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Wednesday, May 4, 2016

"मुझे दो सालों तक राजेश रोशन से मिलने नहीं दिया गया" - गीतकार इब्राहीम अश्क


एक मुलाकात ज़रूरी है (9) 

इब्राहीम अश्क 
ज के हमारे मेहमान एक मशहूर शायर, एक लोकप्रिय गीतकार होने के साथ साथ एक अच्छे खासे अभिनेता भी हैं. सुपर स्टार ह्रितिक रोशन के सुपर स्टारडम में इनके गीतों का बेहद महत्वपूर्ण स्थान रहा है. "कहो न प्यार है". "क्यों चलती है पवन", "सितारों की महफ़िल में", "जादू जादू", "इट्स मेजिक" जैसे ढेर सारे सुपर डुपर हिट गीतों के रचेयता इब्राहीम अश्क साहब पधारे हैं आज हमारी बज़्म में. आईये उन्हीं से जानते हैं कि क्यों उन्होंने अपना तक्कलुस "अश्क" रखा, क्यों उन्हें दो सालों तक संगीतकार राजेश रोशन से मिलने से महरूम रहना पड़ा, क्यों ग़ालिब के किरदार को मंच पर जीवंत करने में उन्हें अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी, और क्यों अपने "मोहब्बत इनायत" जैसे कामियाब गीत के बावजूद उन्हें एक स्टार गीतकार बनने के लिए ९ सालों का इंतज़ार करना पड़ा.



Saturday, May 16, 2015

"छू कर मेरे मन को...", क्यों राजेश रोशन को अपने पैसे से इस गीत को रेकॉर्ड करना पड़ा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 59

 

छू कर मेरे मन को...’ 





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 59-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’याराना’ के मशहूर गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था। 

रबीन्द्र संगीत की धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों की परम्परा बहुत पुरानी है। 30 के दशक से ही संगीतकार, ख़ास कर बंगाली संगीतकार, रबीन्द्र संगीत से प्ररणा लेकर फ़िल्मी गीत रचते रहे हैं। पंकज मल्लिक, कमल दासगुप्ता, अनिल बिस्वास, सचिन देव बर्मन, हेमन्त कुमार से लेकर बप्पी लाहिड़ी तक यह परम्परा जारी रही है। ये सभी बंगाली संगीतकारों के नाम हमने गिनाए। एक और संगीतकार हैं जिन्हें 100% बंगाली तो नहीं कह सकते, पर हाँ 50% ज़रूर बंगाली हैं। राजेश रोशन वह नाम है, उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं और इस तरह से बंगाल के सुरीले संगीत की धारा उनके नसों में भी बही है। राजेश रोशन ने भी कई बार रबीन्द्र संगीत को आधार बना कर फ़िल्मी गीत रचे हैं। इनमें से सबसे प्रमुख गीत रहा है 1981 की फ़िल्म ’याराना’ का, "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा..." जो आधारित है "तोमार होलो शुरू, आमा होलो शारा" पर। निस्सन्देह यह गीत बेहद कामयाब रहा और आज भी अक्सर रेडियो पर सुनाई दे जाता है, पर राजेश रोशन से एक बड़ी भूल हो गई थी। दरअसल बात ऐसी थी कि रबीन्द्र संगीत का अधिकार शान्तिनिकेतन के विश्वभारती विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित थी, जिसका अर्थ यह है कि किसी भी कलाकार को रबीन्द्र संगीत का इस्तेमाल करने के लिए विश्वभारती से अनुमति लेनी पड़ती थी। पर प्रस्तुत गीत के लिए ना राजेश रोशन ने अनुमति ली और ना ही ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता ने। नतीजा यह हुआ कि फ़िल्म के रिलीज़ होने तक किसी को भनक तक नहीं पड़ी कि ऐसा कोई गीत बन रहा है। जैसे ही फ़िल्म रिलीज़ हुई और कलकत्ता के थिएटर में लोग इसे देखने पहुँचे, इस गीत को सुनते ही लोग भड़क उठे। बंगाल में कविगुरू की क्या अहमियत और सम्मान है यह हम सभी जानते हैं। कविगुरु की धुन का बिना अनुमति के हिन्दी फ़िल्मी गीत में सुनाई दे जाना बंगाल के लोगों को अच्छा नहीं लगा, और इसका विरोध प्रदर्शन हुआ। कई सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ भे हुए जिससे फ़िल्म को थिएटरों से उतारना पड़ा। मामला ज़रूरत से ज़्यादा बिगड़ता देख ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता और राजेश रोशन ने माफ़ी माँगी और विश्वभारती को क्षमा याचना का पत्र भेज कर विवाद को ख़त्म किया। राजेश रोशन के हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी बिल्कुल इसी धुन और मीटर का इस्तेमाल कर कुछ वर्षों बाद (1986 में) एक और गीत बनाया फ़िल्म ’मक्कार’ के लिए। किशोर कुमार की ही आवाज़ में यह गीत था "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल"। 1998 में फ़िल्म ’युगपुरुष’ फ़िल्म में एक बार राजेश रोशन ने रबीन्द्र संगीत "पागला हावा बादोल दिने" पर आधारित गीत बनाया "बंधन खुला पंछी उड़ा"।

यह तो थी "छू कर मेरे मन को" के संगीत की दास्तान। अब आते हैं इसके बोलों पर। गीतकार अंजान के बेटे समीर उस समय अपने पिता के साथ मौजूद थे जब यह गीत लिखा जा रहा था। विविध भारती के एक साक्षात्कार में समीर ने इस गीत के बारे में कुछ ऐसा बताया था - "छूकर मेरे मन को...", अब देखिए इस गाने के पीछे भी एक बड़ी अजीब सी कहानी है, और मुझे याद है, मैं और पापा गाँव जा रहे थे; तो उनकी कैसेट पे दो गानों की ट्यून, एक तो उस फ़िल्म का टाइटल गाना "तेरे जैसा यार कहाँ..." और यह दूसरा गाना। टाइटल गाना तो उन्होंने रास्ते में ही कम्प्लीट कर लिया था पर यह गाना, उनको लग रहा था कि बहुत अच्छा ट्यून राजू ने दिया है, मैं कुछ अच्छा करना चाह रह हूँ। और उन्होंने मुखड़ा मुझे सुनाया "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", मुझे लगा कि बहुत ख़ूबसूरत गाना बनेगा। मगर जब हम गाँव से आए और सिटिंग् हुई और रेकॉर्डिंग् पर जब गाना पहुँचा तो संजोग की बात थी कि रेकॉर्डिंग् में जाने से पहले तक प्रोड्युसर ने वह गाना नहीं सुना था। और रेकॉर्डिंग में जब प्रोड्युसर आया और उन्होंने जैसे ही गाना सुना तो बोले कि रेकॉर्डिंग् कैन्सल करो, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। उन्होंने कहा कि इतना बेकार गाना मैंने अपनी ज़िन्दगी में नहीं सुना, इतना ख़राब गाना राजू तुमने हमारी फ़िल्म के लिए बनाया है, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। अब राजेश रोशन का दिमाग़ उस ज़माने में, उनको ग़ुस्सा बहुत आता था, उन्होंने कहा कि गफ़्फ़ार भाई, उनका नाम था गफ़्फार नडियाडवाला, सोरज नडियाडवाला, हमीद नडियाडवाला, हमीद उसके प्रोड्युसर थे, हमीद यह फ़िल्म बना रहे थे, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गान मैं रेकॉर्ड करने जा रहा हूँ और तुम अभी इसी वक़्त इस रेकॉर्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नहीं देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा, मैं यह गाना रेकॉर्ड करूँगा, तुमको इसका पैसा भी नहीं देना है, मैं अपने पैसे से रेकॉर्ड करूँगा। और उस आदमी ने अपने पैसे से वह गाना रेकॉर्ड किया और गाना रेकॉर्ड होकर जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होंने यह बात कही कि अगर यह गाना नहीं होगा फ़िल्म में तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा। और वह गाना माइलस्टोन बना।" लीजिए, अब आप भी यह गाना सुन लीजिए।

फिल्म याराना : 'छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा...' : किशोर कुमार : राजेश रोशन



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, January 31, 2015

"महलों का राजा मिला..." - इस गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि दी रोशन साहब की पत्नी ने उन्हें



एक गीत सौ कहानियाँ - 51
 

महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 51वीं कड़ी में आज जानिए फ़िल्म 'अनोखी रात' के मशहूर गीत "महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। 



हिन्दी फ़िल्म संगीत जगत में कई संगीतकार ऐसे हुए हैं जो अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बावजूद बहुत ज़्यादा अन्डर-रेटेड रहे। एक से एक बेहतरीन रचना देने के बावजूद इंडस्ट्री और पब्लिक ने उनकी तरफ़ उतना ध्यान नहीं दिया जितना कुछ गिने-चुने और "सफल" संगीतकारों की तरफ़ दिया करते थे। ऐसे एक अन्डर-रेटेड संगीतकार थे रोशन। 40 के दशक में रोशन साहब की प्रतिभा और कला से प्रभावित होकर निर्माता-निर्देशक और संगीतकार ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर, जो बाद में देश-विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये थे, उन्होंने रोशन को All India Radio Delhi में नौकरी दिलवा दी बतौर इन्स्ट्रूमेण्टलिस्ट। और वहीं रोशन साहब की मुलाक़ात हुई कलकत्ता की इरा मोइत्रा से। इरा जी उनके साथ ही काम करने लगीं। दोनों ही कला और संगीत के प्रेमी थे। ऐसे में दोनो का एक दूसरे के निकट आना, प्रेम का पुष्प खिलना बहुत ही प्राकृतिक और सामान्य बात थी। रोशन और इरा के बीच प्यार हो गया और दोनो ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद रोशन साहब मुम्बई (तब बम्बई) आ गये और ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के साथ म्युज़िक ऐसिस्टैन्ट के रूप में काम करने लगे। एक लम्बे संघर्ष और कई चुनौतियों को पार करने के बाद उन्हें स्वतंत्र फ़िल्में मिलने लगी। जिन फ़िल्मों में संगीत देकर उन्होंने हिन्दी फ़िल्म संगीत संसार में अपने नाम की छाप छोड़ दी, वो फ़िल्में थीं 'बावरे नैन', 'बरसात की रात', 'आरती', 'ताज महल', 'ममता', 'बहू बेग़म', 'दिल ही तो है', 'दूज का चाँद', 'चित्रलेखा', 'भीगी रात', 'देवर' और 'अनोखी रात'। रोशन ने लगभग 94 फ़िल्मों में स्वतंत्र रूप से संगीत दिया और उसके अलावा भी कई ऐसी फ़िल्में की जिनमें उन्होंने दो या तीन गीतों का संगीत तैयार किया जब कि उन फ़िल्मों में कोई और मुख्य संगीतकार थे।


रोशन दम्पति
1968 में रोशन साहब जब 'अनोखी रात' फ़िल्म का संगीत बना रहे थे, उसी दौरान उनकी तबीयत नासाज़ हो गई। हार्ट की प्रॉबलेम हो गई थी। फिर भी उन्होंने ऐसी हालत में भी 'अनोखी रात के लगभग सभी गीत रेकॉर्ड कर लिये, पर एक गाना रेकॉर्ड होना अभी बाक़ी था। और दुर्भाग्यवश दिल का दौरा पड़ने से रोशन साहब चले गये 16 नवम्बर के दिन। उनके इस आकस्मिक निधन से इस फ़िल्म का संगीत अधूरा ही रह गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कुछ समय बाद 'अनोखी रात' फ़िल्म के निर्देशक असित सेन ने यह फ़ैसला किया वो बचा हुआ जो एक गीत है इस फ़िल्म का, उसे सलिल चौधरी से कम्पोज़ और रेकॉर्ड करवायेंगे। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि किसी किसी जगह इस बात का उल्लेख है कि 'अनोखी रात' फ़िल्म के इस अन्तिम गीत को रोशन साहब के गुज़र जाने के बाद उनके मुख्य सहायक श्याम राज और सोनिक (संगीतकार जोड़ी सोनिक-ओमी के) ने रेकॉर्ड करवाया था। पर शायद यह सच्चाई नहीं है। तो साहब, जब रोशन साहब की पत्नी इरा जी को इस बात का पता चला कि असित दा सलिल दा से वह आख़िरी गाना बनवाना चाह रहे हैं, तो उनके मन में कुछ और ही बात चल रही थी।   वो उस मातम के दौर में भी असित सेन के पास गईं और उनसे कहा कि फ़िल्म का यह जो एक बचा हुआ गाना है, उसे वो अपनी देख रेख में रेकॉर्ड करवाना चाहती हैं। यह गीत एक श्रद्धांजलि होगी एक वियोगी पत्नी की अपने स्वर्गीय पति के लिए। यह सुन कर असित सेन चौंक उठे। उन्हें यह तो मालूम था कि इरा जी एक गायिका हैं, पर इसका ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो इस तरह का संगीत संयोजन और पूरे रेकॉर्डिंग का संचालन कर कर पायेंगी। उन्होंने इरा जी से पूछा कि आप ये सब कुछ कर पायेंगी? जवाब था "हाँ"। और तब दादा असित सेन ने इरा जी की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस बचे हुए गीत की रेकॉर्डिंग की ज़िम्मेदारी उनको दे दी।


राजेश रोशन
"महलों का राजा मिला, हमारी बेटी राज करेगी, ख़ुशी ख़ुशी कर दो विदा, हमारी बेटी राज करेगी...", यह था वह गीत। गीत की धुन रोशन साहब ने पहले से ही तैयार की हुई थी। इरा जी ने पूरे गाने को अरेंज करके, इस धुन को फ़ाइन ट्यून करके, रेकॉर्ड करवाया, और इस तरह से यह मास्टरपीस कम्पोज़िशन बनी एक श्रद्धांजलि, एक वियोगी पत्नी की तरफ़ से अपने स्वर्गवासी पति के लिए। और क्या लिखा है कैफ़ी साहब ने कि गीत सुनते ही आँखें भर आती हैं! और सिचुएशन भी क्या थी, मुसाफ़िरों का एक दल एक रात के लिए एक रेस्ट-हाउस में आसरा लेता है। एक व्यापारी पिता (तरुन बोस) और उनकी पुत्री (ज़हिदा) उस दल का हिस्सा हैं। यह सामने आता है कि पिता अपनी पुत्री का किसी से विवाह करवाना चाहते हैं पर पुत्री इस रिश्ते से ख़ुश नहीं हैं। तभी बारिश शुरू होती है और एक डाकू (संजीव कुमार) भी उसी बिल्डिंग में शरण लेने घुस आते हैं। वो उस लड़की की तरफ़ जब एक दृष्टि से देखने लगता है तो लड़की इसका कारण पूछती है। और वो कहता है कि उनकी शक्ल बिल्कुल उसके स्वर्गवासी पत्नी से मिलती है, और इस तरह से अपनी पूरी कहानी बताता है। इस गीत में दर्द है एक बेटी का। पर आश्चर्य की बात है कि इसी धुन का इस्तेमाल रोशन साहब के बेटे और अगले दौर के संगीतकार राजेश रोशन ने फ़िल्म 'ख़ुदगर्ज़' में किया और बना डाला एक ख़ुशी का गीत। शत्रुघ्न सिन्हा और अमिता सिंह पर फ़िल्माया हुआ तथा नितिन मुकेश व साधना सरगम का गाया वह गीत था "यहीं कहीं जियरा हमार, ए गोरिया गुम होई गवा रे..."। यह गीत भी अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। राजेश रोशन ने कई बार दूसरों की धुनों से प्रेरित होकर अपने गीत बनाये हैं और उन पर धुन चुराने के आरोप भी जनता ने लगाये हैं, पर इस गीत के लिए यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने पिता की धुन का सहारा लिया है। क्या पिता की सम्पत्ति पुत्र की सम्पत्ति नहीं है? क्या इसे भी चोरी ही कहेंगे आप?

फिल्म - अनोखी रात : 'महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...' : लता मंगेशकर : संगीत - रोशन : गीत - कैफी आज़मी



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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, December 6, 2014

"अंगना आयेंगे साँवरिया..." - देवेन वर्मा को श्रद्धांजलि, उन्हीं के गाये इस गीत के माध्यम से



एक गीत सौ कहानियाँ - 47
 

देवेन वर्मा की आवाज़ में सुनिए- ‘अँगना आयेंगे साँवरिया...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 47-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं अभिनेता देवेन वर्मा को उन्हीं के गाए 'दूसरा आदमी' फ़िल्म के गीत "अंगना आयेंगे साँवरिया..." के ज़रिए। 



देवेन वर्मा उन हास्य अभिनेताओं में से एक थे जिन्हें अपने दर्शकों को हँसाने के लिए लाउड कॉमेडी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। अपने सीधे-सरल अभिनय, ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग और अभिव्यक्ति के माध्यम से देवेन वर्मा हर बार दर्शकों के दिलों में उतर जाते थे। हर किरदार को उन्होंने बख़ूबी निभाया, और नायक-नायिका और तमाम बड़े स्टार्स के होने के बावजूद अपनी हर फ़िल्म में वो भीड़ में से अलग नज़र आए। उनके अभिनय का लोहा हर कोई मानता था। 70 और 80 के दशक में देवेन वर्मा मध्यवित्त पृष्ठभूमि पर बनने वाली फ़िल्मों में नियमित रूप से नज़र आए; फिर वह ॠषीकेश मुखर्जी की 'गोलमाल' और 'रंग बिरंगी' हो या फिर बासु चटर्जी की 'खट्टा-मीठा' हो या 'प्रियतमा' या फिर 'दिल्लगी'। इन समस्त फ़िल्मों में देवेन वर्मा ने अपने स्तरीय हास्य अभिनय क्षमता का प्रदर्शन कराते हुए दर्शकों के दिलों में घर कर गए। देवेन वर्मा सिर्फ़ अभिनय तक ही सीमित नहीं रहे, उन्होंने फ़िल्मों का निर्माण भी किया और कुछ फ़िल्मों का निर्देशन भी। लेकिन उनकी जिस प्रतिभा से आम जनता सबसे कम वाक़िफ़ हैं, वह है उनकी गायकी। देवेन वर्मा एक अच्छे गायक भी थे जिसका प्रमाण उन्होंने दो तीन फ़िल्मों के गीतों में आवाज़ देकर दिया। वैसे देखा जाए तो समय समय पर कई हास्य अभिनेताओं ने फ़िल्मों में गीत गाए हैं। आइ. एस. जौहर ने मोहम्मद रफ़ी के साथ 'शागिर्द' के "बड़े मियाँ दीवाने ऐसे न बनो..." गीत में "यही तो मालूम नहीं है" कहे थे। महमूद ने एक नहीं बल्कि कई कई गीत गाये हैं, उदाहरण के तौर पर फ़िल्म 'शाबाश डैडी' में उनका गाया एक एकल गीत था, 'पड़ोसन' में किशोर कुमार और मन्ना डे के साथ, 'एक बाप छह बेटे' में सुलक्षणा पंडित और विजेता पंडित के साथ, 'कुंवारा बाप' में एक बार फिर किशोर कुमार के साथ, और 'काश' में मोहम्मद अज़ीज़ और सोनाली मुखर्जी के साथ महमूद ने गीत गाये। एक बार फिर कल्याणजी-आनंदजी नें फ़िल्म 'वरदान' के किसी गीत में महमूद साहब की आवाज़ ली। अमरीश पुरी ने अल्का याज्ञ्निक के साथ 'आज का अर्जुन' में "माशूका माशूका" गीत में दो लाइनें गाये, शक्ति कपूर की आवाज़ सुनाई दी शैलेन्द्र सिंह के साथ फ़िल्म 'पसंद अपनी अपनी' के एक गीत में, जॉनी लीवर ने भी अपना रंग जमाया 'इश्क़' और 'इण्टरनैशनल खिलाड़ी' जैसी फ़िल्मों के गीतों में, तो अनुपम खेर साहब गाये उषा कृष्णदास के साथ 'एक अलग मौसम' फ़िल्म का गीत और यश चोपड़ा की पत्नी व गायिका पामेला चोपड़ा के साथ 'विजय' फ़िल्म का एक गीत।

पामेला चोपड़ा ने पहली बार 1977 की यश चोपड़ा की फ़िल्म 'दूसरा आदमी' में देवेन वर्मा के साथ मिल कर एक गीत गाया था जिसके बोल थे "माथे पे लगाइके बिंदिया, अँखियन उड़ाइके निंदिया, खड़ी रे निहारे गोरी, आयेंगे साँवरिया, अँगना आयेंगे साँवरिया..."। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए। अधिकांश गीत किशोर कुमार और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ों में थे जैसे कि "नैनों में काजल है", "आओ मनायें जश्न-ए-मोहब्बत जाम उठायें जाम के बाद", "नज़रों से कहदो प्यार में मिलने का मौसम आ गया", और "क्या मौसम है" (रफ़ी के साथ)। किशोर कुमार और पामेला चोपड़ा का गाया "जान मेरी रूठ गई" भी हिट रहा। पर देवेन वर्मा और पामेला चोपड़ा के गाए "अंगना आयेंगे साँवरिया" गीत की बात ही कुछ और है। देवेन वर्मा के चाहने वालों को अचम्भित कर दिया था यह गीत क्योंकि यह कोई साधारण गीत नहीं था, बहुत ऊँची पट्टी पर गाया हुआ भोजपुरी लोक-शैली का यह गीत है जिसे हर कोई नहीं गा सकता। फ़िल्म में सिचुएशन कुछ ऐसी है कि नायिका (नीतू सिंह) अपने मामा जी (देवेन वर्मा) के घर एक जन्मदिन की पार्टी में गईं हुईं है और उनके पति (ॠषी कपूर) को दफ़्तर से सीधे वहीं पार्टी में आना है। अन्य सभी निमंत्रित आ चुके हैं, पार्टी शुरू हो चुकी है। लेकिन ऋषी कपूर आने में देर कर रहे हैं और नीतू सिंह उदास हो रही है और बार बार दरवाज़े की तरफ़ देख रही है। ऐसे में देवेन वर्मा साहब हारमोनियम और पूरी संगीतमय टोली के साथ ज़मीन पर बैठे गीत छेड़ते हैं "माथे पे लगाइके बिंदिया..."। यह सांकेतिक गीत है जो नीतू सिंह के उस समय के दिल का हाल बयान कर रहे हैं।

कहा जाता है कि इस गीत को शुरू-शुरू में किशोर कुमार और पामेला चोपड़ा से ही गवाने का ख़याल आया था, पर म्युज़िक सिटिंग के दौरान यूँ ही एक दिन देवेन वर्मा इस गीत को गा उठे। संगीत की अच्छी समझ रखने वाले यश चोपड़ा को यह निर्णय लेने में ज़रा सी भी देर नहीं लगी कि इस गीत के लिए देवेन वर्मा की आवाज़ और गायकी का अंदाज़ ही सर्वोत्तम रहेगा। इस तरह से यह गीत आ गया देवेन वर्मा की झोली में। राजेश रोशन ने देवेन वर्मा को कुछ टिप्स दिये और इस तरह से रेकॉर्ड हो गया यह गीत। इसी साल 1977 में देवेन वर्मा अभिनीत फ़िल्म 'आदमी सड़क का' में भी उन्हें दो गीत गाने के अवसर मिले - "आज मेरे यार की शादी है" और अनुराधा के साथ "बुरा ना मानो दोस्ती यारी में"। 1981 की फ़िल्म 'जोश' में अमजद ख़ान के साथ गाया हुआ उनका "खाट पे खटमल चलेगा जब दिन में सूरज ढलेगा" गीत वैसे ज़्यादा सुनने को नहीं मिला। आश्चर्य की बात है कि देवेन वर्मा अभिनीत सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म 'अंगूर' में गायक सपन चक्रवर्ती ने सी. एच. आत्मा का मशहूर गीत "प्रीतम आन मिलो" को गाया था जो देवेन वर्मा पर फ़िल्माया गया था। सपन चक्रवर्ती की आवाज़ देवेन वर्मा पर इतनी फ़िट बैठी और देवेन वर्मा ने भी उसे इतना अच्छा निभाया कि लोगों को लगा कि इसे देवेन वर्मा ने ख़ुद ही गाया है। देवेन वर्मा आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनका अभिनय हमारे पास सुरक्षित है, जब भी हम उदास होंगे, उनकी फ़िल्में हमें गुदगुदा जायेंगी, हँसा जायेंगी, उदासी के बादल को उड़ा जायेंगी। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की ओर से देवेन वर्मा की पुण्य स्मृति को विनम्र नमन। सुनते हैं फ़िल्म 'दूसरा आदमी' का यह गीत।

फिल्म - दूसरा आदमी : ‘अँगना आयेंगे साँवरिया...’ : स्वर - देवेन वर्मा और पामेला चोपड़ा : संगीत - राजेश रोशन : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी 




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प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Monday, June 13, 2011

मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनो....लीजिए एक बार फिर बच्चे बनकर आनंद लें इस कहानी का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 677/2011/117

हानीनुमा फ़िल्मी गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की आज की कड़ी में हम जिस गीतकार की रचना सुनवाने जा रहे हैं, उन्हीं के लिखे हुए गीत के मुखड़े को इस शृंखला का नाम दिया गया है। जी हाँ, "एक था गुल और एक थी बुलबुल" के लेखक आनन्द बक्शी, जिन्होंने इस गीत के अलावा भी कई कहानीनुमा गीत लिखे हैं। इनमें से दो गीत तो इस क़दर मशहूर हुए हैं कि उन्हें अगर इस शृंखला में शामिल न करें तो मज़ा ही नहीं आयेगा। तो चलिये आज और कल की कड़ियों में बक्शी साहब के लिखे दो हिट गीतों का आनन्द लें। अब तक इस शृंखला में आपनें जितने भी गीत सुनें, वो ज़्यादातर राजा-रानी की कहानियों पर आधारित थे। लेकिन आज का जो हमारा गीत है, उसमें क़िस्सा है एक शेर का। बच्चों को शेर से बड़ा डर लगता है, और जहाँ डर होता है, वहीं दिलचस्पी भी ज़्यादा होती है। इसलिये शेर और जंगल की कहानियाँ बच्चों को बहुत पसंद आते हैं। अभी हाल ही में बक्शी साहब के बेटे राकेश जी से हमारी मुलाक़ात में उन्होंने बताया था कि बक्शी साहब हर रोज़ एक नई कहानी, एक नई किताब पढ़ते थे, और गीत लेखन के अलावा भी उनका फ़िल्मों के सीन्स का आइडिया अच्छा था। शायद यही वजह है कि इस कहानीनुमा गीत को उन्होंने इतना ख़ूबसूरत अंजाम दिया है। अमिताभ बच्चन, मास्टर रवि और बच्चों की आवाज़ों में यह है फ़िल्म 'मिस्टर नटवरलाल' का गीत "मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक क़िस्सा सुनों"। कमाल की कल्पना की है उन्होंने इस गीत को लेकर। और आख़िर में "ये जीना भी कोई जीना है लल्लु" को तो जैसे फ़िल्मी गीतों के पंचलाइनों का सरताज ही कहलाया जा सकता है। संगीतकार राजेश रोशन के संगीत नें भी बड़ा ही यथार्थ माहौल बनाया, बिल्कुल जिस माहौल की इस गीत को ज़रूरत थी।

अमिताभ बच्चन का गाया यह पहला पहला फ़िल्मी गीत था, और इस गीत को गा कर उन्हें बतौर गायक भी प्रसिद्धी मिली। अभिनय के साथ साथ उनकी गायकी को भी लोगों नें हाथों हाथ ग्रहण किया। यह सच है कि आनन्द बक्शी और राजेश रोशन का इस गीत में बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन अगर किसी नें इस गीत में जान फूंकी है, तो वो हैं हमारे बिग-बी। इस गीत में उनकी अदायगी ही उनकी प्रतिभा का लोहा है, यह गीत साबित करती है कि वोही नंबर वन हैं। दोस्तों, इस गीत के बारे में चाहे आप कितनी भी चर्चा क्यों न कर लें, असली मज़ा तो केवल इस गीत को सुनने में ही आता है। इसलिए अब मैं आपके और इस गीत के बीच में से हट जाता हूँ, लेकिन उससे पहले ये रही जंगल और शेर की कहानी:

कई साल पहले की ये बात है,
भयानक अंधेरी सिया रात में,
लिये अपनी बंदूक मैं हाथ में,
घने जंगलों से गुज़रता हुआ कहीं जा रहा था।

नहीं भूलती उफ़ वो जंगल की रात,
मुझे याद है वो थी मंगल की रात,
चला जा रहा था मैं डरता हुआ,
हनुमान चालीसा पढ़ता हुआ,
बोलो हनुमान की जय,
जय जय बजरंग बली की जय।

घड़ी थी अंधेरा मगर सख़्त था,
कोई बस दस सवा दस का वक़्त था,
लरज़ता था कोयल की भी कूक से,
बुरा हाल हुआ उसपे भूख से,
लगा तोड़ने एक बेरी से बेर,
मेरे सामने आ गया एक शेर।

कोई घिघी बंदी नज़र फिर गई,
तो बंदूक भी हाथ से गिर गई,
मैं लपका वो झपका,
मैं उपर वो नीचे,
वो आगे मैं पीछे,
मैं पेड़ पे वो नीचे,
अरे बचाओ अरे बचाओ,
मैं डाल-डाल वो पात-पात,
मैं पसीना वो बाग-बाग,
मैं सुर में वो ताल में,
मैं जंगल वो पाताल में,
बचाओ बचाओ,
अरे भागो रे भागो,
ख़ुदा की क़सम मज़ा आ गया,
मुझे मार कर "बेसरम" खा गया।

खा गया? लेकिन आप तो ज़िंदा हो?

अरे ये जीना भी कोई जीना है लल्लू? हाँ?




क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्मकार मोहन कुमार नें एक दिन आनन्द बक्शी को गाते हुए सुन लिया और इतने प्रभावित हुए कि उनसे ज़बरदस्ती अपनी फ़िल्म 'मोम की गुड़िया' में दो गीत गाने के लिये राज़ी करवा लिये।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 8/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान .
सवाल १ - नायक के पिछले जनम वाले किरदार की भूमिका किस ने की थी - ३ अंक
सवाल २ - किस अभिनेत्री ने फिल्म में खलनायिका का काम किया है - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी अनजाना जी कि अनुपस्तिथि में अब आगे आ गए हैं. अविनाश जी को भी २ अंकों की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, June 1, 2011

आओ मनाये जश्ने मोहब्बत, जाम उठाये गीतकार मजरूह साहब के नाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 669/2011/109

जरूह सुल्तानपुरी एक ऐसे गीतकार रहे हैं जिनका करीयर ४० के दशक में शुरु हो कर ९० के दशक के अंत तक निरंतर चलता रहा और हर दशक में उन्होंने अपना लोहा मनवाया। कल हमनें १९७३ की फ़िल्म 'अभिमान' का गीत सुना था। आज भी इसी दशक में विचरण करते हुए हमनें जिस संगीतकार की रचना चुनी है, वो हैं राजेश रोशन। वैसे तो राजेश रोशन के पिता रोशन के साथ भी मजरूह साहब नें अच्छा काम किया, फ़िल्म 'ममता' का संगीत उसका मिसाल है; लेकिन क्योंकि हमें १०-कड़ियों की इस छोटी सी शृंखला में अलग अलग दौर के संगीतकारों को शामिल करना था, इसलिए रोशन साहब को हम शामिल नहीं कर सके, लेकिन इस कमी को हमन उनके बेटे राजेश रोशन को शामिल कर पूरा कर रहे हैं। एक बड़ा ही लाजवाब गीत हमनें सुना है मजरूह-राजेश कम्बिनेशन का, १९७७ की फ़िल्म 'दूसरा आदमी' से। "आओ मनायें जश्न-ए-मोहब्बत जाम उठायें जाम के बाद, शाम से पहले कौन ये सोचे क्या होना है शाम के बाद"। हज़ारों गीतों के रचैता मजरूह सुल्तानपुरी के फ़न की जितनी तारीफ़ की जाये कम है। ज़िक्र चाहे दोस्त के दोस्ती की हो या फिर महबूब द्वारा अपने महबूबा से छुवन का पहला अहसास, मुश्किल से मुश्किल भाव को भी बड़े ही सहजता से व्यक्त करना उनका कमाल था और बड़ी ख़ूबसूरती के साथ इन अहसासों को वे लफ़्ज़ों में पकड़ लेते थे। लता मंगेशकर और किशोर कुमार की आवाज़ों में आज का प्रस्तुत गीत भी इन्हीं में से एक है।

फ़िल्म संगीत का स्वर्णयुग बीत जाने के बाद भी मजरूह सुल्तानपुरी अपने स्तर को कायम रखने में सक्षम थे। जहाँ दूसरे गीतकार फ़िल्म निर्माता के डिमाण्ड के मुताबिक सस्ते और चल्ताउ किस्म के गीत लिख रहे थे और उन्हें पब्लिक डिमाण्ड कह कर चला रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ गिने-चुने गीतकारों नें यह साबित भी किया कि अगर सृजनात्मक्ता है तो तमाम पाबंदियों में रह कर भी अच्छा गीत लिखा जा सकता है। मजरूह साहब भी इन गिने चुने गीतकारों में से थे। शारीरिक संबंध और पैशन को अश्लील और खुले शब्दों में व्यक्त करने का काम तो बहुत से गीतकारों नें हाल में किया है, लेकिन मजरूह साहब नें कई बार ऐसे सिचुएशनों के लिये भी कुछ ऐसे सुंदर गीत लिखे हैं जो यौनोत्तेजक होते हुए भी उनमें कितनी सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। मजरूह साहब के ही शब्दों में - "I have said it all in so many songs, without resorting to cheapness or blatant verse"। उनका कहना बिल्कुल सही है। फ़िल्म 'अनामिका' में लता जी से ही गवाया गया था "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा"। अगर इस गीत को दूसरे अंदाज़ में लिखा गया होता तो शायद लता जी इस गीत को कभी नहीं गातीं, लेकिन सेन्सुअस होते हुए भी शालीनता को बरकरार रखते हुए मजरूह साहब नें इस गीत को जो अंजाम दिया है कि लता जी भी गीत को गाने के लिये राज़ी हो गईं, जब कि फ़िल्म के सभी दूसरे गीत आशा जी की आवाज़ में है। और आज के अंक के 'दूसरा आदमी' के गीत को ही ले लीजिये, इसके अंतरे के बोलों पर ज़रा ध्यान दीजिये, "ये आलम है ऐसा, उड़ा जा रहा हूँ, तुम्हें लेके बाहों में, हमारे लबों से तुम्हारे लबों तक, नहीं कोई राहों में, कैसे कोई अब दिल को सम्भाले, इतने हसीं पैग़ाम के बाद, शाम से पहले कौन ये सोचे क्या होना है शाम के बाद"। गीत के पिक्चराइज़ेशन की बात करें तो यह पार्श्व में चलने वाला गीत है, यानी किसी अभिनेता ने लिप-सींक नहीं किया है। पार्टी में ॠषी कपूर और राखी डांस करते हुए दिखाये जाते हैं और राखी को मन ही मन चाहने वाले परीक्षित साहनी दूर खड़े उन्हें देखते रहते हैं। और घर में तन्हाई में बैठी नीतू सिंह अपने पति ॠषी कपूर के दफ़्तर से वापस लौटने का इंतज़ार कर रही है। वैवाहिक संबंधों के तानेबाने पर केन्द्रित यश चोपड़ा की इस फ़िल्म के सभी गानें लोकप्रिय हुए थे, लेकिन यह गीत फ़िल्म का सब से उत्कृष्ट गीत है हमारी नज़र में, आइए सुना जाये!



क्या आप जानते हैं...
कि मजरूह सुल्तानपुरी के बेटे अंदलिब सुल्तानपुरी फ़िल्म जगत में एक निर्देशक की हैसियत रखते हैं। 'जानम समझा करो' उन्हीं के निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 9/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - फिल्म में नायक के भाई की भूमिका किस कलाकार ने निभायी है - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - निर्देशक कौन है इस खूबसूरत फिल्म के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अविनाश जी ने दूसरी कोशिश में कैच पूरा किया और लपक लिए ३ अंक. प्रतीक जी और क्षिति जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, March 23, 2011

कोमल है कमज़ोर नहीं तू.....जब खुद एक सशक्त महिला के गले से निकला हो ऐसा गीत तो निश्चित ही एक प्रेरणा स्रोत बन जाता है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 619/2010/319

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'कोमल है कमज़ोर नहीं' शृंखला की कल की कड़ी में हमनें यह कहा था कि पार्श्वगायन को छोड़ कर हिंदी फ़िल्म निर्माण के अन्य सभी क्षेत्रों में पुरुषों का ही शुरु से दबदबा रहा है। दोस्तों, भले ही पार्श्वगायन की तरफ़ महिलाओं ने बहुत पहले से ही क़दम बढ़ा लिया था, लेकिन इस राह पर चलने और सफलता प्राप्त करने के लिए भी गायिकाओं को कड़ी मेहनत करनी पड़ी है। १९३३ में एक बच्ची का जन्म हुआ था जिसने ९ वर्ष की आयु में ही अपने पिता को खो दिया। जब वो १६ वर्ष की हुईं तो एक ३१ वर्षीय आदमी से अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर प्रेम-विवाह कर लिया। और इस वजह से उनके परिवार ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया। और अफ़सोस की बात यह कि ससुराल वालों ने भी उनके साथ दुर्व्यवहार किया। अपने बच्चों को पालने के लिए वो पार्श्वगायन के मैदान में उतरीं। गर्भवती अवस्था में भी उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी। आगे चलकर उन्होंने अपने बच्चों को लेकर हमेशा के लिए अपने पति का घर छोड़ दिया। पार्श्वगायन में शुरु शुरु में उन्हें कमचर्चित संगीतकारों के लिए ही गाने के मौके मिलते थे, जिस वजह से सफलता उनसे दूर दूर ही रहती, लेकिन १० वर्षों तक लगातार संघर्ष करने के बाद सफलता आख़िर उनके क़दमों पे आकर गिर ही पड़ीं, और आज 'आशा भोसले' का नाम बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर फिरता है। 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की नौवीं कड़ी है आशा जी के नाम। आशा जी के बारे में और नया क्या बताऊँ, चलिए आज उनको मिले पुरस्कारों पर एक नज़र डालते हैं। उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से १९६७, १९६८, १९७१, १९७२, १९७३, १९७४, १९७७ और २००० में सम्मानित किया गया है। राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें मिले १९८१ और १९८६ में। अन्य पुरस्कारों में शामिल हैं नाइटिंगेल ऒफ़ एशिया अवार्ड (१९८७), मध्य प्रदेश शासन पदत्त लता मंगेशकर अवार्ड (१९८९), स्क्रीन विडिओकोन अवार्ड (१९९७, २००२), एम.टी.वी अवार्ड (१९९७, २००१), चैनल वी अवार्ड (१९९७), दयावती मोदी अवार्ड (१९९८), महाराष्ट्र शासन प्रदत्त लता मंगेशकर अवार्ड (१९९९), सिंगर ऒफ़ दि मिलेनियम अवार्ड (२०००), ज़ी गोल्ड बॊलीवूड अवार्ड (२०००), बी.बी.सी. लाइफ़टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड (२००२), ज़ी सिने अवार्ड (२००२), सैन्सुइ मूवी अवार्ड (२००२), स्वरालय येसुदास अवार्ड (२००२), इण्डियन चेम्बर ऒफ़ कॊमर्स प्रदत्त लिविंग् लिजेण्ड अवार्ड (२००४) आदि। लेकिन इन सब से भी बड़ा पुरस्कार है उनके असंख्य चाहनेवालों का प्यार जो उन्हें बराबर मिलता आया है और आगे भी मिलता रहेगा।

आशा भोसले को सलाम करने के लिए हमने जो गीत चुना है, वह वही गीत है जिसके मुखड़े की पंक्ति से प्रेरीत होकर हमनें इस शृंखला का शीर्षक रखा है "कोमल है कमज़ोर नहीं"। जी हाँ, यह फ़िल्म 'आख़िर क्यों?' का गीत है जो फ़िल्माया गया है स्मिता पाटिल पर। इस फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि निशा (स्मिता पाटिल) अपने पति कबीर (राकेश रोशन) के साथ ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिता रही होती हैं। लेकिन जल्द ही निशा के जीवन में प्रलय आ जाती है जब उन्हें पता चलता है कि कबीर का उसकी की बहन इंदु (टिना मुनीम) के साथ संबंध है। निशा अपनी बेटी को लेकर घर छोड़ देती है और फिर शुरु होता है उसका संघर्ष। वो अपने पैरों पर खड़ी होती है, लड़कियों के एक स्कूल में म्युज़िक टीचर की नौकरी करती है और अपनी बेटी को पालती है। और इस सफ़र में उसका हमसफ़र बनने के लिए उसके जीवन में आता है लेखक आलोक (राजेश खन्ना)। जे. ओम प्रकाश निर्देशित १९८५ की फ़िल्म 'आख़िर क्यों?' की पटकथा व संवाद लिखीं डॊ. अचला नागर नें। राजेश रोशन का संगीत था तथा इंदीवर के लिखे इस फ़िल्म के गीतों को ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। "दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है", "एक अंधेरा लाख सितारे", "सात रंग में खेल रही है दिलवालों की टोली रे" और "शाम हुई चढ़ आयी रे बदरिया" जैसे कामयाब गीतों के साथ साथ आज का प्रस्तुत गीत भी काफ़ी सुना गया। आज का यह गीत इस शृंखला के लिए बहुत ही सटीक है, इसके एक एक शब्द से नारी-शक्ति की ख़ुशबू आती है। कविता की शैली में लिखा यह गीत सुनने से पहले पढ़िए इसके बोल...

कोमल है कमज़ोर नहीं तू,
शक्ति का नाम ही नारी है,
जग को जीवन देनेवाली,
मौत भी तुझसे हारी है।

सतियों के नाम पे तुझे जलाया,
मीरा के नाम पे ज़हर पिलाया,
सीता जैसी अग्नि-परीक्षा
जग में अब तक जारी है।

इल्म हुनर में दिल दिमाग में
किसी बात में कम तू नहीं,
पुरुषों वाले सारे ही
अधिकारों की अधिकारी है।

बहुत हो चुका अब मत सहना,
तुझे इतिहास बदलना है,
नारी को कोई कह ना पाये
अबला है बेचारी है।

'कोमल है कमज़ोर नहीं' का यह अंक समर्पित है आशा भोसले स्मिता पाटिल और डॊ. अचला नागर के नाम!



क्या आप जानते हैं...
कि आशा भोसले नें भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, रूसी और मलय भाषाओं में भी गीत गाये हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - महान लता को समर्पित है ये अंक, तो चंद सवाल उन्हीं के बारे में आज.

सवाल १ - लता ने अपना पहला पार्श्वगायन किस संगीतकार के लिए किया था - २ अंक
सवाल २ - उनके सबसे पहले गाये गीत "मैं खिली खिली" में किसने उनका साथ दिया था यानी आवाज़ मिलाई थी - ३ अंक
सवाल ३ - प्रस्तुत गीत के संगीतकार ने एक मराठी फिल्म में चारों मंगेशकर बहनों को एक साथ गवाया था, क्या है उस मराठी फिल्म का नाम - ४ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजाना जी आज आखिरी मौका है, कुछ कर गुजरिये....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, January 26, 2011

सुनसान रातों में जब तू नहीं आता.....जानिए कमल शर्मा से कि क्या क्या हैं हिंदी होर्रर फिल्मों के भूतों की पसंद

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 579/2010/279

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 'मानो या ना मानो' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला का इन दिनों आप आनंद ले रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से इस स्तंभ का माहौल थोड़ा भारी सा हो रहा था, इसलिए हमने सोचा कि आज माहौल कुछ हल्का किया जाए। अब आप यह भी सोच रहे होंगे कि भूत-प्रेत और आत्माओं की बातें हो रही है, सस्पेन्स फ़िल्मों के शीर्षक गानें बज रहे हैं, तो माहौल हल्का कैसे हो सकता है भला! दोस्तों, एक बार विविध भारती के 'छाया गीत' कार्यक्रम में वरिष्ठ उद्घोषक कमल शर्मा ने कार्यक्रम पेश किया था जिसका शीर्षक था 'फ़िल्मी आत्माएँ'। हमारी फ़िल्मों में जब भी भूत-प्रेत या आत्मा या सस्पेन्स को दिखाने की बात चलती है तो सभी निर्देशक कुछ फ़ॊर्मुला चीज़ें इख़्तियार करते हैं। इन्हीं फ़ॊर्मुला बातों की हास्यास्पद खिंचाई करते हुए कमल जी ने उस कार्यक्रम का आलेख लिखा था। आइए आज उसी आलेख को यहाँ प्रस्तुत कर आपको ज़रा गुदगुदाया जाये। "छाया गीत सुनने वाले सभी श्रोताओं को कमल शर्मा का नमस्कार! एक हवेली... कोहरा..... पूरा चाँद..... जंगल-झाड़ियाँ..... सूखे पत्ते..... एक बग्गी आकर रुकी..... एक बूढ़ा चौकीदार जिसके उम्र का अंदाज़ा लगाना नामुमकिन..... ये सब हॊरर फ़िल्मों के पर्मनेण्ट फ़ीचर्स हैं। हालाँकि अभी १० बजे हैं, पुरानी फ़िल्मी आत्माएँ रात के ठीक १२ बजे वाक करने निकलती थीं। आजकल उन्हें टेलीविज़न पर भी बहुत काम मिलने लगा है। वैसे फ़िल्मी आत्मा नई हो या पुरानी, दोनों में कुछ चीज़ें बड़ी कॊमन है। आत्मा होने के बावजूद वो बाल शैम्पू से धोकर सिल्की बनाती थीं। उन्हे बालों में रबर-बैण्ड या क्लिप लगाना पसंद नहीं, बाल खुली रखती थी। एक बात और, सभी फ़ीमेल आत्माएँ बड़ी ग्लैमरस होती हैं, और उन्हें किसी ना किसी का इंतज़ार रहता है। फ़िल्मी आत्माओं की सब से अच्छी बात यह है कि उन्हें संगीत में गहरी रुचि होती है। वो अच्छा गाती हैं, दिन भर गाने का रियाज़ करती हैं और फिर रात १२ बजे ओपेन एयर में गाने निकल पड़ती हैं। फ़िल्मी आत्माओं का फ़ेवरीट कलर है व्हाइट, जॊर्जेट उनकी पसंदीदा साड़ी है। बल्कि युं कहें कि उनके पास ऐसी कई साड़ियाँ होती हैं, क्योंकि उन्हें कई सालों तक भटकना होता है ना! और ऐसे में एक ही साड़ी से थोड़े ना काम चलेगा! और हाँ, १२ बजे वो इसलिए निकलती हैं क्योंकि १० बजे से वो मेक-अप करती हैं, इसमें दो घण्टे तो लग ही जाते हैं! बस इधर १२ बजे, उधर गाना शुरु!" और दोस्तों, गाने वही जो इन दिनों आप इस स्तंभ में सुन रहे हैं, जैसे कि "कहीं दीप जले कही दिल", "आयेगा आनेवाला", "तुझ बिन जिया उदास रे", "गुमनाम है कोई", वगेरह वगेरह।

कमल शर्मा आगे कहते हैं, "ज़्यादातर फ़िल्मी आत्माओं के पास मोमबत्ती होती है, या फिर दूसरा ऒप्शन है दीया। टॊर्च में वो बिलीव नहीं करती। रिमोट एरीयाज़ में तेल और मोमबत्ती तो फिर भी मिल सकती है लेकिन टॊर्च नहीं। उसमें सेल भी डाउन होते हैं। दीया और मोमबत्ती फ़िल्मी आत्माओं के ज़रूरी गैजेट्स की तरह हैं जो उसकी पहचान से भी जुड़े हैं। उसे रास्ता खोजने के लिए इनकी ज़रूरत नहीं पड़ती, सालों भटकते रहने से तो रास्ते याद भी हो जाते हैं, है न! फ़िल्मी आत्माएँ जब चलती हैं तो पीछे पीछे अण्डरकवर एजेण्ट की तरह कोहरा भी चलता है। धुंध या कोहरे से माहौल बनता है, ऐम्बिएन्स बनता है। फिर इनके पीछे पीछे हवा चलती है, और हवा के साथ साथ मैरथन के धावकों की तरह सूखे पत्ते चलते हैं। फ़िल्मी आत्माएँ ना तो कोई सॊलिड फ़ूड लेती हैं और ना ही कोई लिक्वीड, क्योंकि इसका अभी तक कोई रेकॊर्ड भी नहीं मिला है किसी फ़िल्म में। यह ज़रूर है कि उन्हें छोटे छोटे फ़्लैट्स या चाल पसंद नहीं, उन्हें ऐण्टिक का शौक़ है, विंटेज चीज़ों में उनकी गहरी दिलचस्पी है, उन्हें पुरानी हवेलियाँ पसंद है, जंगल और वीरानों में इनका मेण्टेनेन्स कौन करता है यह अभी तक नहीं मालूम!" कहिए दोस्तों, कैसा लगा? मज़ेदार था ना! और आइए अब आते हैं आज के गीत पर। एक बार फिर लता जी की आवाज़, इस बार गीत फ़िल्माया गया है सारिका पर और इस सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म का नाम है 'सन्नाटा'। लता जी ने अपने एक इण्टरव्यु में मज़ाक मज़ाक में बताया था कि उन्हें भूतों से गहरा लगाव है, तभी तो उन्हें इतने सारे भूतों के गीत गाने को मिले। फ़िल्म 'सन्नाटा' १९८१ की फ़िल्म थी जिसके संगीतकार थे राजेश रोशन। 'सन्नाटा' निर्देशित की थी श्याम रामसे और तुल्सी रामसे ने। जी हाँ दोस्तों, वही रामसे ब्रदर्स, जो ८० के दशक में हॊरर फ़िल्मों के निर्माण के लिए जाने गये। उस दशक में इस बैनर ने एक से एक हॊरर फ़िल्म बनाई जिन्हें लोगों ने सफल भी बनाया। अगले दौर में इस ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर लिया रामगोपाल वर्मा ने, जिनकी 'कौन', 'भूत', 'डरना मना है', 'डरना ज़रूरी है', 'जंगल' और 'फूँक' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया और हॊरर फ़िल्मों को एक नयी दिशा दी। ख़ैर, 'सन्नाटा' पर वापस आते हैं, इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे विजय अरोड़ा, बिंदिया गोस्वामी, सारिका, हेलेन, महमूद प्रमुख। इस फ़िल्म का जो हौण्टिंग् नंबर आपको सुनवा रहे हैं, उसके बोल हैं "सुनसान रातों में, जब तू नहीं आता, तेरे बिना मुझे लगता है, गहरा ये सन्नाटा"। लता जी ने ४० के दशक के आख़िर में "आयेगा आनेवाला" गाकर इस जौनर के गानों की नीव रखी थी, और ८० के दशक के इस शुरुआती फ़िल्म में भी उन्होंने उस सिल्सिले को जारी रखते हुये अपनी रूहानी आवाज़ में इस गीत को गाया। तो आइए सुनते हैं फ़िल्म 'सन्नाटा' के इस शीर्षक गीत को।



क्या आप जानते हैं...
कि लता मंगेशकर और उदित नारायण ने १९८१ की फ़िल्म 'बड़े दिलवाले' में पहली बार साथ में गाया था "जीवन के दिन छोटे सही", जो फ़िल्माया गया थ सारिका और प्राण साहब पर।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आनंद बक्षी साहब ने लिखा था इस गीत को.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक बताएं - 2 अंक
सवाल २ - प्रमुख अभिनेत्री बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अनजान जी दो अंकों की बधाई....पर इस बार तो अमित जी अजय बढ़त बना ही चुके हैं, उन्हें डबल बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, April 26, 2010

राजेश रोशन को था अपनी धुन पर पूरा विश्वास जिसकी बदौलत सुनने वालों को मिला एक बेहद मनभावन गीत

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०६

राजेश रोशन ने अपने करीयर में कई बार रबीन्द्र संगीत से धुन लेकर हिंदी फ़िल्मी गीत तैयार किया है। इनमें से सब से मशहूर गीत रहा है फ़िल्म 'याराना' का "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा"। आज इस गीत की बारी 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में। क्योंकि यह गीत अंजान ने लिखा है, तो आज जान लेते हैं इस गीत के बारे में अनजान साहब के बेटे समीर क्या कह रहे हैं विविध भारती पर। "उन्होने (अंजान ने) मुखड़ा मुझे सुनाया "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", मुझे लगा कि बहुत ख़ूबसूरत गाना बनेगा। मगर जब हम गाँव से वापस आए और सिटिंग् हुई और रिकार्डिंग् पर जब गाना पहुँचा तो संजोग की बात थी कि रिकार्डिंग् में जाने से पहले तक प्रोड्युसर ने वो गाना नहीं सुना था। और रिकार्डिंग् में जब प्रोड्युसर आया और उन्होने जैसे ही गाना सुना तो बोले कि रिकार्डिंग् कैन्सल करो, मुझे यह गाना रिकार्ड नहीं करना है। उन्होने कहा कि इतना बेकार गाना मैंने अपनी ज़िंदगी में नहीं सुना, इतना खराब गाना राजु तुमने हमारी फ़िल्म के लिए बनाया है, मुझे यह गाना रिकार्ड नहीं करना है। अब राजेश रोशन का दिमाग़ उस ज़माने में, उनको ग़ुस्सा बहुत आता था, उन्होने कहा कि गफ़्फ़ार भाई, उनका नाम था गफ़्फ़ार नाडियाडवाला, सूरज नाडियाडवाला, हमीद नाडियादवाला, हमीद उसके प्रोड्युसर थे, हमीद, यह फ़िल्म बने ना बने, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गाना मैं रिकार्ड करने जा रहा हूँ और यह गाना मैं अपने पैसे से रिकार्ड करने जा रहा हूँ। और तुम अभी इसी वक़्त इस रिकार्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नही देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा, मैं यह गाना रिकार्ड करूँगा, तुमको इसका पैसा नहीं देना है, मैं अपने पैसे से रिकार्ड करूँगा। और उस आदमी ने अपने पैसे से वह गाना रिकार्ड किया और गाना रिकार्ड होके जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होने यह बात कही थी कि अगर यह गाना नहीं होगा तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा। और वह गाना माइलस्टोन बना।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - छूकर मेरे मन को
कवर गायन - रफीक शेख




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Friday, April 16, 2010

तुमसे मिला था प्यार....गुलज़ार का लिखा ये गीत है योगेश पाटिल को पसंद

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 406/2010/106

'पसंद अपनी अपनी' में फ़रमाइशी गीतों का सिलसिला जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज बारी है योगेश पाटिल के पसंद के गाने की। आप ने सुनना चाहा है फ़िल्म 'खट्टा मीठा' से "तुमसे मिला था प्यार, कुछ अच्छे नसीब थे, हम उन दिनों अमीर थे जब तुम करीब थे"। बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत है और आम गीतों से अलग भी है। यह उन गीतों की श्रेणी में आता है जिन गीतों में गायक गायिका के आवाज़ों के साथ साथ नायक नायिका की आवाज़ें भी शामिल होती हैं। इस गीत में मुख्य आवाज़ लता मंगेशकर की है, अंत में किशोर कुमार दो पंक्तियाँ गाते हैं, गीत की शुरुआत में राकेश रोशन और बिंदिया गोस्वामी के संवाद हैं और इंटरल्युड में भी राकेश रोशन के संवाद हैं। इस गीत को लिखा है गुलज़ार ने और संगीतकार हैं राजेश रोशन। भले ही राजेश रोशन समय समय पर विवादों से घिरे रहे, लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि उन्होने कुछ बेहद अच्छे गानें भी हमें दिए हैं। और उनके द्वारा रचे लता-किशोर के गाए सभी युगलगीत बेहद लोकप्रिय हुए हैं। आज के प्रस्तुत गीत में गुलज़ार साहब ने संवादों के साथ गीत को इस ख़ूबसूरती के साथ जोड़ा है कि जिस शब्द से संवाद ख़त्म होता है, उसी शब्द से फिर गीत का अंतरा शुरु हो जाता है। गुलज़ार साहब की शब्दों में सुनने वालों को उलझाने की अदा उन्ही दिनों शुरु हो चुकी थी; जैसे कि इस गीत के पहले अंतरे में वो लिखते हैं कि "सोचा था मय है ज़िंदगी और ज़िंदगी की मय, प्याला हटा के तेरी हथेली से पीएँगे"। सुनने वाला कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाता है कि इसका भावार्थ क्या है!

'खट्टा मीठा' १९७७-७८ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था रोमू एन. सिप्पी और गुल आनंद ने, निर्देशक थे बासु चटर्जी तथा राकेश रोशन व बिंदिया गोस्वामी के अलावा फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं इफ्तेखार, देवेन वर्मा, अशोक कुमार, पर्ल पदमसी, डेविड, प्रीति गांगुली और केश्टो मुखर्जी ने। उस ज़माने में पार्सी परिवार के पार्श्व पर कई फ़िल्में बन रही थीं, यह उन्ही में से एक है। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की थी कि होमी मिस्त्री (अशोक कुमार) की पत्नी के गुज़रे हुए कई साल बीत चुके हैं, और उनका समय अपने चार बेटों की देखभाल, घर की देख रेख और फ़ैक्टरी के काम काज में निकलता है। उधर नरगिस सेठना (पर्ल पदमसी) भी एक विधवा है जिसके दो बेटे और एक बेटी है, और रहने के लिए एक बहुत बड़ा मकान भी है। सोली (डेविड), जो होमी और नरगिस दोनों के दोस्त हैं, वो इन दोनों को आपस में शादी कर लेने का सुझाव देते हैं ताकि कम से कम दोनों घर के बच्चों को माँ और बाप दोनों का प्यार मिल सके, और रहने के लिए एक बड़ा मकान भी मिले। शादी हो जाती है और उसके बाद कहानी एक हास्यास्पद मोड़ लेती है जब दो घरों के बच्चे आपस में और नए माहौल में ऐडज्स्ट करने की कोशिश करते हैं। यही है इस फ़िल्म की मूल कहानी और इसी कहाने में फ़ीरोज़ सेठना (राकेश रोशन) और ज़रीन (बिंदिया गोस्वामी) की प्रेम कहानी को भी ख़ूबसूरती से मिलाया गया है। इस फ़िल्म का लता-किशोर का गाया "थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है" गीत काफ़ी मशहूर हुआ, जिसके शीर्षक से एक लोकप्रिय टी.वी धारावाहिक भी बनी थी एक ज़माने में। किशोर कुमार व उषा मंगेशकर की आवाज़ों में फ़िल्म का शीर्षक गीत भी याद किया जाता है। तो आइए योगेश पाटिल की पसंद पर सुनते हैं "तुमसे मिला था प्यार"। योगेश जी, आप अपनी पसंद के साथ साथ मेरी पसंद भी शामिल कर लीजिए इस गीत के लिए क्योंकि मुझे भी यह गीत बेहद पसंद है। और जैसे कि इस गीत के बोलों में कहा गया है कि "हम उन दिनों अमीर थे जब तुम करीब थे", तो हम भी 'आवाज़' की तरफ़ से आप सभी से यही कहेंगे कि 'आवाज़' अमीर है आप लोगों के करीब होने से, आपके प्यार से। आप अपना प्यार 'आवाज़' पर युंही लुटाते रहिएगा ताकि हम और अमीर, और ज़्यादा अमीर होते जाएँ।



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार और राजेश रोशन ने 'खट्टा मीठा' के अलावा 'स्वयंवर' फ़िल्म में एक साथ काम किया था जिसका गीत "मुझे छू रही है तेरी गर्म सांसें" लोकप्रिय हुआ था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. फिल्म के नाम में "सपने" शब्द हैं, गीतकार बताएं -३ अंक.
2. आशा पारिख पर फिल्माए इस गीत को किस गायिका ने गाया है- २ अंक.
3. आगे चलकर इस गीत के मशहूर रीमिक्स संस्करण भी बने, संगीतकार बताएं-२ अंक.
4. फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी के क्या कहने, कभी गलत होते ही नहीं...इंदु जी सुजॉय को आपने आशीर्वाद दिया, शुक्रिया

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, April 12, 2010

राजेश रोशन के सुरों की डोर पर संगीत का आसमां छूती "काईट्स"

ताज़ा सुर ताल १५/२०१०

सुजॊय- सजीव, कुछ निर्देशक और अभिनेता ऐसे हैं जिनकी फ़िल्मों का लोग बेसबरी से इंतज़ार करते हैं। ये कलाकार ना केवल बहुत कम फ़िल्में बनाते हैं, बल्कि हर फ़िल्म में कुछ नया इस फ़िल्म जगत को देते हैं। राकेश रोशन और उनके सुपुत्र हृतिक रोशन के फ़िल्मों का जो कारवाँ 'कहो ना प्यार है' की ज़बरदस्त कामयाबी से शुरु हुआ था, वह कारवाँ उसी कामयाबी की राह पर आगे बढ़ता हुआ, 'कोई मिल गया' और 'क्रिश' जैसी ब्लॊकबस्टर फ़िल्मों के पड़ाव से गुज़र कर अब एक और महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर अग्रसर हो रहा है, जिस पड़ाव का नाम है 'काइट्स'।

सजीव - 'काइट्स' की चर्चा काफ़ी समय से हो रही है और इस फ़िल्म से लोगों को बहुत सी उम्मीदें हैं। लेकिन इस फ़िल्म को राकेश रोशन ने ज़रूर प्रोड्युस किया है, लेकिन इस बार निर्देशन की बगडोर उन्होने अपने हाथ में नहीं लिया, बल्कि यह भार सौंपा गया 'लाइफ़ इन अ मेट्रो' और 'गैंगस्टर' जैसी सफल फ़िल्मों के निर्देशक अनुराग बासु को।

सुजॊय - संगीत की बात करें तो अनुराग बासु की फ़िल्मों में अक्सर प्रीतम का ही संगीत होता है। लेकिन क्योंकि यह रोशन परिवार की फ़िल्म है तो फिर राजेश रोशन के अलावा और कौन हो सकता है फ़िल्म के संगीतकार। और वैसे भी जितनी भी बार राकेश, राजेश और ऋतिक की तिकड़ी एक जुट हुई है, हमें अच्छा संगीत सुनने को मिला है।

सजीव - भले ही राजेश रोशन अपने करीयर में कई संगीत संबंधित विवादों से घिरे रहे हैं, यह बात भी सच है कि वो उन बहुत ही गिने चुने संगीतकारों में से हैं जिन्होने बदलते वक़्त, रुचि और चलन के साथ अपने आप को ढाला है और जिसका नतीजा यह है कि ७० के दशक में उनका सगीत जितना हिट था, आज २०१० के दशक में भी युवाओं के दिलों पर उतने ही हावी हैं।

सुजॊय - तो सजीव, हृतिक रोशन और बारबरा मोरी अभिनीत 'काइट्स' के गीत संगीत की चर्चा आज 'ताज़ा सुर ताल' में हो रही है, आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं के.के की आवाज़ में, जिसे लिखा है नासिर फ़राज़ ने। पहले गीत सुन लेते हैं, फिर अपनी चर्चा आगे बढ़ाएँगे।

गीत: ज़िंदगी दो पल की


सजीव - वाह! बहुत ही अच्छी धुन जो एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह आई। जैसा कि मैंने कहा था कि राजेश रोशन हर दौर के टेस्ट के अनुरूप अपने संगीत को हाला है। के.के की आवाज़ की मिठास और पैशन, दोनों ही साफ़ झलकता है इस गीत में। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का जो तालमेल रोशन साहब ने बनाया है, गीत को बड़ा ही मेलडियस बनाता है। और जहाँ पर के.के "इंतेज़ार कब तलक" गाते हैं, उसमें राजेश रोशन का अंदाज़ आप नोटिस कर सकते हैं।

सुजॊय - कुल मिलाकर यह गीत इन दिनों ख़ूब लोकप्रिय हो रहा है और इसी गीत के ज़रिए टीवी के परदे पर फ़िल्म को प्रोमोट भी किया जा रहा है। के.के. ने इस फ़िल्म में एक और गीत गाया है "दिल क्यों ये मेरा शोर करे"। बड़ा ही सॊफ़्ट नंबर है। एक जालस्थल पर किसी ने इस गीत के बारे में यह लिखा है कि आप किसी लॊंग् ड्राइव पे निकल पड़े हो, चारों तरफ़ प्रकृति की शोभा पूरे शबाब पे हो, और एक कभी ना ख़त्म होनेवाली सड़क, ऐसे में इस गीत को बार बार सुनने का मज़ा कुछ और ही होगा।

सजीव - नासिर फ़राज़ के नर्मोनाज़ुक और काव्यात्मक शब्द और के.के. की नर्म आवाज़ ने इस गीत को बेहद कर्णप्रिय बनाता है। के.के. की खासियत है कि वो दमदार और नर्म, दोनों ही तरह के गीत वो बख़ूबी गा लेते हैं। वैसे इस गीत में आगे चलकर उनकी आवाज़ की वही दमदार और पैशन वाली अंदाज़ सुनाई देती है। वैसे इस गीत में कुछ कुछ अनुराग बासु - प्रीतम - के.के वाले गीतों की झलक भी मिलती है।

सुजॊय - और शायद बैण्ड म्युज़िक के इस्तेमाल की वजह से भी कुछ हद तक ऐसा लगा हो। जो भी है, के.के के गाए ये दोनों ही गीत लोग पसंद करेंगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है। तो आइए अब इस गीत को सुना जाए।

गीत: दिल क्यों ये मेरा शोर करे


सजीव - 'काइट्स' फ़िल्म का अगला गीत है विशाल दादलानी और सूरज जगन की आवाज़ों में। ये दो नाम सुनते ही आप समझ ही चुके होंगे कि गाना किस अंदाज़ का होगा! जी हाँ, रॊक शैली में बना यह गीत गीटार की धुन से शुरु हो कर विशाल की आवाज़ टेक-ओवर कर लेती है। बाद में सूरज जगन अपनी उसी गायकी का परिचय देते हैं जिसे अंग्रेज़ी में 'फ़ुल थ्रोटेड रेंडिशन' कहते हैं।

सुजॊय - इससे पहले 'क्रेज़ी-४' फ़िल्म में विशाल दादलानी को राजेश रोशन ने गवाया था। आजकल बहुत से संगीतकार विशाल से गानें गवा रहे हैं।

सजीव - इस गीत को भी नासिर फ़राज़ ने ही लिखा है, लेकिन पिछले दो गीतों की तरह शायद यह गीत आपके दिल में बहुत ज़्यादा जगह ना बना सके। पर हो सकता है कि फ़िल्म में कहानी के अनुरूप यह गीत होगा और उसे परदे पर देखते हुए इसका अलग ही मज़ा आएगा।

सुजॊय - वैसे सजीव, कई बार अगर इस गीत को सुनें तो अच्छा ज़रूर लगने लगता है। आइए इस गीत को सुनते हैं और इस गीत के बारे में राय हम श्रोताओं पर ही छोड़ते हैं।

गीत: तुम भी हो वही


सजीव - फ़िल्म 'जुली' में प्रीति सागर ने गाया था "माइ हार्ट इज़ बीटिंग्", जो कि एक पूर्णत: अंग्रेज़ी गीत था। राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध यह गीत कालजयी हो गया है। अब फ़िल्म 'काइट्स' के लिए भी उन्होने एक अंग्रेज़ी गीत कॊम्पोज़ किया है, जो कि इस फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है - "काइट्स इन द स्काई"। इस गीत में एक अंतर्राष्ट्रीय अपील है और संगीत संयोजन भी बिल्कुल उसी अंदाज़ का है जो अंदाज़ आजकल विदेशी ऐल्बम्स के गीतों में सुनाई देता है।

सुजॊय - और उससे भी बड़ी बात यह कि इस गीत को और कोई नहीं बल्कि ऋतिक रोशन ने गाया है और यह उनका पहला गीत है। और मानना पड़ेगा कि उन्होने बहुत ही अच्छे गायन का परिचय दिया है। और क्यों ना दें, वो हैं ही परफ़ेक्शनिस्ट। जो भी काम वो करते हैं, पूरे परफ़ेक्शन के साथ करते हैं।

सजीव - इस गीत में ऋतिक का साथ दिया है सुज़ेन डी'मेलो ने। इस गीत को लिखा है आसिफ़ अली बेग ने। सुनते हैं।

गीत: काइट्स इन द स्काई


सुजॊय - ऋतिक रोशन की फ़िल्म हो और उसमें उनकी ज़बरदस्त नृत्यकला का परिचय ना मिले यह कैसे हो सकता है! फ़िल्म 'कोई मिल गया' में "इट्स मैजिक" की तरह 'काइट्स' में भी राजेश रोशन ने अपने भतीजे साहब के लिए एक ऐसा ज़बरदस्त गीत रचा है जिसका शीर्षक है "फ़ायर"। यानी कि अंग्रेज़ी में कहें तो Hrithik is gonna set the stage on fire!!!

सजीव - और इस गीत को राजेश रोशन ने ख़ुद गाया भी है और उनका साथ दिया है विशाल दादलानी, अनुश्का मनचंदा और अनिरुद्ध भोला ने। गीत में बोल बहुत ही कम है, डान्स म्युज़िक ही हावी है और पूरी तरह से टेक्नो म्युज़िक है।

सुजॉय- इसे फिल्म का थीम संगीत भी कहा जा सकता है, "दिल तो पागल है" फिल्म में जिस तरह संगीत से और नृत्य से "जलन" की भावना को परदे पर साकार किया गया था, इस ट्रैक में "फायर" को परिभाषित किया गया है. संगीत आपके जेहन को रचनात्मक बनाता है, वेल डन राजेश रोशन साहब

गीत: फ़ायर


"काईट्स" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
बहुत ही अगल किस्म का संगीत है जिसे सफर में या फिर रात अँधेरे कमरे में अकेले बैठ कर सुना जा सकता है. रोमांटिक गीतों में जैसे के के ने जाँ फूंक दी है. ऋतिक की आवाज़ में एक गीत है जो खूब भाता है. राजेश रोशन ने आज के दौर के संगीत में मेलोडी का सुन्दर मिश्रण किया है. एक अच्छी एल्बम.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ४३- जोश', 'हेल्लो ब्रदर' और 'काइट्स' फ़िल्म को आप किस तरह से आपस में जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # ४४-राजेश रोशन ने 'काइट्स' के एक गीत में अपनी आवाज़ दी है। उनकी आवाज़ में क्या आपको कोई और गीत भी याद आता है? बताइए फ़िल्म का नाम और गीत के बोल।

TST ट्रिविया # ४५- बताइए उस फ़िल्म का नाम जिसमें हृतिक रोशन ने पहली बार काम किया था बतौर बाल कलाकार।


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी सभी जवाब सही हैं, बधाई

Saturday, March 27, 2010

भूल गया सब कुछ .... याद रहे मगर बख्शी साहब के लिखे सरल सहज गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 386/2010/86

नंद बक्शी उन गीतकारों मे से हैं जिन्होने संगीतकारों की कई पीढ़ियों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए हिट काम किया है। जहाँ एक तरफ़ सचिन देव बर्मन के साथ काम किया है, वहीं उनके बेटे राहुल देव बर्मन के साथ भी एक लम्बी पारी खेली है। कल्याणजी-आनंदजी के धुनों पर भी गानें लिखे हैं और विजु शाह के भी। चित्रगुप्त - आनंद मिलिंद, श्रवण - संजीव दर्शन आदि। फ़िल्म 'देवर' में संगीतकार रोशन के साथ भी काम किया है, और रोशन साहब के बेटे राजेश रोशन के साथ तो बहुत सारी फ़िल्मों में उनका साथ रहा। आज हम आपको बक्शी साहब का लिखा और राजेश रोशन का स्वरबद्ध किया हुआ एक गीत सुनवाना चाहेंगे। इस गीत के बारे में ख़ुद आनंद बक्शी साहब से ही जानिए, जो उन्होने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में कहे थे: "मरहूम रोशन मेरे मेहरबान दोस्तों में से थे। उनके साथ मैंने काफ़ी गीत लिखे हैं। मुझे ख़ुशी है कि उनका बेटा राजेश उनके नाम को रोशन कर रहा है। राजेश रोशन के साथ मुझे फ़िल्म 'जुली' में काम करने का मौका मिला। तो फ़िल्म 'जुली' का गीत, जिसे लता और किशोर ने गाया है, आप इसे सुनिए।" दोस्तों, हम ज़रूर सुनेंगे यह गीत, लेकिन उससे पहले आपको बता दें कि 'जुली' फ़िल्म का यह युगल गीत लता-किशोर के सदाबहार युगल गीतों में शामिल किया जाता है। फ़िल्म के चरित्रों के मुताबिक़ थोड़ा सा वेस्टर्ण टच इस गीत को दिया गया है। थोड़ा सा नशीलापन, थोड़ी सी सेन्सुयलिटी का स्वाद इस गीत में मिलता है। यह वह दौर था जब 'आइ लव यू' पर गानें बनने लगे थे। आज वह चलन ख़त्म हो गया है, मुझे याद नहीं पिछली बार किस फ़िल्मी गीत में ये शब्द आए थे। कुछ चर्चित गीत जिनमें 'आइ लव यू' का इस्तेमाल हुआ है, वे हैं "मेरी सोनी मेरी तमन्ना" (यादों की बारात), "काटे नहीं कटते दिन ये रात" (मिस्टर इण्डिया), "इलु इलु" (सौदागर), "अंग्रेज़ी में कहते हैं" (ख़ुद्दार), वगेरह। हाँ, याद आया, आख़िरी बार फ़िल्म 'मुझसे दोस्ती करोगे' में सोनू निगम और अलिशा चिनॊय ने गाया था "ओ माइ डारलिंग् आइ लव यू"!

आनंद बक्शी साहब के करीयर संबंधित जानकारी का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आज हम आपको बताना चाहेंगे उन ४० गीतों के बारे में जो नॊमिनेट हुए थे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए। ये हैं वो गीत:

वर्ष - नामांकन - पुरस्कार
1967 सावन का महीना (मिलन)
1969 कोरा काग़ज़ था (आराधना) ; बड़ी मस्तानी है (जीने की राह)
1970 बिंदिया चमकेगी (दो रास्ते)
1971 ना कोई उमंग है (कटी पतंग)
1972 चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम)
1973 हम तुम एक कमरे में (बॊबी); मैं शायर तो नहीं (बॊबी)
1974 गाड़ी बुला रही है (दोस्त)
1975 आएगी जरूर चिट्ठी (दुल्हन); महबूबा महबूबा (शोले)
1976 मेरे नैना सावन भादों (महबूबा)
1977 परदा है परदा (अमर अक्बर ऐंथनी)
1978 मैं तुल्सी तेरे आंगन की (शीर्षक गीत); आदमी मुसाफ़िर है (अपनापन) आदमी मुसाफ़िर है (अपनापन)
1979 सावन के झूले पड़े (जुर्माना); डफ़ली वाले (सरगम)
1980 शीशा हो या दिल हो (आशा); ओम शांति ओम (कर्ज़); दर्द-ए-दिल (कर्ज़); बने चाहे दुश्मन ज़माना (दोस्ताना)
1981 सोलह बरस की (एक दूजे के लिए); तेरे मेरे बीच में (एक दूजे के लिए); याद आ रही है (लव स्टोरी) तेरे मेरे बीच में (एक दूजे के लिए);
1983 जब हम जवां होंगे (बेताब)
1984 सोहनी चनाब दे किनारे (सोहनी महिवाल)
1985 ज़िंदगी हर कदम (मेरी जंग)
1989 लगी आज सावन की (चांदनी)
1993 चोली के पीछे क्या है (खलनायक); जादू तेरी नज़र (डर)
1994 तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त (मोहरा)
1995 तूझे देखा तो यह जाना सनम (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे) तूझे देखा...
1997 भोली सी सूरत (दिल तो पागल है); आइ लव माइ इण्डिया (परदेस); ज़रा तसवीर से तू (परदेस)
1999 ताल से ताल मिला (ताल); इश्क़ बिना (ताल) इश्क़ बिना (ताल)
2000 हम को हम ही से चुरा लो (मोहब्बतें)
2001 उड़ जा काले कावां (ग़दर एक प्रेम कथा)




क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने संगीतकार रोशन के लिए पहली बार फ़िल्म 'सी.आइ.डी गर्ल' में गीत लिखे थे। उसके बाद आई थी फ़िल्म 'देवर'।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"जिंदगी" गीत बताएं -३ अंक.
2. अमिताभ बच्चन प्रमुख भूमिका में थे इस फिल्म में, नाम बताएं - २ अंक.
3. कौन थे इस फिल्म के निर्देशक -२ अंक.
4. एल पी के संगीत निर्देशन में किस गायक ने इसे गाया था -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी एकदम सही पहचाना गीत, पाबला जी जो आपने जवाब दिया वो तो सवाल में ही है :), अवध जी सही जवाब दिया, आपको जो दो गीत हैं वो हर कसौटी पर खरे नहीं उतरते, गौर कीजिये. पदम सिंह जी आपका अंदाज़ खूब भाया जवाब देने का. अनीता सिंह जी आपका खाता खुला है २ अंकों से बधाई, अनुपम जी लेट भले हुए, पर उपस्तिथि जरूर दर्ज की आपने शुक्रिया

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, March 18, 2010

न बोले तुम न मैंने कुछ कहा....फिर भी श्रोताओं और ओल्ड इस गोल्ड में बन गया एक अटूट रिश्ता

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 377/2010/77

मानांतर सिनेमा के गानें इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बजाए जा रहे हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि इन लीग से हट कर गीतों का आप भरपूर आनंद उठा रहे होंगे। विविध भारती पर प्रसारित विशेष कार्यक्रम 'सिने यात्रा की गवाह विविध भारती' में यूनुस ख़ान कहते हैं कि ६० के दशक के उत्तरार्ध में एक नए क़िस्म का सिनेमा अस्तित्व में आया जिसे समानांतर सिनेमा का नाम दिया गया। इनमें कुछ कलात्मक फ़िल्में थीं तो कुछ हल्की फुल्की आम ज़िंदगी से जुड़ी फ़िल्में। इसकी शुरुआत हुई मृणाल सेन की फ़िल्म 'भुबोन शोम' और बासु चटर्जी की फ़िल्म 'सारा आकाश' से। ७० के दशक मे समानांतर सिनेमा ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। उस दौर में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, एम. एस. सथ्यु, मणि कौल, जब्बर पटेल और केतन मेहता जैसे फ़िल्मकारों ने 'उसकी रोटी', 'अंकुर', 'भूमिका', 'अर्ध सत्य', 'गरम हवा', 'मिर्च मसाला' और 'पार्टी' जैसी फ़िल्में बनाई। लेकिन यह भी सच है कि ७० के दशक के मध्य भाग तक हिंदी सिनेमा अमिताभ बच्चन के ऐंग्री यॊंग् मैन की छवि से पूरी तरह प्रभावित हो चला था। मोटे तौर पर अब सिर्फ़ दो तरह की फ़िल्में बन रही थी, एक तरफ़ 'शोले', 'दीवार', 'अमर अकबर ऐंथनी', 'त्रिशोल', 'डॊन' जैसी स्टारकास्ट वाली भारी भरकम फ़िल्में, और दूसरी तरफ़ कम बजट की वो फ़िल्में जो आम ज़िंदगी से जुड़ी हुई थी। अमुमन इन हल्की फुल्की फ़िल्मों में नायक के रूप में नज़र आ जाते थे हमारे अमोल पालेकर साहब। उनका भोलापन, नैचरल अदाकारी, और एक आम नौजवान जैसी सूरत इस तरह की फ़िल्मों को और भी ज़्यादा नैचरल बना देती थी। आज हम '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में सुनने जा रहे हैं अमोल पालेकर की ही फ़िल्म 'बातों बातों में' का एक बड़ा ही प्यारा सा युगल गीत आशा भोसले और अमित कुमार की आवाज़ों में "ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा"। बासु चटर्जी निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में अमोल पालेकर के अलावा मुख्य किरदारों में थे टिना मुनीम, असरानी, डेविड, लीला मिश्र, पर्ल पदमसी, टुनटुन और अर्वैंद देशपाण्डेय। राजेश रोशन का रुमानीयत से भरा संगीत था और गीत लिखे अमित खन्ना ने।

फ़िल्म की कहानी जहाँ एक तरफ़ एक आम परिवार की कहानी थी, वहीं दूसरी तरफ़ कई हास्यप्रद किस्सों का सहारा लिया गया कहानी के किरदारों में जान डालने के लिए। मूल कहानी कुछ ऐसी थी कि रोज़ी परेरा (पर्ल पदमसी) एक ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही विधवा है औरत हैं जो अपने गीटार पागल बेटे सावी और एक सुंदर बेटी नैन्सी (टिना मुनीम) के साथ रहती है। वह चाहती है कि नैन्सी की शादी एक अमीर लड़के के साथ हो जाए। रोज़ी की मदद करने के लिए उनके पडो़सी अंकल टॊम (डेविड) नैन्सी की मुलाक़ात टोनी ब्रगेन्ज़ा (अमोल पालेकर) से करवाते हैं सुबह ९:१० की बान्द्रा से चर्चगेट की लोकल ट्रेन में। अंकल टॊम के कहने पर नैन्सी टोनी को अपनी मम्मी से मिलवाती है। रोज़ी को शुरु शुर में तो यह जानकर टोनी पसंद नहीं आया कि उसकी तंख्व केवल ३०० रुपय है जब कि नैन्सी की तंख्वा ७०० रुपय है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि जल्द ही टोनी की तंख्वा १००० रुपय होने वाली है, तो वह मान जाती है और नैन्सी और टोनी के मिलने जुलने पर पाबंदियाँ ख़त्म कर देती है। नैन्सी अपनी मम्मी के कहे अनुसार टोनी से शादी कर लेना चाहती है, लेकिन टोनी को अभी शादी नहीं करनी है। और इस ग़लतफ़हमी से दोनों में अनबन हो जाती है। इधर रोज़ी नए लड़के की तलाश में जुट जाती है, उधर टोनी अपने फ़ैसले पर अटल रहता है। बीच में नैन्सी दोराहे पर खड़ी रहती है। यही है 'बातों बातों में' की भूमिका। इस फ़िल्म का पार्श्व इसाई परिवारों से जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसके गानें भी उसी अंदाज़ में बनाए गए हैं। राजेश रोशन ने कहानी के पार्श्व के साथ पूरी तरह से न्याय करते हुए कुछ ऐसे गानें बनाए हैं कि एक ऒफ़बीट फ़िल्म होते हुए भी इसके गानें ज़बरदस्त हिट हुए और आज भी बड़े चाव से सुने जाते हैं। आज का प्रस्तुत गीत जितना संगीत के लिहाज़ से सुरीला है, उतने ही कैची हैं इसके बोल। अमित खन्ना ने किस ख़ूबसूरती के साथ छो्टे छोटे शब्दों को फ़ास्ट म्युज़िक पर कामयाबी से बिठाया है। "ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा, मगर न जाने ऐसा क्यों लगा, कि धूप में खिला है चांद दिन में रात हो गई, कि प्यार की बिना कहे सुने ही बात हो गई"। आइए सुनते हैं। अमित कुमार की आवाज़ पहली बार गूंज रही है 'ओल इज़ गोल्ड' की महफ़िल में आज!



क्या आप जानते हैं...
कि 'बातों बातों में' फ़िल्म के गीत "उठे सब के क़दम त र रम पम पम" में पर्ल पदमसी का प्लेबैक किया था लता मंगेशकर ने जब कि लीला मिश्र का प्लेबैक किया था पर्ल पदमसी ने। है ना मज़ेदार!

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत में एक जगह कई फूलों के नाम हैं जिसमें मोगरे का भी जिक्र है, गीत पहचानें-३ अंक.
2. जगजीत कौर और पामेला चोपडा के गाये इस समूह गीत की धुन किसने बनायीं है- २ अंक.
3. समान्तर सिनेमा के सभी बड़े कलाकार मौजूद थे इस फिल्म में, कौन थे निर्देशक-२ अंक.
4. फिल्म की किस अभिनेत्री को उस वर्ष कि सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का फिल्म फेयर प्राप्त हुआ था -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
चलिए अब ज़रा स्कोर कार्ड पर नज़र डालें - शरद जी हैं ६५, इंदु जी ४५ और अवध जी हैं ३५ अंकों पर. पदम जी तेज़ी से चलकर २१ पर आ चुके है. अनुपम जी ८ रोहित जी ७ और संगीता जी ४ अंकों पर हैं, सभी को शुभकामनाएं
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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