Skip to main content

चाहे ज़िन्दगी से कितना भी भाग रे...सी रामचंद्र ने रचा ये गीत राज कपूर के लिए


आज हम आपको राज कपूर द्वारा अभिनीत, सी. रामचन्द्र का संगीतबद्ध और मन्ना डे का गाया यही गीत सुनवाएँगे। सी. रामचन्द्र, मुकेश की गायकी को पसन्द नहीं करते थे, इसके बावजूद राज कपूर के कारण उन्होने मुकेश को फिल्म में शामिल किया। परन्तु उन्होने मुकेश से फिल्म के हल्के-फुल्के गीत गवाये और गम्भीर गीत मन्ना डे के हिस्से में आए।


ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 808/2011/248

शृंखला ‘आधी हक़ीक़त आधा फसाना’ की आठवीं कड़ी में एक बार पुनः आपका स्वागत है। यह श्रृंखला हमने फ़िल्मकार राज कपूर के ८७ वें जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में आपके लिए आयोजित किया है। राज कपूर सही अर्थों में स्वतंत्र भारत के सपनों के सौदागर थे। उनकी फिल्मों के कथानक और चरित्र सामाजिक यथार्थ की भूमि में जन्म लेते थे, परन्तु उनका ऊपरी स्वरूप फंतासी की तरह दिखता था। जीवन की विसंगतियों से भाग कर आए हुए दर्शक फंतासी के नेत्ररंजक स्वरूप में मनोरंजन पाते और प्रबुद्ध दर्शक सामाजिक सन्दर्भ और पात्रों की मानवीयता से अभिभूत हो जाते। हक़ीक़त और फसाना का यह सन्तुलन राज कपूर की निर्मित फिल्मों के साथ-साथ अभिनीत फिल्मों में भी उपस्थित रहा है।

आज हम आपको राज कपूर की अभिनीत फिल्म ‘शारदा’ में उनके चरित्र के माध्यम से इस सन्तुलन-प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे। फिल्म ‘शारदा’ १९५७ में बनी थी, जिसके निर्माता-निर्देशक एल.बी. प्रसाद और संगीतकार थे सी. रामचन्द्र। परन्तु फिल्म के गीत-संगीत से पहले थोड़ी चर्चा फिल्म के कथानक और चरित्रों को रेखांकित करना आवश्यक है। भारतीय सामाजिक सम्बन्धों की पड़ताल करती इस फिल्म की कथा सदाशिव ब्राह्मण और पी. शेट्टी ने, पटकथा इन्दरराज ने तथा संवाद विश्वामित्र आदिल ने लिखे थे। फिल्म की पटकथा के अनुसार वास्तव में यह नारी चरित्र प्रधान फिल्म है। फिल्म में नायिका शारदा की भूमिका अत्यन्त संवेदनशील अभिनेत्री मीना कुमारी द्वारा अभिनीत की गई थी। नायिका को भारतीय आध्यात्म और भारतीय परम्परा के के प्रति गहरी आस्था है। एक प्राकृतिक चिकित्सा आश्रम में सेविका के रूप में कार्य करने के दौरान वह चंचल, किन्तु निश्छल हृदय नायक शेखर (राज कपूर) के प्रति आकर्षित होती है। विदेश यात्रा के दौरान विमान दुर्घटना में शेखर की मृत्यु के समाचार और सामाजिक मर्यादा से बँधी शारदा के सामने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती है कि अगले क्षण नायक की प्रेमिका से विमाता (सौतेली माँ) बन जाती है। उधर नायक विमान दुर्घटना से जीवित बच कर वापस लौट आता है। वापस लौटने पर शेखर के सामने शारदा प्रेमिका से माँ की भूमिका में बदली हुई नज़र आती है। शेखर इस विसंगति को सह नहीं पाता और शराब में डूब जाता है। राज कपूर ने फिल्म में अपने चरित्र की विविधता को कुशलता से जिया है। नायिका प्रधान कथानक होने के बावजूद राज कपूर ने प्रेमिका और माँ के अन्तर्द्वंद्व को जिस खूबी से प्रस्तुत किया, उसने फिल्म ‘शारदा’ को छठें दशक की श्रेष्ठतम फिल्मों की श्रेणी में ला दिया।

फिल्म ‘शारदा’ के गीतकार राजेन्द्र कृष्ण और संगीतकार सी. रामचन्द्र थे। इस दौर में संगीतकार सी. रामचन्द्र के प्रतिद्वंद्वी शंकर-जयकिशन और ओ.पी. नैयर, तत्कालीन जनरुचि के अनुकूल संगीत-रचना कर रहे थे। इसके बावजूद उन्होने फिल्म ‘शारदा’ में अविस्मरणीय संगीत रचे। हल्की-फुल्की धुन में- ‘जप जप जप रे...’, कीर्तन शैली में- ‘निखिल भुवन पालम...’, लता मंगेशकर के स्वर में कर्णप्रिय गीत- ‘ओ चाँद जहाँ वो जाएँ...’ आदि अपने समय के अत्यन्त लोकप्रिय गीतों की सूची में रहे हैं। परन्तु शब्दों के प्रेरक भाव, आकर्षक धुन और फिल्म के प्रसंग की सार्थक अभिव्यक्ति करता गीत- ‘चाहे ज़िन्दगी से कितना भी भाग रे...’ फिल्म का एक आदर्श गीत सिद्ध हुआ। आज हम आपको राज कपूर द्वारा अभिनीत, सी. रामचन्द्र का संगीतबद्ध और मन्ना डे का गाया यही गीत सुनवाएँगे। सी. रामचन्द्र, मुकेश की गायकी को पसन्द नहीं करते थे, इसके बावजूद राज कपूर के कारण उन्होने मुकेश को फिल्म में शामिल किया। परन्तु उन्होने मुकेश से फिल्म के हल्के-फुल्के गीत गवाये और गम्भीर गीत मन्ना डे के हिस्से में आए। लीजिए, फिल्म ‘शारदा’ का यह गीत आप भी सुनिए-



क्या आप जानते हैंसंगीतकार सी. रामचन्द्र, मुकेश की गायकी को भले ही पसन्द न करते रहे हों, परन्तु अपने आराध्य साईं बाबा के लिए जो गैर-फिल्मी गीत उन्होने संगीतबद्ध किया था, वह मुकेश से ही गवाया था।

पहचानें अगला गीत -इस गीत के संगीतकार पहले शंकर जयकिशन के सहायक थे, मुखड़े में शब्द है "चमन"
१. फिल्म का नाम बताएं - २ अंक
२. संगीतकार बताएं - ३ अंक


पिछले अंक में -

खोज व आलेख-
कृष्णमोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें +91-9871123997 (सजीव सारथी) या +91-9878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Comments

कहाँ व्यस्त हो गईं इन्दु जी?
यह बताइए मेरा कल वाला कमेन्ट कहाँ गया.मैंने फिल्म,गाना और संगीतकार तीनो को पहचान लिया था. अफ़सोस!
आज की पोस्ट मे उत्तर को लेकर कोई रिस्पोंस न देखकर कल की पोस्ट पर गई तो वहाँ किसी का कोई कमेन्ट नही दिख रहा. 'स्पैम' मे तो नही चला गया कहीं देखिये प्लीज़.

राम गांगुली जी शंकर जयकिशन जी के असिस्टेंट रहे थे. और यही आज का उत्तर है.लोक कर दीजिए मेरे तो आग लग गई सपनो मे अपने नम्बर यूँ डूबते देख हा हा हा
अब......देखो
ऐसिच हूँ मैं तो
मैं नीमच से अभी हल आई ही हूँ.मधुमेह का असर कोर्निया या रेटिना पर तो नही होने लगा बस यही चेक करवाना था. डॉक्टर को 'आँखे दिखाई' उन्होंने 'आँखों मे झाँका' और कहा -'तेरे मस्त मस्त दो नैन ...इनमे कोई प्रोब्लम नही है हा हा हा '
मैं तो ये भागी 'आँखे चुरा कर' हा हा सोरीईईईईईईईई
arre! mera kment fir gayb! dekhiye pliz 'spam' me pda ro rha hoga.use sahi jagah chipka dijiye n
Amit said…
इंदू जी बिलकुल सही कह रहीं हैं. दरअसल उनसे डरकर सारे कमेन्ट स्पैम में चले गए. इंदू जी देखिये मैं सबको वापस बुला लाया.
अवध जी का एक कमेन्ट भी स्पैम में था.

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

बिलावल थाट के राग : SWARGOSHTHI – 215 : BILAWAL THAAT

स्वरगोष्ठी – 215 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 2 : बिलावल थाट 'तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...'   ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। व