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Monday, May 1, 2017

चित्रकथा - 16: विनोद खन्ना की पहली फ़िल्म ’मन का मीत’ की बातें


अंक - 16

विनोद खन्ना की पहली फ़िल्म ’मन का मीत’ की बातें

"हीरो नहीं बन सकते, हाँ, विलेन बनने की कोशिश करना..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


विनोद खन्ना (6 अक्टुबर 1946 - 27 अप्रैल 2017)

27 अप्रैल को फ़िल्म जगत के जानेमाने अभिनेता विनोद खन्ना का 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। चला गया फ़िल्म जगत का एक सदाबहार हीरो और पीछे छोड़ गया न जाने कितनी यादगार फ़िल्में। आज भले हम विनोद खन्ना को नायक के रूप में ही याद करें, पर अपना फ़िल्मी सफ़र उन्होंने बतौर खलनायक शुरु किया था 1969 की फ़िल्म ’मन का मीत’ से। इसके बाद कई फ़िल्मों में वो समय समय पर खलनायक की भूमिका में नज़र आते रहे हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में बात करें उनकी पहली फ़िल्म ’मन का मीत’ की और ग़ौर करें इस फ़िल्म में उनकी बतौर खलनायक अदाकारी की। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है विनोद खन्ना की पुण्य स्मृति को।




1969 की फ़िल्म ’मन का मीत’ का निर्माण किया था अभिनेता सुनिल दत्त ने अपनी ’अजन्ता आर्ट्स’ के बैनर तले। इस फ़िल्म का निर्माण उन्होंने अपने छोटे भाई सोम दत्त को लौन्च करने के लिए किया था। और इसी फ़िल्म में उन्होंने विनोद खन्ना को भी उनका पहला ब्रेक दिया। नायक की भूमिका में सोम दत्त तो सफल नहीं रहे, पर खलनायक की भूमिका में नज़र आने वाले विनोद खन्ना आगे चल कर एक सफल नायक ज़रूर बन गए। ’मन का मीत’ के निर्देशक थे ए. सुब्बा राव, संगीतकार थे रवि और गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण (राजिन्दर कृषण)। सोम दत्त और विनोद खन्ना के अलावा फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे लीना चन्दावरकर, ओम प्रकाश, राजेन्द्र नाथ और जीवन। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि यह लीना चन्दावरकर की भी पहली फ़िल्म थी बतौर नायिका। इस तरह से तीन तीन मुख्य कलाकारों का फ़िल्मी सफ़र इस फ़िल्म से शुरु हुआ। यह फ़िल्म ज़्यादा नहीं चली और ना ही इस फ़िल्म के नायक सोम दत्त का करीयर चल पाया। पर विनोद खन्ना और लीना चन्दावरकर की गाड़ी चल निकली। फ़िल्म की कहानी टी. एन. बाली ने लिखी। यह एक आकर्षक और मज़ेदार फ़िल्मी कहानी थी जो एक हिट फ़ॉरमुला फ़िल्म की कहानी थी। शूटिंग् भी दार्जिलिंग् की ख़ूबसूरत वादियों में की गई। फ़िल्म के निर्देशक ए. सुब्बा राव पिछले ही साल ’मिलन’ जैसी सफल फ़िल्म सुनिल दत्त को दे चुके थे, इसलिए इस फ़िल्म में भी उनसे उम्मीदें बहुत ज़्यादा थीं। लेकिन ’मन का मीत’ नहीं चली। रवि और राजेन्द्र कृष्ण भी गीत-संगीत में कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सके जिसके बलबूते फ़िल्म चल पड़ती। आज यह फ़िल्म सिर्फ़ इस बात के लिए याद की जाती है कि यह विनोद खन्ना की पहली अभिनीत फ़िल्म थी।

फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी है कि लाला बलवन्त राय (ओम प्रकाश) कल्कत्ता स्थित एक बहुत बड़े व्यवसायी हैं जिनका दार्जिलिंग् में भी बहुत बड़ा कारोबार है जिसकी देख रेख उनकी भतीजी करती है। लाला जी की लाडली पोती आरती (लीना चन्दावरकर) दार्जिलिंग् की एक कॉलेज में पढ़ाई कर रही है। आरती के माँ-बाप इस दुनिया में नहीं हैं। इसलिए वो अपने नानाजी के बहुत क़रीब है। एक बार छुट्टियों में दार्जिलिंग् से कलकत्ता जाते समय वो अपनी सहेलियों के साथ रेल के लेडीज़ कम्पार्टमेण्ट में बैठ जाती है। ट्रेन जैसे ही चलने लगती है तभी उस लेडीज़ कम्पार्टमेण्ट में दार्जिलिंग् का एक देहाती किस्म का लड़का सोमू (सोम दत्त) ग़लती से चढ़ जाता है। आरती और उसकी सहेलियाँ सोमू को सीधा-सादा भोला-भाला देख कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। बात आई-गई हो जाती है, आरती कलकत्ता पहुँचती है, अपनी सहेली सुषमा (संध्या रानी) को भी साथ ले आती है। स्टेशन से दोनों को पिक करके ले आते हैं फ़िल्म के खलनायक प्राण (विनोद खन्ना)। प्राण रिश्ते में लालाजी की बेटी का देवर है और इसलिए उनके घर उसका आना-जाना लगा रहता है। लाला जी को भी प्राण पसन्द है लेकिन प्राण के मन में आरती से शादी करके उसकी जायदाद को हड़पने का सपना है, इसलिए वो आरती को हर वक़्त इम्प्रेस करने की कोशिशें करता है, लेकिन आरती को वो बिल्कुल पसन्द नहीं। आरती हँसी मज़ाक में प्राण से दूर बच निकलती है। एक सीन में प्राण सिनेमा की तीन टिकटें ख़रीद लाता है ताकि वो आरती और सुषमा को अपने साथ सिनेमा दिखाने ले जा सके, पर आरती साफ़ मना कर देती है।

उधर लाला जी को आरती की शादी की चिन्ता सताने लगती है। वो उसके लिए दो लड़कों का रिश्ता लेकर आरती को उनमें से एक को चुनने की गुज़ारिश करते हैं। पर आरती बिना जाँच-पड़ताल किए किसी से भी शादी करने से साफ़ इनकार कर देती है। तब आरती अपने चचेरे भाई मुरली (राजेन्द्र नाथ), जो एक वकील है, की मदद से भेस बदलकर उन दो लड़कों की असलीयत का पता लगाती है और यह बात साबित हो जाती है कि वो दोनों लालची एवं चरित्रहीन हैं। जब यह ख़बर सुनाने आरती, सुषमा और मुरली घर वापस आते हैं तो पता चलता है कि लाला जी अपने मैनेजर के साथ दार्जिलिंग् चले गए हैं किसी ज़रूरी काम से। शाम को घर पर पार्टी चल रही है, प्राण आरती के साथ डान्स कर रहा है। नृत्य करते हुए यहाँ एक बड़ा मज़ेदार संवाद है दोनों के बीच में। 

प्राण - "आरती, शायद मैं तुम्हारा पार्टनर बनने के लिए ही पैदा हुआ था।"
आरती - "लेकिन न मुझे तुम्हारे पैदा होने की ख़ुशी है, ना मरने का ग़म होगा।"
प्राण - "बड़ी संगदिल हो, ऐसी भी मुझसे नफ़रत क्या!"
आरती - "लेकिन तुम में ऐसी कौन सी बात है जिससे मोहब्बत की जा सके?"
प्राण - "क्यों, क्या कमी है मुझमें? पढ़ा लिखा हूँ, नौजवान हूँ"
आरती - "जो कहते हो सच कहते हो, लेकिन उँ-हुँ, हीरो नहीं बन सकते। हाँ, विलेन बनने की कोशिश करना।"
प्राण - "वह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा!!"

उस समय भले यह संवाद फ़िल्म की कहानी के हिसाब से लिखी गई हो, पर संयोग की बात देखिए कि यह संवाद विनोद खन्ना के जीवन में किस क़दर सच साबित हुई। विलेन के रूप में इस फ़िल्म में क़दम रखने बाद वो आगे चल कर नायक बने, और एक सफल नायक बने। आने वाले वक़्त ने सचमुच यह बता दिया।

ख़ैर, फ़िल्म की कहानी पर वापस आते हैं। पार्टी चल ही रही थी कि दार्जिलिंग् से ट्रंक-कॉल आती है कि लाला जी को दिल का दौरा पड़ गया। आरती, सुषमा और प्राण अपने फ़ैमिली डॉक्टर को साथ में लेकर दार्जिलिंग् के लिए निकल पड़ते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद लाला जी आरती को बताते हैं कि उनके रिश्तेदारों ने उन्हें धोखा दिया और पैसों और ज़मीन-जायदाद की हेरा-फेरी की है, उनकी सगी बेटी और भतीजी भी इसमें शामिल है। इन सब से उन्हें बेहद गहरा सदमा पहुँचा है। लाला जी को अब आरती की शादी की चिन्ता और ज़्यादा सताने लगती है। वो चाहते हैं कि इससे पहले उन्हें कुछ हो जाए, आरती के हाथ पीले हो जाने चाहिए। वो यह भी कहते हैं कि प्राण भी अच्छा लड़का है, वो उससे ही क्यों न शादी कर ले? आरती को प्राण से बचने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता देख वो यह झूठ बोल देती है कि उसे किसी दूसरे लड़के से प्यार है। यह सुन कर लाला जी राहत की साँस लेते हैं और आरती से उस लड़के को तुरन्त मिलवाने को कहते हैं। आरती और सुषमा "उस" लड़के की तलाश में निकल पड़ते हैं। क़िस्मत उनका साथ देती है और सड़क पर उन्हें वही सोमू मिल जाता है जिसकी उन लोगों ने ट्रेन में मज़ाक उड़ाया था। सोनू से मदद माँगने पर इस बार सोमू पहले तो मना कर देता है, लेकिन घर आकर जब अपनी माँ से सुनता है कि किसी झूठ से अगर किसी का भला हो रहा हो तो ऐसी झूठ में कोई ग़लती नहीं है, तब जा कर वो आरती की मदद करने को मान जाता है। आरती सोमू को सूट-बूट पहना कर एक अमीर घर का लड़के के रूप में लाला जी के सामने पेश करती है। उसके आचार-व्यवहार को देख कर लाला जी बहुत ख़ुश होते हैं और उसके साथ आरती की शादी के लिए हाँ कह देते हैं। 

उधर प्राण, जो ख़ुद आरती से शादी करना चाहता है, उसे सोमू पसन्द नहीं आता और एक दिन सोमू को दूर ले जाकर उसकी पिटाई शुरु कर देता है। सोमू भी उससे लड़ पड़ता है। काफ़ी देर तक मारपीट करने के बाद जब वहाँ आरती और सुषमा आ पहूँचते हैं, तब प्राण यह कह कर बच निकलता है कि वो सोमू की परीक्षा ले रहा था कि क्या वो आरती की रक्षा करने की ताक़त रखता भी है। उधर सोमू के इतने दिन अपने घर वापस ना लौटने से उसकी माँ को चिन्ता होती है और वो सोमू के दोस्त को लाला जी के घर भेजती है पता करने के लिए कि सोमू कब वापस आएगा। दरवाज़े पर प्राण उसे मिल जाता है और बातों ही बातों में प्राण को सोमू की असलियत का पता चल जाता है। प्राण उसे वापस भेज देता है यह कह कर कि सोमू अभी घर पर नहीं है। अगले दिन आरती और सोमू की सगाई की रस्म की पार्टी अरेंज होती है। वहाँ पर नाच-गाना चल ही रहा है कि सोमू की माँ उसे ढूंढ़ती हुई वहाँ आ पहुँचती है। आरती सोमू को बात को सम्भालने की गुज़ारिश करती है, और सबके सामने कह देती है कि वह एक पागल बुढ़िया है जो हर किसी को अपना बेटा समझ लेती है। सोमू भी उसे अपनी माँ कहने से इनकार कर देता है। सोमू की माँ को सदमा पहुँचता है और वो वहाँ से चली जाती है। पार्टी के बाद सोमू आरती से साफ़ कह देता है कि अब वो यह नाटक और नहीं क सकता, न जाने उसकी माँ के मन की क्या हालत हुई होगी। उधर प्राण भी सोमू की सारी असलियत लाला जी को बता देते हैं। लाला जी सोमू को बेइज़्ज़त कर घर से निकल जाने को कहते हैं और आरती पर भी गुस्सा करते हैं। सोमू भागता हुआ घर पहुँचता है तो पता चलता है कि उसकी माँ खेत में काम करने गई है। उसकी ग़ैर मौजूदगी में उसकी माँ को खेतों में कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। सोमू खेत में जा कर अपनी माँ को ज़मीन पर पड़ी देखता है। उसकी माँ गुज़र चुकी है।

आरती सोमू के पास जाकर उसकी माँ की मृत्यु पर शोक व्यक्त करती है और उससे माफ़ी माँगती है, पर सोमू उसे उसकी माँ का क़ातिल करार देकर वापस चले जाने को कहता है। घर लौटने पर लाला जी उस पर ग़ुस्सा करते हैं, आरती भी सोमू की माँ के मौत का ज़िम्मेदार ख़ुद को और लाला जी को ठहराती है। वहाँ पर मौजूद प्राण लाला जी की हौसला अफ़ज़ाई करता है। प्राण सोमू के घर जाता है और उसके हाथ में ढेर सारे रुपये देकर कहता है कि ये सब लाला जी ने भेजा है उसके लिए ताकि वो दूर कहीं जा कर एक नई ज़िन्दगी शुरु करे। सोमू वो रुपये प्राण के मुंह पर फेंक देता है। प्राण ग़ुस्सा नहीं होता और एक और चाल चलता है। सोमू को शराब पिला कर लाला जी और आरती के सामने पेश कर देता है। आरती भागती हुई सोमू को पीछे जाती है और एक ऐक्सिडेण्ट का शिकार हो जाती है। सोमू आरती को अस्पताल ले जाता है। लाला जी को ख़बर भेजी जाती है। लाला जी जैसे ही अस्पताल के केबिन में दाख़िल होने ही जाते हैं तो उन्हें सोमू और आरती के बीच हो रही बातचीत सुनाई देती है। लाला जी को पता चल जाता है कि सोमू वाकई एक अच्छा लड़का है। आरती के मन में भी सोमू के लिए प्यार उत्पन्न हो चुका है। लाला जी सोमू को आरती से शादी कर लेने की गुज़ारिश करते हैं। आरती सुन कर ख़ुश हो जाती है। पर सोमू शादी से इनकार कर देता है यह कहते हुए कि दोनों के बीच में अमीरी-ग़रीबी का एक बहुत बड़ा फ़ासला है। तब लाला जी यह ऐलान कर देते हैं कि वो अपनी पूरी जायदाद दान में किसी संस्था को दे देंगे और वो भी सोमू की तरह ग़रीब हो जाएँगे। 

उधर सारी जायदाद अपने हाथों से फ़िसलता देख प्राण सहित सारे रिश्तेदारों में खलबली मच जाती है और सारे मिल कर लाला जी को पागल सिद्ध करने की योजना बनाते हैं। यहाँ तक कि लाला जी के फ़ैमिली डॉक्टर को मार डालने की धमकी देकर उनसे वकील के सामने कहलवा देते हैं कि लाला जी का दिमाग़ी संतुलन ठीक नहीं है। लाला जी अपनी जायदाद का फ़ैसला नहीं ले पाते। वकील के जाने के बाद प्राण लाला जी को एक कमरे में ले जाता है और उन्हें कमरे में बन्द कर देता है। यह सब कुछ आरती और सोमू की ग़ैर-मौजूदगी में होता है। जब आरती और सोमू लौटते हैं, तब लाला जी को अजीब-ओ-ग़रीब हरकतें करते देखते हैं और उन्हें भी ऐसा लगने लगता है कि सच में लाला जी की दिमाग़ी हालत ठीक नहीं है। प्राण भी आरती को लाला जी के बारे में झूठी बातें बताता है जिससे आरती निश्चित हो जाती है कि लाला जी सच में पागल हो गए हैं। उधर प्राण लाला जी को जाकर कहता है कि आरती उससे शादी करने के लिए तैयार हो गई है और कल ही वो दोनों शादी कर रहे हैं। लाला जी को प्राण के मनसूबों का अहसास होता है और वो प्राण से कहते हैं कि वो अभी जा कर आरती को सब सच्चाई बता देंगे। प्राण अपना रीवॉल्वर निकालता है और लाला जी की तरफ़ निशाना साधता है। पर लाला जी चालाकी से रीवॉल्वर हथिया लेते हैं और प्राण पर गोली चला देते हैं। प्राण ज़मीन पर गिर पड़ता है। लाला जी को अपनी ग़लती का अहसास होता है और "मैं ख़ून कर डाला" चिल्लाते हुए आरती की तरफ़ भागते हैं। पुलिस को फ़ोन कर अपना जुर्म क़बूल कर लेते हैं। घर पर पुलिस आते हैं, लेकिन उन्हें वहाँ ना तो किसी की लाश दिखाई देती और ना ही कोई रीवॉल्वर। सब यही सोचते हैं कि लाला जी पागल हो चुके हैं। तभी प्राण वहाँ हाज़िर होता है तो सब चौंक पड़ते हैं। घरवालों के साथ-साथ पुलिस भी यह यकीन कर लेती है कि लाला जी पागल हो चुके हैं।

सारे रिश्तेदार आरती को समझाते हैं कि अगर वो प्राण से शादी कर ले तो लाला जी का पागलपन दूर हो जाएगा। आरती अपनी दादा जी के लिए यह क़ुर्बानी देने के लिए तैयार हो जाती है। सुषमा आरती को समझाने की कोशिश करती है पर आरती नहीं मानती। तब सुषमा मुरली के पास जाकर सब बातें बताती है। मुरली को शक़ होता है प्राण पर, और उसे लगता है कि दाल में कुछ काला है। उधर आरती सोमू की माँ की समाधि पर जाकर रोते हुए कहती है, "माँ जी, मैं आपकी गुनेहगार हूँ, आपकी जान मेरे कारन गई, आपके मासूम बेटे के दिल से मैंने खेला, यह तो भगवान ही जानता है कि आपका बेटा मेरे लिए क्या है, वो इस धरती पर मेरा भगवान है, मेरे जीवन का मालिक है, उसके बग़ैर यह दुनिया मेरे लिए नर्क है, लेकिन जीतेजी हम एक दूसरे के नहीं हो सकते क्योंकि मैं दोषी हूँ, उसी की यह सज़ा मुझे मिल रही है"। सोमू आरती को यह सब कहते सुन लेता है और उसे पहचान भी लेता है। वहाँ मुरली और सुषमा भी आ पहुँचते हैं और लाला जी की हालत के बारे में बताते हैं। मुरली आरती को हक़ीक़त समझाने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ़ प्राण डॉक्टर को डरा कर कहते हैं कि वो लाला जी का ख़ून कर दे और इसे एक ख़ुद्कुशी का जामा पहना दे। डॉक्टर ऐसा करने से मना कर देते हैं तो प्राण डॉक्टर का ख़ून कर देता है। प्राण उनकी लाश को ठिकाने लगा ही रहा होता है कि वहाँ मुरली आ पहुँचता है और ज़मीन पर स्टेथोस्कोप और चश्मा पड़ा देखता है। लाला जी के बारे में पूछने पर प्राण बताता है कि वो पागलख़ाने में हैं। मुरली चला जाता है। रात को जब वो लोग डॉक्टर की लाश को कब्रिस्तान में ठिकाने लगाने आते हैं तब मुरली, आरती और सुषमा मिल कर उन्हें भूत बन कर डराते हैं। उधर सोमू लाला जी के कमरे में घुस कर उन्हें वहाँ से भगा ले जाने के लिए आता है, पर उसे वहाँ लाला जी नहीं बल्कि प्राण के गुंडे मिलते हैं। ख़ूब मारपीट होती है और जल्दी ही सोमू उन गुंडों को काबू में कर लेता है और लाला जी कहाँ यह यह उनसे बुलवाने पर मजबूर कर देता है। उधर कब्रिस्तान में लाला जी के सारे रिश्तेदार गड्ढ़ा खोद रहे होते हैं कि डॉक्टर की लाश के कॉफ़िन से धुआँ निकलने लगता है। कॉफ़िन का ढक्कन खोलते ही धुएँ के साथ-साथ भूत के भेस में मुरली निकलता है और "लाला जी कहाँ हैं, लाला जी कहाँ हैं" कह कर सबको डराता है और सभी को अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। दूसरी तरफ़ प्राण आरती को बन्दी बना कर वहाँ ले आता है जहाँ उसने लाला जी को क़ैद कर के रखा हुआ है। उसने वहाँ आरती से शादी करने की पूरी तैयारी कर रखी है। लाला जी इस शादी से इनकार कर देते हैं तो प्राण उन पर रीवॉल्वर दागता है। गोली चलाने ही वाला है कि सोमू वहाँ पहुँच कर प्राण पर टूट पड़ता है। दोनों में मारपीट होती है। लेकिन प्राण सोमू पर गोली चला देता है। तभी वहाँ पुलिस आती है और प्राण को गिरफ़्तार कर लेती है। आरती और लाला जी सोमू की लाश पर आँसू बहा रहे होते हैं कि तभी सोमू उठ कर खड़ा हो जाता है। मुरली प्राण के हाथ से रीवॉल्वर लेते हुए कहता है कि यह वही नकली रीवॉल्वर है जिससे उसने लाला जी के हाथों अपना क़त्ल करवाया था और दुनिया की आँखों में धूल झोंकी थी कि लाला जी पागल हो गए हैं। पुलिस प्राण और सारे रिश्तेदारों को ले जाती है। सोमू और आरती की शादी सम्पन्न होती है।

यहाँ आकर ’मन का मीत’ फ़िल्म पूरी होती है और फ़िल्म का एक सुखद अन्त होता है। फ़िल्म को देखते हुए यह विचार मन में उत्पन्न होता है कि फ़िल्म की कहानी, पटकथा और निर्देशन में कोई कमी नहीं थी, फिर फ़िल्म के ना चलने का क्या कारण था? सम्भवत: नायक की भूमिका में सोम दत्त उतने आकर्षक नहीं लगे और फ़िल्म का गीत-संगीत भी ठंडा था। अगर फ़िल्म में दो चार सुपरहिट गीत होते तो शायद वो फ़िल्म को डूबने से बचा लेते। ख़ैर, फ़िल्म में ओम प्रकाश, राजेन्द्र नाथ, लीना चन्दावरकर और विनोद खन्ना की अदाकारी ख़ूब रही, और इसमें कोई शक़ नहीं है कि फ़िल्म के नायक से ज़्यादा खलनायक आकर्षक लगे। निस्संदेह जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी, तभी लोग यह समझ गए होंगे कि विनोद खन्ना एक लम्बी पारी खेलने के लिए ही फ़िल्म जगत में आए हैं। विनोद खन्ना के इतने सारे हिट फ़िल्मों के होने के बावजूद हमने ’मन का मीत’ फ़िल्म की बातें की क्योंकि यही वह फ़िल्म थी जहाँ से विनोद खन्ना की शुरुआत हुई थी। आज विनोद खन्ना हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन यह फ़िल्म ’मन का मीत’ हमेशा उनकी पहली फ़िल्म के रूप में याद रखी जाएगी। उनके साथ-साथ यह फ़िल्म भी यादगार बन चुकी है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, October 9, 2012

"ये गाँव प्यारा-प्यारा...", पर नहीं बसा सकीं वर्षा भोसले अपने सपनों का गाँव

गायिका वर्षा भोसले को श्रद्धांजलि



"ये गाँव प्यारा-प्यारा, ये लवली-लवली गाँव, ये हरियाली पीपल की घनी छाँव, राजा बेटा धरती का प्यारा-प्यारा गाँव...", बरसों बरस पहले जब वर्षा भोसले इस गीत को गाते हुए जिस प्यारे से इस गाँव की कल्पना की होगी, तब शायद ही उन्हें इस बात का इल्म हुआ होगा कि वो कभी अपने सपनों का गाँव नहीं बसा पाएँगी। आज जब वर्षा हमारे बीच नहीं रहीं तो उनका गाया हुआ यही गीत बार-बार मन-मस्तिष्क पर हावी हो रहा है। कल जब तक वो इस दुनिया में थीं तब शायद ही हम में से कोई उन्हें दैनन्दिन जीवन में याद किया होगा, पर उनके जाने के बाद दिल यह सोचने पर ज़रूर मजबूर कर रहा है कि उन्होंने यह भयानक क़दम क्यों उठाया होगा? क्यों मानसिक अवसाद ने उन्हें घेर लिया होगा? होश संभालने से पहले ही पिता से दूर हो जाने का दु:ख उनके कोमल मन को कुरेदा होगा? विश्व की श्रेष्ठ गायिकाओं में से एक आशा भोसले की बेटी होकर भी जीवन में कुछ ख़ास न कर पाने का ग़म सताया होगा? अपनी वैवाहिक जीवन की असफलता ने उनकी बची-खुची आशाओं पर भी पानी फेर दिया होगा? सम्पत्ति को लेकर पारिवारिक अशान्ति से वो तंग आ गई होंगी? अगर इन तमाम सवालों को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें तो शायद हम वर्षा के उस मानसिक दर्द के हमदर्द हो पायेंगे। कल वर्षा भोसले की अत्महत्या की ख़बर सुन कर जैसे दिल दहल गया। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से वर्षा भोसले को भावभीनी श्रद्धांजलि और आशा जी व समस्त मंगेशकर परिवार के सदस्यों के लिए कामना कि ईश्वर उन्हें इस दर्दनाक स्थिति से गुज़रने में शक्ति प्रदान करें।

वर्षा भोसले का जन्म सन् 1956 में हुआ था। बतौर गायिका उन्होंने कुछ हिन्दी फ़िल्मों तथा भोजपुरी व मराठी फ़िल्मों में गीत गाए। वो कहते हैं न कि विशाल वटवृक्ष के नीचे अन्य पेड़ों का उगना मुश्किल होता है, वैसे ही वर्षा के लिए आशा भोसले की बेटी होना वरदान से ज़्यादा अभिषाप सिद्ध हुई। वो जो भी गातीं, उसकी तुलना आशा जी से होतीं। आलम कुछ ऐसा हुआ कि वर्षा ने तंग आकर गाना ही छोड़ दिया। विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में अपने संगीतकार बेटे हेमन्त और गायिका बेटी वर्षा का ज़िक्र आशा भोसले ने कुछ इस तरह से किया था -- "कोई कोई क्षण ज़िंदगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि ये मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है न? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मीली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। ये क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। ये गाना सुनिये फ़िल्म 'जादू-टोना' का"



फ़िल्म 'जादू-टोना' में पहली बार गाने के बाद वर्षा भोसले ने कुछ और हिन्दी फ़िल्मों में भी गीत गाये। संगीतकार सोनिक-ओमी के संगीत में फ़िल्म 'भारत के संतान' में दिलराज कौर के साथ "दे दे तू दस पैसे दान", राम लक्ष्मण के संगीत में फ़िल्म 'तराना' में उषा मंगेशकर के साथ "मेरी आँख फ़ड़कती है" और संगीतकार श्यामजी घनश्याम जी के लिए फ़िल्म 'तीन चेहरे' में "हम हैं इस तरह जनाब के लिए जिस तरह जाम है" जैसे गीत गाये जिनमें कोई ख़ास बात न होने की वजह से लोगों ने अनसुने कर दिए। पर दो गीत उन्होंने और ऐसे भी गाये जिनके बोलों पर आज ग़ौर फ़रमाते हैं तो उनकी ज़िंदगी के साथ इनके विरोधाभास का अहसास होता है। एक गीत है किशोर कुमार के साथ फ़िल्म 'लूटमार' का "हँस तू हरदम, ख़ुशियाँ या ग़म, किसी से डरना नहीं, डर डर के जीना नहीं", और दूसरा गीत है अमित कुमार के साथ फ़िल्म 'आख़िरी इंसाफ़' का "यारों कल किसने देखा है, कल को गोली मारो"। और उन्होंने अपने आप को ही गोली मार ली। इन दोनों गीतों में ज़िन्दगी के प्रति आशावादी होने का संदेश है, जबकि वर्षा ने अपनी ज़िंदगी को निराशाओं से घेर लिया।



एक गायिका होने के अलावा वर्षा भोसले एक लेखिका भी थीं। वो लोकप्रिय वेब-पोर्टल 'रेडिफ़' के लिए 1997 से 2003 तक, 'दि संडे ऑबज़र्वर' के लिए 1994 से 1998 तक, और 'जेन्टलमैन' पत्रिका के लिए 1993 में लिखती रहीं। 'दि टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' और 'रक्षक' पत्रिका के लिए भी कुछ समय तक लिखीं। उन्होंने एक खेल-लेखक हेमन्त केंकड़े से विवाह किया, पर दुर्भाग्यवश 1998 में उनका तलाक हो गया। 9 सितंबर 2008 (आशा भोसले के जन्मदिन के अगले दिन) वर्षा ने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की थी, पर उन्हें बचा लिया गया था। पर इस बार काल के क्रूर हाथों ने उन्हें इस धरती से छीन लिया। आज उनकी मृत्यु की ख़बर "आशा भोसले की बेटी ने आत्महत्या की" के रूप में प्रकाशित हो रहा है। जिस निजी पहचान को न बना पाने की वजह से वो अवसाद से गुज़र रही थीं, वह पहचान उनके जाने के बाद भी दुनिया नहीं दे पा रही हैं। अब भी वो पहले आशा भोसले की बेटी हैं, बाद में वर्षा भोसले। आख़िर क्यों??? 

वर्षा भोसले को यह सुरीली श्रद्धांजलि हम समाप्त करते हैं उनकी और आशा जी की गाई फ़िल्म 'जुनून' के वनराज भाटिया के संगीत में "सावन की आई बहार रे" गीत को सुनते हुए....




खोज और आलेख: सुजॉय चटर्जी

Sunday, August 26, 2012

उस्ताद विलायत खाँ : ८५वें जन्मदिवस पर एक स्वरांजलि


स्वरगोष्ठी – ८५ में आज

जिनके सितार-तंत्र बजते ही नहीं गाते भी थे

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, दो दिन बाद अर्थात २८अगस्त को भारतीय संगीत-जगत के विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ का ८५वाँ जन्म-दिवस है। इस अवसर पर आज हम इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करने के साथ उनकी कुछ विशिष्ट रचनाओं का रसास्वादन भी करेंगे।

न्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त सितारनवाज उस्ताद विलायत खाँ का जन्म २८अगस्त, १९२८ को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के गौरीपुर नामक स्थान पर एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके पिता उस्ताद इनायत खाँ अपने समय के न केवल सुरबहार और सितार के विख्यात वादक थे, बल्कि सितार वाद्य को विकसित रूप देने में भी उनका अनूठा योगदान था। उस्ताद विलायत खाँ के अनुसार सितार वाद्य प्राचीन वीणा का ही परिवर्तित रूप है। इनके पितामह (दादा) उस्ताद इमदाद खाँ अपने समय के रुद्रवीणा-वादक थे। उन्हीं के मन में सबसे पहले सितार में तरब के तारों को जोड़ने का विचार आया था, किन्तु इसे पूरा किया, विलायत खाँ के पिता इनायत खाँ ने। उन्होने संगीत-वाद्यों के निर्माता कन्हाई लाल के माध्यम से इस स्वप्न को साकार किया। सितार के ऊपरी हिस्से पर दूसरा तुम्बा लगाने का श्रेय भी इन्हें है।

उस्ताद विलायत खाँ की आरम्भिक संगीत-शिक्षा उनके पिता इनायत खाँ साहब से प्राप्त हुई थी। परन्तु जब वे मात्र १२ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। बाद में उनके चाचा वाहीद खाँ ने उन्हें सितार-वादन की शिक्षा दी। नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ से उन्हें गायन की शिक्षा प्राप्त हुई। इनकी शिक्षा के प्रभाव से ही आगे चल कर उस्ताद विलायत खाँ ने गायकी अंग में अपने सितार-वादन को विकसित किया। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर उनके सितार-वादन का एक उत्कृष्ट उदाहरण सुनते हैं। आपके लिए हमने सबसे पहले उस्ताद विलायत खाँ का बजाया राग शंकरा चुना है। बिलावल थाट, षाडव जाति के इस राग में खाँ साहब द्वारा तीनताल में प्रस्तुत एक मधुर रचना और अन्त में अति द्रुत लय में झाला वादन का रसास्वादन आप भी करें। राग शंकरा की एक अत्यन्त प्रचलित बन्दिश है- ‘अब मोरी आली कैसे धरूँ धीर...’। खाँ साहब का वादन सुनते जाइए और साथ-साथ यह बन्दिश भी गुनगुनाते जाइए।

राग शंकरा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ के सितार-वादन में तंत्रकारी कौशल के साथ-साथ गायकी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। सितार वाद्य को गायकी अंग से जोड़ कर उन्होने अपनी एक नई वादन शैली का सूत्रपात किया था। वादन करते समय उनके मिज़राब के आघात से ‘दा’ के स्थान पर ‘आ’ की ध्वनि का स्पष्ट आभास होता है। उनका यह प्रयोग, वादन को गायकी अंग से जोड़ देता है। खाँ साहब ने सितार के तारों में भी प्रयोग किए थे। सबसे पहले उन्होने सितार के जोड़ी के तारॉ में से एक तार निकाल कर एक पंचम स्वर का तार जोड़ा। पहले उनके सितार में पाँच तार हुआ करते थे। बाद में एक और तार जोड़ कर संख्या छह कर दी थी। अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होने स्वीकार भी किया था कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ माँगते थे कि इस इम्तहान में भी वो अव्वल पास हों। आइए अब आप सुनिए, उस्ताद विलायत खाँ का बजाया, राग गारा। इस रचना में तबला संगति उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने की है।

राग गारा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ की उम्र तब मात्र बारह वर्ष थी जब उनके वालिद उस्ताद इनायत खाँ का इंतकाल हुआ था। आगे की संगीत-शिक्षा नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ ने उन्हें दी। यह गायकों का घराना था। आरम्भ में विलायत खाँ का झुकाव गायन की ओर ही था, किन्तु उनकी माँ ने उन्हें अपनी खानदानी परम्परा निभाने के लिए प्रेरित किया। गायन की ओर उनके झुकाव के कारण ही आगे चल कर उन्होने अपने वाद्य को गायकी अंग के अनुकूल परिवर्तित करने का सफल प्रयास किया। यही नहीं, अपने मंच-प्रदर्शन के दौरान प्रायः गाने भी लगते थे। १९९३ में लन्दन के रॉयल फेस्टिवल हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में खाँ साहब ने राग हमीर के वादन के दौरान पूरी बन्दिश का गायन भी प्रस्तुत कर दिया था। लीजिए आप भी सुनिए।

राग हमीर : ‘अचानक मोहें पिया आके जगाये...’ : उस्ताद विलायत खाँ राग 



उस्ताद विलायत खाँ ने कुछेक विश्वविख्यात फिल्मों में भी संगीत दिया था। १९५८ में निर्मित सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’, १९६९ में मर्चेन्ट आइवरी की फिल्म ‘दि गुरु’ और १९७६ में मधुसूदन कुमार द्वारा निर्मित हिन्दी फिल्म ‘कादम्बरी’, उस्ताद विलायत खाँ के संगीत से सुसज्जित था। वे वास्तव में सरल, सहज और सच्चे कलासाधक थे। जन्मदिवस के अवसर पर उनकी स्मृतियों को यह स्वरांजलि अर्पित करते हुए हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। आइए, ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी को विराम देने से पहले संगीत-मंच की परम्परा का निर्वहन करते हुए, उस्ताद विलायत खाँ द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी की मधुर रचना सुनवाते है। इसे सुन कर आपका मन उन्नीसवीं शताब्दी के महान संगीतज्ञ और रचनाकार कुँवरश्याम की बेहद चर्चित ठुमरी- ‘बाट चलत मोरी चुनरी रंग डारी श्याम...’ गुनगुनाने का अवश्य करेगा।

राग भैरवी : उस्ताद विलायत खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम पूर्व की भाँति संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछेंगे। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह तराना किस राग में निबद्ध है?

२ - इस गीत की गायिका के स्वर आपने शास्त्रीय मंच के अलावा अनेकानेक बार सुना है। तो देर किस बात की, गायिका का नाम हमें लिख भेजें।
आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८७वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८३वें अंक में हमने आपको पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वर में एक दुर्लभ बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार और दूसरे का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी, जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग का नाम पहचानने में भूल की, अतः उन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ की विभिन्न कड़ियों को तैयार कराते समय हम आपके सुझावों और फरमाइशों का पूरा ध्यान रखते हैं। तो देर किस बात की, आज ही अपने सुझाव हमें मेल करें। ‘स्वरगोष्ठी’ के कई संगीत-प्रेमी और कलासाधक स्वयं अपना या अपनी पसन्द का आडियो हमें निरन्तर भेज रहे है और हम विभिन्न कड़ियों में हम उनका इस्तेमाल भी कर रहे हैं। यदि आपको कोई संगीत-रचना प्रिय हो और आप उसे सुनना चाहते हों तो आज ही अपनी फरमाइश हमें मेल कर दें। इसके साथ ही यदि आप इनसे सम्बन्धित आडियो ‘स्वरगोष्ठी’ के माध्यम से संगीत-प्रेमियों के बीच साझा करना चाहते हों तो अपना आडियो क्लिप MP3 रूप में भेज दें। हम आपकी फरमाइश को और आपके भेजे आडियो क्लिप को ‘स्वरगोष्ठी’ आगामी किसी अंक में शामिल करने का हर-सम्भव प्रयास करेंगे। आगामी अंक में हम एक ऐसी संगीत-साधिका के बारे में चर्चा करेंगे, जिन्हें आपने शास्त्रीय संगीत के मंच पर शायद न देखा हो, किन्तु वे बेहद लोकप्रिय हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र 

Wednesday, July 18, 2012

10 गज़लों गीतों के माध्यम से याद करें महान मेहदी हसन साहब को

तालियों की गडगडाहट से गूँजता सभागार और सुरों को अपने तान में समेटती मेहदी हसन साहब की आवाज़. दोस्तों शायद अब ये समां कभी किसी संगीत प्रेमी को देखना नसीब नहीं हो सकेगा क्योंकि खुदा ने उन्हें हम सब से छीनकर अपने पास बुला लिया है ताकि जन्नतें भी उनकी महफिलों से रोशन हो सके. पर उनकी आवाज़ का बेशकीमती खज़ाना तो आज भी हमारे पास सुरक्षित है और ये जादू, कभी कम नहीं हो सकेगा इस बात को हर संगीत प्रेमी स्वीकार करेगा.

दोस्तों सुनिए हमारा ये खास कार्यक्रम, जिसके माध्यम से हम श्रद्धान्जली दे रहे हैं शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन साहब को, स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की और स्वर है सजीव सारथी का. लगभग ढेढ घंटे के इस पोडकास्ट में आपको मिलेंगें मेहदी साहब के गायन के कई मुक्तलिफ़ अंदाज़. तो दोस्तों कुछ समय के लिए अपने रोजमर्रा के काम से मुक्त होकर डूब जाईये सुरों के इस अथाह समुन्दर में जिसका नाम है मेहदी हसन. 




आपकी सुविधा के लिए हम लिखित स्क्रिप्ट यहाँ संलग्न कर रहे हैं 

स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने जिनके वो सबसे प्रिय गायक थे, उनके इन्तेकाल की खबर सुनकर कहा -"आज बहुत बड़े ग़ज़ल गायक कलाकार मेहदी हसन साहब हमारे बीच नहीं रहे, मुझे इस बात का बहुत दु:ख है, ग़ज़ल-गायकी के क्षेत्र में उन्होंने बहुत बड़ा परिवर्तन लाया, आज उनके जाने से ग़ज़ल की बहुत बड़ी हानि हुई है, अब उन जैसा कलाकार फिर से आना मुश्किल है, वो बहुत बड़े शास्त्रीय संगीत के गायक भी थे, और उनके गाने में राजस्थान के संगीत की खुशबू भी थी, उन्होंने मेरे लिए कुछ गाने बनाए थे उनमें से हीं एक ग़ज़ल मैंने जो उन्होंने मुझे गाके भेजी थी, उसका मैंने डुएट रिकार्ड किया था, उनके साथ मेरा ये एक हीं गाना है, मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि मेहदी साहब की आत्मा को वो शांति प्रदान करें" यहाँ पर बताते चलें कि लता दी "सरहदें" एलबम के "तेरा मिलना बड़ा अच्छा लगे" गाने की बात कर रही हैं, जिसकी आधी रिकार्डिंग पाकिस्तान में और आधी हिन्दुस्तान में हुई थी, क्योंकि मेहदी हसन साहब चाह कर भी हिन्दुस्तान नहीं आ पड़े थे। यह ग़म उन्हें आखिर तक कचोटता रहा था। 

मेहदी हसन यानि कि हमारे खां साहब का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूणा गांव में १८ जुलाई १९२७ को हुआ था। खां साहब के हिसाब से उनका जन्म "कलावंत" घराने की १६वीं पीढी में हुआ था। "कलावंत" नाम से हीं मालूम चलता है कि इस घराने में "कला" की कैसी काबिलियत थी। मौशिकी की शुरूआती तालीम उन्होंने अपने अब्बाजान उस्ताद अजीम खान और चचाजान उस्ताद ईस्माइल खान से ली। दोनों में हीं ध्रुपद के अच्छे जानकार थे। सुनते है ये ठुमरी खान साहब की आवाज़ में खां साहब ने अपनी ग़ज़लों को राग यमन और राग ध्रुपद की बारीकियों से नवाज़ा था। इन्होंने ग़ज़ल-गायिकी को उस दौर में अलग पहचान दी, जब ग़ज़लों का मतलब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुबारक बेगम हुआ करते थे। हिन्दुस्तान के बंटवारे से पहले फाजिल्का बंगला यानि कि अविभाजित पंजाब में उन्होंने अपना पहला पर्फोमेंश दिया। वह परफोर्मेंश ध्रुपद-खयाल पर आधारित था। खां साहब दर-असल ध्रुपद-गायक हीं बनना चाहते थे, ग़ज़ल तो पंजाबी में कहें तो "ऐं वैं" हीं हो गया। 

दोस्तों, खां साहब शहंशाह-ए-ग़ज़ल के नाम से जाने जाते थे। कहा जाता है कि ग़ज़लों में उनके जैसा सुर किसी और का नहीं लगा अब तक। हैरत होती है यह सोचकर कि ऐसा इंसान जो एक हुनर में इस कदर माहिर हो, उसकी शुरूआत किसी और हीं हुनर से हुई थी। जी हाँ, मौशिकी की पहली सीढी जो उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के मार्फ़त १९५७ में चढी, वहाँ उनका कार्यक्रम ठुमरी का था। कहते हैं कि खां साहब ठुमरी और ध्रुपद के हीं होकर रह गए होते अगर रेडियो पाकिस्तान के दो अधिकारियों जेड ए बुखारी और रफ़ीक़ अनवर साहब ने उर्दू में उनकी खासी दिलचस्पी और साफ़ तलफ़्फ़ुज़ को देखकर उन्हें ग़ज़ल गाने के लिए प्रेरित न किया होता। हम शुक्रिया करते हैं उन दोनों का, जिनकी वजह से ग़ज़लों को खां साहब नसीब हुए। १९४७ में जब हिन्दुस्तान तक़्सीम हुआ तो मेहदी हसन साहब पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए। हिन्दुस्तान छोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान उन्हें यह हुआ कि पाकिस्तान में न रहने को घर, न खाने को रोटी.... पैसों की तंगहाली ने उन्हें मौशिकी से लगभग जुदा हीं कर दिया। पूरे परिवार का पेट पालने के लिए पहले वे एक साईकिल की दुकान में काम करने लगे। वहाँ से फारिग हुए तो उन्हें कार और डीजल ट्रैक्टर का मैकेनिक बनना पड़ा। सब ऐसा हीं चलता रहता अगर पाकिस्तान रेडियो ने उन्हें मौका न दिया होता। बस राह दिखाने की देर थी, मंज़िल ने तो खुद अपने राहगीर को चुन रखा था। 

मेहदी साहब ने जो चलना शुरू किया तो क्या फिल्मी मोड़, क्या गैर-फिल्मी मोड़.. हर जगह मील के पत्थर उन्हीं के नाम के थे। ग़ज़ल-गायिकी में अपना नाम सोने में दर्ज़ कर लेने के बाद उन्होंने पाकिस्तानी फिल्म-संगीत को आजमाना चाहा। उनका यह प्रयोग भी काबिल-ए-तारीफ़ रहा। १९६९ में रीलिज हुई फिल्म "तुम मिले प्यार मिला" में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के साथ उनका गाना "आपको भूल जाएँ हम, इतने तो बेवफा नहीं" उतना हीं मशहूर है, जितना कि १९७५ की "मेरा नाम है मोहब्बत" फिल्म का नाहीद अख्तर के साथ गाया हुआ "ये दुनिया रहे न रहे मेरे हमदम" या फिर १९६७ की "ज़िंदगी कितनी हसीं है" फिल्म का "जब कोई प्यार से बुलाएगा"। फिल्म "दर्द" का "तेरी महफ़िल से ये दीवाना चला जाएगा" तो रूलाने में इतना कामयाब हुआ कि हिन्दुस्तान ने इसे "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" नाम से अपने इमोशन्स, अपनी भावनाओं में शामिल कर लिया।

बंटवारे के बाद अपना गाँव छूटने का दर्द उन्हें हमेशा सालता रहता था। १९७७ में जब वे पहली बार अपने गाँव लूणा आए तो इस कदर भाव-विभोर हो गए कि मिट्टी में लोट-लोट कर रोने लगे। उस समय वे जयपुर आए हुए थे सरकारी मेहमान बनकर। और उन्हीं के कहने पर सारा जत्था लूणा गया था। कहते हैं कि काफ़िला जब एक मंदिर के सामने से गुजर रहा था तो उन्होंने गाड़ी रूकवा दी और मंदिर की सीढियो के नीचे रेत में पलटियाँ खाने लगे। इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं कि उस वक़्त मेहदी साहब का बेटा डर गया कि वालिद साहब को क्या हो गया। बाद में जब मेहदी साहब से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यहीं बैठकर वे भजन गाया करते थे। सालों बाद माँ से बेटा मिले तो आखिर यही होता है।

२००० में खां साहब पैरलाइसिस के शिकार हुए और तब से मौशिकी से दुर हो गए। उनकी आवाज़ चली गई। कई सालों तक उन्होंने कुछ न कहा। एक शख्स हैं..अफज़ल सुभानी ,जो अपने बारे में कहते हैं कि "पाकिस्तान से बाहर का मैं पहला शागिर्द हूं, जिसे मेहदी हसन साहब ने गंडा बांध कर विधिवत शिष्य बनाया था"। मेहदी साहब की आवाज़ जाने के बाद वे हमेशा उनकी खबर लिया करते थे। एक बार जब उन्होंने टेलीफोन किया तो मेहदी साहब ने खुद उठाया और पूरे जोश के साथ घोषणा की कि "मेरी आवाज़ वापस आ गई है।" अफ़ज़ल सुभानी की मानें तो मेहदी साहब को उन्होंने इससे ज्यादा खुश कभी नहीं पाया था। दु:ख है कि यह खुशी ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। 

"अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें"... तुम बिछड़ गए खां साहब हम सबसे... अब तो बस यही दरख्वास्त है कि "रंजिश हीं सही दिल हीं दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ"। जिस शख्स के लिए मन्ना दा ने कहा था कि उनकी एक हीं तमन्ना है कि वे कभी मेहदी हसन की तरह गा सकें, मरहूम जगजीत सिंह जी ने कहा था कि जो ग़ज़ल गाना चाहता है वह पहले मेहदी साहब की तरह शास्त्रीय संगीत में पारंगत हो ले.... आज उस शख्स ने इस दुनिया से अपनी आवाज़ हटा ली है और भेंट कर दी है दूसरी दुनिया को.. जहाँ पहले से हीं कई फ़नकार उनका इंतज़ार कर रहे थे। १३ जून को वह आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई। अल्लाह उनकी रूह को बरकत दे... आमीन!!


फुटनोट

दोस्तों जैसा कि आप वाकिफ हैं कि प्रस्तुत पोडकास्ट को हम किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं पिछले ढेढ दो हफ़्तों से, इन कड़ियों को निरंतर सुनते हुए हमारे नियमित श्रोता दिलीप कवठेकर जो खुद भी एक गायक हैं, अपनी तरफ से मेहदी साहब की एक ग़ज़ल को गाकर हमारे लिए भेजा है, क्यों न उनके इस श्रद्धा पुष्प को भी हम अपनी श्रद्धान्जली का हिस्सा बनायें...लीजिए सुनिए दिलीप जी की आवाज़ में मेहदी साहब की ये गज़ल

Saturday, December 10, 2011

क़दम के निशां बनाते चले...सचिन दा के सुरों में देव आनंद


यह सच है कि कई अन्य संगीतकारों नें भी देव आनन्द के साथ काम किया जैसे कि शंकर जयकिशन, सलिल चौधरी, मदन मोहन, कल्याणजी-आनन्दजी,राहुल देव बर्मन, बप्पी लाहिड़ी और राजेश रोशन, लेकिन सचिन दा के साथ जिन जिन फ़िल्मों में उन्होंने काम किया, उनके गीत कुछ अलग ही बने। आज न बर्मन दादा हमारे बीच हैं और अब देव साहब भी बहुत दूर निकल गए, पर इन दोनों नें साथ-साथ जो क़दमों के निशां छोड़ गए हैं, वो आनेवाली तमाम पीढ़ियों के लिए किसी पाठशाला से कम नहीं।

Saturday, November 12, 2011

बुझ गई है राह से छाँव - डॉ. भूपेन हज़ारिका को 'आवाज़' की श्रद्धांजलि

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 67
बुझ गई है राह से छाँव - भाग ०१

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे आज श्रद्धांजलि उस महान कलाकार को जिनका नाम असमीया गीत-संगीत का पर्याय बन गया है, जिन्होने असम और उत्तरपूर्व के लोक-संगीत को दुनियाभर में फैलाने का अद्वितीय कार्य किया, जिन्होंने हिन्दी फ़िल्म-संगीत में असम की पहाड़ियों, चाय बागानों और वादियों का विशिष्ट संगीत देकर फ़िल्म-संगीत को ख़ास आयाम दिया, जो न केवल एक गायक और संगीतकार थे, बल्कि एक लेखक और फ़िल्मकार भी थे। पिछले शनिवार, ४ नवंबर को ८५ वर्ष की आयु में हमें अलविदा कह कर हमेशा के लिए जब भूपेन हज़ारिका चले गए तो उनका रचा एक गीत मुझे बार बार याद आने लगा..... "समय ओ धीरे चलो, बुझ गई है राह से छाँव, दूर है पी का गाँव, धीरे चलो...." आइए आज के इस विशेषांक में भूपेन दा के जीवन सफ़र के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों पर नज़र डालें।

भूपेन हज़ारिका का जन्म १ मार्च १९२६ को असम के नेफ़ा के पास सदिया नामक स्थान पर हुआ था। पिता संत शंकरदेव के भक्त थे और अपने उपदेश गायन के माध्यम से ही देते थे। बाल भूपेन में भी बचपन से ही संगीत की रुचि जागी और ११ वर्ष की आयु में उनका पहला ग़ैर-फ़िल्मी गीत रेकॉर्ड हुआ। फ़िल्म 'इन्द्र मालती' में उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अभिनय किया और इसी फ़िल्म में अपना पहला फ़िल्मी गीत "विश्व विजय नौजवान" भी गाया। तेजपुर से मैट्रिक और गुवाहाटी से इंटर पास करने के बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया और साथ ही साथ शास्त्रीय संगीत भी सीखते रहे। १९४२ में साम्प्रदायिक एकता पर लिखा उनका एक गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा जो बाद में 'शीराज़' फ़िल्म में भी लिया गया। गुवाहाटी में कुछ दिनों के लिए अध्यापन करने के बाद वो जुड़े आकाशवाणी से और यहीं से छात्रवृत्ति लेकर वो गए अमरीका के कोलम्बिया यूनिवर्सिटी 'मास कम्युनिकेशन' में एम.ए. करने। वहीं फ़िल्म माध्यम का भी गहन अध्ययन किया, रॉबर्ट स्टेन्स और रॉबर्ट फ्लैहर्टी से भी बहुत कुछ सीखा। वापसी में जहाज़ी सफ़र में जगह जगह से लोक-संगीत इकट्ठा करते हुए जब वो भारत पहुँचे तो उनके पास विश्वभर के लोक-संगीत का ख़ज़ाना था।

गुवाहाटी वापस लौट कर फिर एक बार उन्होंने अध्यापन किया, पर जल्दी ही पूर्ण मनोयोग से वो गीत-संगीत-सिनेमा से जुड़ गए। इप्टा (IPTA) के वे सक्रीय सदस्य थे। असम के बिहू, बन गीत और बागानों के लोक संगीत को राष्ट्रीय फ़लक पर स्थापित करने का श्रेय भूपेन दा को ही जाता है। असमीया फ़िल्म 'सती बेहुला' (१९५४) से वो फ़िल्म-संगीतकार बने। उसके बाद 'मनीराम देवान' और 'एरा बाटोर सुर' जैसी फ़िल्मों के गीतों नें चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। उसके बाद उनके लिखे, निर्देशित और संगीतबद्ध 'शकुंतला', 'प्रतिध्वनि' और 'लटिघटि' के लिए उन्हे लगातार तीन बार राष्ट्रपति पदक भी मिला। भूपेन हज़ारिका का व्यक्तित्व उसी समय इतना विराट बन चुका था कि १९६७ में विधान सभा चुनाव उनसे लड़वाया गया और उन्हें जीत भी हासिल हुई। १९६७-७२ तक विधान सभा सदस्य के रूप में उन्होंने असम में पहले स्टुडियो की स्थापना करवाई।

बांगलादेश के जन्म के उपलक्ष्य में भूपेन हज़ारिका की रचित 'जय जय नवजात बांगलादेश' को अपार लोकप्रियता मिली थी। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के दिनों में प्रसिद्ध अमरीकी बीग्रो गायक पॉल रोबसन के मित्र रहे हज़ारिका अश्वेतों के अधिकारों के लिए लड़ाई से बहुत प्रभावित रहे हैं। रोबसन की प्रसिद्ध रचना 'Old man river' से प्रेरणा लेकर हज़ारिका ने ब्रह्मपुत्र पर अपनी यादगार रचना "बूढ़ा लुई तुमि बुआ कियो" (बूढ़े ब्रह्मपुत्र तुम बहते क्यों हो?)। इसी गीत का हिन्दी संस्करण भी आया, जिसमें ब्रह्मपुत्र के स्थान पर गंगा का उल्लेख हुआ। "विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार, करे हाहाकार, निशब्द सदा, ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों?" आइए भूपेन दा की इसी कालजयी रचना को यहाँ पर सुना जाए।

गीत - गंगा बहती हो क्यों (ग़ैर फ़िल्म)


१९६३ में भूपेन दा के संगीत में असमीया फ़िल्म 'मनीराम देवान' में उन्होंने एक गीत रचा व गाया जो उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में दर्ज हुआ। गीत के बोल थे "बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई"। इसी गीत की धुन पर दशकों बाद कल्पना लाजमी की फ़िल्म 'रुदाली' में भूपेन दा नें "दिल हूम हूम करे गरजाए" कम्पोज़ कर इस धुन को असम से निकाल कर विश्व भर में फैला दिया। आइए इन दोनों गीतों को एक के बाद एक सुनें, पहले प्रस्तुत है असमीया संस्करण।

गीत - बुकु हॉम हॉम कॉरे मुर आई (मनीराम देवान - असमीया)


फ़िल्म 'रुदाली' में इस गीत को लता मंगेशकर और भूपेन हज़ारिका, दोनों नें ही अलग अलग गाया था। सुनते हैं भूपेन दा की आवाज़। ख़ास बात देखिये, यह संगीत है असम का, पर 'रुदाली' फ़िल्म का पार्श्व था राजस्थान। तो किस तरह से पूर्व और पश्चिम को भूपेन दा नें एकाकार कर दिया इस गीत में, ताज्जुब होती है! कोई और संगीतकार होता तो राजस्थानी लोक-संगीत का इस्तेमाल किया होता, पर भूपेन दा नें ऐसा नहीं किया। यही उनकी खासियत थी कि कभी उन्होंने अपने जड़ों को नहीं छोड़ा।

गीत - दिल हूम हूम करे घबराए (रुदाली)


हिन्दी फ़िल्म जगत में भूपेन हज़ारिका के संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी १९७४ की 'आरोप'। दोस्तों, आपको याद होगा अभी हाल ही में 'पुरवाई' शृंखला में हमने दो गीत भूपेन दा के सुनवाये थे, जिनमें एक 'आरोप' का भी था "जब से तूने बंसी बजाई रे..."। इसी फ़िल्म में उन्होंने लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया युगल गीत "नैनों में दर्पण है, दर्पण में कोई देखूँ जिसे सुबह शाम" ख़ूब ख़ूब चला था। भूपेन दा के संगीत की खासियत रही है कि उन्होंने न केवल असम के संगीत का बार बार प्रयोग किया, बल्कि उनका संगीत हमेशा कोमल रहा, जिन्हें सुन कर मन को सुकून मिलती है। आइए फ़िल्म 'आरोप' के इस युगल गीत को सुना जाये, पर उससे पहले लता जी की भूपेन दा को श्रद्धांजलि ट्विटर के माध्यम से... "भूपेन हज़ारिका जी, एक बहुत ही गुणी कलाकार थे, वो बहुत अच्छे संगीतकार और गायक तो थे ही, पर साथ-साथ बहुत अच्छे कवि और फ़िल्म डिरेक्टर भी थे। उनकी असमीया फ़िल्म (एरा बाटोर सुर) में मुझे गाने का मौका मिला यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। ऐसा महान कलाकार अब हमारे बीच नहीं रहा इसका मुझे बहुत दुख है, ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।"

गीत - नैनों में दर्पण है (आरोप)


भूपेन हज़ारिका से संबंधित कुछ और जानकारी हम अगले सप्ताह के अंक में जारी रखेंगे। भूपेन दा को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आज की यह प्रस्तुति हम यहीं समाप्त करते हैं, नमस्कार!

Sunday, October 30, 2011

नज़रे करम फरमाओ...जगजीत सिंह के बेमिसाल मगर कमचर्चित शास्त्रीय गायन की एक झलक

सुर संगम- 41 – गायक जगजीत सिंह की संगीत-साधना को नमन


‘ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी गीत-संगीत प्रेमियों का, मैं कृष्णमोहन मिश्र आज ‘सुर संगम’ के नए अंक में स्वागत करता हूँ। पिछले दिनों १० अक्तूबर को विख्यात गीत, ग़ज़ल, भजन और लोक संगीत के गायक और साधक जगजीत सिंह के मखमली स्वर मौन हो गए। सुगम संगीत के इन सभी क्षेत्रों में जगजीत सिंह न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में बल्कि पूरे विश्व में लोकप्रिय थे। ‘सुर संगम’ के आज के अंक में हम भारतीय संगीत में उनके प्रयोगधर्मी कार्यों पर चर्चा करेंगे।

जगजीत सिंह का जन्म ८ फरवरी, १९४१ को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी सरकारी कर्मचारी थे। जगजीत सिंह का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गाँव का रहने वाला है। उनकी प्रारम्म्भिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में माध्यमिक शिक्षा के लिए जालन्धर आ गए। डी.ए.वी. कॉलेज से स्नातक की और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की।

जगजीत सिंह को बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला था। गंगानगर मे ही पण्डित छगनलाल शर्मा से दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखा। बाद में सेनिया घराने के उस्ताद जमाल खाँ से ख्याल, ठुमरी और ध्रुवपद की बारीकियाँ सीखीं। आगे चल कर उन्होने ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में कुछ नये प्रयोग कर संगीत की इसी विधा में आशातीत सफलता प्राप्त की, परन्तु जब भी उन्हें अवसर मिला, अपनी रागदारी संगीत शिक्षा को अनेक संगीत सभाओं में प्रकट किया। जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत किये गए अधिकतर ग़ज़लों, गीतों और भजनों में रागों का स्पर्श स्पष्ट परिलक्षित होता है। राग दरबारी और भैरवी उनके प्रिय राग थे। आइए, आपको सुनवाते हैं, जगजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी का तराना, जिसे उन्होने अपनी कई सभाओं में प्रस्तुत किया था।

जगजीत सिंह : तराना : राग – भैरवी : ताल – तीनताल


द्रुत तीनताल में प्रस्तुत इस तराना में जगजीत सिंह की लयकारी का कौशल सराहनीय है। अतिद्रुत लय में तबले के साथ युगलबन्दी का प्रदर्शन कर उन्होने रागदारी संगीत के प्रति अपनी अभिरुचि को प्रकट किया है। जगजीत सिंह १९५५ में मुम्बई आ गए। यहाँ से उनके संघर्ष का दौर आरम्भ हुआ। मुम्बई में रहते हुए विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर, वैवाहिक समारोह अथवा अन्य मांगलिक अवसरों पर गीत-ग़ज़लें गाकर अपना गुजर करते रहे। उन दिनों देश के स्वतंत्र होने के बावजूद ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में दरबारी परम्परा कायम थी। संगीत की यह विधा रईसों, जमींदारों और अरबी-फारसी से युक्त क्लिष्ट उर्दू के बुद्धिजीवियों के बीच ही प्रचलित थी। जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को इस दरबारी परम्परा से निकाल कर जनसामान्य के बीच लोकप्रिय करने का प्रयत्न किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि उन्हें अपने इस प्रयास में आशातीत सफलता मिली।
उस दौर में ग़ज़ल गायकी के क्षेत्र में नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेग़म अख्तर, तलत महमूद और मेंहदी हसन जैसे दिग्गजॉ के प्रयत्नों से ग़ज़ल, अरबी और फारसी के दायरे से निकल कर उर्दू के साथ नये अंदाज़ में सामने आने को बेताब थी। ऐसे में जगजीत सिंह, अपनी रेशमी आवाज़, रागदारी संगीत का प्रारम्भिक प्रशिक्षण तथा संगति वाद्यों में क्रान्तिकारी बदलाव कर इस अभियान के अगुआ बन गए। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर जगजीत सिंह के स्वर में सुनते हैं- राग दरबारी, द्रुत एकताल में निबद्ध एक छोटा खयाल।

जगजीत सिंह : खयाल- “नजरे करम फरमाओ...” : राग – दरबारी : ताल – द्रुत एकताल


जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब सरल और सहज अन्दाज़ में गाना आरम्भ किया तो जनसामान्य की अभिरुचि ग़ज़लों की ओर बढ़ी। उन्होने हुस्न और इश्क़ से युक्त पारम्परिक ग़ज़लों के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम आदमी की ज़िंदगी को भी अपने सुरों से सजाया। जैसे- ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूँ..’, ‘मैं रोया परदेश में...’, ‘ये दौलत भी ले लो...’, ‘माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...’ जैसी रचनाओं में आम आदमी को अपने जीवन का यथार्थ नज़र आया। पुरानी ग़ज़ल गायकी शैली में केवल सारंगी और तबले की संगति का चलन था, किन्तु जगजीत सिंह ने सारंगी का स्थान पर वायलिन को अपनाया। उन्होने संगति वाद्यों में गिटार और सन्तूर आदि वाद्यों को भी जोड़ा। ग़ज़ल को जनरुचि का हिस्सा बनाने के बाद १९८१ में उन्होने फिल्म ‘प्रेमगीत’ से अपने फिल्मी गायन का सफर शुरू किया। इस फिल्म का गीत-‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो...’ वास्तव में एक अमर गीत सिद्ध हुआ।

१९९० में एक सड़क दुर्घटना में जगजीत सिंह के इकलौते पुत्र विवेक का निधन हो गया। इस रिक्तता की पूर्ति के लिए उन्होने अपनी संगीत-साधना को ही माध्यम बनाया और आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गए। इस दौर में उन्होने अनेक भक्त कवियों के पदों सहित गुरुवाणी को अपनी वाणी दी। आइए इस अंक को विराम देने से पहले जगजीत सिंह के स्वरों में उपशास्त्रीय रचनाओं से भी साक्षात्कार कराते हैं। यह हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि भैरवी उनका सर्वप्रिय राग था। आपको सुनवाने के लिए हमने चुना है, जगजीत सिंह की आवाज़ में दो ठुमरी रचनाएँ। एक मंच प्रदर्शन के दौरान उन्होने पहले भैरवी के स्वरों में थोड़ा आलाप किया, फिर बिना ताल के नवाब वाजिद आली शाह की रचना- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...’ और फिर तीनताल में निबद्ध पारम्परिक ठुमरी भैरवी- ‘बाजूबन्द खुल-खुल जाए...’ प्रस्तुत किया है। अन्त में उन्होने तीनताल में निबद्ध तराना का एक अंश भी प्रस्तुत किया है। आइए सुनते हैं, जगजीत सिंह की विलक्षण प्रतिभा का एक उदाहरण।

जगजीत सिंह : ठुमरी और तराना : राग – भैरवी


आज के इस अंक को विराम देने से पहले हम “हिंदयुग्म” परिवार और समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से सुगम संगीत के युग-पुरुष जगजीत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और संगीत-कलासाधक के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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