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Monday, January 26, 2009

२७ गीतों ने पार किया समीक्षा के पहले चरण का विशाल समुन्दर

दोस्तों, दूसरे सत्र में प्रकाशित हमारे २७ गीतों ने आज अपनी समीक्षा के पहले चरण का पड़ाव पार कर लिया है. अर्थात् ५ समीक्षकों में से ३ ने अपने अंक दे दिए हैं. इस पहले चरण के बाद सभी गीतों की जो अब तक की स्थिति है उसका ब्यौरा आज हम यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं. समीक्षा का दूसरा और अन्तिम चरण अभी जारी है. जिसके बाद हम उदघोषणा करेंगें हमारे टॉप १० गीतों का और उनमें से एक होगा हमारा सरताज गीत. आज हम दिसम्बर के दिग्गज गीतों की, तीनों समीक्षकों की समीक्षाएं और अन्तिम अंक तालिका यहाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं पर उससे पहले नवम्बर के नम्बरदार गीतों की जो तीसरी समीक्षा छूट गई थी, पहले उस पर एक नज़र डाल लें.

तीसरे समीक्षक ने नवम्बर के नम्बरदार गीतों के बारे में कुछ यूँ राय रखी है -

गीत # १९. उड़ता परिंदा
गीत अच्‍छा लिखा गया है । संगीत बढिया है । पर गायकी कमज़ोर लगी । एक और बात । उच्‍चारण दोष सुधारना गायकों के लिए बहुत ज़रूरी है । दीवार को दिवार और ख़त को खत कहा है । जिससे रस-भंग हो जाता है ।
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १५/२०=७.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २१/३०.

गीत # २० - गीत-वो बुतख़ाना ये मयख़ाना

गीत, गायकी और संगीत सभी बढिया । कहीं कहीं गायकी कमज़ोर लगी ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-५, कुल - १९ /२०=९.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २१, माहिया -
गीत बहुत अधिक प्रभावित नही करता.
गीत--४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-३, कुल - १३/२०=६.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - १८.५ /३०.

गीत # २२, - तू रूबरू
गीत के बोल बहुत बढिया हैं । धुन मिक्सिंग अच्‍छी लगी । कहीं कहीं उच्‍चारण की दिक्क़त यहां भी दिखी । पर कुल मिलाकर एक प्रभावी गीत । गायक में बहुत संभावनाएं हैं । बेहद युवा और आकर्षक स्‍वर ।
गीत--५, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-४, ओवारोल प्रस्तुति-४, कुल - १७/२०=८.५/१०.
पहले चरण के कुल अंक - २४/३०.

चलिए अब बढ़ते हैं दिसम्बर के दिग्गज गीतों की तरफ़, टिपण्णी किसी एक समीक्षक की दे रहे हैं पर अंक तीनों के अलग अलग दिए जा रहे हैं-

गीत # २३, वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता

वन वर्ल्‍ड बहुत अच्‍छा लिखा और कंपोज़ किया गया है । बस एक ही कसर रह गयी है । कहीं कहीं क्‍लेरिटी/स्‍पष्‍टता का अभाव है । यही वजह है कि अगर इबारत ना देखें तो कई जगहों पर आते । काश कि इस गाने में स्‍पष्‍टता का ख्‍याल रखा गया होता तो ये एक बेहतर जनगीत का दरजा हासिल कर सकता था ।
पहले समीक्षक - १९/२०
दूसरे समीक्षक - १४.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १९/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २४, चाँद का आँगन

इस बार के गीत बोलों के मामले में बहुत आगे हैं। इस गीत के बोल कविता जैसे हैं। ऐसे बोलों को स्वरबद्ध करना बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन कुमार आदित्य ने जैसा संगीत दिया है, उसमें बेहतर संयोजन का आभाव होने बावज़ूद बार-बार सुनने का मन होता है। पूरे गीत में बेसिक धुन ही बजती रहती है, फिर भी संगीत को बार-बार सुनना कानों को नहीं थकाता। कुमार आदित्य की आवाज़ बहुत रूखी है, फिर भी इस गीत पर फब रही है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५/२०.
तीसरे समीक्षक - १८/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

गीत # २५, जिस्म कमाने निकल गया है

इस ग़ज़ल के शे'र कमाल के हैं। नाज़िम नक़वी की जितनी तारीफ़ की जाय वह कम है। आदित्य विक्रम का संगीत बढ़िया है। राहत देता ह, लेकिन गायक वह जान नहीं डाल पाया है, वह ट्रीटमेंट नहीं दे पाया है, जिसकी आवश्यकता इस ग़ज़ल को थी। इस ग़ज़ल को सुनने में वह आनंद नहीं है, जो इसे पढ़ने में आता है।
पहले समीक्षक - २०/२०
दूसरे समीक्षक - १५.५/२०.
तीसरे समीक्षक - १४/२०.
कुल अंक - २४.५/३०.

गीत # २६, मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी

इस गीत का सबसे मज़बूत पक्ष इसका संगीत और उसका संयोजन है, लेकिन उस स्तर की गायकी नहीं है। हालाँकि गायिका ने इस गीत का संगीत भी दिया है, उस हिसाब के संगीत का मूड उन्हीं भली-भाँति पता था, शायद रियाज़ की कमी हो। गीतकार ने सम मात्राओं का ध्यान नहीं दिया है, तभी गायिका को 'कि ना रेत' को 'किनारेत' की तरह गाना पड़ा है।
पहले समीक्षक - १८/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - १६/२०.
कुल अंक - २५.५/३०.

गीत # २७, जो शजर

यह ग़ज़ल इस महीने की सबसे उम्दा प्रस्तुति है। दौर सैफ़ी के शे'रो का तो कोई जवाब ही नहीं। दिल को छू देने वाले शे'रों को जब रफीक़ शेख़ की आवाज़ मिली है तो ग़ज़ल मुकम्मल बन पड़ी है। इस पर क्या कहना, बस सुनते रहें...
पहले समीक्षक - १६/२०
दूसरे समीक्षक - १७/२०.
तीसरे समीक्षक - २०/२०.
कुल अंक - २६.५/३०.

तो लीजिये, अब जानिए कि पहले चरण के बाद किस किस पायदान पर हैं हमारे दूसरे सत्र के २७ नगीने गीत-

तेरा दीवाना हूँ - २७/३०.
वन वर्ल्ड -हमारी एक सभ्यता - २६.५/३०
जो शजर - २६.५/३०
चाँद का आंगन - २६.५/३०
मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी- २५.५/३०
हुस्न - २५.५/३०
खुशमिजाज़ मिटटी - २५/३०.
जीत के गीत - २४.५/३०.
सच बोलता है - २४.५/३०.
जिस्म कमाने निकल गया है - २४.५/३०
संगीत दिलों का उत्सव है - २४/३०.
आवारा दिल - २४/३०.
ओ साहिबा - २४/३०
ऐसा नही - २४/३०.
तू रूबरू - २४/३०
सूरज चाँद और सितारे - २२.५/३०.
चले जाना - २१.५/३०.
तेरे चहरे पे - २१/३०.
उड़ता परिंदा - २१/३०
डरना झुकना - २०.५/३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५/३०.
बढे चलो - २०/३०.
ओ मुनिया - १९.५/३०.
मैं नदी - १९/३०.
माहिया - १८.५/३०
राहतें सारी - १८/३०.
मेरे सरकार - १६.५/३०.


Friday, January 2, 2009

कितना है दम नवम्बर के नम्बरदार गीतों में

अक्तूबर के अजयवीरों ने पहले चरण की समीक्षा का समर पार किया अब बारी है नवम्बर के नम्बरदार गीतों की. यहाँ हम आपके लिए, पहले और दूसरे समीक्षक, दोनों के फैसलों को एक साथ प्रस्तुत कर रहे हैं, तो जल्दी से जान लेते हैं कि नवम्बर के इन नम्बरदारों ने समीक्षकों को क्या कहने पर मजबूर किया है.

उडता परिन्दा

पहले समीक्षक -
सुदीप यशराज के ऒल इन वन प्रस्तुति का संगीत पक्ष बेहद श्रवणीय है. संगीत के अरेंजमेंट को भी कम वाद्यों की मदत से मनचाहा इफ़ेक्ट पैदा कर रहा है. प्रख्यात प्रयोगधर्मी संगीतकार एस एम करीम इसी तरह के स्वरों का केलिडियोस्कोप बनाया करते है.

लोरी से लगने वाले इस गाने के कोमल बोलों का लेखन भी उतना ही अच्छा हो नहीं पाया है, क्योंकि कई अलग अलग ख्यालात एक ही गीत में डाल दिये गये है. मगर यही तो एक फ़ेंटासी और मायावी स्वप्न नगरी का सपना देख रही नई पीढी़ का यथार्थ है.

यही बात गायक सुदीप के पक्ष में जाती है. थोडा कमज़ोर गायन ज़रूर है, जो बेहतर हो सकता था, क्योंकि गायक की रचनाधर्मिता तो बेहद मौलिक और वाद से परे है.

गीत - ४, धुन व् संगीत संयोजन - ३.५, आवाज़ व गायकी - ३.५, ओवारोल प्रस्तुति - ३.५. कुल १४.५ : ७.५ /१०.

दूसरे समीक्षक -

गीत का संगीत पक्ष बहुत अच्छा है, लेकिन वह तब जब केवल संगीत को ही सुना जाय, क्योंकि गीत के बोलों में जिस तरह के भावों को डाला गया है, उस तरह का न तो संगीत-संयोजन रहा और न ही गायन। दूसरे अंतरे में ठहराव भी आ गया है। लगता है जैसे कि प्रवाह में कोई अवरोध आ गया। मुकम्मल गीत तभी बनता है जब गीत, संगीत और गायन तीनों उम्दा हों। जबकि इस गाने के तीनों महत्वपूर्व पहियों पर सुदीप का ही बल रहा था, इसलिए उनकी जिम्मेदारी ज्यादा थी। और मैं समझता हूँ कि इसे वो बेहतर कर भी सकते थे, क्योंकि भाव उनके थे, बोल उनके थी, आवाज़ उनकी थी, संगीत उनका था। फिर भी मैं इस प्रयास को १० में से ६ अंक दूँगा। ६/१०

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १३.५ / २०.

ये हुस्न है क्या

पहले समीक्षक -
एक और सुरीली प्रस्तुति,जिसके धुन में,इन्टरल्य़ुड में काफ़ी प्रभावित करने वाले प्रयोग है. चैतन्य भट्ट की सुरों पर की पकड ज़बरदस्त लगती है. साथ ही उनके ग्रुप के अन्य वादक कलाकारों का आपसी सामंजस्य और आधुनिक हार्मोनी के साथ ही मेलोडी के मींड भरी लयकारी इसे बार बार सुनने की चाह्त पैदा करता है. रहमान के सुर और वाद्य संयोजन के काफ़ी करीब ले जाते इस संगीत रचना की तारीफ़ करने के किये शब्द नहीं.

संजय द्विवेदी के लिखे हुए शब्द भी ज़ज़बात से भरे हुए, युवा विद्रोही मन की उथल पुथल, खलबली कलम के ज़रिये दर्शाता है.शब्दों में मौलिकता भी कहीं कहीं दाद देने के लिये ललचा जाती है.

कृष्णा पंडित और साथियों के तराशे हुए गायन और सामंजस्य गीत को उचाईंयां प्रदान करता है.व्यवस्था के प्रति आक्रोश , युवा जोश और आसपास की समस्याओं के प्रति जागरूकता गीत के बोलों और धुन के माध्यम से, कहीं अधिक समूह गीत गायन के माध्यम से मेनिफ़ेस्ट करने में यह टीम पूर्ण रूप से सफ़ल मानी जा सकती है. कृष्णा पंडित गले से नहीं दिमाग़ से गाते हैं, इसलिये ये काम भी आसानी से पूरा हो जाता है.

गीत - ४, धुन व् संगीत संयोजन - ४, आवाज़ व गायकी - ४, ओवारोल प्रस्तुति -४. कुल १६ : ८ /१०

दूसरे समीक्षक -
इस महीने के इस गीत का संगीत पक्ष अच्छा है, लेकिन ७ मिनट ४१ सेकेण्ड के गीत में हर जगह एक तरह का ट्रीटमेंट है, इसलिए अलग-अलग अंतरे में एक से लगते हैं। हालांकि गीत के संगीत की अरेंज़िंग लाजवाब है, लेकिन हर जगह अपना रिपिटीशन दर्ज करा रही है। इसलिए बोल के अच्छे होने के बावजूद गीत बहुत अधिक प्रभाव नहीं छोड़ता। कहने का मतलब यह है कि यह गीत कहीं से ऐसा नहीं है, जिसे बारम्बार सुनने का मन करे। समूह गायन अपनी ओर आकर्षित ज़रूर करता है लेकिन फिर भी संगीतकार को अधिक मेहनत करनी होगी। मैं इस गीत को १० में से ८ अंक दूँगा. ८/१०

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १६ / २०.

माहिया

पहले समीक्षक -
सीमा पार सी आये हमारे मुअज़्ज़ज़ मेहमानों नें ये जो प्रस्तुति दी है, उन्हे और आवाज़ को पहले बधाई !!
पाकिस्तान के आवारा बैंड़ नें इस सोफ़्ट रॊक गीत को ईमानदारी से गढा गया सुनाई देता है.गायकों के सुरों के समन्वय में भी सफ़ल हुई है इस गीत के सभी वादकों द्वारा बजाये गये हर वाद्य का अपना योगदान है- लीड़ गिटारिस्ट मोहम्मद वलीद मुस्तफ़ा (और गीत के मुख्य गायक भी),रिदम गिटारिस्ट अफ़ान कुरैशी,और ड्रमर वकास कादिर बालुच नें मेलोडी और पाश्चात्य शास्त्रीयता को अच्छे ढंग से फ़्युज़न किया है इस गीत में.

सुरीले गायक मंडली नें कहीं कहीं हार्मोनी को बेहद सुरीले अंदाज़ में गीत में पिरोया है, जो पूरी प्रस्तुति में एकाकार हो जाती है. इनकी आवाज़ में एक कशिश ज़रूर है.लीड़ गिटारिस्ट नें अपनी मौजूदगी से और कशिश बढा दी है.

पूरी धुन में हार्मोनी और कॊर्ड्स का प्रयोग प्रख्यात संगीतकार सलिल चौधरी की याद दिलाते है. इस समूह के उज्वल भविष्य की कामना करता हूं.

गीत - ४, धुन व् संगीत संयोजन - ४, आवाज़ व गायकी - ४, ओवारोल प्रस्तुति - ४. कुल १६ : ८ /१०

दूसरे समीक्षक
पहले तो इस बात का स्वागत कि हिन्द-युग्म पर अब पाकिस्तान से भी संगीतप्रेमी पधारने लगे हैं। इस गीत के संगीत, बोल और गायन में से किसी में भी ताजगी नहीं है। मिक्सिंग भी बहुत बढ़िया नहीं है। कम से कम लिरिक्स के स्तर पर भी इसमें नयापन होता तो यह सराहनीय गीत बन पड़ता। लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि गायक में बहुत संभावनाएँ हैं, उसे कुछ बिलकुल ओरिजनल कम्पोजिशन पर गाकर खुद को परखना चाहिए। इसे मैं ४ अंक देना चाहूँगा। ४/ १०.

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १२ / २०.

तू रुबरू:

पहले समीक्षक -
सजीव सारथी जी द्वारा गीत लिखा अच्छा गया है किंतु इस गीत की धुन में मधुरता या मेलोडी कम है. गीतकार की मेहनत,मौलिकता और शब्दों के सटीक चयन की वजह से इस गीत का साहित्यिक पक्ष बेहद सशक्त है.
जैसा कि प्रतीत हो रहा है, ये गीत पहले लिखा गया होगा और धुन बाद में बनी है. इसी वजह से धुन का संयोजन एक एब्स्त्रेक्ट पेंटिंग की तरह प्रस्तुत हो पाया है, जिसमें वेरिएशन और कॊर्डस का प्रयोग सीमित किया गया है, जो प्रभावित करने में कमज़ोर रहा है. अगर ये वही ऋषि है, जिन्होनें ऐसा नही के आज मुझे का कर्णप्रिय संगीत दिया है, तो ज़रूर कहूंगा कि इस गीत के संगीत को बड़ी ही ज़ल्दबाज़ी में मुकम्मल किया गया है, और श्रोता अपने आपको जब तक गाने के स्वरों से अपने आपको जोड़ पायेगा, तब तक गीत खत्म ही हो जाता है, एक अधूरेपन के एहसास को मन में छोडते हुए.
हालांकि विश्वजीत अच्चे गायक है,जो ओ साहिबा में साबित भी हो जाती है. मगर इस गीत में उनके गायन में मोनोटोनी सी लगती है, जो अधिकतर धुन की एकरसता की वजह से और बढ़ कर दुगनी हो जाती है. गायकी के स्वरों पर ठहराव भी नियंत्रित नहीं लगता.कहीं जल्दबाज़ी का भी गुमां सा होने लगता है.

गीत - ३.५, धुन व् संगीत संयोजन - ३.५, आवाज़ व गायकी - ३.५, ओवारोल प्रस्तुति - ३.५. कुल १४ : ७ /१०

दूसरे समीक्षक -
इस गीत के बोल बहुत बढ़िया हैं। ऋषि के संगीत में हमेशा की तरह ताज़गी है। बिस्वजीत दूर के सवार नज़र आते हैं। मुझे लगता है कि गीत की अधिक सराहना करने की बजाय मैं इसे १० में से ८॰५ अंक देकर अपनी भावनाएँ प्रदर्शित करना चाहूँगा। ८.५ /१०.

कुल अंक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिलकर) - १५.५ / २०.

Saturday, December 27, 2008

रफ़िक़ शेख की ग़ज़ल ने ली जबरदस्त बढ़त, छोडा खुशमिजाज़ मिटटी को पीछे

अक्तूबर के अजय वीर गीत हैं फ़िर एक बार आमने सामने, और पहले चरण के तीसरे और अन्तिम समीक्षक की पैनी नज़र है उन पर. देखते हैं कि क्या फैसला उनका-

डरना झुकना छोड़ दे

गीत बेहद प्रभावी है । बोल बढिया हैं । अच्‍छी बात ये है कि ये गीत एक संदेश देता है । संयोजन और गायकी में भी ये गीत एकदम युवा है । क्‍लब मिक्‍स में जो टेक्‍नो इफेक्‍ट्स हैं वो अच्‍छे लगते हैं । लेकिन मुझे लगता है कि पंजाबी तड़का मिक्‍स ज्‍यादा अच्‍छा बन पड़ा है । इसे हम सूफी मिक्‍स कहते तो ज्‍यादा अच्‍छा लगता । अब तक का सर्वश्रेष्‍ठ गीत ।
गीत—पूरे पांच. धुन और संगीत संयोजन-पूरे पॉँच, गायकी और आवाज़-पूरे पांच, ओवारोल प्रस्तुति-पूरे पांच
कुल- २०/२०: १०/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 20.5 / 30

ऐसा नहीं कि आज मुझे चांद चाहिए---

इस ग़ज़ल की शायरी ज़रा कमज़ोर लगी । गायकी और संगीत संयोजन उत्‍तम ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १८/२०: ९/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30


सूरज चांद और सितारे

ये ठीक है कि ये हिंद युग्‍म पर अब तक का सबसे बड़ा ग्रुप है । लेकिन दिक्‍कत ये है कि जिस गीत को चुना गया है वो काफी कमज़ोर है । बोलों और भावों में गहराई नहीं है । गायकी और संगीत-संयोजन अच्‍छा है । मुझे लगता है कि अगर ये बैंड उत्‍कृष्‍ट बोलों वाले गीतों को लेकर प्रस्‍तुत हो तो बहुत संभावनाएं खुल सकती हैं ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १५/२०: ७.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 22.5 / 30


तेरा दीवाना हूं
आवाज़ अच्‍छी है । पर नज़्म कमज़ोर है । नज़्म के कुछ हिस्‍से अच्‍छे बन पड़े हैं । संगीत संयोजन उम्‍दा ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-५
कुल- १९ /२०: ९.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 27 / 30


ओ साहिबां

गीत को सुनते ही पहली पंक्ति में ही एक बात खटकती है । गायक को नुक्‍तों का अंदाज़ा नहीं है । ख़ामख़ां को ‘खामखां’ और ‘ख़ुमारी’ को ‘खुमारी’ गाने से गीत का मज़ा बिगड़ गया है । संगीत औसत है ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, गायकी और आवाज़-३
कुल- १३ /२०: ६.५ /१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30

अक्तूबर के गीतों का पहले चरण की परीक्षा को पार करने का बाद अब तक का समीकरण इस प्रकार है -

तेरा दीवाना हूँ - २७ / ३०.
खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
ओ साहिबा - २४ / ३०
ऐसा नही - २४ / ३०.
सूरज चाँद और सितारे - २२.५ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
डरना झुकना - २०.५ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.



Monday, November 17, 2008

अक्तूबर के अजय वीर पहली बार आमने सामने

अक्तूबर के अजय वीर गीतों के पहले चरण की पहली समीक्षा में समीक्षक ने मेलोडी को तरजीह दी है...

गीत # १४ - डरना झुकना छोड़ दे

एकदम सामान्य गीत, पूरा सुन पाना भी मुश्किल... गीत के ३ और गायकी के ३ अंक के अलावा बाकी सारे पक्षों में एक भी नंबर दे पाना मुश्किल।
गीत ३, संगीत ० , गायकी ३, प्रस्तुति ०, कुल ६ / २०.

3/10.

गीत # 15 -ऐसा नही कि आज मुझे चाँद चाहिए

एक और कर्णप्रिय रचना.. गीत बढ़िया संगीत उम्दा , प्रस्तुति भी बढ़िया बस गायकी में (नीचे सुरों में )थोड़ी सी गुंजाईश और हो सकती थी। फिर भी आलओवर बहुत बढ़िया रचना।
गीत ४, संगीत ४, गायकी ३.५, प्रस्तुति ३.५, कुल १५ /२०

7.5/10

गीत # 16 -सूरज चाँद सितारे..

कर्णप्रिय गीत, एक बार सुनने लायक।
गीत ४,संगीत ३.५,गायकी ३.५, प्रस्तुति ४ कुल १५/२०.

7.5/10.


गीत # 17 -आखिरी बार तेरा दीदार ...

बहुत ही सुन्दर गज़ल,सभी पहलूओं पर कलाकारों ने अपना पूरा योगदान दिया। संगीत,गायकी,गीत सब कुछ शानदार। बेहद कर्णप्रिय।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४.५ प्रस्तुति ४.५ कुल १८/२०.

9/10.

गीत # 18 -ओ साहिबा

एक बार फिर सजीव सारथी के मधुर गीत को शुभोजीत ने सुन्दर संगीत में ढ़ाला और उतनी ही सुन्दरता से बिस्वजीत ने इसे गाया। कहीं कहीं साँस लेने की आवाज को बिस्वजीत छुपा नहीं पाये, थोड़ा सा ध्यान देना होगा उन्हें।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४ प्रस्तुति ५ कुल १८ / २०.

9/10.

चलते चलते -

लगता है अब तक समीक्षा के पहले चरण को पार चुके आधे सत्र के गीतों को इन नए गीतों से जबरदस्त टक्कर मिलने वाली है. कुल मिला कर यह सत्र एक उत्तेजना से भरे पड़ाव की तरफ़ बढ रहा है, जहाँ एक से बढ़कर एक गीत एक दुसरे से भिड रहे हैं सरताज गीत की दावेदारी लेकर. संगीत और संगीत प्रेमियों के लिए तो ये सब सुखद ही है

Wednesday, November 12, 2008

आधे सत्र के गीतों ने पार किया समीक्षा का पहला चरण

सितम्बर के सिकंदरों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा, और तीन महीनों में प्रकाशित १३ गीतों की पहले चरण की समीक्षा के बाद का स्कोरकार्ड

समीक्षक की व्यस्तता के चलते हम सितम्बर के गीतों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा को प्रस्तुत करने में कुछ विलंब हुआ. तो लीजिये पहले इस समीक्षा का ही अवलोकन कर लें.


खुशमिजाज़ मिटटी
बढ़िया गीत होते हुए पर भी पता नहीं क्या कमी है, गीत दिल को छू नहीं पाता। ठीक संगीत, गीत बढ़िया और गायकी भी ठीकठाक। गायक को अभिजीत की शैली अपनाने की बजाय खुद की शैली विकसित करनी चाहिये।
गीत: ३, संगीत 3, गायकी ३, प्रस्तुति ३, कुल १२/२०, पहले चरण में कुल अंक २५ / ३०.

राहतें सारी
एक बार सुन लेने लायक गीत, बोल सुंदर परन्तु संगीत ठीक है। वैसे संगीतकार की उम्र बहुत कम है उस हिसाब से बढ़िया कहा जायेगा, क्यों कि बड़े बड़े संगीतकार भी इस उम्र में इतने बढ़िया संगीत नहीं रच पाये हैं।
गीत ३.५, संगीत ३.५ गायकी ३ प्रस्तुति 3 कुल १३/२०, पहले चरण में कुल अंक १८ / ३०.

ओ मुनिया
बढ़िया गीत को संगीत और प्रस्तुति के जरिये कैसे बिगाड़ा जाता है उसका बेहद शानदार नमूना, एक पंक्ति भी सुनने लायक नहीं, जबरन एक दो लाइनें सुनी। हिन्द युग्म पर प्रकाशित गीतों में अब तक का सबसे सामान्य गीत। हिन्द युग्म को ऐसे गीतों से बचना चाहिये। सिर्फ वर्चूअल स्पेस भरने के लिये ऐसी रचनायें प्रकाशित करने का कोई फायदा नहीं।
गीत 5, संगीत ०, गायकी ०, प्रस्तुति ० कुल ५/२०, पहले चरण में कुल अंक १९.५ / ३०.

सच बोलता हैएक बार फिर सुन्दर गज़ल, गायकी और संगीत प्रस्तुति एकदम बढ़िया होते हुए भी गीत को एक बार सुन लेने के बाद सुनने का मन नहीं होता। कुछ चीजों में कमी दिखाई नहीं देती, उसको वर्णित नहीं किय़ा जा सकता कि इस गीत में यह कमी है पर वो कमी अखरती रहती है, मन में कसक सी रहती है। इस गीत को सुनने के बाद भी सिसा ही महसूस होता है।
गायक की आवाज में मो. रफी साहब की आवाज की झलक दिखती (सुनाई देती) है।
गीत ४, संगीत ४.५, गायकी ३, प्रस्तुति ४.५ कुल १६/२०, पहले चरण में कुल अंक २४.५ / ३०.

सितम्बर माह की समाप्ति के साथ ही हमारे वर्तमान सत्र का आधा सफर पूरा हो गया. हालाँकि बीते शुक्रवार तक हम १९ नए गीत प्रकाशित कर चुके हैं, पर सितम्बर तक प्रकाशित सभी १३ गीत अपनी पहले चरण की समीक्षा का समर पार चुके हैं. आईये देखते हैं इन १३ गीतों में कौन है अब तक सबसे आगे. अब तक का स्कोर कार्ड इस प्रकार है.

खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.

हम आपको याद दिला दें कि कुल अंक ५० में से दिए जायेंगे, यानी अन्तिम दो निर्णायकों के पास २० अंक हैं, अन्तिम चरण की रेंकिंग जनवरी में होगी, जिसके बाद ही अन्तिम फैसला होगा, सरताज गीत का और टॉप १० का भी, फिलहाल हम मिलेंगे आने वाले रविवार को, अक्टूबर के अजयवीर गीतों की पहली समीक्षा लेकर.

हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.


Sunday, October 19, 2008

पहले चरण की दूसरी समीक्षा में कांटे की टक्कर, सितम्बर के सिकंदरों की

सितम्बर के सिकंदर गीत समीक्षा की पहली परीक्षा से गुजर चुके हैं, आईये जानें हमारे दूसरे समीक्षक की क्या राय है इनके बारे में -

पहला गीत खुशमिज़ा़ज मिट्टी

मेरा मानना है कि ये गीत अब तक के सबसे संपूर्ण गीतों में से एक है । इस पर बहस की कोई गुंजाईश ही नहीं है । गायक संगीतकार ने इसके बोलों को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ निभाया है । सुबोध साठे को बधाई । गौरव के बोल एक पके हुए गीतकार की कलम से निकले लगते हैं । आवाज़ के सबसे अच्‍छे गीतों में से एक है ये ।

गीत- 5, धुन और संगीत संयोजन—5, गायकी और आवाज़—5, ओवारोल प्रस्तुति—5
कुल अंक 20 / 20 यानी 10 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 19 /20

दूसरा गीत—राहतें सारी

मुझे लगता है कि इस गाने से किसी भी पक्ष में पूरा न्‍याय नहीं हुआ है । मोहिंदर जी के इस गीत के पहले दो अंतरे अच्‍छे हैं । पर आखिरी दो अंतरे कमजोर लगे । उनमें ‘गेय तत्‍त्‍व’ की कमी नज़र आई । कृष्‍ण राज कुमार ने कोशिश की है कि इस गाने को बहुत ही नाजुक-सा बनाया जाये । पर मुझे लगता है कि इस आग्रह की वजह से गाने के प्रभाव पर बहुत बुरा असर पड़ा है । इस गाने को और चमकाया जा सकता है ।

गीत- 3 धुन और संयोजन- 3 गायकी और आवाज-4 ओवरऑल प्रस्‍तुति- 3
कुल अंक 13 /20 यानी 6.5 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 11.5 / 20

तीसरा गीत-- ओ मुनिया मेरी गुडिया---

इससे पहले मैं जे एम सोरेन को सुना नहीं था । पर इस गाने को सुनकर मुझे लगा कि वो सही मायनों में रॉक स्‍टार हैं । एक सच्‍चा रॉक स्‍टार सरोकार वाले गीतों की कुशल प्रस्‍तुति करता है । और सोरेन ने यही किया है । एकदम हार्ड म्‍यूजिक के बावजूद इस गाने की संवदेना दबी नहीं है । सजीव का ये गीत उनके बाक़ी गीतों से बेहतर है और एकदम अलग तरह का भी ।

गीत- 5 धुन और संयोजन- 4 गायकी और आवाज़- 4 ओवरॉल प्रस्‍तुति- 5
कुल अंक 18 / 20 यानी 09 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 17 / 20

चौथा गीत/ग़ज़ल—सच बोलता है

अजीम नवाज़ राही की इस ग़ज़ल के सारे शेर अच्‍छे हैं । एक भी कमज़ोर शेर नहीं है । इसके लिए शायर बधाई का पात्र है । इस ग़ज़ल में इंटरल्‍यूड पर कोरस का प्रयोग अच्‍छा लगा । कुल मिलाकर एक अच्‍छी कंपोज़ीशन और अच्‍छी गायकी ।

रचना- 5 धुन और संयोजन- 4 गायकी और आवाज़- 4 ओवरऑल- 5
कुल अंक 18 / 20 यानी 9 / 10, कुल अंक अब तक (पहली और दूसरी समीक्षा को मिला कर)= 16.5 / 20

चलते चलते -

खुशमिजाज़ मिटटी में दूसरे सप्ताह भी अपनी बढ़त मजबूत रखी है. ओ मुनिया और सच बोलता है भी कसौटी पर खरे उतरे हैं. सितम्बर के सिअकंदेरों की तीसरे और पहले दौर की अन्तिम समीक्षा के साथ हम जल्द ही उपस्थित होंगे.

Sunday, October 5, 2008

सितम्बर के सिकंदरों को पहली भिडंत, समीक्षा के अखाडे में...

सितम्बर के सिकंदरों की पहली समीक्षा -

समीक्षा (खुशमिजाज़ मिटटी )

सितम्बर माह का पहला गीत आया है सुबोध साठे की आवाज़ में "खुशमिजाज़ मिट्टी"। गीत लिखा है गौरव सोलंकी ने और संगीतकार खुद सुबोध साठे हैं। गीत के बोल अच्छी तरह से पिरोये गये हैं। गीत की शुरुआत जिस तरह से टुकड़ों में होती है, उसी तरह संगीतकार ने मेहनत करके टुकड़ों में ही शुरुआत दी है। धीमी शुरुआत के बावजूद सुबोध साठे के स्वर मजबूती से जमे हुए नज़र आते हैं। वे एक परिपक्व संगीतकार की तरह गीत की "स्पीड" को "मेण्टेन" करते हुए चलते हैं। असल में गीत का दूसरा और तीसरा अन्तरा अधिक प्रभावशाली बन पड़ा है, बनिस्बत पहले अन्तरे के, क्योंकि दूसरा अन्तरा आते-आते गीत अपनी पूरी रवानी पर आ जाता है। ध्वनि और संगीत संयोजन तो बेहतरीन बन पड़ा ही है इसका वीडियो संस्करण भी अच्छा बना है। कुल मिलाकर एक पूर्ण-परिपक्व और बेहतरीन प्रस्तुति है। गीत के लिये 4 अंक (एक अंक काटने की वजह यह कि गीत की शुरुआत और भी बेहतर हो सकती थी), आवाज और गायकी के लिये 5 अंक (गीत की सीमाओं को देखते हुए शानदार प्रयास के लिये), ध्वनि संयोजन और संगीत के लिये 4 अंक और कुल मिलाकर देखा जाये तो प्रस्तुति को 5 में से पूरे 5 अंक देता हूँ। गौरव सोलंकी और सुबोध साठे का भविष्य बेहद उज्जवल नज़र आता है।

कुल अंक १८/२० यानी ९ / १०

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समीक्षा (राहतें सारी...)



सितम्बर माह का दूसरा गीत है "राहतें सारी…" लिखा है मोहिन्दर कुमार ने और गाया तथा संगीतबद्ध किया है नये गायक कृष्ण कुमार ने। परिचय में बताया गया है कि कृष्ण कुमार पिछले 14 सालों से कर्नाटक संगीत की शिक्षा ले रहे हैं, लेकिन यह नहीं पता चला कि उन्होंने अब तक कितने गीतों को संगीतबद्ध किया है। गीत को आवाज़ देना और उसे ध्वनि संयोजन करना और संगीत देना दोनों अलग-अलग विधाऐं हैं, यह ज़रूरी नहीं कि जो अच्छा गायक हो वह अच्छा संगीतकार भी हो, और ठीक इसके उलट भी यही नियम लागू होता है। भारतीय फ़िल्म संगीत में ऐसे अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं, जिसमें गायकों ने संगीतकार बनने की कोशिश की लेकिन जल्दी ही उनकी समझ में आ गया कि यह उनका क्षेत्र नहीं है, और यही कुछ संगीतकारों के साथ भी हुआ है, जो गायक बनना चाहते थे। इस गीत में कृष्ण कुमार लगभग इसी "ऊहापोह" (Dilema) में फ़ँसे हुए दिखते हैं। मोहिन्दर कुमार की कविता तो उम्दा स्तर की है, यहाँ तक कि गायक की आवाज़ भी ठीक-ठाक लगती है, लेकिन सर्वाधिक निराश किया है संगीत संयोजन और ध्वन्यांकन ने। शुरु से आखिर तक गीत एक अस्पष्ट सी "श्रवणबद्धता" (Audibility) में चलता है। संगीत के पीछे आवाज़ बहुत दबी हुई आती है, कृष्ण कुमार चाहते तो संगीत का कम उपयोग करके आवाज़ को (माइक पास लाकर) थोड़ा खुला हुआ कर सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और समूचा गीत बेहद अस्पष्ट सा लगा। कृष्ण कुमार अभी बहुत युवा हैं, उनकी संगीत दीक्षा भी चल रही है, उन्हें सिर्फ़ अपने गायकी पर ध्यान देना उचित होगा। कोई अन्य गुणी संगीतकार उनकी आवाज़ का और भी बेहतरीन उपयोग कर सकेगा, क्योंकि शास्त्रीय "बेस" तो उनकी आवाज़ में मौजूद है ही। इस गीत में बोल के लिये 4 अंक, संगीत संयोजन के लिये 2 अंक और आवाज़ और उच्चारण के लिये मैं सिर्फ़ 2 अंक दूँगा,यदि "ओवर-ऑल" अंक दिये जायें तो इस गीत को 5 में से 2 अंक ही देना उचित होगा। आवाज़ और संगीत शिक्षा को देखते हुए कृष्ण कुमार से और भी उम्मीदें हैं, लेकिन इस गीत ने निराश ही किया है।

कुल अंक १०/२० यानी ५ / १०

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समीक्षा (ओ मुनिया )

माह का तीसरा गीत है "ओ मुनिया…" गाया और संगीतबद्ध किया है सोरेन ने और लिखा है सजीव ने…
एक प्रोफ़ेशनल गीत कैसा होना चाहिये यह इसका उत्तम उदाहरण है। तेज संगीत, गीत की तेज गति, स्टूडियो में की गई बेहतर रिकॉर्डिंग और स्पष्ट आवाज़ के कारण यह गीत एकदम शानदार बन पड़ा है। गीत के बोल सजीव ने उम्दा लिखे हैं जिसमें "मुनिया" को आधुनिक ज़माने की नसीहत है ही, साथ में उसके प्रति "केयर" और "आत्मीय प्यार" भी गीत में छलकता है। साईट पर गीत के लिये प्रस्तुत ग्राफ़िक में बम विस्फ़ोट में घायल हुए व्यक्ति और विलाप करती हुई माँ की तस्वीर दिखाई देती है, इसकी कोई आवश्यकता नहीं नज़र आती। यह चित्र इस गीत की मूल भावना से मेल नहीं खाते। बहरहाल, गीत की धुन "कैची" है, युवाओं की पसन्द की है, तत्काल ज़बान पर चढ़ने वाली है। सोरेन की आवाज़ और उच्चारण में स्पष्टता है। चूँकि यह गीत तेज़ गति के संगीत के साथ चलता है, इसलिये इसमें गायक को सिर्फ़ साथ में बहते जाना था, जो कि सोरेन ने बखूबी किया है। अब देखना यह होगा कि किसी शान्त गीत में जिसमें "क्लासिकल" का बेस हो, सोरेन किस तरह का प्रस्तुतीकरण दे पाते हैं… फ़िलहाल इस गीत के बोलों के लिये 5 में से 4, संगीत संयोजन के लिये भी 5 में से साढ़े 3, आवाज़ और ध्वन्यांकन के लिये (ज़ाहिर है कि इसमें तकनीक का साथ भी शामिल है) साढ़े 4 अंक देता हूँ, इस प्रकार यदि गीत का ओवर-ऑल परफ़ॉर्मेंस देखा जाये तो इस अच्छे गीत को 5 में से 4.25 अंक दिये जा सकते हैं।

कुल अंक १६/२० यानी ८ / १०

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समीक्षा 4 (सच बोलता है )

अज़ीम जी लिखी हुई यह गज़ल बेहतरीन अश्आर का एक नमूना है, साथ ही इसे मखमली आवाज़ देने वाले रफ़ीक शेख भी एक जानी-पहचानी आवाज़ बन चुके हैं। समीक्षा के लिये प्रस्तुत गज़ल में यदि एक अंतरा (तीसरा वाला) कम भी होता तो चल जाता, बल्कि गज़ल और अधिक प्रभावशाली हो जाती, क्योंकि इसका आखिरी पैरा "जानलेवा" है। इसी प्रकार रफ़ीक शेख की आवाज़ मोहम्मद अज़ीज़ से मिलती-जुलती लगी, उन्होंने इस गज़ल को बिलकुल प्रोफ़ेशनल तरीके से गाया है, संगीत में अंतरे के बीच का इंटरल्यूड कुछ खास प्रभावित नहीं करता, बल्कि कहीं-कहीं तो वह बेहद सादा सा लगता है। गज़ल के मूड को गायक ने तो बेहतरीन तरीके से निभाया लेकिन संगीत ने उसे थोड़ा कमज़ोर सा कर दिया है। रफ़ीक की आवाज़ बेहतरीन है और यही इस गज़ल का सबसे सशक्त पहलू बनकर उभरी है। गीत पक्ष को 5 में से साढ़े तीन, संगीत पक्ष को 5 में से 3 और गायकी पक्ष को 5 में से साढ़े 4 अंक दिये जा सकते हैं। इस प्रकार ओवरऑल परफ़ॉरमेंस के हिसाब से यह गज़ल "अच्छी"(४.५ /५) की श्रेणी में रखी जाना चाहिये।

कुल अंक १५/२० यानी ७.५ / १०

चलते चलते

खुशमिजाज़ मिटटी की टीम को बधाई, देखना दिलचस्प होगा कि यह गीत आने वाले हफ्तों में भी यह बढ़त बना कर रख पायेगा या नही. ओ मुनिया और सच बोलता है भी कम पीछे नही है हैं दौड़ में...फिलहाल के लिए इतना ही.

Monday, September 29, 2008

तीसरी बार हुई अगस्त के अश्वारोही गीतों की परख

पहले चरण की तीसरी और अन्तिम समीक्षा को प्रस्तुत करने में कुछ विलंब हुआ, दरअसल हमारे माननीय समीक्षक जब पहले दो गीतों की समीक्षा हमें भेज चुकें थे तब उन्हें किसी व्यक्तिगत कारणों के चलते समयाभाव का सामना करना पड़ा. इसी कारण अन्तिम तीन गीतों की समीक्षा उन्होंने काफ़ी संक्षिप्त की है पहले दो गीतों की तुलना में. लेकिन अंक समीकरण हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं सरताज गीत चुनने की प्रक्रिया में. तो प्रस्तुत है पहले चरण के अन्तिम समीक्षक के विचार हमारे ऑगस्त के अश्वारोही गीतों पर.

मैं नदी
गाना शुरू हुआ और सिग्‍नेचर मूजिक शुरू हुआ तो बहुत उम्मीदें बंधी ।
सुंदर सिग्‍नेचर तैयार किया है । और जब मानसी पिंपले की आवाज़ की आमद होती है तो एक तरह की ताज़गी का अहसास होता है । गाने का मुखड़ा बेहतरीन है । रिदम बेहतरीन तरीक़े से रखा गया है । पर पता नहीं क्‍यों मुझे हिंदी सिनेमा संसार के किसी गाने की झलक लगी इस गाने की ट्यून में ।
जब हम पहले अंतरे पर पहुंचे तो ये सुनकर कष्ट हुआ कि मिक्सिंग में कमी रह गयी है और गायिका मानसी की आवाज़ डूब गयी है । वाद्यों की आवाज़ ने बोलों की स्पष्ट कर ली है । पहले अंतरे के बाद का इंटरल्‍यूड बढिया है ।
दूसरे अंतरे में भी गायिका की आवाज़ स्पष्ट नहीं है । जहां तक लिरिक्‍स का सवाल है तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि संगीतकार के लिए इस गाने को ट्यून में उतारना मुश्किल काम रहा होगा । गीत के विन्‍यास में ‘गेय तत्व’ की कमी है । पर गाने की भावभूमि सुंदर है ।
इसके अलावा एक बात और कहना चाहता हूं । मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि गाने की रिकॉर्डिंग साफ़ नहीं है । मैं आवाज़ की नहीं ऑरकेस्‍ट्रा की बात कर रहा हूं । बहुत ही दबा-दबा सा संगीत लग रहा है । चमक क्यों नहीं आ रही है ।
मेरी राय है कि इस गाने की धुन एक बार और बनाई जाये ।
गीत सुंदर है । गायिका में भी संभावनाएं हैं और संगीतकार में भी ।
तो फिर इतनी अच्‍छी रचना को क्यों ना फिर से सजाएं ।
गीत ४/५ । धुन और संगीत संयोजन ३/५ । गायकी और आवाज़ पर ३/5 और ओवर ऑल २/५ । कुल १२/२० यानी
6/10

कुल अंक अब तक - १९ / ३०

बेंतेहा प्यार
इस शानदार गाने के लिए मैं सुदीप यशराज को बधाई देता हूं । सुदीप कितने बरस हैं पता नहीं । तस्वीर से इनका बचपना साफ़ नज़र आता है ।
पर संगीत के मामले में सुदीप बचपने की बजाय परिपक्वता से पेश होते लगते हैं ।
शायद सुदीप जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए । उन्हें क्या करना है ।
पिछले जितने भी गीतों की समीक्षा मैंने की है उनमें से ये गाना मुझे बेहद सधा हुआ लगा । कहूं कि सबसे ज्यादा सधा हुआ ।
जिस तरह वे अंतरे पर जाकर 'सम' लगाते हैं और फिर 'वो हो हो ' शुरू करते हैं वो भी कमाल है ।
गीत सुंदर है । गायकी बढि़या है । गीत रचना में एक जगह 'मैंने बूंद बूंद भरी है अपने आंसू से' की बजाय 'अपने आंसुओं से- होना चाहिए था ।
पर इस बात को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है ।
गिटार का इसा गाने में सुंदर प्रयोग किया है ।
सुदीप इंडीपॉप सर्किट पर सक्रिय कई नामी कलाकारों को मात देने की हैसियत रखते हैं । चाहे रिदम हो । म्यूजिक का बाकी अरेन्जमेन्ट या फिर गायकी और लेखन ।
सभी पक्ष सुंदर । गाने को दस में से दस नंबर ।

कुल अंक अब तक - २०.५ / ३०


जीत के गीत
इस गाने के नंबर इस तरह हैं ।
१. गीत- 4
२. धुन और संगीत संयोजन—4
३. गायकी और आवाज़—4
४. ओवारोल प्रस्तुति—5
ये गाना बिना भारी भरकम शब्दों के बड़ी सरलता के साथ जोश और उमंग की बात करता है । गायकी और संगीत संयोजन भी कमाल का है । कुल मिलाकर 17/ 20 अंक । यानी ८.५/१०

कुल अंक अब तक - २४.५ / ३०

चले जाना
१. गीत--- 4/5
२. धुन और संगीत संयोजन 4/5
३. गायकी और आवाज़—5/5
४. ओवारोल प्रस्तुति—5/5
एक रचना के स्‍तर पर ग़ज़ल औसत है । लेकिन रूपेश की आवाज़ में एक ग़ज़ल गायक का पूरा संयम है । और जब धुन भी खुद उन्‍होंने बनाई तो ये ग़ज़ल निखर आई है ।
कुल 18 / 20 यानी ९/१०

कुल अंक अब तक - २१.५ / ३०


इस बार
1. गीत—2/5
2. धुन और संगीत संयोजन—3/5
3. गायकी और आवाज़—3/5
4. ओवारोल प्रस्तुति- 3/5
बेहद औसत गीत । बेहद आसान गायकी । बेहद औसत प्रस्‍तुति ।
इस गीत को बेहद शोख़ और चमकीला रूप दिया जा सकता था ।
कुल मिलाकर ११ /२० यानी ५.५/१०

कुल अंक अब तक - १६.५ / ३०.

चलते चलते -
तो इस तरह अब तक सभी गीतों में सबसे आगे है "जीत के गीत" और ठीक पीछे है "संगीत दिलों का ..." और "आवारा दिल". वहीँ "मैं नदी" और "मेरे सरकार" " बढे चलो" और "बेंतेहा प्यार" सभी समीक्षकों की उम्मीदों पर एक से खरे नही उतर पाये. " चले जाना" और "तेरे चहरे पर" कभी भी बाज़ी पलट सकते हैं. अगले सप्ताह मिलेंगे आपसे सितम्बर के सिकंदर गीतों कि पहली समीक्षा लेकर. तब तक इजाज़त.

Sunday, September 14, 2008

अगस्त के अश्वारोहियों की दूसरी भिडंत में जबरदस्त उठा पटक

जैसे जीवन के कुछ क्षेत्रों मे हमेशा असंतोष बना रहता है वैसे ही संगीत की दुनिया में कुछ लोग इस तरह की चर्चा करते हैं कि संगीत में तो अब वह बात नहीं रही. हक़ीक़त यह है कि समय,काल,परिवेश के अनुसार संगीत बदला है. चूँकि उसका सीधा ताल्लुक मनुष्य से है जिसका स्वभाव ही परिवर्तन को स्वीकारना है तो संगीत का दौर और कलेवर कैसे स्थायी रह सकता है वह भी बदलेगा ही और हमें उसे बदले रंगरूप में भी स्वीकार करने का जज़्बा पैदा करना पड़ेगा.

आवाज़ एक सुरीला ब्लॉग है जहा नयेपन की बयार बहती रहती है.नई आवाज़ें,नये शब्द और नयापन लिये संगीत.इस बार भी पाँच प्रविष्टियाँ मेरे कानों पर आईं और तरबतर कर गईं. मुश्किल था इनमें से किसे कम कहूँ या ज़्यादा. लेकिन जो भी समझ पाया हूँ आपके सामने है.

१)नदी हूँ मैं पवन हूँ,मैं धरा या गगन:

शब्द अप्रतिम,गायकी अच्छी है शब्द की सफ़ाई पर ध्यान दिया जाने से ये आवाज़ एक बड़ी संभावना बन सकती है,उन्हें गायकी का अहसास है.कम्पोज़िशन मौके के अनुकूल है और मन पर असर करती है.

गीत:4.5/5
संगीत:4/5
आवाज़:3/5
कुल प्रभाव 3.5/5
15/20
7.5/10

कुल अंक अब तक 13.5 / 20

२)बेइंतहा प्यार

रचना सुन्दर बन पड़ी है.आवाज़ भी प्रभावी है लेकिन सुर में ठहराव नहीं है. वह बहुत ज़रूरी है.धुन अच्छी लगी है , मेहनत नज़र आती है.

गीत:2.5/5
संगीत:3.5/5
आवाज़:2.5/5
कुल प्रभाव 2.5/5
11/20
5.5/10

कुल अंक अब तक 10.5 / 20

३)बहते बहते धारे,कहते तुमसे सारे

ये इस बार की सबसे प्रभावी रचना है.गायकी,संगीत और शब्द मन को छू जाते हैं.सभी प्रतिभागियों से कहना चाहूँगा कि वह संगीत जो टेक्निकली परफ़ेक्ट है याद नहीं रखा जाएगा,जिसमें बहुत से साज़ बजे हैं वह याद नहीं रखा जाएगा,याद रखी जाती है धुन क्योंकि सबसे पहले वह मन को छूती है और गीत का रास्ता प्रशस्त करती है.धुन अच्छी होने के बाद ज़िम्मेदारी कविता पर आ जाती है और अंतिम प्रभाव छोड़ती है आवाज़ ,लेकिन वही सबसे ज़्यादा पुरस्कृत होती है.

गीत:3.5/5
संगीत:3.5/5
आवाज़:3.5/5
कुल प्रभाव 4.5/5
15/20
7.5/10

कुल अंक अब तक 16 / 20

४)चले जाना

संगीत अच्छा बन पड़ा है.गीत कमज़ोर है.गायक को सुर पर ठहराव की आवश्यकता है.पिच कैसा भी हो आवाज़ खूँटे सी गड जाना चाहिये.एक विशेष बात इस प्रस्तुति के फ़ेवर में जाती है और वह भारतीय साज़ों का इस्तेमाल.वॉयलिन सुन्दर बजा है इसमें.रिद्म का काम भी बेजोड़ है लेकिन गायकी अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाई है.

गीत:2/5
संगीत:3.5/5
आवाज़:2.5/5
कुल प्रभाव 2/5
9/20
4.5/10

कुल अंक अब तक 12.5 / 20

५)इस बार मेरे सरकार:

सामान्य प्रस्तुति है.मेहनत नहीं की गई है.शब्द के साथ संगीत ब्लैण्ड नहीं कर रहा.

गीत:1.5/5
संगीत:1.5/5
आवाज़:1.5/5
कुल प्रभाव 1.5/5
6/20
3/10

कुल अंक अब तक 11 / 20

सभी रचनाएं सुनकर दिल बाग बाग हो जाता है कि बेसुरेपन के इस दौर में युवा पीढ़ी के कलाकार इतनी मेहनत कर रहे हैं. आज युवाओं के सर पर कैरियर को लेकर चिंताएँ हैं उसे देखते हुए आवाज़ की यह पहल और उस पर मिला इन कलाकारों का प्रतिसाद प्रशंसनीय है.बधाईयाँ.

चलते चलते

इस समीक्षा के साथ साथ जबरदस्त उठा पटक हो गई है, "जीत के गीत" ने अपनी बढ़त बरक़रार रखी है, मगर "चले जाना" और "मेरे सरकार" पीछे चले गए और "मैं नदी" और "बेइंतेहा प्यार" आगे आ गए हैं. ये देखना दिलचस्प होगा की पहले चरण के अंतिम समीक्षक की समीक्षा के बाद क्या तस्वीर बनती है.

अपनी मूल्यवान समीक्षाओं से हमारे गीतकार / संगीतकार / गायकों का मार्गदर्शन करने के लिए अपना बहुमूल्य समय निकाल कर, आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म अपना आभार व्यक्त करता है.

Sunday, August 17, 2008

समीक्षा के महासंग्राम में, पहले चरण की आखिरी टक्कर

आज हम समीक्षा के पहले चरण के अन्तिम पड़ाव पर हैं, तीसरे समीक्षक की रेटिंग के साथ जुलाई के जादूगरों को प्राप्त अब तक के कुल अंकों को लेकर ये गीत आगे बढेंगें अन्तिम चरण की समीक्षा के लिए, जो होगा सत्र के अंत में यानी जनवरी २००९ में, जिसके बाद हमें मिलेगा, हमारे इस सत्र का सरताज गीत. तो दोस्तों चलते हैं पहले चरण की समीक्षा में, अपने तीसरे और अन्तिम समीक्षक के पास और जानते हैं उनसे, कि उन्होंने कैसे आँका हमारे जुलाई के जादूगर गीतों को -
(पहले दो समीक्षकों के राय आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं)

गीत समीक्षा Stage 01, Third review

संगीत दिलों का उत्सव है ....

पहला गीत है - संगीत दिलों का उत्सव है...
इस गाने की उपलब्धि है मुखड़ा --'संगीत दिलों का उत्सव है-
बहुत सुंदर है ये गीत ।
हालांकि मुझे लगता है कि इस गीत में भी गेय तत्व मुश्किल हो गए हैं । रचना के दौरान कई पंक्तियां लंबी और कठिन
बन गयी हैं । पर कुल मिलाकर इन कमियों को इसकी धुन और गायकी में ढक लिया गया है ।
गायकों की आवाज़ें बढि़या लगीं । और धुन भी ।
आलाप सुंदर जगह पर रखे गए हैं ।
गाने का इंट्रोडक्‍शन म्यूजिक बहुत लंबा है पर मधुर है । गिटार और ग्रुप वायलिन की तरंगें बारिश का असर देती हैं ।
ये प्रयोग वाकई शाबाशी के लायक़ है ।
लगता है कि संगीतकारों ने सलिल चौधरी से खूब प्रेरणा ली है ।
इंट्रो में गायक की आमद से पहले का सिग्‍नेचर बहुत शानदार है ।
बस एक ही कमी लगी और वो थी मिक्सिंग ।
कई जगहों पर आवाज़ डूब गयी है ।
गायकी में जो समस्याएं हैं उन पर एक नज़र 'सुर खनकते हैं' में 'ते' को डुबा दिया गया है । ऐसा लगता है कि
इसे धुन पर फिट करने के लिए 'खनक हैं' की ध्‍वनि रखी गयी है । खनकते हैं पूरा सुनाई नहीं देता ।
आलाप में जिस तरह मॉडर्न बीट्स हटकर तबला आ जाता है वो कमाल का है ।
इस गाने में संगीतकारों की प्रतिभा की बहुत झलक नज़र आती है ।
बेहद संभावनाशील कलाकार हैं संगीतकार । कहना ना होगा कि इन तमाम गानों में संगीत के मामले में ये गाना
सबसे ज्यादा परिपक्व है ।
दस में से दस अंक ।

संगीत दिलों का उत्सव है... को तीसरे निर्णायक द्वारा मिले 10 /10 अंक, कुल अंक अब तक 24 /30

बढे चलो.

दूसरा गीत है "बढ़े चलो…", मुझे ये गीत बाकी तमाम गीतों से ज्यादा भव्य लगा ।
संवाद के साथ ओपनिंग और ढोल ढमाका कमाल का है ।
पर जैसे ही गाना एस्‍टेब्लिश होता है । गाने की मिक्सिंग की पोल खुलने लगती है ।
मुझे बार बार लग रहा है कि इस गाने की मिक्सिंग दोबारा करनी चाहिए ।
ताकि आवाज़ें प्रॉपर तरीक़े से उभर कर आएं ।
महिला स्वर ओपनिंग में तो एकदम साफ़ है ।
पर पुरूष स्वर काफी खोखला/ हॉलो लग रहा है ।
'बदल रहा है हिंद' के बाद जब 'बढ़े चलो' आता है तब भी महिला स्वर चमकदार है पर पुरूष स्वर गड़बड़ है । डूबा डूबा
सा लग रहा है । फिर महिला स्वर का आलाप संभवत: रीवर्ब/ प्रतिध्‍वनि डालने की वजह से पूरी तरह अस्पष्ट हो गया है ।
हम आज फ़लक पर बिछी हुई से लेकर सूरज पिघलाने वाले हैं तक आवाजें हॉलो लगती हैं ।
'बदल रहा है हिंद' से गाना फिर से चमक जाता है ।
गाने की बीट्स बढिया हैं । पर दूसरे अंतरे के बाद बीट्स इतनी प्रोमिनेन्‍ट हो गयी हैं
कि आवाजें दब रही हैं । अगर आप वाकई इस गाने को दोबारा मिक्‍स करें और इसे चमका दें तो
इस रचना के साथ न्याय हो जायेगा ।
पुरूष गायकों को उच्चारण पर मेहनत करनी होगी । 'भावना' को 'बावना' गाया गया है ।
इसे सुधारा जा सकता है ।
लेकिन इस गाने को इन तमाम बातों के बावजूद मैं दस में से सात अंक दे रहा हूं । तो इसकी वजह है गाने की रचनाशीलता और
धुन की प्रयोगधर्मिता ।
इस गाने में अपार संभावनाएं हैं । रचना का पक्ष तो वाक़ई कमाल है । इसे आप हिंद युग्म का परिचय गीत
कहते हैं । ये भारत के तमाम युवाओं का परिचय गीत बनने का हक़ रखता है ।
बढे चलो, को तीसरे निर्णयक से अंक मिले 7 /10, कुल अंक अब तक 20 /30.

आवारा दिल.

तीसरा गीत है, “आवारा दिल…”। इस गाने को पॉप गाने की शैली में बनाया गया है ।
गायक की आवाज़ में थोड़ी नर्मी है । पर एक लोच भी है । सुबोध ने इस गाने को बहुत बढिया गाया है ।
धुन बढिया है ।
मुझे लगता है कि इस गाने को थोड़े और जोश के साथ गाया जाना चाहिए था । धुन में एक उछाल होता तो अच्‍छा लगता ।
इस गाने में हर बार इंटरल्‍यूड म्‍यूजिक को 'सम' पर ठहराकर फिर गायक की आवाज़ को इंट्रोड्यूस करना अच्छा लगता है ।
दूसरा अंतरा मुझे सबसे अच्छा लगा ।
आवारा दिल को मैं दस में से नौ नंबर दूंगा ।
सुंदर काम किया है ।
आवारा दिल, को तीसरे निर्णायक से मिले 9 / 10, कुल अंक अब तक 24 /30.


तेरे चेहरे पे ...

आखिरी गीत एक गज़ल है “तेरे चेहरे पे…”। जैसे ही मैंने इस ग़ज़ल को सुनना शुरू किया तो सबसे पहले ‘आवाज़’ के पन्ने पर दोबारा जाना पड़ा और देखना पड़ा कि ये गायक कौन है । निशांत अक्षर एक अनूठा नाम लगा । आवाज़ के अनुरूप अनूठा । संगीतकार अनुरूप में मुझे संभावनाएं नज़र आ रही हैं । मेरा मानना है कि गजल कंपोज़ करना आसान काम नहीं है । संगीतकार को इस ‘झमाझम’ दौर में खुद को बहुत संयत और संवेदनशील रखना पड़ता है । और ‘अनुरूप’ को इस मामले में सौ में से दो सौ नंबर देने चाहिए ।
अनुरूप में वाक़ई समझदारी है । गजल की धुन बहुत प्यारी है । सादा है । जिस तरह से ‘और’ को लहराके गवाया है वो मन को लुभा जाता है । रिदम सेक्‍शन बढिया है । अच्छी बात ये है कि गजल के सुनहरे दौर के किसी भी कंपोजर की छाया नहीं है कंपोजीशन में । इसमें आधुनिकता भी है और परंपरा भी ।
तकनीकी द़ृष्टि से भी मैं इस मिक्सिंग से पूरी तरह संतुष्ट हूं । मुझे नहीं पता कि इसे भी आप सभी ने अपने अपने शहरों में अलग अलग रहकर तैयार किया या सिटिंग कर सके । पर कुल मिलाकर जो रचना तैयार हुई वो अच्छी है । बल्कि उत्कृष्ट है ।
अब एक तल्ख़ बात कहूंगा । शायर के लिए । ये जरूरी भी है । मनुज मेहता की शायरी बहुत साधारण है । बेहतर होता कि इतने अच्छे गायक और संगीतकार की तरह शायर से कुछ बेहतर लिखवाया जाता । ग़ज़ल सचमुच बहुत ही साधारण है । अगर इस छोटी सी गजल के हर शेर में गहराई होती तो यकीन मानिए ये रचना डाउनलोड होकर कई दिनों तक मेरे कंप्‍यूटर पर बज रही होती । गायक और संगीतकार को बधाईयां, लटके झटकों से बचने के लिए ।
8/10
तेरे चेहरे पे..., को तीसरे निर्णायक ने मिले 8 /10, कुल अंक अब तक 21 /30

चलते चलते...

पहले चरण के बाद जुलाई के जादूगर ४ गीतों की पोजीशन इस प्रकार है -

आवारा दिल २४ / ३०
संगीत दिलों का उत्सव है २४ / ३०
तेरे चेहरे पे २१ / ३०
बढे चलो २० / ३०


हम आपको याद दिला दें कि कुल अंक ५० में से दिए जायेंगे, यानी अन्तिम दो निर्णायकों के पास २० अंक हैं, अन्तिम चरण की रेंकिंग जनवरी में होगी, जिसके बाद ही अन्तिम फैसला होगा, सरताज गीत का और टॉप १० का भी, फिलहाल हम मिलेंगे अगले महीने के पहले रविवार को, अगस्त के अश्वरोही गीतों की पहली समीक्षा लेकर.

हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.

Sunday, August 10, 2008

समीक्षा के अखाडे में दूसरा दंगल

सरताज गीत बनने की जंग शुरू हो चुकी है, जुलाई के जादूगर गीत, जनता की अदालत में हाज़री बजाने के बाद, पहले चरण की समीक्षा की कठिन परीक्षा से गुजर रहे हैं, जैसा की हम बता चुके हैं कि पहले चरण में ३ समीक्षक होंगे और दूसरे और अन्तिम चरण में दो समीक्षक होंगे, समीक्षा का दूसरा चरण सत्र के समापन के बाद यानी जनवरी के महीने शुरू होगा, फिलहाल देखते हैं कि पहले चरण के, दूसरे समीक्षक ने जुलाई के जादूगरों को कितने कितने अंक दिए हैं. इस समीक्षा के अंकों में पहली समीक्षा के अंक जोड़ दिए गए हैं जिसके आधार पर, हमारे श्रोता देख पाएंगे कि कौन सा गीत है, अब तक सबसे आगे.

गीत समीक्षा

संगीत दिलों का उत्सव है ....

पहला गीत है “संगीत दिलों का उत्सव है…” सभी गीतों में सबसे श्रेष्‍ठ.. गीत संगीत और गायकी सब कुछ एकदम परफेकक्ट ... गीत संगीत और गायकी तीनों पक्षों में ताजगी लगती है। बीच बीच में आलाप बहुत प्रभावित करता है। इस गीत को 8 नंबर दे रहा हूँ।

संगीत दिलों का उत्सव है... को दूसरे निर्णायक द्वारा मिले 8/10 अंक, कुल अंक अब तक 14 /20

बढे चलो.

दूसरा गीत है “बढ़े चलो…”, आज के हिन्द का युवा...ठीक कह सकते हैं। बहुत दिल को छू नहीं पाया। आज के प्रचलन के हिसाब से ठीक है। गायकी अच्छी है पर संगीत तेज है और वाद्ययंत्रों की आवाज हावी हो जाने के कारण गीत में वो बात नहीं बन पाई जो गीत के बोलों के हिसाब से बन सकती थी। इस गीत को मैं 6 नंबर ही दे पा रहा हूँ.

बढे चलो, को दूसरे निर्णयक से अंक मिले 6 / 10, कुल अंक अब तक 13 /20.

आवारा दिल.

तीसरा गीत है, “आवारा दिल…”। बढ़िया गीत... इतनी कम उम्र में संगीतकार ने जो काम किया है उस हिसाब से उनका भविष्य उज्जवल है। गीत अच्छा संगीत बेहतर और गायकी बेहतरीन इस गीत को 7 नंबर दे रहा हूँ।

आवारा दिल, को दूसरे निर्णायक से मिले 7 / 10, कुल अंक अब तक 15 /20.


तेरे चेहरे पे ...

आखिरी गीत एक गज़ल है “तेरे चेहरे पे…”। छोटा सी ग़ज़ल, संगीत गीत और गायकी में ताजगी। बहुत बढ़िया संयोजन। इस गीत को भी 7 नंबर मिल रहे हैं

तेरे चेहरे पे..., को दूसरे निर्णायक ने मिले 7 /10, कुल अंक अब तक 13 /20

चलते चलते...

तो दोस्तों, दो समीक्षकों के निर्णय आ चुके हैं, अभी भी पहले चरण में "आवारा दिल" ने बढ़त कायम रखी है, "संगीत दिलों का उत्सव है..." तीसरे स्थान से उछल कर दूसरे पर आ गया है, और शीर्ष गीत को कड़ी चुनौती दे रहा है. अब तीसरे (पहले चरण के अन्तिम) समीक्षक के निर्णय के बाद ही स्थिति साफ़ हो पायेगी. तीसरे समीक्षक की पारखी समीक्षा लेकर हम उपस्थित होंगे अगले रविवार को. हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.

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