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Saturday, July 19, 2014

"मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों?" वाक़ई कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ हमारे आसपास है...


एक गीत सौ कहानियाँ - 36
 

‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी जिन्दगी से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 36वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' की ग़ज़ल "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." के बारे में



माल अमरोही निर्देशित 1983 की फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से पिटी पर हेमा मालिनी-धर्मेन्द्र अभिनीत इस फ़िल्म को इसकी पटकथा, संवाद और निर्देशन के लिए आज भी याद किया जाता है और याद किया जाता है इस फ़िल्म के सुमधुर गीतों और ग़ज़लों को भी। ख़य्याम द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म के गीतों को लिखने का कार्यभार जाँनिसार अख़्तर को सौंपा गया था, पर सभी गीत पूरे होने से पहले ही वो चल बसे जिस वजह से फ़िल्म के शेष दो गीत शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली से लिखवाये गये। लता मंगेशकर का गाया "ऐ दिल-ए-नादान..." सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा इस फ़िल्म का, जो कि ख़य्याम साहब की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है और लता जी के पसन्दीदा गीतों में भी इसका शुमार होता है। लता की ही आवाज़ में "जलता है बदन..." भी काफ़ी सुना गया, पर "ख़्वाब बन कर कोई आयेगा..." ज़्यादा चर्चा में नहीं रहा। अन्य दो गीत "हरियाला बन्ना आया रे..." (आशा भोसले, जगजीत कौर) और "ऐ ख़ुदा शुक्र तेरा..." (महेन्द्र कपूर, भूपेन्द्र) भी ज़्यादा ध्यान आकर्षित नहीं कर पाए। पर इस फ़िल्म में दो ग़ज़लें ऐसी थीं जिनमें एक अलग ही बात थी। अलग बात इसलिए कि इनके गायक थे कब्बन मिर्ज़ा जिन्हें उस समय कोई नहीं जानता था और उनकी अलग हट कर आवाज़ ने इन दो ग़ज़लों को एक अलग ही जामा पहनाया। "आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे..." और "तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है..." गाकर कब्बन मिर्ज़ा ने बहुत वाह-वाही लूटी। निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखे फ़िल्म के दो गीत थे "हरियाला बन्ना आया रे..." और "तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है..."। 

कब्बन मिर्ज़ा
अब आते हैं कब्बन मिर्ज़ा पर। आख़िर कौन थे ये जनाब? इनकी आवाज़ तो इससे पहले किसी ने नहीं सुनी। और न ही इसके बाद फिर कभी सुनाई दी। कहाँ से आये और कहाँ ग़ायब हो गये पता ही नहीं चला। इन्टरनेट पर इनके बारे में बस यही लिखा गया है कि ये 'विविधभारती' के उद्‍घोषक हुआ करते थे। इसलिए कब्बन मिर्ज़ा के जीवन से जुड़ी और भी कुछ बातें मालूम करने के लिए जब मैंने 'विविधभारती' के वर्तमान लोकप्रिय उद्‍घोषक यूनुस ख़ान का सहारा लिया तो कब्बन साहब के बारे में कुछ और बातें जानने को मिली। कब्‍बन मिर्जा का ताल्‍लुक लखनऊ से था। वो 'विविधभारती' में उदघोषक नहीं बल्कि 'प्रोग्राम असिस्‍टेन्‍ट' थे। और आवाज़ अच्छी होने की वजह से प्रोग्राम भी करते थे। 'संगीत सरिता' से वो शुरूआत से जुड़े रहे थे। मुहर्रम में मर्सिए वग़ैरह गाते थे। 'विविधभारती' में उनका सबसे अहम योगदान रहा 'संगीत सरिता' का शुरूआती स्‍वरूप और उसे लोकप्रियता देना, जिसमें पहले किसी राग के बारे में बताया जाता, फिर उसका चलन, और फिर उस पर आधारित शास्‍त्रीय और फिल्‍मी रचना। ये क्‍लासिकल स्‍वरूप उन्‍हीं ने बनाया। बाद में इसे इंटरव्‍यू बेस्‍ड कर दिया गया। वो अस्‍सी के दशक के दौरान विविधभारती से रिटायर हुए। और फिर मुंबई के उपनगर मुंब्रा में रहते रहे। उनके एक (या शायद दोनों) बेटे सऊदी अरब के एक मशहूर रेडियो स्‍टेशन से जुड़े हैं। इन्टरनेट पर उनका जन्म 1937-38 बताया गया है। उन्हें गले का कैन्सर हो गया था पर उनकी मृत्यु के बारे में ठीक-ठीक कहीं कुछ लिखा नहीं गया है, पर कुछ वेबसाइट में 'Late Kabban Mirza' कह कर उल्लेख है।

ख़य्याम
अब सवाल यह है कि फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के इन दोनो ग़ज़लों को गाने के लिए कब्बन मिर्ज़ा कैसे चुने गये। 'रज़िया सुल्तान' फ़िल्म दिल्ली की एकमात्र महिला सुल्तान रज़िया सुल्तान (1205-1240) के जीवन पर आधारित थी और इसमें शामिल है उनके ऐबिसिनियन ग़ुलाम जमाल-उद्दीन याकुत (धर्मेन्द्र द्वारा निभाया चरित्र) के साथ प्रेम-सम्बन्ध भी। जमाल एक बहुत बड़ा सिपहसालार है, जो जब भी कभी वक़्त मिलता है, थोड़ा गा लेता है अपनी मस्ती में, पर वो कोई गायक नहीं है। ऐसे किरदार के पार्श्वगायन के लिए कमाल अमरोही ने ख़य्याम के सामने अपनी फ़रमाइश रख दी कि उन्हें ये दो ग़ज़लें किसी ऐसे गायक से गवानी है जो गायक नहीं है पर थोड़ा बहुत गा लेता है। ऐसे में ख़य्याम साहब के लिए बड़ी कठिनाई हो गई कि उन्हें कोई इस तरह का गायक न मिले। अब यह हुआ कि पूरे हिन्दुस्तान से 50 से भी ज़्यादा लोग आये और सब आवाज़ों में यह हुआ कि लगा कि वो सब मंझे हुए गायक हैं। किसी की भी आवाज़ में वह बात नज़र नहीं आयी जिसकी कमाल अमरोही को तलाश थी। ऐसे ही कब्बन मिर्ज़ा भी आये अपनी आवाज़ को आज़माने। ख़य्याम, उनकी पत्नी और गायिका जगजीत कौर और कमाल अमरोही, तीनो ने उन्हें सुना। जब कब्बन मिर्ज़ा से यह पूछा गया कि उन्होंने कहाँ से गायन सीखा, तो उनका जवाब था कि उन्होंने कहीं से नहीं सीखा। किस तरह के गाने आप गा सकते हैं, पूछने पर कब्बन साहब लोकगीत सुनाते चले जा रहे थे। वो तीनों मुश्किल में पड़ गये क्योंकि उनकी ज़रूरत थी एक ऐसे शख्स की जो गायक न हो पर ग़ज़ल गा सके! अत: कब्बन मिर्ज़ा भी रिजेक्ट हो गये। पर अगली सुबह कमाल साहब का ख़य्याम साहब को टेलीफ़ोन आया कि आप फ़्री हैं तो अभी आप तशरीफ़ लायें। नाश्ता उनके साथ हुआ। नाश्ता हुआ तो कमाल साहब कहने लगे कि रात भर मुझे नींद नहीं आई, यह जो आवाज़ है जो हमने कल सुनी कब्बन मिर्ज़ा की, यही वह आवाज़ है जिसकी तलाश मैं कर रहा था। ख़य्याम चौंक कर बोले, "कमाल साहब, लेकिन उनको गाना तो आता नहीं!" तो कमाल अमरोही ने ख़य्याम का हाथ पकड़ कर बोले, "ख़य्याम साहब, आप मेरे केवल मौसीकार ही नहीं हैं, आप तो मेरे दोस्त भी हैं। प्लीज़ आपको मेरे लिए यह करना है, मुझे इन्ही की आवाज़ चाहिये।" फिर क्या था, शुरू हुई कब्बन मिर्ज़ा की संगीत शिक्षा। ख़य्याम साहब ने उन्हे तीन-चार महीने स्वर और ताल का ज्ञान दिलवाया और उसके बाद गाने की रेकॉर्डिंग शुरू हुई। अक्सर यह होता है कि रेकॉर्डिंग के वक़्त म्युज़िक डिरेक्टर रेकॉर्डिंग करवाता है अपने रेकॉर्डिस्ट से, और असिस्टैण्ट जो होते हैं वो ऑरकेस्ट्रा संभालते हैं। पर उस दिन क्योंकि कब्बन मिर्ज़ा नये थे, गा नहीं पा रहे थे, इसलिए ख़य्याम साहब ने जगजीत कौर को भेजा रेकॉर्डिंग पर, असिस्टैण्ट को भी अन्दर भेजा, और ख़ुद कंडक्ट किया। इस तरह से रेकॉर्ड हुआ कब्बन मिर्ज़ा का गाया "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..."।

निदा फ़ाज़ली
शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली के लिए भी यह ग़ज़ल उतनी ही महत्वपूर्ण थी। उन्हीं के शब्दों में - "देखिये, पटना, बिहार, अज़ीमाबाद के एक शायर हुए हैं शाद अज़ीमाबादी। उनकी एक लाइन है कि "मैं ख़ुद आया नहीं, लाया गया हूँ"। जैसा कि मैंने पहले कहा कि चॉयस का इख़्तियार ज़िन्दगी में होता नहीं है। जहाँ आप पैदा हुए, वह आपका परिवार, उस परिवार की जो भाषा वही आपकी भाषा, वह परिवार जिस मोहल्ले में, वही आपका मोहल्ला, वह मोहल्ला जिस नगर में, वह आपका नगर; मेरे साथ भी यही हुआ कि बिना पूछे पैदा कर दिया गया, और मैं ये तमाम बोझ लिए गधे की तरह ज़िन्दगी के सफ़र में घूमता रहा। जब घर छीना गया तो घर की तलाश में पूरे देश में भटकता रहा, यह भी बेवकूफ़ी थी। मालूम पड़ा एक पड़ाव बम्बई आया है, उस ज़माने में धरमवीर भारती एक यहाँ थे, उनके 'धर्मयुग' में लिखना शुरू कर दिया। फिर 'ब्लिट्ज़' में लिखना शुरू कर दिया। एक दिन बेघर एक शख़्स जिसका नाम निदा फ़ाज़ली था, उसके लिए मैसेज रखी हुई थी हर जगह, जहाँ वह काम कर रहा था थोड़ा-थोड़ा, कहीं 'धर्मयुग' में पड़ी हुई है, कहीं 'ब्लिट्ज़' में पड़ी हुई है, कहीं किसी रेडियो स्टेशन में पड़ी हुई है, और उस मैसेज में लिखा हुआ था "मैं आप से मिलना चाहता हूँ, आप मुझसे आ कर मिलिये, मुझे आप से कुछ काम लेना है - कमाल अमरोही"। मैंने सोचा कि मेरा कमाल अमरोही से क्या काम हो सकता है! मैं उनसे मिलने चला गया। कमाल साहब मिले करीब 2 बजे, वो स्टाइलिश आदमी थे कमाल साहब, वो एक लफ़्ज़ अंग्रेज़ी का नहीं बोलते थे, और वो भाषा बोलते थे जो आज से 50 साल पहले अमरोहा में बोली जाती थी। मैं वह भाषा बम्बई आकर भूल गया। मैंने कहा, "कमाल साहब, आदाब अर्ज़ है, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है"। बोले, "तशरीफ़ रखिये, मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है कि मुझे एक मुकम्मल शायर की ज़रूरत है"। मैंने कहा कि मैं हाज़िर हूँ और इस इज़्ज़त-अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया कि आप मुझे मुकम्मल शायर समझ रहे हैं। बोले, "जी, मुझे आप से कुछ नग़मात तहरीर करवाने है"। मैं कहा कि मैं हाज़िर हूँ साहब, आप बताइये कि कैसा गाना है, क्या लिखना है। बोले कि इससे पहले कि आप गाना लिखें, एक बात मैं जाहिर कर देना चाहता हूँ कि इल्मी शायरी अलग होती है और फ़िल्मी शायरी अलग होती है, और फ़िल्मी शायरी लिखने के लिए आपको मेरी मिज़ाज की शिनाख़्त बहुत ज़रूरी है; जाँ निसार अख़्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गये थे, अल्लाह को प्यारे हो गये। मैंने कहा कि मैं यह शर्त तो पूरी नहीं करने वाला, कोशिश करूंगा कि आपके मिज़ाज का कुछ लिखूँ। तो उन्होंने सिचुएशन सुनाई, अपनी ज़ुबान में सुनाई तो थोड़ी देर के लिए मैं भी हिल गया। कहने लगे, "हमारी दास्तान उस मुकाम पर आ गई जहाँ मलिका-ए-आलिआ रज़िया सुल्तान, यानी हेमा मालिनी, सियाहा लिबास में ख़रामा-ख़रामा चली आ रही है, जिसे देख कर हमारा आलेया कासी ख़ैरमक़दम के लिए आगे बढ़ा। मैं थोड़ी देर बैठा रहा, फिर उनके असिस्टैन्ट ने कहा कि इसका मतलब यह है कि हेमा मालिनी सफ़ेद घोड़े पर काले लिबास पहने आ रही हैं, और आलेया कासी यानी कैमरा उनकी तरफ़ मूव हो रहा है। तो मैंने आख़िर के दो गीत उस फ़िल्म के लिए लिखे।" 

"तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." ग़ज़ल में कुछ ऐसी बात है कि जिसे एक बार सुनने के बाद एक और बार सुनने का मन होता है। कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में एक ऐसा आकर्षण है कि जो सीधे दिल में उतर जाता है। यह उपहास ही है कि ऐसी मोहक आवाज़ के धनी कब्बन मिर्ज़ा गले के कैन्सर से आक्रान्त हो कर इस दुनिया से चल बसे। पर जैसा कि इस ग़ज़ल की दूसरी लाइन में कहा गया है कि "मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है", वैसे ही कब्बन मिर्ज़ा भले इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी गायी हुई 'रज़िया सुल्तान' की इन दो ग़ज़लों ने उनकी आवाज़ को अमर कर दिया है, जो हमेशा हमारे साथ रहेगी। बस इतनी सी थी यह दास्तान। लीजिए, कब्बन मिर्जा की आवाज़ में वह गाना आप भी सुनिए।

फिल्म - राजिया सुल्तान : "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." : स्वर - कब्बन मिर्ज़ा : संगीत - खय्याम : गीतकार - निदा फाजली  





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, May 2, 2013

‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’ तीसरा भाग


पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की श्रद्धांजलि

‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना...' 



फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की गायिकाओं में शमशाद बेगम का 23 अप्रैल को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खनकती आवाज़ की धनी इस गायिका ने 1941 की फिल्म खजांची से हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायन क्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई थी। आत्मप्रचार से कोसों दूर रहने वाली इस गायिका को श्रद्धांजलि-स्वरूप हम अपने अभिलेखागार से अगस्त 2011 में अपने साथी सुजॉय चटर्जी द्वारा प्रस्तुत दस कड़ियों की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…' के सम्पादित अंश का तीसरा भाग प्रस्तुत कर रहे हैं। 


‘ओल्ड इज़ गोल्ड' में शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ इन दिनों गूँज रही है, उन्हीं को समर्पित लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे...' में। आज हम जिस संगीतकार की रचना सुनवाने जा रहे हैं, उन्होंने भी शमशाद बेगम को एक से एक लाजवाब गीत दिए और उनकी आवाज़ को 'टेम्पल बेल वॉयस' की उपाधि देने वाले ये संगीतकार थे, ओ.पी. नैयर। नैयर साहब के अनुसार दो गायिकाएँ हैं जिनकी आवाज़ ओरिजिनल हैं, वे हैं गीता दत्त और शमशाद बेगम। दोस्तों, विविध भारती पर नैयर साहब का एक लम्बा साक्षात्कार प्रसारित हुआ था, ‘दास्तान-ए-नैयर’ शीर्षक से। उस साक्षात्कार में कई बार शमशाद जी का ज़िक्र छिड़ा था। आज और अगली कड़ी में हम उसी साक्षात्कार के चुने हुए अंशों को पेश करेंगे जिनमें नैयर साहब शमशाद जी के बारे में बताते हैं। जब उनसे पूछा गया कि वो अपना पहला पॉपुलर गीत किसे मानते हैं, तो उनका जवाब था- “फिल्म ‘आरपार’ का गाना ‘कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र...’, जो शमशाद बेगम का पहला सुपरहिट गाना था:। शमशाद बेगम के गाये गीतों में नैयर साहब डबल बेस का ख़ूब इस्तेमाल किया करते थे, इस बारे में भी जानिये उन्हीं से- “मैं जब, जैसे चाहता था, एक दिन मुझे एक रेकॉर्डिस्ट नें कम्प्लिमेण्ट दिया कि नैयर साहब, आप रेकॉर्डिंग् करवाना जानते हो, बाकी किसी को ये पता नहीं। आपने सुना “जरा हट के ज़रा बच के, ये है बॉम्बे मेरी जान...” और उसमें, शमशाद जी के गानों में “लेके पहला पहला प्यार...”, “कभी आर कभी पार...”, “बूझ मेरा क्या नाम रे...” आदि। इन सभी गीतों में डबल बेस का खेल है"।

नैयर साहब के इंटरव्यूज़ में एक कॉमन सवाल जो होता था, वह था लता से न गवाने का कारण। ‘दास्तान-ए-नैया’ में जब यह बात चली कि मदन मोहन के कम्पोज़िशन्स को कामयाब बनाने के लिए लता जी का बहुत बड़ा हाथ है, उस पर नैयर साहब नें कहा, "लता मंगेशकर का बहुत बड़ा हाथ था, और हम हैं वो कम्पोज़र हैं जिसने लता मंगेशकर की आवाज़ पसन्द ही नहीं की। वो गायिका नम्बर एक हैं, पसन्द क्यों नहीं की, क्योंकि हमारे संगीत को सूट नहीं करती। 'थिन थ्रेड लाइक वॉयस' हैं वो। मुझे चाहिये थी सेन्सुअस, फ़ुल ऑफ़ ब्रेथ, जैसे गीता दत्त, जैसे शमशाद बेगम। टेम्पल बेल्स की तरह वॉयस है उसकी। शमशाद जी की आवाज़ इतनी ऑरिजिनल है कि बस कमाल है।"

तो आइए दोस्तों, नैयर साहब और शमशाद जी के सुरीले संगम से उत्पन्न तमाम गीतों में से आज हम एक गीत सुनते हैं। 1956 की फ़िल्म सी.आई.डी. का यह गीत है- “कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...”। मजरूह सुल्तानपुरी के बोल हैं और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया यह सदाबहार नग़मा। 


फिल्म सी.आई.डी.: “कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...” : संगीत – ओ.पी. नैयर



‘रात रंगीली गाये रे, मोसे रहा न जाए रे, मैं क्या करूँ...'


‘ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक और नए अंक में आप सभी का मैं, सुजॉय चटर्जी, स्वागत करता हूँ। इन दिनों इस स्तम्भ में जारी है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम के गाये गीतों से सुसज्जित लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे...'। पिछले अंक में हमने शमशाद जी का गाया, ओ.पी. नैयर का स्वरबद्ध किया, फिल्म सी.आई.डी. एक गीत सुनवाया था। नैयर साहब के साथ शमशाद जी की पारी इतनी सफल रही कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए आज के अंक में भी नैयर-शमशाद जोड़ी की धूम रहेगी। ‘दास्तान-ए-नैयर' सीरीज में जब नैयर साहब से पूछा गया-

कमल शर्मा : शमशाद जी से आप किस तरह मिले?

ओ.पी. नैयर : शमशाद जी को मैं लाहौर से ही जानता हूँ, रेडियो से। वो मुझसे 4-5 साल बड़ी हैं। मैं तो बच्चा हूँ उनके आगे। उनको बहुत पहले से सुना, पेशावर में, पश्तो गाने गाया करती थीं। फिर रेडियो लाहौर में आ गईं। बड़ी ख़ुलूस, बहुत प्यार करने वाली ईमोशनल औरत है।

कमल शर्मा : क्या खनकती आवाज़ है। ओ.पी. नैयर : टेम्पल वायस साहब, उनका नाम ही टेम्पल वॉयस है।

यूनुस खान : नैयर साहब, आपके कई गाने शमशाद बेगम नें गाये हैं, और आपने कहा है कि शमशाद बेगम आपको ख़ास हिन्दुस्तानी धरती से जुड़ा स्वर लगता है।

ओ.पी. नैयर : उसकी आवाज़ का नाम है टेम्पल बेल, जब मन्दिर में घंटियाँ बजती हैं, गिरजाघर में घंटे बजते हैं, इस तरह की खनक है उनकी आवाज़ में, जो किसी फ़ीमेल आर्टिस्ट में नहीं है और न कभी होगी।

यूनुस खान : आपके कम्पोज़ किये और शमशाद बेगम के गाये हुए जो आपके गीत हैं, उनके बारे में हमको बताइए, कि शमशाद बेगम की क्या रेंज थी?

ओ.पी. नैयर : उनकी रेंज कम नहीं थी। ऑरिजिनल वॉयसेस जो हैं, वो शमशाद और गीता ही हैं। आशा की कई क़िस्म की आवाज़ें आपको आज भी मिलेंगी, लता जी की आवाज़ें आपको आज भी मिलेंगी, लेकिन गीता और शमशाद की आवाज़ कहीं नहीं मिलेगी। यह हक़ीक़त है। देखिये पहले तो मैं गीता जी, शमशाद जी, इनसे काफ़ी मैं गानें लेता रहा, और बाद में आशाबाई आ गईं हमारी ज़िन्दगी में, तो वो हमसे भी मोहब्बत करने लगीं और हमारे संगीत से भी।

और इस तरह से दोस्तों, आशा भोसले के आ जाने के बाद गीता दत्त और शमशाद बेगम, दोनों के लिए नैयर साहब ने अपने दरवाज़े बन्द कर दिए। लेकिन तब तक ये दोनों गायिका उनके लिए इतने गानें गा चुकी थी कि जिनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है। उसी लम्बी फ़ेहरिस्त से आज प्रस्तुत है 1956 की फिल्म 'नया अंदाज़' से ‘रात रंगीली गाये रे, मोसे रहा न जाए रे, मैं क्या करूँ...’, जिसे मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया था। जाँनिसार अख़्तर साहब का लिखा हुआ गीत है, और खनकती आवाज़ शमशाद बेगम की। मीना कुमारी, जो बाद में ट्रैजेडी क्वीन के रूप में जानी गईं, इस फ़िल्म में उनका किरदार एक सामान्य लड़की का था। आइए आपको सुनवाते हैं, यह गीत और इसी गीत के साथ इस विशेष श्रद्धांजलि श्रृंखला को यहीं विराम देने की हमे अनुमति दीजिए।


फिल्म नया अंदाज़ : ‘रात रंगीली गाये रे, मोसे रहा न जाए रे, मैं क्या करूँ...’ : संगीत – ओ.पी. नैयर



आपको हमारा यह विशेष श्रद्धांजलि अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिए। पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को श्रद्धांजलि अर्पित करती इस श्रृंखला के बारे में हमें आपके सुझावों और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं। 


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, July 31, 2008

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे...

आवाज़ पर आज का दिन समर्पित रहा, अजीम फनकार मोहमद रफी साहब के नाम, संजय भाई ने सुबह वसंत देसाई की बात याद दिलाई थी, वे कहते थे " रफ़ी साहब कोई सामान्य इंसान नही थे...वह तो एक शापित गंधर्व था जो किसी मामूली सी ग़लती का पश्चाताप करने इस मृत्युलोक में आ गया." बात रूपक में कही गई है लेकिन रफ़ी साहब की शख़्सियत पर एकदम फ़बती है.( पूरा पढ़ें ...)

मोहम्मद रफी, ऐतिहासिक हिन्दी सिनेमा जगत का एक ऐसा स्तम्भ जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिल पर अमिट छाप बनाये है, जिनकी सुरीली अद्वितीय आवाज हर रोज हमें दीवाना करती है और जिन्होंने करीब पैंतीस सालों में अपनी अतुलनीय आवाज में मधुर गीतों का एक बड़ा अम्बार हमारे लिये छोड़ा । रफी जी की आवाज एक ऐसी आवाज, जिसने दुःख भरे नगमों से लेकर धूम-धड़ाके वाले मस्ती भरे गीतों सभी को एक बहतरीन गायकी के साथ निभाया, यूँ तो बहुत से नये गायक कलाकारों द्वारा रफी जी की आवाज को नकल करने की कोशिश की गयी और उनको सराहा भी गया परंतु कोई भी मोहम्मद रफी के उस जादू को नही ला सका; शायद कोई कर भी न सके । पुरजोर कोशिशों के बावजूद कोई भी ऐसा गायक रफी साहब की केवल एक-आध आवाज को नकल करने में सफल हो सकता है परंतु कोई भी रफी साहब की उस आवाज की विविधता को नही ला सकता जैसा वे करते थे.

रफी साहब, गीत-संगीत के आकाश में इस सितारे का उदय अमृतसर के निकट एक गांव कोटला सुल्तान सिंह में 24 दिसम्बर 1924 को हुआ । जब रफी जी अपने बचपन की सीढियां चढ रहे थे तब इनका परिवार लाहौर चला गया । रफी जी का गीत-संगीत के प्रति इतना लगाव था कि ये बचपन के दिनों में उस फकीर का पीछा करते थे जो प्रतिदिन उस जगह आता था और गीत गाता था जहाँ ये रहते थे । इनके बड़े भाई हामिद इनके संगीत के प्रति अटूट लगाव से परिचित थे और हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे । लाहौर में ही उस्ताद वाहिद खान जी से रफी जी ने सगीत की शिक्षा प्राप्त करनी शुरू कर दी । रफी साहेब के शुरुवाती दिनों की कहानी आप को युनुस भाई बता ही चुके हैं ( यहाँ पढ़ें...)


रफ़ी साहब के संगीत सफर की बड़ी शुरूआत फिल्म "दुलारी(१९४९)" के सदाबहार गीत "सुहानी रात ढल चुकी" से हुई थी। इस गाने के बाद रफ़ी साहब ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सत्तर के दशक तक वे पार्श्व-गायन के बेताज बादशाह रहे। इस सफलता के बावजूद, रफी साहब में किसी तरह का गुरूर न था और वे हमेशा हीं एक शांत और सुलझे हुए व्यक्तित्व के रूप में जाने गए। उनके कई सारे प्रशंसक तो आज तक यह समझ नहीं पाए कि इतना शांत और अंतर्मुखी व्यक्ति अपने गानों में निरा जोशीला कैसे नज़र आता है।

उनके पुत्र शाहिद के शब्दों में -

"जब एक बार हमने उनसे पूछा कि क्या वास्तव में आपने हीं 'याहू' गाया है, तो अब्बाजान ने मुस्कुराकर हामीं भर दी। हम उनसे पूछते रहे कि 'आपने यह गाना गाया कैसे?', पर उन्होंने इस बारे में कुछ न कहा। हमारे लिए यह सोचना भी नामुमकिन था कि उनके जैसा सरल इंसान "याहू" जैसी हुड़दंग को अपनी आवाज दे सकता है।"

शायद यह रफ़ी साहब की नेकदिली और संगीत जानने व सीखने की चाहत हीं थी, जिसने उन्हें इतना महान पार्श्व-गायक बनाया था। उन्होंने किसी भी फनकार की अनदेखी नहीं की। उनकी नज़रों में हर संगीतकार चाहे वह अनुभवी हो या फिर कोई नया, एक समान था। रफ़ी साहब का मानना था कि जो उन्हे नया गीत गाने को दे रहा है, वह उन्हें कुछ नया सीखा रहा है, इसलिए वह उनका "उस्ताद" है। अगर गीत और संगीत बढिया हो तो वे मेहनताने की परवाह भी नहीं करते थे। अगर किसी के पास पैसा न हो, तब भी वे समान भाव से हीं उसके लिए गाते थे।

गौरतलब है कि रफ़ी साहब ने अपने समय के लगभग सभी संगीतकारों के साथ काम किया था, परंतु जिन संगीतकारों ने उनकी प्रतिभा को बखूबी पहचाना और उनकी कला का भरपूर उपयोग किया , उनमें नौशाद साहब का नाम सबसे ऊपर आता है। नौशाद साहब के लिए उन्होंने सबसे पहला गाना फिल्म "पहले आप" के लिए "हिन्दुस्तान के हम हैं , है हिन्दुस्तान हमारा" गाया था। दोनों ने एक साथ बहुत सारे हिट गाने दिए जिन में से "बैजू बावरा" , "मेरे महबूब" प्रमुख हैं। एस०डी० बर्मन साहब के साथ भी रफ़ी साहब की जोड़ी बेहद हिट हुई थी। "कागज़ के फूल", "गाईड", "तेरे घर के सामने", "प्यासा" जैसी फिल्में इस कामयाब जोड़ी के कुछ उदाहरण हैं।

सत्तर के दशक के प्रारंभ में रफ़ी साहब की गायकी कुछ कम हो गई और संगीत के फ़लक पर किशोर दा नाम का एक नया सितारा उभरने लगा। परंतु रफ़ी साहन ने नासिर हुसैन की संगीतमय फिल्म "हम किसी से कम नहीं(१९७७)" से जबर्दस्त वापसी की। उसी साल उन्हें "क्या हुआ तेरा वादा" के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया।

रफ़ी साहब के संगीत सफर का अंत "आस-पास" फिल्म के "तू कहीं आस-पास" गाने से हुआ। ३१ जुलाई, १९८० को उनका देहावसान हो गया। उनके शरीर की मृत्यु हो गई, परंतु उनकी आवाज आज हीं सारी फ़िज़ा में गूँजी हुई है। उनकी अमरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि , उनकी मृत्यु के लगभग तीन दशक बाद भी , उनकी लोकप्रियता आज भी चरम पर है। कितना सच कहा है रफी साहब ने अपने इस गीत में...."तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे...."

जानकारी सोत्र - इन्टरनेट , आवाज़ के लिए संकलन किया - विश्व दीपक 'तनहा' और भूपेंद्र राघव.

( ऊपर चित्र में रफी साहब, साथी लता और मुकेश के साथ )

हमें यकीं है कि आज पूरे दिन आपने रफी साहब के अमर गीतों को सुनकर उन्हें याद किया होगा, हम छोड़ जाते हैं आपको एक अनोखे गीत के साथ, जहाँ रफी साहब ने आवाज़ दी, किशोर कुमार की अदाकारी को, ये है दो महान कलाकारों के हुनर का संगम...देखिये और आनंद लीजिये.



रफी साहब के केवल दो ही साक्षात्कार उपलब्ध हैं, जिनमे से एक आप देख सकते हैं यहाँ.

वो शुरुवाती दिन...

मो. रफी को याद कर रहे हैं, युनुस खान

अट्ठाईस बरस पहले 31 जुलाई के दिन सुरसंसार का ये सुरीला पंछी, दुनिया को बेगाना मानकर उड़ गया, और तब से आज तक वो डाली कांप रही है । दरअसल मोहम्‍मद रफ़ी संगीत की दुनिया में शोर की साजिश के खि़लाफ़ एक सुरीला हस्‍तक्षेप थे।

दुनिया के नक्‍शे में खोजने चलें, तो पाकिस्‍तान के दायरे में लाहौर के नज़दीक कोटला सुल्‍तान सिंह को खोज पाना, काफी मशक्‍कत का काम होगा । यहां चौबीस दिसंबर 1924 को रफ़ी साहब का जन्‍म हुआ था । बाद में रफ़ी का परिवार लाहौर चला आया । यहां उन्होंने उस्ताद बड़े गु़लाम अली ख़ां साहब और उस्ताद अब्‍दुल वहीद ख़ां साहब से संगीत की तालीम ली थी ।


लाहौर में कुंदन लाल सहगल का एक कंसर्ट हो रहा था, लेकिन अचानक बिजली चली गयी और आयोजन रूक गया । सहगल ने कहा कि जब तक बिजली नहीं आयेगी वो नहीं गायेंगे । तेरह बरस के मोहम्‍मद रफ़ी इस आयोजन में अपने जीजा मोहम्‍मद हमीद के साथ आये हुए थे । उन्होंने कहा कि रफ़ी गाना गाकर जनता को शांत कर सकते हैं । इस तरह रफ़ी साहब को मंच पर गाने का मौका़ मिला था । रफ़ी साहब को पहली बार गाने का मौक़ा संगीतकार श्याम सुंदर ने दिया था सन 1942 में, फ़िल्म थी 'गुलबलोच' । इसमें रफ़ी ने अठारह बरस की उम्र में ज़ीनत बेगम के साथ 'सोणिए नी, हीरिए नी, तेरी याद ने बहुत सताया' गाना गाया था । ये गाना बेहद लोकप्रिय हुआ था । इसके बाद रफ़ी को लाहौर रेडियो स्टेशन पर नियमित गाने के बुलावे आने लगे । ये फ़िल्म 1944 में रिलीज़ हुई थी ।

यही वो साल था जब मो. रफ़ी बंबई चले आए थे । मैंने रफ़ी साहब की शुरूआत के बारे में एक किस्सा सुना है, पता नहीं इसमें किस हद तक सच्चाई है । रफ़ी साहब की मुलाक़ात नौशाद के वालिद से हुई थी और रफ़ी का गाना सुनकर उन्होंने नौशाद के नाम एक सिफ़ारिशी चिट्ठी लिखी थी । नौशाद से जब उनकी मुलाक़ात हुई तो उन्होंने इसी साल कारदार की फ़िल्म 'पहले आप' के गाने 'हिंदुस्‍तान के हम हैं हिंदोस्‍तां हमारा, हिंदु-मुस्लिम दोनों की आंखों का तारा' में रफ़ी साहब की आवाज़ का इस्तेमाल कोरस में किया था । इस गाने को दरअसल दुर्रानी, श्‍याम कुमार, मोतीराम, अलाउद्दीन वग़ैरह ने गाया था । इस मार्च-पास्ट गीत को सिपाहियों पर फिल्माया गया था । नौशाद ने सोचा था कि इस गाने में सिपाहियों के बूटों की आवाज़ ज़रूर होंगी । चूंकि उस ज़माने में उतनी तकनीकी सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए गायकों को फौजी बूट पहनाए गये और पैर पटकते हुए गाने को कहा गया । इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान रफ़ी साहब के पैर में बहुत चोटें आ गयी थीं । रफ़ी साहब को इस गाने के बदले में पचास रूपये मेहनताना दिया गया था । इस फ़िल्म के लिए रफ़ी ने दो और कोरस गाने गाए थे ।

सन 1944 में रफ़ी साहब ने फिल्‍म 'गांव की गोरी' ( विलेज गर्ल) में संगीतकार श्‍याम सुंदर के निर्देशन में एक गाना गाया था जी.एम. दुर्रानी के साथ, बोल थे—'अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी-तैसी' . रिकॉर्ड कंपनी के रिकॉर्ड नंबर के मुताबिक़ ये रफ़ी साहब का दूसरा रिलीज़ गाना था । इस दौर में रफ़ी साहब कुछ फिल्‍मों में गानों में नज़र भी आए थे । 1945 में आई थी स्‍वर्णलता और नज़ीर के अभिनय से सजी फिल्‍म –'लैला मंजनू' । इस फ़िल्म में रफ़ी साहब ने एस. डी. बातिश और साथियों के साथ गाना गाया था 'तेरा जलवा जिसने देखा वो दीवाना हो गया'. ।संगीतकार थे पंडित गोविंदराम । इस गाने में रफ़ी परदे पर भी नज़र आए थे ।

संगीत के क़द्रदान जानते हैं कि मुकेश, रफ़ी और किशोर कुमार तीनों पर अपने शुरूआती दौर में कुंदन लाल सहगल का गहरा असर रहा था । लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इन तीनों में से केवल रफ़ी साहब को ही सहगल के साथ गाने का मौक़ा मिला था । रफ़ी अकसर नौशाद से कहा करते थे कि उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया जाये ।

ये मौक़ा आया सन 1946 में । जब नौशाद ने मो. रफ़ी को फिल्‍म 'शाहजहां' में कुंदनलाल सहगल के पीछे कोरस में मुख्या आवाज़ के रूप में मौक़ा दिया था । गाना था मजरूह सुल्‍तानपुरी का लिखा -'मेरे सपनों की रानी रूही रूही रूही' . आपको बता दें कि इसी फ़िल्म से बतौर गीतकार मजरूह का सफ़र शुरू हुआ था । कोरस के साथ साथ इस गाने में एकदम आखिर में रफ़ी साहब दो लाईनें गाते हैं । नौशाद साहब बताया करते थे कि रफ़ी इस गाने की दो पंक्तियां गाकर इतने खुश थे मानो उन्‍हें सारी दुनिया की दौलत मिल गयी हो ।

आप समझ सकते हैं कि आज़ादी के आसपास का समय भारतीय फ़िल्म संगीत में संक्रमण का समय था । अब तक कलाकार अपने गाने स्वयं गाते थे । सहगल, नूरजहां, सुरैया वग़ैरह प्ले बेक नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने गाने खुद ही गा रहे थे और परदे पर भी होंठ हिला रहे थे । पर रफ़ी जिस दौर में उभर रहे थे तब प्लेबैक का सफ़र शुरू हो रहा था । सन 1946 में मो. रफी को अपना पहला हिंदी एकल गीत गाने का मौक़ा मिला था फिल्‍म थी महबूब ख़ान की 'अनमोल घड़ी' और गाने के बोल थे—'तेरा खिलौना टूटा बालक' . ये गाना फ़िल्म के नायक पर नहीं बल्कि एक खिलौने वाले पर फिल्‍माया गया था ।
इसी साल फीरोज़ निज़ामी के निर्देशन में रफी ने फिल्‍म 'शरबती आंखें' में दो एकल गीत रिकॉर्ड किए थे । 1947 में उन्‍होंने फीरोज़ निजामी के ही संगीत निर्देशन में मलिका-ए-तरन्‍नुम नूरजहां के साथ गाया-'यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है' । ये गाना बड़ा हिट हुआ । इस फ़िल्म के कोरस गीत 'वो अपनी याद दिलाने को' में रफी साहब परदे पर भी दिखे । लेकिन सन 1948 में एस यू सनी की फिल्‍म 'मेला' में रफ़ी ने अपना पहला हिट एकल गीत दिया था—'ये जिंदगी के मेले'। दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म में ये रफ़ी का गाया एकमात्र गाना था । बाकी सारे गाने मुकेश ने गाए थे । 1949 में फिल्‍म 'दुलारी' के लिए रफ़ी साहब ने 'सुहानी रात ढल चुकी' जैसा बेमिसाल नगमा गाया था । इसी साल अंदाज, चांदनी रात,दिल्लगी जैसी फिल्मों ने रफी साहब को फिल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया था ।

जब बात शुरुवाती दिनों की हो रही है तो, क्यों न उनके द्वारा, उसी दौर में गाया गया बेहद चर्चित "सुहानी रात ढल चुकी " को सुन लिया जाए, ये विडियो, लन्दन में हुए रफी साहब के एक लाइव कंसर्ट से लिया गया है...आनंद लीजिये.



- युनुस खान

(लेखक विविध भारती में कार्यरत हैं । आवाज़ के पाठकों, के लिए विशेष, रफी साहब की पुण्यतिथि पर, दैनिक भास्कर में उनके द्वारा लिखे गए लेख की पुनाप्रस्तुती )



साथ ही पढिये, मो. रफी पर संजय पटेल का ये भावपूर्ण लेख.
बने रहिये आवाज़ के साथ, शाम सात बजे पढिये रफी साहब के संगीत सफर पर एक संक्षिप्त आलेख.

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