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Saturday, May 27, 2017

चित्रकथा - 20: रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ

अंक - 20

रीमा लागू को श्रद्धांजलि

रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


18 मई 2017 को सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रीमा लागू का मात्र 59 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इतनी जल्दी उनके दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से अभिनय जगत को जो क्षति पहुँची है उसकी भरपाई हो पाना असंभव है। 35 सालों से उपर के अभिनय सफ़र में रीमा जी ने दर्शकों के दिलों पर राज किया; कभी गुदगुदाया, कभी रुलाया, और कभी अपने अभिनय से हमें भाव-विभोर कर दिया। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें उनके शुरुआती सालों की फ़िल्मों पर। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीया रीमा लागू की पुण्य स्मृति को!



रीमा लागू (21 जून 1958 - 18 मई 2017)


ऑन-स्क्रीन माँ के किरदार में फ़िल्म इतिहास में बहुत सी अभिनेत्रियों ने बुलंदी हासिल किए हैं जिनमें वो नाम जो सबसे पहले याद आते हैं, वो हैं निरुपा रॉय, कामिनी कौशल, सुलोचना, दुर्गा खोटे, अचला सचदेव, और बाद के वर्षों में नज़र आने वाली अभिनेत्रियों में एक प्रमुख नाम रीमा लागू का है। ’क़यामत से क़यामत तक’, ’मैंने प्यार किया’, ’आशिक़ी’, ’हिना’, ’साजन’, ’हम आपके हैं कौन’, ’जुड़वा’, ’येस बॉस’, ’कुछ कुछ होता है’, ’हम साथ-साथ हैं’, ’वास्तव’, ’मैं प्रेम की दीवानी हूँ’, ’कल हो न हो’, ’रंगीला’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों में माँ की सफल भूमिका निभा कर रीमा लागू दर्शकों के दिलों में एक अपना अलग ही मुकाम बना चुकी थीं। उनके परदे पर आते ही जैसे एक रौनक सी छा जाती। उन्होंने फ़िल्मी माँ के किरदार को एक दुखियारी औरत से बाहर निकाल कर एक ग्लैमरस महिला में परिवर्तित किया। लेकिन आज भले उन्हें हम उनकी माँ की भूमिका वाली फ़िल्मों के लिए याद करते हैं, हक़ीकत यह है कि 1988 में ’क़यामत से क़यामत तक’ के आने से पहले उन्होंने कई फ़िल्मों में कई तरह के चरित्र निभाए जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान यकायक नहीं जाता।

21 जून 1958 को जन्मीं रीमा लागू का असली नाम नयन भडभडे था। उनकी माँ मन्दाकिनी भडभडे मराठी स्टेज ऐक्ट्रेस थीं और उन्हीं से शायद अभिनय की बीज नयन में भी अंकुरित हुई। उनके अभिनय क्षमता से उनका स्कूल वाक़िफ़ था। माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करते ही वो पेशेवर तौर पर अभिनय करना शुरु किया। विवेक लागू से विवाह के पश्चात् नयन भडभडे बन गईं रीमा लागू। 1979 से लेकर 1988 तक वो यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी भी की और साथ ही साथ टेलीविज़न और फ़िल्मों में अभिनय भी जारी रखा। 1988 के बाद उनका फ़िल्मी सफ़र तेज़ हो जाने की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इन्हीं दस वर्षों यानी कि 1979 से 1988 के बीच उन्होंने कई फ़िल्मों में तरह तरह के किरदार निभाए। रीमा लागू का फ़िल्मी सफ़र शुरु हुआ 1979 की मराठी फ़िल्म ’सिंहासन’ से जिसमें नीलू फुले, श्रीराम लागू, नाना पाटेकर, और मोहन अगाशे जैसे दिग्गज कलाकार थे। हिन्दी फ़िल्मों में रीमा लागू प्रथम नज़र आईं 1980 की फ़िल्म ’आक्रोश’ में। इस फ़िल्म में उन्होंने एक नौटंकी नर्तकी का किरदार निभाया था। गोविंद निहलानी निर्देशित इस कलात्मक फ़िल्म को उस वर्ष के बहुत से फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिले। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल और अमरीश पुरी जैसे दिग्गज कलाकारों की इस फ़िल्म में नवोदित रीमा लागू का छोटा सा लावणी डान्सर का किरदार सराहनीय था। फ़िल्म में केवल तीन गीत थे जिनमें एक गीत रीमा लागू पर फ़िल्माया गया। "तू ऐसा कैसा मर्द" एक लावणी गीत है जिस पर रीमा लागू ने लावणी नृत्य किया और माधुरी पुरंदरे की गायी इस लावणी पर लिप-सिंक किया। अक्सर इस तरह के लावणी में थोड़ा बहुत अश्लीलता आ ही जाती है, पर रीमा लागू इस गीत में इतनी ग्रेसफ़ुल और सुन्दर लगती हैं कि उन्हें इस रूप में देखने का मज़ा ही कुछ अलग है। गोविन्द निहलानी जैसे फ़िल्मकार ने अगर उन्हें इस किरदार के लिए चुना था तो ज़रूर उनकी अभिनय प्रतिभा को देख कर ही चुना होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। 

1980 की एक और फ़िल्म में रीमा लागू नज़र आईं। गोविन्द निहलानी के बाद अब बारी थी श्याम बेनेगल की। शशि कपूर निर्मित फ़िल्म ’कलयुग’ में शशि कपूर के अलावा रेखा, राज बब्बर, विक्टर बनर्जी, सुषमा सेठ, कुलभूषण खरबन्दा और अनन्त नाग जैसे मंझे हुए अभिनेता थे। श्याम बेनेगल की फ़िल्म में रीमा लागू जैसी नई अभिनेत्री को अभिनय का मौका मिलना बहुत बड़ी बात थी। साथ ही इतने बड़े बड़े अभिनेताओं के साथ एक ही सीन में अभिनय करना और अपनी एक पहचान बना पाना आसान काम नहीं था। महाभारत की कहानी का आधुनिक रूप था ’कलयुग’ की कहानी। इसमें कुलभूषण खरबन्दा की पत्नी का किरदार रीमा ने निभाया। दो परिवारों के बीच के द्वन्द की कहानी है ’कलयुग’ जिसमें रीमा लागू के बेटे का ऐक्सिडेन्ट में मृत्यु हो जाती है। अपने बेटे का शव देख कर एक माँ की क्या हालत होती है, रीमा लागू के अभिनय से सजी इस सीन को देख कर अपनी आँसू रोक पाना मुमकिन नहीं। हालाँकि किरण के इस किरदार में रीमा लागू को कुलभूषण खरबन्दा के साथ कुछ इन्टिमेट सीन्स भी करने पड़े हैं, लेकिन बेटे की मृत्यु का वह सीन दिलो-दिमाग़ पर छाया रहता है। रीमा लागू ने संतान के जाने के दर्द को यूं उभारा है कि मन से यह दुआ निकलती है कि भगवान कभी किसी दुश्मन से भी उसका संतान न छीने! ’कलयुग’ के बाद 1983 में फ़िल्म ’चटपटी’ में एक छोटा किरदार निभाया रीमा लागू ने। देवेन वर्मा निर्मित इस फ़िल्म में स्मिता पाटिल शीर्षक भूमिका में थीं और साथ में थे राज किरण, श्रीराम लागू और सुधीर दलवी। फ़िल्म बुरी तरह फ़्लॉप होने की वजह से यह फ़िल्म भुला दी गई।

फिर 1985 में फ़िल्म आई ’नासूर’ जिसमें फिर एक बार रीमा लागू को समानान्तर सिनेमा के कुछ दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। अशोक चोपड़ा निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे ओम पुरी, प्रिया तेन्दुलकर, सदाशिव अमरापुरकर, अच्युत पोद्दार, के. के. रैना और अरुण बक्शी। रीमा लागू ने इस फ़िल्म में सदाशिव अमरापुरकर की पुत्रवधु का चरित्र निभाया। हालाँकि रीमा लागू का रोल लम्बा नहीं है, लेकिन छोटी सी भूमिका में भी वो अपना छाप छोड़ जाती हैं। जिस अस्पताल में डॉ. सुनिल गुप्ता (ओम पुरी) गाइनोकोलोजिस्ट हैं, उसी में मंत्री रावसाहेब (सदाशिव) की गर्भवती पुत्रवधु मंजुला (रीमा लागू) का दाख़िला होता है डेलिवरी के लिए। लेकिन ऑपरेशन टेबल पर डॉ. गुप्ता को पता चलता है कि माँ और बच्चे में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है और वो ख़ुद निर्णय लेते हुए माँ को बचाते हैं। अपने बच्चे को खोने का दर्द फिर एक बार रीमा लागू के अभिनय में फूट पड़ती है। संयोग की बात देखिए कि कुछ कुछ इसी तरह का दृश्य पिछली फ़िल्म ’कलयुग’ में भी रीमा लागू ने अदा की थी। 

1986 और 87 में रीमा लागू की कोई फ़िल्म नहीं आई, पर 1988 का वर्ष उनके करीअर का टर्निंग् पॉइन्ट सिद्ध हुआ। अरुणा राजे लिखित, निर्मित और निर्देशित विवादास्पद फ़िल्म ’रिहाई’ में कई दिग्गज कलाकारों के साथ स्क्रीन शेयर किया रीमा लागू ने। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि गुजरात के एक दूर दराज़ के गाँव से सारे जवान मर्द रोज़ी रोटी के लिए शहर चले गए हैं और गाँव में केवल औरतें, बच्चें और वृद्ध-वृद्धा रह गए हैं। गाँव की महिलाएँ दिन भर खेतों खलिहानों में अटूट परिश्रम करती हैं, बच्चे पालती हैं, और रात में तन्हाइयाँ ओढ़ कर सो जाती हैं। गाँव की इन महिलाओं की भूमिकाओं में जिन अभिनेत्रियों ने अभिनय किया, वो हैं हेमा मालिनी, नीना गुप्ता, इला अरुण और रीमा लागू। तभी गाँव में मनसुख (नसीरुद्दीन शाह) की वापसी होती है जो दुबई में सालों काम कर अपने गाँव लौटा है। कुछ औरतें मनसुख के तरफ़ आकर्षित होती हैं, ख़ास तौर से नीना गुप्ता और रीमा लागू द्वारा निभाये किरदार, और दोनों ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं। दो बच्चों की माँ रीमा लागू ने इस विवादास्पद चरित्र को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से निभाया है। यह एक ऐसी औरत का किरदार है जो मुंहफट है, जो कुछ भी कहने से पहले सोचती नहीं, जिसकी बातों में निडरता के साथ-साथ थोड़ी अश्लीलता भी है। हेमा मालिनी जैसी सुपरस्टार अभिनेत्री के साथ सीन शेअर किया रीमा लागू ने और कुछ संवाद भी दोनों के बीच में हैं। इतना ही नहीं एक गीत में आशा भोसले ने हेमा मालिनी का पार्श्वगायन किया है तो अनुपमा देशपांडे ने रीमा लागू का। पहली फ़िल्म ’आक्रोश’ में रीमा लागू पर गीत फ़िल्माया गया था और उनका डान्स भी था, ’रिहाई’ के उस गीत में भी रीमा लागू नृत्य करती नज़र आती हैं। ’रिहाई’ में हेमा मालिनी के अलावा इला अरुण और नीना गुप्ता के चरित्रों को रीमा लागू के चरित्र से ज़्यादा प्रॉमिनेन्स दिया गया है, लेकिन रीमा लागू का स्क्रीन प्रेसेन्स भी कमाल का रहा। उनकी अच्छी बात यह रही कि जो भी रोल उन्हें दिया गया, चाहे छोटा या बड़ा, उन्होंने हर एक में जान फूंक दी।

हिन्दी फ़िल्म जगत में नायक-नायिका की जोड़ियाँ ख़ूब जमी हैं। लेकिन माँ और पिता की जोड़ियों की अगर बात करें तो सबसे पहले जो जोड़ी याद आती है, वह है रीमा लागू और आलोक नाथ की। फ़िल्म ’मैंने प्यार किया’ से इस जोड़ी की शुरुआत ज़रूर हुई थी, पर जिस फ़िल्म में रीमा लागू और आलोक नाथ एक साथ पहली बार नज़र आए थे, वह फ़िल्म थी 1988 की ’हमारा ख़ानदान’। इस फ़िल्म में एक गाइनोकोलोजिस्ट की भूमिका में नज़र आईं रीमा लागू। डॉ. जुली के किरदार में अमरीश पुरी और आशा पारेख के साथ उन्होंने स्क्रीन शेअर किया। किसी बच्चे के लिंग निर्धारण में माँ की नहीं बल्कि पिता के क्रोमोज़ोम की भूमिका होती है, यह संदेश इस फ़िल्म में रीमा लागू के चरित्र के माध्यम से दी गई। अब तक उनके निभाए किरदारों में यह किरदार सबसे दीर्घ रही। फिर इस वर्ष के आख़िर में प्रदर्शित हुई ’मैंने प्यार किया’ जिसमें सूरज बरजात्या ने रीमा लागू को एक ऐसे अवतार में उतारा कि बाकी इतिहास है। एक ग्लैमरस पर घरेलु माँ का इमेज इस फ़िल्म से उनकी बनी जो बेहद हिट सिद्ध हुई और इस फ़िल्म के बाद एक के बाद एक फ़िल्मों में उन्हें हमने इसी अवतार में देखा। इस दौर के समस्त सुपरस्टार हीरो-हीरोइन्स की माँ बन चुकी हैं रीमा लागू और आज की पीढ़े उन्हें इसी रूप में याद करती रहेंगी। लेकिन ’मैंने प्यार किया’ से पहले उनके द्वारा निभाए गए किरदारों में उनके अभिनय की विविधता महसूस की जा सकती है। चाहे ’आक्रोश’ के लावणी डान्सर का किरदार हो या ’कलयुग’ के बिज़नेसमैन घराने की बहू का चरित्र, ’नासूर’ में गर्भवती औरत जिसका बच्चा डेलिवरी के समय मर जाता है, ’हमारा ख़ानदान’ में गाइनोकोलोजिस्ट की दमदार अदायगी या फिर ’रिहाई’ में एक अनपढ़, कामुक, दो बच्चों की माँ की वह विवादास्पद रोल, हर चरित्र में रीमा लागू ढल गईं और इन फ़िल्मों को अपने अभिनय से सजाया, सँवारा, उनमें अपनी सहज स्वाभाविक अदायगी से जान डाली। रीमा लागू आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हिन्दी व मराठी सिनेमा, थिएटर और टेलीविज़न पर उनकी अमिट छाप सदा बनी रहेगी। सहज, सरल अभिनय और हर तरह के चरित्र में बड़ी आसानी से ढल जाना ही रीमा लागू की सबसे बड़ी ख़ासियत थी और इसी बात की पुष्टि उनके द्वारा निभाए गए शुरुआती फ़िल्मों के किरदारों से होती है। रीमा लागू की प्रतिभा और योगदान को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करती है शत शत नमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, April 8, 2017

चित्रकथा - 13: हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर


अंक - 13

हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर

"मेघा झर झर बरसत रे..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


पिछले सोमवार दिनांक 3 अप्रैल 2017 को शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका पद्मविभूशण किशोरी अमोनकर (आमोणकर) का 84 वर्ष की आयु में देहावसन हो जाने से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन जगत को गहरी हानी पहुँची है। शास्त्रीय संगीत जगत में किशोरी जी का जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति हो पाना असंभव है। संयोग से आगामी सोमवार 10 अप्रैल को किशोरी जी का जन्मदिवस है। आइए आज ’चित्रकथा’ में स्वर्गीया किशोरी अमोनकर जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करें उनकी गाई उन रचनाओं को याद करते हुए जिन्होंने फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध किया है।



किशोरी अमोनकर (10 अप्रैल 1932 - 3 अप्रैल 2017)

फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध करने में जितना योगदान फ़िल्मी गायक-गायिकाओं का है, उतना ही योगदान उन शास्त्रीय-संगीत जगत के गायक-गायिकाओं का भी है जिन्होंने अपनी गिनी-चुनी रचनाओं से ना केवल रसिकों के दिलों में रस घोला है बल्कि फ़िल्म-संगीत का स्तर बहुत ऊँचा कर दिया है। शास्त्रीय गायिकाओं में शोभा गुर्टू, बेगम परवीन सुल्ताना, लक्ष्मी शंकर, सरस्वती राणे, हीरा देवी मिश्र के साथ-साथ किशोरी अमोनकर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले किशोरी जी ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है, लेकिन उनकी गाई हुई ये चन्द रचनाएँ किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। इन फ़िल्मों के गीतों की चर्चा शुरु करने से पहले कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर करना बहुत ज़रूरी है। जहाँ इन्टरनेट से हमें बहुत सी जानकारियाँ मिलती है, वहीं ग़लत जानकारियों का भण्डार भी है इन्टरनेट। कई जगहों पर यह लिखा हुआ मिलता है कि किशोरी अमोनकर ने पहली बार 1946 की फ़िल्म ’पृथ्वीराज संयोगिता’ में गीत गाए हैं जो कि ग़लत है। यह सच है कि 1933 की इसी शीर्षक से बनी फ़िल्म में "किशोरी" नामक गायिका के गाए कुछ गीत हैं, लेकिन ये किशोरी अमोनकर नहीं बल्कि किशोरी पाठक हैं। एक और ग़लत धारणा है कि 1952 की फ़िल्म ’सिस्कियाँ’ में भी किशोरी जी ने गीत गाए हैं। ये दरसल "किशोरी" नामक किसी अन्य गायिका की आवाज़ में हैं और यह फ़िल्म कभी प्रदर्शित नहीं हुई।

10 अप्रैल 1932 को बम्बई में जन्मीं किशोरी अमोनकर ने संगीत की पहली शिक्षा अपनी माँ मोगुबाई कुर्डिकर से ली जो जयपुर-अतरौली घराने की जानीमानी गायिका थीं। साथ ही भिंडीबाज़ार घराने के अंजनी मालपेकर से भी उन्होंने तालीम ली। पारम्परिक रागों में निबद्ध ख़याल गायकी में उन्होंने महरथ हासिल की। भजन और ठुमरी में भी किशोरी अमोनकर का कोई सानी नहीं। एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका के रूप में वो 60 के दशक के शुरु में प्रतिष्ठित हुईं। 1964 में वी. शान्ताराम एक नृत्यप्रधान फ़िल्म बना रहे थे ’गीत गाया पत्थरों ने’। अपनी पुत्री राजश्री और अभिनेत्र जीतेन्द्र को उन्होंने इस फ़िल्म में लौन्च किया। ’झनक झनक पायल बाजे’ में एक से बढ़ कर एक शास्त्रीय-संगीत जगत के फ़नकारों के द्वारा फ़िल्म के गीतों को सजाने के बाद ’गीत गाया पत्थरों ने’ के शीर्षक गीत के लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर को चुना। उन दिनों फ़िल्म-संगीत अपने पूरे शबाब पर थी। हर गायिका की तरह किशोरी के मन में भी फ़िल्म में गाने की इच्छा जागृत हुई। उनकी माँ और गुरुजी ने उन्हें समझाया कि उनके परिवार के लिए गीत-संगीत व्यवसाय नहीं बल्कि साधना है और इसलिए उन्हें फ़िल्मी गायन से दूर रहना चाहिए। पर किशोरी की तीव्र इच्छा थी फ़िल्म में गाने की। इसलिए उन्होंने अपनी माँ और गुरुजी के सुझाव को नज़रंदाज़ कर वी. शान्ताराम की फ़िल्म में मिले मौके को हाथोंहाथ ग्रहण कर लिया। 

राजश्री का सुन्दर नृत्य और उस पर किशोरी अमोनकर की मनमोहक आवाज़, असर तो होना ही था। हसरत जयपुरी के लिखे और कमचर्चित संगीतकार रामलाल द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के दो संस्करण थे। एक तो किशोरी जी का गाया एकल, और दूसरा संस्करण एक युगल गीत था आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में। जब इन दो संस्करणों में त्लनात्मक समीक्षा हुई तब किशोरी अमोनकर के गाए संस्करण को दिग्गजों ने ऊँचा स्थान दिया। इस गीत में राग दुर्गा की छाया थी जिसमें किशोरी जी को अपनी स्वरभाषा के ज्ञान को शब्दभाषा में ढालना था। बेहद ख़ूबसूरती के साथ फ़िल्म का यह शीर्षक गीत "गीत गाया पत्थरों ने..." उन्होंने गाया जो 1965 के बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम के दसवें पायदान का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। इस कामयाबी के बावजूद किशोरी अमोनकर ने फ़िल्म जगत से अपने सारे रिश्ते समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके दो कारण थे। पहला कारण यह था कि जब ’गीत गाया पत्थरों ने’ गीत कामयाब हुई, तब उनकी माँ ने उन्हें चेतावनी दे दी कि अगर उसने फिर कभी किसी फ़िल्म के लिए गाया तो वो उसे अपने दो तानपुरों को छूने तक नहीं देंगी। किशोरी जी को अपनी ग़लती का अहसास हुआ। लेकिन सिर्फ़ यही एक कारण नहीं था फ़िल्म जगत से मुंह मोड़ने का। जैसा कि हम सभी जानते हैं उन दिनों फ़िल्म जगत में लौबी हुआ करती थी। जानेमाने संगीत इतिहासकार वामनराव हरि देशपाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि किशोरी और उनकी माँ का इस फ़िल्म में गाने को लेकर कड़वा अनुभव रहा जब उन्होंने इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स को सभी दुकानों से यकायक ग़ायब होते हुए देखा। वैसे भी वो फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में नहीं रहतीं, लेकिन कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा उन्हें अलग-थलग करने की साज़िश ने उनके दिल को बहुत ज़ोर का ठेस पहुँचाया। शक़ की उंगली लता मंगेशकर की तरफ़ उठी, पर सबूत के अभाव में इसकी पुष्टि कभी नहीं हो सकी। लेकिन ऐसा कई गायिकाओं के साथ हो चुका है। इस फ़िल्म के बाद किशोरी अमोनकर ने अपना पूरा ध्यान शास्त्रीय संगीत में लगा दिया और दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति करती चली गईं। 

’गीत गाया पत्थरों ने’ बनने के 26 वर्ष बाद किशोरी अमोनकर फिर एक बार फ़िल्म जगत में क़दम रखे। इस बार फ़िल्मकार थे गोविन्द निहलानी। 1982 की अपनी फ़िल्म ’विजेता’ में शास्त्रीय संगीत का प्रयोग करने वाले गोविन्द निहलानी ने 1990 में अपनी फ़िल्म ’दृष्टि’ के लिए एक शास्त्रीय गायिका की आवाज़ लेने की सोच रहे थे। उन्हीं के शब्दों में यह फ़िल्म ग्यारह आंदोलनों में बनाया गया था और हर एक आन्दोलन के लिए एक सांकेतिक गीत था। इसके लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर से गीत और आलाप गवाने का निर्णय लिया। लेकिन अमोनकर तो फ़िल्मों से दूर जा चुकी थीं। गोविन्द निहलानी ने जब उन्हें फ़िल्म की कहानी सुनाई और यह भी कहा कि वो अपने गीत ख़ुद कम्पोज़ कर सकती हैं, तब किशोरी अमोनकर को कहानी भी पसन्द आई और ख़ुद के रचे गीतों को गाने की बात से ख़ुश होकर फ़िल्म स्वीकार कर ली। फ़िल्म की कहानी में वैवाहिक विवाद और एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेअर्स के प्रसंगों को सुन कर अमोनकर ने निहलानी के सामने यह शर्त रख दी कि उनके किसी भी गीत को प्रेम-संपादन (lovemaking) दृश्य के पार्श्व में नहीं रखा जाएगा। उनकी सारी शर्तों तो निहलानी मान गए। अमोनकर जुट गईं फ़िल्म की धुनों को तैयार करने में। गीतों के लिए बोल थे वसन्त देव ने जिन्होंने ’उत्सव’ फ़िल्म में कई सुन्दर गीत लिखे थे। किशोरी अमोनकर के लिए इस फ़िल्म में संगीत देना एक बड़ी चुनौती थी। इसका मुख्य कारण था उनके जयपुर घराने के शैली का अनम्य या दृढ़ होना। ताल, अलंकार और स्वरूप, सभी बहुत दृढ़ होते हैं इस घराने के। ऐसे में एक फ़िल्मी संगीतकार न होते हुए अपने संगीत को फ़िल्म के संगीत के लिए ढाल पाना आसान काम नहीं था। और फिर समय की भी सीमा थी।

’दृष्टि’ फ़िल्म में तीन गीत और तीन आलाप थे। पहला गीत "मेघा झर झर बरसत रे..." को किशोरी अमोनकर ने राग मलहार की शैली में स्वरबद्ध किया है। गीत के बीच बीच में आलाप बेहद सुन्दर बन पड़े हैं। यूं तो इस फ़िल्म में कई आलाप उन्होंने गाए हैं जिनका प्रयोग पाश्वसंगीत के रूप में किया गया है, लेकिन इस गीत के भीतर गाए हुए आलाप बेहद सुन्दर हैं। ऐसे ही एक आलाप का प्रयोग गोविन्द निहलानी ने एक लम्बे प्रेम-संपादन वाले दृश्य के लिए कर लिया और किशोरी अमोनकर को दिए अपने वादे से मूकर गए। फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद जब किशोरी जी ने फ़िल्म देखी तो उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा। उनकी माँ ग़ुस्से से आग-बबूला हो गईं। अमोनकर ने अन्तिम फ़ैसला ले लिया अब चाहे कुछ भी हो जाए, वो फ़िल्म जगत फिर कभी वापस नहीं आएँगी। फ़िल्म की दूसरी रचना थी रघुनन्दन पांशिकर के साथ गाया उनका युगल गीत "सावनिया संझा में अंबर झर आई, का चाल चलत काम राधा भरमाई"। यह भी वर्षा का गीत है। इस गीत को मुख्य रूप से रघुनन्दन जी ने ही गाया है जबकि किशोरी जी की आवाज़ आलापों में सुनाई देती है। रघुनन्दन मराठी मंच के प्रसिद्ध अभिनेता प्रभाकर पांशिकर के पुत्र हैं। 11 वर्ष की आयु में उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी। पंडित वसन्तराव कुलकर्णी से शुरुआती तालीम लेने के बाद उन्होंने जयपुर-अतरौली घराने की विधिवत तालीम किशोरी अमोनकर से लेनी शुरु की। अगले 17 वर्षों तक वो किशोरी जी के शिष्य बने रहे और उन्हीं की निगरानी में संगीत की सेवा करते रहे। इस तरह से जब ’दृष्टि’ में एक शास्त्रीय युवा गायक (इरफ़ान ख़ान) के पार्श्वगायन के लिए एक पुरुष आवाज़ की ज़रूरत पड़ी तो किशोरी जी ने अपने शिष्य को गाने का मौक़ा दिया और इस तरह से गुरु-शिष्य की जोड़ी ने गीत-संगीत का ऐसा समा बाँधा कि यह गीत फ़िल्म-संगीत के ख़ज़ाने का एक अनमोल नगीना बन गया।

’दृष्टि’ फ़िल्म का समापन फ़िल्म के नायक निखिल (शेखर कपूर) और नायिका संध्या (डिम्पल कापड़िया) के समुन्दर के किनारे बैठे हुए एक दृश्य से होता है जिसमें निखिल संध्या से पूछ रहे हैं कि उनके रिश्ते में आख़िर दिक्कत क्या थी जो एक दूसरे से इतना दूर कर दिया। समुन्दर किनारे बैठे वो बारिश का आनन्द ले रहे हैं और पार्श्व में चार अन्तरों का एक गीत चल रहा है। गीत के बोल इशारा कर रहे हैं कि वो एक दूसरे के साथ पुनर्मिलन के लिए तैयार हैं। यह संवाद के माध्यम से बोला नहीं जाता, लेकिन समाप्ति का यह गीत इसी तरफ़ इशारा कर रहा है। इस अन्तिम गीत के बोल हैं "एक ही संग हुते जो हम और तुम काहे बिछुड़ा रे" जिसे सुनते हुए हमें "ज्योति कलश छलके" गीत की याद आ जाती है। वैसे "ज्योति कलश छलके" राग देशकर पर आधारित है। किशोरी जी की आवाज़ में चार अन्तरों का यह गीत राग भूपाली पर आधारित है। इस गीत को छोटा ख़याल (अविलम्बित ख़याल) भी कहा जा सकता है। फ़िल्म के मुख्य भाव को उजागर करता यह गीत किशोरी अमोनकर के दिलकश आलापों और संगीत के तालों से सुसज्जित होकर जैसे रसों और भावनाओं का संचार कर रहे हों। वसन्त देव के छोटे-छोटे बोल गीत की सुन्दरता पे चार चाँद लगाते हैं। इस गीत से फ़िल्म समाप्त होता है। वैसे इसी गीत का एक और संस्करण भी है जिसमें किसी साज़ का प्रयोग नहीं हुआ है। निखिल और संध्या के एक दूसरे से अलग होने वाले दृ्श्य के बाद यह संस्करण पार्श्व में बजता है। जैसा कि ’गीत गाया पत्थरों ने’ फ़िल्म के गीत के बाद किशोरी जी ने कहा कि उन्होंने अपने स्वरभाषा को शब्दभाषा के साथ मिलाया है, इस गीत में भी वही प्रयोग सुनाई देता है। गीत का करुण रस किशोरी अमोनकर के स्वरभाषा से पूर्णता को प्राप्त करता है।


किशोरी अमोनकर ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी और एक फ़िल्म में संगीत दिया। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के लौहस्तंभ किशोरी अमोनकर का इन दो फ़िल्मों में योगदान कला की दृष्टि से अद्वितीय है, अतुलनीय है। फ़िल्म जगत हमेशा ॠणी रहेगी उनकी जिन्होंने अपनी पारस प्रतिभा से इन दोनों फ़िल्मों के संगीत को स्वर्णिम बना दिया। किशोरी अमोनकर भले एक फ़िल्मी पार्श्वगायिका नहीं थीं, लेकिन बस इन चार गीतों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनका मुकाम फ़िल्मी पार्श्वगायिकाओं से बहुत उपर है।



आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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