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बुधवार, 22 जनवरी 2014

रागमाला गीत -2 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट





प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट


रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 2



राग भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुलतानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस की छटा बिखेरता रागमाला गीत


दो उस्तादों के गायन और वादन की अनूठी जुगलबन्दी

फिल्म : गूँज उठी शहनाई

संगीतकार : बसन्त देसाई

गायक : उस्ताद अमीर खाँ

शहनाई वादक : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन 






रविवार, 17 मार्च 2013

Raagmaala 2 उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के जन्मदिवस पर विशेष



स्वरगोष्ठी – 112 में आज


रागों के रंग रागमाला गीत के संग - 2

फिल्म 'गूँज उठी शहनाई 'के रागमाला गीत में दो उस्तादों की अनूठी जुगलबन्दी


आज ‘स्वरगोष्ठी’ के एक ताज़ा अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में एक और रागमाला गीत लेकर उपस्थित हुआ हूँ। आज का यह रागमाला गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। यह गीत दो कारणों से आज के अंक को विशेष बनाता है। पहली विशेषता यह है कि इसे भारतीय संगीत-जगत के दो दिग्गज उस्तादों- उस्ताद अमीर खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने जुगलबन्दी के रूप में प्रस्तुत किया है। दूसरी विशेषता यह है कि आगामी गुरुवार, 21 मार्च को शहनाई-वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की 98वीं जयन्ती है। रागमाला का यह गीत आज हम उन्हीं उस्ताद शहनाईनवाज़ को स्वरांजलि-स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं।


बसन्त देसाई
र्ष 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ का कथानक एक प्रेम त्रिकोण पर आधारित है, परन्तु फिल्म का नायक किशन (राजेन्द्र कुमार) सांगीतिक प्रतिभा से सम्पन्न कुशल शहनाईवादक भी है। फिल्म में किशन की बाल्यावस्था में संगीत के प्रति ललक और संगीत-गुरु रघुनाथ महाराज (अभिनेता उल्हास) के मार्गदर्शन से एक कुशल शहनाईवादक बनने की दास्तान है। फिल्म के संगीतकार बसन्त देसाई ने इस फिल्म में एक से बढ़ कर एक राग आधारित गीतों का संयोजन किया था। चूँकि फिल्म का कथानक एक शहनाईवादक के चरित्र पर केन्द्रित है इसलिए बसन्त देसाई ने अपने समय के दिग्गज शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और वाराणसी के ही युवा शहनाईवादक रामलाल को भी फिल्म से सम्बद्ध किया गया था। यही नहीं, संगीत के इन्दौर घराने के संस्थापक और वाहक उस्ताद अमीर खाँ को फिल्म में गायन के लिए राजी कर लिया गया। संगीतकार बसन्त देसाई स्वयं भी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अत्यन्त कुशल थे और जब उनके साथ जब इन दिग्गज कलाकारों का साथ मिला तब फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ के लिए कई अविस्मरणीय और कालजयी गीतों की रचना हुई। इन्हीं गीतों में से एक रागमाला गीत भी है, जिसकी चर्चा आज हम आपसे कर रहे हैं।

फिल्म में इस रागमाला गीत का उपयोग उस प्रसंग में किया गया है, जब एक अनाथ बालक किशन, मन्दिर के एक कोने में छिप कर, देव-प्रतिमा के सम्मुख साधनारत संगीत के प्रकाण्ड पण्डित रघुनाथ महाराज के स्वरों का अपनी शहनाई पर अनुकरण करने का प्रयत्न करता है। किशन की शहनाई के स्वर कानों में पड़ते ही पण्डित रघुनाथ महाराज अपने उस एकलव्य जैसे शिष्य की प्रतिभा को पहचान लेते हैं और उसे अपना शिष्य बना कर विधिवत संगीत की शिक्षा देने लगते हैं। आज का रागमाला गीत इसी प्रसंग से जुड़ा है। यह गीत, गायन और शहनाईवादन की जुगलबन्दी के रूप में है। गुरु रघुनाथ महाराज गायन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने कण्ठस्वर दिया है, जब कि शिष्य किशन के लिए उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई बजाई है। गीत में क्रमशः भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुल्तानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस रागों का प्रयोग किया गया है। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार ही यह क्रम रखा गया है। पहला राग भटियार सूर्योदय का राग है। समय के अनुसार ही क्रमशः आगे बढ़ते हुए मध्यरात्रि के राग चन्द्रकौंस से गीत को विराम दिया गया है।

उस्ताद अमीर खाँ
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
इस रागमाला गीत का आरम्भ मन्दिर के दृश्य से होता है, जहाँ देव-प्रतिमा के सम्मुख गुरु रघुनाथ महाराज संगीत-साधना के अन्तर्गत प्रातःकाल के राग भटियार की एक रचना- ‘निसदिन न बिसरत मूरत तिहारी...’ का गायन कर रहे हैं। वहीं मन्दिर के दूसरे कोने में बालक किशन शहनाई पर रघुनाथ महाराज के स्वरों की अनुकृति करने का प्रयास करता है। महाराज के कानों में अचानक शहनाई का मधुर स्वर पड़ता है और वे किशन के पास जाकर उसकी प्रतिभा की सराहना करते हैं और उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार कर लेते हैं। अगला राग रामकली है, जिसे महाराज के घर के अभ्यास कक्ष में फिल्माया गया है। इस प्रसंग में महाराज पहले राग रामकली में एक पंक्ति गाते हैं और फिर किशन उन्हीं स्वरों को शहनाई पर बजाता है। अचानक गुरु महाराज राग देशी की सरगम गुनगुनाते है। देशी के बाद राग शुद्ध सारंग के स्वरों में आलाप और शहनाईवादन साथ-साथ होता है। इसके बाद महाराज राग मुल्तानी की एक बन्दिश- ‘बलमा तुम संग लागली प्रीत...’ गाते हैं। मुल्तानी के बाद राग यमन की बारी आती है। इस राग की एक प्रचलित बन्दिश ‘अवगुण न कीजिए गुणी संग...’ के साथ महाराज किशन से कुछ सरल तानों का अभ्यास कराते हैं। अचानक गुरु महाराज राग बागेश्री का सरगम आरम्भ कर देते हैं। रागमाला गीत के इस भाग में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने कुछ जटिल ताने बजाई हैं। अन्त में राग चन्द्रकौंस का तराना प्रस्तुत किया जाता है और गीत के इसी भाग में किशन एक परिपक्व युवक (अभिनेता राजेन्द्र कुमार) और शहनाईवादक के रूप में परिलक्षित होता है। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ का आठ रागों में गुथा हुआ यह रागमाला गीत सुनवाते हैं। इस गीत में उस्ताद अमीर खाँ के कण्ठस्वर और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई की जुगलबन्दी की गई है।


रागमाला गीत : भटियार, रामकली, देशी, शुद्ध सारंग, मुल्तानी, यमन, बागेश्री और चन्द्रकौंस : उस्ताद अमीर खाँ और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के रागमाला में पिरोए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बहार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म संगीत सम्राट तानसेन। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने केवल दूसरे प्रश्न का ही सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें एक अंक ही मिलते हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

इसी अंक की पहेली के साथ वर्ष 2013 की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) भी पूर्ण हुई है। इस श्रृंखला में सर्वाधिक 16.5 अंक प्राप्त कर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने प्रथम स्थान, 16 अंक पाकर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने द्वितीय स्थान और 15.5 अंक पाकर बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने तृतीय स्थान प्राप्त किया है। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले अंक से हमने आपके अनुरोध पर ‘रागमाला’ शीर्षक से लघु श्रृंखला आरम्भ की है। परन्तु अगला अंक रंग और उल्लास के पर्व, होली से ठीक पहले पड़ने वाले रविवार को प्रकाशित होगा, इसलिए ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक रस-रंग से भरपूर होली पर केन्द्रित होगा। भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों में होली का चित्रण जिस प्रकार हुआ है, अगले अंक में हम ऐसे ही कुछ उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। रविवार, 24 मार्च को हम इस विशेष अंक के साथ उपस्थित होंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


रविवार, 6 जनवरी 2013

नये वर्ष में नई लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ की शुरुआत



स्वरगोष्ठी – 103 में आज
राग और प्रहर – 1

'जागो मोहन प्यारे...' राग भैरव से आरम्भ दिन का पहला प्रहर 


‘स्वरगोष्ठी’ के नये वर्ष के पहले अंक में कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमी पाठकों और श्रोताओं का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आज से हम आरम्भ कर रहे हैं, एक नई लघु श्रृंखला- ‘राग और प्रहर’। भारतीय शास्त्रीय संगीत, विशेषतः उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। इस श्रृंखला में हम आपसे राग और समय के अन्तर्सम्बन्धों पर आपसे चर्चा करेंगे।

सूर्योदय : छायाकार -नारायण द्रविड़
काल-गणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। ऋतु-प्रधान रागों की चर्चा आपसे हम आगे किसी श्रृंखला में करेंगे, परन्तु इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की आपसे चर्चा करेंगे।

दिन और रात के आठ प्रहरों में सबसे पहला प्रहर प्रातः सूर्योदय के सन्धिप्रकाश बेला से लेकर प्रातः नौ बजे तक का माना जाता है। इस अवधि में मानव के मन और शरीर को नई ऊर्जा के संचार की आवश्यकता होती है। रात्रि विश्राम के बाद तन और मन अलसाया हुआ होता है। ऐसे में कोमल स्वरों वाले राग स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार करते है। इस प्रहर में भैरवी, भैरव, अहीर भैरव, आसावरी, रामकली, बसन्त मुखारी आदि रागों का गायन-वादन उपयोगी माना जाता है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपको दिन के पहले प्रहर के इन रागों में से सबसे पहले राग आसावरी सुनवाते हैं। परम्परागत रूप से सूर्योदय के बाद गाये-बजाए जाने वाले इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसका वादी धैवत और संवादी गान्धार स्वर होता है। अब हम आपके लिए संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा।


राग आसावरी : ‘सजन घर लागे...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर



सूर्योदय के बाद, अर्थात दिन के पहले प्रहर में गाया-बजाया जाने वाला एक और राग है- ‘रामकली’। भैरव थाट के इस राग में दोनों मध्यम और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इस राग में प्रयोग किये जाने वाले कोमल स्वर हैं, ऋषभ, धैवत और निषाद। तीव्र मध्यम स्वर सन्धिप्रकाश के वातावरण की सार्थक अनुभूति कराता है। आज के अंक में हम आपके लिए पण्डित रविशंकर का सितार पर बजाया राग रामकली प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले दिनों भारतीय संगीत की समृद्ध परम्परा को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने वाले इस महान कलासाधक का निधन हो गया था। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक भारतीय संगीत की आध्यात्मिकता और शास्त्रीयता, पाश्चात्य संगीत जगत के लिए एक जटिल प्रक्रिया थी। पण्डित जी ने आरम्भ में अपनी विदेश यात्राओं के दौरान इस विरोधाभास का अध्ययन किया और फिर अपनी कठोर साधना से अर्जित संगीत-ज्ञान को विदेशों में इस प्रकार प्रस्तुत किया कि पूरा यूरोप ‘वाह-वाह’ कर उठा। 7 अप्रेल, 1920 को तत्कालीन बनारस (अब वाराणसी) के बंगाली टोला नामक मुहल्ले में एक संगीत-प्रेमी परिवार में जन्मे रवीन्द्रशंकर चौधरी (बचपन में रखा गया पूरा नाम) का गत मास निधन हो गया था। इस महान कलासाधक को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आपको उन्हीं का बजाया राग रामकली सुनवा रहे हैं।


राग रामकली : मध्य व द्रुत लय की दो रचनाएँ : पण्डित रविशंकर



प्रथम प्रहर के अन्तिम चरण में प्रयोग किया जाने वाला एक बहुत ही मोहक किन्तु आजकल कम प्रचलित राग है- ‘बसन्त मुखारी’ है। आमतौर पर संगीत-साधक इस राग का प्रयोग प्रथम प्रहर की समाप्ति से कुछ समय पूर्व करते हैं। कभी-कभी दूसरे प्रहर के आरम्भ में भी इस राग का प्रयोग किया जाता है। भैरव थाट और सम्पूर्ण जाति के इस राग में ऋषभ, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग बसन्त मुखारी के पूर्वांग में भैरव और उत्तरांग में भैरवी परिलक्षित होता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। आज हम आपको राग बसन्त मुखारी राग में निबद्ध भक्ति और श्रृंगार रस से मिश्रित एक रचना सुनवाते हैं। इस रचना को सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज ने स्वर दिया है, जिसके बोल हैं- ‘जल जमुना भरने निकसी गोरी...’।


राग बसन्त मुखारी : ‘जल जमुना भरने निकसी गोरी...’ : पण्डित जसराज



आज हमारी चर्चा में प्रथम प्रहर के राग हैं। विद्वानों का मत है कि सन्धिप्रकाश, अर्थात सूर्योदय की लालिमा आकाश में नज़र आने से लेकर सूर्योदय के बाद तक इस प्रहर के प्रमुख राग 'भैरव' का गायन-वादन मुग्धकारी होता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्म-गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार हो चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बांग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें ‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरव : फिल्म जागते रहो : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 103वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



1- संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?


2- इस गीत के गायक-गायिका कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 101वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर के स्वरों में राग केदार पर आधारित फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।



झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक से हमने ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से यह नवीन श्रृंखला आरम्भ की है। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे। दिन के इस दूसरे प्रहर की अवधि प्रातः 9 से मध्याह्न 12 बजे के बीच माना जाता है। आप दूसरे से लेकर आठवें प्रहर के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध रचनाओं के बारे में अपनी फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।



कृष्णमोहन मिश्र 


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