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Monday, April 29, 2013

सिनेमा के शानदार 100 बरस को अमित, स्वानंद और अमिताभ का संगीतमय सलाम

प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - बॉम्बे टा'कीस


सिनेमा के १०० साल पूरे हुए, सभी सिने प्रेमियों के लिए ये हर्ष का समय है. फिल्म इंडस्ट्री भी इस बड़े मौके को अपने ही अंदाज़ में मना या भुना रही है. १०० सालों के इस अद्भुत सफर को एक अनूठी फिल्म के माध्यम से भी दर्शाया जा रहा है. बोम्बे  टा'कीस  नाम की इस फिल्म को एक नहीं दो नहीं, पूरे चार निर्देशक मिलकर संभाल रहे हैं, जाहिर है चारों निर्देशकों की चार मुक्तलिफ़ कहानियों का संकलन होगी ये फिल्म. ये चार निर्देशक हैं ज़ोया अख्तर, करण जोहर, अनुराग कश्यप और दिबाकर बैनर्जी. अमित त्रिवेदी का है संगीत तथा गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे और अमिताभ भट्टाचार्य. चलिए देखते हैं फिल्म की एल्बम में बॉलीवुड के कितने रंग समाये हैं. 

पहला  गीत बच्चन  हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को समर्पित है...जी हाँ सही पहचाना वही जो रिश्ते में सबके बाप  हैं. शब्दों में अमिताभ भट्टाचार्य ने सरल सीधे मगर असरदार शब्दों में हिंदी फिल्मों पर बच्चन साहब के जबरदस्त प्रभाव को बखूबी बयाँ किया है. अमित की तो बात ही निराली है, गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. एकतारा का जबरदस्त प्रयोग गीत को वाकई इस दशक में पहुंचा देता है जब हिंदी सिनेमा का पर्याय ही अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. बीच बीच में उनके मशहूर संवादों से गीत का मज़ा दुगुना हो जाता है. सुखविंदर की आवाज़ में बहुत दिनों बाद ऐसा दमदार गीत निकला है. खैर हम भी इस गीत के साथ अपनी इडस्ट्री और बच्चन साहब की ऊंची शख्सियत को सलाम करते हैं, और आगे बढते हैं अगले गीत की तरफ.

अक्कड बक्कड बोम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ बरस का हुआ, ये खिलाड़ी न बूढा हुआ.....वाह स्वानंद साहब ने खूब बयाँ किया है सिनेमा के सौ बरसों का किस्सा. हालाँकि अमित की धुन इंग्लिश विन्गलिश  के कैसे जाऊं मैं पराये देश  से कुछ मिलती जुलती लगती है शुरुआत में, पर धीरे धीरे गीत अपनी लय पकड़ लेता है, सबसे बढ़िया बात ये है कि गीत अपनी रवानी में कहीं भी कमजोर नहीं पड़ता, और श्रोताओं को झूमने की वजह देता रहता है. मोहित की आवाज़ भी खूब जमी है गीत में....

मुर्रब्बा  गीत के दो संस्करण हैं, आमतौर पर अमित के इन ट्रेडमार्क गीतों में शिल्प राव की आवाज़ जरूरी सी होती है, पर इस गीत में महिला स्वर है कविता सेठ की जिनका साथ दिया है खुद अमित ने. छोटा सा मगर बेहद प्रभावी गीत है ये भी. एक बार फिर संगीत संयोजन गीत की जान है. गीत ऐसा नहीं है जो जुबाँ पर चढ जाए पर अच्छा सुनने के शौक़ीन इसे अवश्य पसंद करेंगें .गीत का एक संस्करण जावेद बशीर की आवाज़ में भी है. 

शीर्षक गीत बोम्बे टा'कीस  एक बार फिल्मों के प्रति दर्शकों की दीवानगी को समर्पित है.कैलाश खेर और रिचा शर्मा की आवाजों में ये एक रेट्रो गीत है. स्वानंद के शब्द दिलचस्प हैं. पर मुझे इसका दूसरा संस्करण जिसमें ढेरों गायकों की आवाज़ समाहित है. शान और उदित की आवाजों के साथ कुछ अन्य गीतों की झलक में मिला जुला ये संस्करण अधिक फ़िल्मी लगता है. 

वाकई इन सौ बरसों में फिल्मों के कितने चेहरे बदले पर सौ बरसों के बाद आज भी लगता है जैसे बस अभी तो शुरुआत ही है. फिल्मों का ये कारवाँ यूहीं चलता चले और मनोरंजन के इस अद्भुत लोक में दर्शकों को भरपूर आनंद मिलता रहे यही हम सब की कामना है. एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४ की रेटिंग ५ में से. 

एक सवाल श्रोताओं के लिए -
प्रस्तुत एल्बम में एक गीत एक फ़िल्मी नायक को समर्पित है, क्या आपको कोई अन्य गीत याद आता है जो किसी फ़िल्मी व्यक्तित्व पर केंदित है ?


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:

Monday, October 8, 2012

अमित और स्वानंद ने रचा कुछ अलग "इंग्लिश विन्गलिश" के लिए


प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा : इंग्लिश विन्गलिश 

१५ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद खूबसूरती की जिन्दा मिसाल और अभिनय के आकाश का माहताब, श्रीदेवी एक बार फिर लौट रहीं है फ़िल्मी परदे पर एक ऐसे किरदार को लेकर जो अपनी अंग्रेजी को बेहतर करने के लिए संघर्षरत है. फिल्म है इंग्लिश विन्गलिश. आईये चर्चा करें फिल्म के संगीत की. अल्बम के संगीतकार हैं आज के दौर के पंचम अमित त्रिवेदी और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे.

पहला गीत जो फिल्म का शीर्षक गीत भी है पूरी तरह इंग्लिश विन्गलिश अंदाज़ में ही लिखा गया है. गीत के शुरूआती नोट्स को सुनते ही आप को अंदाजा लग जाता है अमित त्रिवेदी ट्रेडमार्क का. कोरस और वोइलन के माध्यम से किसी कोल्लेज का माहौल रचा गया है. स्वानंद ने गीत में बेहद सुंदरता से हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों के साथ खेला है. गीत की सबसे बड़ी खासियत है शिल्पा राव की आवाज़,जिसमें किरदार की सहमी सहमी खुशी और कुछ नया जानने का आश्चर्य बहुत खूब झलकता है. पुरुष गायक के लिए अमित स्वयं की जगह किसी और गायक की आवाज़ का इस्तेमाल करते तो शायद और बेहतर हो पाता.    

अगले गीत में अमित की आवाज़ लाजवाब आई है. धक् धुक एक ऐसे अवस्था का बयां है जिसमें किरदार किसी अपने से दूर जाने के भय से ग्रस्त है. बंगाल के मिटटी की खुश्बू से सने इस गीत की धुन बहुत ही मधुर है. स्वानंद ने शब्दों से पूरे चित्र को बखूबी तराशा है....क्यों न हमें टोके...क्यों न हमें रोके... जैसी पक्तियों को अमित ने बेहद दिल से गाया भी है.

श्रीदेवी की आवाज़ में कुछ संवादों से अगला गीत खुलता है जो मैनहैंटन शहर को समर्पित है. क्लिटंन और बियांका गोमस की आवाजों में ये गीत दिलचस्प है पर कोई लंबी छाप नहीं छोड़ता, हालाँकि बांसुरी का प्रयोग खूबसूरत है.

अगला गीत है गुस्ताख दिल, कम से कम वाध्यों से सुन्दर संयोजन है अमित का और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी भी है. शिल्पा की गहरी और दिल में उतरती आवाज़ गीत को एक अलग मुकाम दे देती है. दिल की गुस्ताखियों को शब्दों में उभरा है स्वानंद ने, हालाँकि इस विषय पर हजारों गीत बन चुके हैं पर स्वनादं ने कुछ अलग तरीके से बात को रखने की कोशिश जरूर की है.    

महाराष्ट्र के विवाहों में गाये जाने वाले लोक गीतों की झलक है अंतिम गीत नवराई माझी में. मस्ती भरे इस गीत में सुनिधि की आवाज़ है और उनका साथ दिया है खुद गीतकार स्वानंद ने और माताजी नीलाम्बरी किरकिरे ने. स्वानंद और उनकी माताजी की आवाज़ गीत में एक सुखद रस घोल देती है....

इंग्लिश विन्गलिश का संगीत ठहराव भरा और मेलोडियस है, रेडियो प्लेबैक इसे दे रहा है ४.१ की रेटिंग....अपनी राय आप बताएँ...


संगीत समीक्षा - इंग्लिश विन्गलिश by f100000740246953
एक सवाल  क्या आपको कोई ऐसा पुराना गीत याद आता है जिसमें गायक एक ऐसे किरदार के लिए गा रहा हो जो किसी नयी भाषा को सीखना की कोशिश कर रहा हो....सोचिये और बताईये हमें टिप्पणियों के माध्यम से.

Tuesday, August 31, 2010

किलिमांजारो में बूम बूम रोबो डा.. रोबोट की हरकतों के साथ हाज़िर है रहमान, शंकर और रजनीकांत की तिकड़ी

ताज़ा सुर ताल ३३/२०१०

सुजॊय - आज है ३१ अगस्त! यानी कि आज 'ताज़ा सुर ताल' इस साल का दो तिहाई सफ़र पूरा कर रहा है। पीछे मुड़ कर देखें तो इस साल बहुत ही कम फ़िल्में ऐसी हैं जिन्होंने बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़े हैं।

विश्व दीपक - हाँ, लेकिन फ़िल्म संगीत की बात करें तो इन फ़िल्मों के अलावा भी कई फ़िल्मों का संगीत सुरीला रहा है। 'वीर', 'इश्क़िया', 'कार्तिक कॊलिंग‍ कार्तिक', 'आइ हेट लव स्टोरीज़', 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता', 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसे फ़िल्मों के गानें काफ़ी अच्छे हैं। अब देखते हैं कि २०१० का बेस्ट क्या अभी आना बाक़ी है!

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप ने कोई ऐसा कम्प्युटर देखा है जिसका स्पीड १ टेरा हर्ट्ज़ हो, और मेमरी १ ज़ीटा बाइट, जिसका प्रोसेसर पेण्टियम अल्ट्रा कोर मिलेनिया वी-२, और एफ़. एच. पी-४५० मोटर हिराटा, जापान का लगा हो?

विश्व दीपक - अरे अरे ये सब क्या पूछे जा रहे हैं आप? यह 'टी. एस. टी' है भई!

सुजॊय - तभी तो! आज हम जिस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं यह उसी से ताल्लुख़ रखता है। ये जो स्पेसिफ़िकेशन्स मैंने अभी बताए, यह दरसल किसी कम्प्युटर का नहीं, बल्कि एक अत्याधुनिक रोबोट का होगा जिसका निर्माण कर रहे हैं फ़िल्म निर्माता कलानिथि मारन निर्देशक शंकर के साथ मिल कर अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'रोबोट' में।

विश्व दीपक - 'रोबोट' इस देश में बनने वाली सब से महँगी फ़िल्म है और इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं साउथ सुपरस्टार रजनीकांत और ऐश्वर्या राय बच्चन। फ़िल्म में संगीत दिया है ए. आर. रहमान ने और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे। दोस्तों, इससे पहले कि हम 'रोबोट' की बातों को आगे बढ़ाएँ, आइए फ़िल्म का पहला गाना सुन लेते हैं जिसे गाया है ए. आर. रहमान, सुज़ेन, काश और क्रिसी ने।

गीत - नैना मिले


सुजॊय - फ़िल्म की कहानी और प्लॊट के हिसाब से ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गानें हाइ टेक्नो बीट्स वाले होंगे और गायन शैली भी उसी तरह का रोबोट वाले अंदाज़ का होगा, और अभी अभी जो हमने गीत सुना उसमें इन सभी बातों का पूरा पूरा ख़याल रखा गया है। "नैना मिले, तुम से नैना मिले", स्वानंद किरकिरे के बोलों को ध्यान से सुना जाए तो उनका ख़ास अंदाज़ महसूस किया जा सकता है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि 'ध्यान से सुना जाए', क्योंकि टेक्नो बीट्स के चलते गीत के बोल पार्श्व में चले गए हैं और संगीत ही सर चढ़ कर बोल रहा है।

विश्व दीपक - वाक़ई एक 'रोबोटिक' गाना है। हाल में एक फ़िल्म आई थी 'लव स्टोरी २०५०' जिसका संगीत भी कुछ इसी तरह का डिमाण्ड करता था। "मिलो ना मिलो" गीत मशहूर हुआ था लेकिन कुल मिलाकर फ़िल्म पिट गई थी। ख़ैर, 'रोबोट' का दूसरा गीत पहले गीत की तुलना में टेक्नो बीट्स के मामले में हल्का है और एक रोमांटिक युगल गीत है मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में। सुनते हैं फिर चर्चा करते हैं।

गीत - पागल अनुकन (प्यारा तेरा गुस्सा भी)


विश्व दीपक - भले ही एक नर्मोनाज़ुक रूमानीयत से भरा गीत है, लेकिन स्वानंद किरकिरे इसमें भी वैज्ञानिक शब्दों को डालना नहीं भूले हैं। हिंदी सिनेमा का यह पहला गीत है जिसमें "न्युट्रॊन" और "ईलेक्ट्रॊन" शब्दों का इस्तमाल हुआ है।

सुजॊय - आइए अब इस फ़िल्म के प्रमुख किरदार रोबोट का परिचय आप से करवाया जाए। इस ऐण्ड्रो-ह्युमानोएड रोबोट का नाम है 'चिट्टी'। यह एक इंसान है जिसने जन्म नहीं लिया, बल्कि जिसका निर्माण हुआ है। चिट्टी गा सकता है, नाच सकता है, लड़ सकता है, पानी और आग का उस पर कोई असर नहीं होता। वो हर वो सब कुछ कर सकता है जो एक इंसान कर सकता है लेकिन शायद उससे भी बहुत कुछ ज़्यादा। वो विद्युत-चालित है और वो झूठ नहीं बोल सकता। चिट्टी की कुछ विशेषताओं के बारे में हमने आपको बताया, आइए अब सुनते हैं 'चिट्टी डान्स शोकेस'।

विश्व दीपक - 'चिट्टी डान्स शोकेस' एक डान्स नंबर है प्रदीप विजय, प्रवीन मणि, रैग्ज़ और योगी बी. का।

गीत - चिट्टी डान्स शोकेस


सुजॊय - वाक़ई ज़बरदस्त इन्स्ट्रुमेन्टल पीस था। हिप-हॊप डान्स के शौकीनों के लिए बहुत अच्छा पीस है। इस फ़्युज़न ट्रैक का इस्तमाल टीवी पर होने वाले डान्स रियल्टी शोज़ में किया जा सकता है।

विश्व दीपक - और अब एक ऐसा गीत जिसे सुनते हुए आप शायद ९० के दशक में पहुँच जाएँगे। और वह इसलिए कि इसमें आवाज़ें हैं हरिहरण और साधना सरगम की। लेकिन गाने के अंदाज़ में ९० के दशक की कोई छाप नहीं है। यह तो इसी दौर का गीत है। यह गीत दर-असल इस रोबोट की गरिमा और महिमा का बखान करता है। रहमान के शुरुआती दिनों में दक्षिण के फ़िल्मों में वो जिस तरह का संगीत दिया करते थे, इस गीत में कुछ कुछ उस शैली की छाया मिलती है। सुनते हैं "अरिमा अरिमा"।

गीत - अरिमा अरिमा


विश्व दीपकव - स्वानंद किरकिरे ने केवल "ईलेक्ट्रॊन" और "न्युट्रॊन" तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा, अब एक ऐसा गीत जिसमें किलिमांजारो और मोहंजोदारो का उल्लेख है, और उल्लेख क्या, गीत के मुखड़े में ही ये दो शब्द हैं जिन पर इस गीत को आधार किया गया है। इस तरह के शब्दों के चुनाव का तो यही उद्येश्य हो सकता है कि धुन पहले बनी होगी और उस धुन पर ये शब्द फ़िट किए गए होंगे।

सुजॊय - जावेद अली और चिनमयी का गाया यह गीत एक मस्ती भरा गीत है जिसमें वह रोबोटिक शैली नहीं है, बल्कि तबले का भी इस्तमाल हुआ है। जावेद अली धीरे धीरे कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। आज के दौर के गायकों में उन्होंने अपनी एक अलग जगह बना ही ली है और फ़िल्म संगीत संसार में उन्होंने अपने क़दम मज़बूती से जमा लिए हैं। आइए सुनते हैं "किलिमांजारो"।

गीत - किलिमांजारो


विश्व दीपक - फ़िल्म के शुरु में चिट्टी कोई भी काम तो कर सकता है, लेकिन वो इंसान के जज़्बातों को समझ नहीं सकता। उसमें कोई ईमोशन नहीं है। और तभी डॊ. वासी चिट्टी के प्रोसेसर को अपग्रेड करते हैं और उसमें ईमोशन्स का सिम्युलेशन करते हैं यह सोचे बिना कि इसके परिणाम क्या क्या हो सकते हैं। अब चिट्टी महसूस कर सकता है और सब से पहले जो वो महसूस करता है, वह है प्यार। क्या यही प्यार डॊ. वासी के रास्ते पे दीवार बन कर खड़ा हो जाएगा? क्या डो. वासी का क्रिएशन ही उनका विनाश कर देगा? यही कहानी है 'रोबोट' की।

सुजॊय - और अब एक और रोबोटिक नंबर, फिर से टेक्नो बीट्स की भरमार लिए यह है "बोम बूम रोबोडा", जिसे गाया है रैग्ज़, योगी बी., मधुश्री, कीर्ति सगठिया और तन्वी शाह ने। मधुश्री को ए. आर. रहमान ने कई ख़ूबसूरत गीतों में गवाया है। बहुत ही मिठास है उनकी आवाज़ में। यह ताज्जुब की ही बात है कि मुंबई के फ़िल्मी संगीतकार क्यों उनसे गानें नहीं गवाते! ख़ैर, सुनते हैं यह गीत।

गीत - बूम बूम रोबोडा


विश्व दीपक - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत "ओ नए इंसान"। श्रीनिवास और खतिजा रहमान का गाया यह गीत है। श्रीनिवास ने बिलकुल रोबोटिक अंदाज़ में यह गाया है। श्रीनिवास ने इस गीत में दो अलग अलग आवाज़ें निकाली हैं, जो एक दूसरे से बिलकुल अलग है। ऒर्केस्ट्रेशन पूरी तरह से ईलेक्ट्रॊनिक है और इस गीत को सुनते हुए एक साइ-फ़ाइ फ़ील आता है।

सुजॊय - और जिन्हें मालूम नहीं है, उन्हें हम यह बताना चाहेंगे कि खतिजा रहमान ए. आर. रहमान की बेटी है जो इस गीत के ज़रिए हिंदी पार्श्व गायन में क़दम रख रही है। चलिए सुनते हैं यह गीत।

गीत - ओ नए इंसान


सुजॊय - हाँ तो विश्व दीपक जी, कैसा रहा इन रोबोटिक गीतों का अनुभव? मुझे तो बुरा नहीं लगा। हाल के कुछ फ़िल्मों में रहमान का जिस तरह का संगीत आ रहा था, ज़्यादातर सूफ़ियाने अंदाज़ का, उससे बिलकुल अलग हट के, बहुत दिनों के बाद इस तरह का संगीत सुनने में आया है। वैसे हाल में 'शिवाजी' में रहमान ने इस तरह का संगीत दिया था, लेकिन हिंदी के श्रोताओं में 'शिवाजी' के गानें कुछ ख़ास असर नहीं कर सके थे। अब देखना है कि 'रोबोट' के गीतों को किस तरह का रेसपॊन्स मिलता है! "पागल अनुकन" और "किलिमांजारो", ये दोनों गीत मुझे सब से ज़्यादा पसंद आए।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, भले हीं गाने सुनने के दौरान मैंने इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, किलिमांजारो और मोहनजोदाड़ो जैसे शब्दों के लिए स्वानंद किरकिरे को क्रेडिट दिया था, लेकिन एक बात मेरे दिल में चुभ-सी रही थी.. शुरू में सोचा कि रहने देता हूँ, हर बात कहनी ज़रूरी नहीं होती, लेकिन जब हम समीक्षा हीं कर रहे हैं तो हमें कुछ भी छुपाने का हक़ नहीं मिलता। शायद आपने रोबोट के तमिल वर्ज़न ऐंदिरन के गाने नहीं सुने। मैंने सुने हैं.. गाने के बोल तो समझ नहीं आए लेकिन ऊपर बताए गए शब्द पकड़ में आ गए थे} और जब मैंने हिन्दी के गाने सुने और हिन्दी में उन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति मिली तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि गीतकार ने गाने का बस अनुवाद हीं किया है और कुछ नहीं। नहीं तो तमिल का "डा" (बूम बूम रोबो डा), जो हिन्दी के "रे" या "अरे" के समतुल्य है, हिन्दी में भी "डा" हीं क्यों होता। और भी ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं.. जिन्हें सुनने पर मुझे लगा था कि किसी साधारण-से गीतकार से गाने लिखवाए (अनुवाद करवाए) गए हैं। लेकिन गीतकार के रूप में "स्वानंद किरकिरे" का नाम देखकर मुझे झटका-सा लगा। अब जैसा कि आपके साथ हुआ और दूसरे हिन्दी-भाषी श्रोताओं के साथ होने वाला है, हम तो बस हिन्दी के गाने हीं सुनते हैं और उसी को "असल" समझ बैठते हैं। अब यहाँ पर दोषी कौन है, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन स्वानंद साहब से मुझे ऐसी उम्मीद न थी। वे "गुलज़ार" और "महबूब" की तरह मिसाल बन सकते थे, जो तमिल के गानों (जिसे वैरामुतु जैसे बड़े कवि/गीतकार लिखा करते हैं) से बोल नहीं उठाते, बल्कि रहमान की धुनों पर अपने नए बोल लिखते हैं। बस इतना है कि स्वानंद साहब से निराश होने के बावजूद रहमान के संगीत के कारण हीं मैं इस एलबम को पसंद कर पा रहा हूँ। सुजॊय जी, आपने इस एलबम के लिए साढे तीन अंक निर्धारित किए थे, लेकिन मैं आधे अंक की कटौती गीतकार के कारण कर रहा हूँ। एक गीतकार/कवि के मन में शब्दों के लिए जो टीस उठती है, वह तो आप समझ हीं सकते हैं.. है ना? खैर.. मैं भी किस भावनात्मक दरिया में बह गया... हाँ तो, आज की समीक्षा को विराम देने का वक्त आ गया है, अगली बार "अनजाना अनजानी" के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए शुभदिन एवं शुभरात्रि!!

आवाज़ रेटिंग्स: रोबोट: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९७- हरिहरण और साधना सरगम की आवाज़ में उस मशहूर गीत का मुखड़ा बताइए जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "ये दिल बेज़ुबाँ था आज इसको ज़ुबाँ मिल गई, मेरी ज़िंदगी को एक हसीं दास्ताँ मिल गई"?

TST ट्रिविया # ९८- फ़िल्म 'रोबोट' के साउण्डट्रैक में आपने जितनी भी आवाज़ें सुनीं, उनमें से एक गायिका हैं जिनका असली नाम है सुजाता भट्टाचार्य। बताइए इस गायिका को अब हम किस नाम से जानते हैं?

TST ट्रिविया # ९९- परिवार की नाज़ुक आर्थिक स्थिति के चलते ए. आर. रहमान को कक्षा-९ में स्कूल छोड़ना पड़ा था। बताइए रहमान उस वक़्त किस स्कूल में पढ़ रहे थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. खुदा जाने (बचना ए हसीनों)
२. ६७
३. इन दोनों फ़िल्मों में विदेशी गीत की धुन का इस्तेमाल किया गया है। 'वी आर फ़मिली' में एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॊक" तथा 'कल हो ना हो' में रॊय ओरबिसन के "प्रेटी वोमेन"।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

Tuesday, August 3, 2010

"इश्क़ महंगा पड़े फिर भी सौदा करे".. ऐसा हीं एक सौदा करने आ पहुँचें हैं कभी साफ़, कभी गंदे, "लफ़ंगे परिंदे"

ताज़ा सुर ताल २९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! जैसा कि हाल के सालों में हम देखते आ रहे हैं.. आज के फ़िल्मकार नई नई कहानियाँ हिंदी फ़िल्मों में ला रहे हैं। वैसे तो ज़्यादातर फ़िल्मों की कहानियों का आधार नायक-नायिका-खलनायक ही होते रहे हैं और आज भी है, लेकिन बदलते समाज और दौर के साथ साथ फ़िल्म के पार्श्व में काफ़ी परिवर्तन आ गए हैं। अब आप ही बताइए मुंबई के 'बाइक गैंग्स' पर किसी फ़िल्म की कल्पना क्या ७० के दशक में की जा सकती थी?

सुजॊय - क्योंकि फ़िल्म समाज का आईना कहलाता है, तो बदलते दौर के साथ साथ, बदलते समाज के साथ साथ फ़िल्में भी बदल रही है। और यही बात लागू होती है फ़िल्म संगीत पर भी। जब जब फ़िल्मी गीतों के गिरते हुए स्तर पर लोग चर्चा शुरु कर देते हैं, तब भी उन्हें इसी बात को ध्यान में रखना होगा कि अब वक़्त बदल गया है। आज की नायिका अगर "चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है" जैसे गीत गाये, तो वह बहुत ज़्यादा नाटकीय और बेमानी लगेगी। इसलिए बदलते दौर के साथ साथ बदलते संगीत को भी खुले दिल से स्वीकारें, इसी में शायद सब की भलाई है। हाँ, यह ज़रूर है कि गीतों का स्तर नहीं गिरना चाहिए। अच्छा फ़नकार वही है जो लाख पाबंदियों के बावजूद भी अच्छा काम कर निकल जाए। और पिछले कुछ दिनों से हम देख भी रहे हैं कि कुछ कलाकार इस ओर ध्यान दे भी रहे हैं।

विश्व दीपक - तो अब आज की फ़िल्म की चर्चा शुरु की जाए! जैसा कि हमने पिछले हफ़्ते हीं इशारा कर दिया था, आज हम लेकर आए हैं फ़िल्म 'लफ़ंगे परिंदे' के गीतों को। यह फ़िल्म मुंबई के बाइक गैंग्स की कहानी है जिसका निर्माण किया है आदित्य चोपड़ा ने और निर्देशन है प्रदीप सरकार का। नील नितिन मुकेश फ़िल्म के नायक हैं जो नंदु की भूमिका में नज़र आएँगे, जो एक फ़ाइटर है और जो आँखों में पट्टी लगाकर रिंग में लड़ेंगे। उधर फ़िल्म की नायिका बनीं हैं दीपिका पडुकोण जो निभा रही है पिंकी का किरदार, जो एक नृत्यांगना है और जो नेत्रहीन है। नंदु पिंकी को अपनी आँखों से दुनिया दिखाता है तो पिंकी उसे प्यार करना सिखाती है। लेकिन इन दोनों को अपने प्यार के लिए किस तरह की कीमत चुकानी होगी, यह आप ख़ुद देख लीजिएगा २० अगस्त के बाद, यानी जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हो जाएगी।

सुजॊय - तो दोस्तों, यश राज के बैनर तले बनने वाली इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं नवोदित गायक रोनित सरकार की आवाज़ में। फ़िल्म के गीतकार हैं प्रदीप सरकार के चहेते गीतकार स्वानंद किरकिरे, और संगीत के लिए चुना गया है आर. आनंद को।

गीत - लफ़ंगे परिंदे


विश्व दीपक - आजकल रॊक शैली का लगभग सभी फ़िल्मों में इस्तेमाल हो रहा है। पिछले कुछ हफ़्तों में हमने जिन जिन फ़िल्मों के गानें इस स्तंभ में सुने हैं, उन सब में एक ना एक रॊक अंदाज़ का गीत ज़रूर रहा है। "लफ़ंगे परिंदे" गीत भी उसी रॊक स्टाइल का है। हेवी मेटल, गीटार की भरमार और उस पर रोनित सरकार की वज़नदार आवाज़ धुन और इन हेवी मेटल्स के साथ पूरा पूरा न्याय करती है। यह गीत किसी रॊक ऐल्बम में होती तो इसे ज़्यादा कामयाबी मिलती, फ़िल्मी गीत के रूप में इस तरह के गीत का लोगों की ज़ुबान पर चढ़ना ज़रा मुश्किल सा हो जाता है। गीत अच्छा है इसमें कोई शक़ नहीं है, और इस गीत से इस ऐल्बम की धमाकेदार शुरुआत हुई है।

सुजॊय - इस बात पर अगर हम ग़ौर करें कि यह एक यशराज फ़िल्म है, तो हमेशा से यशराज के फ़िल्म का शीर्षक गीत बड़ा ही रोमांटिक और नर्मोनाज़ुक हुआ करता है। उस दृष्टि से यह एक उल्लंघन है उनके हीं नियमों का है और ऐसा यशराज की फ़िल्म से उम्मीद नहीं किया करते हैं लोग। तो सब को चौंका कर ही कह सकते हैं कि यशराज बैनर अब अपना इमेज बदल रहा है। अच्छा, अगले गीत की तरफ़ बढ़ने से पहले आप को यह बता दें कि इस फ़िल्म के संगीतकार आर. आनंद का दुबारा पदार्पण हुआ है फ़िल्म जगत में। इससे पहले आर. आनंद ने आग़ोश बैण्ड के ज़रिए 'पैसा' नामक ऐल्बम का निर्माण किया था। फिर उसके बाद इन्होंने दक्षिण के कुछ फ़िल्मों में संगीत दिया और आनंद की आख़िरी फ़िल्म थी 'ज़ोर'। अब देखते हैं हिंदी फ़िल्मों में वो क्या कुछ कर दिखाते हैं।

विश्व दीपक - और अब "लफ़ंगे परिंदे" के बाद "मन लफ़ंगा"।

गीत - मन लफ़ंगा


सुजॊय - पिछले गीत से जो एक ख़ास मूड बन गया था, उसी मूड को आगे बढ़ाता हुआ यह गीत हमने सुना मोहित चौहान की आवाज़ में। गोवानीज़ कोरल गायन का इस्तेमाल सुना जा सकता है इस गीत में। ऒरकेस्ट्रेशन भी गोवा के संगीत जैसा लगता है। मोहित की आवाज़ ने एक बार फिर गीत के साथ पूरा पूरा न्याय किया और कहने की ज़रूरत नहीं कि मोहित चौहान एक के बाद एक सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। उनके गाये ज़्यादातर गानें ही हिट हो रहे हैं। इन दिनों 'वन्स अपन ए टाइम' का "पी लूँ" गीत हर चैनल पर सुनने को मिल रहा है जो चार्टबस्टर भी बन चुका है। "मन लफ़ंगा" गीत का एक रीमिक्स भी है फ़िल्म के ऐल्बम में लेकिन ऒरिजिनल के साथ इसकी तुलना अर्थहीन है।

विश्व दीपक - अकोस्टिक गीटार का जो इस्तेमाल हुआ है, वह कई दृष्टि से नवीन लगता है। एक सादा सरल बीट और रीदम गीत के प्रवाह को कर्णप्रिय बनाता है और लगता है कि यह गीत भी एक मक़बूल रोमांटिक गीत के रूप में उभर कर आएगा। स्वानंद के बोल भी कमाल के हैं कि नायक कह रहा है कि उसे अपने मन पर कोई बस नहीं है, मन तो लफ़ंगा है, जब प्यार की बात आती है तो वो किसी की नहीं सुनता, वह मनमानी करता है। "इश्क़ महंगा लगे.. फिर भी सौदा करे".. यह पंक्ति अपने आप में हीं सारी बात कह देती है। इस गीत को पहली बार सुनने के बाद एक बार और सुनने को दिल करता है। दोस्तों, आप लोग अगला गीत सुनिए, मैं ज़रा इस गीत को दोबारा सुन कर फिर अगला गीत सुनता हूँ।

सुजॊय - अगला गीत है शैल हाडा और अनुष्का मनचंदा की अवाज़ों में, आइए सुनते हैं।

गीत - धतड़ ततड़


विश्व दीपक - इस ऐल्बम का रॊक फ़ील बरकरार रखा है इस "धतड़ ततड़" ने। शैल हाडा सांवरिया का शीर्षक गीत गाने के बाद जैसे ग़ायब हो गए थे, उन्हे वापस लौटा देख कर ख़ुशी हो रही है, क्योंकि वो बेहद गुणी कलाकार हैं। उनके इंटरव्यु से पता चलता है कि शास्त्रीय संगीत सीखे हुए कलाकार है, जिन्होंने कई सालों तक मुंबई के किसी स्कूल में बच्चों को संगीत सिखाया भी है। और इस गीत में उनके साथ अनुष्का मनचंदा की आवाज़ ने अच्छा साथ दिया है। रॊक और लोक संगीत का फ़्युज़न है इस गीत में, स्ट्रिंग्स के साथ साथ ढोल का इस्तेमाल हुआ है जो क़दमों को थिरकाने लगते हैं।

सुजॊय - सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल के बाद अब ऐसा लगने लगा है कि जो दो गायिका दूसरों के मुक़ाबले कुछ आगे निकल रही हैं वो हैं अनुष्का मनचंदा और शिल्पा राव। धीरे धीरे संगीतकारों की निगाहें इन्ही दो गायिकाओं पर टिक-सी रही है ऐसा प्रतीत होता है। पूरी तरह से मुंब‍इया डान्स नंबर है और लगता है और इस बार गणपति में तो शायद इसी गीत की धूम रहेगी। लोग ख़ूब झूमने वाले हैं इस गीत के साथ जैसे पिचले साल सलमान ख़ान की फ़िल्म 'वाण्टेड' का गीत "तेरा ही जल्वा" छाया हुआ था। ख़ैर, इस धतड़ ततड़ के बाद अब एक सुकूनदायक गीत की बारी शिल्पा राव की आवाज़ में हो जाए!

गीत - नैन परिंदे


विश्व दीपक - एक ख़ूबसूरत पियानो पीस के साथ शुरु होकर यह गीत बेहद सुरीला आकार ले लेता है। शिल्पा राव इस तरह के गानें एक के बाद एक गा रही हैं और उनकी आवाज़ में इस तरह के गानें ख़ूब जँचते भी हैं। "सजदे में युंही" (बचना ऐ हसीनों), "उड़ी उड़ी मुड़ी मुड़ी" (पा), "रंग दे" (लाहौर), जैसे गीत शिल्पा राव के हाल के सफल गीतों में शुमार होते हैं। इस गीत की बात करें तो स्वानंद किरकिरे के शब्द बड़े ही काव्यात्मक और अर्थपूर्ण लगते हैं।

सुजॊय - शिल्पा राव की आवाज़ दीपिका के उपर अच्छी बैठी है, जिनके लिए "सजदे में युंही" भी शिल्पा ने गाया था। देखते हैं कि क्या शिल्पा भविष्य में दीपिका का स्क्रीन वॉयस बन पाती हैं या नहीं। और अब एक और रॉक सॉंग आज के समय के सब से कामयाब रॉकस्टार सूरज जगन की आवाज़ में। सूरज जगन एक रॉक सिंगर हैं जो फ़िल्म 'रॉक ऒन' में परदे पर नज़र भी आए थे। उन्होंने उस फ़िल्म में दूसरे बैंड के लीड सिंगर का किरदार निभाया था। उनकी आवाज़ में वह जोश है, वह वज़न है, जो इन हार्ड मेटल संगीत में साफ़ साफ़ सुनाई भी दे और अपना असर भी करे।

विश्व दीपक - बेस गीटार और ईलेक्ट्रिक गीटार का ख़ूब इस्तेमाल हुआ है इस गीत में, और सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरस में ढोलकी और स्कॉटिश पाइप का भी इस्तेमाल हुआ है। तो चलिए इस थिरकन भरे गीत को सुन लिया जाये। वैसे भी यह फ़िल्म का एक और शीर्षक गीत है जिसके बोल हैं "रंग डालें लफ़गे परिंदे"।

गीत - रंग डालें लफ़ंगे परिंदे


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसा लगा 'लफ़ंगे परिंदे'? मुझे तो एक और 'रॉक ऒन' लगा। फ़िल्म की कहानी के अनुसार ये गीत बने हैं जो सिचुएशनल हैं। मोहित चौहान और शिल्पा राव वाले दो गीत एक श्रेणी में रख सकते हैं और बाक़ी के तीन गीत रॉक श्रेणी में। यकीनन हीं यह ऐल्बम ऐवरेज से ऊपर है... बल्कि मैं तो कहता हूँ कि यह ऐल्बम भी इन्हीं दिनों आए बाकी ऐल्बमों-सा मक़बूल होने का माद्दा रखता है। वैसे भी यहाँ उन परिंदों की बात हो रही है जो कभी साफ तो कभी गंदे हैं लेकिन खुलेआम उड़ते हैं.. संगीत की दुनिया में भी इन्होंने लम्बी उड़ान भरी है... है ना? "ये कभी साफ़, ये कभी गंदे, लफ़ंगे परिंदे" :-)

विश्व दीपक - सुजॉय जी, सही कहा आपने। यहाँ पर मैं संगीतकार और गीतकार दोनों की तारीफ़ करना चाहूँगा। गीतकार के बारे में क्या कुछ नया कहूँ। स्वानंद साहब हर तरह के गीत लिखने में उस्ताद हो चुके हैं। भला कोई यकीन कर सकता हूँ कि इन्होंने हीं "आल इज़ वेल" लिखा था। और यहाँ पर वही "लफ़ंगे परिंदे" लिख रहे हैं.. पिछली फिल्म "राजनीति" में इन्होंने हीं कहा था "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन" तो वेलडन अब्बा में इन्हीं की कलम से ये बोल निकले थे "साबुन लेकर हाथ में निकले, सिस्टम को है धोना रे"। "खोया खोया चाँद" के शीर्षक गीत को भला कोई भूल सकता है... और कितने गाने गिनवाऊँ! मैं तो भाई इनका कायल हो गया हूँ। "देसी शब्दों" की बौछार इनसे अच्छा कोई और नहीं कर सकता.. यह तो मानना हीं पड़ेगा। गीतकार के बाद संगीतकार की भी बात कर लें। तो यहाँ पर प्रदीप सरकार की समझ-बूझ और विश्वास की दाद देनी होगी जो उन्होंने अपने नियमित संगीतकार "शांतनु मोइत्रा" की बजाय एक गुमनाम संगीतकार (आर आनंद) को चुना.. मैं सच कहता हूँ, मैंने इस फिल्म से पहले इनका नाम नहीं सुना था, लेकिन इस फिल्म के गानों को सुनने के बाद अब सोच रहा हूँ कि ढूँढ-ढूँढकर इनके गाने सुनूँ। इन्होंने इस फिल्म के नब्ज़ को जैसे पकड़-सा लिया है.. गानों को सुनते हीं दृश्य सामने आने लगते हैं। निस्संदेह संगीतकार की जीत हुई है। मेरी उम्मीदें इनसे अब बढ गई हैं.. देखते हैं आगे क्या होता है। चलिए तो इस सुखद बातचीत के बाद आज की समीक्षा को विराम देते हैं। अगली बार एक नई फिल्म (शायद आशाएँ या वी आर फैमिली या फिर कोई और) के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

आवाज़ रेटिंग्स: लफ़ंगे परिंदे: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८५- 'लफ़ंगे परिंदे' फ़िल्म के गीत "धतड़ ततड़" को आप किशोर कुमार से कैसे जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # ८६- "मेरे उपर भी आइ.आइ.टी या पी.एम.टी की परीक्षा देने का प्रेशर था घर से। लेकिन एक बार युवा वाणी कार्यक्रम के लिए आकाशवाणी केन्द्र जाते वक़्त मेरा ऐक्सिडेन्ट हो गया। तब मम्मी ने कहा कि अब ज़िंदगी में जो करना है करो। क्योंकि उस ऐक्सिडेन्ट से बच कर निकलना मेरे लिए दूसरा जन्म था। मैं कैसे बचा मुझी कुछ नहीं पता। तो मम्मी ने कहा कि जो अब ज़िंदगी में बनना है बनो"। बताइए हम किस फ़नकार की बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८७- प्रदीप सरकार और स्वानंद किरकिरे का साथ कई फ़िल्मों में हुआ है। बताइए इन दोनों के उस फ़िल्म के उस गीत का मुखड़ा जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "होश लेके उड़ गया उसकी कैसी है जादूगरी"।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रियदर्शन, प्रीतम, अक्षय कुमार।
२. नगीन तनवीर।
३. फ़िल्म - बिल्लू, गीत - बिल्लू भयंकर, सहगायक - अजय झिंग्रन और कल्पना.

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। अवध जी, ताजा सुर ताल पर आपको देखकर बेहद खुशी हुई। आगे भी इसी तरह अपनी उपस्थिति से हमें कृतार्थ करते रहिएगा। यही आग्रह है आपसे। आपने एक सवाल का सही जवाब दिया। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, July 27, 2010

महंगाई डायन को दुत्कारकर बाहर किया "पीपलि" वालों ने और "खट्टे-मीठे" पलों को कहा नाना ची टाँग

ताज़ा सुर ताल २८/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत है इस स्तंभ में, और विश्व दीपक जी, आपको भी नमस्कार!

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! आज की कड़ी में हम दो फ़िल्मों के गानें सुनने जा रहे हैं। भले ही इन दो फ़िल्मों की कहानी और संगीत में कोई समानता नज़र ना आए, लेकिन इन दो फ़िल्मों में एक समानता ज़रूर है कि इनके निर्माता फ़िल्म जगत के अनूठे फ़िल्मकार के रूप में जाने जाते हैं, और इन दोनों की फ़िल्मों में कुछ अलग हट के बात ज़रूर होती है। अपने अपने तरीके से और अपने अपने मैदानों में ये दोनों ही अपने आप को परफ़ेक्शनिस्ट सिद्ध करते आए हैं। इनमें से एक हैं प्रियदर्शन और दूसरे हैं आमिर ख़ान। जी हाँ, वही अभिनेता आमिर ख़ान जो हाल के समय से निर्माता भी बन गए हैं अपने बैनर 'आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स' से ज़रिए।

सुजॊय - प्रियदर्शन की फ़िल्म 'खट्टा-मीठा' और आमिर ख़ान की 'पीपलि लाइव' की संगीत-समीक्षा के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। पहले कुछ 'खट्टा-मीठा' हो जाए! इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं अक्षय कुमार, त्रिशा कृष्णन और राजपाल यादव। प्रीतम का संगीत है, गानें लिखे हैं इरशाद कामिल, शहज़ाद रॊय और नितिन रायकवार ने। विश्व दीपक जी, आपने इन दो फ़िल्मों की समानता की बात कही तो मुझे ऐसा लगता है, हालाँकि मैं पूरी तरह से श्योर तो नहीं हूँ, कि इन दोनों फ़िल्मों की कहानियों में हास्य रस का अंश शायद ज़्यादा है किसी और पक्ष के मुक़ाबले। कम से कम प्रोमोज़ से तो ऐसा ही लग रहा है!

विश्व दीपक - हो सकता है। 'खट्टा-मीठा' प्रियदर्शन की मलयालम फ़िल्म 'वेल्लानकलुडे नाडु' का रीमेक है। अक्षय कुमार की यह छठी फ़िल्म है प्रियदर्शन के साथ, और त्रिशा कृष्णन का हिंदी फ़िल्मों में यह पदार्पण है। तो आइए सुना जाए 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का पहला गीत "नाना चि टांग"।

गीत - त्याचा नाना चि टांग


सुजॊय - बहुत दिनों के बाद कुणाल गांजावाला की आवाज़ सुनने को मिली। मैं कुछ दिनों से सोच ही रहा था कि कुणाल कहाँ ग़ायब हो गए, और लीजिए वो आ गए वापस! इससे पहले शायद उनकी आवाज़ हमने 'सावरिया' फ़िल्म में सुनी थी। "नाना चि टांग" एक पेप्पी नंबर है जैसा कि हमने अभी अभी सुना। कैची रीदम है और लगता है कि यह चार्ट-बस्टर साबित होगी। गीत के आरंभ में और इंटरल्युड में भी आपने महसूस किया होगा मराठी रैप का जिसे गाया यू.आर.एल ने। हिंदी-मराठी रैप का संगम और उसके साथ रॊक शैली का संगीत, एक बिल्कुल ही नया प्रयोग। प्रीतम, कीप इट अप!

विश्व दीपक - ड्रम्स और गिटार का जम के इस्तेमाल हुआ है और धुन कुछ ऐसी है कि जल्द ही सुनने वाला आकर्षित हो जाता है और तन-मन थिरकने लगता है। कुणाल की आवाज़ बहुत दिनों के बाद एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आई है और कोई शक़ नहीं कि यह गीत एक लम्बी पारी खेलने वाला है। अच्छा सुजॊय जी, इस गीत में जिन मराठी शब्दों का प्रयोग हुआ है, वो ग़ैर-मराठी लोगों को समझ कैसे आएगी?

सुजॊय - मुझे ऐसा लगता है कि बहुत ध्यान से अगर सुना जाए तो कुछ कुछ ज़रूर समझ में आ ही जाता है, जैसे कि "जिथे मी जाते तिथे तू दिस्ते, हवात तुझे सुगंध पसरते, मनात तू माझ्या ध्यानात तू, चार दिशाणा तू च तू..."। इसे पढ़ते हुए कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि इसका अर्थ है कि जहाँ भी मैं जाता हूँ, वहीं तू दिखती है, हवा में तेरी ख़ुशबू है, मेरे मन में तू ही तू है, हर दिशा में तू ही तू है। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, सुनते हैं एक प्यारा सा डुएट के.के और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में।

गीत - सजदे किए हैं लाखों


विश्व दीपक - जिसे हम कह सकते हैं कि पूरी तरह से इस मिट्टी की ख़ुशबू लिए हुए था यह गीत, और इन दोनों अभिज्ञ गायकों ने अपना अपना कमाल दिखाया। प्रीतम की मेलोडी बरकरार है, इरशाद कामिल ने भी ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं इस गीत के लिए। गीत की विशेषता है इसका सादापन, जिसे एक बार सुनते ही दिल अपना बना लेता है और मन ही मन हम दिन भर गुनगुनाने लग पड़ते हैं। पहले गीत के मुक़ाबले बिल्कुल ही अलग अंदाज़। गी की धुन सुन कर ऐसा लग रहा है कि किसी लोक गीत से प्रेरित होगा।

सुजॊय - मेरा भी यही ख़याल है क्योंकि आपको याद होगा राहुल देव बर्मन ने एक गीत बनाया था फ़िल्म 'बरसात की एक रात' फ़िल्म के लिए - "नदिया किनारे पे हमरा बगान, हमरे बगानों में झूमे आसमान"। लताजी के गाए इस गीत की धुन "सजदे किए" से मिलती जुलती है। हो सकता है उत्तर बंगाल के चाय बगानों के किसी लोक धुन पर आधारित होगा! वैसे हमारी यह सोच बेबुनियाद नहीं है, क्योंकि एलबम के सीडी पर इस गाने के लिए किसी पारंपरिक धुन को क्रेडिट दिया गया है। लगता हैं प्रीतम धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। इस गीत में हिंदुस्तानी साज़ों जैसे कि बांसुरी, तबला, सितार, और पायल की ध्वनियाँ सुनाई देती है जो गीत को और भी ज़्यादा मधुर बनाते हैं। उम्मीद है यह गीत इस साल के सब से लोकप्रिय युगल गीत की लड़ाई में सशक्त दावेदार सिद्ध होगा। प्रीतम और अक्षय कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो 'सिंह इज़ किंग' में "तेरी ओर" गीत की तरह इस गीत को भी उतनी ही लोकप्रियता हासिल हो, यही हम कामना करते हैं, और सुनते हैं 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का एक और गीत।

गीत - आइ ऐम ऐलर्जिक टू बुल-शिट


विश्व दीपक - भले ही गीत के शीर्षक से गीत के बारे में लोग ग़लत धारणा बना लें, लेकिन गीत को सुनते हुए पता चलता है कि दर-असल यह गीत फ़िल्म का थीम सॉंग है जो राजनीति और सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार और घूसखोरी जैसी मुद्दों की तरफ़ व्यंगात्मक उंगली उठाता है। इस गीत को लिखा है शहज़ाद रॉय ने, उन्होने ही गाया है और संगीत तय्यार किया है शनि ने।

सुजॊय - दर-असल इस गीत को सुन कर ही मैंने यह अनुमान लगाया था कि फ़िल्म में कॊमेडी का बहुत बड़ा हाथ होगा। यह एक पूरी तरह से सिचुएशनल गीत है जो लोगों की ज़ुबान पर तो नहीं चढ़ेगा, लेकिन फ़िल्म की नैरेशन में महत्वपूर्ण किरदार अदा करेगा। "मुझे फ़िकर यह नहीं कि देश कैसे चलेगा, मुझे फ़िकर यह है कि ऐसे ही ना चलता रहे", "यहाँ बोलने की आज़ादी तो है, पर बोलने के बाद आज़ादी नहीं है", इस तरह के संवाद आज के राजनीति पर व्यंगात्मक वार करती है। वैसे क्या आपको पता है कि यह गाना "शहज़ाद रॉय" के हीं गानों "लगा रह" और "क़िस्मत अपने हाथ में" गानों का एक रीमेक मात्र है। शनि ने ओरिज़िनल गानों के संगीत में ज्यादा परिवर्त्तन न करते हुए, उसमें बस बॉलीवुड का तड़का डाला है, बाकी का जादू तो शहज़ाद रॉय का है। चलिए अब अगले गीत की ओर रूख करते हैं।

विश्व दीपक - 'खट्टा-मीठा' का चौथा और अंतिम गीत है "आइला रे आइला" दलेर मेहंदी और कल्पना पटोवारी की आवाज़ों में जो एक मराठी उत्सव गीत है। यह एक थिरकता हुआ गीत है नितिन रायकवार का लिखा हुआ। मराठी अंदाज़ का नृत्य गीत है। नितिन ने अपने शब्दों से मराठी माहौल को ज़िंदा कर दिया है तो वहीं दलेर मेंहदी ने यह साबित किया है कि वे बस भांगड़ा के हीं उस्ताद नहीं, बल्कि मराठी गीतों को भी ऐसा गा सकते हैं कि सुनने वाले के मुँह से "आइला" निकल जाए।

गीत- आइला रे आइला


विश्व दीपक - अब हम बढ़ते हैं 'पीपलि लाइव' के संगीत पर। आमिर ख़ान निर्मित इस फ़िल्म की निर्देशिका हैं अनुषा रिज़्वी। फ़िल्म का अनूठा संगीत तैयार किया है इण्डियन ओशन, राम सम्पत, भडवई गाँव मंडली और नगीन तनवीर ने; और गानें लिखे हैं स्वानंद किरकिरे, संजीव शर्मा, नून मीम रशीद और गंगाराम सखेत ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रघुवीर यादव, ओम्कार दास माणिकपुरी, मलैका शेनोय, नसीरुद्दिन शाह और आमिर बशीर।

सुजॊय - जैसा कि आजकल प्रोमोज़ में दिखाया जा रहा है, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 'पीपलि लाइव' की कहानी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है, और इसी वजह से इसका संगीत भी बिल्कुल ग्राम्य है, लोक संगीत की मिठास के साथ साथ एक रूखापन (रॊवनेस) भी है जो फ़िल्म की कहानी और कथानक को और ज़्यादा सजीव बनाता है। सुन लेते हैं फ़िल्म का पहला गीत "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू", फिर उसके बाद बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

गीत - देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन के अपने स्टाइल का गाना था; इस बैण्ड की जानी पहचानी आवाज़ें और साज़ें। इकतारा, तबला, मृदंग, सितार जैसे भारतीय साज़ों के साथ साथ बेस गिटार की भी ध्वनियाँ आपने महसूस की होंगी इस अनोखे गीत में। देश भक्ति गीत होते हुए भी यह बिल्कुल अलग हट के है। इस गीत के लिए संजीव शर्मा और स्वानंद किरकिरे को ही सब से ज़्यादा क्रेडिट मिलना चाहिए क्योंकि इस गीत की जान इसके बोल ही हैं।

सुजॊय - बिलकुल सही! "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू, घाट घाट यहाँ घटता जादू, कहीं पहाड़ है कंकड़ शंकड़, बात है छोटी बड़ा बतंगड़, इण्डिया सर ये चीज़ धुरंधर, रंग रंगीला परजातंतर"। इसी गीत का एक और वर्ज़न भी है जिसमें थोड़ी कॊमेडी डाली गई है और पहले के मुक़ाबले बोलों में गम्भीरता थोड़ी कम है। फ़िल्म की पृष्ठभूमि के हिसाब से बिलकुल परफ़ेक्ट है यह गीत और इस ग़ैर पारम्परिक फ़िल्मी रचना को सुन कर दिल-ओ-दिमाग़ जैसे ताज़ा हो गया।

विश्व दीपक - अब फ़िल्म का दूसरा गीत "सखी स‍इयाँ तो खूबई कमात है, महँगाई डायन खाए जात है"। यह पूर्णत: एक लोक गीत है रघुवीर यादव और साथियों की आवाज़ों में। भडवई गाँव मंडली ने इस गीत की स्वरबद्ध किया है। पहले गीत का आनंद लीजिए, फिर इस पर और चर्चा करेंगे।

गीत - महँगाई डायन खाए जात है


सुजॊय - बिना कोई मिक्सिंग किए, बिना किसी ऒरकेस्ट्रेशन के इस्तेमाल के, इस गीत को बिलकुल ही लाइव लोक संगीत की तरह रेकोर्ड किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर मध्य भारत के गाँवों में लोक गीत गाए जाते हैं। रघुवीर यादव की लोक शैली वाली आवाज़ ने गीत में जान डाल दी है। हारमोनियम, ढोलक, और कीर्तन मंडली के साज़ों का वैसे ही इस्तेमाल हुआ है जैसे कि इस तरह की मंडलियाँ लोक गीतों में करती हैं। और एक बार फिर स्वानंद किरकिरे ने अपने शब्दों का लोहा मनवाया है। मनोज कुमार की फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के गीत "बाकी कुछ बचा तो महँगाई मार गई" की याद भी करा जाता है।

विश्व दीपक - पहले गीत में भी देश के कुछ समस्याओं की तरफ़ इशारा किया गया था, इस गीत में तो आज की सब से बड़ी समस्या, महँगाई की समस्या की तरफ़ आवाज़ उठाया गया है थो़ड़े हल्के फुल्के अंदाज़ में। खड़ी बोली और अवधी भाषा में यह गीत है।

सुजॊय - और सब से बड़ी बात यह कि लता मंगेशकर को यह गीत इतना पसंद आया कि उन्होने ट्विटर पर आमिर ख़ान को ट्वीट भेज कर इस गीत की तारीफ़ें भेजीं और फ़िल्म की सफलता के लिए उन्हे शुभकामनाएँ भी दी हैं। इस मज़ेदार लोक गीत के बाद अब आइए थोड़ा सा सीरियस हो जाएँ और सुनें "ज़िंदगी से डरते हो"।

गीत - ज़िंदगी से डरते हो


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन की आवाज़ और संगीत था इस गीत में। रॊक शैली में बना यह गीत एक प्रेरणादायक रचना है जो निकले हैं नून मीम रशीद की कलम से। कुल ७ मिनट के इस गीत को पार्श्व संगीत के रूप में इस्तेमाल किया गया होगा ऐसा लगता है। फ़िल्म 'लगान' में "बार बार हाँ बोलो यार हाँ" गीत की तरह इसमें भी समूह स्वरों का विशेष इस्तेमाल किया गया है।

सुजॊय - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत नगीन तनवीर की आवाज़ में सुनवाते हैं - "चोला माटी के राम"। इस गीत को सुनते हुए आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि कैसी रूहानी आवाज़ है इस थिएटर आरटिस्ट की। नगीन तनवीर कभी हबीब तनवीर थिएटर ग्रूप की सदस्या हुआ करती थीं। नगीन का नाम हबीब तनवीर से इसलिए भी जुड़ा है, क्योंकि नगीन हबीब तनवीर की सुपुत्री हैं। नगीन लोक गीत गाती हैं और इस गीत को भी क्या अंजाम दिया है उन्होने। गंगाराम सखेत के लिखे इस गीत की भाषा छत्तीसगढ़ी है।

विश्व दीपक - इसकी धुन उत्तर और मध्य भारत के विदाई गीत की तरह है। बांसुरी और इकतारे का क्या सुंदर प्रयोग हुआ है, जिन्हे सुनते हुए हम जैसे किसी सुदूर ग्रामांचल में पहुँच जाते हैं। एक इंटरनेट साइट पर किसी ने लिखा है इस गीत के बारे में - "चोला माटी के राम की भाषा निन्यानवे फ़ीसदी छत्तीसगढी हीं है। इसके संगीत में भी छत्तीसगढ के लोग धुन "करमा" की छाप है। करमा एक लोक-नृत्य है, जो गाँवों में लगने वाले मेलों और उत्सवों का विशेष आकर्षण होता है। इन उत्सवों के दौरान गाँव के सारे मर्द सजते-सँवरते हैं और "लुगरा" धारण करते हैं। फिर गाँव की जनता एक गोल चक्कर बना लेती है, जिसके केंद्र में नर्त्तक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। ये सारे नर्त्तक "मांदर" (यह छत्तीसढ का खास साज़ है... ढोल-ताशों का एक प्रकार) की धुन पर बिना रूके बिना थके नाचते जाते हैं। ऐसे अवसरों पर कम से कम पाँच या छह मांदरों के बिना तो काम हीं नहीं चलता।"

सुजॊय - यह अच्छी जानकारी थी। इकतारे का जिस तरह का प्रयोग हुआ है, ठीक ऐसा ही प्रयोग बंगाल के बाउल भटियाली गायक भी करते हैं। इसलिए इस गीत को सुनते हुए बंगाल के गाँवों की भी सैर हो जाती है। तो देखिए एक ही गीत है लेकिन कितने प्रदेशों के लोक संगीत से मेल खाती है। इसी को तो हम कहते हैं 'अनेकता मे एकता' और यही इस देश की शक्ति का राज़ है। एक और बात यह कि इसकी धुन जैसा कि आपने कहा विदाई धुन है, तो इस लोक धुन का प्रयोग थोड़े से तेज़ अंदाज़ में कल्याणजी-आनंदजी ने किया था फ़िल्म 'दाता' के गीत "बाबुल का यह घर बहना, कुछ दिन का ठिकाना है" में। तो आइए इस भजन को सुनते हैं।

गीत - चोला माटी के राम


सुजॊय - वाह! नगीन तनवीर की आवाज़ ने तो आँखें नम कर दी। हाँ तो विश्व दीपक जी, आज की दोनों फ़िल्मों के गानें तो हमने सुन लिए, अब बारी है अंतिम विचारों की। जहाँ तक 'खट्टा-मीठा' का सवाल है "नाना चि टांग" और "सजदे किए हैं लाखों", ये दो गीत मुझे पसंद आए और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ५ में ३.५ की रेटिंग। और 'पीपलि लाइव', भई इससे पहले कि मैं अपनी रेटिंग दूँ, सब से पहले तो मैं नतमस्तक होकर आमिर ख़ान को सलाम करना चाहूँगा, उन्होने एक बार फिर से साबित किया कि वो अलग हैं, नंबर वन हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि पर और भी तो कई फ़िल्में हाल के सालों में बनी हैं, लेकिन ऐसा जादूई संगीत किसी में भी सुनने को नहीं मिला। आज के फ़िल्मकार अक्सर क्या करते हैं कि जब भी ऐसे किसी लोक गीत की बारी आती है तो लोक गीत के बहाने किसी सस्ते और अश्लील गीत की रचना कर बैठते हैं। 'पीपलि लाइव' के गीतों को सुन कर ऐसा लगा कि अगर हमारे फ़िल्मकार, संगीतकार और गीतकार चाहें तो आज भी फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर वापस आ सकता है। युं तो इस फ़िल्म के सभी गानें मुझे अच्छे लगे लेकिन यह जो अभी अभी हमने "चोला माटी के राम" सुना, इस गीत का तो मैं दीवाना हो गया। नगीन तनवीर की आवाज़ ने दिल को ऐसा छुआ है कि अभी तक उनकी आवाज़ कानों में गूँज रही है। मेरी तरफ़ से 'पीपलि लाइव' को ४.५ की रेटिंग्‍ और ख़ास इस गीत को १० में १०। आमिर ख़ान को ढेरों शुभकामनाएँ कि उनकी यह फ़िल्म सफल हो और वो इसी तरह से फ़िल्मों और फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करते रहें।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं क्या कहूँ.. आपने तो सब कुछ हीं कह दिया है। आपने सही कहा कि अगर कोई दूसरा इंसान होता तो पीपलि लाइव का संगीत शायद ऐसा नहीं होता, जैसा अभी सुनने को मिल रहा है। वो कहते हैं ना कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी भी चीज को हाथ में ले तो उसे सोना बनाकर हीं दम लेते हैं। आमिर खान भी वैसे हीं इंसान हैं। एक कम-बज़ट की फिल्म, जिसमें कोई भी पहचान का कलाकार न हो और जिसमें किसी "गंभीर" मुद्दे को उठाया गया हो, उसे कोई भी हाथ में लेना नहीं चाहता। आमिर के आगे आने से ये अच्छा हुआ कि फिल्म को पहचान मिली और फिल्म के गाने भी लोगों की नज़रों में आ गए। निर्माता/निर्देशिका ने गीतकारों, संगीतकारों और गायको का चुनाव बड़े हीं ध्यान से किया है। "रघुवीर यादव" और "नगीन" को सुनने के बाद हर किसी को इस चुनाव की दाद देनी होगी। वैसे हाल में यह फिल्म अपने गाने "सखी सैंया" के कारण विवाद में भी आई थी, जिसका ज़िक्र सजीव जी पहले हीं कर चुके हैं,इसलिए मैं दुहराऊँगा नहीं। जहाँ तक इस एलबम की बात है तो यकीनन "पीपलि लाइव" "खट्टा-मीठा" से "इक्कीस" पड़ती है। "खट्टा-मीठा" चूँकि पूरी तरह से एक मनोरंज़क फिल्म है तो उसमें "पीपलि लाइव" जैसा संगीत देने की कोई गुंजाईश भी नहीं थी। फिर भी प्रीतम और शनि ने हर-संभव कोशिश की है। इसलिए मुझे "खट्टा-मीठा" से कोई शिकायत नहीं। चलिए तो इस तरह दो अच्छे और बेहतर एलबमों को सुनने के बाद इस समीक्षा पर ब्रेक लगाई जाए। अगली बार कौन-सी फिल्म होगी? यही सोच रहे हैं ना? चूँकि पिछली दो समीक्षाओं से हम बताते आ रहे हैं तो इस बार भी राज़ से पर्दा हटा हीं देते हैं। "लफ़ंगे परिंदे" या फिर "दबंग" या फिर दोनों। यह जानने के लिए अगली भेंट तक का इंतज़ार कीजिए।

आवाज़ रेटिंग्स: खट्टा-मीठा: ***१/२, पीपलि लाइव: ****१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८२- 'भूल भुलै‍या' और 'खट्टा-मीठा' फ़िल्मों में कम से कम तीन समानताएँ बताइए।

TST ट्रिविया # ८३- आपका जन्म २८ नवंबर १९६४ को हुआ था। आप ने पंजाब युनिवर्सिटी चण्डीगढ़ से म्युज़िक की मास्टर डिग्री हासिल की सुलोचना बृहस्पति की निगरानी में। आपकी माँ का नाम मोनिका है। बताइए हम किनकी बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८४- २००९ की एक फ़िल्म में रघुवीर यादव ने अपनी आवाज़ के जल्वे दिखाए थे एक गीत में। बताइए उस फ़िल्म का नाम, गीत के बोल और सहगायकों के नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "इकतारा" (वेक अप सिड)।
२. "जा रे, जा रे उड़ जा रे पंछी" (माया)।
३. इस गीत को लिखा था मशहूर शायर मजाज़ लखनवी ने जो जावेद अख़्तर के मामा थे।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, May 18, 2010

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं.. लोक, शास्त्रीय और पाश्चात्य-संगीत की मोहक जुगलबंदी का नाम है "राजनीति"

ताज़ा सुर ताल १९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों, 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़ी कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। आज जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा हम करने जा रहे हैं वह है प्रकाश झा की अपकमिंग् फ़िल्म 'राजनीति'। १० बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित प्रकाश झा ने हमेशा ही अपने फ़िल्मों में समाज और राजनीति के असली चेहरों से हमारा बावस्ता करवाया है। और 'राजनीति' भी शायद उसी जौनर की फ़िल्म है।

सुजॊय - हाँ, और सुनने में आया है कि 'राजनीति' की कहानी जो है वह सीधे 'महाभारत' से प्रेरित है। दर-असल यह एक ऐसी औरत के सफर की कहानी है जो भ्रष्टाचार से लड़ती हुईं देश की प्रधान मंत्री बन जाती हैं। कैटरीना कैफ़ ने ही यह किरदार निभाया है और ऐसा कहा जा रहा है कि यह चरित्र सोनिया गांधी से काफ़ी मिलता-जुलता है, वैसे कैटरीना का यह कहना है कि उन्होंने प्रियंका गाँधी के हावभाव को अपनाया है। ख़ैर, फ़िल्म की कहानी पर न जाते हुए आइए अब सीधे फ़िल्म के संगीत पक्ष पर आ जाते हैं।

विश्व दीपक - लेकिन उससे पहले कम से कम हम इतना ज़रूर बता दें कि 'राजनीति' में कैटरीना कैफ़ के अलावा जिन मुख्य कलाकारों ने काम किए हैं वो हैं अजय देवगन, नाना पाटेकर, रणबीर कपूर, नसीरुद्दिन शाह, अर्जुन रामपाल, मनोज बाजपयी, सारा थॊम्पसन, दर्शन जरीवाला, श्रुति सेठ. निखिला तिरखा, चेतन पण्डित, विनय आप्टे, किरण कर्मकार, दया शंकर पाण्डेय, जहांगीर ख़ान, और रवि खेमू।

सुजॊय - वाक़ई बहुत बड़ी स्टार कास्ट है। विश्व दीपक जी, अभी हाल ही में एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी 'स्ट्राइकर', आपको याद होगा। फ़िल्म कब आयी कब गयी पता ही नहीं चला, लेकिन उस फ़िल्म के संगीत में कुछ बात थी। और सब से बड़ी बात यह थी कि उसमें ६ अलग अलग संगीतकार थे और ६ अलग अलग गीतकार। 'स्ट्राइकर' फ़िल्म की हमने जिस अंक में चर्चा की थी, हमने कहा था शायद यह पहली फ़िल्म है इतने सारे संगीतकार गीतकार वाले। अब देखिए, 'राजनीति' में भी वही बात है।

विश्व दीपक - हाँ, लगता है कुछ फ़िल्मकार अब इस राह पर भी चलने वाले हैं। अच्छी बात है कि एक ही एल्बम के अंदर लोगों को और ज़्यादा विविधता मिलेगी। अगर एक ही फ़िल्म में प्रीतम, शान्तनु मोइत्रा, आदेश श्रीवास्तव, और वेन शार्प जैसे बिल्कुल अलग अलग शैली के संगीतकार हों, तो लोगों को उसमें दिलचस्पी तो होगी ही।

सुजॊय - तो चलिए, 'राजनीति' का पहला गाना सुनते हैं मोहित चौहान और अंतरा मित्रा की आवाज़ों में। गीत इरशाद कामिल का है और धुन प्रीतम की।

गीत: भीगी सी भागी सी


सुजॊय - प्रीतम और इरशाद कामिल की जोड़ी ने हमेशा हिट गीत हमें दिए हैं। इस गीत को सुन कर भी लगता है कि यह लम्बी रेस का घोड़ा बनेगा। एक बार सुन कर शायद उतना असर ना कर पाए, लेकिन दो तीन बार सुनने के बाद गीत दिल में उतरने लगती है। मेलडी के साथ साथ एक यूथ अपील है इस गीत में।

विश्व दीपक - जी हाँ, आप सही कह रहे हैं और जिस तरह से गीत को रचा गया है, वह भी काफ़ी अलग तरीके का है। अमूमन मोहित चौहान हीं अपने आलाप के साथ गीत की शुरूआत करते हैं, लेकिन इस गाने में पहली दो पंक्तियाँ अंतरा मित्रा की हैं, जो अपनी मीठी-सी आवाज़ के जरिये मोहित की पहाड़ी आवाज़ के लिए रास्ता तैयार करती हैं। और जहाँ तक मोहित की बात है तो ये किसी से छुपा नहीं है कि मोहित इरशाद-प्रीतम के पसंदीदा गायक हैं और वे कभी निराश भी नहीं करते। इस गाने में इरशाद का भी कमाल दिख पड़ता है। "संदेशा", "अंदेशा", "गुलाबी", "शराबी" जैसे एक-दूसरे से मिलते शब्द कानों को बड़े हीं प्यारे लगते हैं।

सुजॊय - चलिए इस गीत के बाद अब जो गीत हम सुनेंगे वह शायद फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है। तभी तो फ़िल्म के प्रोमोज़ में इसी गीत का सहारा लिया जा रहा है। "मोरा पिया मोसे बोलत नाही, द्वार जिया के खोलत नाही"। शास्त्रीय और पाश्चात्य संगीत का सुंदर फ़्युज़न सुनने को मिलता है इस गीत में, जिसे आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया है और गाया भी ख़ुद ही है। पार्श्व में उनका साथ दिया है शशि ने तो अंग्रेज़ी के शब्दों को अपनी मोहक आवाज़ से सजाया है रोज़ाली निकॊलसन ने। इस गीत को लिखा है समीर ने। बहुत दिनों के बाद समीर और आदेश श्रीवस्तव का बनाया गीत सुनने को मिल रहा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इन्होने ९० के दशक के अंदाज़ में नहीं, बल्कि समय के साथ चलते हुए इसी दौर के टेस्ट के मुताबिक़ इस गीत को ढाला है।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, वैसे शायद आपको यह याद हो कि कुछ सालों पहले पाकिस्तानी ग्रुप फ़्युज़न का एक गीत आया था "मोरा सैंया मोसे बोले ना"। यह गीत बाद में "नागेश कुकुनूर" की फिल्म "हैदराबाद ब्लूज़-२" में भी सुनने को मिला था और हाल-फिलहाल में इसे "अमन की आशा" में शामिल किया गया है। मेरे हिसाब से "समीर"/"आदेश श्रीवास्तव" इस गाने की पहली पंक्ति से प्रेरित हुए हैं और उन्होंने उस पंक्ति में आवश्यक परिवर्त्तन करके इस गाने को एक अलग हीं रूप दे दिया है। या ये भी हो सकता है कि यह पंक्ति किसी पुराने सूफ़ी कवि की हो, जहाँ से दोनों गानों के गीतकार प्रभावित हुए हों। मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं,इसलिए कुछ कह नहीं सकता। वैसे जो भी हो, समीर ने इस गाने को बहुत हीं खूबसूरत लिखा है और उसी खूबसूरती से आदेश ने धुन भी तैयार की है। आदेश श्रीवास्तव हर बार हीं अपने संगीत से हम सबको चौंकाते रहे हैं, लेकिन इस बार तो अपनी आवाज़ के बदौलत इन्होंने हम सबको स्तब्ध हीं कर दिया है। इनकी आवाज़ में घुले जादू को जानने के लिए पेश-ए-खिदमत है आप सबके सामने यह गीत:

गीत: मोरा पिया


सुजॊय - इसी गीत का एक रीमिक्स वर्ज़न भी है, लेकिन ख़ास बात यह कि सीधे सीधे ऒरिजिनल गीत का ही रीमिक्स नहीं कर दिया गया है, बल्कि कविता सेठ की आवाज़ में इस गीत को गवाकर दीप और डी.जे. चैण्ट्स के द्वारा रीमिक्स करवाया गया है। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि आदेश श्रीवास्तव वाला वर्जन बेहतर है। आइए सुनते हैं कविता सेठ की आवाज़ में यह गीत:

गीत: मोरा पिया मोसे बोलत नाही (ट्रान्स मिक्स)


विश्व दीपक - प्रीतम-इरशाद कामिल और आदेश-समीर के बाद अब बारी है शांतनु-स्वानंद की। शांतनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की जोड़ी भी एक कमाल की जोड़ी है, जिनका स्कोर १००% रहा है। भले इनकी फ़िल्में बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाब रही हो या असफल, इनके गीत-संगीत के साथ हमेशा ही 'ऒल इज़ वेल' रहा है। '३ इडियट्स' की अपार लोकप्रियता के बाद अब 'राजनीति' में ये दोनों वापस आए हैं और केवल एक गीत इन्होने इस फ़िल्म को दिया है। यह एक डांस नंबर है "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन"।

सुजॊय - प्रणब बिस्वास, हंसिका अय्यर और स्वानंद किरकिरे की आवाज़ों में यह गीत एक मस्ती भरा गीत है। 'लागा चुनरी में दाग' फ़िल्म के "हम तो ऐसे हैं भ‍इया" की थोड़ी बहुत याद आ ही जाती है इस गीत को सुनते हुए। स्वानंद किरकिरे क्रमश: एक ऐसे गीतकार की हैसियत रखने लगे हैं जिनकी लेखन शैली में एक मौलिकता नज़र आती है। भीड़ से अलग सुनाई देते हैं उनके लिखे हुए गीत। और भीड़ से अलग है शांतनु का संगीत भी। "मोरा पिया" में अगर शास्त्रीय संगीत के साथ पाश्चात्य का फ़्युज़न हुआ है, तो इस गीत में हमारे लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत का संगम है। कुल मिलाकर एक कर्णप्रिय गीत है पिछले गीत की तरह ही। सुनते हैं बारिश को समर्पित यह गीत और इस चिलचिलाती गर्मी में थोड़ी सी राहत की सांस लेते हैं इस गीत को सुनते हुए।

गीत: इश्क़ बरसे


सुजॊय - और अब गुलज़ार के कलम की जादूगरी। "धन धन धरती रे" गीत समर्पित है इस धरती को। वेन शार्प के संगीत से सजे इस गीत के दो रूप हैं। पहले वर्ज़न में आवाज़ है शंकर महादेवन की और दूसरी में सोनू निगम की। सोनू वाले वर्ज़न का शीर्षक रखा गया है "कॊल ऒफ़ दि सॊयल"। एक देश भक्ति की भावना जागृत होती है इस गीत को सुनते हुए। पार्श्व में बज रहे सैन्य रीदम के इस्तेमाल से यह भावना और भी ज़्यादा बढ़ जाती है। मुखड़े से पहले जो शुरुआती बोल हैं "बूढ़ा आसमाँ, धरती देखे रे, धन है धरती रे, धन धन धरती रे", इसकी धुन "वंदे मातरम" की धुन पर आधारित है। और इसे सुनते हुए आपको दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले "बजे सरगम हर तरफ़ से गूंजे बन कर देश राग" गीत की याद आ ही जाएगी।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही पकड़ा है आपने। वैसे इस गीत के बारे में कुछ कहने से पहले मैं वेन शार्प से सबको परिचित करवाना चाहूँगा। वेन शार्प एक अमेरिकन संगीतकार हैं, जिन्होंने इससे पहले प्रकाश झा के हीं "गंगाजल" और "अपहरण" में संगीत दिया है। साथ हीं साथ पिछले दिनों आई फिल्म "लाहौर" में भी इन्हीं का संगीत था। ये एकलौते अमेरिकन संगीतकार हैं जिन्हें फिल्मफ़ेयर से नवाजा गया है। अब तो ये प्रकाश झा के फेवरेट बन चुके हैं। चूँकि ये हिन्दी नहीं समझते, इसलिए इनका संगीत पूरी तरह से निर्देशक की सोच और गीतकार के शब्दों में छुपी भावना पर निर्भर करता है। इनका मानना है कि हिन्दी फिल्म-संगीत की तरफ़ इनका रूझान "ए आर रहमान" की "ताल" को सुनने के बाद हुआ। चलिए अब इस गाने की भी बात कर लेते हैं। तो इस गाने में "वंदे मातरम" को एक नया रूप देने की कोशिश की गई है। धरती को पूजने की बजाय गुलज़ार साहब ने धरती की कठिनाईयों की तरफ़ हम सबका ध्यान आकर्षित किया है और इसके लिए उन्होंने बड़े हीं सीधे और सुलझे हुए शब्द इस्तेमाल किए हैं, जैसे कि "सूखा पड़ता है तो ये धरती फटती है।" अंतिम पंक्तियों में आप "सुजलां सुफलां मलयज शीतलां, शस्य श्यामलां मातरम" को महसूस कर सकते हैं। अब ज्यादा देर न करते हुए हम आपको दोनों हीं वर्जन्स सुनवाते हैं। आप खुद हीं निर्णय लें कि आपको किसकी गायकी ने ज्यादा प्रभावित किया:

गीत: धन धन धरती (शंकर महादेवन)


गीत: धन धन धरती रिप्राईज (सोनू निगम)


"राजनीति" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
तो दोस्तों, अब आपकी बारी है, कहिए 'राजनीति' के गानें कैसे लगे आपको? क्या कुछ ख़ास बात लगी इन गीतों में? क्या आपको लगता है कि चार अलग अलग तरह के गीतकार-संगीतकार जोड़ियों से फ़िल्म के गीत संगीत पक्ष को फ़ायदा पहुँचा है? प्रकाश झा के दूसरे फ़िल्मों के गीत संगीत की तुलना में इस फ़िल्म को आप क्या मुक़ाम देंगे? ज़रूर लिख कर बताइएगा टिप्पणी में।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५५- हाल ही में ख़बर छपी थी कि रणबीर कपूर लता जी से मिलने वाले हैं किसी ख़ास मक़सद के लिए। बता सकते हैं क्या है वह ख़ास मक़सद?

TST ट्रिविया # ५६- गीतकार समीर एक इंटरविउ में बता रहे हैं - "मैने अपना गीत जब अमित जी (अमिताभ बच्चन) को सुनाया, तो वो टेबल पर खाना खा रहे थे। वो गाने लगे और रोने भी लगे, उनको अपनी बेटी श्वेता याद आ गईं।" दोस्तों, जिस गीत के संदर्भ में समीर ने ये शब्द कहे, उस गीत को आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया था। अंदाज़ा लगा सकते हैं कौन सा गीत है यह?

TST ट्रिविया # ५७- प्रकाश झा ने 'राजनीति' में गुलज़ार साहब से एक गीत लिखवाया है। क्या आप १९८४ की वह मशहूर फ़िल्म याद कर सकते हैं जिसमें गुलज़ार साहब ने प्रकाश झा के साथ पहली बार काम किया था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रशान्त तामांग।
२. प्रकाश मेहरा, जिन्होने लिखा था "जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों"।
३. फ़िल्म 'अपना सपना मनी मनी' में "देखा जो तुझे यार, दिल में बजी गिटार"।

सीमा जी, आपके दोनों जवाब सही हैं। तीसरे सवाल का जवाब तो आपने जान हीं लिया। दिमाग पर थोड़ा और जोड़ देतीं तो इस सवाल का जवाब भी आपके पास होता। खैर कोई नहीं.. इस बार की प्रतियोगिता में हिस्सा लीजिए।

Monday, February 8, 2010

"स्ट्राईकर" का संगीत निशाना है एक दम सटीक

ताज़ा सुर ताल 06/ 2010

सजीव - सुजॊय, यह बताओ तुम्हे कैरम खेलने का शौक है?
सुजॊय - अरे सजीव, यह अचानक 'ताज़ा सुर ताल' के मंच पर कैरम की बात कहाँ से आ गई। वैसे, हाँ, बचपन में काफ़ी खेला करता था गर्मियों की छुट्टियों में, लेकिन अब बिल्कुल ही बंद हो गया है।
सजीव - दरअसल, आज हम जिस फ़िल्म की बातें करेंगे और गानें सुनेंगे वो कैरम से जुड़ी हुई है।
सुजॊय - मैं समझ गया, जिस फ़िल्म के प्रोमोज़ ख़ूब आ रहे हैं इन दिनों, 'स्ट्राइकर' फ़िल्म की बात हम आज कर रहे हैं ना?
सजीव - हाँ, जिस तरह से कैरम बोर्ड में स्ट्राइकर ही खेल को शुरु से लेकर अंजाम तक लेके जाती है, यही भाव इस फ़िल्म की कहानी का अंडरकरण्ट है। 'स्ट्राइकर' कहानी है झोपड़पट्टी (स्लम) में रहने वाले एक नौजवान की जो कैरम खिलाड़ी है और जो घिरा हुआ है जुर्म और असामाजिक तत्वों से। इस फ़िल्म के शीर्षक से या इसकी कहानी को सुन कर या पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि इसके संगीत से हमें कुछ ज़्यादा उम्मीदें लगानी चाहिए, क्योंकि अंडरवर्ल्ड की कहानी में भला अच्छे संगीत की गुंजाइश कहाँ होती है! लेकिन नहीं, इस फ़िल्म के संगीत में कुछ ख़ास बातें तो ज़रूर हैं, जिन्हे आप आज सुनते हुए महसूस करेंगे।
सुजॊय - सजीव, पहली ख़ास बात तो शायद यही है कि इस फ़िल्म में ६ संगीतकारों ने संगीत दिया है और ६ गीतकारों ने गीत लिखे हैं। शायद यह पहली फ़िल्म है जिसमें इतने सारे गीतकार संगीतकार हैं। चलिए एक एक करके गीत सुनते हैं और हर गीतकार - संगीतकार जोड़ी का तुलनात्मक विश्लेषण करते हैं।
सजीव - अच्छा विचार है, शुरुआत करते हैं एक सुफ़ियाना अंदाज़ वाले गीत से जिसे सोनू निगम ने गाया है। गीतकार जीतेन्द्र जोशी और संगीतकार शैलेन्द्र बरवे। यह गीत है "छम छम जानी रातें, ये सितारों वाली रात"। एक लाइन में अगर कहा जाए तो सोनू निगम ने यह साबित किया है कि चाहे गायकों की कितनी भी बड़ी नई फ़ौज आ गया हो, लेकिन अब भी वर्सेटाइलिटी में वो अब भी नंबर-१ हैं। कुल ७ मिनट १२ सेकण्ड्स के इस गीत के शुरु के १ मिनट १० सेकण्ड्स में सोनू के बिल्कुल नए अंदाज़ के आलाप सुनने को मिलते हैं। बरवे साहब ने सोनू की आवाज़ का ऐसा नया अंदाज़ उभारा है कि अगर ना बताया जाए तो लगता ही नहीं कि सोनू गा रहे हैं। बहुत ही अच्छा व नवीन प्रयोग! और उस पर पार्श्व में धीमी लय में बजती हुई वोइलिन की तानें और तालियों की थापें। ऐसा सूफ़ियाना समां बंधा है इस गाने ने कि इसे सुनते हुए दिल मदहोश सा हो जाता है।
सुजॊय - और गीत के बोल भी उतने ही आकर्षक! कुछ कुछ 'ताल' फ़िल्म के "इश्क़ बिना क्या जीना यारों" (उसे भी सोनू ने ही गाया था), और 'सांवरिया' फ़िल्म के "युं शबनमी", या फिर 'अनवर' फ़िल्म की "मौला मेरे मौला" गीत से कुछ कुछ समानता मिलती है, लेकिन जीतेन्द्र जोशी रुमानीयत से भरे बोलों ने और रोमांटिसिज़्म के नए अंदाज़ ने गीत को एक अलग ही नज़रिया दिया है। प्रेम और एक दैवीय शक्ति की बातें हैं इस गीत में। सूफ़ी संगीत जो इस दौर की खासियत चल रही है, उसमें जीतेन्द्र और शैलेन्द्र ने प्रेम रस और आध्यात्म का ऐसा संमिश्रण तैयार किया है कि बार बार सुनने को दिल करता है। इस नए उभरते गीतकार-संगीतकार जोड़ी को हमारा तह-ए-दिल से शुभकामनाएँ। ऐसा लगता है जैसे इस साल 'बेस्ट न्युकमर' के पुरस्कार के लिए कांटे की टक्कर होने वाली है। आइए सुनते हैं इस गीत को!

गीत - छम छम जानी रातें...cham cham (striker)


सजीव - अब दूसरा गीत किसी गीतकार - संगीतकार जोड़ी का नहीं है, बल्कि गीतकार - संगीतकार - गायक की तिकड़ी का है। गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे, संगीतकार हैं स्वानंद किरकिरे, और गायक हैं स्वानंद किरकिरे। गायक और गीतकार तो पहले से ही थे, अब संगीतकार भी बन गए हैं स्वानंद इस गीत से। फ़िल्म संगीत के इतिहास में बहुत गिने चुने ऐसे कलाकार हैं जिन्होने ये तीनों भूमिकाएँ निभाए हैं। किशोर कुमार, रवीन्द्र जैन और आनंद राज आनंद तीन अलग अलग दौर को रिप्रेज़ेंट करते हैं, और इस श्रेणी में आज के दौर का यक़ीनन प्रतिनिधित्व करना शुरु कर दिया है स्वानंद ने। यह गीत है "मौला मौला" और यह भी सुफ़ी क़व्वाली रंग लिए हुए है।
सुजॊय - गीत का प्रिल्युड म्युज़िक भी अलग अलग साज़ों के इस्तेमाल से काफ़ी रंगीन बन पड़ा है, और कुल मिलाकर यह गीत भी पहले गीत की तरह सुकूनदायक है। स्वानंद ने गायकी में भी लोहा मनवाया है। गायन और संगीत तो वो कभी कभार ही करते होंगे, लेकिन जिस चीज़ के लिए वो जाने जाते हैं, यानी कि गीतकारिता, उसमें तो जैसे कमाल ही कर दिया है जब वो लिखते हैं कि "मन के चांद पे बदरी ख़यालों की, नंगे ज़हन पे बरखा सवालों की"। इन दोनों गीतों को सुनते हुए आप यह महसूस करेंगे कि इनमें साज़ों की अनर्थक भरमार नहीं है जैसा कि आज कल के गीतों में हुआ करता है। और कोई भी पीस, कोई भी साज़ अनावश्यक नहीं लगता। बहुत ही सही म्युज़िक अरेंजमेण्ट हुआ है इन दोनों गीतों में। आइए अब यह गीत सुनते हैं।

गीत - मौला मौला...maula (striker)


सुजॊय - और अब एक ऐसे गीतकार - संगीतकार की जोड़ी का नग़मा जिस जोड़ी ने हाल के कुछ सालों में कम ही सही लेकिन जब भी साथ साथ काम किया, कुछ अव्वल दर्जे के गानें हमें दिए। यह जोड़ी है गुलज़ार साहब और विशाल भारद्वाज की। 'कमीने' के शीर्षक गीत के बाद एक उसी तरह का गीत 'स्ट्राइकर' के लिए भी इस जोड़ी ने बनाया है, जिसे विशाल ने ही गाया है। "और फिर युं हुआ, रात एक ख़्वाब ने जगा दिया" एक बार फिर गुलज़ार साहब के ग़ैर पारम्परिक बोलों से सजी है।
सजीव - जहाँ तक संगीत की बात है, है तो यह एक इंडियन टाइप का नर्मोनाज़ुक गाना, लेकिन वेस्टर्ण क्लासिकल टच है इसकी धुन में भी और ऒकेस्ट्रेशन में भी। 'कमीने' का शीर्षक गीत गाने के बाद विशाल ने अपनी आवाज़ का फिर एक बार जलवा दिखाया है और अब तो ऐसा लगने लगा है कि आगे भी उनकी गायकी जारी रहेगी। एक पैशनेट रोमांटिक गीत है यह, जिसमें विशाल के कीज़ और परकुशन्स साज़ों का बहुत ही बढ़िया इस्तेमाल किया है। अच्छा सुजॊय, इससे पहले कि हम यह गीत सुनें, ज़रा इस फ़िल्म के मुख्य कलाकारों के बारे में थोड़ी सी जानकारी देना चाहोगे?
सुजॊय - बिल्कुल! चंदन अरोड़ा के निर्देशन में बनीं यह फ़िल्म है, जिसके मुख्य किरदारों में हैं आर. सिद्धार्थ, आदित्य पंचोली, अनुपम खेर, पद्मप्रिया, निकोलेट बर्ड, अंकुर विकल और सीमा बिस्वास।
सजीव - आप सभी को याद होगा कि सिद्धार्थ ने 'रंग दे बसंती' में यादगार भूमिका अदा की थी। उसके बाद उन्हे बहुत सारी हिंदी फ़िल्मों में अभिनय के ऒफ़र मिले लेकिन उन्होने किसी में भी उन्होने दिलचस्पी नहीं दिखाई, और दक्षिण के फ़िल्मों से ही जुड़े रहे। ऐसे में लगता है कि 'स्ट्राइकर' में वो नये और एक असरदार भूमिका में नज़र आएँगे। चलिए अब सुना जाए विशाल भारद्वाज की आवाज़ में यह गीत।

गीत - और फिर युं हुआ....yun hua (stiker)


सजीव - इन तीनों गीतों को सुनने के बाद एक बात तो तय है, कि इस फ़िल्म का सम्गीत लीग से हट के है, जो हो सकता है कि डिस्कोथेक्स पर न बजें लेकिन लोगों के दिलों में एक लम्बे समय तक गूंजती रहेगी। आज के दौर के अच्छे संगीत के जो रसिक लोग हैं, उनके लिए एक म्युज़िकल सौगात है इस फ़िल्म का संगीत।
सुजॊय - सहमत हूँ आप से। अब चौथे गीत के रूप में बारी है गीतकार नितिन रायकवाड़ और नवोदित संगीतकार युवन शंकर राजा की। शंकर राजा भले ही हिंदी फ़िल्म संगीत में नवोदित हो, लेकिन दक्षिण में वो लगभग ७५ फ़िल्मों में संगीत दे चुके हैं। इस गीत को युवन शंकर राजा और फ़िल्म के हीरो सिद्धार्थ ने मिल कर गाया है। यह गीत है "हक़ से, ले हक़ से, जो चाहे तू रब से", इस गीत की खासियत यह है कि दो ऐसी आवाज़ें सुनने को मिलती है जो आज तक किसी हिंदी फ़िल्मी गीत में सुनने को नहीं मिला है, और गीत है भी अलग अंदाज़ का। इन दोनों कारणों से इस गीत को सुन कर एक ताज़ेपन का अहसास होता है।
सजीव - सुजॊय, इस गीत को सुन कर क्या तुम्हे फ़िल्म 'गजनी' का वह गीत याद नहीं आता, "बहका मैं बहका"?
सुजॊय - सही कहा आपने, गायकी का अंदाज़ कुछ कुछ वैसा ही है। और सजीव, नितिन रायकवाड़ की अगर बात करें, तो उन्होने ज़्यादातर अंडरवर्ल्ड की फ़िल्मों के लिए उन्होने कई गानें लिखे हैं जिनमें उस जगत की बोली और भाषा का इस्तेमाल उन्होने किए हैं। बहुत अच्छा नाम तो उनका नहीं है क्योंकि उनके ज़्यादातर गानें उसी श्रेणी के चरित्रों के लिए लिखे गए हैं, और ऐसे गानें सामयिक तौर पर चर्चित होते हैं, फिर कहीं खो जाते हैं। लेकिन इस गीत में थोड़ी अलग हट के बात है और उनके लिखे पहले के तमाम गीतों से काफ़ी बेहतर है।
सजीव - और युवन का म्युज़िक भी तुरंत ग्रहण करने लायक तो है ही, ख़ास कर शुरूआती संगीत में एक अजीब सा आकर्षण महसूस किया जा सकता है। सच है कि युवन और सिद्धार्थ अच्छे गायक नहीं हैं, लेकिन इस गीत को जिस तरह का रफ़ फ़ील चाहिए था, वो ऐसे गायकों की गायकी से ही आ सकती थी। कहानी के नायक के चरित्र के सपनों और ख़्वाहिशों का ज़िक्र है इस गीत में। कुल मिलाकर बोल, संगीत और गायकी के लिहाज़ से इस गीत में नई बात है, और इस गीत को भी कामयाबी मिलने के अच्छी चांसेस हैं। आइए सुनते हैं।

गीत - हक़ से, ले हक़ से....haq se (striker)


सुजॊय - अब जो गीत हम आपको सुनवाने जा रहे हैं, उसे एक बार फिर से जीतेन्द्र जोशी ने लिखा है और शैलेन्द्र बरवे ने स्वरबद्ध किया है। सुनिधि चौहान की आवाज़ में यह है "पिया सांवरा तरसा रहा"। हम सुनिधि के आम तौर पर जिस तरह के जोशीले और दमदार आवाज़ को सुना करते हैं, यह गीत उस अंदाज़ के बिल्कुल विपरीत है। सुकून से भरा एक नर्म अंदाज़ का गाना है, कुछ कुछ सेमी-क्लासिकल रंग का। इस तरह के गानें वैसे सुनिधि ने पहले भी गाए हैं जैसे कि फ़िल्म 'सुर' में "आ भी जा आ भी जा ऐ सुबह", 'चमेली' में "भागे रे मन कहीं", वगेरह।
सजीव - फ़िल्म 'चलते चलते' का गीत "प्यार हमको भी है, प्यार तुमको भी है" की ट्युन को भी महसूस किया जा सकता है प्रील्युड व इंटर्ल्युड म्युज़िक में। ऒर्केस्ट्रेशन में हारमोनियम, ड्रम, बांसुरी और तबले का प्रयोग सुनाई देता है। यह फ़िल्म का एकमात्र गीत है किसी गायिका का गाया हुआ। इस गीत में एक नारी के जज़्बातों का वर्णन मिलता है कि किस तरह से वो अपने प्यार को फिर एक बार अपने पास चाहती है। शैलेन्द्र और जीतेन्द्र ने जिस तरह से पहले गीत में सोनू निगम के आवाज़ को एक नये तरीके से पेश किया था, वैसे ही इस गीत में भी सुनिधि की आवाज़ को एक अलग ही ट्रीटमेंट दिया है।
सुजॊय - हाँ, और सुनिधि ने जिस तरह से नीचे सुरों में गाते हुए एक ख़ास रोमांटिसिज़्म का परिचय दिया है, वह वाक़ई कर्णप्रिय है। और क्या मोडुलेशन है उनकी गले में। इन दोनों गीतों के लिए इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी को सराहना ज़रूर मिलनी चाहिए और मिलेगी भी। लेकिन फ़िल्हाल हम इनकी प्रतिभा को सराहते हुए सुनते हैं यह गीत।

गीत - पिया सांवरा तरसा रहा...piya sanwara (striker)


सुजॊय - और अब आज का अंतिम गीत। अब की बार इस फ़िल्म की शीर्षक गीत की बारी। इस गीत को कॊम्पोज़ किया है और गाया भी है ब्लाज़ ने। और उनके साथ मिलकर गीत को लिखा है नितिन रायकवाड़ और अनुश्का ने। रैप शैली में बना हुआ यह गीत है "एइम लगा उंगली चला"। कुछ बहुत ख़ास गीत तो नहीं लगा इसे सुनकर, बस यही कह सकते हैं कि एक ऐटिट्युड वाला गाना है, जिसमें बोलों से ज़्यादा बीट्स पर ज़ोर डाला गया है।
सजीव - सुजॊय, अगर रैप शैली में गाना बन रहा है तो इसी तरह का अरेंजमेण्ट ज़रूरी हो जाता है। अब ऐसे गीत में तो हम दूसरे पारंपरिक साज़ों का इस्तेमाल नहीं कर सकते ना?
सुजॊय - बिल्कुल सहमत हूँ आपकी बात से। और इस गीत में 'स्ट्राइकर' शब्द का प्रयोग बार बार होता है। जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि कैरम बोर्ड में जिस तरह से एक स्ट्राइकर की मदद से एक के बाद एक मोहरों को अपने काबू में किया जाता है, वैसे ही शायद फ़िल्म का नायक ज़िंदगी के कैरम बोर्ड पर भी कुछ इसी तरह का रवैया अपनाया होगा, यह तो फ़िल्म देखने पर ही पता लगेगी!
सजीव - मेरा ख़याल इस गीत के बारे में तो यही है कि इसकी तरफ़ लोगों का बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं जाएगा, लेकिन पूरे फ़िल्म में पार्श्वसंगीत की तरह इसका इस्तेमाल बार बार होता रहेगा। इस तरह के थीम सॊंग्‍ बनाई ही इसीलिए जाती है। तो अब यह गीत सुनते हैं, लेकिन उससे पहले हम अपने पाठकों से और अपने श्रोताओं से कुछ कहना चाहते हैं। अगर आपको इस शृंखला से किसी भी तरह की कोई शिकायत है, या इसके स्वरूप से कोई ऐतराज़ है, या फिर आप किसी तरह का बदलाव चाहते हैं, तो हमें अपने सुझाव बेझिझक बताएँ। हम कोशिश करेंगे अपने आलेखों में सुधार लाने की।
सुजॊय - अपने विचार टिप्पणी के अलावा हिंद युग्म के ई-मेल पते पर आप भेज सकते हैं। और आइए अब सुना जाए 'स्ट्राइकर' का शीर्षक गीत।

गीत - एइम लगा उंगली चला...aim laga (striker)


"स्ट्राईकर" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
अलग अलग संगीतकारों का ये प्रयोग बहुत बढ़िया बन पड़ा है. इससे प्रेरित होकर अन्य निर्माता निर्देशकों को भी यह राह अपनानी चाहिए, इससे प्रतिभाओं से भरे इस देश में बहुत से उभरते हुए फनकारों को अपना हुनर दिखाने का एक बड़ा माध्यम मिल सकेगा. और जब पूरी फिल्म में आपके खाते में यदि एक गीत होगा तो जाहिर है आप उस एक गीत में अपना सब कुछ झोंक देना चाहेंगें, और वही काफी हद तक इस फिल्म के संगीत के साथ हुआ है, स्वानंद का गीत तो ऑल टाइम हिट गीत होने का दम रखता है. ये संगीत प्रयोगात्मक है मगर इसका निशाना एकदम सटीक है. संगीत प्रेमियों के लिए एक सुरीला तोहफा....जरूर खरीदें.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १६- 'स्ट्राइकर' फ़िल्म में जिन ६ गीतकारों और ६ संगीतकारों ने काम किया है, उनमें से किन किन को हमने आज शामिल नहीं किया है?
TST ट्रिविया # १७ "कोई लाख करे चतुराई", "कविराजा कविता के मत अब कान मरोड़ो", "के आजा तेरी याद आई" जैसे गीतों का ज़िक्र 'स्ट्राइकर' के किसी गीत के साथ कैसे की जा सकती है?
TST ट्रिविया # १८ सोनू निगम ने स्वानंद किरकिरे का लिखा और शांतनु मोइत्र का स्वरबद्ध किया एक गीत गाया था जिसमें कोई छंद नहीं था। बिना छंद का गाना था वह। बताइए वह कौन सा गाना था?


TST ट्रिविया में अब तक -
सभी जवाब आ गए, सीमा जी को बधाई, अनाम जी आप अपने सुझाव सकारात्मक रूप से भी हमें बता सकते हैं, वैसे इस शृंखला का उद्देश्य नए गीतों को सुनना और उन पर समीक्षात्मक चर्चा करना है.

Monday, November 16, 2009

"ऑल इज वेल" है शांतनु-स्वानंद की जोड़ी के रचे "३ इडियट्स" के संगीत में

ताजा सुर ताल TST (35)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में, अब तो लगता है सीमा जी अकेली रनर रह गयी हैं, अब उन्हें चुनौती देना तो असंभव सा ही लग रहा है...


सजीव - सुजॉय, 'ताज़ा सुर ताल' में इस हफ़्ते हम चर्चा करेंगे विधु विनोद चोपड़ा की आनेवाली फ़िल्म '3 Idiots' का, और इस फ़िल्म के कुछ गीत भी सुनेंगे।

सुजॉय - मैने सुना है कि यह फ़िल्म चेतन भगत के उपन्यास Five Point Someone पर आधारित है, क्या यह सच है?

सजीव - मैने भी पहले पहले यही सुना था, लेकिन औपचारिक तौर पर शायद ऐसा नहीं है। हाल में जब इस फ़िल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी से यह सवाल किया गया था तो उन्होने साफ़ इंकार कर दिया था कि '3 Idiots' का Five Point Someone से कोई संबंध नहीं है। और जब यह सवाल चेतन भगत से किया गया तो उन्होने भी कहा कि वो इस फ़िल्म में किसी भी तरह से नहीं जुड़े, हालाँकि निर्माता ने उन्हे यह बताया है कि भले ही इस फ़िल्म की कहानी उनकी उपन्यास के प्लॊट से मिलती जुलती है लेकिन उनके उपन्यास से इस फ़िल्म का कोई संबध नहीं है।

सुजॉय - अच्छा तभी मैं कहूँ कि फ़िल्म की नामावली में कहानी के लिए राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी को क्यों क्रेडिट किया गया है। यह बात तो सच है कि चेतन भगत का नाम नामावली में कहीं नहीं आता।

सजीव - पता नहीं आमिर ख़ान, माधवन और शरमन जोशी के किरदारों के साथ हम Five Point Someone के आलोक गुप्ता, रियान ओबेरॊय और लेखक के किरदारों में कोई मेल ढ़ूंढ पाएँगे या नहीं, लेकिन मेरे ख़्याल से जिन लोगों ने भी Five Point Someone पढ़ी है, वो बार बार उन्ही चरित्रों को ढ़ूँढने की कोशिश करेंगे।

सुजॉय - इससे पहले भी चेतन भगत की एक और बेहद कामयाब उपन्यास One Night @ the Call Center को आधार बनाकर 'Hello' फ़िल्म बनाई गई थी, लेकिन फ़िल्म उतनी बुरी तरह से पिट गई जितनी उस उपन्यास को कामयाबी मिली थी। अब देखना है कि '3 Idiots' कुछ कमाल दिखाती है या उसकी भी 'Hello' जैसी हालत होती है।

सजीव - नहीं सुजॉय, मुझे लगता है कि यह फ़िल्म चलेगी, एक तो विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी की जोड़ी, उपर से आमिर ख़ान भी जुड़े हैं इस फ़िल्म में। बोमन इरानी भी हैं, नायिका हैं करीना कपूर, गीत और संगीत स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा का, यानी कि लगभग पूरी की पूरी मुन्ना भाई वाली टीम, कुछ तो कमाल ज़रूर करेगी यह फ़िल्म!

सुजॉय - मैं भी चाहता हूँ कि यह एक अच्छी फ़िल्म के रूप में सामने आए, वैसे भी कोई अच्छी फ़िल्म देखे हुए एक अरसा सा हो गया है। और बताइए कि और क्या जानकारी है इस फ़िल्म के बारे में आपके पास?

सजीव - दो एक बातें और है, लेकिन उससे पहले इस फ़िल्म का एक गीत सुन लेते हैं, फिर आगे बातें करेंगे।

गीत: All is well



सुजॉय - सोनू निगम और शान की आवाज़ें बहुत दिनों के बाद किसी गीत में सुन कर अच्छा लगा, क्यों सजीव?

सजीव - हाँ, और साथ में स्वानंद किरकिरे की आवाज़ भी थी। क्योंकि फ़िल्म के तीनों किरदार कॊलेज स्टुडेंट्स हैं तो ज़ाहिर है कि गानों में भी आज की पीढ़ी को लुभाने वाली यूथ अपील होगी। एक और ख़ास बात देखिये इस गीत में....शांतनु ने सभी वाध्य "ट्रेश" सामानों से उठाये हैं, सुनकर आर डी बर्मन की याद आ गयी.

सुजॉय - स्वानंद और शांतनु बहुत चुनिंदा काम करते हैं और दूसरों से बहुत अलग हट कर काम करते हैं। और स्वानंद तो ख़ुद भी एक उम्दा गायक भी हैं। "बावरा मन देखने चला एक सपना" गीत को भला कौन भूल सकता है! अच्छा सजीव, आप '3 Idiots' से संबंधित कुछ और जानकारी देने वाले थे न?

सजीव - हाँ, यह फ़िल्म रिलीज़ होगी क्रीस्मस के दिन, यानी कि २५ दिसंबर को। और इस फ़िल्म में काजोल नज़र आएँगी एक स्पेशल अपीयरेंस में। अच्छा, अब एक और गीत सुनते हैं सोनू निगम और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में। बोल हैं "ज़ूबी डूबी"। पहले गीत को सुनो और फिर बताओ कि इस गीत में तुम्हे कौन सी बात अच्छी लगी।

गीत: Zoobi Doobi



सुजॉय - शांतनु मोइत्र के संगीत की ख़ासीयत है कि पाश्चात्य संगीत और रीदम को भी बहुत ही सुरीले तरीके से वो पेश करते हैं। तुम्हे याद है कि नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन एक फ़िल्म आई थी 'खोया खोया चाँद'। उस फ़िल्म में शांतनु ने ५० और ६० के दशकों को जीवित कर दिया था। ख़ास कर सोनू निगम की आवाज़ में "ये निगाहें निगाहें झुकी झुकी" गीत की मुझे याद आ गई इस गीत को सुनते हुए। यह कोई साधारण युगल गीत नहीं है, बल्कि एक बहुत ही नए किस्म का रोमांस है इस गीत में। स्वानंद की पंच लाइन "जैसा फिल्मों में होता है..." कमाल है.

सजीव - हाँ, और कुछ कुछ 'लगे रहो मुन्ना भाई' के "पल पल पल हर पल" गीत से भी थोड़ा बहुत मिलता जुलता है। रीदम light western music पर आधारित है। सोनू और श्रेया ने जब भी युगल गीत गाए हैं वो हर बार मक़बूल हुए हैं, चाहे 'परिणिता' में "पिहू बोले" हो या "पल पल हर पल" हो, 'ख़ाकी' में "तेरी बाहों में हम जीते मरते रहे" हो या फिर 'फिर मिलेंगे' का "बेताब दिल है धड़कनों की क़सम", और 'क्रिश' फ़िल्म में तो कई गानें हैं इस जोड़ी के जिन्हे ख़ूब ख़ूब बजाया और सुना गया है।

सुजॉय - बिल्कुल सही बात कही आपने! चलिए जब सोनू निगम की बात चल ही रही है तो उनकी एकल आवाज़ में इस फ़िल्म का एक और गीत सुन लिया जाए, "जाने नहीं देंगे"।

गीत: जाने नहीं देंगे



सजीव - क्या गाया है सोनू ने इस गीत को। हाल के दिनों में जितने भी नए नए गायक उभरे हैं और उभर रहे हैं, उन सब से अभी भी बहुत आगे हैं पिछली पीढ़ी के गायक, और उन सब में सोनू निगम सब से आगे हैं। उनकी आवाज़ की जो रेंज है ना, कमाल है। इस गीत को सुन कर इसका भली भाँति अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

सुजॉय - सही में, चाहे बहुत लो स्केल में ठहराव वाली जगह हो या फिर बहुत ऊँचा सुर लगाने की बात, सोनू को दोनों में महारथ हासिल है। और ख़ास कर इस गीत में तो उन्होने सही में अपना लोहा मनवाया है। और सजीव, इस फ़िल्म में मैने सुना है कि कुछ नई आवाज़ें भी सुनाई देंगी, क्या ख़याल है इस बारे में आपका?

सजीव - ठीक ही सुना है तुमने। अब हम ऐसे दो गीत सुनेंगे। पहला गीत जिसे गाया है सूरज जगन और शरमन जोशी ने, और दूसरा गीत है शान और शांतनु मोइत्र का गाया हुआ। ये दोनों गीत फ़िल्म की कहानी के अनुसार सिचुएशनल होंगे, जिनका मज़ा फ़िल्म को देखते हुए ही उठाया जा सकेगा।

सुजॉय - लेकिन कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि शांतनु मोइत्र और स्वानंद किरकिरे की तरफ़ से कुछ अलग और रिफ़्रेशिंग् गीत संगीत सुनने को मिलेगा, नहीं तो हम बस एक ही तरह के गानें सुन सुन कर ऊब गए हैं।

सजीव - ज़रूर! तो चलो, अब एक के बाद एक दो गीत सुनते हैं और इस चर्चा को यहीं समाप्त करते हैं।

गीत: Give me some sunshine



गीत: बहती हवा सा



और अब बारी है ट्रिविया की

TST ट्रिविया # 28- '3 Idiots' की शूटिंग्‍ कौन से IIM (Indian Institute of Management) में हुआ है और Five Point Someone उपन्यास किस शैक्षिक संस्थान से संबम्धित है?

TST ट्रिविया # 29- 'मैं हूँ ना', 'कौन है जो सपनों में आया', 'चेहरा' और 'मुस्कान' फ़िल्मों के साथ आप '3 Idiots' को किस तरीके से जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # 30- स्वानंद किरकिरे को आकाशवाणी के किस केन्द्र में 'युवावाणी' कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला था?


३ इडियट्स अल्बम को आवाज़ रेटिंग ***1/2
फिल्म के अधिकतर गीत सिचुएशनल हैं. फिल्म के प्रदर्शन के बाद यदि फिल्म दर्शकों को पसंद आती है तो ये सभी गीत भी खूब सराहे जायेंगे, "आल इस वेल" और "जूबी डूबी" जल्दी ही लोगों को जुबान पर होंगें. "गीव मी सम सनसाईन" और "बहती हवा" बार बार सुने जाने पर और इनके प्रोमोस रीलिस होने पर अधिक पसंद किये जायेंगें, "जाने नहीं दूंगा तुझे..." लम्बे समय तक सोनू निगम की गायिकी के लिए याद किया जायेगा, और संगीत प्रतियोगिताओं ने नए गायक इसे गाकर खूब तालियाँ बटोरेंगें.

आवाज़ की टीम ने इस अल्बम को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत अल्बम को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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