर आधारित बहुत से होली गीत बने हैं, आईये आज सुनें हमारे स्तंभकार कृष्णमोहन मिश्रा और आवाज़ की धनी संज्ञा टंडन के साथ इसी राग पर एक चर्चा, जिसमें जाहिर है शामिल है एक गीत होली का भी
 

Sunday, December 30, 2012

संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर विशेष -2


स्वरगोष्ठी-102 में आज 

संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर विशेष -2
  
खमाज, केदार, सोहनी, वृन्दावनी सारंग और भैरवी में पगे नौशाद के गीत  


क्षिति, पी.के. और प्रकाश संगीत-पहेली के महाविजेता बने



‘स्वरगोष्ठी’ के 102वें अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों के बीच उपस्थित हूँ। आपको स्मरण ही होगा कि गत रविवार को हमने फिल्म जगत के यशस्वी संगीतकार नौशाद अली के 94वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से जुड़े कुछ प्रसंगों का स्मरण किया था। पिछले अंक में हमने नौशाद के संगीतबद्ध, 1946 से लेकर 1955 के बीच कुछ राग-आधारित गीतों का चयन किया था। आज हम उससे अगले दशक अर्थात 1956 से लेकर 1967 के बीच के कुछ राग-आधारित गीत आपको सुनवाएँगे। ये गीत खमाज, केदार, सोहनी, वृन्दावनी सारंग और भैरवी रागों पर आधारित हैं जिनका रसास्वादन आप करेंगे।  
इसके साथ ही आज के इस अंक में हम ‘स्वरगोष्ठी’ के वार्षिक महाविजेता और उप-विजेताओ की घोषणा भी कर रहे हैं।


रम्भ से ही नौशाद ने अपने संगीत को उत्तर प्रदेश के लोक संगीत और राग आधारित संगीत पर केन्द्रित रखा। यही नहीं आवश्यकता पड़ने पर दिग्गज शास्त्रीय गायकों को भी अपनी फिल्मों में गवाया। 1957 की फिल्म ‘मदर इण्डिया’ और ‘गंगा जमुना’ में तो नौशाद ने लोक संगीत के श्रेष्ठतम उदाहरण प्रस्तुत किये। नौशाद ने इन फिल्मों के कुछ गीतों में तो लोक धुनों के साथ रागदारी संगीत का अनूठा समिश्रण कर फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा दिया। आज सबसे पहले हम आपको फिल्म ‘मदर इण्डिया’ का एक गीत सुनवाते हैं, जिसे मन्ना डे ने स्वर दिया है। गीत के बोल हैं- ‘चुनरिया कटती जाए रे, उमरिया घटती जाए...’। नौशाद ने इस गीत में पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक प्रचलित लोकधुन के साथ-साथ राग खमाज के स्वरों का उपयोग भी किया है। वर्तमान में प्रचलित राग खमाज ठुमरियों के लिए एक आदर्श राग है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ का प्रयोग नहीं होता और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कई फिल्म-संगीतकारों ने खमाज का प्रयोग किया है। नौशाद के संगीत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे विविध रागों के स्वरों का सरल लोक रूपान्तरण कर लेते थे। फिल्म ‘मदर इण्डिया’ के इस गीत में भी उनकी इस प्रतिभा का स्पष्ट दिग्दर्शन होता है। मन्ना डे के स्वरों में सुनिए राग खमाज का एक अनूठा फिल्मी रूप।

राग - खमाज : ‘चुनरिया कटती जाए रे...’ : मन्ना डे : फिल्म - मदर इण्डिया


नौशाद की संगीत प्रतिभा को शिखर पर ले जाने में 1960 की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस फिल्म का पूरा संगीत ही अविस्मरणीय रहा है। आज के इस अंक में हमने फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के दो गीत लिये हैं। पहला लता मंगेशकर का गाया गीत है- ‘बेकस पे करम कीजिये सरकार-ए-मदीना...’, जिसे नौशाद ने राग केदार के स्वरों का आधार लेकर संगीतबद्ध किया था। राग केदार कल्याण थाट से संचालित होता है। प्राचीन ग्रन्थकार इसे बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे। इस राग में दोनों मध्यम तथा अन्य स्वर शुद्ध लगते हैं। शुद्ध मध्यम आरोह-अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम केवल आरोह में प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ तथा अवरोह में गन्धार स्वर वर्जित होता है। नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ का यह गीत राग केदार पर आधारित गीतों की सूची में एक अच्छा उदाहरण है। आपके लिए प्रस्तुत है यह गीत-

राग - केदार : ‘बेकस पे करम कीजिये...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मुगल-ए-आज़म


फिल्मों के प्रसंग के अनुसार नौशाद उस समय के दिग्गज शास्त्रीय गायकों को आमंत्रित कर गवाने से भी नहीं चूके। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में तथा 1954 की फिल्म ‘शबाब’ में दोबारा उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में ऐसा प्रयोग वे कर चुके थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक प्रसंग में अकबर के दरबारी गायक तानसेन के स्वर में जब एक गीत की आवश्यकता हुई तो नौशाद ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को गाने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया। उस्ताद का राग सोहनी में गाया वह गीत था- ‘प्रेम जोगन बनके...’। इस ठुमरीनुमा गीत के लिए के. आसिफ ने उस्ताद को पचीस हजार रुपये मानदेय के रूप में दिया था। यह गीत उन्हें इतना पसन्द आया कि के. आसिफ ने उस्ताद बड़े गुलाम अली को पचीस हजार रुपये और देकर एक और गीत ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’ (राग रागेश्री) भी गवाया था। आइए, अब हम आपको उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ की राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध ठुमरी सुनवाते हैं।

राग – सोहनी : ‘प्रेम जोगन बनके...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : फिल्म - मुगल-ए-आज़म



लोकधुनों और राग आधारित गीतों के अलावा गज़लों की संगीत-रचना में भी नौशाद सिद्ध थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’, ‘मेरे महबूब’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘पालकी’ आदि फिल्मों में उनकी संगीतबद्ध गज़लें बेहद लोकप्रिय हुई थीं। फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ में मोहम्मद रफी का गाया- ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं...’ और ‘गुजरे हैं आज इश्क़ में...’ की धुनें बेहद आकर्षक थीं। परन्तु आज हम आपको इस फिल्म का जो गीत सुनवा रहे हैं, वह राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित है। मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वरों में प्रस्तुत इस युगल गीत के बोल हैं- ‘सावन आए या न आए, जिया जब झूमे सावन है...’। तीनताल और कहरवा में निबद्ध इस गीत का आनन्द आप लीजिए।

राग – वृन्दावनी सारंग : ‘सावन आए या न आए...’ : आशा भोसले और रफी : फिल्म – दिल दिया दर्द लिया




नौशाद द्वारा लोक धुनों के आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण के लिए यदि फिल्म ‘मदर इण्डिया’ को याद रखा जाएगा तो 1961 में बनी फिल्म ‘गंगा जमुना’ का संगीत भी कुछ कम नहीं था। पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोकप्रिय धुनों में राग खमाज, पीलू, पहाड़ी, भैरवी आदि रागों का स्पर्श देकर नौशाद ने इस फिल्म के संगीत के स्तर को नई ऊँचाईयों तक पहुँचा दिया था। फिल्म ‘गंगा जमुना’ के एक गीत- ‘दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे...’ को नौशाद ने लोक धुन बिरहा का आधार दिया तो राग भैरवी के कोमल स्वरों का स्पर्श देकर गीत के विरह भाव को उत्प्रेरित भी किया। सितार और सारंगी का प्रयोग कर उन्होने गीत को अतुलनीय कर्णप्रियता प्रदान की है। संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित दो कड़ियों की इस लघु श्रृंखला का समापन हम फिल्म ‘गंगा जमुना' के इसी गीत से कर रहें हैं। लता मंगेशकर की आवाज़ में राग भैरवी के स्वरों की चाशनी में पगे इस गीत का आप रसास्वादन करें और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दें।

राग – भैरवी : ‘दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गंगा जमुना

आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत के संगीतकार कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 104वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 100वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में वर्ष 1954 की फिल्म ‘शबाब’ के गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मुलतानी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

वर्ष 2012 के महाविजेता


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ 51वें अंक अर्थात वर्ष 2012 के प्रारम्भिक अंकों से हमने आप सबके परामर्श से संगीत पहेली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू किया था। गत 16 दिसम्बर के अंक में 100वीं पहेली सम्पन्न हुई है। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे कुछ पाठक नियमित तो कुछ पाठक बीच-बीच में भाग लेते रहे हैं। 100वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त हो जाने के बाद हमने सभी प्रतिभागियों द्वारा पूरे एक वर्ष तक के अर्जित प्राप्तांकों का योग किया और प्रथम तीन सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागियो का चयन किया।

सर्वाधिक 82 अंक अर्जित कर जबलपुर, मध्य प्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी वर्ष 2012 की महाविजेता बनीं है। इस क्रम में 57 अंक पाकर जौनपुर, उत्तर प्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने प्रथम उप-महाविजेता का और 39 अंक पाकर लखनऊ, उत्तर प्रदेश के श्री प्रकाश गोविन्द द्वितीय उप-महाविजेता बने हैं। इन सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। यहाँ हम पहेली के कुछ अन्य प्रतिभागियों का भी उल्लेख करना चाहते हैं। पटना, बिहार की सुश्री अर्चना टण्डन और बैंगलुरु, कर्नाटक के श्री पंकज मुकेश ने आरम्भिक तीन सेगमेंट तक अपनी बढ़त बना ली थी। परन्तु अचानक ये दोनों प्रतिभागी प्रतियोगिता में अनियमित हो गए। यही कारण था कि तीसरे सेगमेंट के बीच से भाग लेने वाले श्री प्रकाश गोविन्द इनसे आगे निकल आए। इनके अलावा अहमदाबाद, गुजरात के डॉ. कश्यप दवे, लखनऊ के श्री अवध लाल, राजस्थान के राजेन्द्र सोनकर, राकेश रमण, दयानिधि वत्स, अभिषेक मिश्रा, अखिलेश दीक्षित और दीपक ‘मशाल’ ने भी बीच-बीच में संगीत पहेली में अपनी सहभागिता की है। इन सभी प्रतिभागियों को हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित हैं।

100वें अंक की समाप्ति के बाद बने हमारे तीनों शीर्ष स्थान के विजेताओं से अनुरोध है कि वे अपने डाक का पूरा पता हमें शीघ्रातिशीघ्र swargoshthi@gmail.com पर भेज दें, ताकि हम आपका पुरस्कार आपके पते पर भेज सकें।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक वर्ष 1013 का पहला अंक होगा। इस अंक से हम एक नई लघु श्रृंखला- ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से आरम्भ कर रहे हैं। काल गणना के अनुसार दिन और रात्रि को तीन-तीन घण्टों की अवधि के आठ प्रहर में बाँटा जाता है। परम्परागत रूप से गायन-वादन के लिए सभी राग किसी प्रहर विशेष अथवा ऋतु विशेष में ही उपयोगी माने जाते हैं। अगले अंक में हम दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर आपसे चर्चा करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, December 23, 2012

संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर एक विशेष श्रृंखला


स्वरगोष्ठी-101 में आज 

फिल्म संगीत के गुलदस्ते को रागों की खुशबू दी अप्रतिम साधक नौशाद अली ने 
 



‘स्वरगोष्ठी’ का यह 101वाँ अंक है और इस विशेष अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, दो दिन बाद ही अर्थात 25 दिसम्बर को भारतीय सिनेमा के एक महान संगीतकार नौशाद अली का 94वाँ जन्मदिवस हम मनाने जा रहे हैं। इस उपलक्ष्य में हम ‘स्वरगोष्ठी’ की दो कड़ियों के माध्यम से सिनेमा संगीत का एक मानक स्थापित करने वाले संगीतकार नौशाद के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण कर रहे हैं। आज के अंक के लिए हमने 1946 से लेकर 1955 तक, अर्थात एक दशक की अवधि के कुछ राग आधारित गीतों को चुना है जिनमें नौशाद की सांगीतिक प्रतिभा के स्पष्ट दर्शन होते हैं।


25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान मालिक का हुक्का तैयार करते। संगीत के प्रति ऐसी ही दीवानगी में नौशाद का बचपन बीता। साज़ों की झाड़-पोंछ के दौरान ही कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था।
उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



इसके आगे का वृतान्त हम जारी रखेंगे, इस बीच थोड़ा विराम लेकर हम आपको नौशाद का संगीतबद्ध किया एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पिला कर रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वह गीत सुनवाते हैं जो राग बिहाग पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर और भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।

राग- बिहाग : फिल्म ‘शाहजहाँ’ : ‘ऐ दिल-ए-बेकरार झूम...’ : कुन्दनलाल सहगल



घर से भाग कर बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे नौशाद अली कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्रांट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इंटरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इंटरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

आज के अंक के लिए नौशाद के संगीतबद्ध किये कुछ ऐसे राग आधारित गीत लेकर हम उपस्थित हुए हैं, जिनमे स्पष्ट रागानुभूति होती है। ऐसा ही एक गीत 1948 में प्रदर्शित महबूब खाँ की फिल्म ‘अनोखी अदा’ से लिया गया है। इस फिल्म का एक गीत- ‘कभी दिल, दिल से टकराता तो होगा...’ को नौशाद ने मुकेश और शमशाद बेगम दोनों के स्वर में प्रस्तुत किया था। यह गीत राग दरबारी कान्हड़ा की सार्थक अनुभूति कराता है। हम आपको शमशाद बेगम का गाया संस्करण सुनवाते हैं-

राग- दरबारी : फिल्म ‘अनोखी अदा’ : ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’ : शमशाद बेगम



पियानो वादक के रूप में नौशाद को न्यू पिक्चर कम्पनी में एक ठिकाना तो मिल गया, परन्तु मंज़िल तो अभी कोसों दूर थी। अभी तक नौशाद मुम्बई (तब बम्बई) में रह रहे अलीम साहब के नाम लखनऊ से अपने एक मित्र का खत लेकर आए थे और उन्हीं के साथ गुजर कर रहे थे। नौकरी मिलते ही उन्होने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। नौशाद के यह दूसरे आश्रयदाता एक दूकान में सेल्समैन थे और रात में दूकान बन्द होने के बाद दरवाजा बन्द कर अन्दर ही सोते थे। नौशाद को भी ऐसे ही रहना पड़ता था। कभी जब दूकान में गर्मी अधिक होती तो दोनों बाहर फुटपाथ पर रात गुजारते थे।

आइए अब हम वर्ष 1952 की उस फिल्म और उसके एक गीत की चर्चा करते हैं जिसने नौशाद की राग आधारित गीतों की रचना करने की क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था। परन्तु आज हम आपको नौशाद के सर्वप्रिय पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के स्वर में राग मालकौंस पर आधारित वह गीत सुनवाते हैं, जिसकी लोकप्रियता आज भी कायम है।

राग- मालकौंस : फिल्म ‘बैजू बावरा’ : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मोहम्मद रफी 





उस्ताद अमीर खाँ जैसे दिग्गज गवैये नौशाद की प्रतिभा के ऐसे कायल हुए कि आगे चल कर जब भी उन्हें नौशाद ने बुलाया, अपनी सहमति और सहयोग प्रदान किया। रागदारी संगीत के प्रति नौशाद की ऐसी अगाध श्रद्धा थी कि इस विषय पर प्रायः फिल्म के निर्माता-निर्देशक के साथ उनकी मीठी नोकझोक भी हो जाती थी। एक साक्षात्कार में नौशाद ने फ़िल्मकार ए.आर. कारदार के हवाले से जिक्र किया भी था कि फिल्म में राग आधारित गीत रखने के सवाल पर कैसे उन्हें चुनौती मिली थी। उस्ताद अमीर खाँ को नौशाद साहब ने दोबारा याद किया, 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के लिए। इस फिल्म के अन्य गीतों के लिए मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार थे, किन्तु उस्ताद अमीर खाँ से उन्होने राग मुल्तानी के स्वरों में मीरा का एक पद- ‘दया करो हे गिरिधर...’ गवाया। यह राग दिन के चौथे प्रहर के परिवेश को यथार्थ रूप से अनुभूति कराता है। आइए सुनते हैं यह गीत-


राग- मुल्तानी : फिल्म ‘शबाब’ : ‘दया करो हे गिरिधर...’ : उस्ताद अमीर खाँ


स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए। लोक संगीत के साथ ही उन्होने शास्त्रीय राग आधारित गीतों का प्रचलन भी पाँचवें दशक से आरम्भ कर दिया था। नौशाद के संगीत से सजे अगले जिस गीत की हम चर्चा करने जा रहे हैं, वह 1955 में प्रदर्शित बेहद सफल फिल्म ‘उड़न खटोला’ का गीत है- ‘मोरे सइयाँ जी उतरेंगे पार हो, नदिया धीरे बहो...’। दरअसल यह एक पारम्परिक ठुमरी है, जिसे नौशाद ने फिल्म के लिए लता मंगेशकर से बड़े ही आकर्षक ढंग से गवाया था। फिल्म के अन्य गीतों के साथ यह गीत भी बेहद लोकप्रिय हुआ था। आइए सुनते हैं, राग पीलू की एक पारम्परिक ठुमरी का फिल्मी रूपान्तरण।

राग- पीलू : फिल्म ‘उड़न खटोला’ : ‘मोरे सइयाँ जी उतरेंगे पार...’ : लता मंगेशकर



और अन्त में, जिस प्रकार संगीत के मंच की परम्परा होती है, संगीतकार नौशाद की स्मृतियों को समर्पित ‘स्वरगोष्ठी’ की इस कड़ी को हम राग भैरवी से विराम देंगे। राग भैरवी पर आधारित यह गीत 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘अमर’ से लिया गया है। नौशाद ने इस फिल्म के लिए अत्यन्त सुरीले गीत रचे थे, जिनमें एक गीत है- ‘इंसाफ का मन्दिर है ये भगवान का घर है...’। इस गीत में भैरवी का स्पष्ट स्वरूप उभरता है। फिल्म में इस गीत के अन्तरों का प्रयोग कई बार किया गया है। मोहम्मद रफी के स्वर में आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम नौशाद के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों की एक और श्रृंखला प्रस्तुत करेंगे।

राग- भैरवी : फिल्म ‘अमर’ : ‘इंसाफ का मन्दिर है ये...’ : मोहम्मद रफी



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 101वें अंक से आज की संगीत पहेली एक नई श्रृंखला में पदार्पण कर रही है। इस अंक की पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस इस गीत की गायिका कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 103वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 99वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी सिद्धेश्वरी देवी के स्वरों में भैरवी की एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार जयदेव। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम संगीतकार नौशाद अली पर जारी श्रृंखला का दूसरा भाग प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पिछले सौवें अंक तक चली संगीत प्रतियोगिता के महाविजेता और उप-विजेताओ के प्राप्तांकों और उनके नामों की घोषणा भी करेंगे। जनवरी, 2013 से हम आपके सुझावों और फरमाइशों के आधार पर आपके प्रिय कार्यक्रमों में कुछ परिवर्तन भी कर रहे हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, December 9, 2012

'स्वरगोष्ठी' में ठुमरी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



स्वरगोष्ठी-९९ में आज
फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – १०

विरहिणी नायिका की व्यथा : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा। 


‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा।

हमारी आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों के योगदान से। उन्होने इस ठुमरी को अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का जन्म १९०२ में पराधीन भारत के पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श ख़ान तत्कालीन पश्चिम पंजाब प्रान्त के एक संगीत परिवार से सम्बन्धित थे और ख़ुद भी एक जाने-माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली जब ७ वर्ष के थे, तभी उन्होंने अपने चाचा काले खाँ से सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली ने अपनी स्वर-यात्रा का आरम्भ सारंगी वादक के रूप में किया और कलकत्ता में आयोजित उनकी पहली संगीत-सभा में उन्हें लोकप्रियता मिली। ली। बाद में उन्होने अपनी गायन प्रतिभा से भी संगीत-प्रेमियों को प्रभावित किया। उनके गले की मिठास, गायकी का अंदाज़, हरकतें, सबकुछ मिलाकर उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। आइए, आज सबसे पहले उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनते हैं आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

 

श्रृंगार रस के विरह भाव को उकेरने में पूर्ण समर्थ इस ठुमरी को सुविख्यात गायिका पद्मा तलवलकर ने भी गाया है। २८ फरवरी, १९४८ को मुम्बई में जन्मीं पद्मा जी की संगीत-शिक्षा जयपुर, अतरौली घराने की प्राप्त हुई है, किन्तु उनके गायन में ग्वालियर और किराना गायकी की विशेषताएँ भी परिलक्षित होती हैं। उनका विवाह जाने-माने तबला-वादक पण्डित सुरेश तलवलकर से हुआ। इस संगीतज्ञ दम्पति की सन्तानें- पुत्र सत्यजीत और पुत्री सावनी, दोनों ही तबला-वादन में कुशल हैं। संगीत-शिक्षा के दौरान पद्मा जी को ‘भूलाभाई मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से पाँच वर्ष तक छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी। बाद में उन्हें ‘नेशनल सेण्टर फॉर पर्फ़ोर्मिंग आर्ट्स’ द्वारा दो वर्ष के लिए फ़ेलोशिप भी मिली थी। उन्हें वर्ष २००४ में पण्डित जसराज गौरव पुरस्कार, २००९ में श्रीमती वत्सलाबाई भीमसेन जोशी पुरस्कार तथा २०१० में राजहंस प्रतिष्ठान पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इन्हीं प्रतिभावान गायिका के स्वरों में अब आप भैरवी की इस ठुमरी का आनन्द लीजिए-


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : विदुषी पद्मा तलवलकर




आज हमारी चर्चा में जो ठुमरी है, उसे अनेक गायक-गायिकाओं ने अलग-अलग ढंग से गाया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने भी अनेक अवसरों पर इस ठुमरी को प्रस्तुत किया है। उनके स्वरों में ढल कर इस ठुमरी का एक अलग रंग निखरता है। आज के अंक में हम उनकी आवाज़ में भी यह ठुमरी सुनवा रहे हैं। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। इससे पूर्व अजय जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके पिता पं. अजीत चक्रवर्ती से, बाद में कालीदास वैरागी और पं. ज्ञानप्रकाश घोष से प्राप्त हुई। पण्डित अजय चक्रवर्ती पहले ऐसे संगीत-साधक हैं, जिन्हें पाकिस्तान आमंत्रित किया गया और उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया था। एक संगीत-सभा में इस ठुमरी की प्रस्तुति के दौरान पण्डित अजय चक्रवर्ती ने वर्तमान गजल गायकी, राग भैरवी के विभिन्न रूप तथा पटियाला घराने की गायकी के बारे में कुछ चर्चा की है। संगीत के विद्यार्थियों के लिए यह प्रस्तुति लाभकारी होगी। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में भैरवी की यही ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



वर्ष १९७७ वासु चटर्जी की फिल्म ‘स्वामी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राजेश रोशन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग में भैरवी की इस पारम्परिक ठुमरी का उपयोग किया था। परन्तु ठुमरी के इस फिल्मी स्वरूप में भैरवी के अलावा बीच-बीच में कुछ अन्य रागों- जोगिया, पीलू आदि की अनुभूति भी होती है। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येसुदास ने इस ठुमरी को बड़े नर्म और भावपूर्ण अंदाज में गाया है। राजेश रोशन के पिता, संगीतकार रोशन ने अपने समय की फिल्मों में पारम्परिक खयाल, ठुमरी आदि का भरपूर उपयोग किया था। फिल्म ‘स्वामी’ में इस ठुमरी को शामिल करने की प्रेरणा राजेश को सम्भवतः अपने पिता से मिली हो। ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के इस फिल्मी रूप का आनन्द आप भी लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

फिल्म – स्वामी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : येसुदास



आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही वर्ष २०१२ की पाँचों श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रथम तीन विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से पुरस्कृत भी किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?
२ – इस पारम्परिक ठुमरी को आठवें दशक की एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। उस फिल्म के संगीतकार कौन थे?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता 


 
‘स्वरगोष्ठी’ के ९७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका इकबाल बानो के स्वर में ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग देस। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का



 मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक सौवाँ अंक होगा और यह हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ का समापन अंक भी होगा। इस अंक में हम आपके लिए श्रृंगार रस की अत्यन्त मोहक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे। जनवरी, २०१३ से हम आपके सुझावों और फरमाइशों के आधार पर आपके प्रिय कार्यक्रमों में बदलाव कर रहे हैं। आप अपने सुझाव १५ दिसम्बर तक अवश्य भेज दें। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, December 2, 2012

स्वरगोष्ठी में आज : ठुमरी- ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की पहली वर्षगाँठ पर सभी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक अभिनन्दन   


स्वरगोष्ठी-९८  में आज 

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी –९ 

श्रृंगार रस से परिपूर्ण ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’



फिल्मों में शामिल की गई पारम्परिक ठुमरियों पर केन्द्रित ‘स्वरगोष्ठी’ की लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज का यह अंक जारी श्रृंखला की ९वीं कड़ी है और आज की इस कड़ी में हम आपको पहले राग पीलू की ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन, काजर बिन कारे... ’ का पारम्परिक स्वरूप, और फिर इसी ठुमरी का फिल्मी स्वरूप प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा इस अंक में एकल तथा युगल ठुमरी गायन की परम्परा के बारे में आपके साथ चर्चा करेंगे। 


ज पीलू की यह ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ हम आपको सबसे पहले गायिका इकबाल बानो की आवाज़ में सुनवाते हैं। इकबाल बनो का जन्म १९३५ में दिल्ली के एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर दिल्ली के उस्ताद चाँद खाँ ने उन्हें रागदारी संगीत का प्रशिक्षण देना आरम्भ किया। कुछ वर्षों की संगीत-शिक्षा के दौरान उस्ताद ने अनुभव किया कि इकबाल बानो के स्वरों में भाव और रस के अभिव्यक्ति की अनूठी क्षमता है। उस्ताद ने उन्हें ठुमरी, दादरा और गजल गायन की ओर प्रेरित और प्रशिक्षित किया। मात्र १४ वर्ष की आयु में इकबाल बानो ने दिल्ली रेडियो से शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय गायन आरम्भ कर दिया था। वर्ष १९५० में उन्हें देश की प्रख्यात गायिकाओं में शुमार कर लिया गया था। १९५२ में १७ वर्ष की आयु में उनका विवाह पाकिस्तान के एक समृद्ध परिवार में हुआ और उन्होने मुल्तान शहर को अपना नया ठिकाना बनाया। पाकिस्तान के संगीत-प्रेमियों ने इकबाल बानो को सर-आँखों पर बैठाया। शीघ्र ही वह रेडियो पाकिस्तान की नियमित गायिका बन गईं। यही नहीं उन्होने अनेक फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया। १९८५ में उन्हें फैज अहमद ‘फैज’ की नज़मों पर विशेष शोध और गायन के लिए विश्वस्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ था। २१ अप्रैल, २००९ को लाहौर में उनका निधन हो गया। इस अप्रतिम गायिका के स्वरों में ही है, आज की ठुमरी, लीजिए प्रस्तुत है।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ विदुषी इकबाल बानो



आम तौर पर मंच पर एकल ठुमरी गायन की ही परम्परा है। युगल ठुमरी गायन का उदाहरण कभी-कभी उस समय परिलक्षित होता है, जब युगल खयाल गायक खयाल के बाद अन्त में ठुमरी गाते है। इसके अलावा नृत्य के कार्यक्रम में भाव अंग के अन्तर्गत दो नर्तक या नृत्यांगना मंच पर जब भाव-प्रदर्शन करते हैं। बीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में संगीत के मंच पर जिन युगल गायकों का वर्चस्व था उनमें शामचौरासी घराने के उस्ताद नज़ाकत अली (१९२०-१९८४) और सलामत अली (१९३४-२००१) बन्धुओं का नाम शीर्ष पर था। देश के विभाजन के बाद ये दोनों भाई पाकिस्तान के प्रमुख युगल गायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इन्हीं के दो छोटे भाई अख्तर अली और ज़ाकिर अली हैं, जिनका ठुमरी-दादरा गायन संगीत के मंचों पर बेहद लोकप्रिय हुआ। आइए, अब हम आपको उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ की आवाज़ में राग पीलू की यही ठुमरी- 'गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...' सुनवाते हैं।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ



१९६४ में अजीत और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का संगीत फिल्मों के एक कम चर्चित संगीतकार लच्छीराम तँवर ने तैयार किया था। लच्छीराम की स्वतंत्र रूप से प्रथम संगीत निर्देशित १९४७ की फिल्म थी ‘आरसी’। इस पहली फिल्म का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय भी हुआ, किन्तु १९४७ से १९६४ के बीच उन्हें साधारण स्तर की फिल्मों के प्रस्ताव ही मिले। इसके बावजूद उनकी प्रत्येक फिल्मों के एक-दो गीतों ने लोकप्रियता के मानक गढ़े। १९६४ की फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ उनकी अन्तिम फिल्म थी। इस फिल्म में लच्छीराम ने इस परम्परागत ठुमरी को आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी के स्वरों में प्रस्तुत किया। फिल्मों में प्रयोग की गई ठुमरियों में सम्भवतः पहली बार युगल स्वरों में किसी ठुमरी को शामिल किया गया था। फिल्म में नायक-नायिका अजीत और माला सिन्हा हैं, परन्तु इस ठुमरी को फिल्म के सह-कलाकारों, सम्भवतः केवल कुमार और निशी पर फिल्माया गया है। ठुमरी के अन्त में अभिनेत्री द्वारा तीनताल में कथक के तत्कार और टुकड़े भी प्रस्तुत किये गए हैं। मूलतः यह ठुमरी राग पीलू की है। परन्तु लच्छीराम ने इसे राग देस के स्वरों में बाँधा है। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी ने गायन में राग देस के स्वरों को बड़े आकर्षक ढंग से निखारा है। रफ़ी ने इस गीत को सपाट स्वरों में गाया है किन्तु आशा भोसले ने स्वरों में मुरकियाँ देकर और बोलों में भाव उत्पन्न कर ठुमरी को आकर्षक रूप दे दिया है। आइए सुनते हैं, श्रृंगार रस से ओतप्रोत राग देस में यह फिल्मी ठुमरी। आप इस ठुमरी का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ : देस ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : आशा भोसले और मोहम्मद रफी



आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक पंजाब अंग के सुविख्यात गायक के स्वर में एक पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


१- यह ठुमरी किस विख्यात गायक की आवाज़ में है?

२- आपने अभी जिस पारम्परिक ठुमरी का अंश सुना है, इसी ठुमरी का प्रयोग आठवें दशक की एक फिल्म में किया गया था। क्या आप उस फिल्म में शामिल ठुमरी के राग का नाम हमें बता सकते हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०० वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के ९६वें अंक की पहेली में हमने आपको रसूलन बाई के स्वरों में भैरवी की पारम्परिक ठुमरी ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘भैरवी’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म ‘सौतेला भाई’। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, लखनऊ से प्रकाश गोविन्द और जौनपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की शुरुआत हमने १९३६ की फिल्म ‘देवदास’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ से किया था। अब हम आ पहुँचे हैं, इस श्रृंखला के समापन की दिशा में। अन्तिम दो अंकों में हम आठवें दशक की फिल्मों में शामिल ठुमरियों पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में हम आपके लिए एक और मनमोहक पारम्परिक ठुमरी लेकर उपस्थित होंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर हमारी इस सुरीली गोष्ठी में आप अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज़ कराइएगा। अब हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र


Sunday, November 25, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी–८


स्वरगोष्ठी – ९७ में आज

मान-मनुहार की ठुमरी : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’


‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें पूरा मान-सम्मान देते हुए फिल्मों में शामिल किया गया और इन ठुमरियों को भरपूर लोकप्रियता भी मिली। ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक आपने जो भी पारम्परिक ठुमरियाँ और उनके फिल्मों सहित अन्य अनुप्रयोगों का रसास्वादन किया है, उनमें रागों की समानता थी, अर्थात, मूल ठुमरी जिस राग में थी, अन्य अनुप्रयोग भी उसी राग में बँधे हुए थे। परन्तु आज के अंक में हमने जिस ठुमरी का चयन किया है, वह मूल पारम्परिक ठुमरी तो राग भैरवी में निबद्ध है, किन्तु उसी ठुमरी के परवर्ती प्रयोग के राग भिन्न-भिन्न हैं। यहाँ तक कि उसी ठुमरी के फिल्मी प्रयोग में भी राग बदला हुआ है। हमारी आज की ठुमरी है- ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ साँवरिया...’। इस ठुमरी को सुप्रसिद्ध गायिका रसूलन बाई ने भैरवी में गाया है। मान-मनुहार की इस श्रृंगारप्रधान ठुमरी को सुनने से पहले पूरब अंग की ठुमरियों की कुछ विशेषताओं के बारे में हम आपसे चर्चा करना चाहते हैं। 

ठुमरी गायन के दो प्रकार हैं, पहला है बन्दिश अथवा बोल-बाँट की ठुमरी और दूसरा प्रकार है, बोल-बनाव की ठुमरी। १८५६ में अंग्रेजों द्वारा नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ते के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिये जाने के बाद ठुमरी का केन्द्र लखनऊ से स्थानान्तरित होकर बनारस हो गया था। बोल-बनाव की ठुमरियों का विकास बनारस के संगीत परिवेश में हुआ। इस प्रकार की ठुमरियों में शब्द बहुत कम होते हैं और यह विलम्बित लय से शुरू होती हैं। इनमें स्वरों के प्रसार की बहुत गुंजाइश होती है। छोटी-छोटी मुरकियाँ, खटके, मींड आदि का प्रयोग ठुमरी की गुणबत्ता को बढाता है। कुशल गायक ठुमरी के शब्दों से अभिनय कराते हैं। गायक कलाकार ठुमरी के कुछ शब्दों को लेकर अलग-अलग भावपूर्ण अन्दाज़ में प्रस्तुत करते हैं। अन्त में कहरवा ताल की लग्गी के साथ ठुमरी समाप्त होती है। ठुमरी के इस भाग में तबला संगतिकार को अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर मौका मिलता है। बात जब बोल-बनाव ठुमरी की हो तो रसूलन बाई का ज़िक्र आवश्यक है। आज की पहली ठुमरी हम उन्हीं की आवाज़ में ही प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होने ठुमरी ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’, राग भैरवी में प्रस्तुत किया है।

ठुमरी भैरवी : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : विदुषी रसूलन बाई



इसी ठुमरी को जानी-मानी गायिका रोशन आरा बेगम ने भी अपना स्वर दिया है, किन्तु उन्होने इसे राग खमाज के स्वरों में गाया है। रोशन आरा बेगम, किराना घराने के शीर्षस्थ गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की भतीजी थीं। खाँ साहब के तीन भाई थे; अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ। गायिका रोशन आरा अब्दुल हक़ खाँ की बेटी थीं। उनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद अब्दुल करीम खाँ द्वारा ही हुई थी। १९१७ (अनुमानित) में कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। देश के विभाजन के बाद १९४८ में वह अपने पति के साथ पाकिस्तान चली गई थीं। खयाल, ठुमरी, दादरा और गजल गायन के क्षेत्र में उन्हें खूब यश मिला। आज की ठुमरी ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ साँवरिया...’, रोशन आरा बेगम के स्वरों में भी अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी, परन्तु उन्होने इसे राग खमाज के स्वरों में गाया था। लीजिए उनकी गायी यह ठुमरी आप भी सुनिए।

ठुमरी खमाज : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : रोशन आरा बेगम




इसी ठुमरी का प्रयोग संगीतकार अनिल विश्वास ने १९६२ में प्रदर्शित फिल्म ‘सौतेला भाई’ में भी किया था। महेश कौल द्वारा निर्देशित इस फिल्म के नायक गुरुदत्त थे। अनिल विश्वास ने इस ठुमरी को फिल्म के एक ऐसे प्रसंग के लिए तैयार किया था, जब नायक का सौतेला छोटा भाई अपने कुछ बिगड़ैल दोस्तों के साथ तवायफ के कोठे पर पहुँचता है। इस प्रसंग में नर्तकी इसी ठुमरी पर नृत्य करती है। अनिल विश्वास ने ठुमरी का स्थायी तो परम्परागत रूप में ही रखा, किन्तु अन्तरा की कुछ पंक्तियों को गीतकार शैलेन्द्र से लिखवाया था। उन्होने मूल भैरवी की ठुमरी के स्वरों में भी परिवर्तन किया और बेहद चंचल प्रवृत्ति के राग अड़ाना के स्वरों में और एकताल में बाँधा। फिल्म ‘सौतेला भाई’ में प्रयुक्त इस ठुमरी को स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने अपने आकर्षक स्वरों से सजाया है। लीजिए, आप भी सुनिए, इस ठुमरी का मोहक फिल्मी रूप और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म सौतेला भाई : ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ : लता मंगेशकर





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

२ – इस पारम्परिक ठुमरी को सातवें दशक की एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। फिल्म में शामिल यह ठुमरी किस राग पर आधारित है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ९५वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में चर्चित ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- नवाब वाजिद अली शाह। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के अन्तर्गत पुनः एक ऐसी ठुमरी का परिचय देंगे, जिसके विभिन्न प्रयोगों में अलग-अलग रागों का इस्तेमाल हुआ है। हमारे एक पाठक (अपना नाम उन्होने नहीं लिखा) ने इस श्रृंखला के लिए छः पारम्परिक ठुमरियों के एक सूची भेजी है, जिनका प्रयोग फिल्मों में किया गया है। आज के अंक में हमने जो ठुमरी प्रस्तुत की है, वह उसी सूची से ली गई है। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, November 11, 2012

नवोदित संगीत प्रतिभाओ के ताज़गी भरे स्वर


स्वरगोष्ठी - विशेष अंक में आज 

उत्तर प्रदेश की बाल, किशोर और युवा संगीत प्रतिभाएँ- देवांशु, पूजा, अपूर्वा और भैरवी


‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ 
देवांशु घोष को पुरस्कृत करते हुए 
महामहिम राज्यपाल
अन्य कला-विधाओं की भाँति पारम्परिक संगीत का विस्तार भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होता रहा है। संगीत की नवोदित प्रतिभाओं को खोजने, प्रोत्साहित करने और उनकी प्रतिभा को सही दिशा देने में कुछ संस्थाएँ संलग्न हैं। इनमें एक नाम जुड़ता है, लखनऊ की संस्था ‘संगीत मिलन’ का। संगीत की शिक्षा, शोध और प्रचार-प्रसार में यह संस्था विगत ढाई दशक से संलग्न है। पिछले दिनों संस्था ने पूरे उत्तर प्रदेश में बाल, किशोर और युवा वर्ग की संगीत प्रतिभाओं को खोजने का अभियान चलाया, जिसका समापन गत रविवार को प्रदेश के महामहिम राज्यपाल बी.एल. जोशी के हाथों विजेता बच्चों को पुरस्कृत करा कर हुआ। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के विशेष अंक में हम इस प्रतिभा-खोज प्रतियोगिता में चुनी गईं संगीत प्रतिभाओं की गायकी से आपका परिचय कराएँगे।


न्नीसवीं शताब्दी के उत्तर प्रदेश में संगीत-शिक्षा के अनेक केन्द्र थे। वर्तमान समय में भी यह प्रदेश संगीत-शिक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस विस्तृत प्रदेश में समय-समय पर नवोदित संगीत प्रतिभाओं को खोजने का अभियान सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर चलता ही रहता है। गैर-सरकारी स्तर पर पिछले दिनों संगीत-संस्था 'संगीत मिलन' ने प्रतिभ खोज का यह अभियान सफलतापूर्वक सम्पादित किया। पूरे उत्तर प्रदेश से तीन आयु-वर्ग में संगीत प्रतिभाओं को खोजना, सरल नहीं था, किन्तु संस्था के कर्मठ कार्यकर्ताओं- मिलन देवनाथ, अरुंधति चौधरी, प्रदीप नारायण, मंजुला रॉय, मनीषा सक्सेना, अंजना मिश्रा, तरुण तपन भट्टाचार्य आदि ने लगभग चार मास के अथक श्रम से इस अभियान को सफल बनाया।

देवांशु घोष 
यह प्रतियोगिता तीन चरणों में सम्पन्न हुई। प्रथम चरण में प्रदेश के नौ केन्द्रों- गाजियाबाद, मथुरा, आगरा, बरेली, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी और गोरखपुर में प्रतिभाओं का चयन किया गया। प्रथम चरण की प्रतियोगिता में पूरे प्रदेश से लगभग ४०० बाल, किशोर और युवा संगीत-विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। इनमें से ७८ का चयन दूसरे चरण की प्रतियोगिता के लिए किया गया। दूसरे चरण की प्रतियोगिता का आयोजन २८ अक्तूबर से २ नवम्बर के बीच लखनऊ में हुआ, जिसमें अन्तिम चरण के लिए २४ प्रतिभागियों को कुना गया। ३ नवम्बर को आयोजित अन्तिम चरण की प्रतियोगिता के दौरान प्रतिभागियो का उत्साह चरम पर था। उन्होने अपनी प्रतिभा का बढ़-चढ़ कर प्रदर्शन किया। वरिष्ठ शिक्षकों और संगीतज्ञों के एक दल ने मूल्यांकन कर विभिन्न पुरस्कारों के लिए इनका योग्यता के अनुसार निर्धारण किया। तीनों वर्गों में सर्वाधिक अंक अर्जित कर वाराणसी के देवांशु घोष ने ‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ (Classical Voice of Uttar Pradesh) का खिताब जीता। १० से १४ वर्ष आयु के बाल वर्ग के अन्तर्गत आने वाले देवांशु ने प्रतियोगिता के अन्तिम चरण में राग शंकरा का विलम्बित खयाल ‘हर हर महादेव...’ और द्रुत खयाल ‘तान तलवार ले...’ का गायन प्रस्तुत कर निर्णायकों समेत सभी दर्शकों को चकित कर दिया। देवांशु द्वारा राग शंकरा की प्रस्तुति का आप भी आनन्द लीजिए-

‘उत्तर प्रदेश की आवाज़’ : देवांशु घोष : वाराणसी : राग शंकरा



पूजा तिवारी 
बाल वर्ग में अन्तिम चरण की प्रतियोगिता के लिए कुल नौ बच्चों- आयुष श्रीवास्तव, शशांक दीक्षित, शाश्वत विश्वकर्मा और ऐश्वर्या गोपन (सभी कानपुर), भरत अंकित और देवांशु घोष (दोनों वाराणसी), चाहत मल्होत्रा और पूजा तिवारी (दोनों लखनऊ) तथा आरुल सेठ (गाजियाबाद) का चयन हुआ था। इनमें तीनों वर्गों में सर्वोच्च अंक पाकर देवांशु घोष तो ‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ बन ही चुके थे, इसके उपरान्त अधिकतम अंक अर्जित कर लखनऊ की पूजा तिवारी ने बालवर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसी क्रम में वाराणसी के भरत अंकित को दूसरा और लखनऊ की चाहत मल्होत्रा को बाल वर्ग में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। आइए, बाल वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त पूजा तिवारी से राग मधुवन्ती सुनते हैं, जिसे उन्होने अन्तिम चयन के दौरान प्रस्तुत किया था। पूजा ने राग मधुवन्ती में दो खयाल प्रस्तुत किये। विलम्बित रचना के बोल थे- ‘लाल के नैना अंजन सोहे...’ और द्रुत खयाल के बोल थे- ‘पवन पुरवाई...’। बाल वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली इस बालिका की प्रस्तुति में स्पष्ट शब्दोच्चार का गुण भी आपको परिलक्षित होगा।


बाल वर्ग में प्रथम : पूजा तिवारी : लखनऊ : राग मधुवन्ती



अपूर्वा तिवारी
१५ से १९ वर्ष आयु अर्थात किशोर वर्ग में अन्तिम प्रतियोगिता के लिए सात प्रतियोगियों का चयन हुआ, जिनमें वाराणसी से चार- अपूर्वा तिवारी, चारुलता मुखर्जी, पूर्णेश भागवत और विलीना पात्रा, लखनऊ से दो- महिमा तिवारी और सृष्टि पाण्डेय तथा कानपुर से एकमात्र अपूर्वा भट्टाचार्य ने अन्तिम चरण में अपनी-अपनी प्रतिभा का श्रेष्ठ प्रदर्शन किया। यह भी एक संयोग ही था कि किशोर वर्ग में प्रथम, द्वितीय और तृतीय, तीनों स्थानों पर वाराणसी के प्रतियोगियों का आधिपत्य रहा। यही नहीं पूरे उत्तर प्रदेश से अन्तिम प्रतियोगिता के लिए चुने गए २४ प्रतियोगियों में वाराणसी और कानपुर से सात-सात तथा लखनऊ से छः प्रतिभागी थे। इस तथ्य से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रदेश के इन तीन नगरों में संगीत-शिक्षण की व्यवस्था सन्तोषजनक है। किशोर वर्ग की अन्तिम प्रतियोगिता में प्रथम स्थान अपूर्वा तिवारी को, द्वितीय स्थान पूर्णेश भागवत को और तृतीय स्थान विलीना पात्रा को मिला। प्रथम स्थान प्राप्त अपूर्वा ने अन्तिम चरण में राग चन्द्रकौंस के दो खयाल क्रमशः ‘आवत ब्रज की नार...’ और ‘गोकुल गाँव के छोरा...’ का जैसा मोहक गायन प्रस्तुत किया था, उन्हें अब आप भी सुनिए। 

किशोर वर्ग में प्रथम : अपूर्वा तिवारी : वाराणसी : राग चन्द्रकौंस


बी. भैरवी

प्रदेश स्तर पर आयोजित इस संगीत-प्रतिभा-प्रतियोगिता के युवा वर्ग में २० से २४ वर्ष आयु के संगीत-प्रतिभाओं ने हिस्सा लिया। इस वर्ग में अन्तिम चरण के लिए लखनऊ से दो, देविका रॉय और शैलेन्द्र यादव, कानपुर से भी दो, अपर्णा द्विवेदी और सीता यादव, बरेली से जयश्री मुखर्जी, वाराणसी से बी. भैरवी, आगरा से शीतल चौहान, इलाहाबाद से विनीता श्रीवास्तव का चयन किया गया था। इन प्रतियोगियों के बीच काँटे की टक्कर रही। अन्ततः इस वर्ग में प्रथम स्थान की हकदार वाराणसी की बी. भैरवी बनीं। द्वितीय स्थान आगरा की शीतल चौहान को और तृतीय स्थान लखनऊ की देविका रॉय ने प्राप्त किया। प्रथम पुरस्कार पाने वाली बी. भैरवी ने अन्तिम चरण की प्रतियोगिता में राग पूरिया धनाश्री में दो चटकदार खयाल प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया था। इस प्रस्तुति में विलम्बित खयाल के बोल थे- ‘बलि बलि जाऊँ...’ और द्रुत तीनताल की अत्यन्त लोकप्रिय बन्दिश ‘पायलिया झनकार मोरी...’ थी। बी. भैरवी की गायी राग पूरिया धनाश्री की इन दोनों रचनाओं का रसास्वादन आप भी कीजिए। 


युवा वर्ग में प्रथम : बी. भैरवी : वाराणसी : राग पूरिया धनाश्री 


महामहिम राज्यपाल के साथ विजेता बच्चे
इन विजयी संगीत-प्रतिभाओं के अलावा प्रथम चरण की प्रतियोगिता प्रदेश के जिन अलग-अलग केन्द्रों पर आयोजित हुई थी, उन केन्द्रों पर सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को भी पुरस्कृत किया गया। नगर की श्रेष्ठ प्रतिभा के रूप में पुरस्कृत इन प्रतिभाओं ने पुरस्कार वितरण समारोह के अवसर पर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल बी.एल. जोशी के सम्मुख अलग-अलग रागों की बन्दिशों से पिरोयी एक आकर्षक रागमाला प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया। इस प्रस्तुति के प्रतिभागी थे, शीतल चौहान (आगरा), पूजा तिवारी (लखनऊ), अपूर्वा तिवारी (वाराणसी), आरुल सेठ (गाजियाबाद), सीता यादव (कानपुर), विनीत श्रीवास्तव (इलाहाबाद), जयश्री मुखर्जी (बरेली) तथा कृतिका (गोरखपुर)। महामहिम राज्यपाल ने विजेताओं को पुरस्कृत करते हुए इस तथ्य पर आश्चर्य व्यक्त किया कि अधिकांश प्रतिभाएँ पारम्परिक संगीत परिवार के नहीं हैं। उन्होने संस्था के कार्यकर्त्ताओं की भरपूर सराहना भी की।

संगीत प्रतिभाओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का उपहार 

‘संगीत मिलन’ द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता के बाल, किशोर और युवा वर्ग के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। आप सबको हम अपने साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ की सहर्ष सदस्यता प्रदान करते हैं। आप सब निरन्तर हमारे सम्पर्क में रहें और समय-समय पर अपनी प्रगति से हमें अवगत कराते रहें। आप अपने कार्यक्रमों के चित्र, आडियो, वीडियो आदि हमे भेजिए, विशेष अवसरों पर हम उनका उपयोग करेंगे। आपकी सांगीतिक गतिविधियाँ ‘स्वरगोष्ठी’ अथवा हमारे अन्य नियमित स्तम्भ में शामिल कर हमें खुशी होगी। नीचे दिये गए ई-मेल पर आप बेहिचक हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।  


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ का आज का यह अंक विशेष अंक है, जिसके माध्यम से हमने संगीत के कुछ नवोदित हस्ताक्षरों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया है। इसलिए इस अंक में हम पहेली नहीं दे रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक से पहेलियों का सिलसिला पूर्ववत जारी रहेगा। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com  या  radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस अंक में हमने आपसे कुछ नवोदित प्रतिभाओं परिचय कराया है। इसके लिए हमने जारी श्रृंखला को एक सप्ताह का विराम दिया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में अपनी जारी श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के अन्तर्गत हम प्रस्तुत करेंगे, एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी भैरवी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’। यह ठुमरी आप पण्डित भीमसेन जोशी, विदुषी गिरिजा देवी, पण्डित राजन-साजन मिश्र और फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में चर्चित गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में सुनेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में रविवार, प्रातः ९-३० बजे हम इसी मंच पर पुनः मिलेंगे। अब हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


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