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Monday, July 11, 2011

ठाढ़े रहियो ओ बाँके यार...लोक-रस से अभिसिंचित ठुमरी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 697/2011/137

'ओल्ड इज गोल्ड' पर जारी श्रृंखला 'रस के भरे तोरे नैन' की सत्रहवीं कड़ी में समस्त ठुमरी-रसिकों का स्वागत है| श्रृंखला के समापन सप्ताह में हम 70 के दशक की फिल्मों में शामिल ठुमरियों से और वर्तमान में सक्रिय कुछ वरिष्ठ ठुमरी गायक-गायिकाओं से आपका परिचय करा रहे हैं| कल के अंक में हमने पूरब अंग की ठुमरियों की सुप्रसिद्ध गायिका सविता देवी और उनकी माँ सिद्धेश्वरी देवी से आपका परिचय कराया था| आज के अंक में हम विदुषी गिरिजा देवी से आपका परिचय करा रहे हैं|

गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को कला और संस्कृति की नगरी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था| पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत-प्रेमी थे| उन्होंने पाँच वर्ष की आयु में ही गिरिजा देवी के संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी| गिरिजा देवी के प्रारम्भिक संगीत-गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे| नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ किया| नौ वर्ष की आयु में ही एक हिन्दी फिल्म "याद रहे" में गिरिजा देवी ने अभिनय भी किया था| गिरिजा देवी का विवाह 1946 में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था| उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था| परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कोई रोक पाया है| 1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया| यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूटी थीं| संगीत के क्षेत्र में पण्डित विष्णु नारायण भातखंडे और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता से पहले ही भारतीय संगीत को जन-जन में प्रतिष्ठित करने का जो आन्दोलन छेड़ रखा था, उसका सार्थक परिणाम स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद तेजी से नज़र आने लगा था|

गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा होगा| 1949 में आकाशवाणी से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया| इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई वह आज तक जारी है| गिरिजा देवी ने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यों में भी अपना योगदान किया| 80 के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च एकेडमी ने आमंत्रित किया| यहाँ रह कर उन्होंने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये बल्कि शोध कार्य भी कराए| इसी प्रकार 90 के दशक में गिरिजा देवी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक छात्र-छात्राओं को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी| आज भी 82 वर्ष की आयु में वे सक्रिय हैं| गिरिजा देवी को 1972 में "पद्मश्री", 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1989 में "पद्मभूषण" और 2010 में संगीत नाटक अकादमी का फेलोशिप जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किये गए| गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतंत्रता-पूर्व काल की पूरब अंग की बोल-बनाव ठुमरियों की विशेषज्ञ और संवाहिका हैं| आधुनिक उपशास्त्रीय संगीत के भण्डार को उन्होंने समृद्ध किया है|

विदुषी गिरिजा देवी का अभिनन्दन और उनके स्वस्थ-शतायु जीवन की कामना करते हुए अब हम आते हैं आज सुनाई जाने वाली ठुमरी की चर्चा पर| जिस प्रकार विदुषी गिरिजा देवी संगीत के दो युगों का प्रतिनिधित्व करतीं हैं उसी प्रकार आज की ठुमरी फिल्म-संगीत-इतिहास के दो दशकों का प्रतिनिधित्व कर रही है| 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में फिल्म "पाकीजा" के निर्माण की योजना बनी थी| फिल्म-निर्माण प्रक्रिया में इतना अधिक समय लग गया कि दो संगीतकारों को फिल्म का संगीत तैयार करना पड़ा| 1972 में प्रदर्शित "पाकीजा" के संगीत के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने शास्त्रीय रागों का आधार लेकर एक से एक गीतों की रचना की थी| इन्हीं में से एक राग "माँड" में निबद्ध ठुमरी -"ठाढ़े रहियो ओ बाँके यार रे..." थी| आज की शाम हम इसी ठुमरी का उपहार आपको दे रहे हैं| यह परम्परागत ठुमरी नहीं है, इसकी रचना मजरुह सुल्तानपुरी ने की है| परन्तु भावों की चाशनी से पगे शब्दों का कसाव इतना आकर्षक है कि परम्परागत ठुमरी का भ्रम होने लगता है| राजस्थान की प्रचलित लोकधुन से विकसित होकर एक मुकम्मल राग का दर्जा पाने वाले राग "माँड" में निबद्ध होने के कारण नायिका के मन की तड़प का भाव मुखर होता है| ठुमरी में तबले पर दादरा और तीनताल का अत्यन्त आकर्षक प्रयोग किया गया है| गुलाम मोहम्मद ने इस ठुमरी के साथ-साथ चार-पाँच अन्य गीत अपने जीवनकाल में ही रिकार्ड करा लिया था| इसी दौरान वह ह्रदय रोग से पीड़ित हो गए थे| उनके अनुरोध पर फिल्म के दो गीत -"यूँही कोई मिल गया था..." और -"चलो दिलदार चलो..." संगीतकार नौशाद ने रिकार्ड किया| फिल्म "पाकीज़ा" के निर्माण के दौरान ही गुलाम मोहम्मद ने 18 मार्च, 1968 को इस दुनिया से विदा ले लिया| उनके निधन के बाद फिल्म का पार्श्वसंगीत तथा परवीन सुल्ताना, राजकुमारी और वाणी जयराम कि आवाज़ में कुछ गीत नौशाद ने फिल्म में जोड़े| इस कारण गुलाम मोहम्मद के स्वरबद्ध किये कई आकर्षक गीत फिल्म में शामिल नहीं किये जा सके| फिल्म में शामिल नहीं किये गए गीतों को रिकार्ड कम्पनी एच.एम्.वी. ने बाद में "पाकीज़ा रंग विरंगी" शीर्षक से जारी किया था| अन्ततः यह महत्वाकांक्षी फिल्म गुलाम मोहम्मद के निधन के लगभग चार वर्ष बाद प्रदर्शित हुई थी| संगीत इस फिल्म का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष सिद्ध हुआ, किन्तु इसके सर्जक इस सफलता को देखने के लिए हमारे बीच नहीं थे| आइए फिल्म "पाकीज़ा" की ठुमरी -"ठाढ़े रहियो ओ बाँके यार..." में गुलाम मोहम्मद द्वारा की गई सुरों और तालों की नक्काशी की सराहना हम सब करते हैं|



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "पाकीज़ा" में गुलाम मोहम्मद ने लता मंगेशकर की आवाज़ में राग पहाडी पर आधारित एकल गीत -"चलो दिलदार चलो..." रिकार्ड किया था, परन्तु फिल्म में इसी गीत को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के युगल स्वरों में नौशाद ने रिकार्ड कर शामिल किया था| एकल गीत में जो प्रवाह और स्वाभाविकता है, वह युगल गीत में नहीं है|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 18/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - पारंपरिक ठुमरी है (ध्यान दीजियेगा आज हर सवाल पर एक बोनस अंक है)
सवाल १ - इस ठुमरी पर किस नृत्यांगना के कदम थिरके हैं - ४ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - राग बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी अवनीश जी और क्षिति जी को बहुत बधाई, इंदु जी अवध जी का भी आभार

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 9, 2011

नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने...ग़ालिब का कलाम और सुर्रैया की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 589/2010/289

"आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक"। मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर के बाद हम सुरैया के लिये भी यही कह सकते हैं कि उनकी गायकी, उनके अभिनय में वो जादू था कि जिसका असर एक उम्र नहीं, बल्कि कई कई उम्र तक होता रहेगा। 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा', सिंगिंग् स्टार सुरैया को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस लघु शृंखला की आज नवी कड़ी में सुनिए १९५४ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' की एक अन्य ग़ज़ल "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये ना बने"। ग़ालिब के इन ग़ज़लों को सुरों में ढाला था संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद ने। इस फ़िल्म का निर्देशन सोहराब मोदी ने किया था। ग़ालिब की ज़िंदगी पर आधारित इस फ़िल्म को बहुत तारीफ़ें नसीब हुए। ग़ालिब की भूमिका में नज़र आये थे भारत भूषण और सुरैया बनीं थीं चौधवीं, उनकी प्रेमिका, जो एक वेश्या थीं। फ़िल्म के अन्य कलाकारों में शामिल थे निगार सुल्ताना, दुर्गा खोटे, मुराद, मुकरी, उल्हास, कुमकुम और इफ़्तेखार। इस फ़िल्म को १९५५ में राष्ट्रीय पुरस्कार के तहत स्वर्ण-कमल से पुरस्कृत किया गया था। सोहराब मोदी और संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे। फ़िल्मफ़ेयर में रुसी के. बंकर को सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए पुरस्कृत किया गया था। १९५४ में सुरैया की बाकी फ़िल्में आयीं 'वारिस', 'शमा परवाना' और 'बिलवामंगल'। इसके बाद सुरैया ने जिन फ़िल्मों में काम किया उनकी फ़ेहरिस्त इस प्रकार है:
१९५५ - ईनाम
१९५६ - मिस्टर लम्बू
१९५८ - तक़दीर, ट्रॊली ड्राइवर, मालिक
१९६१ - शमा
१९६३ - रुस्तोम सोहराब
१९६४ में सुरैया ने फ़िल्म 'शगुन' का निर्माण किया, १९६५ में फ़िल्म 'दो दिल' में केवल गीत गाये, और यही उनकी अंतिम फ़िल्म थी। उसके बाद सुरैया ने अपने आप को इस फ़िल्म जगत से किनारा कर लिया और गुमनामी में रहने लगीं। वो ना किसी सार्वजनिक जल्से में जातीं, ना ही ज़्यादा लोगों से मिलती जुलतीं। उनके इस पड़ाव का हाल आपको हम कल की कड़ी में बताएँगे।

सुरैया को फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में अभिनय करने का गर्व था। जब वो विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में तशरीफ़ लायी थीं, उन्होंने आज की इस प्रस्तुत ग़ज़ल को पेश करते हुए कुछ इस तरह से कहा था - "ज़िंदगी में कुछ मौके ऐसे आते हैं जिनपे इंसान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िंदगी में भी एक मौका ऐसा आया था जब फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को प्रेसिडेण्ट अवार्ड मिला और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ, जहाँ हमने पंडित नेहरु के साथ बैठकर यह फ़िल्म देखी थी। पंडित नेहरु हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली ना समाती। इस वक़्त पंडितजी की याद के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश करती हूँ, नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये ना बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये ना बने।"



क्या आप जानते हैं...
कि सुरैया ने कोई बसियत नहीं बनवाई थी, इसलिए उनकी मृत्यु के तुरंत बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनकी जायदाद सील कर दी और दावेदार के लिए अर्ज़ी आमंत्रित की।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
भाई ये तो हम कहीं पहुँचते हुए नज़र नहीं आ रहे...मुकाबला एकदम बराबरी का है....आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी है...देखते हैं :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 8, 2011

धडकते दिल की तम्मना हो मेरा प्यार हो तुम....कितने कम हुए है इतने मासूम और मुकम्मल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 588/2010/288

सुरैया के गाये सुमधुर गीतों से सजी लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' की आठवीं कड़ी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सभी हम हार्दिक स्वागत करते हैं। आज की कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है वह ना केवल सुरैया जी के संगीत सफ़र का एक अहम अध्याय रहा है, बल्कि इस गीत के संगीतकार के लिए भी एक मीलस्तंभ गीत सिद्ध हुआ था। ये कमचर्चित और अण्डर-रेटेड म्युज़िक डिरेक्टर थे ग़ुलाम मोहम्मद। १९६१ की फ़िल्म 'शमा' का बेहद मशहूर और ख़ूबसूरत गीत "धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम, मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम"। गीत नहीं, बल्कि ग़ज़ल कहें तो बेहतर होगा। कैफ़ी आज़्मी साहब ने क्या ख़ूब लफ़्ज़ पिरोये हैं इस ग़ज़ल में। ग़ुलाम मोहम्मद की तरह क़ैफ़ी साहब भी अण्डर-रेटेड रहे हैं, और उनकी लेखन प्रतिभा का फ़िल्म जगत उस हद तक लाभ नहीं उठा सका जितना उठा सकता था। आगे बढ़ने से पहले आइए इस ग़ज़ल के बाक़ी के शेर यहाँ लिखें...

धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम,
मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम।

खिलाओ फूल किसी के किसी चमन में रहो,
जो दिल की राह से गुज़री है वो बहार हो तुम।

ज़ह-ए-नसीब अता कि जो दर्द की सौग़ात,
वो ग़म हसीन है जिस ग़म के ज़िम्मेदार हो तुम।

चढ़ाऊँ फूल या आँसू तुम्हारे क़दमों में,
मेरी वफ़ाओं की उल्फ़त की यादगार हो तुम।

जितने सुंदर बोल, उतनी ही प्यारी धुन, और उतनी ही सुरीली आवाज़, कुल मिलाकर फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक अनमोल नगीना है यह ग़ज़ल। ग़ुलाम मोहम्मद की बात करें तो १९२४ में वे बम्बई आये थे और ८ सालों तक संघर्ष करने के बाद उन्हें सरोज मूवीटोन में बतौर तबला वादक नियुक्ति मिली थी। उसके बाद अनिल बिस्वास और नौशाद के सहायक और वादक के रूप में काम किया। नौशाद साहब के साथ उनकी युनिंग् ख़ूब जमी और नौशाद साहब की रचनाओं में ढोलक और तबले के ठेकों का जो रंग निखर कर आता था, वो ग़ुलाम मोहम्मद साहब की ही देन थी। फ़िल्म 'आन' के बाद ग़ुलाम मोहम्मद एक स्वतंत्र संगीतकार बन गये। 'हूर-ए-अरब', 'पगड़ी', 'पारस', और 'परदेस' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। जहाँ तक ग़ुलाम मोहम्मद और सुरैया के साथ की बात है, १९४९ की फ़िल्म 'शायर' में एक उल्लेखनीय गीत था सुरैया का गाया हुआ "हमें तुम भूल बैठे हो, तुम्हें हम याद करते हैं"। उस ज़माने में ग़ुलाम साहब ज़्यादातर लता और शम्शाद बेगम को गवा रहे थे। १९५३ में 'दिल-ए-नादान' फ़िल्म से ग़ुलाम मोहम्मद ग़ज़लनुमा गीतों में भी महारथ हासिल कर ली, जिसकी परछाई अगले ही साल 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में दिखाई दी। आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा और जगजीत कौर को भी गवा लेने के बाद 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में सुरैया के साथ उनका उत्कृष्ट काम हुआ। फिर आगे चलकर १९५८ की फ़िल्म 'मालिक' में "मन धीरे धीरे गाये रे मालूम नहीं कौन" एक सदाबहार सुरैया-तलत डुएट रहा है। और इसके बाद १९६१ की फ़िल्म 'शमा' के गानें तो हैं ही। यानी कि कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भले ग़ुलाम मोहम्मद ने सुरैया को ज़्यादा नहीं गवाया, या युं कहें कि ज़्यादा गवाने का अवसर उन्हें नहीं मिला, लेकिन इस जोड़ी का स्कोर १००% रहा है। जितना भी काम हुआ उत्कृष्ट ही हुआ। तो आइए इस जोड़ी के नाम आज की यह शाम करते हुए फ़िल्म 'शमा' की यह सदाबहार ग़ज़ल सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि मुशायरे के रूप में ढाल कर उर्दू शायरी को ग़ुलाम मोहम्मद ने एक और फ़िल्म 'पाक दमन' (१९५७) में संगीत से सजाया था और रफ़ी, चाँदबाला, मुबारक़ बेगम और शक़ील बदायूनी की आवाज़ों का इस्तेमाल किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह क्या बात है....फिर एक बार वही कहानी, अमित जी २ अंकों से आगे जरूर हैं, पर अंजाना जी जिस तरह की टक्कर उन्हें दे रहे हैं कमाल है...विजय जी और इंदु जी धन्येवाद

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, November 3, 2009

मौसम है आशिकाना, ये दिल कहीं से उनको ऐसे में ढूंढ लाना...आईये सज गयी है महफिल ओल्ड इस गोल्ड की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 251

दोस्तों, शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' जी के बाद एक लम्बे इंतेज़ार के बाद हमें मिली हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड पहेली प्रतियोगिता' के तीसरे विजेयता के रूप में पूर्वी जी। और आज से अगले पाँच दिनों तक हम सुनने जा रहे हैं पूर्वी जी के पसंद के पाँच सदाबहार नग़में। पूर्वी जी ने हमें कुल दस गानें चुन कर भेजे थे, जिनमें से हमने पाँच ऐसे गीतों को चुना है जिनकी फ़िल्मों का कोई भी गीत अब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर नहीं बजा है। हमें पूरी उम्मीद है कि पूर्वी जी के पसंद ये गानें आप सभी बेहद एन्जॉय करेंगे, क्योंकि उनका भेजा हुआ हर एक गीत है गुज़रे ज़माने का सदाबहार नग़मा, जिन पर वक़्त का कोई भी असर नहीं चल पाया है। शुरुआत कर रहे हैं लता मंगेशकर के गाए फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के गीत "मौसम है आशिक़ाना" से। वैसे तो 'पाक़ीज़ा' फ़िल्म का कोई भी गीत ताज़े हवा के झोंके की तरह है जो इतने सालों के बाद भी वही ताज़गी, वही ख़ुशबू लिए हुए है। इन मीठे धुनों को साज़ों से निकालकर फ़ज़ाओं में बिखेरने वाले जादूगर का नाम है ग़ुलाम मोहम्मद। जी हाँ, यह बहुत ही अफ़सोस की बात है कि ग़ुलाम साहब अपने करीयर की इस सब से महत्वपूर्ण फ़िल्म की ज़बरदस्त कामयाबी को देखे बग़ैर ही इस दुनिया से चले गए। हिंदी फ़िल्मी गीतों में मटके का प्रयोग शुरु करने वाले दो संगीतकारों में दो नाम मशहूर हैं। इनमें से एक तो थे श्याम सुंदर और दूसरे ग़ुलाम मोहम्मद। ग़ुलाम साहब की म्युज़िकल हिट फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के संगीत को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार ग़ुलाम मोहम्मद की प्रतिभा का ही सम्मान था। इस सम्मन ने यह साबित किया था कि भले ही वो कमचर्चित संगीतकार हों, लेकिन प्रतिभा और उत्कृष्ट संगीत देने की दृष्टि से वो किसी से भी कम नहीं। फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के बनने में इतने ज़्यादा समय लग गए (करीब १४ साल) कि ग़ुलाम साहब के देहान्त के बाद नौशाद साहब ने फ़िल्म का संगीत पूरा किया और फ़िल्म के 'बैकग्राउंड म्युज़िक' भी तैयार किए। यह एक तरह से नौशाद साहब की श्रद्धांजली थी अपने उस साथी के लिए जिन्होने उनकी तमाम फ़िल्मों में उनके सहायक और वादक रहे। आपको यह भी बता दें कि ग़ुलाम मोहम्मद की तरह फ़िल्म के सिनेमाटोग्राफर जोसेफ़ विर्स्चिंग् का भी फ़िल्म के पूरे होते होते निधन हो गया था। इस फ़िल्म से जुड़ी कुछ और दिलचस्प और दर्द भरी बातें हम आपको फिर कभी बताएँगे, अभी तो इस फ़िल्म के और भी गानें बजने हैं इस महफ़िल में।

१९७२ की फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' कमाल अमरोही की महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म को हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फ़िल्मों में गिना जाता है। यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसके ज़िक्र के बग़ैर कमाल अमरोही, ग़ुलाम मोहम्मद और अदाकारा मीना कुमारी की कोई भी चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। अशोक कुमार, राज कुमार और नादिरा फ़िल्म के महत्वपूर्ण किरदारों में थे। फ़िल्म की कहानी, संवाद, स्क्रीनप्ले, इत्यादि जितने सशक्त थे, उतना ही सुरीला था फ़िल्म का संगीत। इस फ़िल्म की सफलता के पीछे इसके संगीत का भी पूरा पूरा हाथ रहा। इस फ़िल्म में कई गीतकारों ने गीत लिखे, जैसे कि कैफ़ी आज़्मी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ भोपाली, और ख़ुद कमाल अमरोही साहब भी। आज का प्रस्तुत गीत कमाल साहब का लिखा हुआ है। कमाल साहब आम बोलचाल में भी बड़े ही अदबी भाषा का प्रयोग किया करते थे। जिस तरह का उर्दू अमरोहा में उस ज़माने में बोला जाता था, वैसी बोली बोलते थे, जिसकी वजह से कभी कभी सामने वाला हक्का बक्का रह जाता था। कुछ ऐसी ही हालात से गुज़रे थे हमारे निदा फ़ाज़्ली साहब जब वो फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के गानें लिखने के लिए उनके पास गए थे। कमाल अमरोही साहब ने प्रस्तुत गीत में नायिका के दर्द का इज़हार किया है। कभी उन्होने पलकों का शामियाना बिछाया है तो कभी सावन के महीने को क़ातिलाना क़रार दिया है, और कभी जुगनुओं को ज़मीं पर उतरे हुए सितारे कहे हैं। यह गीत फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक उत्कृष्टतम गीत है, जिसकी तारीफ़ शब्दों में संभव नहीं। पूर्वी जी, हम आपकी पसंद की दाद देते हैं। भई वाह! क्या गाना चुना है आपने!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत के संगीतकार की ये पहली फिल्म थी.
२. आर के फिल्म्स की इस फिल्म में निर्देशन राज कपूर का नहीं था.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"भूख".

पिछली पहेली का परिणाम -

दिलीप जी ८ अंकों के लिए बधाई. अवध जी आपने सही कहा. शरद जी इन दोनों गीतों में अक्सर ये भूल हो जाती है :) राज जी हमें पता था की ये आपका सबसे पसंदीदा गीत है, तभी तो सुनवाया :)वैसे किसी ने भी बोनस अंकों के लिए नहीं खेला, जानकारी के लिए बता दें एस डी बर्मन के संगीत निर्देशन में बने गीत सबसे अधिक बजे हैं ओल्ड इस गोल्ड में.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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