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Sunday, June 30, 2019

राग तिलंग : SWARGOSHTHI – 424 : RAG TILANG






स्वरगोष्ठी – 424 में आज

खमाज थाट के राग – 5 : राग तिलंग

इन्दुबाला देवी से राग तिलंग में एक ठुमरी और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




इन्दुबाला देवी
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। इस श्रृंखला में हम खमाज थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में खमाज थाट के जन्य राग “तिलंग” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको विगत शताब्दी की सुविख्यात व्यावसायिक गायिका इन्दुबाला देवी के स्वरों में प्रस्तुत राग तिलंग की ठुमरी के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग तिलंग के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिक उपयोग किया गया है। इस राग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से मदन मोहन का स्वरबद्ध किया एक गीत – “लगन तोसे लागी बलमा...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग तिलंग को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है। राग की जाति औड़व-औड़व होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग तिलंग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। यद्यपि राग तिलंग में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, फिर भी राग के सौन्दर्य-वृद्धि के लिए कभी-कभी तार सप्तक के अवरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और सुगम संगीत की रचनाएँ अधिक मिलती हैं। यह पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग तिलंग से मिलता-जुलता राग खमाज होता है। दोनों रागों में भेद को स्पष्ट करने के लिए कुछ तथ्यों को जानना आवश्यक है। दोनों रागों में पर्याप्त समानता है, किन्तु एक अन्तर के कारण राग तिलंग और खमाज में अन्तर आ जाता है। दोनों राग खमाज थाट से सम्बद्ध होता है और दोनों के आरोह में शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। दोनों रागों में वादी और संवादी क्रमशः गान्धार और निषाद स्वर होते हैं और दोनों पूर्वांग प्रधान राग होते हैं। परन्तु राग खमाज के अवरोह में शुद्ध ऋषभ स्वर का भी प्रयोग किया जाता है, जिस कारण राग की जाति बदल जाती है। अर्थात राग तिलंग औडव-औडव जाति का राग है, जबकि राग खमाज औडव-षाड़व का राग है। हम यह भी कह सकते हैं कि राग खमाज अपने थाट का आश्रय राग है, जबकि राग तिलंग जन्य राग होता है। राग तिलंग में अधिकतर ठुमरी गायी जाती है। एक शताब्दी से भी पहले व्यावसायिक गायिकाओं द्वारा गायी गई ठुमरियों का स्वरूप कैसा होता था, इसका अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पिछली शताब्दी की गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी सुनवाते है। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक गायिका इन्दुबाला देवी भी थीं। आइए अब हम इन्हीं की आवाज़ में राग तिलंग की ठुमरी सुनते हैं। ठुमरी के बोल हैं, -“तुम काहे को नेहा लगाए...”। आप यह ठुमरी सुनिए।

राग तिलंग : “तुम काहे को नेहा लगाए...” : ठुमरी : इन्दुबाला देवी



आज हमने आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग तिलंग का परिचय प्रस्तुत किया। इसके साथ ही पिछली शताब्दी की मशहूर गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में एक पुरानी ठुमरी रिकार्डिंग के माध्यम से राग के उपशास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने का प्रयास किया। अनेक फिल्मी गीतों में राग तिलंग का प्रयोग किया गया है। अब हम इस राग पर आधारित 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से एक गीत –“लगन तोसे लागी बलमा…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं। राग तिलंग की रचना खमाज थाट से मानी गई है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒। इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग है- झिंझोटी, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जयजयवन्ती, तिलक कामोद आदि। अब हम राग तिलंग पर आधारित एक फिल्मी गीत का रसास्वादन करा रहे हैं। यह गीत हमने 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से लिया है। अनीता गुहा, अमिता, अनूप कुमार, शुभा खोटे और दलजीत अभिनीत इस फिल्म में इस गीत के साथ ही अन्य कई गीत भी राग आधारित थे। फिल्म का संगीत सुप्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन ने तैयार किया है। गीतकार हैं, राजेन्द्र कृष्ण। राग तिलंग के अनुकूल स्वरों में लता मंगेशकर ने गीत –“लगन तोसे लागी बलमा...” का अत्यन्त मधुर गायन किया है। लीजिए पहले आप राग तिलंग पर आधारित यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलंग : “लगन तोसे लागी बलमा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – देख कबीरा रोया




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 424वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 6 जुलाई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 426 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 422वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म “सीमा” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इसके साथ ही किसी अज्ञात स्थान से अरविन्द मिश्र ने केवल एक सही उत्तर देकर एक अंक अर्जित किया। रविचन्द्र जोशी ने अपना तीनों सही उत्तर फेसबुक पर सार्वजनिक कर दिया। तीनों उत्तर सही होने के बावजूद हम इसे प्रतियोगिता में शामिल नहीं कर रहे हैं। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में आज आपने खमाज थाट के जन्य राग “तिलंग” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका इन्दुबाला देवी के स्वरों में प्रस्तुत पिछली शताब्दी में प्रचलित एक ठुमरी का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म “देख कबीरा रोया” से एक मनमोहक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में सुनवाया। संगीतकार मदन मोहन ने इस गीत को राग तिलंग के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग तिलंग : SWARGOSHTHI – 424 : RAG TILANG : 30 जून, 2019


Sunday, January 28, 2018

राग तिलंग : SWARGOSHTHI – 354 : RAG TILANG




स्वरगोष्ठी – 354 में आज

पाँच स्वर के राग – 2 : “लगन तोसे लागी बलमा…”

इन्दुबाला देवी से तिलंग की एक प्राचीन ठुमरी और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




मदन मोहन
इन्दुबाला देवी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग तिलंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पिछली शताब्दी की मशहूर गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में एक पुरानी ठुमरी रिकार्डिंग के माध्यम से राग के उपशास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने का प्रयास करेंगे। अनेक फिल्मी गीतों में राग तिलंग का प्रयोग किया गया है। इस राग पर आधारित 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से एक गीत –“लगन तोसे लागी बलमा…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग तिलंग की रचना खमाज थाट से मानी गई है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒। इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग है- झिंझोटी, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जैजैवन्ती, तिलक कामोद आदि। खमाज थाट इन्हीं रागों में से एक राग तिलंग में आज हम आपको दो रचनाओं का रसास्वादन करा रहे हैं। पहले आप सुनिए, राग तिलंग पर आधारित एक फिल्म संगीत। यह गीत हमने 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से लिया है। अनीता गुहा, अमिता, अनूप कुमार, शुभा खोटे और दलजीत अभिनीत इस फिल्म में इस गीत के साथ ही कई गीत राग आधारित थे। फिल्म का संगीत सुप्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन ने तैयार किया है। गीतकार हैं, राजेन्द्र कृष्ण। राग तिलंग के अनुकूल स्वरों में लता मंगेशकर ने गीत –“लगन तोसे लागी बलमा...” का अत्यन्त मधुर गायन किया है। लीजिए पहले आप राग तिलंग पर आधारित यह गीत सुनिए।

राग तिलंग : “लगन तोसे लागी बलमा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – देख कबीरा रोया



द्वितीय प्रहर निशि रे ध वर्जित, गावत तिलंग राग,
ग नी स्वर संवाद करत, रखियत खमाज थाट।
राग तिलंग को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है। राग की जाति औड़व-औड़व होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग तिलंग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। यद्यपि राग तिलंग में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, फिर भी राग के सौन्दर्य-वृद्धि के लिए कभी-कभी तार सप्तक के अवरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और सुगम संगीत की रचनाएँ अधिक मिलती हैं। यह पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग तिलंग से मिलता-जुलता राग खमाज होता है। दोनों रागों में भेद को स्पष्ट करने के लिए कुछ तथ्यों को जानना आवश्यक है। दोनों रागों में पर्याप्त समानता है, किन्तु एक अन्तर के कारण राग तिलंग और खमाज में अन्तर आ जाता है। दोनों राग खमाज थाट से सम्बद्ध होता है और दोनों के आरोह में शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। दोनों रागों में वादी और संवादी क्रमशः गान्धार और निषाद स्वर होते हैं और दोनों पूर्वांग प्रधान राग होते हैं। परन्तु राग खमाज के अवरोह में शुद्ध ऋषभ स्वर का भी प्रयोग किया जाता है, जिस कारण राग की जाति बदल जाती है। अर्थात राग तिलंग औडव-औडव जाति का राग है, जबकि राग खमाज औडव-षाड़व का राग है। हम यह भी कह सकते हैं कि राग खमाज अपने थाट का आश्रय राग है, जबकि राग तिलंग जन्य राग होता है। राग तिलंग में अधिकतर ठुमरी गायी जाती है। एक शताब्दी से भी पहले व्यावसायिक गायिकाओं द्वारा गायी गई ठुमरियों का स्वरूप कैसा होता था, इसका अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पिछली शताब्दी की गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी सुनवाते है। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक गायिका इन्दुबाला देवी भी थीं। आइए अब हम इन्हीं की आवाज़ में राग तिलंग की ठुमरी सुनते हैं। ठुमरी के बोल हैं, -“तुम काहे को नेहा लगाए...”। आप यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलंग : “तुम काहे को नेहा लगाए...” : ठुमरी : इन्दुबाला देवी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 354वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक सुविख्यात और रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुपरिचित पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 356वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 352वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भूपाली, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

वर्ष 2018 की इस प्रथम पहेली क्रमांक 352 का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। पहेली के इन दोनों विजेताओं को "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" की ओर से हार्दिक बधाई। हमारे पिछले कई महाविजेताओं ने इस पहेली में भाग नहीं लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे नियमित महाविजेता इस अंक में विराम देकर अन्य प्रतिभागियों से आगे निकालना चाहते हैं। इस पहेली प्रतियोगिता हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रो,  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस दूसरे अंक में आपने राग तिलंग का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर की सुप्रसिद्ध गायिका इन्दुबाला देवी स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी का रसास्वादन कराया। राग तिलंग के स्वरों का उपयोग करते हुए अनेक फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “देख कबीरा रोया” से राग तिलंग पर आधारित एक गीत सुविख्यात गायिका लता मंगेशकर के स्वर में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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