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Thursday, January 24, 2013

गणतन्त्र दिवस पर विशेष : ‘बॉम्बे टॉकीज़’, ‘क़िस्मत’ और अनिल विश्वास


भारतीय सिनेमा के सौ साल –33 
स्मृतियों का झरोखा  : गणतन्त्र दिवस पर विशेष

‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों का झरोखा’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज से प्रत्येक माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख किया करेंगे। आज के अंक में हम ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘क़िस्मत’ की निर्माण-प्रक्रिया और उसकी सफलता के बारे में कुछ विस्मृत यादों को ताजा कर रहे हैं।


बॉम्बे टॉकीज़’ की दूसरी फ़िल्म ‘क़िस्मत’ तो एक ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। अशोक कुमार और मुमताज़ शान्ति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस के पहले के सारे रेकॉर्ड्स तोड़ दिए। पूरे देश में कई जगहों पर जुबिलियाँ मनाने के अलावा कलकत्ते के ‘चित्र प्लाज़ा’ थिएटर में यह फ़िल्म लगातार 196 हफ़्ते (तीन साल) तक नियमित रूप से चली। इस रेकॉर्ड को आगे चलकर रमेश सिप्पी की फ़िल्म ‘शोले’ ने तोड़ा। ‘क़िस्मत’ एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म थी क्योंकि इसमें बचपन में दो भाइयों के बिछड़ जाने और बाद में मिल जाने वाले फ़ॉरमूले को आज़माया गया था। फ़िल्म की सफलता ने इस विषय को काफ़ी लोकप्रिय बनाया और फ़िल्मकारों ने इस फ़ॉरमूले को बार-बार आज़माया।

‘क़िस्मत’ अनिल बिस्वास की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सबसे कामयाब फ़िल्म थी। पार्श्वगायन की तकनीक अब विकसित हो चली थी और अनिल बिस्वास को अशोक कुमार के गायन में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए इस फ़िल्म में अरूण कुमार ने उनका शत-प्रतिशत पार्श्वगायन किया (इससे पहले अरूण कुमार एक-आध गीत ही गाया करते थे, जबकि बाक़ी गीत अशोक कुमार ख़ुद गाते थे)। मुमताज़ शान्ति की आवाज़ बनीं अमीरबाई कर्नाटकी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत एक देशभक्ति गीत था अमीरबाई और साथियों का गाया हुआ - “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है...”। इस गीत ने स्वाधीनता-संग्राम की अग्नि में घी का काम किया। गीत का रिदम और ऑरकेस्ट्रेशन भी ऐसा ‘मार्च-पास्ट’ क़िस्म का था कि सुनते ही मन जोश से भर जाए। एक तरफ़ अनिल बिस्वास, जो ख़ुद एक कट्टर देशभक्त थे और जो फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले चार बार जेल भी जा चुके थे, तो दूसरी तरफ़ इस गीत के गीतकार कवि प्रदीप, जिनकी झनझनाती राष्ट्रवादी कविताएँ लहू में उर्जा पैदा कर देती। इस देशभक्त गीतकार-संगीतकार की जोड़ी से उत्पन्न होने की वजह से ही शायद यह देशभक्ति गीत अमर हो गया। दो दिन बाद हम सब अपना राष्ट्रीय पर्व, गणतंत्र दिवस मनाएँगे। इस उपलक्ष्य में आइए सुनते है, यही चर्चित गीत। 

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘आज हिमालय की चोटी से...’ : अमीरबाई कर्नाटकी और साथी



अमीरबाई का गाया फ़िल्म का एक अन्य हिट गीत था “ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दीवाली है मेरे घर में अन्धेरा”। उन्हीं का गाया “अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया, भगवान किनारे पे लगा दे मेरी नैया...” भी फ़िल्म की एक लोकप्रिय रचना थी। केवल इन तीन गीतों से ही ‘क़िस्मत’ के गीत-संगीत की चर्चा समाप्त नहीं हो जाती। एक और गीत जिसने चारों तरफ़ लोकप्रियता के परचम लहरा दिए थे, वह थी कालजयी लोरी “धीरे-धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा...”। इस गीत के दो वर्ज़न थे – पहला अमीरबाई का गाया एकल गीत जबकि दूसरे में मुख्य आवाज़ अरूण कुमार की थी और अमीरबाई गीत ने आख़िर में अपनी आवाज़ मिलाई थी। कहते हैं कि इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर अरूण कुमार के बदले अशोक कुमार की ही आवाज़ थी और अनिल बिस्वास ने मज़ाक में कहा था कि शायद यही एक ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया है। जो भी है, हक़ीक़त यही है कि यह लोरी फ़िल्म-संगीत के इतिहास की एक सदाबहार लोरी है जिसकी चर्चा लोग आज भी करते हैं।

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘धीरे धीरे आ रे बादल...’ : अरुण कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी



‘क़िस्मत’ का शीर्षक गीत भी अमीरबाई और अरूण कुमार का गाया हुआ था, जिसके बोल थे “हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाय, ये जो एक दिन हँसाए, एक दिन रुलाए”। अरूण कुमार ने एकल आवाज़ में “तेरे दुख के दिन फिरेंगे, ले दुआ मेरी लिए जा...” गीत गाया था। इस फ़िल्म का एक और बेहद सुंदर और लोकप्रिय गीत रहा “पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...” जिसे पारुल घोष ने गाया था। यह गीत पारुल घोष का गाया सबसे लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ। इस गीत का असर कैसा रहा होगा, इसका अंदाज़ा हम इस बात से लगा सकते हैं कि लता मंगेशकर ने अपनी ‘श्रद्धांजलि’ एल्बम में पारुल घोष को श्रद्धांजलि स्वरूप उनके इसी गीत को गाया था और पारुल घोष को याद करते हुए लता जी ने कहा था, “पारुल घोष, जानेमाने संगीतकार अनिल बिस्वास जी की बहन, और प्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की पत्नी थीं। फ़िल्म गायिका होने के बावजूद वो घर संसार सम्भालने वाली गृहणी भी थीं। उनके जाने के बाद महसूस हुआ कि वक़्त की गर्दिश ने हमसे कैस-कैसे फ़नकार छीन लिए।” जब मैंने पारुल घोष की परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक से इस गीत के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया, “इस गीत के साथ तो न जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। जब मैं बहुत छोटी थी, तब सब से पहला पहला गीत जो मैंने सीखा था, वह यही गीत था। और जब भी कोई मुझे गीत गाने को कहता, मैं यही गीत गाती रहती। और आज तक यह मेरा पसंदीदा गीत रहा है”

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...’ : पारुल घोष



हिमांशु राय की मृत्यु के बाद से ही ‘बॉम्बे टॉकीज़’ विवादों और परेशानियों से घिर गया था। सरस्वती देवी, जिन्हें हिमांशु राय की वजह से वहाँ जगह मिली थी, के लिए भी वहाँ काम करना मुश्किल हो गया। उपर से रामचन्द्र पाल, पन्नालाल घोष और अनिल बिस्वास जैसे संगीतकार वहाँ शामिल हो चुके थे। ऐसे में सरस्वती ने वहाँ से इस्तीफ़ा देना ही बेहतर समझा। उनकी प्रतिष्ठा और उनका अनुभव इतना था कि ‘मिनर्वा मूवीटोन’ के सोहराब मोदी ने उन्हें अपनी कम्पनी में काम करने के लिए आमन्त्रित किया। इस तरह से ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की कुल 20 फ़िल्मों में संगीत देने के बाद सरस्वती देवी इस कम्पनी से अलग हो गईं और आने वाले वर्षों में ‘मिनर्वा मूवीटोन’ की कुछ 6 फ़िल्मों में संगीत दिया।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों का झरोखा’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।  

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Monday, October 10, 2011

फूले बन बगिया, खिली कली कली....बिहु रंग रंगा ये सुरीला गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 762/2011/202

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आप सभी का इस सुरीली महफ़िल में। कल से हमने शुरु की है पूर्वी और पुर्वोत्तर भारत के लोक गीतों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों से सजी लघु शृंखला 'पुरवाई'। कल पहली कड़ी में आपनें सुनी अनिल बिस्वास के संगीत में मेघालय के खासी जनजाति के एक लोक धुन पर आधारित मीना कपूर की गाई फ़िल्म 'राही' की एक लोरी। आज जो गीत हम लेकर आये हैं उसके संगीतकार भी अनिल बिस्वास ही हैं और गायिका भी मीना कपूर ही हैं। पर साथ में मन्ना डे की आवाज़ भी शामिल है। पर यह गीत किसी खासी लोक धुन पर नहीं बल्कि असम की सबसे ज़्यादा लोकप्रिय लोक-गीत 'बिहु' पर आधारित है। बिहु में गीत, संगीत और नृत्य, तीनों की समान रूप से प्रधानता होती है। इनमें से कोई भी एक अगर कमज़ोर पड़ जाए, तो बात नहीं बनती। बिहु असम का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार भी है और बिहु गीत व बिहु नृत्य इस त्योहार का प्रतीक स्वरूप है। 'बिहु' शब्द 'दिमसा कछारी' जनजाति के भाषा से आया है। ये लोग मुख्यत: कृषि प्रधान होते हैं और ये ब्राई शिबराई यानि बाबा शिबराई की पूजा करते हैं। मौसम के पहली फसल को ये लोग ब्राई शिबराई को समर्पित करते हैं और उनसे शान्ति और ख़ुशहाली की दुआ माँगते हैं। इस तरह से "बि" का अर्थ है "माँगना" और "शु" का अर्थ है "शान्ति और ख़ुशहाली"। यहीं से आया है "बिशु", और क्योंकि असमीया में "श" का उच्चारण "ह" भी होता है, इस तरह से "बिशु" बन गया है "बिहु"। यूं तो बिहु साल में कई बार आता है अलग अलग रूप लेकर, लेकिन गीत-संगीत वाले बिहु की बात करें तो यह अप्रैल के महीने में बैसाखी के समय आता है जिसे 'रंगाली बिहु' या "बहाग (बैसाख) बिहु" कहा जाता है। 'रंगाली बिहु' का त्योहार उपजाऊ धरती का प्रतीक है, जिसमें बिहु नृत्य के माध्यम से स्त्री-पुरुष उत्तेजक अंग भंगिमाओं से अपनी उर्वरक होने का आहवान करते हैं। बिहु गीत-संगीत में जिन वाद्यों का प्रयोग होता है, उनमें मुख्य रूप से शामिल हैं ढोल, ताल, पेपा, टोका, बांसुरी, ख़ुतुली और गोगोना। ये सभी असम के पारम्परिक वाद्य हैं।

मीना कपूर, मन्ना डे और साथियों के गाए अनिल बिस्वास के संगीत पर हमने जिस गीत को चुना है वह है १९६२ की फ़िल्म 'सौतेला भाई' का। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे गुरु दत्त, प्रनोती घोष और बेला बोस। किसी भी बिहु गीत में रीदम के साथ मुख्य गीत शुरु होने से पहले बिना ताल के दो तीन लाइनें होती हैं, यानि जैसे कि मुखड़े के पहले का शेर। इसी तरह से प्रस्तुत गीत में भी मुख्य गीत शुरु होने से पहले के बोल हैं "फूले बन बगिया, खिली कली कली, आई ॠतु अलबेली, संग की सहेलियाँ गईं पिया घर, रह गई दैया मैं अकेली"। फिर इसके बाद बिहु रीदम के साथ मुखड़ा शुरु होता है "काह्हा करूँ, आह्हा जिया, मोह्ह गई, देखो जिया रे"। शैलेन्द्र का लिखा यह गीत है और मूल बिहु गीत के बोल हैं "पाह गिसा साह कोरी नेह लागी....."। बिहु के रीदम पर हिन्दी के बोलों को बिठाना, इसमें जो शब्दों की कटिंग् है, वह आसान काम नहीं था, इस बारे में जानिये अनिल बिस्वास से ही। "बहुत मुश्किल हुई थी। मेरे जैसे शैलेन्द्र जो थे न, वो भी चैलेन्ज उनको कर दो तो वो भी सर खपा देते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि 'दादा, मैं अब हिन्दी शब्द को इसके जैसे कैसे तोड़ूं जो आसामी लोग तोड़ गए?' मैंने कहा कि यह गाना मुझे चाहिए, अब तुम्हारे सिवा कौन लिखेगा मुझे पता नहीं। फिर कहने लगे कि हम ज़रा समुन्दर किनारे होकर आते हैं। गए और लिख के ले आए "काह करूँ आह जिया मोह गई रेमैंने बोला यह तो वैसा नहीं लग रहा है। तो बोले कि इसको आप ऐसे गाओ "काह्ह करूँ आह्ह जिया मोह्ह गई देखो जिया रे"। मैं क्या बताऊँ, 'हैट्स ऑफ़ टू दैट मैन"! तो लीजिए दोस्तों, बिहु पर आधारित फ़िल्म 'सौतेला भाई' का यह गीत सुनिए मीना कपूर, मन्ना डे और साथियों की आवाज़ों में।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
मुखड़े में शब्द है "बंसी" और "हरजाई"

पिछले अंक में
वाह अमित भाई
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, June 7, 2011

तारों की नगरी से चंदा ने एक दिन....आज सुर्रैया सुना ही है एक दर्द भरी कहानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 673/2011/113

'एक था गुल और एक थी बुलबुल' - कहानी भरे गीतों की इस लघु शृंखला की तीसरी कड़ी में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। कुंदनलाल सहगल और शांता आप्टे के बाद आज कहानी सुनाने की बारी है सुरैया की। ३० के दशक से एक छलांग मार कर आज हम पहुँच गये हैं ५० के दशक में। साल १९५४ में एक फ़िल्म आयी थी 'वारिस', जिसका "राही मतवाले" गीत आप सब को याद ही होगा। इसी फ़िल्म में सुरैया की एकल आवाज़ में एक गीत है "तारों की नगरी से चंदा ने एक दिन धरती पे आने की ठानी"। कहिये प्लॉट कैसा है कहानी का? उतावले हो रहे होंगे न आप आगे की कहानी जानने के लिये। बस थोड़ा सा इंतज़ार कीजिये, अभी हम आते हैं कहानी पर, लेकिन उससे पहले इस गीत से जुड़ी कुछ बातें कहना चाहेंगे। "राही मतवाले" गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ था कि इस फ़िल्म के दूसरे गीतों की तरफ़ लोगों का ध्यान ज़रा कम ही गया है। आज का प्रस्तुत गीत तो बहुत लोगों नें सुना भी नहीं होगा। सुरैया पर ही फ़िल्माये गये इस गीत में पर्दे पर उसे और उसके बेटे को दिखाया जाता है। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की है कि एक रेल दुर्घटना में सुरैया अपने पति से बिछड़ जाती हैं। उस वक़्त वो गर्भवती थीं। बच्चे के जन्म के बाद वो अपने बच्चे को पालती-पोसती है, और इस तरह से कहानी में एक सिचुएशन रखा जाता है कि वो अपने बच्चे को सुलाने के लिये लोरी गा रही है, जिसके ज़रिये वो अपनी ही दुखभरी दास्तान कहती है।

क़मर जलालाबादी के लिखे इस गीत को चाहे आप लोरी कह लीजिये या कोई कहानी, बेहद ख़ूबसूरत गीत है। सुरैया इस गीत में अपने बच्चे को सुलाने के लिये लोरी गाती है, लेकिन गीत ख़त्म होते होते वह अपनी ही जीवन की दर्दीली कहानी सुना चुकी होती है। मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, अपने पति के लिये "चांद" का इस्तमाल करती हैं। और अनिल बिस्वास नें भी अपने दूसरे सभी गीतों की तरह ही क्या मधुर संगीत दिया है इस गीत में भी। हमें पूरी उम्मीद है कि आप में से जिन श्रोताओं नें इस गीत को पहले नहीं सुना है, उनको आज पहली बार यह गीत सुनकर उतना ही आनंद आयेगा। गीत सुनने से पहले यह रही कहानी इस गीत की।

तारों की नगरी से चंदा ने एक दिन,
धरती पे आने की ठानी,
सुन मेरे मुन्ना कहानी।

चंदा नें पहने शबनम के गहने,
लहरों पे आयी रवानी।
कब से खड़ी थी व्याकुल चकोरी,
नैना बिछाये हुए!
धरती पे उतरा राजा गगन का,
चुपके से किरणों के रथ में।
आये पिया प्यारे, प्यासे के द्वारे,
फिर भी चकोरी ना जाने।
कहती थी दुनिया हो न सकेगा चंदा चकोरी का मेल,
पल भर में देखो रूठेगी निंदिया टूटेगा सपनों का खेल।
इतने में चंदा बढ़ कर यूं बोला,
मैं राजा तू मेरी रानी।
लेकिन ये दुनिया प्रेमी की बैरन हाये लगा दी नज़रिया,
आये थे जैसे वैसे ही एक दिन सजनी से बिछड़े सांवरिया।
अब तक खड़ी है पथ पर चकोरी, लेकर पिया की निशानी,
जब तक न वापस आयेगा चंदा, पूरी न होगी कहानी।




क्या आप जानते हैं...
कि अनिल बिस्वास स्वरबद्ध फ़िल्म 'राही' की मीना कपूर की गायी लोरी "चांद सो गया तारे सो गये" मेघालय राज्य के खासी जनजाती की एक लोकधुन पर आधारित है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 4/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - किस सरोद वादक ने इस गीत में अपना योगदान दिया है - ३ अंक
सवाल २ - किस राग पर आधारित है ये गीत - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतीक जी बढ़िया खेल रहे हैं, अविनाश जी बीच बीच में चूक जाते हैं. अमित जी हमें थोडा समय दीजिए पिछली पहेली के संशय को दूर करने का

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 15, 2011

ऐ जान-ए-जिगर दिल में समाने आजा....पियानों के तार खनके और मुकेश की आवाज़ में गूंजा अनिल दा नग्मा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 593/2010/293

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार और स्वागत है आप सभी का इन दिनों चल रही लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' में। साल १७९० से लेकर १८६० के बीच मोज़ार्ट के दौर के पियानों में बहुत सारे बदलाव आये, पियानो का निरंतर विकास होता गया, और १८६० के आसपास जाकर पियानो ने अपना वह रूप ले लिया जो रूप आज के पियानो का है। पियानो के इस विकास को एक क्रांति की तरह माना जा सकता है, और इस क्रांति के पीछे कारण था कम्पोज़र्स और पियानिस्ट्स के बेहतर से बेहतर पियानो की माँग और उस वक़्त चल रही औद्योगिक क्रांति (industrial revolution), जिसकी वजह से उत्तम क्वालिटी के स्टील विकसित हो रहे थे और उससे पियानो वायर का निर्माण संभव हुआ जिसका इस्तमाल स्ट्रिंग्स में हुआ। लोहे के फ़्रेम्स भी बनें प्रेसिशन कास्टिंग् पद्धति से। कुल मिलाकर पियानो के टोनल रेंज में बढ़ौत्री हुई। और यह बढ़ौत्री थी मोज़ार्ट के 'फ़ाइव ऒक्टेव्स' से ७-१/४ या उससे भी ज़्यादा ऒक्टेव्स तक की, जो आज के पियानो में पायी जाती है। पियानो की शुरुआती विकास में एक और उल्लेखनीय नाम है ब्रॊडवूड कंपनी का; जॊन ब्रॊडवूड ने रॊबर्ट स्टोडर्ट और अमेरिकास बेकर्स के साथ मिलकर हार्प्सिकॊर्ड केस का इस्तमाल कर एक नये पियानो का निर्माण किया, और इसी से शुरुआत हुई 'ग्रैण्ड पियानो' की। यह सन् १७७७ की बात थी। इस टीम को जल्द ही ख्याति मिल गई क्योंकि इनके द्वारा निर्मित पियानो की ध्वनियाँ शक्तिशाली थीं, शार्प थीं। इन्होंने अपने पियानो जोसेफ़ हेडन और बीथोवेन को भेजे, और इनके पियानो में पहली बार पाँच से ज़्यादा ऒक्टेव्स की रेंज मौजूद थी। १७९० में पाँच ऒक्टेव, १८१० में छे ऒक्टेव और १८२० में सात ऒक्टेव वाले पियानो का निर्माण संभव हुआ। वियेनीज़ निर्माणकर्ताओं ने भी इस शैली को इख़्तियार कर पियानो निर्माण किया, लेकिन इन दोनों स्कूलों के पियानो में एक मूल फ़र्क था - ब्रॊडवूड पियानो ज़्यादा शक्तिशाली (robust) थे, जबकि वियेनीज़ पियानो ज़्यादा सेन्सिटिव हुआ करते थे। इस तरह से दोनों ही अपनी अपनी जगह कीमती सिद्ध हुए।

३० के दशक से सरस्वती देवी और ४० के दशक से आर. सी. बोराल के बाद आज 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला के लिए हमने चुना है ५० के दशक से संगीतकार अनिल बिस्वास की एक नायाब रचना। कल हमने आर. सी. बोराल साहब को 'फ़ादर ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहकर संबोधित किया था। दरअसल ऐसा अनिल दा ने ही कहा था, और ख़ुद को उन्होंने 'अंकल ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहा। तो दोस्तों, फ़ादर के बाद आज बारी अंकल की। अनिल के संगीत में हमने चुना है १९५१ की फ़िल्म 'आराम' का एक बेहद लोकप्रिय गीत मुकेश की आवाज़ में, "ऐ जान-ए-जिगर दिल में समाने आजा"। ४० के दशक के आख़िर तक फ़िल्म संगीत में पियानो का इस्तमाल बेहद लोकप्रिय हो चुका था और यह परम्परा ९० के दशक तक जारी रहा। हिंदी फ़िल्मों में पियानो पर रचे गीतों में अधिकतर गीत पार्टी गीत हुआ करते थे। अगर ख़ुशी की बात हुई तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अक्सर ग़म में डूबा नायक भी पियानो पर कोई ग़मगीन नग़मा छेड़ देता है जिसका अर्थ केवल उसकी नायिका ही समझ सकती है और कोई नहीं। आज के प्रस्तुत गीत के फ़िल्मांकन में प्रेम नाथ साहब पियानो पर बैठे गाते हुए नज़र आते हैं। राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा है। दोस्तों, अभी हाल ही में आपने संगीतकार तुषार भाटिया का साक्षात्कार पढ़ा होगा 'आवाज़' पर जो केन्द्रित था अनिल दा पर। बरसों पहले अनिल दा ने तुषार जी को एक एल.पी रेकॊर्ड उपहार में दिया था और उसके कवर पर बांगला में कुछ लिखा था, जो तुषार जी पढ़ नहीं पाये थे। अभी हाल में उनके इसी इंटरव्यु के दौरान उन्होंने वह कवर मुझे दिखाया और मुझसे उसका तर्जुमा करने को कहा। जब मैंने उन्हें बताया कि अनिल दा ने लिखा है, "तुषार को सस्नेह आशिर्वाद के साथ, अनिल दा", तो तुषार जी ने मुझे जवाब में कहा, "Dear Sujoy, You have made my day, missing dada more than ever before". और मैंने उनको जवाब दिया कि "what a privilege you have given me Tushar ji to translate something Anil da has written for you; cant ask for more!"। सच ही तो है दोस्तों, इतने सालों तक अनिल दा का लिखा वह जुम्ला अनपढ़ा रह गया और मुझे यह सौभाग्य नसीब हुआ कि उसे पढ़कर तुषार जी को बताऊँ कि अनिल दा ने उनको क्या लिखा था। तो आइए अनिल दा को समर्पित आज का यह पियानो गीत सुनते हैं मुकेश की आवाज़ में। और हाँ सब से उल्लेखनीय बात कहना तो मैं भूल ही गया; वह यह कि इस गीत में जो पियानो बजा है उसे बजाया था सनी कास्तेलीनो ने, जिनके लिए अनिल दा के दिल में बहुत सम्मान था।



क्या आप जानते हैं...
कि किसी भी पियानो को निर्माण के बाद पहले साल में चार बार ट्युन करना पड़ता है चार बार ऋतुओं के बदलाव के समय, और फिर दूसरे साल से दो बार प्रति वर्ष।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेता पर है ये गीत फिल्माया - 3 अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
तीनों महारथियों के स्कोर बराबर हैं....बढ़िया है मुकाबला...हिन्दुस्तानी जी भी हैं २ अंकों पर

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Friday, January 28, 2011

'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' - २७ 'अनिल बिस्वास पर केन्द्रित विविध भारती की यादगार शृंखला 'रसिकेशु' के बनने की कहानी संगीतकार तुषार भाटिया की ज़बानी'

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में एक बार फिर आप सभी का हम स्वागत करते हैं। आज का यह अंक बहुत ही ख़ास है क्योंकि आज आप इसमें एक महान संगीतकार के बारे में कुछ बातें जानने जा रहे हैं जो शायद अब तक आपको मालूम ना होंगी, और ये सब बातें आपको बताएँगे एक और बेहद गुणी फ़नकार। दोस्तों, अगर आप विविध भारती के श्रोता हैं और सुबह सवेरे 'संगीत सरिता' सुनते हैं तो आपने इसमें एक शृंखला ज़रूर सुनी होगी 'रसिकेशु', जिसमें संगीतकार अनिल बिस्वास से युवा संगीतकार तुषार भाटिया की बहुत अच्छी और लम्बी बातचीत सुनवाई गई थी। विविध भारती ने बड़े प्यार से इस रेकोडिंग् को अपने संग्रहालय में सहेज कर रखा है और इस शृंखला का दोहराव भी हर वर्ष होता रहता है श्रोताओं की फ़रमाइश पर। पिछले दिनों मेरी तुषार जी से फ़ेसबूक पर मुलाक़ात हुई, उनका बड़प्पन ही कहूँगा कि मुझे अपने फ़्रेण्ड्स-लिस्ट में शामिल किया, और इतना ही नहीं, एक इंटरव्यु के लिए भी तुरंत राज़ी हो गए। मुझे बहुत रोमांच हो आया क्योंकि यह मेरा पहला इंटरव्यु था। इससे पहले जितने भी इंटरव्युज़ मैंने किये हैं, सब ईमेल के माध्यम से हुए हैं। टेलीफ़ोन पर यह पहला इंटरव्यु था। ख़ैर, मैंने पूरी तैयारी की और सवालों की सूची तैयार की जो मैं तुषार जी से पूछना चाहता था। लेकिन जब हमारी बातचीत शुरु हुई तो अनिल दा और 'रसिकेशु' के बारे में इतने विस्तार और प्यार से तुषार जी ने बताना शुरु किया कि केवल 'रसिकेशु' और अनिल दा पर ही हमारी बातचीत घंटों तक चल पड़ी। इसलिए मैंने सोचा कि क्यों ना अनिल दा की 'रसिकेशु' के बनने की कहानी से ही आज की इस प्रस्तुति को सजाया जाये। तुषार जी के सब से पसंदीदा संगीतकारों में अनिल दा का नाम आता है, और अनिल दा के लिए तुषार जी के मन में किस तरह का सम्मान है, किस तरह का प्यार है, वो आपको इस इंटरव्यु को पढ़ने के बाद पता चल जाएगा। तो आइए, आपको मिलवाते हैं बहुमुखी प्रतिभा के धनी, जानेमाने सितार-वादक, संगीतकार, ऐड-फ़िल्म-मेकर, व लेखक श्री तुषार भाटिया से।
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सुजॊय - तुषार जी, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आपका 'हिंद-युग्म' में।

तुषार जी - नमस्कार!

सुजॊय - तुषार जी, सब से पहले तो आपका आभार व्यक्त करूँगा जो आप इस इंटरव्यु के लिए तैयार हुए; मैंने आपकी अनिल दा से की हुई बातचीत पर आधारित विविध भारती की शृंखला 'रसिकेशु' ना केवल सुनी है, उसे रेकॊर्ड करके ट्रान्स्क्राइब भी कर रखा है।

तुषार जी - 'रसिकेशु' के बनने की भी एक लम्बी कहानी है, अगर बताने लगूँ तो बहुत समय निकल जाएगा आपका।

सुजॊय- कोई बात नहीं, मैं जानना चाहूँगा, बहुत अच्छा लगेगा मुझे अनिलदा के बारे में और जानकर। और सिर्फ़ मुझे ही क्यों, हमें पूरा यकीन है कि गुज़रे ज़माने के सभी संगीत रसिकों को अनिल दा के बारे में जानकर बेहद ख़ुशी होगी। क्या वो आपके फ़ेवरीट संगीतकार रहे हैं?

तुषार जी - फ़ेवरीट अनिल दा थे और होने ही चाहिए। वो सर्वश्रेष्ठ और सर्वोपरी संगीतकार थे। ऐसा एक बार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी ने ही कहा था। और परम आदरणीय आर. सी. बोराल साहब व पंकज मल्लिक साहब के बाद अनिल दा ही तो थे। ऐसी विलक्षण बुद्धि कभी कभार ही पैदा होती है।

सुजॊय - अमीन सायानी साहब ने अनिल दा पर केन्द्रित एक रेडियो कार्यक्रम में उन्हें फ़िल्म संगीतकारों के भीष्म-पितामह कह कर संबोधित किया था।

तुषार जी - जी, लेकिन अनिल दा अपने आप को 'अंकल ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहते थे; 'फ़ादर ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' का ख़िताब उन्होंने आर. सी. बोराल साहब तथा पंकज मल्लिक साहब को दे रखा था।

सुजॊय - अच्छा तुषार जी, बताइए कि आप रेडियो से पहली बार कब जुड़े थे?

तुषार जी - ऐसा हुआ था कि पंडित पन्नालाल घोष पर 'संगीत सरिता' में एक सीरीज़ हुया था एक हफ़्ते का, जिसके आख़िर के दो एपिसोड्स मैंने किए थे। इस कार्यक्रम की प्रोड्युसर छाया गांगुली जी थीं जिन्होंने मुझे इस सीरीज़ को करने की दरख्वास्त की। इस सीरीज़ का विषय था 'पंडित पन्नालाल घोष का फ़िल्म संगीत में योगदान'। उस समय मुझे रेडियो का कोई एक्स्पिरिएन्स नहीं था, रेडियो में कैसे बोलते हैं, किस तरह की भाषा होती है, कुछ पता नहीं था। फिर भी ज़्यादा परेशानी नहीं हुई क्योंकि पढ़के बोलना था| उस सीरीज़ का बहुत अच्छा रेस्पॊन्स मिला, बहुत सारे श्रोताओं के पत्र भी मिले।

सुजॊय - तुषार जी, 'रसिकेशु' किस तरह से प्लान हुई और इस सीरीज़ के लिए आपको कैसे चुना गया, इसकी कहानी हम बाद में आप से पूछेंगे, पहले बताइए कि आपका ने अनिल दा से, मेरा मतलब है उनके गीतों से रु-ब-रु किस उम्र में और किस तरह से हुए थे, और किस तरह से आप अनिल दा के गीतों को सुनने लगे?

तुषार जी - 'बसंत', 'क़िस्मत', और 'तराना' के गानें मुझे आते थे, और मुझे ये गानें बहुत पसंद थे। लेकिन ज़्यादा गानें सुनने का मौक़ा नहीं मिलता था, इसलिए मै उनके काम से ज़्यादा वाक़िफ़ नहीं था। लेकिन जितना भी सुना था, वो बेहद पसंद था। मेरे मामाजी के घर में दो रेकॊर्ड्स थे, और मैं छुट्टियों में एक बार जब उनके घर गया तव उन रेकॉर्ड्स को अपने साथ ले कर आया था. कैसेट में रेकॊर्ड करने के लिए। एक रेकॊर्ड में "बलमा जा जा जा" गीत था जिसमें खयाल और दादरे का क्या सुंदर मिश्रण था। दूसरे रेकॊर्ड में 'तराना' के दो गीत थे, एक तरफ़ "सीने में सुलगते हैं अरमान" और दूसरी तरफ़ "नैन मिले नैन हुए बावरे", और यह दूसरा गीत मुझे बेहद पसंद था। उन दिनों गानें रेडियो पर ही सुन सकते थे, विविध भारती या रेडियो सीलोन, दूसरा कोई ज़रिया नहीं था। या फिर टीवी पर जो पुरानी फ़िल्में आती थीं, उनमें गानें सुन सकते थे। 'छोटी छोटी बातें', 'तराना, 'आराम', 'परदेसी', 'स्वयमसिद्धा' जैसी फ़िल्मों के गानें मैं टी.वी से रेकॊर्ड कर लिया करता था। फिर १९७८ में एक एल.पी रेकॊर्ड निकला 'Songs to Remember' जिसमें अनिल दा के कुल १२ गानें थे। १९७४-७५ तक मैं नौशाद साहब, ओ.पी.नय्यर साहब, रोशन साहब और सलिल दा का बहुत बड़ा भक्त बन चुका था। लेकिन जब मैंने उस एल.पी रेकॊर्ड में शामिल "ऋतू आये ऋतू जाए" सुना जो राग गौड सारंग पर आधारित था, तो मैं चमत्कृत हो गया। फिर और भी गानें जैसे कि "रूठ के तुम तो चल दिए", "ज़माने का दस्तूर है ये पुराना", "आ मोहब्बत की बस्ती बसाएँगे हम", "मोहब्बत तर्क की मैंने" जैसे गानें सुना, तो जैसे वो इंद्रासन डोल गया जिसमें मैंने बाक़ी सब दिग्गज संगीतकारों को बिठा रखा था। इसलिए मैंने उस रेकॊर्ड को कहीं छुपा दिया।

सुजॊय - यानी कि आपके दिल को यह गवारा न था कि नौशाद साहब, नय्यर साहब, सलिल दा, इनसे भी ज़्यादा कोई पसंद आ रहा है!

तुषार जी - बिल्कुल! फिर एक दिन मेरी माताजी ने मुझसे कहा कि तुम उस रेकॊर्ड को क्यों नहीं बजाते? "दूर पपीहा बोला", "बरस बरस बदली" वगेरह? तब मैंने उस रेकॊर्ड को दुबारा बजाना शुरु किया। और उसका आनंद दुगुना हो गया। और वह रेकॊर्ड मेरे जीवन की बहुत ही आनंदायक एक सम्पत्ति बन गई। मैं रोक नहीं पाता था अपने आप को उसे बजाने से। मैं घण्टों उस रेकॊर्ड की मुख्यपृष्ठ पर अनिल दा की तस्वीर को तकता रहता था, कि एक आदमी इतना दिव्य संगीत कैसे दे सकता है, इतना पर्फ़ेक्ट कैसे हो सकता है। हर गाना कमाल का और पंकज बाबू की तरह कोई फ़िल्मीपन नहीं था उनके संगीत में, ऐसा मुझे लगता था।

सुजॊय - वाह!

तुषार जी - कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि अनिल दा के कम्पोज़िशन्स सुनके दूसरे संगीतकारों ने सारे हथियार डाल दिये होंगे। और उनका संगीत भी क्या है! "बेइमान तोरे नैनवा", "रसिया रे मनबसिया रे", और 'अनोखा प्यार' के गानें, 'गजरे' के गानें।

सुजॊय - जी हाँ, जी हाँ।

तुषार जी - ये सब जो मैं अपनी बातें बता रहा हूँ ये उस दौर की हैं जब आर.डी. बर्मन का ज़माना था। और मैं कॊलेज में था उस वक़्त। यह वह दौर था जब हम लोग राजेश खन्ना, आर. डी. बर्मन और किशोर दा की तिकड़ी का, यानी इनके गानों का मज़ा लेते थे। लेकिन मैं साथ ही साथ पुराने गानों का भी मज़ा लेता था, और ऐसा मुझे फ़ील होता था कि पुराने गानों में जो गहराई थी, वो नये गानों में कम थी। मैंने एक कैसेट में अनिल दा के कई गानें रेकॊर्ड किए टीवी से, रेडियो से। उसमें 'फ़रेब' के लता जी के गाए दो गीत थे। उनमें एक था "जाओगे ठेस लगाके" और दूसरा था एक लोरी, "रात गुनगुनाती है लोरियाँ सुनाती है"। मेरी मौसी के घर पे यह रेकॊर्ड मुझे मिला, और मैं उसे रेकॊर्ड करने के लिए ले आया था। वह कैसेट कोई ले गया और वापस नहीं किया। और १९८२ के बाद मैंने ये गानें फिर कभी नहीं सुनें।

सुजॊय - तुषार जी, हम ख़ास आपके लिए फ़िल्म 'फ़रेब' के इन दोनों दुर्लभ गीतों को खोज लाये हैं, आइए आगे बढ़ने से पहले इन दोनों गीतों का आनंद लिया जाए।

तुषार जी - ज़रूर!

गीत - जाओगे ठेस लगाके (फ़रेब)


गीत - रात गुनगुनाती है (फ़रेब)


तुषार जी - वाह! फिर अनिल दा का 'हमलोग' सीरियल का म्युज़िक आया, आपने सुना होगा, जिसमें मीना कपूर जी ने टाइटल सॊंग् गाया था, "आइए हाथ उठाएँ हम भी"।

सुजॊय - जी! मीना जी भी कमाल की गायिका रही हैं।

तुषार जी - मेरे भाई श्यामल के अनुसार "कुछ और ज़माना कहता है" अब तक का बेस्ट फ़िल्म सॊंग् है।

सुजॊय - वाह!

तुषार जी - फिर एक दिन फ़िल्म 'सौतेला भाई' टीवी पे दिखाई गई जिसका "जा मैं तोसे नाही बोलूँ" मैंने रेकॊर्ड कर लिया। 'सौतेला भाई' के दूसरे या तीसरे हफ़्ते ही 'छोटी छोटी बातें' भी दिखाई गई, जिसका वह गाना था "कुछ और ज़माना कहता है"। इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "मोरी बाली री उमरिया, अब कैसे बीते राम" मैंने पहली बार सुना और सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए। यह गीत राग पीलू पर आधारित होते हुए भी जिस तरह से अनिल दा ने इसमें कोमल निशाद का प्रयोग किया है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। पीलू राग में आमतौर से शुद्ध निशाद बहुत प्रबल होता है, जैसे फ़िल्मी गीतों में आपने सुना होगा। कानन देवी का "प्रभुजी प्रभुजी तुम राखो लाज हमारी" (हॊस्पिटल), सहगल साहब का "काहे गुमान करे" (तानसेन), नौशाद साहब का बनाया हुआ "ओ चंदन का पलना" (शबाब), और "मोरे सैंयाजी उतरेंगे पार हो नदिया धीरे बहो" (उडन खटोला), इत्यादि इसके उदाहरण हैं। लेकिन अनिल दा के इस गीत में, "अब कैसे बीते राम, रो रो के बोली राधा मोहे तज के गयो श्याम", यह सांगीतिक वाक्य कोमल निशाद पे रुकता है। अनिल दा ने कैसे सोचा होगा इसको। मैं चाहता हूँ कि आप इस गीत को यहाँ पर ज़रूर सुनवाएँ।

सुजॊय - ज़रूर! हम दो गीत सुनेंगे यहाँ पर, एक तो नौशाद साहब के संगीत में फ़िल्म 'उड़न खटोला' का "मोरे सैंया जी उतरेंगे पार" तथा दूसरा अनिल दा का रचा फ़िल्म 'छोटी छोटी बातें' का उपर्युक्त गीत।

गीत - मोरे सैंयाजी उतरेंगे पार (उडन खटोला)


गीत - मोरी बाली री उमरिया (छोटी छोटी बातें)


तुषार जी - और भी बहुत से संगीतकार हुए जिन्होंने शास्त्रीय संगीत पर गानें बनाये, लेकिन अनिल दा की बात ही अलग थी। उनके काम में एक नया दृष्टिकोण मुझे नज़र आता था। तो मैं एक एकलव्य की तरह अनिल दा को मन ही मन पूजता था। संगीत सृजन की रुचि होने की वजह से मेरा दृष्टिकोण एक विद्यार्थी की तरह होता था और मैं सोचता रहता था उनके बारे में। फिर १९८४ में जब मैंने सुना "लूटा है ज़माने ने क़िस्मत ने रुलाया है" (दोराहा), वहाँ भी पाया कि कोमल धैवत का प्रयोग अनोखा है। मुझे अनिल दा और नौशाद साहब के कम्पोज़िशन्स के हर पहलू में सिर्फ़ पर्फ़ेक्शन ही नज़र आता। क्या ग़ज़ब की पकड़ थी इनकी अपने फ़न पर!

सुजॊय - वाह! बहुत ही अच्छी तरह से आपने बताया कि किस तरह से आप अनिल दा के भक्त बनें। ये तो थी कि किस तरह से आपने अनिल दा के गीतों को सुनना शुरु किया, सुनते गये, उन्हें और उनके संगीत को खोजते गये, लेकिन उनसे आपकी पहली मुलाक़ात कब और कहाँ हुई थी? किस तरह की बातचीत होती थी आप में?

तुषार जी - मैं उस वक़्त HMV में था और अनिल दा दिल्ली से बम्बई आये थे किसी भजन के रेकॊर्डिंग् के लिए। और तब मैंने पहली बार उनसे मिला। यह बात १९८६ की है। उस समय मैं HMV में उन्हीं के गीतों का एक ऐल्बम कम्पाइल कर रहा था, जिसका शीर्षक था 'Vintage Favourites - Anil Biswas'। मैं चाहूँगा कि इस कैसेट/ सीडी का कवर आप अपने पाठकों को ज़रूर दिखाएँ।

सुजॊय - ज़रूर!

चित्र-१: 'Vintage Favourites - Anil Biswas' (Front Page) (सौजन्य: तुषार भाटिया)


चित्र-२: 'Vintage Favourites - Anil Biswas' (Back Page) (सौजन्य: तुषार भाटिया)


तुषार जी - बाद में भी जब भी वो बम्बई आते थे, तब भी मिलता था, लेकिन मैं उनका लिहाज़ करता था, इसलिए उनसे ज़्यादा बात़चीत या सवाल नहीं पूछता था। मैं सोचता रहता था कि कैसे रहे होंगे अनिल बिस्वास! ये कैसे संभव है कि संगीत की कोई विधा ऐसी नहीं जिसे उन्होंने छोड़ा हो, अनिल दा का तो मामला ही कुछ अलग है! वो जो कुछ भी बोलते थे, वो बड़ा मार्मिक होता था, और उनके बोलने की छटा भी कमाल की थी। पाँचों भाषाओं में पे उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी - हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, बांगला और बृज भाषा। और इन भाषाओं में अच्छा काव्य लिखते भी थे। और ज़बान भी इतनी साफ़ कि सामने वाला दंग रह जाए! बहुत ही गहरा अध्ययन था काव्य का। और हिंदी से लेके उर्दू के बड़े बड़े कवियों, शायरों के साथ हुए उनके काम से मैं अच्छी तरह वाक़ीफ़ था, जैसे कि आरज़ू लखनवी, सफ़दार आह, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, पंडित नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप। साथ ही कबीर, मीरा, तुल्सीदास के काव्य की भी उतनी ही गहरी जानकारी थी उनको। 'रसिकेशु' में भी उन्होंने एक दोहा कहा था अगर आपको याद है तो, "खरी बात कबीरा कहीगा, अंधाउ कहे अनूठी, बची खुची सो गुसैया कहीगा, बाकी सब बाता झूठी"।

सुजॉय - बहुत ख़ूब। यानी कबीरदास, सूरदास और तुल्सीदास, बाकी सब बकवास! अच्छा, 'रसिकेशु' के लिए अनिल दा से आपकी किस साल मुलाक़ात हुई थी और किस तरह से 'रसिकेशु' प्लान हुई थी?

तुषार जी - 'रसिकेशु' के लिए अनिल दा से हमारी मुलाक़ात हुई १९९६ में। पंडित पन्नालाल घोष के उस प्रोग्राम का इतना अच्छा रेस्पॊन्स मिला कि उसके बाद छाया जी ने मुझसे कहा कि वो अनिल दा पर भी प्रोग्राम करने की इच्छुक हैं। छाया जी जानती थीं कि अनिल दा से मेरी मुलाक़ातें होती थीं, और उन्होंने मुझसे उनसे मिलवाने को कहा। तो अगली बार जब अनिल दा बम्बई आये और हर साल की तरह उस बार भी उनके सम्मान में एक लंच का आयोजन हुआ था डॊ. जोशी के घर पे, तो मैं छाया जी को लेकर वहाँ गया।

सुजॊय - तुषार जी, माफ़ी चाहूँगा टोकने के लिए, आगे बढ़ने से पहले यह बताइए कि छाया गांगुली जी को आप पहले से ही जानते थे?

तुषार जी - जी हाँ, महादेवी वर्मा जी और पंडित नरेन्द्र शर्मा के कुछ गानें मैंने कम्पोज़ किए थे जिन्हें छाया जी गा चुकी थीं। हमारा एक दूसरे के घर के घर आना जाना था। और पन्ना बाबू पर उस प्रोग्राम के लिए भी छाया जी ने ही मुझसे आग्रह किया था।

सुजॊय - अच्छा अच्छा! अब बताइए आगे उस लंच में फिर क्या हुआ।

तुषार जी - उस लंच में तो फिर कुछ बात नहीं हुई, बस एक अपॊयण्टमेण्ट फ़िक्स हुआ मेरा और छाया जी का अनिल दा के साथ। फिर हम अगले दिन शाम को उनसे मिलने गए और छाया जी ने उनसे इंटरव्यु की बात छेड़ी। अनिल दा ने पूछा कि इंटरव्यु कौन करेगा? तुषार, तुम सुझाओ। मैंने ब्रॊडकास्टिंग् की दुनिया के दो बहुत मशहूर नाम सुझाये। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मेरे मन में कहीं न कहीं एक ऐसी इच्छा भी थी कि काश नौशाद साहब यह इंतरव्यु। यह बात तो जगविदित है कि नौशाद साहब अनिल दा को अपना गुरु समझते थे। अगर ये दो दिग्गजों की बातचीत रेडियो पर लोग सुनेंगे तो इससे बेहतर तो कोई बात हो ही नहीं सकती थी। वैसे भी आर. सी. बोराल, पंकज मल्लिक और अनिल बिस्वास के बाद नौशाद साहब का ही तो नाम आता है, जिन्हें हम फ़िल्म संगीत के प्रचलित धारा के पायनीयर या युग-प्रवर्तक संगीतकार कह सकते हैं। तो मैं ये सब सोच ही रहा ही था कि काश ऐसा कुछ हो सके कि अचानक फ़ोन बजा। मैंने फ़ोन उठाया। उधर से आवाज़ आई, "क्या वहाँ अनिल बाबू तशरीफ़ रखे हुए हैं? मैंने पूछा कि आप कौन साहब बोल रहे हैं? दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "जी मुझ नाचीज़ को नौशाद अली कहते हैं"। उस वक़्त मेरी क्या हालत हुई होगी इसका आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। मेरे लिए तो वर्णन के बाहर है। मैंने फ़ोन पे हाथ रख अनिल दा से कहा कि नौशाद साहब का फ़ोन है। तो अनिल दा ने मुझसे सवाल किया कि वो क्या कह रहे हैं? अब मैं नौशाद साहब से ये बात कैसे पूछता? अर्जुन को विश्वरूप दर्शन जो हुए थे, उनके सामने एक भगवान श्री कृष्ण थे, मेरे सामने दो थे। तो मैंने बहुत ही संकोच के साथ यह बात नौशाद साहब से पूछी। उन्होंने अपनी लखनवी तहज़ीब में अर्ज़ किया, "अगर अनिल बाबू फ़ारिक़ हों तो मैं आदाब-ओ-सलाम के लिए हाज़िर हो जाऊँ|" न जाने ये कैसी ग्रहदशा थी! दिल में उस इंटरव्यु की बात थी थी, और अगर इस वक़्त नौशाद साहब यहाँ आ जाएँ तो कोई बात बन भी जाए क्या पता! जब मैंने अनिल दा से कहा कि नौशाद साहब आकर मिलना चाहते हैं, तो अनिल दा बोले कि "फ़ोन ला"। फिर फ़ोन पर बात करने लगे, मुझे उस तरफ़ की बातें तो सुनाई नहीं दी, इस तरफ़ से दादा कहने लगे 'जीते रहो... आज रहने दो, बच्चे आये हैं, रेडियो पर इंटरव्यु की बात कर रहे हैं....."। छाया जी ने फिर पूछा कि इंतरव्यु किससे करवाना है? अनिल दा ने देर तक मेरी तरफ़ देखा और अचानक बोल उठे कि यह इंटरव्यु तुषार करेगा। मैं चौंक पड़ा। मैंने कहा, "दादा, मुझे तो कोई तजुर्बा नहीं"। तो अनिल दा भड़क उठे, कहने लगे, "तेरी यह मजाल, तू मुझे ना कह रहा है?" मैंने कहा, "दादा, आपको सवालात करने की मेरी क्या औक़ात है।" तो कहने लगे कि तूने जो पंडित पन्नालाल घोष पे प्रोग्राम किया था वो मैंने सुना था, I have heard it, I know about it'। उन्होंने छाया जी से कहा कि अगर तुषार करेगा तो ही मैं इंटरव्यु दूँगा। इसके बाद मेरे पास कोई चारा न था। मैं तो केवल छाया जी को उनसे मिलवाने ले गया था और उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी ही मेरे सर डाल दी।

सुजॊय - कैसा लग रहा था आपको उस वक़्त जब इतना बड़ा मौका आपको मिला?

तुषार - क्या बताऊँ मैं कि कितना टेन्शन दिया दादा ने मुझे! मेरे सामने तीन मसले थे। एक तो संगीत का महासागर मेरे सामने लहरा रहा था जिसे मुझे दुनिया के सामने पेश करना था। दूसरा मसला था समय का। मेरे पास प्रिपेयर्ड होने का टाइम नहीं था, क्योंकि इंटरव्यु दूसरे-तीसरे दिन ही था। और तीसरा मसला यह था कि दादा न अपने बारे में बोलना चाहते थे और ना मैं उनकी तारीफ़ कर सकता था। अनिल दा को अपनी तारीफ़ से नफ़रत थी। यह उनका तजुर्बा था कि उन्होंने मुझमें कुछ देख लिया था जिसकी वजह से उन्होंने मुझे इस महान कार्य के लिए चुना। अब मेरे लिए मुश्किल की घड़ी थी। दूसरे दिन मेरे घर में शादी थी और उसी दिन शाम को मुझे और छाया जी को उनसे जाकर मिलना था। मुझे यह सोचकर बुखार आ गया था कि दादा का इंटरव्यु कैसे करूँगा, क्योंकि वो कोई ऐसे वैसे कलाकार नहीं थे, वो भारत के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार थे। और उनसे वो सब सवाल नहीं पूछ सकते थे जो किसी भी आम इंटरव्यु में एक जर्नलिस्ट कलाकार को पूछते हैं। मुझे ऐसे सवाल पूछने थे जो उनके बारे में भी ना हो लेकिन उनका साहित्य और संगीत पे जो आधिपत्य है, जो महारथ उन्हें हासिल है, वो सब दुनिया के सामने रख सकूँ। जो विराट दर्शन मुझे हो रहा था, मैं चाहता था कि वही दर्शन लोगों को भी इस कार्यक्रम के ज़रिए हो। और एक बात यह भी थी कि अनिल दा बहुत सालों के बाद रेडियो में आ रहे थे। न जाने उनको मुझ पर इतना भरोसा कैसे हो गया था, यह बात मुझे समझ में नहीं आ रही थी। ख़ैर, छाया जी का प्लान था कि यह शृंखला तीन से सात एपिसोड्स में पूरी हो जाए।

सुजॊय - लेकिन यह शृंखला तो २६ एपिसोड्स की थी न?

तुषार - हाँ। तो मैं सोच में पड़ गया कि किस तरह से इंटरव्यु के मामले को आगे बढ़ाया जाये। कौन कौन से विषय चुने जायें, मैंने अनिल दा से पूछा। उन्होंने कहा कि कल आ जाओ। शाम को जब मैं और छाया जी उनके घर गये, तो दादा बहुत ही एक्साइटेड थे। उन्होंने एक लिस्ट बनाई थी संगीतकारों की। बड़े उत्साह से वो कहने लगे कि मैं आर. सी. बोराल साहब से शुरु करूँगा, फिर पंकज मल्लिक साहब से आगे बढ़ाऊँगा, वगेरह वगेरह। मैं और छाया जी एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे कि तीन कड़ियों की यह शृंखला तो दादा पर है, पर वो तो दूसरे संगीतकारों की बातें किए जा रहे हैं। आप देखिए, उस वक़्त उनकी उम्र ८५ वर्ष थी, फिर भी कितना जोश था उनमें। फिर पूछने लगे, और लिखते गये, सहगल साहब, कानन देवी....। पूछा कि हम पंकज बाबू के कौन से गानें बजाएँगे? शुरुआत तो "मैं जानू क्या जादू है" से ही करूँगा, फिर 'डॊक्टर' फ़िल्म का "गुज़र गया वो ज़माना" आएगा, और फिर मुझसे पूछा कि पंकज दा का और कौन सा गीत रखें। मैंने कहा कि कविगुरु रबीन्द्रनाथ की कविता, पंकज दा की बनाई हुई धुन पे, "दिनेर शेषे घूमेर देशे"। मैं क्या बताऊँ, काश उस वक़्त मेरे पास कैमरा होता, उनके चेहरे पर जो एक्स्प्रेशन आया! बोल पड़े, "लाजवाब! इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता"। दादा "दिनेर शेषे घूमेर देशे" को गुनगुनाना शुरु किया और धीरे धीरे उनकी आँखें भरने लगीं, और आँसू बहने लगे। मैं और छाया जी बहुत चिंतित हो गये कि इतने भावावेश में कहीं उनकी तबीयत ख़राब ना हो जाये। शाम के ६:३० बज रहे थे, जाड़े का मौसम था। वो रोते गये और गाते गये। मीना दीदी ने दादा को आगे गाने से मना किया। लेकिन अनिल दा ने कहा कि नहीं मैं गाऊँगा, ज़रूर गाऊँगा। वो कहाँ सुनने वाले थे। मीना दी के रोकने के बावजूद अनिल दा ने गाना बंद नहीं किया और मुझसे अंतरे के शब्द पूछे। मैंने कहा, "दादा, रहने दीजिए आज।" कहने लगे, "तू अंतरा बता"। मैंने कहा, "घौरे जारा जाबार तारा कौखोन गैछे घौर पाने...." कहने लगे, "ये तो मेरी ज़िंदगी की कहानी है; क्या अनिल बिस्वास नाम का प्राणी ऐसी धुन बना पाएगा? कदापि नहीं।" उन्होंने इतना ईमोशनल होकर गाया कि क्या बताऊँ। ज़रा सोचिये कि क्या आलम होगा वह, रबीन्द्रनाथ की कविता, पंकज बाबू की धुन, गाने वाले अनिल दा, और शब्द पूछे जा रहे थे तुषार भाटिया से, और सुनने वालों में मीना दी और छाया जी, यानी दो सशक्त गायिकाएँ। यह सोच कर ही जैसे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ख़ैर, आधा घंटा लगा उनको स्वस्थ होने में। छाया जी और मैं सोचने लगे कि यह सीरीज़ दादा पर है लेकिन वो तो अपने बारे में कुछ कह ही नहीं रहे हैं, ना ही अपने गीतों के बारे में। मैंने हिम्मत करके दादा से पूछा, "दादा, आपके कौन से गानें लें? तो कहने लगे, "मेरे गानों के बारे में मैं क्या बोलूँ, तू ही बोल, तू ही सोच"। तभी मैंने सोच लिया कि मुझे ऐसे सवाल पूछने पड़ेंगे कि जिनमें अनिल बिस्वास नाम के महासागर में छिपा हुआ सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, विद्वान, काव्यरसिक तथा संगीत-गुरु लोगों को नज़र आ सके।

सुजॊय - वाह!

तुषार जी - आर. सी. बोराल साहब से लेकर आर. डी. बर्मन तक उन्होंने एक लिस्ट बनाई थी जिन पर वो बोलना चाहते थे; लेकिन गीतो के चयन की ज़िम्मेदारी उन्होंने मेरे सर पे डाल दी। और उसी शाम को हम बैठ कर गानें सीलेक्ट किए। ये तो थे पहले के १३ एपिसोड्स जो दूसरे संगीतकारों के बारे में थे। ये तो तैयार हो गए। उसी दिन मैंने सोच लिया था कि आर. सी. बोराल, पंकज मल्लिक, कमल दासगुप्ता, खेमचंद प्रकाश और नौशाद पे पूरा पूरा एपिसोड होगा, बाक़ी सब के दो दो कम्बाइन करेंगे, और कम्बिनेशन भी ठीक ठीक बन रहे थे। ये तो थी दूसरों की बातें, मैं तो सोचने लगा कि अब दादा का संगीत कैसे पेश किया जाए! ये सोचते रात बीत गई कि सीरीज़ का स्ट्रक्चर कैसा रखूँ!यह एक बहुत बड़ी चैलेंज थी। आप शायद यकीन नहीं करेंगे कि कुछ भी प्री-प्लैन्ड नहीं था, सबकुछ बिलकुल स्पॊण्टेनियसली हुआ। अलग अलग विषयों पर उनसे सवाल पूछा; संगीत के अलग अलग प्रकार, शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, जिनके माध्यम से दादा की सोच को बाहर निकालने की कोशिश करता रहा। हर विधा की चर्चा के बाद उसी विधा में दादा का बनाया हुआ गीत पेश करता था। कुछ बातें ज़रूर रह गईं जैसे कि बंदिश की ठुमरी के बारे में चर्चा। मैंने छाया जी से यह कहा भी था कि दादा से पूरी बातचीत रेकॊर्ड कर लेते हैं क्योंकि ऐसा मौक़ा बार बार नहीं आयेगा, बाद में एडिटिंग में बैठेंगे तो सबकुछ देखा जाएगा। और छाया जी भी इसी मत से सहमत थीं।

सुजॊय - अच्छा तुषार जी, कितने दिनों में रेकॊडिंग् पूरी हुई थी?

तुषार जी - बस दो ही दिनों में, एक दिन चार घण्टे और एक दिन ६-७ घण्टे। लेकिन पूरी एडिटिंग् में ४ महीने लग गये। कई जगहों पर बाद में मैंने डब भी किया, जैसे कि सॊंग् डिटैल्स, और कुछ कुछ चीज़ें जो इंटरव्यु के दौरान बतानी रह गयी थी। संगीत और साहित्य विषयक चरचाएँ काफ़ी हमें काट देनी पड़ी क्योंकि समय की पाबंदी थी। रेकॊर्डिंग् के दौरान दादा में इतना जोश था कि वो रुकते ही नहीं थे, हमने बस एक आध ब्रेक ही लिया चाय पीने के लिए। इस इंटरव्यू में मैंने पन्ना बाबू वाले प्रोग्राम जैसी भाषा का इस्तमाल नहीं किया जो पढ़के बोलना था। इसमें तो कुछ भी तय नहीं था। और दादा ने मुझसे कुछ भी नहीं पूछा कि तुम क्या क्या पूछोगे। दादा इंटरव्यु के दौरान ख़ुद तो गाते ही थे, मुझे भी गाने को कहते थे।

चित्र-३: विविध भारती के स्टुडियो में 'रसिकेशु' की रेकॊर्डिंग् करते हुए अनिल बिस्वास, मीना कपूर और तुषार भाटिया (सौजन्य: तुषार भाटिया)

सुजॊय - अच्छा एक बात बताइए तुषार जी, यह जो शीर्षक है 'रसिकेशु', क्या यह छाया जी या आप का सोचा हुआ था?

तुषार जी - बिल्कुल नहीं, यह शीर्षक भी दादा का ही दिया हुआ था, जिसका अर्थ भी उन्होंने बताया था; 'रसिकेशु' यानी रसिकों को समर्पित।

सुजॊय - वाह, क्या बात है! अच्छा, इस शृंखला में कुछ एपिसोड्स के बाद से मीना कपूर जी को भी शामिल किया गया था। यह किस तरह से हुआ? क्या यह प्री-प्लैन्ड था या यह भी अकस्मात? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन दो दिनों में रेकॊर्डिंग् हुई थी, उनमें दूसरे दिन मीना जी भी साथ आईं होंगी?

तुषार जी - नहीं, मीना दी हमेशा दादा के साथ ही रहती थीं और दोनों दिन वो भी स्टुडियो में तशरीफ़ लायी थीं। मीना दी बहुत ही इंट्रोवर्ट हैं, शाइ हैं। हम लोगों ने उनसे निवेदन किया कि आप भी बातचीत में शामिल हो जाइए। आपने देखा होगा कि उनके इस बातचीत में शामिल हो जाने से पूरी शृंखला में एक अलग रंग आ गया।

सुजॊय - जी हाँ!

तुषार जी - दीदी के आने से ऐसी बहुत सारी बातें थीं जो मैं ईज़ीली कर सकता था क्योंकि दादा और दीदी, दोनों ही गा गा के, जो भी विषय होता था, उदाहरण देते थे। दोनों के कुशाग्रता की जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है। किसी भी विषय पर उनसे दिलचस्प चर्चा हो सकती थी। और हर विषय में उनके पास उदाहरण देने के लिए गानें मौजूद होते थे। दादा के साथ इतने वर्षों की जो औपचारिकता थी, उन्होंने ख़त्म कर दी। इस शृंखला के ज़रिए मैं उनके और भी बहुत करीब आ गया। इस तरह से 'रसिकेशु' पूरी हुई और जब इसका ब्रॊडकास्ट शुरु होने ही वाला था, उसके पिछले दिन मेरा बहुत बड़ा ऒपरेशन था। और दूसरे दिन से मैं रोज़ सुबह अस्पताल में पड़े पड़े 'रसिकेशु' सुना करता था।

सुजॊय - इस शृंखला के प्रसारण को अनिल दा और मीना दी ने भी रेडियो पर सुना होगा। क्या उन्होंने अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की?

तुषार जी - मुझे उनका लिखा हुआ एक लेटर आया, जिसमें लिखा हुआ था - "MY DEAR PAGLA, YOUR DIDI SAYS THAT THE EDITING IS PERFECT."

सुजॊय - वाह! मीना जी के नाम से उन्होंने ही आपकी तारीफ़ की।

तुषार जी - जी हाँ, यही तो उनकी खासियत थी जो दूसरों में मैंने नहीं देखा। और जब 'रसिकेशु' ब्रॊडकास्ट हुई, तब मुझे भी और रेडियो स्टेशन को भी बहुत सारे लेटर्स आये दुनिया भर से, अमेरिका से, कनाडा से, कई लोगों ने लिखा कि उन्होंने इसे रेकॊर्ड कर अपने पास रखा हुआ है। मुझे इस बात की ख़ुशी हुई कि सब जगह अनिल दा की इस शृंखला के चर्चे होने लगे। और इसके बाद दादा टीवी पर भी आना शुरु हो गए। लोगों को उनके बारे में जानकारी हो गई कि वो कहाँ हैं। गजेन्द्र सिंह जी ने मुझसे दादा का फ़ोन नंबर लेकर उन्हें 'सा रे गा मा' में निमंत्रण दिया। इस बात का गर्व है मुझे कि 'रसिकेशु' करने का मौका मिला और मेरे जीवन की एक बहुत ही अविस्मरणीय घटना है। इसके लिए मैं छाया गांगुली जी को और विविध भारती को जितना धन्यवाद दूँ, कम है। लोगों को यह शृंखला पसंद आई और हर साल यह ब्रॊडकास्ट होती चली आ रही है पिछले १३ सालों से, और यह हमारी सफलता का ही चिन्ह है, इसका मुझे आनंद है।

सुजॊय - तुषार जी, आपका मैं किन शब्दों में शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा है; जिस विस्तार से और प्यार से आपने अनिल दा के बारे में हमें बताया, 'रसिकेशु' के बारे में बताया, हमें यकीन है कि हमारे पाठकों को यह बातचीत बहुत पसंद आई होगी। वैसे आप से अभी और भी बहुत सारी बातें करनी है, राय बाबू के बारे में, पंकज बाबू के बारे में, नौशाद साहब के बारे में, नय्यर साहब के बारे में, रोशन साहब, सलिल दा, इन सभी के बारे में, और आपकी फ़िल्म 'अंदाज़ अपना अपना' के बारे में भी। हम फिर किसी दिन आपसे एक और लम्बी बातचीत करेंगे। एक बार फिर आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

तुषार जी - बहुत बहुत धन्यवाद!

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तो दोस्तों, यह था इस सप्ताह का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष', अगले सप्ताह फिर किसी ख़ास प्रस्तुति के साथ हम वापस आयेंगे। और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी में फिर आपसे मुलाक़ात होगी कल शाम ६:३० बजे, जिसमें एक नई लघु शृंखला का आग़ाज़ होगा गुज़रे ज़माने की एक बेहद मशहूर सिंगिंग् स्टार को स्मार्पित। आज की इस प्रस्तुति के बारे में आप अपनी राय हमें नीचे टिप्पणी में या ईमेल के द्वारा oig@hindyugm.com के पते पर ज़रूर लिख भेजिएगा, हमें इंतज़ार रहेगा। तो अब आज के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!

नोट- अंतिम चित्र में तुषार जी अनिल दा और मीना जी के साथ रसिकेशु की रिकॉर्डिंग करते हुए दिख रहे हैं

Tuesday, November 9, 2010

दूर पपीहा बोला रात आधी रह गई...सुर्रैया की आवाज़ और कवि गीतकार गोपाल सिंह नेपाली के शब्द

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 523/2010/223

पंडित नरेन्द्र शर्मा और वीरेन्द्र मिश्र के बाद 'दिल की कलम से' शृंखला की तीसरी कड़ी में आज जिस हिंदी साहित्यकार व कवि की चर्चा हम करने जा रहे हैं वो प्रकृति के चितेरे तो थे ही, देश भक्ति का जज्बा भी उनमें कूट कूट कर समाया हुआ था। जी हाँ, हम आज बात कर रहे हैं गोपाल सिंह नेपाली की, जिन्हें हम गीतकार जी. एस. नेपाली के नाम से भी जानते हैं। उनका जन्म बिहार के चम्पारन ज़िले में बेदिया नामक स्थान पर ११ अगस्त १९११ को हुआ था। बालावस्था से ही वे घण्टों एकान्त में बैठकर प्रकृति की सुषमा का आनंद लेते और बाद में इसी प्रकृति से जुड़े कविताएँ लिखने लगे। १९३१ में कलकत्ता में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में शामिल होने को वे प्रेरीत हुए, जहाँ पे जाकर साहित्य के कई महान विभुतियों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। १९३२ में काशी में आचार्य महावीर प्रसाद द्वारा आयोजित एक बहुत बड़े कवि सम्मेलन में कुल ११५ कवि शामिल हुए जिनमें से केवल १५ कवियों को कविता पाठ करने का मौका मिला। और इनमें से एक गोपाल सिंह नेपाली भी थे। उस सम्मेलन में उनकी लिखी कविताओं के रंग ख़ूब जमे। सुधा पत्रिका के सम्पादक दुरारेलाल जी ने उन्हें लखनऊ आकर उनकी पत्रिका में काम करने का निमंत्रण दिया जहाँ पर वे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के सहायक बनें। १९३४ में वे दिल्ली चले गए और एक सिने पत्रिका 'चित्रपट' में संयुक्त सम्पादक की नौकरी कर ली। फिर दो साल तक वे रतलाम में 'रतलाम टाइम्स' से जुड़े रहे। १९३९ में वे पटना चले गए। १९४४ का साल गोपाल सिंह नेपाली के जीवन का एक महत्वपूर्ण साल था जब पी. एल. संतोषी, पटेल और रामानन्द ने उन्हें आमन्त्रित किया उनकी फ़िल्मों में गीत लिखने के लिए। और इस तरह से जी. एस. नेपाली के नाम से उनका पदार्पण हुआ फ़िल्म जगत में।

जी. एस. नेपाली एक तरफ़ जहाँ कोमल भावनाओं वाली, प्रकृति प्रेम से ओत-प्रोत कविताएँ लिखते रहे, वहीं दूसरी तरफ़ देश भक्ति की झंझनाती रचनाएँ भी क्या ख़ूब लिखे। उनकी लिखी हुई 'दिल्ली चलो' कविता पर फ़िल्मिस्तान ने 'समाधि' नामक फ़िल्म का निर्माण भी किया। लेकिन आज हम जो गीत चुन लाए हैं वह है एक बड़ा ही कोमल प्रेम गीत, जिसमें एक अंग दर्द का भी छुपा हुआ है। फ़िल्म 'गजरे' का गीत "दूर पपीहा बोला रात आधी रह गई, मेरी तुम्हारी मुलाक़ात बाक़ी रह गई"। सुरैय्या की आवाज़ और अनिल बिस्वास का संगीत। साल १९४८ में अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में कुल तीन फ़िल्में आई थीं - अनोखा प्यार, गजरे, और वीणा, जिनमें से पहले दो फ़िल्मों के गानें ख़ासा लोकप्रिय हुए थे। 'गजरे' के मुख्य भूमिकाओं में थे सुरैय्या और मोतीलाल। १९४६ में फ़िल्मिस्तान के 'सफ़र' में सफल गीत लिखने के बाद नेपाली जी ने 'गजरे' के गीतों को भी महकाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि बिना उर्दू शब्दों के इस्तेमाल किए शुद्ध हिंदी में भी लोकप्रिय गीत लिखे जा सकते हैं। अनिल दा हमेशा इस बात का ख़याल रखते थे कि जिस तरह के शब्द गीत में हों, उसी तरह से एक्स्प्रेशन भी आने चाहिए। तभी तो इस गीत के पहले शब्द "दूर" को लम्बा खींच कर सुरैय्या से गवाया ताकि वाक़ई यह लगे कि दूर कहीं से पपीहा बोल रहा है। इसी फ़िल्म में कुछ और सुरैय्या के गाए एकल गीत थे जैसे कि "रह रह के तेरा ध्यान रुलाता है क्या करूँ, हर दिल में मुझको तू नज़र आता है क्या करूँ" और "जलने के सिवा और क्या है यहाँ, चाहे दिल हो किसी का या हो दीया"। लेकिन लोकप्रियता के पयमाने पर आज का प्रस्तुत गीत ही सर्वोपरी रहा। तो आइए अब इस सुमधुर गीत का आनंद लेते हैं सुरैय्या की सुरीली आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि नेपाल के राणा के साथ मिलकर गोपाल सिंह नेपाली ने 'हिमालय फ़िल्म्स' की स्थापना की और इस बैनर तले तीन फ़िल्मों का निर्माण किया - 'नज़राना', 'संस्कारी', और 'ख़ुशबू'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०४ /शृंखला ०३
ये है गीत का आरंभिक शेर -


अतिरिक्त सूत्र - आवाज़ है मन्ना दा की.

सवाल १ - किस कवि का जिक्र होगा कल - २ अंक
सवाल २ - इस सफल फिल्म के संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी बढ़त ले चुके हैं मगर अमित जी और शरद जी भी पीछे नहीं हैं. बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, September 21, 2010

कहाँ तक हम उठाएँ ग़म....जब दर्द को नयी सदा दी लता जी ने अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 488/2010/188

गुज़रे ज़माने के अनमोल नग़मों के शैदाईयों और क़द्रदानों, इन दिनों आपकी ख़िदमत में हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पेश कर रहे हैं लता मंगेशकर के गाए कुछ बेहद दुर्लभ गीतों पर आधारित लघु शृंखला 'लता के दुर्लभ दस'। अब तक आपने इस शृंखला में जितने भी गानें सुनें, उनकी फ़िल्में भी कमचर्चित रही, यानी कि बॊक्स ऒफ़िस पर असफल। लेकिन आज हम जिस फ़िल्म का गीत सुनने जा रहे हैं, वह एक मशहूर फ़िल्म है और इसके कुछ गानें तो बहुत लोकप्रिय भी हुए थे। १९५० की यह फ़िल्म थी 'आरज़ू'। जी हाँ, वही 'आरज़ू' जिसमें तलत महमूद साहब ने पहली पहली बार "ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल" गीत गा कर एक धमाकेदार पदार्पण किया था हिंदी फ़िल्म संगीत संसार में। लेखिका इस्मत चुगताई के पति शाहीद लतीफ़ ने इस फ़िल्म का निर्माण किया था जिसमें मुख्य भूमिकाओं में थे दिलीप कुमार और कामिनी कौशल। इस जोड़ी की यह अंतिम फ़िल्म थी। इस जोड़ी ने ४० के दशक में 'शहीद' और 'नदिया के पार' जैसी फ़िल्मों में कामयाब अभिनय किया था। 'आरज़ू' में संगीत अनिल बिस्वास का था, जिन्होंने इस फ़िल्म में ना केवल तलत महमूद को लौंच किया, बल्कि गायिका सुधा मल्होत्रा से भी उनका पहला पहला फ़िल्मी गीत गवाया था जिसके बोल थे "मिला गए नैन"। इस फ़िल्म में अनिल दा ने अपनी दूसरी फ़िल्मों की तरह ही लता मंगेशकर से बहुत से एकल गीत गवाए। इनमें शामिल हैं लोक धुनों पर आधारित "आई बहार जिया डोले मोरा जिया डोले रे" और "मेरा नरम करेजवा डोल गया"; इन हल्के फुल्के गीतों के अलावा कुछ संजीदे गानें भी थे जैसे "उन्हें हम तो दिल से भुलाने लगे, वो कुछ और भी याद आने लगे", "जाना ना दिल से दूर आँखों से दूर जाके" और "कहाँ तक हम उठाएँ ग़म, जिए अब या कि मर जाएँ"। इनमें से आज के लिए हमने चुना है "कहाँ तक हम उठाएँ ग़म"। क्या दर्द-ए-मौसिक़ी है, क्या अदायगी है, क्या पुर-असर बोल हैं! इस गीत की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है। अब तक जितने भी गीत हमने सुनवाए हैं, हो सकता है कि उन्हें आपने पहले कभी नहीं सुना हो, लेकिन कम से कम इस गीत को तो आप में से बहुतों ने सुना होगा। हाँ, यह बात ज़रूर है कि आज यह गीत कहीं से सुनाई नहीं देता।

प्रेम धवन और मजरूह सुल्तानपुरी ने इस फ़िल्म के गानें लिखे थे, प्रस्तुत गीत मजरूह साहब का लिखा हुआ है। मजरूह साहब की यह तीसरी फ़िल्म थी। इस गीत की चर्चा में यह याद दिलाना ज़रूरी है कि साल १९४९ में, यानी इस 'आरज़ू' के ठीक एक साल पहले एक फ़िल्म 'अंदाज़' आई थी, उसमें लता जी के गाए कई गानें मशहूर हुए थे, और उनमें एक गीत था "उठाए जा उनके सितम और जिये जा"। और 'आरज़ू' के इस गीत में भी ग़म उठाने की ही बात की गई है। और इन दोनों गीतों के गीतकार मजरूह साहब ही थे। इसका मतलब यह है कि "उठाए जा उनके सितम" की अपार कामयाबी की वजह से ही हो सकता है कि फ़िल्म के निर्माता ने कुछ इसी तरह के एक और गीत की माँग की होगी मजरूह साहब और अनिल दा से। क्योंकि आज का गीत मजरूह साहब ने १९५० के आसपास लिखा होगा, इसलिए यहाँ पर हम आपको उनके विविध भारती पर कहे हुए वो बातें पेश कर रहे हैं जिसका नाता १९४५ से १९५२ के समय से है। आप ख़ुद ही पढ़िए मजरूह साहब के शब्दों में। "१९४५ से १९५२ के दरमियाँ की बात है। उस समय मैंने तरक्की पसंद अशार की शुरुआत की थी। मेरे उम्र के जानकार लोगों को यह मालूम होगा कि आज ऐसे अशार जो किसी और के नाम से लोग जानते हैं, वो तरक्की पसंद शायरी मैंने ही शुरुआत की थी। मैं एक बार अमेरिका और कनाडा गया था। वहाँ के कई युनिवर्सिटीज़ में मैं गया, मुझे इस बात की हैरानी हुई कि वहाँ के शायरी पसंद लोगों को मेरे अशार तो याद हैं, पर कोई फ़ैज़ के नाम से, तो कोई फ़रहाद के नाम से, मजरूह के नाम से नहीं।" तो लीजिए दोस्तों, सुनिए लता जी की आवाज़ में यह दर्द भरा गीत और महसूस कीजिए उनकी आवाज़ की मिठास को। वैसे भी दर्दीले गीत ज़्यादा मीठे लगते हैं!



क्या आप जानते हैं...
कि मजरूह सुल्तानपुरी को सन १९९४ में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. फ़िल्म के नाम में दो शब्द हैं जिनमें से एक शब्द एक राग का नाम भी है और दूसरा शब्द एक मशहूर पार्श्व गायक का नाम। तो इन दोनों शब्दों को जोड़िए और बताइए फ़िल्म का नाम। ३ अंक।
२. यह एक कृष्ण भजन है। गीतकार बताएँ। ३ अंक।
३. संगीतकार वो हैं जिनके संगीत में एक गीत अभी हाल ही में आपने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुना है 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला के अंतर्गत। कौन हैं ये संगीतकार? २ अंक।
४. गीत के मुखड़े का पहला शब्द है "श्याम"। फ़िल्म की नायिका का नाम बताएँ। २ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -


खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, September 14, 2010

कुछ शर्माते हुए और कुछ सहम सहम....सुनिए लता की आवाज़ में ये मासूमियत से भरी अभिव्यक्ति

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 483/2010/183

'लता के दुर्लभ दस' शृंखला की तीसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। १९४८ की दो फ़िल्मों - 'हीर रांझा' और 'मेरी कहानी' - के गानें सुनने के बाद आइए अब हम क़दम रखते हैं १९४९ के साल में। १९४९ का साल भी क्या साल था साहब! 'अंदाज़', 'बड़ी बहन', 'बरसात', 'बाज़ार', 'एक थी लड़की', 'दुलारी', 'लाहोर', 'महल', 'पतंगा', और 'सिपहिया' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर लता मंगेशकर यकायक फ़िल्म संगीत के आकाश का एक चमकता हुआ सितारा बन गईं। इन नामचीन फ़िल्मों की चमक धमक के पीछे कुछ ऐसी फ़िल्में भी बनीं इस साल जिसमें भी लता जी ने गीत गाए, लेकिन अफ़सोस कि उन फ़िल्मों के गानें ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुए और वो आज भूले बिसरे और दुर्लभ गीतों में शुमार होता है। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 'गर्ल्स स्कूल'। लोकमान्य प्रिडक्शन्स के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के निर्देशक थे अमीय चक्रबर्ती। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सोहन, गीता बाली, शशिकला, मंगला, सज्जन, राम सिंह और वशिष्ठ प्रमुख। फ़िल्म का संगीत तैयार किया अनिल बिस्वास और सी. रामचन्द्र ने मिल कर। गीत लिखे कवि प्रदीप ने। १९४९ में अनिल दा ने लता से सुरैया और देव आनंद अभिनीत फ़िल्म 'जीत' में गीत गवाए जिसमें मुरकियों भरा "हँस ले गा ले ओ चाँद" बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस फ़िल्म में भी अनिल दा अकेले नहीं थे, उनके साथ श्यामबाबू पाठक का भी संगीत था। 'गर्ल्स स्कूल' में सी. रामचन्द्र के चुलबुले और थिरकन भरे गीतों के बीच भी अनिल बिस्वास के "कमसिन प्यार भरे" अंदाज़ में स्वरबद्ध और लता का ही गाया हुआ "कुछ शर्माते हुए और कुछ सहम सहम, नए रास्ते पे हमने रखा है क़दम" अपना अलग मुक़ाम रखता है। यह गीत भी लोकप्रिय हुआ था उस ज़माने में। लेकिन आज इस गीत को लोग बिलकुल ही भुला बैठे हैं। पहले प्यार की अनुभूति पर असंख्य गीत बनें हैं, लेकिन इस जौनर में इस दुर्लभ गीत को सुनने का आनंद ही कुछ और है।

३० और ४० के दशकों में बहुत सारे गायक गायिकाएँ फ़िल्म जगत में काम कर रहे थे। सब की आवाज़ें एक साथ गूंजा करती थीं। लेकिन ५० के दशक के आते आते एक ज़माना ऐसा भी आया कि जब बस गिनती भर की आवाज़ें ही राज करने लगीं इंडस्ट्री पर। मशहूर रेडियो ब्रॊडकास्टर अमीन सायानी साहब ने जब इसी बात का ज़िक्र अनिल बिस्वास से उनके किसी भेंट के दौरान किया, तो पता है अनिल दा ने लता जी का उदाहरण देते हुए क्या कहा था? "किसी से मैंने पूछा था 'क्या बात है तुम लोगों को, देखो मैं सुनता हूँ टीवी के उपर, बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ें आ रही हैं आजकल, दो तीन आवाज़ें मुझे बहुत पसंद आई'। मैंने कहा कि क्या वजह है कि लोगों को चान्स नहीं देते हो? कहते हैं 'समय किसके पास है साहब! वो तो लता दीदी आती हैं और रिहर्सल विहर्सल कुछ नहीं करतीं हैं और गाना वहीं सुन लेती हैं और रेकॊर्ड हो जाता है, सबकुछ ठीक हो जाता है।' तो रिहर्सल देने के लिए इन लोगों (नए ज़माने के संगीतकारों) के पास समय नहीं है। और हमारे साथ तो ऐसी बात हुई थी कि लता दीदी ने ही, उनके पास भी समय हुआ करता था रिहर्सल देने के लिए और एक गाना शायद आपको याद होगा फ़िल्म 'हमदर्द' का, "ॠतु आए ऋतु जाए", १५ दिन बैठके लता दीदी और मन्ना दादा ने उसको प्रैक्टिस किया था।" दोस्तों, जिस तरह से मुकेश की आवाज़ से सहगल साहब के असर को हटाने का श्रेय अनिल दा को जाता है, इसी श्रेय के वो एक बार फिर से हक़दार बनें जब उन्होंने लता की आवाज़ से नूरजहाँ के अंदाज़ को बाहर किया। लता जी के शुरुआती करीयर में कई महत्वपूर्ण सुझावों और पार्श्व गायन की बारिकियों को सिखाने में अनिल दा का बहुत बड़ा हाथ था। यह बात और है कि जब लता जी ने सन् १९६७ में अपनी पसंदीदा १० गानों की फ़ेहरिस्त जारी की, तो उसमें अनिल दा का कोई भी गीत शामिल नहीं हुआ। ख़ैर, अब इन सब बातों का क्या फ़ायदा। फ़ायदा तो है बस इन सुरीले गीतों को सुनने का जो बने हैं लता जी और अनिल दा के संगम से। सुनते हैं प्यार की दुनिया में पहले क़दम की दास्तान लता जी की कमसिन आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि 'गर्ल्स स्कूल' के लिए ही अनिल बिस्वास ने पहली बार लता को रेकॊर्ड किया था - "तुम्हीं कहो मेरा मन क्यों रहे उदास" के लिए - भले ही यह फ़िल्म 'अनोखा प्यार', 'गजरे' आदि के बाद रिलीज़ हुई हो।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. फ़िल्म के शीर्षक में दो शब्द है जिसमें दूसरा शब्द वह है जो शीर्षक है उस फ़िल्म का जिसके एक गीत में टाइ लगाने की बात की गई है। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।
२. फ़िल्म के संगीतकार हैं फ़िल्म जगत की पहली लोकप्रिय संगीतकार जोड़ी। बताइए इस संगीतकार जोड़ी का नाम। २ अंक।
३. अगर संगीतकार का नाम आप समझ गए हों तो गीतकार के नाम का अंदाज़ा लगाना भी कोई मुश्किल काम नहीं क्योंकि उस दौर में इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी साथ साथ बहुत सारी फ़िल्मों में काम किया था। बताइए गीतकार का नाम। २ अंक।
४. गीत का एक अंतरा शुरु होता है इन शब्दों से - "तू फ़ाइल लेके चला"। मुखड़ा बताएँ। ३ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी और पवन जी बहुत सही....इतना दुर्लभ गीत आपने पहचान लिया, बहुत बढ़िया, किश जी, आपकी पड़ोसन की अब कोई खैर खबर है या नहीं...? प्रतिभा जी आपको भी बधाई...अवध जी अगली बार सही

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, July 19, 2010

जीवन है मधुबन....इस गीत की प्रेरणा है मशहूर के सरा सरा गीत की धुन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 442/2010/142

अंग्रेज़ी में एक कहावत है - "1% inspiration and 99% perspiration makes a man successful". अर्थात् परिश्रम के मुक़ाबले प्रेरणा को बहुत कम महत्व दिया गया है। यह कहावत दूसरे क्षेत्रों में भले ही कारगर साबित हो, लेकिन जहाँ तक फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में ज़्यादातर ऐसा देखा गया है कि विदेशी धुनों से प्रेरीत गीत जल्दी ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं, यानी कामयाब हो जाते हैं। इन गीतों में उपर्युक्त कहावत की सार्थकता दूर दूर तक नज़र नहीं आता। लेकिन हमारे फ़िल्म जगत में कुछ बहुत ही गुणी संगीतकार भी हुए हैं, जिन्होने अपने संगीत सफ़र में विदेशी धुनों का ना के बराबर सहारा लिया और अगर एक आध गीतों में लिया भी है तो उनमें उन्होने अपना भी भरपूर योगदान दिया और उसका पूरी तरह से भारतीयकरण कर दिया, जिससे कि गीत बिलकुल देसी बन गया। ऐसे ही एक बेहद प्रतिभावान संगीतकार रहे अनिल बिस्वास, जिन्हे फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के संगीतकारों का भीष्म पितामह भी कहा जाता है। युं तो अनिल दा के गानें मुख्य रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत और देश के विभिन्न प्रांतों के लोक संगीत पर आधारित रहा है, लेकिन कम से कम एक गीत उनका ऐसा ज़रूर है जिसमें उन्होने भी एक विदेशी मूल धुन का सहारा लिया। आज 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला में अनिल दा के उसी गीत की बारी। यह गीत है फ़िल्म 'जासूस' का, जिसके बोल हैं "जीवन है मधुबन, तू इसमें फूल खिला, कांटों से ना भर दामन, अब मान भी जा"। तलत महमूद की मख़मली आवाज़ और गीतकार हैं इंदीवर। और जिस विदेशी धुन से यह गीत प्रेरीत है वह है डॊरिस डे का मशहूर गीत "के सरा सरा सरा सरा व्हाटेवर विल बी विल बी (que sera sera sera sera whatever will be will be)"| अमीन सायानी साहब ने एक बार इस गीत के बारे में यह कहा था कि अनिल बिस्वास ने अपनी एक धुन एक वेस्टर्ण हिट गीत की धुन के आधार पर ज़रूर बनाई थी फ़िल्मी दुनिया को यह बताने के लिए कि किसी और धुन से प्रेरणा पाना चाहो तो भई पाओ मगर सीधी कॊपी ना करो, जैसे कि आज खुले-आम हो रहा है। फ़िल्म 'जासूस' सन् १९५७ की एक कम बजट की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे कामरान, नीरू और कुमकुम, और फ़िल्म के निर्देशक थे आर. डी. राजपूत।

आइए आपको "के सरा सरा" गीत के बारे में कुछ बताया जाए। यह गीत पहली बार पब्लिश हुआ था सन् १९५६ में जिसे लिखा था जे लिविंग्स्टन और रे ईवान्स की टीम ने। इस गीत को पहली बार इस्तेमाल किया गया था १९५६ की ही ऐल्फ़्रेड हिचकॊक की फ़िल्म 'दि मैन हू न्यु टू मच' में जिसके मुख्य कलाकार थे डॊरिस डे और जेम्स स्टीवार्ट। डॊरिस ने यह गीत गाया था जिसे कोलम्बिआ रेकार्ड्स ने जारी किया था। यह गीत बेहद मक़बूल हुआ, अमेरिका में भी और इंगलैण्ड में भी। इस गीत को १९५६ में सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का 'अकाडेमी अवार्ड', यानी कि ऒस्कर मिला था। इस धुन का इस्तेमाल १९६८ से लेकर १९७३ तक डॊरिस डे की कॊमेडी शो 'दि डॊरिस डे शो' के थीम सॊंग् के रूप में किया गया था। लिविंग्स्टन और ईवान्स का यह तीसरा ऒस्कर था, इससे पहले इन्होने १९४८ और १९५० में यह पुरस्कार जीता था। इस फ्रेज़ "के सरा सरा" की मूल भाषा को लेकर थोड़ा सा संशय है। वैसे तो ये स्पैनिश बोल हैं, लेकिन व्याकरण के लिहाज से स्पैनिश नहीं हो सकते। कहते हैं कि लिविंग्स्टन ने १९५४ की फ़िल्म 'दि बेयरफ़ूट कण्टेसा' देखी, जिसमें एक इटालियन परिवार का मोटो होता है "Che sarà sarà" जो एक पत्थर पर खुदाई किया रहता है उनकी पुरानी पूर्वजों की हवेली में। तभी लिविंग्स्टन ने यह फ़्रेज़ नोट कर लिया था और फिर स्पैनिश के अक्षरों में इसे परिवर्तित कर दिया। तो दोस्तों, ये तो थी "के सरा सरा" के बारे में जानकारी। आपको फ़िल्म 'पुकार' में माधुरी दीक्षित और प्रभुदेवा पर फ़िल्माया गीत भी याद आ ही गया होगा अब तक! उस गीत में और अनिल दा के इस गीत में ज़मीन आसमान का अंतर है। लीजिए आप ख़ुद ही सुनिए और महसूस कीजिए।



क्या आप जानते हैं...
कि अभी हाल ही में, साल २००९ में, एक थाई लाइफ़ इन्श्योरैंस कंपनी ने अपने विज्ञापन में "के सरा सरा" के मूल गीत का इस्तेमाल किया था जिसे कुछ विकलांग बच्चों द्वारा गाते हुए दिखाया गया था उस विज्ञापन में।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. खुद गायिका के भाई हैं इस "प्रेरित" गीत के संगीतकार, नाम बताएं- ३ अंक.
२. प्रदीप कुमार और माला सिन्हा अभिनीत इस फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
३. हैरी बेलाफ़ोण्ट के "जमाइकन फ़ेयरवेल" पर आधारित ये गीत किसने लिखा है - २ अंक.
४. कौन है गायिका इस दर्द भरे गीत की - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
हा हा हा ...सच बहुत दिनों बाद इतना मज़ा आया, हाँ गाना वाकई बहुत मुश्किल था, उज्जवल जी को सही गायक पहचानने के लिए हम १ अंक अवश्य देंगें, खैर दिग्गजों को आज की पहेली के लिए शुभकामनाएं :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, February 13, 2010

मेरा बुलबुल सो रहा है शोर तू न मचा...कवि प्रदीप और अनिल दा का रचा एक अनमोल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 344/2010/44

१९४३। इस वर्ष ने ३ प्रमुख फ़िल्में देखी - क़िस्मत, तानसेन, और शकुंतला। 'तानसेन' रणजीत मूवीटोन की फ़िल्म थी जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने सहगल और ख़ुर्शीद से कुछ ऐसे गानें गवाए कि फ़िल्म तो सुपर डुपर हिट साबित हुआ ही, खेमचंद जी और सहगल साहब के करीयर का एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित हुआ। प्रभात से निकल कर और अपनी निजी बैनर 'राजकमल कलामंदिर' की स्थापना कर वी. शांताराम ने इस साल बनाई फ़िल्म 'शकुंतला', जिसके गीत संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाया। संगीतकार वसंत देसाई की इसी फ़िल्म से सही अर्थ में करीयर शुरु हुआ था। और १९४३ में बॊम्बे टॊकीज़ की सफलतम फ़िल्म आई 'क़िस्मत'। 'क़िस्मत' को लिखा व निर्देशित किया था ज्ञान मुखर्जी ने। हिमांशु राय की मृत्यु के बाद बॊम्बे टॊकीज़ में राजनीति चल पड़ी थी। देवीका रानी और शशधर मुखर्जी के बीच चल रही उत्तराधिकार की लड़ाई के बीच ही यह फ़िल्म बनी। अशोक कुमार और मुम्ताज़ शांति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए। देश भर में कई कई जुबिलीज़ मनाने के अलावा यह फ़िल्म कलकत्ता के 'चित्र प्लाज़ा' थिएटर में लगातार १९६ हफ़्तों (३ साल) तक प्रदर्शित होती रही। इस रिकार्ड को तोड़ा था रमेश सिप्पी की फ़िल्म 'शोले' ने। 'क़िस्मत' एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म रही क्योंकि इस फ़िल्म में बचपन में बिछड़ने और अंत में फिर मिल जाने की कहानी थी। संगीत की दृष्टि से 'क़िस्मत' अनिल बिस्वास की बॊम्बे टॊकीज़ में सब से उल्लेखनीय फ़िल्म रही। धीरे धीरे पार्श्वगायन की तकनीक को संगीतकार अपनाने लगे थे, और अच्छे गायक गायिकाएँ इस क्षेत्र में क़दम रख रहे थे। ऐसे में संगीतकार भी गीतों में नए प्रयोग ला रहे थे। इस फ़िल्म के तमाम गीत गली गली गूंजने लगे थे। ख़ास कर कवि प्रदीप के लिखे "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने तो जैसे पराधीन भारत के लोगों के रग रग में वतन परस्ती के जस्बे का संचार कर दिया था। इसी फ़िल्म में एक नर्मो नाज़ुक लोरी भी थी जिसे शायद आज भी फ़िल्म संगीत के सर्वश्रेष्ठ लोरियों में गिना जाता है! "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल ना मचा"। कवि प्रदीप की गीत रचना, अनिल दा का संगीत। इसी गीत को हमने चुना है १९४३ का प्रतिनिधित्व करने के लिए।

फ़िल्म 'क़िस्मत' के गीतों की बात करें तो उन दिनों अमीरबाई कर्नाटकी अनिल दा की पहली पसंद हुआ करती थीं। फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से ६ गीतों में ही अमीरबाई की आवाज़ शामिल थी। उपर ज़िक्र किए गए दो गीतों के अलावा इस फ़िल्म में अमीरबाई ने दो दुख भरे गीत गाए - "ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा", और "अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया"। जहाँ तक आज के प्रस्तुत गीत का सवाल है, इसके दो वर्ज़न है, एक में अमीरबाई के साथ आवाज़ है अशोक कुमार की, और दूसरे में अरुण कुमार की। दरसल अरुण कुमार अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे जो अच्छा भी गाते थे और जिनकी आवाज़ अशोक कुमार से कुछ कुछ मिलती थी। इसलिए बॊम्बे टॊकीज़ के कुछ फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्लेबैक उन्होने किया था। लेकिन इस गीत को दोनों से ही अलग अलग गवाया गया और दोनों वर्ज़न ही उपलब्ध हैं। आज हम आपको इस गीत के दोनों वर्ज़न सुनवाएँगे। कहा जाता है कि अनिल बिस्वास ने मज़ाक मज़ाक में कहा था कि यही एकमात्र ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया था। यह भी कहा जाता है कि अनिल दा अशोक कुमार के गायन से कुछ ज़्यादा संतुष्ट नहीं होते थे, इसलिए वो अरुण कुमार से ही उनके गानें गवाने में विश्वास रखते थे। इस फ़िल्म में अरुण कुमार ने अमीरबाई के साथ एक और युगल गीत गाया था जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी था, "हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाए, ये जो एक दिन हँसाए एक दिन रुलाए"। अरुण कुमार का गाया "तेरे दुख के दिन फिरेंगे ले दुआ मेरी लिए जा" भी एक दार्शनिक गीत है इस फ़िल्म का। अनिल दा की बहन और गायिका पारुल घोष का "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" शास्त्रीय रंग में ढला हुआ इसी फ़िल्म का एक सुरीला नग़मा था। इससे पहले कि आज का गीत आप सुनें, उस दौर का दादामुनि अशोक कुमार ने सन्‍ १९६८ में विविध भारती पर किस तरह से वर्णन किया था, आइए जानें उन्ही के कहे हुए शब्दों में। "दरअसल जब मैं फ़िल्मों में आया था सन् १९३४-३५ के आसपास, उस समय गायक अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होने फ़िल्मी गानों को एक शक्ल दी और मेरा ख़याल है उनकी वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्ही की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानी बॊक्स ऒफ़िस सक्सेस के लिए गानों को सब से ऊंची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक के तकनीक की तैयारियां हो रही थी। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आए नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गानें सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाए जाते थे ताक़ी हम जैसे गानेवाले आसानी से गा सके। मैं अपनी पुरानी फ़िल्मों से कुछ मुखड़े सुना सकता हूँ, (गाते हुए) "मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूँ रे", "चल चल रे नौजवान", "चली रे चली रे मेरी नाव चली रे", "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है...", "पीर पीर क्या करता रे तेरी पीर ना जाने कोई"। ये पहले पहले बॊम्बे टॊकीज़ के गीतों में "रे" का इस्तेमाल बहुत किया जाता था।" तो आइए दोस्तों, अब इस गीत को सुनें, पहले अशोक कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में, और फिर अरुण कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में।



दूसरा संस्करण


चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

देख रही तेरा रस्ता कब से
अब तो आजा बेदर्दी सैयां,
रो रो अखियाँ तरसे संगदिल,
मन से पडूं मैं तेरे पैयां..

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. ये फिल्म इस बेहद कामियाब संगीतकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही, हम किस संगीतकार की बात कर रहे हैं- सही जवाब के होंगें २ अंक.
3. इस गीत की गायिका का नाम बताएं जिसका हाल के सालों में एक रीमिक्स संस्करण भी आया-सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
4. इस गीत के गीतकार उस दौर के सफल गीतकारों में थे उनका नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
पहेली में नए प्रयोगों के चलते खूब मज़ा आ रहा है. रोहित जी अब तक ७ अंकों के साथ आगे चल रहे हैं, शरद जी हैं ५ अंकों पर, इंदु जी नाराज़ हो गयी क्या ? अरे व्यस्तता के चलते आपका स्वागत नहीं कर पाए, वैसे स्वागत तो मेहमानों का होता है न, आप तो ओल्ड इस गोल्ड की सरताज सदस्या ठहरीं. वैसे पहेली के सुझावों के लिए हम शरद जी का धन्येवाद देते हैं. ताज्जब इस बात का है कि सही गीत पता लग जाने के बाद भी कोई अन्य सवालों के जवाब लेकर हाज़िर नहीं हो रहा. शायद इस शृंखला के मुश्किल गीतों के कारण ऐसा हो...अवध जी हमें मेल किया और सभी सवालों के जवाब दे डाले. नियमानुसार एक से अधिक सही जवाब देने पर कोई अंक नहीं दिए जाने हैं, पर अवध जी का जवाब अन्य लोगों तक नहीं पहुंचा और उनका कंप्यूटर खराब होने के करण हो सकता है उन्हें नियमों की सही जानकारी न हो, तो इस पहली गलती को नज़र अंदाज़ कर हम उन्हें २ अंक देते हैं, ताकि उनका भी खाता खुले...सभी विजेताओं को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, February 2, 2010

रसिया रे मन बसिया रे तेरे बिना जिया मोरा लागे ना...एक गीत मीना कपूर को समर्पित

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 333/2010/33

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास लघु शृंखला 'हमारी याद आएगी' की तीसरी कड़ी में आज बातें गायिका मीना कपूर की। जी हाँ, वही मीना कपूर जो एक सुरीली गायिका होने के साथ साथ सुप्रसिद्ध संगीतकार अनिल बिस्वास जी की धर्मपत्नी भी हैं। अनिल दा तो नहीं रहे, मीना जी आजकल दिल्ली में रहती हैं। दोस्तों, आप में से कई पाठक हर मंदिर सिंह 'हमराज़' के नाम से वाकिफ होंगे जिन्होने फ़िल्मी गीत कोश का प्रकाशन किया एक लम्बे समय से शोध कार्य करने के बाद। इस शोध कार्य के दौरान वे फ़िल्म जगत के तमाम कलाकारों से ख़ुद जा कर मिले और तमाम जानकारियाँ बटोरे। उनकी निष्ठा और लगन का ही नतीजा है कि १९३१ से लेकर ८० के दशक तक के सभी फ़िल्मों के सभी गीतों के डिटेल्स उनके बनाए गीत कोश में दर्ज है। तो एक बार वे दिल्ली में अनिल दा के घर भी गए थे। आइए उन्ही की ज़बानी में सुनें उस मुलाक़ात के बारे में जिसमें अनिल दा के साथ साथ मीना जी से भी उनकी भेंट हुई और मीना जी के गाए शुरु शुर के गीतों के बारे में कुछ दुर्लभ बातें पता चली। 'हमराज़' जी 'लिस्नर्स बुलेटिन' पत्रिका के सम्पादक भी हैं और उस मुलाक़ात को उन्होने इस पत्रिका के ६८-वें अंक में सन् १९८७ में प्रकाशित किया था, प्रस्तुत है। "२५ नवंबर १९८६ को दिल्ली में अनिल दा के घर पर उनकी १९३५ से १९४० तक हिंदी फ़िल्मों के गीतों के गयकों की जानकारी प्राप्त करने के लिए जब मेरी बातचीत चल रही थी तो एकाएक गायिका मीना कपूर जी आ गईं। तब उनके गाए गीतों की बात चल पड़ी। मीना जी ने बताया कि सब से पहला गीत उन्होने संगीतकार नीनू मजुमदार के निर्देशन में फ़िल्म 'पुल' में सन् १९४७ में गाया था - "नाथ तुम जानत हो सब गट की"। इसके बाद की २-३ फ़िल्मों के लिए भी नीनू मजुमदार जी ने ही उनसे गीत गवाए थे - जेलयात्रा ('४७), गड़िया ('४७ - "सुंदर सुंदर प्यारे प्यारे", "रात की गोदी में" , "निंदिया देश चलो री"), कुछ नया ('४८) इत्यादि।"

मीना कपूर ने अनिल दा के संगीत निर्देशन में भी बहुत से फ़िल्मों में गानें गाए हैं, लेकिन बहुत बार ऐसा हुआ कि फ़िल्म के पर्दे पर तो उनकी आवाज़ रही, लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड के लिए उन्ही गीतों को लता जी से गवाया गया। और क्योंकि रिकार्ड वाले वर्ज़न ही श्रोताओं को सुनने को मिलता है, इस तरह से मीना जी के गाए तमाम गानों से उनके चाहने वाले वंचित रह गए। १९४८ की एक ऐसी ही फ़िल्म थी 'अनोखा प्यार', जिसमें अनिल दा ने नरगिस के लिए मीना जी की आवाज़ को चुना था। लेकिन बाद में जब रिकर्ड पर लता जी की आवाज़ सुनाई दी तो ऐसा कहा गया कि उस वक़्त मीना जी बीमार थीं जिसकी वजह से लता जी ने रिकार्ड के लिए वो गीत गाएँ। वैसे लता जी ने इस फ़िल्म में नलिनी जयवंत के लिए पार्श्वगायन किया था। मीना जी के गाए हिट गीतों में चितलकर के साथ उनका गाया "आना मेरी जान संडे के संडे" ख़ासा लोकप्रिय हुआ था। ५० के दशक में भी अनिल दा के कुछ फ़िल्मों में उनके गाए गीत ख़ूब पसंद किए गए जैसे कि फ़िल्म 'परदेसी', 'छोटी छोटी बातें', और 'चार दिल चार राहें'। आज के लिए हमने चुना है १९५७ की फ़िल्म 'परदेसी' का एक बड़ा ही दिल को छू लेने वाला गीत, "रसिया रे, मन बसिया रे, तेरे बिना जिया मोरा लागे ना"। यह फ़िल्म पहली इंडो रशियन को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी, जिसका निर्माण रूस में हुआ था। कहानी ख्वाजा अहमद अब्बास व मारिया स्मिर्नोवा की थी, तथा निर्देशन अब्बास साहब और वसिलि प्रोनिन का था। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे डेविड अब्राहम, इया अरेपिना, विताली बेलियाकोव, पी. जयराज, पृथ्वीराज कपूर, श्तीफ़न कायुकोव, मनमोहन कृष्णा, नरगिस, वरवरा ओबुखोवा, पद्मिनी, अचला सचदेव, बलराज साहनी, ओलेग स्ट्रिज़ेनोव प्रमुख। उस साल के फ़िमफ़ेयर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए एम. आर. आचरेकर को पुरस्कार मिला था इस फ़िल्म के लिए। जहाँ तक संगीत पक्ष का सवाल है, अनिल दा का संगीत था और प्रेम धवन के बोल। दोस्तों, आज अनिल दा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी जीवन संगिनी मीना जी का गाया हुआ यह गीत जैसे आज पुकार पुकार कर उन्हे आवाज़ दे रहा है कि "तेरे बिना जिया मोरा लागे ना"। जानेवाले तो कभी वापस नहीं आते, लेकिन ऐसे कलाकार जाकर भी नहीं जाते। गुज़रे ज़माने के ये अनमोल तराने हमेशा हमेशा उन्हे हमारे बीच मौजूद रखेंगे। मीना कपूर जी को उत्तम स्वास्थ्य और लम्बी आयु के लिए शुभकामनाएँ देते हुए आइए सुनते हैं उनका गाया यह सुरीला नग़मा।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

इबादत में उठे हैं आज फिर हाथ मेरे,
खुदा मिटा दे उसके दिल से हर गिला,
वो मेरा सनम जो दूर हो गया नज़रों से,
है जुस्तजू जिसकी उससे दे मुझे मिला...

अतिरिक्त सूत्र- साहिर लुधियानवीं का लिखा है ये गीत

पिछली पहेली का परिणाम-
जी शरद जी आपने हमारी गलती पर सही ध्यान दिलाया. पर आपको बधाई...क्या वाकई आपको ये सभी गाने जुबानी याद हैं :), ग्रेट
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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