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Wednesday, February 1, 2017

"नवलेखन ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना मेरे लेखन यात्रा का टर्निंग पॉइंट रहा" - पंकज सुबीर II एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है 
एपिसोड - 48



निर्देशक कृष्ण कान्त पंडया की आने वाली फिल्म "बियांबान - the curse of women" आधारित है जाने माने साहित्यकार पंकज सुबीर की कहानी 'दो एकांत' पर. इस कहानी और इस फिल्म की मेकिंग पर बातचीत करने के लिए आज हमारे साथ है पंकज सुबीर. प्ले का बट्टन दबाएँ और सुनें इस दिलचस्प बातचीत को....



ये एपिसोड आपको कैसा लगा, अपने विचार आप 09811036346 पर व्हाट्सएप भी कर हम तक पहुंचा सकते हैं, आपकी टिप्पणियां हमें प्रेरित भी करेगीं और हमारा मार्गदर्शन भी....इंतज़ार रहेगा.

एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें


मिलिए इन जबरदस्त कलाकारों से भी -
राशिद खान, दिग्विजय सिंह परियारराकेश चतुर्वेदी ओम, अनवर सागरसंजीवन लालकुणाल वर्माआदित्य शर्मानिखिल कामथमंजीरा गांगुली, रितेश शाह, वरदान सिंह, यतीन्द्र मिश्र, विपिन पटवा, श्रेया शालीन, साकेत सिंह, विजय अकेला, अज़ीम शिराज़ी, संजोय चौधरी, अरविन्द तिवारी, भारती विश्वनाथन, अविषेक मजुमदर, शुभा मुदगल, अल्ताफ सय्यद, अभिजित घोषाल, साशा तिरुपति, मोनीश रजा, अमित खन्ना (पार्ट ०१), अमित खन्ना (पार्ट २), श्रध्दा भिलावे, सलीम दीवान, सिद्धार्थ बसरूर, बबली हक, आश्विन भंडारे , आर्व, रोहित शर्मा, अमानो मनीष, मनोज यादव, इब्राहीम अश्क, हेमा सरदेसाई, बिस्वजीत भट्टाचार्जी (बिबो), हर्षवर्धन ओझा, रफीक शेख, अनुराग गोडबोले, रत्न नौटियाल, डाक्टर सागर

Friday, March 25, 2016

लव जिहाद उर्फ़ उदास आँखों वाला लड़का


बोलती कहानियां : एक नया अनुभव - 01 

बोलती कहानियां के नए संस्करण में आज प्रस्तुत है पंकज सुबीर की कालजयी रचना "लव जिहाद उर्फ़ उदास आँखों वाला लड़का". प्रमुख स्वर है अनुज श्रीवास्तव का, और संयोजन है संज्ञा टंडन का. सुनिए और महसूस कीजिये इस कहानी के मर्म को, जो बहुत हद तक आज के राजनितिक माहौल की सच्चाई को दर्शाता है.

"लड़का बहुत कुछ भूल चुका है। बहुत कुछ। उसके मोबाइल में अब कोई गाने नहीं हैं। न सज्जाद अली, न रामलीला, न आशिक़ी 2। जाने क्या क्या सुनता रहता है अब वो। दिन भर दुकान पर बैठा रहता है। मोटर साइकिल अक्सर दिन दिन भर धूल खाती है। कहीं नहीं जाता। आप जब भी उधर से निकलोगे तो उसे दुकान पर ही बैठा देखोगे। अब उसके गले में काले सफेद चौखाने का गमछा परमानेंट डला रहता है और सिर पर गोल जालीदार टोपी भी। दाढ़ी बढ़ गई है। बढ़ी ही रहती है।" - इसी कहानी से

लेखक का परिचय
पंकज सुबीर उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार । उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को इंडिपेंडेंट मीडिया सोसायटी (पाखी पत्रिका) द्वारा वर्ष 2011 का स्व. जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान । उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार। कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी वर्ष 2008 में भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार हेतु अनुशंसित। कहानी संग्रह महुआ घटवारिन को कथा यूके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान। समग्र लेखन हेतु वर्ष 2014 में वनमाली कथा सम्मान। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तीन कहानी संकलनों लोकरंगी प्रेम कथाएँ, नौ लम्बी कहानियाँ तथा युवा पीढ़ी की प्रेम कथाएँ में प्रतिनिधि कहानियाँ सम्मिलित। कहानी शायद जोशी कथादेश अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत । पाकिस्तान की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका आज ने भारत की कहानी पर केन्द्रित विशेषांक में चार कहानियों का उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया। कहानियाँ, व्यंग्य लेख एवं कविताएँ नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, हँस, लमही, प्रगतिशील वसुधा, हिंदी चेतना, परिकथा, सुख़नवर, सेतु, वागर्थ, कथाक्रम, कथादेश, समर लोक, संवेद वराणसी, जज्बात, आधारशिला, समर शेष है, लफ्ज़, अभिनव मीमांसा, अन्यथा जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित। इसके अलावा समाचार पत्रों के सहित्यिक पृष्ठों पर भी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दैनिक भास्कर, नव भारत, नई दुनिया, लोकमत आदि हिंदी के प्रमुख समाचार पत्र शामिल हैं। कई कहानियों का तेलगू , पंजाबी, उर्दू में अनुवाद। कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध कार्य । सह संपादक : हिंदी चेतना, वेब संपादक : परिकथा, वेब संपादक : लमही, वेब संपादक : दूसरी परंपरा समन्वयक (भारत) : हिन्दी प्रचारिणी सभा (हिन्दी चेतना), कैनेडा प्रकाशित पुस्तकेंः ईस्ट इंडिया कम्पनी (कहानी संग्रह), महुआ घटवारिन (कहानी संग्रह ), ये वो सहर तो नहीं (उपन्यास), युवा पीढ़ी की प्रेम कथाएँ (कहानी संकलन), नौ लम्बी कहानियाँ (कहानी संकलन), लोकरंगी प्रेमकथाएँ (कहानी संकलन), एक सच यह भी (कहानी संकलन), हिन्दी कहानी का युवा परिदृश्य (संपादन श्री सुशील सिद्धार्थ)

Friday, February 17, 2012

बोलती कहानियाँ: एक रात (रेडियो ड्रामा)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुभव प्रिय की आवाज़ में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की कहानी "शत्रु" का पॉडकास्ट सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं प्रसिद्ध कथाकार पंकज सुबीर की कहानी "एक रात", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

 कहानी "एक रात" का कुल प्रसारण समय 11 मिनट 6 सेकंड है। इस बार हमने इस प्रसारण  में कुछ नये प्रयोग किये हैं। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी, जो अब तक खुद को जिंदा समझता था, कल रात सचमुच में मर गया।
 ~ पंकज सुबीर

हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

बरसात इतनी तेज़ रफ़्तार से हो रही है कि वाइपर की फुल स्पीड के बाद भी विंडस्क्रीन साफ़ नहीं हो पा रही है।
 (पंकज सुबीर की "एक रात" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3


#Sixth Story, Ek Raat: Pankaj Subeer/Hindi Audio Book/2012/6. Voice: Anurag Sharma

Saturday, May 15, 2010

सुनो कहानी: पंकज सुबीर की कहानी तुम लोग

तुम लोग - पंकज सुबीर

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं रोचक कहानियां, नई और पुरानी। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हरिशंकर परसाई की दर्दनाक कहानी "बाबू की बदली" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं पंकज सुबीर की कहानी "तुम लोग", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 15 मिनट 58 सेकंड।

प्रस्तुत कहानी का टेक्स्ट सुखनवर पत्रिका के मार्च-अप्रैल अंक में उपलब्ध है।

पंकज सुबीर की कहानियां पलाश और ईस्ट इंडिया कम्पनी आप पहले ही आवाज़ पर सुन चुके हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



एक एक रंग को खूबसूरती के साथ सजाया है प्रकृति ने इसकी पंखुरियों पर, बीच में ज़र्द पीले रंग का छींटा, फ़िर सिंदूरी और किनारों पर कहीं कहीं चटख़ लाल, संपूर्णता का एहसास लिये।
~ पंकज सुबीर

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

अरे पंडित! जब मरोगे न, तब यहीं के लोग दौड़ेंगे सबसे पहले।
(पंकज सुबीर की "तुम लोग" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें।
VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis

#Twenty Eighth Story, Tum Log: Pankaj Subeer/Hindi Audio Book/2010/09. Voice: Anurag Sharma

Tuesday, August 18, 2009

१० बेहद दुर्लभ गीत गुलज़ार साहब के, चुने हैं पंकज सुबीर ने


सम्‍पूरन सिंह कालरा नाम के इस शख्‍स का जन्‍म 18 अगस्‍त 1936 को दीना नाम की उस जगह में हुआ जो कि आजकल पाकिस्‍तान में है । ये शख्‍स जिसको कि आजकल हम गुलज़ार के नाम से जानते हैं । गुलज़ार जो कि अभी तक 20 फिल्‍मफेयर और 5 राष्‍ट्रीय पुरुस्‍कार अपने गीतों के लिये ले चुके हैं । साथ ही साहित्‍य अकादमी पुरुस्‍कार और जाने कितने सम्‍मान उनकी झोली में हैं । सिक्‍ख धर्म में जन्‍म लेने वाले गुलज़ार का गाने लिखने से पहले का अनुभव कार मैकेनिक के रूप में है। आज हम बात करेंगें उन्‍हीं गुलज़ार साहब के कुछ उन गीतों के बारे में जो या तो फिल्‍म नहीं चलने के कारण उतने नहीं सुने गये या फिर ऐसा हुआ कि उसी फिल्‍म का कोई गीत बहुत जियादह मकबूल हो गया और ये गीत बहुत अच्‍छा होने के बाद भी बरगद की छांव तले होकर रह गया । मैंने आज जो 10 गीत छांटे हैं वे सारे गीत लता मंगेशकर तथा गुलज़ार साहब की अद्भुत जुगलबंदी के गीत हैं ।

सबसे पहले हम बात करते हैं 1966 में आई फिल्‍म सन्‍नाटा के उस अनोखे प्रभाव वाले गीत की । गुलज़ार साहब के गीतों को सलिल चौधरी जी, हेमंत कुमार जी और पंचम दा के संगीत में जाकर जाने क्‍या हो जाता है । वे नशा पैदा करने लगते हैं । सन्‍नाटा में यूं तो लता जी के चार और हेमंत दा का एक गीत था । संगीत जाहिर सी बात है हेमंद दा का ही था । ये गीत लता जी और हेमंत दा दोनों ने गाया था लेकिन मुझे लता जी का गाया ये गीत बहुत पसंद है ।



जया भादुड़ी की किस्‍मत है कि उनको गुलज़ार जी के कुछ अच्‍छे गीत मिले । 1972 में आई नामालूम सी फिल्‍म दूसरी सीता में भी जया ही थीं और संगीत दिया था पंचम दा ने । ये गीत मुझे बहुत पसंद है इसमें एक विचित्र सी उदासी है और एक रूह में समा जाने वाली बेचैनी है जो लता जी ने अपने स्‍वर से पैदा की है । सुनिये गीत



1996 में आई फिल्‍म माचिस गुलजा़र साहब की बनाई हुई एक अनोखी फिल्‍म थी । विशाल भारद्वाज ने कुछ अनूठे गीत रचे थे । लोकप्रिय हुए छोड़ आए हम, चप्‍पा चप्‍पा और लता जी का ही पानी पानी । मगर मुझे लगता है कि फिल्‍म में लता जी के ही गाये हुए इस गीत को जितना सराहा जाना था इसे उतना सराहा नहीं गया । जंगल से जाती पगडंडियों पर देखो तो शायद पांव पड़े हों, जैसे शब्‍दों को फिल्‍म के अन्‍य गीतों की छांव में रह जाना पड़ा । मेरे विचार से ये माचिस का सर्वश्रेष्‍ठ गीत है ।



2001 में आई फिल्‍म लाल सलाम । उस समय गुलज़ार साहब, ह्रदयनाथ जी और लता जी की तिकड़ी ने लेकिन और माया मेमसाब जैसी फिल्‍में दी थीं । उसके बाद ही ये फिल्‍म आई । लोगों को याद है फिल्‍म का मितवा गीत क्‍योंकि वहीं प्रोमो में बजता था । फिल्‍म नहीं चली और गीत भी अनसुने रह गये । लता जी ने वैसे तो चार गीत गाये और चारों ही अनोखे थे । मगर मुझे पसंद है सबसे जियादह मराठी शब्‍दों से भरा ये गीत ।




1977 में आई फिल्‍म पलकों की छांव में याद है आपको, वही जिसमें डाकिया डाक लाया जैसा मशहूर गीत था । लक्ष्‍मीकांत प्‍यारेलाल की जोड़ी और गुलज़ार साहब की जुगलबंदी ने फिल्‍म यूं तो अल्‍ला मेघ दे जैसा गीत भी रचा था लेकिन मुझे तो जाने क्‍यों पसंद आता है ये गीत जिसमें है रातों के सन्‍नाटों की सरसराती हुई आवाज़ें । सुनिये वहां जहां एक बार ठहर कर फिर गीत प्रारंभ होता है ।



1972 में आई फिल्‍म अनोखा दान में सलिल चौधरी और गुलजार साहब की जादुई जोड़ी ने एक ही गीत बनाया था । दरअसल में गुलजार साहब ने फिल्‍म का एक ही गीत लिखा था बाकी नहीं । गीत एक था मगर हजारों पर भारी था । ये आनंद का गीत है । ये प्रेम का गीत है । ये जवानी का गीत है । सुनिये और आनंद लीजिये लता जी की आवाज़ का ।



1986 में आई फिल्‍म गुलामी आपको याद होगी अमीर खुसरो और गुलज़ार साहब के संकर गीत जिहाले मस्‍कीं के कारण, जिसके बोल भले ही समझ में नहीं आते थे पर फिर भी इसे खूब पसंद किया गया । लक्ष्‍मी कांत प्‍यारे लाल जी ने फिल्‍म के तीनों गीत खूब बनाये थे । मुझे पसंद है लता जी का ये गीत जो तीन बार होता है और बहुत अच्‍छा होने के बाद भी जिहाले मस्‍कीं की आंधी में दब कर रह गया ।



1968 में आई राहगीर हेमंत दा के संगीत और गुलजार साहब के गीतों से सजी हुई थी । आपको तो याद होगी जनम से बंजारा हूं बंधू की जिसे हेमंत दा ने जिस हांटिंग अंदाज में गाया है उसे सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । मगर क्‍या करें हमें तो आज उन गीतों की बात करनी है जो कम सुने गये । ये गीत तो विशेष अनुरोध करता हूं की जरूर सुनें और बार बार सुनें ये उसी योग्‍य है




1988 इस फिल्‍म के तो सारे ही गीतों के साथ अन्‍याय हुआ । सजीव जी ने तो मुझसे यहां तक पूछा कि पंकज जी लिबास फिल्‍म रिलीज हुई थी या नहीं । क्‍या अनोखे गीत । लता जी के चार गीत और चारों एक से बढ़कर एक । सब सुनने योग्‍य मगर मुझे यही जियादह पसंद आता है । अलग तरीके का ये गीत भीड़ में भी अलग ही दिखाई देता है ।



और अंत में 1971 में आई गुलज़ार साहब की ही फिल्‍म मेरे अपने जिसका संगीत सलिल दा ने दिया था । और आपको एक ही गाना याद होगा कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों । यदि ये सच है तो आपने गुलजार साहब का सबसे अनोखा गीत नहीं सुना है । ये गीत कई बार सुनिये । सुनिये सलिल दा के हांटिंग संगीत को, सुनिये गुलज़ार साहब के अनोखे शब्‍दों को और सुनिये लता जी की आवाज़ को एक बिल्‍कुल नये रूप में । इस गीत के लिये भी कहूंगा कि कई कई बारे सुनें । और मुझे इजाज़त दें । जैराम जी की ।




प्रस्तुति - पंकज सुबीर

हमें यकीन है है कि पंकज जी के चुने इन १० दुर्लभ गीतों की ये पोस्ट आपके लिए एक संग्रहण की वस्तु बन चुकी होंगी. आज गुलज़ार साहब के जन्मदिन पर ये था आवाज़ का ख़ास तोहफा ख़ास आपके लिए. इन दस गीतों में से एक या दो गीत जरूर ऐसे होंगें जिन्हें आज आपने पहली बार सुना होगा. हमें बताईये कौन से हैं वो गीत जो आज आपने पंकज जी की इस पोस्ट में पहली बार सुनें.

Sunday, June 14, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (7)

क्‍या आपको याद है नाजिया हसन की
1980 में जब एकाएक ही एक नाम संगीत में धूमकेतू की तरह उभरा था और पूरा देश गुनगुना रहा था 'आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आये तो बात बन जाये '' उस समय ये गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि इसने वर्ष के श्रेष्‍ठ गीत की दौड़ में फिल्‍म आशा के गीत "शीशा हो या दिल हो" को पछाड़ कर बिनाका सरताज का खिताब हासिल कर लिया था । उस समय फिल्‍मी गीतों का सबसे विश्‍वसनीय काउंट डाउन बिनाका गीत माला में लगातार 14 सप्‍ताह तक ये गीत नंबर वन रहा । "कुर्बानी" के इस गीत को गाने वाली गायिका थी नाजिया हसन और संगीत दिया था बिद्दू ने । एक बिल्‍कुल अलग तरह का संगीत जो कि साजों से ज्यादह इलेक्‍ट्रानिक यंत्रों से निकला था उसको लोगों ने हाथों हाथ लिया । नाजिया की बिल्‍कुल नए तरह की आवाज का जादू लोगों के सर पर चढ़ कर बोलने लगा ।

नाजिया का जन्‍म 3 अप्रैल 1965 को कराची पाकिस्‍तान में हुआ था । और जब नाजिया ने कुर्बानी फिल्‍म का ये गीत गाया तो नाजिया की उम्र केवल पन्‍द्रह साल थी । इस गीत की लोकप्रियता को देखते हुए बिद्दू ने नाजिया को प्राइवेट एल्‍बम लांच करने का विचार किया और जब ये विचार मूर्त रूप तक आया तो इतिहास बन चुका था । नाजिया तथा उसके भाई जोएब हसन ने मिलकर 1980 में पूरे संगीत जगत को हिला कर रख दिया था । "डिस्‍को दीवाने" एक ऐसा एलबम था जो कि न जाने कितने रिकार्ड तोड़ता गया । तब ये ब्‍लैक में बिकता था और लोगों ने इसे खरीदने के 50 रुपये ( तब एल पी रेकार्ड चलते थे जो पचास रुपये के होते थे ) के स्‍थान पर 100 रुपये 150 रुपये भी दिये । हालंकि दोनों भाई बहन मिलकर लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे थे लेकिन नाजिया की आवाज़ का जादू सर चढ़ कर बोला था । आओ ना प्‍यार करें और डिस्‍को दीवाने जैसे गानों ने कुर्बानी की सफलता को कायम रखा था ।

नाजिया हसन की शिक्षा लंदन में हुई तथा अधिकांश समय भी वहीं बीता । 1995 में नाजिया की शादी मिर्जा इश्तियाक बेग से हुई और फिर एक बेटा अरीज भी हुआ किन्‍तु वैवाहिक जीवन सफल नहीं रहा तथा 2000 में नाजिया का तलाक हो गया । नाजिया ने अपनी कमाई का काफी बड़ा हिस्‍सा चैरेटी में लगा दिया था और वे कई संस्‍थाओं के लिये काम करती रहीं । भारत में भी इनरव्‍हील के माध्‍यम से बालिकाओं के लिये काफी काम किया । 13 अगस्‍त 2000 को 35 साल की उम्र में नाजिया का फेफड़ों के केंसर से निधन हो गया । नाजिया की मृत्‍यु के बाद पाकिस्‍तान सरकार ने नाजिया को सर्वोच्‍च सम्‍मान 'प्राइड आफ परफार्मेंस' प्रदान किया ।

डिस्‍को दीवाने पाकिस्‍तानी भाई बहन का एक ऐसा एल्‍बम था जो कि उस समय का एशिया में सबसे जियादह बिकने वाला एल्‍बम बना । न केवल दक्षिण एशिया बल्कि रशिया, ब्राजील, इंडोनेशिया में भी उसकी लोकप्रियता की धूम मची । पूरे विश्‍व में 14 बिलियन कापियों के साथ ये एल्‍बम नंबर वन बना और नाजिया सुपर स्‍टार बन गई । नाजिया के गाने डिस्‍को दीवाने ने ब्राजील के चार्ट बस्‍टर में सबसे ऊपर जगह बनाई ।

इस एल्‍बम में कुल मिलाकर 10 ट्रेक थे जिनमें से 7 बिद्दू के संगीतबद्ध किये हुए थे और 3 अरशद मेहमूद के । गीत लिखे थे अनवर खालिद, मीराजी और हसन जोड़ी ने ।

कुर्बानी(1980)के बाद दोनों भाई बहनों ने भारत की कुछ फिल्‍मों जैसे स्‍टार(बूम बूम)(1982),शीला(1989),दिलवाला(1986),मेरा साया(नयी)(1986),मैं बलवान(1986),साया(1989),इल्‍जाम (1986)जैसी फिल्‍मों में गीत गाये लेकिन "आप जैसा कोई" की सफलता को नहीं दोहरा सके, उसमें भी कुमार गौरव की सुपर फ्लाप फिल्‍म 'स्‍टार' में तो नाजिया जोहेब के दस गाने थे । वहीं डिस्‍को दीवाने के बाद दोनों ने मिल कर स्‍टार (बूम बूम)(1982), यंग तरंग(1984), हाटलाइन(1987),कैमरा'कैमरा(1992),दोस्‍ती जैसे प्राइवेट एल्‍बम और भी निकाले लेकिन यहां भी डिस्‍को दीवाने की कहानी दोहराई नहीं जा सकी । हालंकि ये एल्‍बम चले लेकिन डिस्‍को दीवाने तो एक इतिहास था । 1982 में आये एल्‍बम बूम बूम के सारे गीतों को कुमार गौरव की फिल्‍म स्‍टार में लिया गया था जिसमें कुमार गौरव ने एक गायक की ही भुमिका निभाई थी । गाने तो पूर्व से ही लोकप्रिय थे किन्‍तु फिल्‍म को उसका लाभ नहीं मिला ।

तो आइये इस रविवार सुबह की कॉफी का आनंद लें डिस्‍को दीवाने के गीतों के संग.

आओ न प्‍यार करें (नाजिया हसन)


डिस्‍को दीवाने (नाजिया हसन)


लेकिन मेरा दिल (नाजिया हसन)


मुझे चाहे न चाहे (नाजिया और जोहब)


कोमल कोमल (नाजिया हसन)


तेरे कदमों को (नाजिया और जोहेब)


दिल मेरा ये (नाजिया हसन )


धुंधली रात के (नाजिया हसन)


गायें मिलकर (नाजिया हसन)


डिस्‍को दीवाने (इंस्‍ट्रूमेंटल)


इस रविवार सुबह की कॉफी के अनमोल गीतों को परोसा है पंकज सुबीर ने.


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Wednesday, May 20, 2009

पतझर सावन बसंत बहार...अनुराग शर्मा के काव्य संग्रह पर पंकज सुबीर की समीक्षा


पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा
पुस्तक - पतझर सावन बसंत बहार (काव्य संग्रह)
लेखक - अनुराग शर्मा और साथी (वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया)
समीक्षक - पंकज सुबीर


पिट्सबर्ग अमेरिका में रहने वाले भारतीय कवि श्री अनुराग शर्मा का नाम वैसे तो साहित्‍य जगत और नेट जगत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है । किन्‍तु फिर भी यदि उनकी कविताओं के माध्‍यम से उनको और जानना हो तो उनके काव्‍य संग्रह पतझड़, सावन, वसंत, बहार को पढ़ना होगा । ये काव्‍य संग्रह छ: कवियों वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया और अनुराग शर्मा की कविताओं का संकलन है । यदि अनुराग जी की कविताओं की बात की जाये तो उन कविताओं में एक स्‍थायी स्‍वर है और वो स्‍वर है सेडनेस का उदासी का । वैसे भी उदासी को कविता का स्‍थायी भाव माना जाता है । अनुराग जी की सारी कविताओं में एक टीस है, ये टीस अलग अलग जगहों पर अलग अलग चेहरे लगा कर कविताओं में से झांकती दिखाई देती है । टीस नाम की उनकी एक कविता भी इस संग्रह में है ’’एक टीस सी उठती है, रात भर नींद मुझसे आंख मिचौली करती है ।‘’

अनुराग जी की कविताओं की एक विशेषता ये है कि उनकी छंदमुक्‍त कविताएं उनकी छंदबद्ध कविताओं की तुलना में अधिक प्रवाहमान हैं । जैसे एक कविता है ‘जब हम साथ चल रहे थे तक एकाकीपन की कल्‍पना भी कर जाती थी उदास’ ये कविता विशुद्ध रूप से एकाकीपन की कविता है, इसमें मन के वीतरागीपन की झलक शब्‍दों में साफ दिखाई दे रही है । विरह एक ऐसी अवस्‍था होती है जो सबसे ज्‍यादा प्रेरक होती है काव्‍य के सृजन के लिये । विशेषकर अनुराग जी के संदर्भ में तो ये और भी सटीक लगता है क्‍योंकि उनकी कविताओं की पंक्तियों में वो ‘तुम’ हर कहीं नजर आता है । ‘तुम’ जो कि हर विरह का कारण होता है । ‘तुम’ जो कि हर बार काव्‍य सृजन का एक मुख्‍य हेतु हो जाता है । ‘घर सारा ही तुम ले गये, कुछ तिनके ही बस फेंक गये, उनको ही चुनता रहता हूं, बीते पल बुनता रहता हूं ‘ स्‍मृतियां, सुधियां, यादें कितने ही नाम दे लो लेकिन बात तो वही है । अनुराग जी की कविताओं जब भी ‘तुम’ आता है तो शब्‍दों में से छलकते हुए आंसुओं के कतरे साफ दिखाई देते हैं । साफ नजर आता है कि शब्‍द उसांसें भर रहे हैं, मानो गर्मियों की एक थमी हुई शाम में बहुत सहमी हुई सी मद्धम हवा चल रही हो । जब हार जाते हैं तो कह उठते हैं अपने ‘तुम’ से ‘ कुछेक दिन और यूं ही मुझे अकेले रहने दो’ । अकेले रहने दो से क्‍या अभिप्राय है कवि का । किसके साथ अकेले रहना चाहता है कवि । कुछ नहीं कुछ नहीं बस एक मौन सी उदासी के साथ, जिस उदासी में और कुछ न हो बस नीरवता हो, इतनी नीरवता कि अपनी सांसों की आवाज को भी सुना जा सके और आंखों से गिरते हुए आंसुओं की ध्‍वनि भी सुनाई दे ।

एक कविता में एक नाम भी आया है जो निश्चित रूप से उस ‘तुम’ का नहीं हो सकता क्‍योंकि कोई भी कवि अपनी उस ‘तुम’ को कभी भी सार्वजनिक नहीं करता, उसे वो अपने दिल के किसी कोने में इस प्रकार से छुपा देता है कि आंखों से झांक कर उसका पता न लगाया जा सके । "पतझड़ सावन वसंत बहार" संग्रह में अनुराग जी ने जो उदासी का माहौल रचा है उसे पढ़ कर ही ज्‍यादा समझा जा सकता है । क्‍योंकि उदासी सुनने की चीज नहीं है वो तो महसूसने की चीज है सो इसे पढ़ कर महसूस करें ।

इसी संग्रह से पेश है कुछ कवितायें, पंकज सुबीर और मोनिका हठीला के स्वरों में -
एक टीस सी उठती है...


जब हम चल रहे थे साथ साथ...


मेरे ख़त सब को पढाने से भला क्या होगा...


जब तुम्हे दिया तो अक्षत था...


कुछ एक दिन और...


जिधर देखूं फिजा में रंग मुझको....


साथ तुम्हारा होता तो..


पलक झपकते ही...


कितना खोया कितना पाया....




Sunday, April 19, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (3)

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीतों की सौगात लेकर हम फिर से हाज़िर हैं. आज आपके लिए कुछ ख़ास लेकर आये हैं हम सबके प्रिय पंकज सुबीर जी. हमें उम्मीद ही नहीं यकीन है कि पंकज जी का ये नायाब नजराना आप सब को खूब पसंद आएगा.

असमिया संगीतकार और गायक श्री भूपेन हजारिका का गीत "ओ गंगा बहती हो क्‍यों" जब आया तो संगीत प्रेमियों के मानस में पैठता चला गया । हालंकि भूपेन दा काफी पहले से हिंदी फिल्‍मों में संगीत देते आ रहे हैं किन्‍तु उनको हिंदी संगीत प्रेमियों ने इस गाने के बाद हाथों हाथ लिया । यद्यपि 1974 में आई फिल्‍म "आरोप" जिसके निर्देशक श्री आत्‍माराम थे तथा जिसमें विनोद खन्‍ना और सायरा बानो मुख्‍य भूमिकाओं में थे उस फिल्‍म का एक गीत जो लता जी तथा किशोर दा ने गाया था वो काफी लोकप्रिय हुआ था । गीत था- "नैनों में दर्पण है दर्पण में कोई देखूं जिसे सुबहो शाम" । इस फिल्‍म के संगीतकार भी भूपेन दा ही थे । भूपेन दा और गुलजार साहब ने मिलकर जब "रुदाली" का गीत संगीत रचा तो धूम ही मच गई । रुदाली में इस जादुई जोड़ी के साथ त्रिवेणी के रूप में आकर मिली लता जी की आवाज । और फिर श्रोताओं को मिले दिल हूम हूम करे, समय ओ धीरे चलो जैसे कई सारे अमर गीत । रुदाली का संगीत बहुत पापुलर संगीत है और वो उस दौर का संगीत है जब "माया मेमसाब", "लेकिन", "रुदाली" जैसी फिल्‍मों में हट कर संगीत आ रहा था । किन्‍तु आज हम बात करेंगें एक ऐसी फिल्‍म की जिसमें यही टीम थी और संगीत भी ऐसा ही अद्भुत था लेकिन किसी कारण से न तो फिल्‍म को कोई महत्‍व मिला और संगीत भी उसी प्रकार से आकर चुपचाप ही चला गया । यहां तक कि रुदाली फिल्‍म की निर्देशिका कल्‍पना लाजमी ही इस फिल्‍म "एक पल" की भी निर्देशिका थीं । किन्‍तु जहां रुदाली आई थी 1993 में तो एक पल आई थी 1985 में । अर्थात लगभग आठ साल पहले ।

तो आइये बात करते हैं एक पल की और सुनते हैं उसके वे अद्भुत गीत ।
1985 में आई एक पल में शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख जैसे कलाकार थे । जाहिर सी बात है कि ये एक आफ बीट फिल्‍म थी । 1985 में मार धाड़ की फिल्‍मों का दौर चल रहा था और शायद इसीलिये ये फिल्‍म और इसके गीत कुछ अनसुने से होकर गुज़र गये थे । संगीत भूपेन दा का था और गीत लिखे थे कैफी आजमी साहब और गुलजार साहब ने मिलकर ।

यदि अपनी बात कहूं तो मुझे लता जी का गाया तथा गुलजार सा‍हब का लिखा गीत 'जाने क्‍या है जी डरता है, रो देने को जी करता है, अपने आप से डर लगता है ' सबसे पसंद है । जाने किस मानसिकता में लिखा गया है ये गीत । शब्‍द ऐसे कि लगता है मानो किसी ने हमारे ही भावों को अभिव्‍यक्ति दे दी है । उस पर लता जी ने जिस हांटिंग स्‍वर में गाया है, ऐसा लगता है कि बार बार सुनते रहो इस गीत को ।

जाने क्‍या है जी डरता है


एक और गीत है जो लता जी, भूपेन दा तथा गुलजार साहब की ही त्रिवेणी ने रचा है । शब्‍द देखें 'चुपके चुपके हम पलकों में कितनी सदियों से रहते हैं, आ डूब के देखें नीले से सागर में कैसे बहते हैं, आ जाना डूब के देखेंगें' ये गीत भी एक ऐसा गीत है जिसे रात की ख़ामोशी में सुन लो तो नशा ही छा जाये ।' जो सोचा है वो झूठ नहीं महसूस किया वो पाप नहीं, हम रूह की आग में जलते हैं ये जिस्‍म का झूठा ताप नहीं' जैस्‍ो शब्‍दों का जादू देर तक सर पर चढ़ा रहता है ।

चुपके चुपके


कैफी आजमी साहब का लिखा हुआ एक गीत है जो कि दो स्‍वरों में है भूपेंद्र तथा आशा भौंसले जी ने अलग अलग इस गीत को अपनी तरह से गाया है । 'आने वाली है बहार सूने चमन में, कोई फूल खिलेगा प्‍यारा सा कोमल तन में' ये गीत दोनों ही बार आनंद देता है । आशा जी की खनकदार आवाज़ जो गीतों में प्राण फूंक देती है उसने इस गीत को अमर कर दिया है । भूपेंद्र ने गीत का सेड वर्शन गाया है । जाहिर सी बात है उसमें संगीत भी वैसा ही है ।

आने वाली है बहार


आने वाली है बहार (आशा)


एक और गीत जो मुझे हांट करता है वो लता जी और भूपेन दा के स्‍वरों में है तथा गुलजार साहब ने लिखा है । गीत के बोल हैं 'मैं तो संग जाऊं बनवास, स्‍वामी न करना निरास, पग पग संग जाऊं, जाऊं बनवास हे' गीत के बोल ही बता रहे हैं कि राम के बनवास गमन पर गीत है । जिसमें लता जी बनवास ग वन गमन की जिद कर रहे हैं और भूपेन दा रोकने के लिये अपनी बात कर रहे हैं । 'जंगल बन में घूमे हाथी भालू शेर और हिरना, नारी हो तुम डर जाओगी न जाओ बनवास हे '' । अनोखा सा गीत है ये ।

मैं तो संग


गुलजार साहब के एक और गीत को झूम कर गाया है नितिन मुकेश, भूपेन दा और भूपेंद्र ने । 'फूले दाना दाना फूले डालियां भंवराता आया बैसाख' इस गीत में असम के बीहू की ध्‍वनियां भूपेन दा ने उपयोग की हैं ।'बाजरे की बाली सी छोरिया, गेहूं जैसी गोरिया, रात को लागे चांदनी, ऐसी ला दे जोरुआ' । मुझे नहीं मालूम असम में बैसाख कैसा आता है किन्‍तु इस गीत में तो अद्भुत मस्‍ती है बैसाख की । और अंत में जब गीत तेज होता है तो वो पंक्तियां 'पूर्णिमा अगनी जल गई रजनी, जल्‍दी करा दे रे मंगनी, हो मैया करा दे रे' गीत देर तक मस्‍ती देता रहता है । बीच बीच में भूपेन दा का स्‍वर किसी जादू की तरह आता है ।

फूले दानादाना


गुलज़ार साहब का एक और गीत है जो दो बार है एक बार सेड है और एक हैप्‍पी है । सेड में केवल भूपेंद्र ने गाया है और हैप्‍पी वर्शन में भूपेन दा, भूपेंद्र, उषा मंगेशकर तथा हेमंती शुक्‍ला ने इसे गाया है । विवाह गीत है ये 'जरा धीरे जरा धीमे ले के जइहो डोरी, बड़ी नाज़ुक मेरी जाई मेरी बहना भोली' । गीत में भी लोक संगीत की ध्‍वनियां हैं और भरपूर हैं ।

जरा धीरे


तो ये है संगीत फिल्‍म 'एक पल' का जिसे निर्देशित किया था कल्‍पना लाजमी ने । फिल्‍म भले ही यूंही आकर यूंही चली गई हो किन्‍तु इसका संगीत अमर है । ये लोक का संगीत है ।

प्रस्तुति - पंकज सुबीर

पिछले अंक में विकास शुक्ल जी ने हमसे लता जी के गाये एक गीत की फरमाईश की थी, हमने एक बार फिर अजय जी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्होंने ढूंढ निकला वह दुर्लभ गीत जिसे विकास जी ढूंढ रहे थे. आप भी सुनिए फिल्म "गजरे" से ये गीत "बरस बरस बदरी बिखर गयी...", संगीत है अनिल बिस्वास का -





"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Monday, March 16, 2009

नवलेखन पुरस्कार वितरण समारोह की रिकॉर्डिंग

हिन्द-युग्म महत्वपूर्ण सार्वजनिक साहित्यिक समारोहों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराता रहा है ताकि कार्यक्रम का आनंद वे लोग भी ले सकें जो सशरीर समारोह उसमें सम्मिलित नहीं हो सकते। सबसे पहले हमने उदय प्रकाश का कहानीपाठ सुनवाया। फिर तेजेन्द्र शर्मा और गौरव सोलंकी के कथापाठ की रिकॉर्डिंग सुनवाई थी।

आज सुनिए १४ मार्च २००९ को भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित नवलेखन पुरस्कार वितरण समारोह की रिकॉर्डिंग। इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता की भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान २००६ से सम्मानित कवि कुँवर नारायाण। इसके अलावा इस कार्यक्रम में अतिथि के दौर पर अजित कुमार, कैलाश वाजपेयी, अशोक वाजपेयी, ऋता शुक्ल, रवीन्द्र कालिया उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में १३ नई साहित्यकि पुस्तकों का विमोचन हुआ। जिसमें हिन्द-युग्मी विमल चंद्र पाण्डेय और पंकज सुबीर के पहले कहानी-संग्रहों का विमोचन भी शामिल था।

शुरू के ५० सेकेण्ड की रिकॉर्डिंग हमारे पास उपलब्ध नहीं है। कुल समयः २ घण्टे १५ मिनट

सुनें-


आप भी अपने इर्द-गिर्द के होने वाले इस तरह के साहित्यिक आयोजनों की रिकॉर्डिंग podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं। यदि प्रसारित करने लायक गुणवत्ता रही तो प्रसारित कर हमें खुशी होगी।


Saturday, March 14, 2009

पंकज सुबीर के कहानी-संग्रह 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' का विमोचन कीजिए

दोस्तो,

आज सुबह-सुबह आपने भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित कथा-संग्रह 'डर' का विमोचन किया और इस संग्रह से एक कहानी भी सुनी। अब बारी है लोकप्रिय ब्लॉगर, ग़ज़ल प्रशिक्षक पंकज सुबीर के पहले कहानी-संग्रह 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' के विमोचन की। गौरतलब है कि इस पुस्तक के साथ-साथ १२ अन्य हिन्दी साहित्यिक कृतियों के विमोचन का कार्यक्रम आज ही हिन्दी भवन सभागार, आईटीओ, नई दिल्ली में चल रहा है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता २००६ के भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित कवि कुँवर नारायण कर रहे हैं। सभी पुस्तकों का विमोचन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के हाथों होना है।

लेकिन घबराइए नहीं। हम आपको ऑनलाइन और पॉडकास्ट विमोचन का नायाब अवसर दे रहे हैं, जिसके तहत आप इस कहानी-संग्रह का विमोचन अपने हाथों कर सकेंगे, वह भी शीला दीक्षित से पहले। साथ ही साथ हम इस कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी भी सुनवायेंगे। तो कर दीजिए लोकार्पण

अनुराग शर्मा की आवाज़ में इस संग्रह की शीर्षक कहानी 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' नीचे के प्लेयर से सुनें: -


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें
ईस्ट इंडिया कम्पनी mp3




आपको बताते चलें कि युवा कहानीकार पंकज सुबीर के इस कथासंग्रह में अलग-अलग रंगों की १५ कहानियाँ सम्मिलित हैं। संग्रह में ईस्ट इंडिया कम्पनी के अलावा अन्य कहानियां हैं कुफ्र, अंधेरे का गणित, घेराव, ऑंसरिंग मशीन, हीरामन, घुग्घू, तस्वीर में अवांछित, एक सीप में, ये कहानी नहीं है, रामभरोस हाली का मरना, तमाशा, शायद जोशी, छोटा नटवरलाल, तथा और कहानी मरती है हैं। ये सारी ही कहानियां वर्तमान पर केन्द्रित हैं। शीर्षक कहानी ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी उस मानसिकता की कहानी है जिसमें उंगली पकड़ते ही पहुंचा पकड़ने का प्रयास किया जाता है। कुफ्र कहानी में धर्म और भूख के बीच के संघर्ष का चित्रण किया गया है। अंधेर का गणित में समलैंगिकता को कथावस्‍तु बनाया गया है तो घेराव और रामभरोस हाली का मरना में सांप्रदायिक दंगे होने के पीछे की कहानी का ताना बाना है। आंसरिंग मशीन व्‍यवस्‍था द्वारा प्रतिभा को अपनी आंसरिंग मशीन बना लेने की कहानी है। हीरामन ग्रामीण परिवेश में लिखी गई एक बिल्‍कुल ही अलग विषय पर लिखी कहानी है। घुग्‍घू कहानी में देह विमर्श कथा के केन्‍द्र में है जहां गांव से आई एक युवती के सामन कदम-कदम पर दैहिक आमंत्रण हैं। तस्‍वीर में अवांछित कहानी एक ऐसे पुरुष की कहानी है जो कि अपनी व्‍यस्‍तता के चलते अपने ही परिवार में अवांछित होता चला जाता है। एक सीप में तीन लड़कियां रहती थीं मनोवैज्ञानिक कहानी है जिसमें एक ही घर में रहने वाली तीन बहनों की कहानी है जो एक एक करके हालात का शिकार होती हैं। ये कहानी नहीं है साहित्‍य के क्षेत्र में चल रही गुटबंदी और अन्‍य गंदगियों पर प्रकाश डालती है। तमाशा एक लड़की के अपने उस पिता के विद्रोह की कथा है जो उसके जन्‍म के समय उसे छोड़कर चला गया था। शायद जोशी मनोवैज्ञानिक कहानी है। छोटा नटवरलाल में समाचार चैनलों द्वारा समाचारों को लेकर जो घिनौना खेल खेला जाता है उसे उजागर करती है। और कहानी मरती है लेखक की हंस में प्रकाशित हो चुकी वो कहानी है जिसमें कहानी के पात्र कहानी से बाहर निकल निकल कर उससे लड़तें हैं और उसे कटघरे में खड़ा करते हैं। ये पंद्रह कहानियां अलग अलग स्‍वर में वर्तमान के किसी एक विषय को उठाकर उसकी पड़ताल करती हैं और उसके सभी पहलुओं को पाठकों के सामने लाती हैं।

आने वाले दिनों में आप कहानी-कलश पर इस कहानी-संग्रह की कुछ कहानियाँ पढ़ सकेंगे और साथ उनके पॉडकास्ट भी सुन सकेंगे।

Saturday, March 7, 2009

सुनो कहानी: होली पर विशेष

होली के शुभ अवसर पर पंकज सुबीर की रोचक कहानी पलाश

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं रोचक कहानियां, नई और पुरानी। पिछले सप्ताह आपने नीलम मिश्रा की आवाज़ में कुर्रत-उल-ऐन हैदर की रचना ''फोटोग्राफर'' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज होली के शुभ अवसर पर हम लेकर आये हैं पंकज सुबीर की रोचक कहानी "पलाश", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 18 मिनट।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

'मेड़ पर पड़े हुए पेड़ के कटे हुए हिस्से पर बैठ कर फाल्गुनी पलाश के फूलों पर धीरे धीरे हाथ फेरने लगी, कितने मुलायम हैं ये फूल मखमल की तरह । एक एक रंग को खूबसूरती के साथ सजाया है प्रकृति ने इसकी पंखुरियों पर, बीच में ज़र्द पीले रंग का छींटा, फ़िर सिंदूरी और किनारों पर कहीं कहीं चटख़ लाल, संपूर्णता का एहसास लिये ।'
(पंकज सुबीर की "पलाश" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


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#Twenty Eighth Story, Palash: Pankaj Subeer/Hindi Audio Book/2009/09. Voice: Anurag Sharma

Saturday, October 11, 2008

अँधेरी रात का सूरज - राकेश खंडेलवाल के बहुप्रतीक्षित काव्य संग्रह का ऑनलाइन विमोचन

कौन हूँ मैं, ये मैं भी नहीं जानता, आईने का कोई अक्स बतलायेगा असलियत क्या मेरी, मैं नहीं मानता..."

अपने ब्लॉग गीत कलश पर ये परिचय लिखने वाले राकेश खंडेलवाल जी ख़ुद को जाने या न जाने पर समस्त ब्लॉग्गिंग जगत उन्हें उनकी उत्कृष्ट कविताओं के माध्यम से जानता भी है और पहचानता भी है. आज उनकी प्रतीक्षित पुस्तक "अँधेरी रात का सूरज" का लोकार्पण है. चूँकि राकेश जी का प्रवास अमेरिका में है तो औपचारिक विमोचन आज राजधानी मंदिर औडीटोरियम में, वर्जीनिया और वाशिंगटन हिन्दी समिति द्वारा शाम ६.३० बजे डा० सत्यपाल आनंद (उर्दू,हिन्दी,पंजाबी और अंग्रेजी के विश्व प्रसिद्ध लेखक व कवि ), कनाडा से समीर लाल, न्यू जर्सी से अनूप एवं रजनी भार्गव, राले (नार्थ केरोलाइना) से डा० सुधा ढींगरा, न्यू जर्सी से ही सुरेन्द्र तिवारी, फिलाडेल्फिया से घनश्याम गुप्ता की उपस्थिति में होना है, जहाँ स्थानीय कवि एवं साहित्यकारों में श्री गुलशन मधुर ( भारत में विविध भारती के उद्घोषक रहे हैं ) मधु माहेश्वरी, डा० विशाखा ठाकर, बीना टोडी, रेखा मैत्र, डा० सुमन वरदान, डा० नरेन्द्र टंडन भी उपस्तिथ रहेंगे ऐसी सम्भावना है.

उधर सीहोर में पुस्तक के प्रकाशक, शिवना प्रकाशन ने जो आयोजन रखा है उसमें अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों की जानी मानी कवियित्री मोनिका हठीला के हाथों विमोचन होगा । वहीं हिंदी की मनीषी विद्वान तथा प्रोफेसर डॉ श्रीमती पुष्पा दुबे "अंधेरी रात का सूरज" पर अपनी विशेष टिप्‍पणी करेंगीं । इस आयोजन में शहर के सभी कवि साहित्यकार तथा पत्रकार उपस्थित रहेंगें.

अब अगर आप वॉशिंगटन नही जा सकते और सीहोर पहुँचाना भी आपके लिए मुश्किल हो तो क्या करें ? घबराईये नही, हिंद युग्म आवाज़ आज अपने इस अनूठे प्रयास के माध्यम से न सिर्फ़ आपको इस आयोजन से जोड़े रखेगा बल्कि आज आप इस पुस्तक की पहली झलक पाने वाले पहले पाठक/श्रोता होंगे. हमारा मानना है कि आवाज़ पर पधारने वाला हर अतिथि हमारे लिए विशेष है, इसीलिए हम चाहेंगे कि यह पुस्तक जो कि पाठकों के लिए बनी है, ख़ुद पाठकों के हाथों से इसका विमोचन हो.

तो दोस्तों बस एक क्लिक से करें राकेश जी के काव्य संग्रह का विमोचन -



स्वागत करें श्री राकेश खंडेलवाल जी का, कि वो कहें कुछ 'अपनी बात' -

कभी कभी अपनी बात कहना बहुत मुश्किल हो जाता है। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू किया जाये। ऐसा ही कुछ मुझे लग रहा है । क्या बात करूँ और कहां से प्रारंभ करूँ ?

लिखने की आदत जो भारत में रहते हुए निरन्तर प्रगति करती रही थी, अमेरिका आने के पश्चात व्यस्त जीवन में मंद गति से चलती रही। वाशिंगटन क्षेत्र में हिन्दी साहित्य प्रेमियों के बढ़ते हुए समूह ने इसे थोड़ा विस्तार दिया। एक घटना जिसने मुझे इस दिशा में तीव्र गति से बढ़ने को प्रेरित किया वह था मेरा श्री अनूप भार्गव से परिचय। फिलाडेल्फिया में रहने वाले माननीय घनश्याम गुप्ता जी एक अच्छे कवि और मित्र हैं। उनके बुलावे पर सन 1998 में फिलाडेल्फिया के कवि सम्मेलन में अनूपजी से हुआ परिचय प्रगाढ़ मित्रता में परिवर्तित हो गया । उनके तकनीकी ज्ञान ने जून 2003 में ईकविता समूह की रूपरेखा बनाई और प्रारंभ से ही मुझे इससे जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और कलम फिर प्रवाहित होती चली गई।

उन्हीं के सहयोग से सन 2005 में अपना ब्लाग गीतकलश शुरू किया । इस यात्रा के दौरान कई कवि मित्रों और साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त हुआ जिनके उल्लेख के बिना मेरी बात अधूरी रह जायेगी। टोरांटो में रहने वाल समीर लाल जी से परिचय तो ब्लाग और फोन के माध्यम से था पर व्यक्तिगत तौर पर पहली बार उनसे मुलाकात बंफेलो (न्यूयार्क) में सितम्बर 2006 के कवि सम्मेलन में हुई। उनके विशेष प्रेम ने गीतकलश का रूप निखारा। पंकज सुबीर जी की सह्रदयता और निश्छलता उनके अतुलित ज्ञान को सम्मानित करती है और उनकी बातें निरन्तर लेखन की प्रेरणा होती हैं।

कई नाम ऐसे हैं जिनका उल्लेख इसलिये आवश्यक है कि उनके सहयोग के बिना यह रचनायें पुस्तक का रूप नहीं ले पातीं। सियेटल में रह रहे लोकप्रिय कवि अभिनव शुक्ल, विवेचनात्मक कवि श्री रिपुदमन पचौरी, श्री घनश्याम गुप्ता, परम आदरणीय श्री कुँअर बेचैनजी, महाकवि आदरणीय श्री गुलाब खंडेलवाल जी और माँ शारदा की वीणा को रंगों की तूलिका में परिवर्तित करने वाले कुशल चितेरे श्री विजेन्द्र विज इन सभी मित्रों एवं स्नेही जनों का अनुग्रह मेरा प्रेरणा स्रोत रहा है ।

मेरी कलम से जो भी लिखा गया, मैं इसे अपना योगदान नहीं मानता । मैंने सदैव कहा है-

काव्य का व्याकरण मैंने जाना नहीं
शब्द कांगा पे ही उतरते गये
भावनाओं की गंगा उमड़ती रही
छंद के शिल्प खुद ही सँवरते गये।

आपके हाथों में यह शब्द समन्वय है,आपको कितना पसन्द आया, यह जानने की आकाँक्षा रहेगी।

-राकेश खण्डेलवाल

पुस्तक की प्रस्तावना लिखते हुए कवि कुंवर बैचैन कहते हैं कि कविवर राकेश खण्डेलवाल के गीत सुसंस्कृत भाषा और संस्कृति के संवाहक हैं -

शब्द कोश के एक पृष्ठ पर अनेक शब्द यूँ ही उदास पड़े हुए थे । उन्हीं में एक शब्द कुछ ज्यादा ही उदास था ।इन शब्दों की उदासी से होती हुई जब एक कवि की नार इस अमुक शब्द पर पड़ी, वह जो अधिक उदास था, तो वह वहीं ठहरी रही ।
कवि ने उस शब्द से पूछा- ''भाई, तुम तो गीत हो, फिर इतने उदास क्यों हो ?''
शब्द कोश के पन्ने पर बैठे हुए ही गीत ने भरे मन से कहा- ''कविवर अगर मैं दुखी न होऊँ तो फिर क्या करूँ ? आज के कवि मेरी ओर ध्यान ही नहीं देते । कुछों को छोड़कर, जो ध्यान देते भी हैं, वो मुझे मेरे व्यक्तित्व के अनुसार लोक-जीवन के मंच पर नहीं लाते । मेरे जो मान-दण्ड हैं, जो मानक हैं उनकी उपेक्षा करते हैं और कुछ भी कहने लग जाते हैं ।''
''नहीं यह तो सच नहीं है । तुम्हें तो प्रत्येक युग में कवियों ने अपना कंठहार बनाया है । लोक जीवन से लेकर साहित्यिक मंचों तक तुम्हारा ही बोलबाला रहा है । तुम लोक में लोक गीत बनकर छाये रहे हो । सजी हुई दुल्हनों और बालिकाओं की ढोलक की थाप पर तुम खूब थिरके हो । खेतों में धान बोती सुकुमारियों और फस्लों को काटती मजदूरिनों को भी तुम रिझाते रहे हो । यहीं नहीं, तुम तो बड़े बड़े शिष्ट-विशिष्ट साहित्यकारों की लेखनी को भी अपना आशीष देते रहे हो । चाहे संस्कृत के कवि जयदेव हों, चाहे मैथिल कोकिल विद्यापति, चाहे ब्रज भाषा-शिरोमणि सूर हों या अवधि सम्राट तुलसी सभी को तुम्हारा स्नेह मिला है और उन्होंने तुम्हारा आदर किया है । ...फिर तुम इतने दुखी क्यों हो ?'' कवि ने कहा ।
''ये तो तुम ठीक ही कहते हो कविवर, किन्तु क्या तुमने लोगों से यह कहते हुए नहीं सुना कि गीत तो मर गया है'' गीत ने प्रश्न किया ।
''हाँ, सुना तो है, किन्तु क्या गीत कभी मर सकता है, कभी मरा है, वह तो अमर है । निराला, प्रसाद, महादेवी, बच्चन से लेकर आज तक क्या तुम जीवित नहीं हो । यह कहने वाले कि गीत मर गया है, अब कहने लगे हैं कि गीत तो अमर है ।''
कवि ने प्रतिप्रश्न करते हुए गीत से पूछा- ''क्या तुमने राकेश खण्डेलवाल का नाम सुना है ?''
''सुना तो है, लेकिन वे तो सात समुन्दर पार के देश अमेरिका में रहते हैं ?''
''हाँ, वे रहते भले ही अमेरिका में हों, किन्तु उनकी भाव-भूमि भारतीय ही है । उनमें भारत की मिट्टी की ही सुगंध है जो उनके गीतों के शब्द-पुष्पों में भीतर तक समाई हुई है । सुगंध ही नहीं वरन् इन शब्द-पुष्पों का रूप रंग भी भारतीय ही है । उनमें जो रस है वह भी कन्हैया द्वारा रचाई जाने वाली रास का प्रेम रस है, जिसमें शृँगार है, तन्मयता है, नशा है, उमंग है, लय है, नाद है, उन्मुक्तता है, निश्चिंतता है, योग है और सहयोग भी ।''
इस पर गीत कवि से सम्मोहित होते हुए बोला- ''कविवर फिर राकेश खण्डेलवाल के गीतों पर कोई चर्चा करो न ।''
कवि प्रसन्न हुआ और इस प्रकार व्याख्या करनी प्रारम्भ की । आइये आप भी कवि द्वारा बताई गईं उन विशेषताओं का आनंद लीजिये जो कविवर राकेश खण्डेलवाल के गीतों में सहज रूप में मिल जाती हैं.....

यों राकेश जी ने आधुनिक यथार्थ को भी अपनी कविता का विषय बनाया है और उसे बड़ी ही बारींकी से चित्रित भी किया है किन्तु राकेश जी मूलत: प्रेम के कवि हैं । उनके गीतों का प्राण यदि है तो वह प्रेम ही है । प्रेम का आत्मालाप-अभिव्यक्ति, आशा-निराशा, संयोग-वियोग, प्रशंसा-उपालम्भ, दुख-सुख, रूठना-मनाना, पूजा-अर्चन और सौन्दर्य-वर्णन सभी का चित्रण पूरे मनोयोग और सहजता के साथ कवि ने किया है ।

प्रेम में प्रेम का उपासक अपने प्रिय को रिझाने के लिये क्या नहीं करता । उसका भरसक प्रयास यही रहता है कि वह सब कुछ ऐसा करे जो प्रिय उसकी ओर ध्यान दे । ध्यान देना ही कांफी नहीं है, वरन् उस पर रीझ भी जाए । किन्तु प्रिय है कि उसका पाषाण हृदय पिघलता ही नहीं । प्रिय को रिझाने के लिये उसने क्या नहीं किया । सैकड़ों गीतों की रचना करके उसकी आराधना की, मगर प्रिय है कि उसकी ओर उसका ध्यान ही नहीं देता । ऐसी निष्ठुरता ऐसा पाहनपन भी कैसा-

आह न बोले, वाह न बोले
मन में है कुछ चाह न बोले
जिस पग पर चलते मेरे पग
कैसी है वह राह न बोले
फिर भी आराध्य, हृदय के पाषाणी, इतना बतला दो
कितने गीत और लिखने हैं ?
कितने गीत और लिखने हैं, लिखे सुबह से शाम हो गई ।
थकी लेखनी लिखते लिखते, स्याही सभी तमाम हो गई ॥


यह वह प्रेमी है जिसने अपने गीतों के शब्दों में गुलाब, गुलमोहर और चंदन की सुगंध भरी, नदिया-ताल-सरोवर के जल का कलकल नाद लिया, कोयल की कुहुक को समोया, अंधियारी रात में भी प्रिय के लिये चांदनी के चित्र बनाये, अर्चना की थाली में साधारण दीप नहीं, वरन् सितारों के दीप सजाए, एक एक पल प्रिय के नाम का जाप करने में लगा दिया और वह भी इस विश्वास के साथ कि कवि के गीतों को अपने प्रिय से ही स्वर मिलते हैं, आवारा भावों को शब्दों का अनुशासन मिलता है, छंदबध्दता मिलती है । प्रिय को आराध्य और स्वयं को आराधक मान कर हर तरह से उसकी उपासना की, किन्तु जैसे उपासक का व्रत खंडित हो गया हो या निष्ठा निष्काम हो गई हो ऐसा प्रतीत हुआ-

किन्तु उपासक के खंडित व्रत जैसा तप रह गया अधूरा
और अस्मिता दीपक की लौ में जलकर गुमनाम हो गई
बन आराधक मैंने अपनी निष्ठा भागीरथी बनाई
लगा तुम्हारे मंदिर की देहरी पर वह निष्काम हो गई


लेकिन प्रेम कभी थकता नहीं । यदि वह सच्चा है तो कभी निराश भी नहीं होता । प्रेम करना ही प्रेम को पाना है । प्रेम के प्रस्थान बिन्दु पर विश्वास ही प्रेम के चरमोत्कर्ष पर पहुँचना है । प्रिय का अनुग्रह, उसकी अनुकम्पा पान ही प्रेमी का लक्ष्य है । प्रिय यदि एक प्रकार से खुश नहीं होता तो दूसरी कोई युक्ति निकालता है किन्तु अंतत: प्रिय की अनुकम्पा पा ही लेता है-

अनुभूति को अहसासों को, बार बार पिंजरे में डाला
एक अर्थ से भरा नहीं मन, अर्थ दूसरा और निकाला ,
आदि-अंत में, धूप-छांव में, केवल किया तुम्हें ही वर्णित
अपने सार संकल्पों में मीत तुम्हें ही सदा सँभाला
मिली तुम्हारे अनुग्रह की अनुकम्पा शायद इसीलिये तो
सावन की काली मावस्या, दोपहरी की घाम हो गई ।....


यह बात सच है कि अब प्रेमी को अपने प्रिय की कृपा प्राप्त हो गई है किन्तु ऐसा भी समय आया था जब प्रेम के आराधक ने पत्थरों को भी सिंदूर में रंग दिया था, बरगदों के नीचे बैठकर मन्नतें मांगी थीं, शाम को घी के दीपक जलाए थे, घंटियां बजाईं थीं, शंख से जल चढ़ाया था, शास्त्रों में लिखे मंत्रों का उच्चारण किया था, एकादशी का उपवास रखा था, पूर्णिमा को नारायणी का पाठ किया था, रामायण-भागवत-गीता सभी को पढ़ा, वेद-श्रुतियाँ-ऋचाओं और उपनिषदों में भी उलझा रहा, किन्तु धुंध के बादल छंटे ही नहीं थे, और न भाग्य की रेखा ही बदली थी, किन्तु आंखिरकार प्रिय के ंकदमों को प्रेमी की ओर मुडना ही पड़ा । ..और जैसे ही प्रिय के पग इधर को उठे वैसे ही-

यों लगा मुस्कुराने लगी हर दिशा
छंद की पालकी में विचरने लगे
भाव मन की उमड़ती हुई आस के ।


इतना ही नहीं, वरन् प्रिय के स्वागत में प्रिय के पाँवों को चूमने के लिये डालियों से फूल स्वयं ही झरने लगे, डालियाँ प्रिय के साथ झूलने को आतुर हो उठीं, पुरवाई के झौंके उँगली थाम कर चल पड़े, हरी दूब पंजों पर उचक उचक कर उसे देखने लगी, उपवन में कलियाँ खिल उठीं, पत्तों पर रंग आने लगा, भंवरे उल्लास के गीत गाने लगे, सोया हुआ बसंत जाग गया, धूप प्रिय की राह में अल्पना सजाने लगी, कोंपलें अपनी पलकें मलने लगीं, ताल में शतदल कमल खिल उठे, गुलमोहर अपने नयनों में नवीन सपने सजाने लगा। यही नहीं वरन् बड़े-बड़े संन्यासियों ने भी अपने पारम्परिक गेरुए परिधान को त्याग दिया और वे भी प्रिय के रंग में रंग गए-

भूलकर अपने पारम्परिक वेश को
आपके रंग में सब रंगे रह गए
जिन पे दूजा न चढ़ पाया कोई कभी
सारे परिधान थे जो भी संन्यास के


गीत के प्रधान गुणों में आत्मभिव्यक्ति और आत्म निवेदन का विशेष महत्व है । गीत एक प्रकार से प्रेमी द्वारा प्रिय को लिखे प्रेम पत्र होते हैं जिनमें हृदय के समस्त संवेगों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है । यह बात अलगी रही कि होठों पर लगे संकोच के ताले बहुत दिनों बाद खुलते हैं और गाहे-ब-गाहे मौन रह जाना पड़ता है-

एक तुम्हारा प्रश् अधूरा
दूजे उत्तर जटिल बहुत था
तीजे रुंधे कंठ की वाणी
इसीलिये मैं मौन रह गया


गीत अनुभूतियों का आईना है । तरह तरह की अनुभूतियाँ होती रहती हैं, गीतकार उन्हीं को शब्द देता है । ...और अनुभूतियाँ अनन्त हैं, असीम हैं । गीतकार की इच्छा होती है कि वह कुछ ऐसा लिखे जो अद्वितीय हो । उससे पहले वैसा और नयी शैली में न कहा गया हो प्रेम के उस रूप को गीत का विषय बनाए जो बिल्कुल नया नवेला हो । ऐसी प्रीत जिसका जिक्र इतिहास में अब तक न हुआ हो । राकेश जी कहते हैं-

बहुत दिनों से सोच रहा हूं कोई गीत लिखूं
इतिहासों में मिले न जैसी ऐसी प्रीत लिखूं


कवि की चाहत है कि वह ऐसी प्रीत के बारे में कुछ कहे जिसमें भुजपाशों की सिहरन का कोई अर्थ न हो, थरथराते हुए अधर ही सारी कहानी को कह दें, प्रीति करने की वह रीति हो जिसके अनगिन और नये आयाम हों । उसकी कामना है वह चातक और पपीहे का मनमीत बनकर गीत लिखे । वैसे भी गीत और प्रीत का अमर संबंध है ।

-डॉ. कुँअर बेचैन

पुस्तक का कवर design किया है देश के ख्‍यात चित्रकार श्री विजेंद्र विज जी का जिन्‍होंने गहरे हरे रंग पर अपनी पेंटिंग से वो जादू रचा विजेंद्र विज जी ने जो चित्र आवरण के लिये चयन किया वो पुस्‍तक के शीर्षक को पूरी तरह से व्‍यक्‍त करता है । तिस पर ये कि उन्‍होंने जा रंग संयोजन किया है वो भी अद्भुत है । ऐसा लगता है कि अभी रंग बोल उठेंगें और राकेश जी के गीतों को गुनगुनाने लगेंगें.

अब आते हैं कविताओं पर. यूँ तो बहुत मुश्किल है हमारे लिए कि हम इस अदभुत कविता संग्रह में से मात्र कुछ कवितायें चुनें, पर फ़िर भी हमने पंकज सुबीर जी जिनका कि आज जन्मदिन भी है, की मदद से कुछ रचनाएँ चुनीं और साथ माँगा गजब के संगीत प्रेमी और सर से लेकर पांव तक कला में डूबे श्री संजय पटेल भाई का. संजय भाई आवाज़ के श्रोताओं के लिए और हिन्दी चिट्टाजगत के लिए एक जाना माना नाम है, यूँ तो सालों से बतौर उद्घोषक उन्होंने बहुत नाम कमाया है, पर बहुत कम लोगों ने उनकी जादू भरी आवाज़ सुनी होगी क्योंकि वो एक ऐसे शख्स हैं जो औरों की तारीफों में अपनी तारीफ करना भूल जाते हैं...आज आवाज़ की टीम गर्व के साथ उनकी आवाज़ को पहली बार इन्टरनेट पर प्रस्तुत कर रही है, राकेश जी की कविताओं को उन्होंने जिस अंदाज़ में पेश किया है वो साबित करता है कि वो कितने अच्छे काव्य मर्मज्ञ भी हैं... सुनें और आनंद लें -


चरखे का तकवा....



हम गीतों के गलियारों में ...



एक दीपक वही....



साँझा बाती के दीपक की...



मोनिका हठीला अखिल भारतीय कवियित्री हैं ‍कच्छ भुज की रहने वाली हैं । किसी कवि सम्‍मेलन से रायपूर से लौट रहीं थीं सीहोर में अपने मायके में रुकीं तो पंकज जी उनका अधिकार पूर्वक समय लिया । पेश है उनकी मधुर आवाज़ में राकेश जी के कुछ मुक्तक और कवितायें.



इन्टरनेट पर पहली बार मुखरित हो रही है पंकज सुबीर जी की आवाज़ भी आज इस शुभ अवसर पर साथ में हैं श्री रमेश हठीला जिन्होंने एक कविता गाई है वे मंच के स्थापित कवि रहे हैं पर अभी संन्यास ले चुके हैं । इनकी आवाजों में कुछ मुक्‍तक और गीत राकेश जी के हैं ।



हमारी ये प्रस्तुति आपको कैसी लगी, हमें अवश्य बतायें....पुस्तक की प्रति पाने के लिए संपर्क करें-

अँधेरी रात का सूरज : (काव्य-संग्रह)

राकेश खण्डेलवाल

1713 Wilcox Lane, Silver Spring

MD 20906-5945, USA

+2028777919

rakeshkhandelwal1k@gmail.com,

http://geetkalash.blogspot.com

मूल्य : मात्र 350 रुपये, 25$ US

प्रथम संस्करण : अक्टूबर 2008

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन

Shivna Prakashan, P.C.Lab, Shop 3,4,5 Samrat Complex Basement,

Opp. New Bus Stand, Sehore, M.P. 466001, India +91-9977855399

www.subeer.com/prakashan.html

ग्राफिक एफ्फेक्ट्स - प्रशेन

Monday, September 29, 2008

लता संगीत पर्व- महीने भर चला संगीत प्रेमियों का उत्सव

आवाज़ पर आयोजित लता संगीत उत्सव पर एक विशेष रिपोर्ट और सुनें लता जी के चुने हुए २० गीत एक साथ.

जब हमने लता संगीत उत्सव की शुरुवात की थी इस माह के पहले सप्ताह में, तब दो उद्देश्य थे, एक भारत रत्न और संगीत के कोहिनूर लता मंगेशकर पर हिन्दी भाषा में कुछ सहेजनीये आलेखों का संग्रह बने और दूसरा लता दी के चाहने वाले इंटरनेटिया श्रोताओं को हम प्रेरित करें की वो लता जी के बारे में हिन्दी भाषा में लिखें. जहाँ तक दूसरे उद्देश्य का सवाल है, हमें बहुत अधिक कमियाबी नही मिल पायी है. कुछ लिखते लिखते रह गए तो कुछ जब तक लिखना सीख पाते समय सीमा खत्म हो चली. प्रतियोगिता की दृष्टि से मात्र एक ही प्रवष्टि हमें मिली जिसे हम आवाज़ पर स्थान दे पाते. नागपुर के २२ वर्षीय अनूप मनचलवार ने अपनी मुक्कम्मल प्रस्तुति से सब का मन मोह लिया, सुंदर तस्वीरें और slide शो से अपने आलेख को और सुंदर बना दिया. हमारे माननीय निर्णायक श्री पंकज सुबीर जी ने अनूप जी को चुना है लता संगीत पर्व के प्रथम और एक मात्र विजेता के रूप में, अनूप जी को मिलेंगीं ५०० रुपए मूल्य की पुस्तकें और "पहला सुर" एल्बम की एक प्रति. अनूप जी का आलेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं. अनूप मनचलवार जी को बधाई देते हुए हम आगे बढ़ते हैं, अगर हम अपने पहले उद्देश्य की बात करें तो हम इस आयोजन को एक बहुत बड़ी सफलता कहेंगे. पेश है इस सफर की कुछ झलकियाँ-



किसी भी सफल आयोजन के लिए जरूरी है एक सफल शुरुवात. और ये शुरुवात हमें मिली जब आयोजन के कर्णधार और हमारे प्रिये पंकज सुबीर भाई ने लता जी की आवाज़ में रूह की वादियों में बह रही दिलरुबा नदी से मिलवाया. लता जी की मुंहबोली बहन और स्वर्गीय कवि/गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह ने जब लता जी के साथ बीते उनके व्यक्तिगत जीवन के कुछ मधुर क्षणों को याद किया तो पाठकों की आँखें सजल हो उठीं.

फ़िर आमद हुई इस आयोजन में संजय पटेल भाई की, जो लाये साथ में लता जी का सुगम संगीत. कुछ ऐसी ग़ज़लें और नगमें जिन्हें सिर्फ़ सुनना काफ़ी नही उन्हें समझना भी जरूरी है, लता जी के गायन की उंचाईयों की झलक पाने के लिए. संजय भाई ने जिस खूबी से इसे अपने पहले और दूसरे आलेख में प्रस्तुत किया उसे पढ़ कर और सुनकर हमरे श्रोताओं ने हमें ढेरों बधाईयाँ भेजीं, जिसे हम सादर संजय भाई को प्रेषित कर रहे हैं. फ़िर लौटे पंकज भाई अपनी शीग्र प्रकाशनीये कहानी में लता जी का जिक्र लेकर. हिंद युग्मी तपन शर्मा ने जानकारीपूर्ण आलेख दिया सुर की देवी के नाम, वहीँ लता जी के जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर संजय भाई ने पेश की माया गोविन्द की एक अद्भुत कविता,स्वर कोकिला को समर्पित. और कल यानी जब लता जी ने अपने परिवार के साथ अपना ७९ वां जन्मदिन मना रही थी, तब यहाँ हिंद युग्म पर संजय भाई ने एलान किया कि प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर. इससे बेहतर भेंट हम संगीत प्रेमी क्या दे सकते थे साक्षात् माँ सरस्वती का रूप लेकर धरती पर आयी इस आवाज़ को, जिसका नाम है लता मंगेशकर. इस सफल आयोजन के लिए हिंद युग्म आवाज़ परिवार आप सब का एक बार फ़िर आभार व्यक्त करता है. चलते चलते संजय भाई ने जो कहा लता जी के लिए उसे दोहरा दें क्योंकि यही हम सब के मन की दुआ है -

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.

सुनिए आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए २० नायाब गीत लता जी के, एक साथ. हमने कोशिश की है कि लता जी के हर अंदाज़ की एक झलक इन गीतों में आपको मिले, आनंद लें -

Monday, September 22, 2008

पंकज सुबीर की कहानी "शायद जोशी" में लता मंगेशकर

(ये आलेख नहीं है बल्कि मेरी एक कहानी ''शायद जोशी'' का अंश है ये कहानी मेरे कहानी संग्रह ''ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी'' की संभावित कहानियों में से एक है ।)

- पंकज सुबीर

अचानक उसे याद आया कल रात को रेडियो पर सुना लता मंगेशकर का फिल्म शंकर हुसैन का वो गाना 'अपने आप रातों में' । उसे नहीं पता था कि शंकर हुसैन में एक और इतना बढ़िया गाना भी है वरना अभी तक तो वो 'आप यूं फासलों से गुज़रते रहे' पर ही फिदा था । हां क्या तो भी शुरूआत थी उस गाने की 'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं, चौंकते हैं दरवाज़े सीढ़ियाँ धड़कती हैं' उफ्फ क्या शब्द हैं, और कितनी खूबसूरती से गाया है लता मंगेशकर ने ।

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और उस पर खैयाम साहब का संगीत, कोई भारी संगीत नहीं, हलके हल्‍के बजते हुए साज और बस मध्यम मध्यम स्वर में गीत । और उसके बाद 'अपने आप' शब्दों को दोहराते समय 'आ' और 'प' के बीच में लता जी का लंबा सा आलाप उफ्फ जानलेवा ही तो है । एक तो फिल्म का नाम ही कितना विचित्र है 'शंकर हुसैन' पता नहीं क्या होगा इस फिल्म में । काश वो इसे देख पता । कुछ चीज़ें होती हैं न ऐसी, जिनको लेकर आप हमेशा सोचते रहते हैं कि काश आप इसे देख पाते । बचपन में जब इतिहास के टीचर इतिहास पढाते थे तब उसकी बहुत इच्छा होती थी कि काश उसे एक बार सिकंदर देखने को मिल जाए । वो छूकर देख पाए कि अच्छा ऐसा है सिकंदर । ऐसा ही कुछ वो काश्मीर में खिलने वाले क्वांग पोश, दामपोश फूलों के बारे में भी सोचता था । शंकर हुसैन को लेकर भी उसको ऐसी ही उत्सुकता है कि क्या होगा इस फिल्म में । और शंकर के साथ हुसैन कैसे लग गया ।

मुखडे क़े बाद जो अंतरा शुरू होता है वो भी कमाल का ही था

'एक अजनबी आहट आ रही है कम कम सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम सी
बिन किसी की याद आए दिल के तार हिलते हैं
बिन किसी के खनकाए चूडियां खनकती हैं
अपने आप.........'

पहले तो उसने पक्का सोच लिया था कि ये गीत गुलज़ार का ही है । वही लिखते हैं इस तरह शब्दों के साथ खेल खेल कर । खामोशी का गीत 'हमने देखी है उन आंखों की....' भी तो इसी तरह का है । उत्सुकता के साथ उसने गीत के खत्म होने का इंतज़ार किया था और जब गीतकार का नाम लिया गया था तो चौंक गया था वो । कैफ भोपाली....? उनका गीत था ये......? थोडा अच्छा भी लगा था उसे, अपने ही शहर वाले ने लिखा है इतना सुंदर गीत ।

दूसरा मुखडा तो पहले से भी यादा अच्छा था

'कोई पहले दिन जैसे घर किसी को जाता हो
जैसे खुद मुसाफिर को रास्ता बुलाता हो
पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं
और छम छमा छम छम पायलें छनकती हैं
अपने आप........'

आश्चर्य चकित रह गया था वो, इतना सुंदर गीत उसने आज तक सुना क्यों नही था। कितनी सीधी सीधी सी बात कही है । पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं । जाने किस जानिब और वो भी बेउठाए ....। क्या बात कही है ये गीत छुपा कहाँ था अब तक ? कितने मशहूर गीत सुन चुका है वो अब तक, फिर ये गीत कहाँ छुपा था ? वैसे कैफ भोपाली और लता मंगेशकर की जुगलबंदी में पाकीज़ा के सारे गाने उसे पंसद हैं । विशेषकर 'यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते ' वो तो अद्भुत गीत है ।

गाने का तीसरा अंतरा शायद पूरी शिद्दत के साथ लिखा गया था । उसी अज्ञात की तरफ बार बार इशारा करते हुए शब्दों को पिरोया गया है जो शायद उन सबके जीवन में होता है जिनके सारे स्वपन अभी स्थगित नहीं हुए हैं । एक अज्ञात, जो होता है पर दिखाई नहीं देता । सारी समस्याओं का मूल एक ही है, जीवन से अज्ञात की समाप्ति । जब तक आपको लगता है कि न जाने कौन है, पर है ज़रूर, तब तक आप सपने देखते हैं । सपने देखते हैं, उस न जाने कौन के सपने। वो न जाने कौन आपके आस पास फिरता है, मगर दिखता नहीं है । वही आपको जिन्दा रखता है । जैसे ही आपको यकीन हो जाता है कि हम तो इतने दिन से फिज़ूल ही परेशान हैं, कोई भी नहीं है, उसी दिन आपको सपने आने भी बंद हो जाते हैं (स्थगित हो जाते हैं) ।

'जाने कौन बालों में उंगलियां पिरोता है
खेलता है पानी से तन बदन भिगोता है
जाने किसके हाथों से गागरें छलकती हैं
जाने किसी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं
अपने आप.......'


क्या डिफाइन किया है अज्ञात को । 'जाने कौन बालों में उंगलिया पिरोता है' ज्ञात और अज्ञात के बीच एक महीन से सूत बराबर गुंजाइश को छोड़ा गया है, यह कह कर कि जाने किसकी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं। कैफ भोपाली ऐसा ही लिखते थे 'फिरते हैं हम अकेले बाँहों में कोई ले ले....' । कौन ले ले....? कुछ पता नहीं हैं । बस वही, जो है, पर नहीं है । यहाँ पर भी उसकी बांहों से बिजलियाँ लपक रही हैं। पता नहीं ये शंकर हुसैन अब उसको देखने को मिलेगी या नहीं । क्या होगा जब वो मर रहा होगा? क्या ये तब तक भी उसको परेशान करेगी ? कशमीर के क्वांगपोश और दामपोश फूलों की तरह । क्या सचमुच इतने सारे अनुत्तरित प्रश्नों को साथ लेकर ही मरेगा वो ? फिर उन प्रश्नों का होता क्या होगा जो उस आदमी के साथ जीवन भर चलते आए हैं, जो अभी अभी मर गया है ।

आखिर में एक बार फिर लता मंगेशकर की आवाज़ उसी मुखड़े को दोहराती है....

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और विस्मय में डूबा हुआ छोड़कर गीत खत्म भी हो जाता है ।



प्रस्तुति - - पंकज सुबीर


लता संगीत उत्सव की एक और कड़ी

Thursday, September 4, 2008

लता संगीत उत्सव ( १ ) - पंकज सुबीर

रूह की वादियों में बह रही दिलरुबा नदी

ख़ैयाम साहब ने जितना भी संगीत दिया है वो भीड़ से अलग नज़र आता है । उनके गीत अर्द्ध रात्रि का स्वप्न नहीं हो कर दोपहर की उनींदी आंखों का ख्वाब हैं जो नींद टूटने के बाद कुछ देर तक अपने सन्नाटे में डुबोये रखते हैं । आज जिस गीत की बात हो रही है ये गीत फ़िल्म "शंकर हुसैन" का है । "शंकर हुसैन" जितना विचित्र नाम उतने ही मधुर गीत । दुर्भाग्य से फ़िल्म नहीं चली और बस गीत ही चल कर रह गये । फ़िल्म में ''कैफ भोपाली'' का लिखा गीत जो लता मंगेशकर जी ने ही गाया था ''अपने आप रातों में '' भी उतना ही सुंदर था जितना कि ये गीत है, जिसकी आज चर्चा होनी है । हम आगे कभी ''अपने आप रातों में '' की भी बातें करेंगें लेकिन आज तो हमको बात करनी है ''आप यूं फासलों से ग़ुज़रते रहे दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही'' की । लता जी की बर्फानी आवाज़, जांनिसार अख्तर ( जावेद जी के पिताजी) के शबनम के समान शब्दों को, खैयाम साहब की चांदनी की पगडंडी जैसी धुन पर इस तरह बिखेरती हुई गुज़र जाती है कि समय भी उस आवाज़ के पैरों की मधुर आहट में उलझा अपनी चाल भूलता नज़र आता है ।

इस गीत के भावों को पहचानना सबसे मुश्किल कार्य है कभी यह करुण रस में भीगा होता है तो अगले ही अंतरे में रहस्यवाद की छांव में खड़ा हो जाता है, या एक पल में ही सम्‍पूर्ण श्रृंगार और कुछ भी नहीं । चलिये हम भी लताजी, खैयाम साहब और जांनिसार अख्तर साहब के साथ एक मधुर यात्रा पर चलें । सुनतें हैं ये गीत -



इसकी शुरूआत होती है लता जी के मधुर आलाप के साथ जो शत प्रतिशत कोयल की कूक समेटे है और रूह को आम्र मंजरियों के मौसम का एहसास कराता है । मुखड़े के शुरूआत में एक रहस्य है जो मैं केवल इसलिये नहीं सुलझा पा रहा हूं कि मैंने फ़िल्म नहीं देखी है । रहस्य ये है कि ''आप यूं '' कहते समय लता जी ने हल्‍की सी हंसी का समावेश किया है । खनकती हंसी से शुरू होते हुए मुखड़े की बानगी देखिये -

''( हंसी) आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे...2
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आहटों से अंधेरे चमकते रहे
रात आती रही रात जाती रही
आप यूं ....''

शायद आपको भी इस रहस्यवाद में गुलज़ार साहब की मौज़ूदगी का एहसास हो रहा होगा । जांनिसार अख्तर साहब ने आहटों से अंधेरों को कुछ वैसे ही चमकाया है जैसे गुलज़ार साहब ने आंखों की महकती खुशबू को देखा था । ''आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे. दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही'' में ताने उलाहने का भाव है, या शिकायत है किंतु फिर उस हंसी का क्या ? जो मुखड़े को शुरू करती है और अगले ही क्षण ''आहटों से अंधेरे चमकते रहे रात आती रही रात जाती रही'' में रहस्यवाद का घना कुहासा छा जाता है मानो महादेवी वर्मा का उर्दू रूपांतरण हो गया हो।

लता जी की हल्‍की सी गुनगुनाहट के बाद पहला अंतरा आता है

''गुनगुनाती रहीं मेरी तनहाईयां...2
दूर बजती रहीं कितनी शहनाईयां
जिंदगी जिंदगी को बुलाती रही
आप यूं ( हंसी) फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आप यूं....

शायद ये दर्द ही है जो अपनी तनहाईयों के गुनगुनाने की आवाज़ को सुन रहा है । क्‍योंकि दूर से आती शहनाईयों की आवाज़ पीड़ा के एहसास को और गहरा कर देती है । जिंदगी ख़ुद को बुला रही है, या अपने सहभागी को कुछ स्पष्ट नहीं है । आप जब तक पीड़ा के मौज़ूद होने के निर्णय पर पहुंचते हैं, तब तक वापस मुखड़े के फासलों शब्द में फिर वही हंसी मौज़ूद नज़र आती है आपके निर्णय का उपहास करती ।

अगला अंतरा गुलज़ार साहब की उदासी और महादेवी वर्मा के सन्नाटों का अद्भुत संकर है

कतरा कतरा पिघलता रहा आसमां ...2
रूह की वादियों में न जाने कहां इक नदी....
हक नदी दिलरुबा गीत गाती रही
आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आप यूं....( हंसी)

आज तक कोई नहीं समझ पाया के आसमान जब शबनम के रूप में पिघलता है तो इसमें करुणा होती है या कोई ख़ुशी? यहां भी आसमां के कतरा कतरा पिघलने पर अधिक व्यक्ख्या नहीं की गई है क्‍योंकि अगले ही क्षण लता जी की आवाज़ आपका हाथ थाम कर रूह की वादियों में उतर जाती है । वैसे इस गाने को आंख बंद कर आप सुन रहे हैं तो पूरे समय आप रूह की वादियों में ही घूमते रहेंगें । और वो दिलरुबा नदी ? निश्चित रूप से लता जी की आवाज़ । मुखड़े के दोहराव के बाद आये ''आप यूं '' के बाद फिर एक सबसे स्पष्ट हंसी ....?

तीसरा अंतरा गीत का सबसे ख़ूबसूरत अंतरा है ।

आपकी नर्म बांहों में खो जायेंगे..2
आपके गर्म ज़ानों पे सो जायेंगे--सो जायेंगे
मुद्दतों रात नींदे चुराती रही
आप यूं फ़ासलों से ग़ुज़रते रहे
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आप यूं....( हंसी) आप यूं ....

शायद किसी भटकती हुई आत्मा के अपने पुनर्जन्‍म पाए हुए प्रेमी से पुर्नमिलन के लिये ही ये गीत लिखा गया है । उसका प्रेमी अभी सोलह साल का किशोर ही है जो उसके होने का एहसास भी नहीं कर पा रहा है । चंदन धूप के धुंए की तरह उड़ती वो रूह उस किशोर की नर्म बांहों के आकाश या गर्म ज़ानों ( कंधे) की धरती पर अपनी मुक्ति का मार्ग ढूँढ रही है । थकी सी आवाज़ में लताजी जब इन शब्दों को दोहराती हैं ''सो जायेंगे, सो जायेंगे'' तो जन्मों जन्मों की थकान को स्पष्ट मेहसूस किया जो सकता है । अचानक आवाज़ रुक जाती है संगीत थम जाता है । ऐसा लगता है मानो उस आत्मा को अपने हल्‍की हल्‍की मूंछों वाले किशोर प्रेमी के गर्म ज़ानों पर मुक्ति मिल ही गई है, किंतु क्षण भर में ही सन्नाटा टूट जाता है और पीड़ा अपनी जगरातों भरी रातों का हिसाब देने लगती है ''मुद्दतों रात नींदे चुराती रही '' । फिर वही मुखड़ा और ''आप यूं '' में फिर वही हंसी । और सब कुछ ग़ुज़र जाता है । रह जाते हैं आप ठगे से, लता जी, खैयाम साहब और जां निसार अख्तर साहब तीन मिनट में आपको सूफी बना जाते हैं ।

1975 में ये फ़िल्म 'शंकर हुसैन" आई थी, और आज लगभग 33 साल बीत गये हैं किंतु इस गीत के आज भी उतने ही दीवाने हैं जो 33 साल पहले थे. अंत में इस गीत को सुनने के बाद इसके दीवानों की जो अवस्था होती है उसको शंकर हुसैन का लता जी का दूसरा गीत अच्छी तरह से परिभाषित करता है -

''अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं

चौंकते हैं दरवाज़े सीढि़यां धड़कती हैं ''


प्रस्तुति - पंकज सुबीर

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