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Sunday, December 29, 2019

राग गारा : SWARGOSHTHI – 449 : RAG GARA






स्वरगोष्ठी – 449 में आज


नौशाद की जन्मशती पर उनके राग – 5 : राग गारा


लच्छू महाराज की अनूठी नृत्य-संरचना देखिए, गारा में पिरोया गीत; “मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो...”



लता मंगेशकर
नौशाद
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की पाँचवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान रहे नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद अली का जन्म हुआ था। इस तिथि के अनुसार बीते 25 दिसम्बर, 2019 को नौशाद का एक सौवाँ जन्मदिन सम्पन्न हुआ है। इस उपलक्ष्य में हम “स्वरगोष्ठी” के दिसम्बर मास के प्रत्येक अंक में नौशाद के कुछ राग आधारित ऐतिहासिक गीत प्रस्तुत किया। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घरवालों की फटकार बदस्तूर जारी रही। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई (अब मुम्बई) की ओर रुख किया।


नौशाद के सांगीतिक जीवन की सर्वाधिक उल्लेखनीय फिल्म “मुगल-ए-आजम” रही है। “मुग़ल-ए-आज़म', वर्ष 1960 की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म मानी जाती है। फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के अनुसार के. आसिफ़ निर्देशित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म की नीव सन् 1944 में रखी गयी थी। दरअसल बात ऐसी थी कि आसिफ़ साहब ने एक नाटक पढ़ा। उस नाटक की कहानी शाहंशाह अकबर के राजकाल की पृष्ठभूमि में लिखी गयी थी। कहानी उन्हें अच्छी लगी और उन्होंने इस पर एक बड़ी फ़िल्म बनाने की सोची। लेकिन उन्हें उस वक़्त यह अन्दाज़ा भी नहीं हुआ होगा कि उनके इस सपने को साकार होते 16 साल लग जायेंगे। 'मुग़ल-ए-आज़म' अपने ज़माने की बेहद मंहगी फ़िल्म थी। एक-एक गीत के सीक्वेन्स में इतना खर्चा हुआ कि जो उस दौर की किसी पूरी फ़िल्म का खर्च होता था। नौशाद के संगीत निर्देशन में भारतीय शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत की छटा लिये इस फ़िल्म में कुल 12 गीत थे जिनमें आवाज़ें दी उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, लता मंगेशकर, शमशाद बेग़म और मोहम्मद रफ़ी ने। हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास का यह एक स्वर्णिम अध्याय रहा। यहाँ तक कि इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "प्यार किया तो डरना क्या" को शताब्दी का सबसे रोमांटिक गीत का ख़िताब भी दिया गया था। लता मंगेशकर की ही आवाज़ में फ़िल्म का अन्य गीत "मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे..." का भी अपना अलग महत्व है। कहा जाता है कि मुस्लिम सब्जेक्ट पर बनी इस ऐतिहासिक फ़िल्म में राधा-कृष्ण से सम्बन्धित इस गीत को रखने पर विवाद खड़ा हो सकता है, ऐसी आशंका जतायी गयी थी। वरिष्ठ निर्देशक विजय भट्ट भी इस गीत को फ़िल्म में रखने के ख़िलाफ़ थे। हालाँकि वो इस फ़िल्म से सीधे-सीधे जुड़े नहीं थे, पर उनकी यह धारणा थी कि यह फ़िल्म को ले डूब सकता है क्योंकि मुग़ल शाहंशाह को इस गीत के दृश्य में हिन्दू उत्सव जन्माष्टमी मनाते हुए दिखाया जाता है। नौशाद ने यह तर्क भी दिया कि जोधाबाई चूँकि ख़ुद एक हिन्दू थीं, इसलिए सिचुएशन के मुताबिक इस गीत को फ़िल्म में रखना कुछ ग़लत नहीं था। फिर भी नाज़ुकता को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म के पटकथा लेखकों ने इस सीन में एक संवाद ऐसा रख दिया जिससे यह तर्क साफ़-साफ़ जनता तक पहुँच जाये।

बहुत से फ़िल्मी गीतों को कृष्ण की लीलाओं से प्रेरणा मिली हैं। पर "मोहे पनघट..." कुछ अलग ही मुकाम रखता है। इस गीत के लिए गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद का नाम रेकॉर्ड पर दर्शाया गया है। पर सत्य यह है कि मूल गीत न तो शक़ील ने लिखा है और न ही मूल संगीत नौशाद का है। यह दरअसल एक पारम्परिक बन्दिश है जिसे शक़ील और नौशाद ने फ़िल्मी जामा पहनाया है। क्योंकि इसके मूल रचयिता का नाम किसी को मालूम नहीं है और इसे एक पारम्परिक रचना के तौर पर भी गाया जाता रहा है, इसलिए शायद किसी ने विरोध नहीं किया। पर ऐसे गीतों में गीतकार के नाम के जगह 'पारम्परिक' शब्द दिया जाना बेहतर होता। ख़ैर, उपलब्ध तथ्यों के अनुसार राग गारा पर आधारित इस मूल ठुमरी का सबसे पुराना ग्रामोफ़ोन 78 RPM रेकॉर्ड इन्दुबाला की आवाज़ में आज भी सुना जा सकता है। इन्दुबाला का जन्म 1899 में हुआ था और ऐसी धारणा है कि उनकी गायी यह रेकॉर्डिंग 1915 से 1930 के बीच के किसी वर्ष में की गई होगी। 1932 में उस्ताद अज़मत हुसैन ख़ाँदिलरंग ने इसी ठुमरी को 'कोलम्बिआ रेकॉर्ड कम्पनी' के लिए गाया था। गौहर जान की आवाज़ में यह ठुमरी मशहूर हुई थी। मूल रचना के शब्द हैं "मोहे पनघट पर नन्दलाल छेड़ दीनो रे, मोरी नाजुक कलइयाँ मरोड़ दीनो रे.."। 'मुग़ल-ए-आज़म' के गीत में शक़ील ने शब्दों को आम बोलचाल वाली हिन्दी में परिवर्तित कर ठुमरी का फ़िल्मी संस्करण तैयार किया है। बहुत से फ़िल्मी गीतों को कृष्ण की लीलाओं से प्रेरणा मिली हैं। पर "मोहे पनघट..." कुछ अलग ही मुकाम रखता है।

लच्छू महाराज
विविध भारती के एक कार्यक्रम में नौशाद साहब ने इस गीत को याद करते हुए बताया, "इस फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी आई जिसमें अकबर बादशाह कृष्णजन्म पर्व मना रहे हैं। आसिफ़ साहब ने मुझसे कहा कि वो इस सिचुएशन पर एक गाना चाहते हैं जिसमें वह झलक, वह माहौल पैदा हो। मैंने गाना बनाया, रेकॉर्ड करवाया, और उन्हें सुनाया। उन्हें बहुत पसन्द आया। तब मैंने उनसे रिक्वेस्ट किया कि इस गीत के पिक्चराइज़ेशन में जो डान्स इस्तेमाल होगा, उसे आप किसी फ़िल्मी डान्स डिरेक्टर से नहीं, बल्कि एक क्लासिकल डान्सर से करवाइयेगा। उन्होंने कहा कि फिर आप ही ढूँढ लाइये। मैंने लच्छू महाराज को आसिफ़ साहब से मिलवाया, जो लखनऊ कथक घराने के एक सुप्रतिष्ठित गुरु और कलाकार थे। आसिफ़ साहब ने उन्हें गाना सुनाया, तो वो रोने लग गये। आसिफ़ साहब परेशान हो गये, कहने लगे कि यह डान्स का गाना है, इसमें रोने की कौन सी बात है भला, मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात हो गई, तब लच्छू महाराज ने कहा कि बिल्कुल यही स्थायी बोल वाली ठुमरी मेरे बाबा गाया करते थे, इसने मुझे उनकी याद दिला दी।"

फिर आयी गीत के फ़िल्मांकन की बारी। यह भी कोई आसान काम नहीं था। मधुबाला एक प्रशिक्षित नृत्यांगना नहीं थी। लच्छू महाराज ने लगातार पाँच दिनों तक मधुबाला को नृत्य सिखाया। कहा जाता है कि इस गीत के लाँग शॉट्स में लच्छू महाराज के दल के किसे लड़के ने मधुबाला के स्थान पर नृत्य किया, पर गीत के दृश्यों को देख कर अन्दाज़ा लगाना मुश्किल है। है ना आश्चर्य की बात! एक और आश्चर्य की बात यह है कि इतने स्तरीय गीतों के बावजूद उस वर्ष का 'फ़िल्मफ़ेअर' पुरस्कार 'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए नौशाद को नहीं बल्कि 'दिल अपना और प्रीत परायी' के लिए शंकर जयकिशन को दिया गया। इसमें सन्देह नहीं कि 'दिल अपना...' के गानें भी बेहद मकबूल हुए थे, पर स्तर की बात करें तो 'मुग़ल-ए-आज़म' कई क़दम आगे थी। फ़िल्मफ़ेअर में ऐसा कई बार हुआ है। उदाहरण के तौर पर 1967 में शंकर जयकिशन को 'सूरज' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि 'गाइड', 'ममता' और 'अनुपमा' प्रतियोगिता में शामिल थी। 1971 में शंकर जयकिशन को फ़िल्म 'पहचान' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि उसी साल 'दो रास्ते' और 'तलाश' जैसी म्युज़िकल फ़िल्में थीं। 1973 में एक बार फिर शंकर जयकिशन को 'बेइमान' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि 'पाक़ीज़ा' के संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। क्या यह सही निर्णय था? ख़ैर, कला किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं। सच्चा पुरस्कार है, श्रोताओं का प्यार जो 'मुग़ल-ए-आज़म' को बराबर मिली और अब तक मिलती रही है। चूँकि यह गीत शास्त्रीय नृत्यप्रधान है, इसीलिए हम आपको इस गीत का रसास्वादन करने के लिए ‘यू-ट्यूब’ के सौजन्य से वीडियो रूप में प्रस्तुत कर रहे है।

राग गारा : “मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे...” : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म – मुगल-ए-आजम



विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे
राग गारा को खमाज थाट जन्य राग माना जाता है। इस राग में दोनों गान्धार और दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। राग गारा में अधिकतर उपशास्त्रीय संगीत; जैसे ठुमरी, दादरा, झूला, कजरी आदि और सुगम तथा फिल्म संगीत आदि गाया-बजाया जाता है। यह विलम्बित खयाल का राग नहीं है। इसमें विशेषकर मन्द्र और मध्य के पूर्वांग के स्वर प्रयोग किए जाते हैं। कुछ विद्वान मध्यम स्वर को षडज स्वर मान कर भी गाते-बजाते हैं। इस राग में काफी समानता राग पीलू से पाई जाती है। कुछ विद्वान इस राग को क्षुद्र प्रकृति का राग मानते हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक उपशास्त्रीय रचना सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, सुप्रसिद्ध विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। दरअसल यह एक झूला गीत है, जिसे वर्षा ऋतु में गाया जाता है। आप यह झूला गीत सुनिए और इस श्रृंखला और इस वर्ष की समापन प्रस्तुति कड़ी से विराम लेने की हमें अनुमति दीजिए।

राग गारा : झूला गीत : “बदरिया रे झूला धीरे से झूला रे...” : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ का यह वर्ष 2019 की समापन कड़ी है। हमारी अगली कड़ी का प्रकाशन वर्ष 2020 के पहले रविवार को होगा। वर्ष के पहले और दूसरे अंक में आप पहेली के वार्षिक महाविजेताओं की प्रस्तुतियों का रसास्वादन करेंगे; अतः इस अंक में हम कोई भी पहेली नहीं दे रहे हैं। अब हमारी अगली पहेली 451वें अंक में प्रकाशित होगी।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 447वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – देसी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, डोम्बिवली, महाराष्ट्र से श्रीपाद बावडेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


"स्वरगोष्ठी" की पहेली के वर्ष 2019 के महाविजेताओं को व्यक्तिगत रूप से ई-मेल से सूचित कर दिया गया है। डॉ. किरीट छाया, प्रफुल्ल पटेल, मुकेश लाडिया, क्षिति तिवारी और डी. हरिणा माधवी हमारे सम्भावित महाविजेता हैं। नए वर्ष 2020 का पहला और दूसरा अंक इन महाविजेताओं की प्रस्तुतियों के आधार पर ही होगा।उपरोक्त सभी सम्भावित महाविजेताओं से अनुरोध किया गया है कि वे अपना स्वयं का गाया/बजाया अथवा अपनी पसन्द का आडियो/वीडियो क्लिप हमें शीघ्र भेज दें। मुकेश जी से आग्रह है कि वे आडियो/वीडियो क्लिप के साथ अपना परिचय-वृत्त भी अतिशीघ्र भेज दें। आपके प्रेषण की हमें प्रतीक्षा है। 



अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की पाँचवीं और समापन कड़ी में आज आपने राग गारा का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायिका विदुषी अश्वनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में इस राग में पिरोया एक उपशास्त्रीय झूला गीत प्रस्तुत किया। नौशाद द्वारा राग गारा के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए लता मंगेशकर और साथियों के स्वर में राग गारा पर आधारित फिल्म “मुगल-ए-आजम” का एक ऐतिहासिक गीत प्रस्तुत किया। अब हामारी मुलाक़ात नये वर्ष 2020 के अगले अंक में 5 जनवरी के अंक में होगी। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
 राग गारा : SWARGOSHTHI – 449 : RAG GARA : 29 दिसम्बर, 2019

Sunday, September 22, 2019

राग भैरव : SWARGOSHTHI – 435 : RAG BHAIRAV






स्वरगोष्ठी – 435 में आज

भैरव थाट के राग – 1 : राग भैरव

विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे से राग भैरव में निबद्ध रचना और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




डॉ. प्रभा अत्रे
लता  मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में भैरव थाट के जनक राग “भैरव” पर चर्चा करेंगे। आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला के पहले अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीत-विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग भैरव, द्रुत तीनताल में निबद्ध एक शिवस्तुति सुनवाएँगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 1956 में प्रदर्शित फिल्म “जागते रहो” से शैलेंद्र का लिखा और सलिल चौधरी का स्वरबद्ध किया एक गीत – “जागो मोहन प्यारे...” का रसास्वादन आप करेंगे।



आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘भैरव’। इस थाट में प्रयोग किये जाने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म, प, ध॒(कोमल), नि । अर्थात ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। थाट ‘भैरव’ का आश्रय राग ‘भैरव’ ही है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग ‘भैरव’ में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। राग में आरोह के स्वर- सा, रे(कोमल), ग, म, प, ध(कोमल), नि, सां तथा अवरोह के स्वर- सां, नि, ध(कोमल), प, म, ग, रे(कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग भैरव के स्वर समूह भक्तिरस का सृजन करने में समर्थ हैं। इस राग का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए अब हम आपको विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे के स्वरों में राग भैरव का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में संलग्न प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध खयाल अंग की एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल में निबद्ध है।

राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिव शंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे


आज के प्रातःकालीन भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन-वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बांग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - जागते रहो




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 435वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1963 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है।

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 सितम्बर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 437 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 433वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए शहनाई पर लोक संगीत शैली कजरी की धुन का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; वाद्य का नाम – शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; वादक – उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने थाट और राग भैरव का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपको सुविख्यात शास्त्रीय गायिका विदुषी प्रभा अत्रे द्वारा प्रस्तुत राग भैरव की एक फिल्मों में राग भैरव का प्रयोग काफी हुआ है। भैरव आधार के फिल्मी उदाहरण का अनुभव कराने के लिए हमने पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के स्वर में फिल्म “जागते रहो” के एक गीत का रसास्वादन किया। अगले अंक में हम भैरव थाट के एक जन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे हैं। अपने सभी नियमित सदस्यों और संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग भैरव : SWARGOSHTHI – 435 : RAG BHAIRAV : 22 सितम्बर, 2019 

Sunday, August 11, 2019

राग सूर मल्हार : SWARGOSHTHI – 430 : RAG SOOR MALHAR







स्वरगोष्ठी – 430 में आज


वर्षा ऋतु के राग – 4 : सूर मल्हार


पण्डित भीमसेन जोशी से इस राग में दो खयाल और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित  भीमसेन जोशी
लता  मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “वर्षा ऋतु के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल मल्हार नाम से कोई राग नहीं है। दरअसल मल्हार एक अंग का नाम है। जब कोई राग इस अंग से संचालित होता है तब इसे मल्हार अंग का राग कहलाता है। राग मेघ मल्हार, मियाँ मल्हार, गौड़ मल्हार सूर मल्हार, रामदासी मल्हार आदि मल्हार अंग के प्रचलित राग हैं। इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में हम मल्हार अंग के राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की इस कड़ी में आज आपके लिए पहले फिल्म संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया, राग सूर मल्हार पर आधारित फिल्म ‘रामराज्य’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद राग का वास्तविक स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में हम इस राग के दो खयाल रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागी...’।




मल्हार अंग के रागों की श्रृंखला में कुछ राग अपने युग के महान संगीतज्ञों, कवियों के नाम पर प्रचलित है। ऐसा ही एक उल्लेखनीय राग है- सूर मल्हार। ऐसी मान्यता है कि इस राग की रचना हिन्दी के भक्त कवि सूरदास ने की थी। इस ऋतु प्रधान राग में निबद्ध रचनाओं में पावस के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, नायिका के विरह के भाव को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। राग सूर मल्हार काफी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औडव-षाडव होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग सूर मल्हार में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वरों का तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित होता है। फिल्मी संगीतकारों ने वर्षा ऋतु के इस राग सूर मल्हार पर आधारित एकाध गीत ही रचे हैं, जिसमें वर्षा ऋतु के अनुकूल भावों की अभिव्यक्ति हो। गीतकार भरत व्यास का लिखा और संगीतकार वसन्त देसाई का संगीतबद्ध किया एक कर्णप्रिय गीत हमे अवश्य उपलब्ध हुआ। फिल्म संगीतकारों में वसन्त देसाई एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिनकी रचनाओं में रागदारी संगीत के प्रति लगाव और उनकी प्रतिबद्धता के स्पष्ट दर्शन होते हैं। मल्हार अंग के रागों के प्रति उनका लगाव उनकी अन्तिम फिल्म ‘शक’ तक निरन्तर बना रहा। इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में बसन्त देसाई द्वारा राग मियाँ मल्हार में स्वरबद्ध ‘गुड्डी’ का आकर्षक गीत आप सुन चुके हैं। आज के अंक में हम राग सूर मल्हार के स्वरों में पिरोया उनका एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ का यह गीत है, जिसे भरत व्यास ने लिखा, वसन्त देसाई ने संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।

राग सूर मल्हार : ‘डर लागे गरजे बदरवा..’ : लता मंगेशकर : फिल्म - रामराज्य


इस राग की कुछ अन्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने बताया कि सूर मल्हार का मुख्य अंग है- सा [म]रे प म, नी(कोमल) म प, नी(कोमल)ध प, म रे सा होता है। राग के गायन-वादन में यदि सारंग झलकने लगे तो नी(कोमल) ध s म प नी(कोमल) ध s प स्वरों का प्रयोग करने से सारंग तिरोहित हो जाता है। श्री मिश्र के अनुसार सारंग के भाव में मेघ मल्हारांश उद्वेग के चपल और गम्भीर ओज से युक्त भाव में राग देस के अंश के विरह भाव के मिश्रण से कसक-युक्त उल्लास में वेदना के मिश्रण से नये रस-भाव का सृजन होता है। अब आप पण्डित भीमसेन जोशी से सुनिए, राग सूर मल्हार में निबद्ध दो मोहक खयाल रचनाएँ। मध्यलय की रचना एकताल में है, जिसके बोल हैं - ‘बादरवा गरजत आए...’ और इसके बाद द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं - ‘बादरवा बरसन लागी...’। आप इन खयाल रचनाओं को सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग सूर मल्हार : ‘बादरवा गरजत आए...’ और ‘बादरवा बरसन लागी...’ : पण्डित भीमसेन जोशी




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 430वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 17 अगस्त, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 432 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 428वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1951 में प्रदर्शित फिल्म “मल्हार” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने मल्हार अंग के राग “सूर मल्हार” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीरज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में प्रस्तुत दो खयाल रचनाओं का रसास्वादन किया। इससे पहले इसी राग पर आधारित फिल्म “रामराज्य” से एक गीत पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के स्वरों में सुनवाया गया। संगीतकार वसन्त देसाई ने इस गीत को राग सूर मल्हार के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग सूर मल्हार : SWARGOSHTHI – 430 : RAG SOOR MALHAR : 11 अगस्त, 2019

Sunday, August 4, 2019

राग गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 429 : RAG GAUD MALHAR






स्वरगोष्ठी – 429 में आज

वर्षा ऋतु के राग – 3 : गौड़ मल्हार

विदुषी मालविका कानन से इस राग में बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए





विदुषी मालविका कानन
लता  मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – “वर्षा ऋतु के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल मल्हार नाम से कोई राग नहीं है। दरअसल मल्हार एक अंग का नाम है। जब कोई राग इस अंग से संचालित होता है तब इसे मल्हार अंग का राग कहलाता है। राग मेघ मल्हार, मियाँ मल्हार, गौड़ मल्हार सूर मल्हार, रामदासी मल्हार आदि मल्हार अंग के प्रचलित राग हैं। इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में हम मल्हार अंग के राग गौड़ मल्हार पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हमने 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोया है। दरअसल राग गौड़ मल्हार की एक पारम्परिक बन्दिश का इस्तेमाल फिल्म में किया गया था। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही इसी राग की एक लोकप्रिय बन्दिश सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी मालविका कानन के स्वरों में हम प्रस्तुत कर रहे हैं।


राग गौड़ मल्हार का फिल्मों में प्रयोग बहुत कम किया गया है। रोशन और बसन्त देसाई, दो ऐसे फिल्म संगीतकार हुए हैं, जिन्होने इस राग का बेहतर इस्तेमाल अपनी फिल्मों में किया है। पार्श्वगायक मुकेश ने 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार रोशन थे। फिल्म के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की एक परम्परागत बन्दिश का चुनाव किया। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म ‘मल्हार’ और ‘बरसात की रात’ में शामिल राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोये दोनों गीतों का प्रयोग फिल्मों के शीर्षक संगीत के रूप में किया गया था। आइए अब हम आपको हम फिल्म ‘मल्हार का गीत सुनवाते है। लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का गीत सुनिए, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों का प्रयोग कर गीत को मूल बन्दिश के निकट ला दिया।

राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार


राग गौड़ मल्हार में राग गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। यह मल्हार अंग के रागों में से एक है। इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग होता है। राग गौड़ मल्हार के आरोह और अवरोह में सभी शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। केवल अवरोह में धैवत के साथ कोमल निषाद स्वर का प्रयोग होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार के थाट के विषय में दो मत हैं। अधिकतर गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो कुछ इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा तो इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे। राग गौड़ मल्हार के बारे में विद्वानो का मत है कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का यह स्वरूप अधिक प्रचलित है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। राग गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है, किन्तु पावस ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका मालविका कानन के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है। आप राग गौड़ मल्हार की यह बन्दिश सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालविका कानन : तीनताल




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 429वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1967 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 अगस्त, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 431 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 427वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1971 में प्रदर्शित फिल्म “गुड्डी” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मियाँ की मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – वाणी जयराम

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने मल्हार अंग के राग “गौड़ मल्हार” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीत-विदुषी मालविका कानन के स्वरों में प्रस्तुत एक बन्दिश का रसास्वादन किया। इससे पहले इसी राग पर आधारित फिल्म “मल्हार” से एक पारम्परिक बन्दिश का फिल्मी रूप पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के स्वरों में सुनवाया गया। संगीतकार रोशन ने इस गीत को राग गौड़ मल्हार के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 429 : RAG GAUD MALHAR : 4 अगस्त, 2019

Sunday, June 30, 2019

राग तिलंग : SWARGOSHTHI – 424 : RAG TILANG






स्वरगोष्ठी – 424 में आज

खमाज थाट के राग – 5 : राग तिलंग

इन्दुबाला देवी से राग तिलंग में एक ठुमरी और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




इन्दुबाला देवी
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। इस श्रृंखला में हम खमाज थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में खमाज थाट के जन्य राग “तिलंग” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको विगत शताब्दी की सुविख्यात व्यावसायिक गायिका इन्दुबाला देवी के स्वरों में प्रस्तुत राग तिलंग की ठुमरी के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग तिलंग के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिक उपयोग किया गया है। इस राग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से मदन मोहन का स्वरबद्ध किया एक गीत – “लगन तोसे लागी बलमा...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग तिलंग को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है। राग की जाति औड़व-औड़व होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग तिलंग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। यद्यपि राग तिलंग में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, फिर भी राग के सौन्दर्य-वृद्धि के लिए कभी-कभी तार सप्तक के अवरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और सुगम संगीत की रचनाएँ अधिक मिलती हैं। यह पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग तिलंग से मिलता-जुलता राग खमाज होता है। दोनों रागों में भेद को स्पष्ट करने के लिए कुछ तथ्यों को जानना आवश्यक है। दोनों रागों में पर्याप्त समानता है, किन्तु एक अन्तर के कारण राग तिलंग और खमाज में अन्तर आ जाता है। दोनों राग खमाज थाट से सम्बद्ध होता है और दोनों के आरोह में शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। दोनों रागों में वादी और संवादी क्रमशः गान्धार और निषाद स्वर होते हैं और दोनों पूर्वांग प्रधान राग होते हैं। परन्तु राग खमाज के अवरोह में शुद्ध ऋषभ स्वर का भी प्रयोग किया जाता है, जिस कारण राग की जाति बदल जाती है। अर्थात राग तिलंग औडव-औडव जाति का राग है, जबकि राग खमाज औडव-षाड़व का राग है। हम यह भी कह सकते हैं कि राग खमाज अपने थाट का आश्रय राग है, जबकि राग तिलंग जन्य राग होता है। राग तिलंग में अधिकतर ठुमरी गायी जाती है। एक शताब्दी से भी पहले व्यावसायिक गायिकाओं द्वारा गायी गई ठुमरियों का स्वरूप कैसा होता था, इसका अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पिछली शताब्दी की गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी सुनवाते है। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक गायिका इन्दुबाला देवी भी थीं। आइए अब हम इन्हीं की आवाज़ में राग तिलंग की ठुमरी सुनते हैं। ठुमरी के बोल हैं, -“तुम काहे को नेहा लगाए...”। आप यह ठुमरी सुनिए।

राग तिलंग : “तुम काहे को नेहा लगाए...” : ठुमरी : इन्दुबाला देवी



आज हमने आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग तिलंग का परिचय प्रस्तुत किया। इसके साथ ही पिछली शताब्दी की मशहूर गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में एक पुरानी ठुमरी रिकार्डिंग के माध्यम से राग के उपशास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने का प्रयास किया। अनेक फिल्मी गीतों में राग तिलंग का प्रयोग किया गया है। अब हम इस राग पर आधारित 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से एक गीत –“लगन तोसे लागी बलमा…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं। राग तिलंग की रचना खमाज थाट से मानी गई है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒। इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग है- झिंझोटी, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जयजयवन्ती, तिलक कामोद आदि। अब हम राग तिलंग पर आधारित एक फिल्मी गीत का रसास्वादन करा रहे हैं। यह गीत हमने 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से लिया है। अनीता गुहा, अमिता, अनूप कुमार, शुभा खोटे और दलजीत अभिनीत इस फिल्म में इस गीत के साथ ही अन्य कई गीत भी राग आधारित थे। फिल्म का संगीत सुप्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन ने तैयार किया है। गीतकार हैं, राजेन्द्र कृष्ण। राग तिलंग के अनुकूल स्वरों में लता मंगेशकर ने गीत –“लगन तोसे लागी बलमा...” का अत्यन्त मधुर गायन किया है। लीजिए पहले आप राग तिलंग पर आधारित यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलंग : “लगन तोसे लागी बलमा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – देख कबीरा रोया




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 424वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 6 जुलाई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 426 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 422वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म “सीमा” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इसके साथ ही किसी अज्ञात स्थान से अरविन्द मिश्र ने केवल एक सही उत्तर देकर एक अंक अर्जित किया। रविचन्द्र जोशी ने अपना तीनों सही उत्तर फेसबुक पर सार्वजनिक कर दिया। तीनों उत्तर सही होने के बावजूद हम इसे प्रतियोगिता में शामिल नहीं कर रहे हैं। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने खमाज थाट के जन्य राग “तिलंग” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका इन्दुबाला देवी के स्वरों में प्रस्तुत पिछली शताब्दी में प्रचलित एक ठुमरी का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म “देख कबीरा रोया” से एक मनमोहक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में सुनवाया। संगीतकार मदन मोहन ने इस गीत को राग तिलंग के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग तिलंग : SWARGOSHTHI – 424 : RAG TILANG : 30 जून, 2019


Sunday, June 23, 2019

राग जयजयवन्ती : SWARGOSHTHI – 423 : RAG JAYJAYVANTI






स्वरगोष्ठी – 423 में आज

खमाज थाट के राग – 4 : राग जयजयवन्ती

पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष से राग जयजयवन्ती में एक रचना और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। इस श्रृंखला में हम खमाज थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में खमाज थाट के जन्य राग “जयजयवन्ती” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष के स्वरों में प्रस्तुत राग जयजयवन्ती की एक रचना के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग जयजयवन्ती के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिक उपयोग किया गया है। इस राग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म “सीमा” से शंकर जयकिशन का स्वरबद्ध किया एक गीत –“मनमोहना बड़े झूठे...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग जयजयवन्ती का सम्बन्ध खमाज थाट से माना जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर के उत्तरार्द्ध में किए जाने की परम्परा है। राग जयजयवन्ती को परमेल-प्रवेशक राग कहा जाता है। इसका कारण यह है कि यह रात्रि के दूसरे प्रहर के अन्तिम समय में गाया-बजाया जाता है। इस राग के बाद काफी थाट के रागों का समय प्रारम्भ हो जाता है। राग जयजयवन्ती में खमाज और काफी दोनों थाट के स्वर लगते हैं। शुद्ध गान्धार खमाज थाट का और कोमल गान्धार काफी थाट का सूचक है। कोमल गान्धार स्वर का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो ऋषभ स्वरों के बीच किया जाता है। रात्रि के दूसरे प्रहर के रागों में राग जयजयवन्ती के अलावा कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- राग नीलाम्बरी, खमाज, आसा, खम्भावती, गोरख कल्याण, जलधर केदार, मलुहा केदार, श्याम केदार, झिंझोटी, तिलक कामोद, तिलंग, दुर्गा, देस, नट, नारायणी, नन्द, रागेश्री, शंकरा, सोरठ, हेम कल्याण आदि। राग जयजयवन्ती के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आइए सुनते हैं, इस राग की मोहक बन्दिश। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष।

राग जयजयवन्ती : “मेरो मन मोहन सों अटक्यो...” : पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष



जयजयवन्ती राग, खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इसमें भी दोनों गान्धार और दोनों निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग जयजयवन्ती का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर के अन्तिम भाग में किया जाता है। आरोह में पंचम के साथ शुद्ध निषाद और धैवत के साथ कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अवरोह में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग होता है। इस राग की प्रकृति गम्भीर है और चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होती है। इस राग में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना आदि गाये जाते है। इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। यह राग दो अंगों, देस और बागेश्री, में प्रयोग होता है। देस अंग की जयजयवन्ती, जिसमें कभी-कभी बागेश्री अंग भी दिखाया जाता है, प्रचार में अधिक है। लीजिए, अब आप सुनिए, राग जयजयवन्ती के स्वरों में पिरोया मनमोहक फिल्मी गीत। इसे हमने 1955 में बनी फिल्म ‘सीमा’ से लिया है। सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने इसे गाया है। यह गीत एकताल में निबद्ध है। गीत के संगीतकार शंकर जयकिशन हैं। आप भी यह गीत सुनिए और आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।

राग जयजयवन्ती : “मनमोहना बड़े झूठे...” : लता मंगेशकर : फिल्म सीमा




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 423वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 जून, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 425 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 421वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आजम” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – गारा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल एवं दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और साथी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और किसी अज्ञात स्थान से शिल्पी सिंह। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, मेरी पारिवारिक व्यस्तता के कारण विगत दो सप्ताह तक “स्वरगोष्ठी” का प्रकाशन बाधित हुआ। इस कारण आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने खमाज थाट के जन्य राग “जयजयवन्ती” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष के स्वरों में प्रस्तुत एक रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म “सीमा” से एक मनमोहक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में सुनवाया। संगीतकार शंकर जयकिशन ने इस गीत को राग जयजयवन्ती के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग जयजयवन्ती : SWARGOSHTHI – 423 : RAG JAYJAYVANTI : 23 जून, 2019



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