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Sunday, May 7, 2017

राग भैरव : SWARGOSHTHI – 316 : RAG BHAIRAV




स्वरगोष्ठी – 316 में आज


संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 2 : राग भैरव में लोरी


राग भैरव में निबद्ध प्रभा अत्रे से शिव-स्तुति और लता मंगेशकर से लोरी सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की नई श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के घर में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हमने 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘संस्कार’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग भैरव के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही इसी राग की एक रचना सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका डॉ. प्रभा अत्रे के स्वरों में हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
र्ष 1949 में रोशन के संगीत निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘नेकी और बदी’ प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्मकार केदार शर्मा द्वारा निर्मित यह फिल्म व्यावसायिक दृष्टि से असफल थी। किन्तु अगले वर्ष प्रदर्शित केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बावरे नैन’ के गीतों ने खूब सफलता अर्जित की। इस फिल्म के संगीत ने रोशन को फिल्म जगत में स्थापित कर दिया। वर्ष 1951 में रोशन के संगीत से सजी तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थी। केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बेदर्दी’ में एक बार फिर मुकेश के लुभावने गीत थे। इसी फिल्म में रोशन ने अभिनेत्री निम्मी से भी एक गीत –“ननदिया जाने ना दर्द...” गवाया था। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘हमलोग’ थी। इस फिल्म में भी मुकेश की आवाज़ थी। फिल्म में मुकेश के अलावा लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और दुर्रानी की आवाज़ों में आकर्षक गीत थे। इसी वर्ष रोशन के संगीत निर्देशन में मुकेश द्वारा निर्मित फिल्म ‘मल्हार’ भी प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के गीतों में रोशन ने रागों का सुखद स्पर्श दिया था। इसी फिल्म से राग ‘गौड़ मल्हार’ पर आधारित गीत पर हम पिछले अंक में चर्चा कर चुके है। अगले वर्ष अर्थात 1952 में रोशन की पाँच फिल्में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म ‘अनहोनी’ ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म थी, जिसमे राज कपूर ने अभिनय किया था। इस फिल्म में रोशन ने राज कपूर के लिए तलत महमूद की आवाज़ का चयन किया और सफल भी हुए। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘संस्कार’ थी। इस फिल्म में भी तलत महमूद के गाये गीत थे। फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र थे, जिन्होने एक से बढ़ कर एक गीतों की रचना की थी। इन गीतों में रोशन के संगीत में भी भरपूर रचनात्मकता के दर्शन होते हैं। सितार, बाँसुरी और सारंगी के अभिनव प्रयोग से इन गीतों को सजाया गया था। अपने संगीत शिक्षा काल में इसराज रोशन का प्रिय वाद्य रहा। गज से बजने वाले एक प्रमुख वाद्य सारंगी की शिक्षा उन्होने उस्ताद बुन्दु खाँ से प्राप्त की थी। इसीलिए उनके गीतों में सारंगी का सार्थक प्रयोग मिलता है। फिल्म ‘संस्कार’ में रोशन ने तलत महमूद की आवाज़ में एक खूबसूरत गजल –“मुहब्बत के झूठे सहारों ने लूटा...” भी स्वरबद्ध किया था। फिल्म में लता मंगेशकर ने भी उल्लेखनीय गीत गाये थे, जिनमें –“दो नैनों ने जाल बिछाया...”, -“दो नैना उलझ गए...” तथा –“हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” काफी लोकप्रिय हुए थे। लता मंगेशकर की आवाज़ में गायी लोरी –हँसे टिम टिम...” में राग भैरव का स्पर्श है। हमारा आज का यही गीत है। पहले आप रोशन का स्वरबद्ध किया गया फिल्म ‘संस्कार’ से राग भैरव पर आधारित गीत सुनिए। शैलेन्द्र के गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।

राग भैरव : “हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – संस्कार


राग भैरव भारतीय संगीत का एक प्राचीन राग है। यह इसी नाम से प्रचलित थाट भैरव से सम्बद्ध माना जाता है। अर्थात राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग होता है। आश्रय राग उसे कहते हैं जब किसी थाट का नामकरण किसी प्रचलित राग के नाम के अनुसार किया गया हो। इस दृष्टि से राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग कहलाता है। राग भैरव में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। विद्वानों ने इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल के सन्धिप्रकाश बेला को माना है। इस नियम के अनुसार राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल 4 से सात बजे के बीच किया जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वरों पर आन्दोलन किया जाता है। अब हम आपको इसी राग में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना सुनवाते हैं।

डॉ.प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर ‘सरगम’ विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल और एकताल में निबद्ध है।

राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिव शंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 316वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 13 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 318वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 313वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको लगभग 66 वर्ष पूर्व की फिल्म ‘मल्हार’ के एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग भैरव पर आधारित रोशन के एक गीत और राग भैरव की की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, September 15, 2013

स्वरगोष्ठी – 137 में आज : ‘मन रे हरि के गुण गा...’


 
स्वरगोष्ठी – 137 में आज

रागों में भक्तिरस – 5

ध्रुवपद अंग में राग भैरव का रंग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे राग भैरव पर चर्चा करेंगे जो भक्तिरस की सृष्टि करने में सबसे उपयुक्त राग है। भारतीय संगीत के इस प्राचीनतम राग में आज हम आपको एक ध्रुवपद रचना सुनवाएँगे। साथ ही इस राग पर आधारित, 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से एक मधुर भक्तिगीत प्रस्तुत करेंगे। 


स श्रृंखला के पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान भारतीय संगीत की परम्परा वैदिक काल से जुड़ी है। उस काल के उपलब्ध प्रमाणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन संगीत का स्वरूप धर्म और आध्यात्म से प्रभावित था। वैदिक युग के बाद भारतीय संगीत का अगला पड़ाव पौराणिक युग में होता है। इस युग में जनसामान्य का झुकाव शास्त्रगत संगीत की अपेक्षा लोक-गीत और नृत्य की ओर अधिक हुआ। इस प्रवृत्ति को और अधिक स्पष्ट करते हुए हैलीन कॉफमैन ने ‘दी म्यूजिक ऑफ आर्य’ नामक पुस्तक में लिखा है कि पौराणिक युग में लोक-गीत और लोक-नृत्यों का सर्वाधिक विकास हुआ था। इन विधाओं में स्थानीय रुचियों का पूरा ध्यान रखा जाता था। इस युग में लिखे ‘हरिवंश पुराण’ में नृत्य और मार्कण्डेय पुराण, वायु पुराण तथा वृहद्धर्म पुराण में वाद्य संगीत का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य में उल्लेख है कि इस युग में वीणा का सर्वाधिक प्रचार हुआ। वीणा के विविध प्रकार- परिवादिनी, विपंची, बल्लकी, महती, नकुली, कच्छपी आदि लोकप्रिय थे।

आज हम आपसे राग भैरव की चर्चा करेंगे। प्राचीन ग्रन्थों में भैरव को प्रथम राग माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस राग का सृजन स्वयं भगवान शिव ने किया था। यह प्रातःकालीन राग है, अर्थात सूर्योदय के पश्चात इस के गायन-वादन की परम्परा है। आजकल अधिकतर संगीत सभाओं और गोष्ठियों का आयोजन आम तौर पर सायंकाल या रात्रि में किया जाता है। इस कारण राग भैरव सुनने का अवसर कम मिलता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के राग भैरव में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। कुछ विद्वानो के अनुसार प्राचीन काल में भैरव में शुद्ध निषाद (वर्तमान स्वरूप) के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता था। राग के अवरोह में वक्रगति का प्रयोग किया जाता है। राग भैरव में जोगिया की तरह शुद्ध मध्यम पर ठहराव नहीं दिया जाता। राग कलिंगड़ा इससे मिलता-जुलता राग है। आइए, अब हम आपको राग भैरव के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते है।

आज हम आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से राग भैरव पर आधारित एक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह कीर्तन शैली का भक्ति गीत है, जिसके संगीतकार सलिल चौधरी थे। राग भैरव को आधार बना कर सलिल चौधरी ने फिल्म ‘जागते रहो’ में भी एक आकर्षक गीत- ‘जागो मोहन प्यारे...’ तैयार किया था, जो आज भी लोकप्रिय है। यह गीत हम कई अवसरों पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ से प्रस्तुत कर चुके है। आज उन्हीं सुरीले संगीतकार का राग भैरव पर आधारित यह दूसरा गीत सुनिए। इस गीत में बंगाल के लोकप्रिय ताल वाद्य ‘खोल’ का प्रयोग कहरवा ताल में किया गया है। गीत में आपको एकाध स्थान पर राग जोगिया का स्पर्श भी परलक्षित होगा, किन्तु गीत का ढाँचा राग भैरव के स्वरों में है। इस गीत से जुड़े दो तथ्य भी उल्लेखनीय हैं। आगामी 28 सितम्बर को कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर का जन्मदिन है। भक्तिरस से पगे उनके इस गीत के माध्यम से हम उन्हें शुभकामनाएँ अर्पित करते हैं। इसके साथ ही फिल्म ‘मुसाफिर’ सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की प्रथम निर्देशित फिल्म थी। आगामी 30 सितम्बर को उनकी 91वीं जयन्ती है। इस गीत के माध्यम से हम उस महान फ़िल्मकार की स्मृतियों को नमन करते हैं। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।



राग भैरव : ‘मन रे हरि के गुण गा...’ : लता मंगेशकर : फिल्म मुसाफिर




वर्तमान में भारतीय संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, उनमें ध्रुपद अथवा ध्रुवपद शैली सबसे प्राचीन है। प्राचीन ग्रन्थों में प्रबन्ध गीत शैली का उल्लेख मिलता है। ध्रुवपद या ध्रुपद का जनक इसी प्रबन्ध गीत को माना जाता है। ध्रुवपद शैली की विशिष्ट पद रचना और गायन पद्यति का विकास ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के काल (1468-1516 ई.) में उन्हीं के प्रयासों से हुआ था। वे मध्ययुगीन पद शैली के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। राजा मानसिंह स्वयं एक संगीतज्ञ थे, इसलिए उनके द्वारा प्रवर्तित शैली में परम्परा की उपेक्षा नहीं की गई थी। उन्होने प्राचीन शास्त्र को ही आधार मान कर ध्रुवपद शैली का विकास किया था। आगे चल कर ध्रुवपद शैली चार भिन्न बानी (वाणी), गौरहार, डागर, खण्डहार और नौहार बानी के नाम से विकसित हुई। आज के अंक में हम आपके लिए डागरबानी के अन्तर्गत राग भैरव का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। डागर परिवार के सुविख्यात साधक उस्ताद सईदुद्दीन डागर के स्वरों में सुनिए, राग भैरव में निबद्ध ध्रुवपद। सूल ताल में पखावज संगति उद्धवराव आपेगाँवकर ने किया है। आप राग भैरव में यह ध्रुवपद सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग भैरव : ‘मध आली मध अन्त शिव आली...’ : उस्ताद सईदुद्दीन डागर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 137वीं संगीत पहेली में हम आपको एक भक्तिरस प्रधान खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – यह खयाल रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 139वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 135वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के स्वरों में प्रस्तुत एक स्तुतिगीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी कान्हड़ा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित जसराज। इस अंक के दोनों प्रश्नो के उत्तर एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, U.S.A से दिनेश कृष्णजोइस, हमारे नियमित प्रतिभागी जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपको राग भैरव की चर्चा करते हुए इस राग की दो रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक कम प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र
 

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