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Monday, January 11, 2010

जब साजिद वाजिद जोड़ी को मिला गुलज़ार साहब का साथ, तो रचा गया एपिक "वीर" का संगीत

ताज़ा सुर ताल ०२/ २०१०

सजीव - 'ताज़ा सुर ताल' की इस साल की दूसरी कड़ी में सभी का हम स्वागत करते हैं। पिछली बार 'दुल्हा मिल गया' की गीतों की चर्चा हुई थी और गानें भी हमने सुनें थे, आज बारी है एक महत्वपूर्ण फ़िल्म की, जिसकी चर्चा शुरु हुए साल बीत चुका है।

सुजॊय - चर्चा शुरु हुए साल बीत चुका है और अभी तक फ़िल्म बाहर नहीं आई, ऐसी तो मुझे बस एक ही फ़िल्म की याद आ रही है, सलमान ख़ान का 'वीर'।

सजीव - बिल्कुल सही पहचाना तुमने! आख़िर अब इस फ़िल्म के गानें रिलीज़ हो चुके हैं, और फ़िल्म के प्रोमोज़ भी आने शुरु हो गए हैं। आज फ़िल्म 'वीर' की बातें और 'वीर' का संगीत 'ताज़ा सुर ताल' पर।

सुजॊय - तो सजीव, जब 'वीर' की बात छिड़ ही गई है तो बात आगे बढ़ाने से पहले इस फ़िल्म का मशहूर गीत "सलाम आया" सुन लेते हैं और श्रोताओं को भी सुनवा देते हैं, उसके बाद इस गीत के बारे में चर्चा करेंगे और 'वीर' की बातों को आगे बढ़ाएँगे।

सजीव - ज़रूर! बस इतना बता दें कि इस फ़िल्म के संगीतकार हैं साजिद-वाजिद और गीतकार हमारे गुलज़ार साहब।

गीत - सलाम आया...Salaam aaya (veer)


सुजॊय - रूप कुमार राठोड़, श्रेया घोषाल और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में यह सुरीला गीत हमने सुना। बहुत दिनों के बाद ऐसा ख़ूबसूरत गीत आया है, क्यों?

सजीव - बिल्कुल! पीरियड फ़िल्मों की अगर बात करें तो 'जोधा अक़बर' के बाद यही पहला पीरियड फ़िल्म रिलीज़ होने जा रहा है। फ़िल्म 'वीर' के इस गीत को सुनते हुए फ़िल्म 'जोधा अक़बर' का "कहने को जश्न-ए-बहारा है" की याद आ जाती है जैसे!

सुजॊय - हाँ, अंदाज़ कुछ कुछ उसी तरह का है। एक चीज़ आपने ग़ौर की है आजकल, कि शुद्ध युगल गीत होते ही नहीं हैं इन दिनों। दो मुख्य गायक गायिका के साथ एक तीसरी आवाज़ को भी शामिल कर लिया जाता है कुछ चुनिंदा बोलों और आलापों को गाने के लिए। यह एक ट्रेंड सी जैसे चल पड़ी है।

सजीव - अगर ऐसा ही चलता रहा तो प्योर डुएट्स तो ख़त्म ही हो जाएँगे! ख़ैर, जब तक गाना अच्छा है, तब तक चाहे दो लोग गाएँ या तीन, बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। और बताओ इस गीत के बारे में और क्या ऒब्ज़र्वेशन है तुम्हारी?

सुजॊय - इसका जो संगीत संयोजन हुआ है, जिसे हम अरेन्जमेंट कहते हैं, वह भारतीय साज़ों के आधार पर किया गया है। अब ये ध्वनियाँ हो सकता है कि सीन्थेसाइज़र से निकले होंगे, लेकिन सितार और बाँसुरी की मीठी तानें बहुत दिनों के बाद किसी फ़िल्मी गीत में सुनने को मिला है।

सजीव - साथ ही कोरस का और स्ट्रिंग् इन्स्ट्रुमेंट्स जैसे कि वायलिन्स का भी सुंदर प्रयोग मिलता है। और अरे भई गीतकार का ज़िक्र तो हमने किया ही नहीं। गुलज़ार साहब के बोलों ने भी तो उतना ही कमाल किया है!

सुजॊय - कोई शक़ नहीं इसमें। और इससे एक और बात साबित हो जाती है कि अगर बोल अच्छे हों तो आज के दौर के संगीतकार भी मधुर संगीत दे सकते हैं। साजिद वाजिद अब तक चलताऊ किस्म के गानें ही बनाते आए हैं, लेकिन देखिए सुलज़ार के बोल पाकर कितना अच्छा गाना बना कर दिखाया है! अच्छा, अब दूसरा गाना कौन सा सुनवा रहे हैं?

सजीव - दूसरा गाना है सोनू निगम का गाया हुआ, मुखड़े के बोल हैं "मेहरबानियाँ"।

गीत - मेहरबानियाँ..meharbaaniyan (veer)


सजीव - यह गाना कैसा लगा?

सुजॊय - हाँ, एक अलग ही अंदाज़ का गाना है, लेकिन अगर इस पीरियड फ़िल्म के पार्श्व की बात करें तो मुझे ऐसा लगा कि गा्ने का रीदम और अंदाज़ थोड़ा ज़्यादा मॊडर्ण सा बन गया है। अगर किसी को यह न बताया जाए कि यह एक पीरियड फ़िल्म का गीत है, तो इसे सुन कर लगेगा कि कॊलेज के लड़कों पर फ़िल्माया गया है जो फ़िल्म की नायिका के साथ मस्ती कर रहे हैं।

सजीव - और एक बात नोटिस की है तुमने? गीत का जो शुरुआती संगीत है और शुरुआती रीदम है वह फ़िल्म 'दिल चाहता है' के सोनू निगम के ही गाए "तन्हाई" गीत के रीदम से बहुत मिलता जुलता है।

सुजॊय - वाक़ई! अब अगला गाना सुनने से पहले ज़रा इस फ़िल्म की बातें हो जाएँ?

सजीव - ज़रूर! 'वीर' फ़िल्म के निर्माता हैं विजय गलानी। निर्देशक हैं अनिल शर्मा। कहानी और स्क्रीनप्ले शैलेश वर्मा और सलमान ख़ान ने मिलकर लिखा है। सल्लु मियाँ के अलावा फ़िल्म में नायिका की भूमिका में है लिज़ा लज़रुस। साथ में हैं मिथुन चक्रबर्ती, जैकी श्रोफ़ और शाहरुख़ ख़ान भी हैं इस फ़िल्म में। किसी भी पीरियड फ़िल्म में सिनेमाटोग्राफ़ी का महत्वपूर्ण पक्ष होता है, तो इस फ़िल्म में यह विभाग सम्भाला है गोपाल शाह ने।

सुजॊय - चलिए, फ़िल्म के कास्ट और क्रू से तो आपने हमारा परिचय करा दिया, अब एक गीत सुनने की बारी है। बताइए अब कौन सा गाना सुना जाए?

सजीव - अब हम सुनेंगे मिली जुली आवाज़ों में "ताली मार दो हत्थी वीरा", जिसे गाया है सुखविंदर सिंह, राहत फ़तेह अली ख़ान, वाजिद और नोमान पिंटो ने।

गीत - ताली मार...taali maar (veer)


सुजॊय - इस गीत में भी नयापन है। साजिद-वाजिद का ख़ास ट्रेडमार्क इस गीत में सुनने को मिलता है। इस गीत के मुखड़े को अगर आप ने ग़ौर से सुना है तो आपको २००९ की उनकी फ़िल्म 'वांटेड' के गीत "लव मी बेबी लव मी" की याद आ जाएगी।

सजीव - सच कहा तुमने। इस गीत का संगीत संयोजन अच्छा हुआ है। तालियाँ बजाकर गीत का पूरा रिदम खड़ा किया गया है। पिछले गीत में हमें जिस पीरियड अंदाज़ की कमी लग रही थी, वह इस गीत में कुछ हद तक पूरा हुआ है।

सुजॊय - अच्छा सजीव, हम बार बार 'पीरियड पीरियड' कह रहे हैं, क्या आपको कुछ अंदाज़ा है कि किस पीरियड की यह फ़िल्म है। कहानी का मूल क्या है?

सजीव - जहाँ तक मैंने सुना है या पढ़ा है कहीं पे, यह उस समय की कहानी है जब अंग्रेज़ इस देश में अपना शासन चलाया करते थे। उनके 'डिवाइड ऐंड रूल' पॊलिसी की वजह से कई राजा महाराजा और नवाब झांसे में आ गए और अपना बहुमूल्य राजपाठ उन फ़िरंगियों के हाथों सौंप दिया। लेकिन एक जाती ऐसी भी थी जिन्होने मौत को ग़ुलामी से बेहतर माना। और यह जाती थी पिंडरी। पिंडरियों के रगों में वो ख़ून था जो अपने अंतिम साँसों तक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध करते थे। और पिंडरियों में सब से साहसी, सब से ज़्यादा शक्तिशाली पिंडरी का नाम था 'वीर'। वीर ने अंग्रेज़ों की ग़ुलामी स्वीकार नहीं की, जिसकी वजह से अंग्रेज़ों के अलावा माधवगढ़ के राजा से भी दुश्मनी मोल ली। दूसरी तरफ़ वीर प्रेम करता था उसी राजा की पुत्री यशोधरा से। वीर के पिता की बेइज़्ज़ती का बदला दाव पर था, उसका प्यार दाव पर लग चुका था, उसका अपना अस्तित्व भी दाव पर था। तलवारें टकराईं,एक के बाद एक शव गिरने लगे युद्ध भूमि पर। क्या होता है फ़िल्म के अंत में? यही देखना है हमें जैसे ही यह फ़िल्म रिलीज़ होती है।

सुजॊय - यानी की हिन्दुस्तानी "ग्लादियेटर" हैं सल्ल्लू मियां यहाँ. चलिए हमें और हमारे पाठकों को एक अंदाज़ा हो गया फ़िल्म के बारे में। अब देखना है कि जनता किस तरह से फ़िल्म को ग्रहण करती है। ख़ैर, अब आज के चौथे गीत की बारी। अब मैं आपको सुनवाउँगा राहत फ़तेह अली ख़ान और सुज़ेन डी'मेलो कई आवाज़ों में एक नर्मोनाज़ुक गीत, "सुरीली अखियों वाले"। "सलाम आया" गाने की तरह यह गीत भी बेहद कोमल और प्यार भरा है, जिसे सुन कर सही मायने में अच्छा लगता है। और राहत साहब का सुफ़ीयाना अंदाज़ गीत में अच्छा रंग ले आया है। इंटर्ल्युड म्युज़िक में कोरस का अच्छा इस्तेमाल हुआ है।

सजीव - और एक बार फिर गुलज़ार साहब के बोलों ने गीत को एक अलग मुकाम तक पहुँचाया है। लेकिन यह बताना मुश्किल है कि सुज़ेन डी'मेलो ने जिन अंग्रेज़ी बोलों को गाया है उन्हे भी गुलज़ार साहब ने ही लिखे हैं या फिर कोई और!

सुजॊय - गीत सुनने से पहले इस गीत से मिलता जुलता एक गीत का ज़िक्र मैं करना चाहूँगा। गीत है फ़िल्म 'लगान' का "ओ री छोरी मान भी ले बात मोरी"। इस गीत में जहाँ उदित और अल्का गीत को गाते है, वहीं दूसरी तरफ़ एक ब्रिटिश लड़की वसुंधरा दास की आवाज़ में अंग्रेज़ी के बोल गाती हैं। और 'वीर' के इस गीत में भी ऐसा ही लगता है कि कोई अंग्रेज़ लड़की ने सुज़ेन वाले पोर्शन गाए होंगे!

गीत - सुरीली आँखों वाले...surili akhiyon waale (veer)


सजीव - और अब माहौल को थोड़ा और बदलते हुए एक ठुमरी सुनते हैं "कान्हा बैरन हुई बांसुरी, कान्हा क्यो तेरे अधर लगी"।

सुजॊय - वाह, क्या बात है!

सजीव - बिल्कुल, और वह भी रेखा भारद्वाज की गाई हुई। 'ओम्कारा' और 'दिल्ली-६' के बाद रेखा भारद्वाज एक मशहूर गायिका के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी हैं। और इस ठुमरी को भी क्या ख़ूब अंजाम दिया है उन्होने! बेग़म अख़्तर की ठुमरी वाला अंदाज़ जैसे यकयक ज़हन में आ जाता है।

सुजॊय - इस ठुमरी में तबले से रिदम तैयार किया गया है जैसा कि होना ही चहिए था। और रेखा जी के साथ में आवाज़ मिलाई है तोशी साबरी, शरीब साबरी और शबाब साबरी ने। देखना यह है कि क्या यह गीत भी "ससुराल गेंदाफूल" की तरह लोकप्रिय होती है या नहीं!

सजीव - देखो जिस तरह से तुमने "मेहेरबानियाँ" गीत में "तन्हाई" और "ताली" गीत में "लव मी बेबी" गीत की झलक पाई थी, वैसे ही इस ठुमरी में भी मैं एक और गीत के सुर ढूंढ़ पाया हूँ।

सुजॊय - कौन सा?

सजीव - रेखा भारद्वाज जब दूसरी बार "कान्हा" गाती हैं, तब उसके साथ "मितवा, कहे धड़कनें तुझसे क्या" गीत के "मितवा" वाले अंश की धुन से मेल महसूस की जा सकती है।

गीत - कान्हा बैरन हुई बांसुरी...kaanha (veer)


सुजॊय - तो कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि इस फ़िल्म का संगीत अच्छा है, क्यों सजीव?

सजीव - हाँ, कम से कम साजिद वाजिद आज तक जिस तरह का संगीत देते आए हैं, उस लिहाज़ से तो यह उनका सब से बेहतरीन ऐल्बम माना जाना चाहिए इसे। जिस तरह से हिमेश भाई का 'तेरे नाम' फिर कभी नहीं बना पाया, वैसे ही हो सकता है कि 'वीर' के साथ भी साजिद वाजिद का नाम वैसे ही जुड़ जाए। यह तो वक़्त ही बताएगा।

वीर के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
रेखा भारद्वाज के गाये गीत के अलावा अन्य गीतों की बहुत अधिक शेल्फ वेल्यू नहीं नज़र आती, कुछ बार सुनने के बाद आप कुछ बोरियत महसूस करेंगें, पर जहाँ तक गीतों के स्तर का सवाल है, निराशा नहीं हाथ लगती. "सलाम आया","सुरीली अखियों वाले" (सुंदर बोल), और कान्हा जैसे गीतों के चलते ये अल्बम २०१० की हिट परेड में विशेष महत्त्व रखेगी. आवाज़ ने दिए ४ तारे.


अब पेश है आज के तीन सवाल.

TST ट्रिविया # ०४-"सलाम आया" और "रफ़्ता रफ़्ता देखो आँख मेरी लड़ी है" गीत में आप क्या समानता खोज सकते हैं?

TST ट्रिविया # ०५-साजिद-वाजिद की पहली ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम और पहली फ़िल्मी ऐल्बम का नाम बताइए।

TST ट्रिविया # ०६- संगीतकार साजिद-वाजिद ने गीतकार आनंद बक्शी साहब के साथ एक फ़िल्म में काम किया था। कौन सी थी वह फ़िल्म?


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी दो सही जवाबों के साथ ४ अंक अर्जित कर लिए.याद रहे आप लोग रेटिंग देकर भी १ अंक कम सकते हैं, इन नए गीतों पर आपकी राय हम जानना चाहते हैं.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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