रविवार, 21 फ़रवरी 2021

राग कल्याण (यमन) और शुद्ध कल्याण : SWARGOSHTHI – 502 : RAG KALYAN (YAMAN) & SHUDDH KALYAN

      



स्वरगोष्ठी – 502 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 6 

"ये चमन हमारा अपना है..." और  "जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया...", राग कल्याण (यमन) और शुद्ध कल्याण की दो रचनायें




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की पाँच कड़ियों में हमने राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी और मियाँ की मल्हार पर आधारित पाँच देशभक्ति गीतों की चर्चा की और इन रागों की शास्त्रीय रचनाएँ भी प्रस्तुत की गईं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की छठी कड़ी में राग कल्याण (यमन) और शुद्ध कल्याण पर आधारित दो फ़िल्मी रचनायें।


आशा भोसले और दत्ताराम (Courtesy: hamaraphotos.com)
'देशभक्ति
 गीतों में शास्त्रीय राग’ श्रृंखला की आज की कड़ी में प्रस्तुत है दो ऐसे गीत जिनका आधार कल्याण थाट के दो राग हैं। पहला गीत आधारित है राग कल्याण अथवा यमन पर और दूसरा गीत शुद्ध कल्याण पर। 1957 की फ़िल्म ’अब दिल्ली दूर नहीं’ में आशा भोसले, गीता दत्त और साथियों का गाया "ये चमन हमारा अपना है, इस देश पे अपना राज है" गीत राग कल्याण पर आधारित है। राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का आश्रय राग है। इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग कल्याण अथवा यमन का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग का प्राचीन नाम कल्याण ही मिलता है। मुगल काल में राग का नाम यमन प्रचलित हुआ। वर्तमान में इसका दोनों नाम, कल्याण और यमन, प्रचलित है। यह दोनों नाम एक ही राग के सूचक हैं, किन्तु जब हम ‘यमन कल्याण’ कहते हैं तो यह एक अन्य राग का सूचक हो जाता है। राग यमन कल्याण, राग कल्याण अथवा यमन से भिन्न है। इसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है, जबकि यमन में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। राग कल्याण अथवा यमन के चलन में अधिकतर मन्द्र सप्तक के निषाद से आरम्भ होता है और जब तीव्र मध्यम से तार सप्तक की ओर बढ़ते हैं तब पंचम स्वर को छोड़ देते हैं। 

गीतकार शैलेन्द्र के लिखे और संगीतकार दत्ताराम द्वारा संगीतबद्ध किए फ़िल्म ’अब दिल्ली दूर नहीं’ के इस गीत को सुनते हुए आप राग कल्याण या यमन के इन सभी गुणों का अनुभव कर पायेंगे। गीत फ़िल्माया गया है अभिनेत्री सुलोचना लाटकर पर जो इस गीत में बच्चों को अपने देश की महानता का वर्णन कर रही हैं। बाल कलाकारों में शामिल हैं मास्टर रोमी, बेबी चाँद और अमजद ख़ान। ये वोही अमजद ख़ान हैं जो आगे चल कर मशहूर खलनायक व चरित्र अभिनेता बने। साथ ही इस गीत में अभिनेता मोतीलाल को भी देखा जा सकता है। राज कपूर निर्मित यह फ़िल्म दर‍असल एक कम बजट की फ़िल्म थी। इसलिए इस फ़िल्म के संगीत के लिए उन्होंने शंकर-जयकिशन के सहायक संगीतकार दत्ताराम को स्वतंत्र रूप से संगीत देने का मौका दिया। और यही फ़िल्म दत्ताराम के बतौर स्वतंत्र संगीतकार पहली फ़िल्म सिद्ध हुई। बच्चों के लिए बनाई गई यह फ़िल्म बॉक्स् ऑफ़िस पर जैसी भी रही हो, फ़िल्म के गीतों ने काफ़ी धूम मचाया। दत्ताराम ने यह सिद्ध किया कि एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में भी वो उत्कृष्ट संगीत देने की क्षमता रखते हैं।



गीत : “ये चमन हमारा अपना है...” : फ़िल्म: अब दिल्ली दूर नहीं, गायिका: आशा भोसले, गीता दत्त, साथी



हंसराज बहल और मोहम्मद रफ़ी (Courtesy: hamaraphotos.com)
राग कल्याण के कुछ प्रचलित प्रकार हैं; पूरिया कल्याण, शुद्ध कल्याण, जैत कल्याण आदि। राग कल्याण/यमन आधारित फ़िल्म ’अब दिल्ली दूर नहीं’ के इस गीत के बाद अब हम आते हैं राग कल्याण के एक अन्य प्रचलित प्रकार - शुद्ध कल्याण पर। इस राग पर आधारित जिस फ़िल्मी देशभक्ति गीत को हमने चुना है, वह एक ऐसा गीत है जिसे बजाये बग़ैर कोई भी राष्ट्रीय पर्व का उत्सव अधूरा है। यह गीत है 1965 की फ़िल्म ’सिकन्दर-ए-आज़म’ का मोहम्मद रफ़ी और साथियों का गाया, "जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा, वो भारत देश है मेरा..."। इस देश की महानता के विभिन्न पक्षों का इससे सुन्दर चित्रण किसी अन्य फ़िल्मी गीत में मिलना मुश्किल है। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के अमर बोलों को शुद्ध कल्याण के स्वरों में पिरो कर प्रस्तुत किया है संगीतकार हंसराज बहल ने। विविध भारती को दिए सन् 1981 के एक साक्षात्कार में हंसराज बहल ने बताया कि उन्होंने बचपन में शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। उन्हीं के शब्दों में - "लाहौर में बचपन से शौक़ था गाने का, और हमारे वहाँ एक पंडित जी का स्कूल था - पंडित चुन्नीलाल, शंकर विद्यालय। वहाँ से मैंने सीखा क्लासिकल म्युज़िक और इन्स्ट्रुमेण्ट्स वगेरह भी सीखा और कुछ एक साल रहा उनके पास। उसके बाद मैंने अपना कुछ स्कूल, मैंने भी खोला लहौर में। मगर मेरी जो रुचि थी ज़्यादा, मॉडर्ण संगीत में, तो मैं वो छोड़ के सीधा बॉम्बे चला आया।" मुंबई में हंसराज बहल ने अपने छोटे भाई, निर्माता गुलशन बहल के साथ मिल कर फ़िल्मों का निर्माण भी शुरू किया ’N C Films' के बैनर तले। गुलशन बहल और हंसराज बहल की जोड़ी की पहली फ़िल्म बनी ’लाल परी’। बहल भाइयों ने कुल 15-16 फ़िल्मों का निर्माण किया जिनमें गुलशन बहल का नाम निर्माता के रूप में और हंसराज बहल का नाम संगीतकार के रूप में परदे पर दिखाई दिया। इन फ़िल्मों में ’मिलन’, ’सावन’ और ’सिकन्दर-ए-आज़म’ भी शामिल है।  

"ये चमन हमारा अपना है" और "जहाँ डाल-डाल पर...", इन दोनों गीतों को एक के बाद एक सुनते हुए राग कल्याण/ यमन और शुद्ध कल्याण के बीच के अन्तर को महसूस किया जा सकता है। शुद्ध कल्याण के आरोह में मध्यम और निषाद स्वर तथा अवरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है। इस राग में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि के प्रथम प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। इस राग में सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग शुद्ध कल्याण की रचना राग भूपाली और राग कल्याण के मेल से हुई है। इसके आरोह में राग भूपाली और अवरोह में राग कल्याण के स्वर प्रयोग होते हैं जिसे फ़िल्म ’सिकन्दर-ए-आज़म’ के इस कालजयी गीत में भी अनुभव किया जा सकता है। अवरोह में तीव्र मध्यम स्वर अति अल्प प्रयोग होता है, इसीलिए अवरोह की जाति में तीव्र मध्यम स्वर की गणना नहीं की जाती। शुद्ध कल्याण गम्भीर प्रकृति का राग है। इसका चलन मन्द्र, मध्य और तार तीनों सप्तकों भलीभाँति किया जा सकता है। तो लीजिए रफ़ी साहब की आवाज़ में भारत के गौरवशाली परम्परा और संस्कृति का वर्णन सुनिए राग शुद्ध कल्याण के कर्णप्रिय स्वरों के साथ।



गीत : “जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ...” : फ़िल्म: सिकन्दर-ए-आज़म, गायक: मोहम्मद रफ़ी



’स्वरगोष्ठी’ के नए सदस्य शिलाद चटर्जी का स्वागत

आज ’स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हम स्वागत कर रहे हैं हमारे नए साथी शिलाद चटर्जी का जो इस स्तम्भ का संचालन करने में हमारी सहायता करेंगे एक विशेष सलाहकार के रूप में। गीतों में रागों के प्रयोग और उनके विश्लेषण में हमारा ज्ञान बढ़ायेंगे दस वर्षीय शिलाद जो प्रयाग संगीत समिति, प्रयागराज (इलाहाबाद) के अधीन शास्त्रीय गायन विभाग के चौथे वर्ष का छात्र है। शिलाद को भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहन रुचि है। जब हम रेडियो पर हिन्दी फ़िल्मी गीतों का आनन्द ले रहे होते हैं, शिलाद का मन करता है कि शास्त्रीय संगीत सुने। प्रतिदिन रात 10 बजे शिलाद आकाशवाणी गुवाहाटी केन्द्र से प्रसारित शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम सुनते हैं। शिलाद ऑल इण्डिया रेडियो के उर्दू सर्विस पर वर्ष 2019 में शास्त्रीय गायन का कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं। राग देश में ख़याल गाकर श्रोताओं को चकित कर दिया था आठ-वर्षीय शिलाद ने।  वर्ष 2020 में DPS Vasantkunj New Delhi द्वारा आयोजित NCR Inter-school Classical Instrumental प्रतियोगिता में हारमोनियम पर राग देश बजा कर शिलाद ने तीसरा पुरस्कार प्राप्त किया है। तो आइए हम सब शिलाद चटर्जी का ’स्वरगोष्ठी’ के मंच पर स्वागत करें। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग कल्याण और शुद्ध कल्याण : SWARGOSHTHI – 502 : RAG KALYAN (YAMAN) & SHUDDHA KALYAN: 21 फरवरी, 2021



रविवार, 14 फ़रवरी 2021

राग मियाँ की मल्हार में "करो सब निछावर" : SWARGOSHTHI – 501 : RAG MIAN KI MALHAR

     




स्वरगोष्ठी – 501 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 5 

"करो सब निछावर, बनो सब फ़कीर...", राग मियाँ मल्हार में देशभक्ति की वर्षा




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछले सप्ताह ’स्वरगोष्ठी’ के 500 अंक पूरे हुए। ’स्वरगोष्ठी’ का एक पड़ाव पार हुआ जहाँ तक इसे स्वर्गीय कृष्णमोहन मिश्र जी ने पहुँचाया। उनके इस प्रिय स्तम्भ को उनके जाने के बाद भी जीवित रखने के उद्देश्य से हम इसे तब तक आगे बढ़ाना चाहेंगे जब तक हमारे लिए यह सम्भव है। इसलिए आज इसकी 501-वीं कड़ी से हम इसे आगे बढ़ा रहे हैं। इस सफ़र में हमारा हमसफ़र बने रहने के लिए आप सभी संगीत रसिकों का बहुत-बहुत धन्यवाद!

उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की चार कड़ियों में हमने राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी और भैरवी पर आधारित चार फ़िल्मी देशभक्ति गीतों की चर्चा की और इन रागों की शास्त्रीय रचनाएँ भी प्रस्तुत की गईं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में राग मियाँ की मल्हार पर आधारित फ़िल्म ’लड़की सह्याद्री की’ से आशा भोसले का गाया एक कमचर्चितपर अत्यन्त कर्णप्रिय देशभक्ति गीत, और साथ ही राग मियाँ की मल्हार से जुड़ी कुछ बातें व शास्त्रीय वाद्य रचना।


वसन्त देसाई व आशा भोसले (सूत्र: hamaraphotos.com)
व्ही. शान्ताराम 
ने वर्ष 1966 में राजकमल कलामन्दिर के बैनर तले ’लड़की सह्याद्री की’ शीर्षक से फ़िल्म बनायी और स्वयम् इसे निर्देशित भी किया। यह एक हिन्दी-मराठी द्वैभाषी फ़िल्म थी जिसमें मुख्यत: मराठी सिनेमा व रंगमंच के कलाकारों ने काम किया। संध्या, शालिनी अभ्यंकर, वत्सला देशमुख, कुमार दिघे, केशवराव दाते और बाबूराव पेंढरकर द्वारा अभिनीत इस फ़िल्म के गीत-संगीत का पक्ष भी काफ़ी उच्चस्तरीय था। उच्चस्तरीय क्यों ना हो जब पंडित जसराज जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गज कलाकार फ़िल्म के लिए गीत गाने को तैयार हों! उनका गाया राग अहिरभैरव में भजन "वन्दना करो, अर्चना करो" फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक मूल्यवान हीरा है। और यह और भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है जब हमें यह पता चलता है कि पंडित जी ने इस गीत के अलावा केवल तीन और फ़िल्मों में ही गीत गाये। ये तीन फ़िल्में हैं ’बीरबल माइ ब्रदर’, ’1920’ और ’गौड़ हरि दर्शन’। हाँ, उन्होंने मीरा नायर की फ़िल्म ’सलाम बॉम्बे’ का संगीत भी तैयार किया था। फ़िल्म ’लड़की सह्याद्री की’ के गाने लिखे पंडित भरत व्यास ने और फ़िल्म के संगीतकार थे वसन्त देसाई। 1959 की फ़िल्म ’नवरंग’ में वसन्त देसाई ने पार्श्व-संगीत तैयार किया था, पर ’नवरंग’ के बाद आपसी मतभेद की वजह से वसन्त देसाई ने व्ही. शान्ताराम से किनारा कर लिया था। शान्ताराम जी के अनुरोध पर वसन्त देसाई फिर एक बार शान्ताराम कैम्प में वापस लौटे और ’गीत गाया पत्थरों ने’ तथा ’लड़की सह्याद्री की’ फ़िल्मों में संगीत दिया। यह जानकारी नीलू गव्हाणकर लिखित 2011 की पुस्तक ’The Desai Trio and the Movie Industry of India’ में दी गई है। ’लड़की सह्याद्री की’ फ़िल्म के कुल 9 गीतों में से 6 गीतों में आशा भोसले की आवाज़ है और इन 6 गीतों में से 4 गीत देशभक्ति रचनाएँ हैं। "मेरी झांसी नहीं दूंगी", "तुम मुझे ख़ून दो", "अंग्रेज़ों ने जीत ली झांसी" और चौथा देशभक्ति गीत है "करो सब निछावर, बनो सब फ़कीर, वक़्त मांगे रे तेरा धन कबीर"। राग मियाँ की मल्हार पर आधारित इसी चौथे गीत की चर्चा आज हम कर रहे हैं।

राग मियाँ मल्हार में वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। यह काफी थाट का और सम्पूर्ण-षाड़व जाति का राग है। अर्थात; आरोह में सात और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह और अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है। राग के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की और विरह की पीड़ा को हर लेने की अनूठी क्षमता होती है।कई फिल्म संगीतकारों ने इस राग पर आधारित यादगार गीतों की रचना की है। ऐसे ही संगीतकारों में एक अग्रणी नाम वसन्त देसाई का है। हिन्दी और मराठी फिल्मों में राग आधारित गीत तैयार करने में इस संगीतकार का कोई विकल्प नहीं था। महाराष्ट्र के एक कीर्तनकार परिवार में जन्में वसन्त देसाई को राजकमल कलामन्दिर की चर्चित फिल्म "शकुन्तला" ने उन्हें फिल्म जगत में स्थापित कर दिया। इस फिल्म के गीतों में उनका रागों के प्रति अनुराग स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। रागदारी संगीत के प्रति उनका लगाव उनकी अन्तिम फिल्म "शक" तक निरन्तर बना रहा। विशेष रूप से मल्हार अंग के रागों से उन्हें खूब लगाव था। फिल्म "गुड्डी" में राग मियाँ की मल्हार के स्वरों की चाशनी में लिपटा गीत ‘बोले रे पपीहरा...’ तो कालजयी गीतों की सूची में शीर्षस्थ है। पर आश्चर्य की बात यह है कि फ़िल्म ’लड़की सह्याद्री की’ के इस देशभक्ति गीत को भी उन्होंने मियाँ की मल्हार के स्वरों में पिरोया जो अपने आप में एक अनोखा प्रयोग था। तो आइए, झपताल में निबद्ध इस रचना का आनन्द लेते हैं।




गीत : “करो सब निछावर, बनो सब फ़कीर...” : फ़िल्म: लड़की सह्याद्री की, गायिका: आशा भोसले



सरोद सम्राट उस्ताद अमजद अली ख़ाँ
राग मियाँ की मल्हार काफी थाट का राग है। मल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार; राग मियाँ मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ मल्हार’ कहा जाने लगा। आइए राग मियाँ की मल्हार का आनन्द लिया जाए 1968 में रिकॉर्ड की हुई उस्ताद अमजद अली ख़ाँ के सरोद पर बजायी हुई रचना के माध्यम से।



राग मियाँ की मल्हार : सरोद : कलाकार - उस्ताद अमजद अली ख़ाँ


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मियाँ की मल्हार में "करो सब निछावर" : SWARGOSHTHI – 501 : RAG MIAN KI MALHAR: 14 फरवरी, 2021



रविवार, 7 फ़रवरी 2021

स्वरगोष्ठी - 500: वर्ष 2020 के संगीत पहेली महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ

     




स्वरगोष्ठी – 500 में आज 


वर्ष 2020 के संगीत पहेली  महाविजेताओं  का उनकी प्रस्तुतियों  से अभिनन्दन




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। एक सफ़र जो शुरू हुआ था 2 जनवरी 2011 को, आज 7 फरवरी 2021 तक जारी है। 500 सप्ताह पूरा करके यह सफ़र आज इस मुकाम तक आ पहुँचा है। शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और लोक संगीत से सजे इस सुरीले सफ़र का नाम है "स्वरगोष्ठी"। इस सफ़र के चालक के रूप में प्रथम आठ कड़ियों में आपके इस दोस्त सुजॉय चटर्जी ने कमान सम्हाला था, उसके बाद 30-वें अंक तक हमारे साथी सुमीत चक्रवर्ती ने मोर्चा सम्भाला, और फिर उसके बाद 31-वीं कड़ी से लेकर 495-वें अंक तक कृष्णमोहन मिश्र जी ने पूरी निष्ठा, लगन और समर्पण के साथ ’स्वरगोष्ठी’ को यहाँ तक पहुँचाया है। आज ’स्वरगोष्ठी’ के 500 अंक पूर्ति पर हमें प्रसन्नता के साथ-साथ बहुत तकलीफ़ भी हो रही है क्योंकि ’स्वरगोष्ठी’ के इस ऐतिहासिक अंक को प्रस्तुत करने के लिए कृष्णमोहन जी अब हमारे बीच नहीं रहे। आज के इस विशेषांक पर केवल और केवल कृष्णमोहन जी का ही अधिकार होना चाहिए था। आज इस अंक को लिखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो कृष्णमोहन जी बगल में खड़े होकर हमें यह अंक लिखता हुआ देख रहे हों। यह उन्हीं का आशिर्वाद है कि उनके 495-वें अंक में हमसे बिछड़ जाने के बाद हम उनके इस प्रिय स्तम्भ को 500-वें अंक तक पहुँचा सके हैं। 

’स्वरगोष्ठी’ को एक उच्चस्तरीय स्तम्भ के रूप में परिवर्तित करने के लिए कृष्णमोहन जी ने अथक प्रयास तो किए ही थे, बल्कि इसे और भी अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए उहोंने एक साप्ताहिक संगीत पहेली की योजना बनाई, और वर्ष के अन्त में सभी प्रतिभागियों के साप्ताहिक अंकों को जोड़ कर प्रथम पाँच सर्वोच्च अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागियों को वर्ष के महाविजेताओं के रूप में घोषित करने की एक नई प्रथा शुरू की। वर्ष 2020 के महाविजेताओं का चयन भी उन्होंने कर लिया था, पर इससे पहले कि वे इन पाँच महाविजेताओं की घोषणा कर पाते, काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे हमेशा के लिए छीन लिया। हमें यह तो पता चल गया कि कौन से पाँच प्रतियोगी शीर्ष के पाँच पायदानों तक पहुँचे हैं, और कृष्णमोहन जी के अन्तिम पोस्ट से हमें यह भी पता चल गया कि चौथे और पाँचवे स्थानों पर कौन कौन रहे, पर हमें यह नहीं पता चल पाया कि बाकी के जो तीन महाविजेता हैं, उनमें से किन्हें प्रथम स्थान मिला, किन्हें द्वितीय और किन्हें तृतीय। आज ’स्वरगोष्ठी’ के इस 500-वें विशेषांक में हम कृष्णमोहन जी द्वारा पाँच महाविजेताओं की घोषणा करने का जो अधूरा काम है, उसे अंजाम देने के लिए उपस्थित हुए हैं। परन्तु सटीक जानकारी उपलब्ध ना होने की वजह से प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पाने वाले महाविजेताओं के स्थानों का उल्लेख नहीं करेंगे, बल्कि तीनों प्रतियोगियों को प्रथम तीन महाविजेता कह कर सम्बोधित करेंगे। तो आइए आपका परिचय करवाते हैं वर्ष 2020 के ’स्वरगोष्ठी संगीत पहेली प्रतियोगिता’ के पाँच महाविजेताओं से और सुनवाते हैं उनकी या उनके पसन्द की प्रस्तुतियाँ।



विदुषी डी. हरिणा माधवी
“स्वरगोष्ठी” की संगीत पहेली में नियमित रूप से भाग लेकर वर्ष 2020 की महाविजेता बनीं हैं, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ टीम की ओर से हरिणा जी को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को केवल मानने वाली ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 18 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की उपाधि प्राप्त की है। दो वर्ष पूर्व हरिणा जी की संगीत विषयक पुस्तक; “प्रेरणा” का प्रकाशन हुआ था। यह उनकी स्वरचित बन्दिशों का संग्रह है, जिसमें राग भैरव से लेकर राग भैरवी तक प्रचलित 25 रागों में कुल 61 बन्दिशें सम्मिलित की गई हैं। हमारे आग्रह पर इस अंक के  लिए हरिणा जी ने स्वयं अपने ही स्वर में त्रिताल में निबद्ध राग नट भैरव की एक रचना हमें भेजी है, जिसके बोल है; "हे मृगराज महा नरसिंह..."। आज के इस विशेष अंक में हम शिक्षिका और विदुषी डी. हरिणा माधवी का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और आपको उनके स्वर में यह छोटा ख़याल सुनवाते हैं।





डॉ. किरीट छाया
वोरहीज, न्यूजर्सी के डॉ. किरीट छाया वर्ष 2020 की संगीत पहेली में बढ़-चढ़ कर भाग लेकर महाविजेताओं की सूची में स्थान प्राप्त कर लिया है। किरीट जी पेशे से चिकित्सक हैं और अमेरिका में 1971 से प्रवास कर रहे हैं। मुम्बई से चिकित्सा विज्ञान से एम.डी. करने के बाद आप सपत्नीक अमेरिका चले गए। बचपन से ही किरीट जी के कानों में संगीत के स्वर स्पर्श करने लगे थे। उनकी बाल्यावस्था और शिक्षा-दीक्षा शास्त्रीय संगीत के प्रेमी और पारखी मामा और मामी के संरक्षण में बीता। बचपन में ही मामा-मामी से सुने हुए भारतीय संगीत के स्वरों के कारण किरीट जी का संगीत के प्रति निरन्तर अनुराग बना रहा। किरीट जी न तो स्वयं गाते हैं और न बजाते हैं, परन्तु संगीत सुनने के दीवाने हैं। वह इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि उनकी पत्नी को भी संगीत के प्रति लगाव है। नब्बे के दशक के मध्य में किरीट जी ने अमेरिका में रह रहे कुछ संगीत अनुरागी परिवारों के सहयोग से “रागिनी म्यूजिक सर्कल” नामक संगीत संस्था का गठन किया है। इस संस्था की ओर से प्रायः संगीत के अनुष्ठान और संगोष्ठ आदि का आयोजन किया जाता है। अब तक उस्ताद विलायत खाँ, उस्ताद अमजद अली खाँ, पण्डित अजय चक्रवर्ती, पण्डित मणिलाल नाग, पण्डित बुद्धादित्य मुखर्जी आदि की संगीत सभाओं का आयोजन यह संस्था कर चुकी है। दो वर्ष पूर्व विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती की संगीत सभा का फिलेडेल्फिया नामक स्थान पर सफलतापूर्वक आयोजन किया गया था। किरीट जी गैस्ट्रोएंट्रोंलोजी चिकित्सक के रूप में विगत 40 वर्षों तक सेवा करने के बाद जुलाई, 2014 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद किरीट जी अब अपना अधिकांश समय अपनी अभिरुचि; फोटोग्राफी के साथ शास्त्रीय संगीत और वर्ष 1950 से 1970 के बीच के फिल्म संगीत के श्रवण को दे रहे हैं। “स्वरगोष्ठी” के मंच से किरीट जी का सम्पर्क हमारी एक नियमित पाठक और प्रतिभागी श्रीमती विजया राजकोटिया के माध्यम से हुआ है। किरीट जी हमारे नियमित सहभागी हैं और संगीत के प्रति अपने अनुराग के कारण और स्वरों की समझ के कारण वर्ष 2020 के संगीत पहेली के महाविजेता बने हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया परिवार उन्हें यह महाविजेता का सम्मान सादर समर्पित करता है। हमारी परम्परा है कि हम जिन्हें सम्मानित करते हैं स्वयं उनका अथवा उनकी पसन्द का संगीत सुनवाते हैं। लीजिए, प्रस्तुत है, डॉ. किरीट छाया द्वारा प्रेषित यू-ट्यूब का यह वीडियो। इस वीडियो के माध्यम से हम आपको पंडित अजय चक्रवर्ती के स्वर में राग मारवा में एक रचना सुनवा रहे हैं। किरीट जी ने हमें बताया कि इस वर्ष उनका पसन्दीदा गीत रहा "विरह" जो टीवी सीरीज़ ’बन्दिश बैन्डिट’ का हिस्सा था और जो राग मारवा पर आधारित था।





क्षिति तिवारी
2019 की संगीत पहेली में सर्वाधिक 94 अंक अर्जित कर जबलपुर, मध्यप्रदेश की क्षिति तिवारी ने प्रथम महाविजेता होने का गौरव प्राप्त किया है। संगीत पहेली में प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में सम्पन्न हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और विनीत पवईया प्रमुख हैं। क्षिति को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए दो वर्ष की राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में जबलपुर के ‘महाराष्ट्र संगीत महाविद्यालय’ में संगीत गायन की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। ध्रुपद, खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों में बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगति की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर कुमकुम धर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय की प्रोफेसर और नृत्यांगना विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में क्षिति तिवारी के कथक नृत्य के साथ गायन संगति की एक रिकार्डिंग हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस रिकार्डिंग में क्षिति तिवारी पहले राग यमन में निबद्ध शिवस्तुति, “नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय...” प्रस्तुत किया है। अगले चरण में नृत्यांगना के भाव प्रदर्शन के लिए उन्होने राग तिलक कामोद की एक बन्दिश “नीर भरन कैसे जाऊँ...” का गायन प्रस्तुत किया है। लीजिए, अब आप यह रचनाएँ सुनिए और प्रथम महाविजेता क्षिति तिवारी का अभिनन्दन कीजिए।






प्रफुल्ल पटेल
पहेली प्रतियोगिता में 79 अंक प्राप्त कर चौथे महाविजेता बने हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी के प्रफुल्ल पटेल। भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि रखने वाले प्रफुल्ल पटेल न्यूजर्सी, अमेरिका में रहते हैं। साप्ताहिक स्तम्भ, ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द करने वाले प्रफुल्ल जी शास्त्रीय संगीत के अलावा भारतीय लोकप्रिय संगीत भी रुचि के साथ सुनते हैं। इस प्रकार के संगीत से उन्हें गहरी रुचि है। परन्तु कहते हैं कि उन्हें पाश्चात्य संगीत ने कभी भी प्रभावित नहीं किया। पेशे से इंजीनियर, भारतीय मूल के प्रफुल्ल जी पिछले पचास वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं। प्रफुल्ल जी स्वान्तःसुखाय हारमोनियम बजाते हैं और स्वयं गाते भी है, किन्तु बताते हैं कि उनकी गायन और वादन का स्तर ‘स्वरगोष्ठी’ में प्रसारित गायन अथवा वादन जैसा नहीं है। जब हमने उनका गाया-बजाया अथवा उनकी पसन्द का आडियो या वीडियो क्लिप उनसे भेजने का अनुरोध किया तो पहले उन्होने संकोच के साथ टाल दिया। हमारे दोबारा आग्रह पर उन्होने अपनी आवाज़ में एक आकर्षक गैरफ़िल्मी गीत हमें भेज दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में नियमित रूप से भाग लेने वाले प्रफुल्ल जी के संगीत ज्ञान का अनुमान इसी तथ्य से किया जा सकता है कि वर्ष 2020 की पहेली प्रतियोगिता में 79 अंक अर्जित कर प्रफुल्ल जी ने वार्षिक महाविजेताओ की सूची में चौथे महाविजेता का सम्मान प्राप्त किया है। श्री पटेल गायक सी.एच. आत्मा और जगमोहन आदि की गायकी के बहुत बड़े प्रसंशक हैं। “स्वरगोष्ठी” के आज के अंक के माध्यम से “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य प्रफुल्ल जी का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और उनकी आवाज़ में एक गैरफ़िल्मी गीत "प्रीतम आन मिलो..." प्रस्तुत का रहे हैं। मूल गीत सी. एच. आत्मा का गाया हुआ गीत है जो उनके गाये प्रसिद्ध ग़ैर-फ़िल्मी गीतों में से एक है। पिछले वर्ष प्रफुल्ल जी ने सी. एच. आत्मा का ही गाया हुआ “मुझे न सपनों से बहलाओ...” अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके भेजा था जिसे श्रोताओं ने बहुत सराहा था। तो लीजिए इस बार प्रफुल्ल जी के स्वर में सुनिए "प्रीतम आन मिलो"। 






मुकेश लाडिआ
पहेली प्रतियोगिता में महाविजेता के पाँचवें स्थान को सुशोभित करने वाले अहमदाबाद, गुजरात निवासी मुकेश लाडिया हैं। मुकेश जी “स्वरगोष्ठी” के 378वें अंक से अर्थात पिछले तीन वर्षों से हमारे नियमित पाठक हैं। विगत तीन वर्षों से वह निरन्तर पहेली प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं। मूलतः अहमदाबाद, गुजरात निवासी मुकेश जी बीच बीच में फीनिक्स, अमेरिका में भी प्रवास करते रहे हैं। वह चाहे भारत में रहें या अमेरिका में “स्वरगोष्ठी” पढ़ना और सुनना तथा पहेली प्रतियोगिता में भाग लेना नहीं भूलते। मुकेश जी शास्त्रीय संगीत के विधिवत कलाकार अथवा शिक्षक नहीं है, किन्तु संगीत-प्रेमी अवश्य हैं। पिछले पाँच दशकों में अहमदाबाद में आयोजित होने वाले सभी संगीत समारोहों और गोष्ठियों में शामिल होकर देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित कलासाधकों की प्रस्तुतियों का रसास्वादन करते रहे हैं। उन्होने वायलिन वादन की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर अखिल भारतीय संगीत विद्यालय की प्रवेशिका पूर्ण कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण की है। इसके बाद अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों को अनेक माध्यमों से श्रवण कर अध्ययन किया। संगीत के प्रति अनुराग होने के साथ साथ मुकेश जी ने अपने पारिवारिक और व्यावसायिक दायित्वों के साथ उन्हें शास्त्रीय गायन के अभ्यास की ललक थी, परन्तु इच्छानुसार अधिक नहीं कर सके। वर्तमान में 68 वर्षीय मुकेश लाडिया प्रतिदिन रिकार्डेड अथवा सजीव माध्यम से प्रतिदिन संगीत श्रवण करते हैं। “स्वरगोष्ठी” की संगीत पहेली प्रतियोगिता 2020 में अपने संगीत ज्ञान और अनुराग के बल पर 58 अंक प्राप्त कर मुकेश जी ने महाविजेताओं की सूची में पाँचवाँ स्थान प्राप्त किया है। हम आज “रेडियो प्लेबैक इण्डिया”, इसके संचालक और सम्पादक मण्डल की ओर से हम उनका हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और उनके सम्मान में उन्हीं के पसंदीदा वाद्य वायलिन पर राग झिंझोटी सुनवा रहे हैं। इसे विदुषी एन. राजम् प्रस्तुत कर रही हैं।






विजया राजकोटिया जी का संदेश
और अब प्रस्तुत है ’स्वरगोष्ठी’ के बहुत पुराने श्रोता-पाठक विजया राजकोटिया जी का संदेश। कृष्णमोहन जी के साथ विजया जी का एक लम्बा नाता रहा है और स्वरगोष्ठी के प्रति उनका योगदान भी उल्लेखनीय है। विजया जी ने कई नए पाठकों को ’स्वरगोष्टी’ के तरफ़ प्रोत्साहित भी किया है, जिनमें से आज के महाविजेता डॉ. किरीट छाया शामिल हैं। कृष्णमोहन जी के इस तरह अचानक चले जाने से हम सब की तरह विजया जी को भी गहरा सदमा पहुँचा है। उन्होंने अपना शोक संदेश कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया है:


और अब इसी के साथ ’स्वरगोष्ठी’ के इस विशेष अंक से मुझे यानी सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर भेंट होगी, इसी उम्मीद के साथ, नमस्कार!

संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
स्वरगोष्ठी - 500: वर्ष 2020 के संगीत पहेली महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ: 07 फरवरी, 2021



रविवार, 31 जनवरी 2021

राग भैरवी में "सुन ले बापू ये पैग़ाम" : SWARGOSHTHI – 499 : RAG BHAIRAVI

    




स्वरगोष्ठी – 499 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 4 

"सुन ले बापू ये पैग़ाम", गांधीजी के आदर्शों की धज्जियाँ उड़ाते समाज की दशा, राग भैरवी के सुरों में




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, जनवरी का महीना देशभक्ति पर्वों का महीना है - 11 जनवरी को लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि, 12 जनवरी को मास्टरदा सूर्य सेन का शहीदी दिवस, 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती, 26 जनवरी को राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस, 28 जनवरी को लाला लाजपत राय जयन्ती और 30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि व शहीद दिवस। इन सब को ध्यान में रखते हुए इन दिनों ’स्वरगोष्ठी’ पर जारी है श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की तीन कड़ियों में तीन अलग गीतकारों (कवि प्रदीप, आनन्द बक्शी, साहिर लुधियानवी), तीन अलग संगीतकारों (सी रामचन्द्र, कल्याणजी-आनन्दजी, एन. दत्ता) और तीन अलग गायकों (लता, रफ़ी, आशा) के फ़िल्मी देशभक्ति गीतों की चर्चा हुई है। ये गाने हैं "ऐ मेरे वतन के लोगों", "वतन पे जो फ़िदा होगा" और "सारे जहाँ से अच्छा"। आज इस श्रृंखला की चौथी कड़ी में 30-जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर एक ऐसे गीत की चर्चा जिसमें उनके आदर्शों और मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाते समाज का चित्रण किया गया है।  यह गीत है राग भैरवी पर आधारित फ़िल्म ’बालक’ का गीत "सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम"। गीतकार भरत व्यास, संगीतकार दत्ताराम, गायिका सुमन कल्याणपुर। साथ ही आनन्द लीजिए पंडित रामभाउ बीजापुरे का हारमोनियम पर बजाया राग भैरवी।


शंकर-जयकिशन
के पसन्दीदा रागों में एक महत्वपूर्ण राग रहा है भैरवी। उनके सहायक रह चुके दत्ताराम जब स्वतंत्र रूप से संगीत देने लगे, तब उन्होंने भी राग भैरवी का अपने गीतों में ख़ूब प्रयोग किया। 60 के दशक के अन्त तक आते-आते फ़िल्म संगीत की धारा काफ़ी बदल चुकी थी। पाश्चात्य संगीत काफ़ी हद तक इसमें अपने लिए जगह बना चुका था। 50-60 के दशकों के दिग्गज संगीतकार ढलान पर थे, और कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और राहुल देव बर्मन के गाने सर चढ़ कर बोलने लगे थे। ऐसे में ना केवल पिछले दौर के बड़े संगीतकार पीछे लुढ़कते गए बल्कि उस दौर के अन्य कमचर्चित संगीतकारों को भी बी और सी-ग्रेड फ़िल्मों से ही गुज़ारा करना पड़ा। और इनमें एक नाम दत्ताराम का है। 1969 में ’कला मण्डल’ के बैनर तले बी. के. आदर्श निर्देशित एक कम बजट की फ़िल्म आयी थी ’बालक’, जिसमें ’बालक’ की भूमिका में परदे पर नज़र आयीं बेबी सारिका। ये वोही बेबी सारिका हैं जो आगे चल कर सारिका के नाम से नायिका बनीं। पर फ़िल्म में उनका किरदार एक बालक का होने की वजह से उनका नाम फ़िल्म की नामावली में बेबी सारिका के बजाय मास्टर सूरज लिखा गया। फ़िल्म के गीतकार थे पंडित भरत व्यास और संगीतकार दत्ताराम। फ़िल्म में बस चार ही गीत थे, चारों एकल गीत और चार अलग-अलग आवाज़ों में - मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, सुमन कल्याणपुर और शान्ति माथुर। इनमें से जो देशभक्ति गीत है, वह सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में है। फ़िल्म के ना चलने से इन गीतों पर किसी का ख़ास ध्यान नहीं गया, पर प्रस्तुत गीत बड़ा प्रभावशाली गीत है, जिसके बोल है "सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम"। गीत में तीन अन्तरे हैं जिनमें वर्तमान समाज की दयनीय स्थिति का वर्णन किया गया है। बालक महात्मा गांधी जी को पत्र लिख कर दु:ख व्यक्त कर रहा है कि किस तरह से उनके मूल्यों और आदर्शों की दज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं। काला धन, काला बाज़ार, रिश्वतखोरी, हिंसा, घेराव, प्रान्तीयता, विदेशी चीज़ों में आसक्ति, चोरी-जमाखोरी, नेताओं की अनैतिकता, बच्चों का तोड़-फोड़, युवाओं का नशे में मत्त होना, इन सब का ज़िक्र है इस गीत में। तीसरे अन्तरे का समापन बड़ा सशक्त है जब गीतकार इस बात की ओर इशारा करते हैं कि एक तरफ़ जहाँ बापू के आदर्शों को ख़ाक में मिलाया जा रहा हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उनके समाधि स्थल राजघाट में सुबह-शाम फूल चढ़ाये जा रहे हैं। इस विरोधाभास को बड़ी सुन्दरता से व्यक्त किया गया है गीत में।

दत्ताराम ने "सुन ले बापू ये पैग़ाम" को राग भैरवी के सुरों में ढाला है, जिसके कोमल ऋषभ स्वर में करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव है तो कोमल गान्धार स्वर में आशा का भाव महसूस होता है। कोमल धैवत में जागृति भाव तो कोमल निषाद में स्फूर्ति का सृजन होता है। और भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। इस तरह से प्रस्तुत गीत का जो भाव है, उसे और अधिक प्रभावशाली बनाने में भैरवी का महत्वपूर्ण योगदान है। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत में दत्ताराम ने साज़ों की निरर्थक भीड़ नहीं लगायी है, बल्कि एक बहुत ही सादे-सरल कम्पोज़िशन के माध्यम से भरत व्यास के प्रभावशाली शब्दों को प्रस्तुत किया है ताकि भारी-भरकम वाद्यों में ये महत्वपूर्ण बोल कहीं खो ना जाएँ। सुमन कल्याणपुर ने बहुत सी फ़िल्मों में बाल-कलाकारों के लिए प्लेबैक किया है और यह गीत भी उन्हीं में से एक है। तो लीजिए अब आप यह गीत सुनिए।





गीत : “सुन ले बापू ये पैग़ाम...” : फ़िल्म: बालक, गायिका: सुमन कल्याणपुर 



पंडित रामभाउ बीजापुरे
अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां  तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा  होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं पंडित रामभाउ बीजापुरे द्वारा हारमोनियम पर बजाया हुआ राग भैरवी। तबले पर उनके साथ संगत की है नारायण गणचारी ने और तानपुरे पर हैं श्रीधर कुलकर्णी। इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के मिठास का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। ’स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक 500-वाँ अंक है। यह एक विशेषांक होगा जिसमें हम वर्ष 2020 के महाविजेताओं की घोषणा के साथ-साथ उनकी प्रस्तुतियाँ शामिल करेंगे। ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’ श्रृंखला 501-वीं कड़ी से जारी रहेगी।




राग भैरवी : हारमोनियम : कलाकार - पंडित रामभाउ बीजापुरे


संगीत पहेली के महाविजेताओं के लिए सूचना 

वर्ष 2020 में ’स्वरगोष्ठी’ में पूछे गए पहेलियों में भाग लेकर पाँच प्रतियोगी महाविजेता बने हैं। स्वर्गीय कृष्णमोहन जी के निधन के बाद हमने उन पाँच महाविजेताओं की पहचान तो कर ली है जिसकी घोषणा हम अपने 500-वें अंक में करेंगे जो एक विशेषांक होगा महाविजेताओं की प्रस्तुतियों से सजा हुआ। हमने पाँचों महाविजेताओ को ई-मेल के माध्यम से सूचित किया है कि उन्होंने अपनी जो भी प्रस्तुति या मनपसन्द रचना कृष्णमोहन जी को भेजी थी, उन्हें कृपया एक बार फिर से हमें प्रेषित करें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर ताकि हम उन्हें 500-वें अंक में शामिल कर सकें। इस राह में हमें अब तक केवल दो प्रतियोगियों से जवाब मिला है। बाकी तीन प्रतियोगियों से सविनय निवेदन है कि शीघ्रातिशीघ्र हमें वह ईमेल प्रेषित कर दें।

संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भैरवी में "सुन ले बापू ये पैग़ाम" : SWARGOSHTHI – 499 : RAG BHAIRAVI: 31 जनवरी, 2021



रविवार, 24 जनवरी 2021

राग पीलू और पहाड़ी में "सारे जहाँ से अच्छा" : SWARGOSHTHI – 498 : RAG PILU & PAHADI

   




स्वरगोष्ठी – 498 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 3 

"सारे जहाँ से अच्छा", पं रविशंकर ने बांधा पीलू में तो एन. दत्ता ने पहनाया फ़िल्मी जामा पहाड़ी का




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, जनवरी का महीना देशभक्ति पर्वों का महीना है - 11 जनवरी को लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि, 12 जनवरी को मास्टर सूर्य सेन का शहीदी दिवस, 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती, 26 जनवरी को राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस, 28 जनवरी को लाला लाजपत राय जयन्ती और 30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि व शहीद दिवस। इन सब को ध्यान में रखते हुए इन दिनों ’स्वरगोष्ठी’ पर जारी है श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की दो कड़ियों में "ऐ मेरे वतन के लोगों" और वतन पे जो फ़िदा होगा" गीतों की चर्चा हुई है। आज इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में ज़िक्र एक और बेहद महत्वपूर्ण देशभक्ति गीत का - "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा"। इस गीत के तमाम संस्करणों में से हम चुन कर लाए हैं दो महत्वपूर्ण संस्करण। पहला, पंडित रविशंकर द्वारा रचा राग मिश्र पीलू में सितार पर बजाया हुआ सन् 1945 का महत्वपूर्ण IPTA संस्करण, और दूसरा, 1959 की फ़िल्म ’भाई बहन’ के लिए संगीतकार एन. दत्ता के निर्देशन में आशा भोसले का गाया गीत जो आधारित है राग पहाड़ी पर।


पंडित रवि शंकर
मशहूर 
शाइर मोहम्मद इक़बाल ने वर्ष 1904 में ग़ज़ल शैली में लिखा था "सारे जहाँ से अच्छा हिदोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा"। इस देशभक्ति ग़ज़ल को ख़ूब पसन्द किया गया जिसे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय व महत्वपूर्ण देशभक्ति गीतों में गिना जाता है। इक़बाल जिस अंदाज़ में इसे गाते/ पढ़ते/ सुनाते थे, वह उनका अपना शाइराना अंदाज़ था। यह अंदाज़ आम शाइरों वाला था, जिसमें ठहराव था, शेर-ओ-शाइरी वाला रंग-ढंग था। वर्ष 1945 में सुप्रसिद्ध सितार वादक पंडित रवि शंकर ने राग मिश्र पीलू को आधार बना कर "सारे जहाँ से अच्छा" की एक नई धुन तैयार की। उन्हें लगा कि इस गीत की जो तत्कालीन धुन थी, उसमें जोश कुछ कम था। उनके अनुसार ऐसे देशभक्ति गीत का लय तोड़ा तीव्र होना चाहिए, इसे एक Marching Song के रूप में बजाया जा सके। 1946 में जब वे IPTA के आधिकारिक संगीतकार बने, तब IPTA के अनुरोध पर उन्होंने "सारे जहाँ से अच्छा" की उनकी बनाई धुन को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जिसे सुन कर सभी मन्त्रमुग्ध हो गए। यह धुन IPTA के सदस्यों को इतनी पसन्द आयी कि उसके बाद से IPTA के सभी कार्यक्रमों की शुरुआत इसी से हुआ करने लगी। आगे चल कर वर्ष 1976 में दूरदर्शन के सिग्नेचर ट्युन के रूप में पंडित रवि शंकर और उस्ताद अली अहमद हुसैन ने मिल कर जिस धुन की रचना की, वह पंडित रवि शंकर के इसी "सारे जहाँ से अच्छा" की धुन पर आधारित थी। ज़रा दूरदर्शन की उस प्रचलित सिग्नेचर ट्युन को गुनगुना कर देखिए, आपको उसमें इसी "सारे जहाँ से अच्छा" की धुन की झलक मिलेगी।

अब कुछ बातें राग पीलू से सम्बन्धित। राग पीलू का सम्बन्ध काफी थाट से जोड़ा जाता है। आमतौर पर इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित किया जाता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के कोमल और शुद्ध, दोनों रूप का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना गया है। इस राग के प्रयोग करते समय प्रायः अन्य कई रागों की छाया दिखाई देती है, इसीलिए राग पीलू को संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल प्रकृति का और श्रृंगार रस की सृष्टि करने वाला राग है। इस राग में अधिकतर ठुमरी, दादरा, टप्पा, गीत, भजन आदि का गायन बेहद लोकप्रिय है। क्योंकि इस राग के स्वरूप को कलाकार की शैली और व्याख्या पर छोड़ दिया जाता है, इसलिए इसे कई बार मिश्र पीलू के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। तो आइए इसी मिश्र पीलू पर आधारित सितार पर पंडित रवि शंकर द्वारा संगीतबद्ध किया हुआ "सारे जहाँ से अच्छा" की धुन सुनते हैं जिसे प्रस्तुत किया है प्रसिद्ध सितार वादक गौरव मजुमदार ने। उनके साथ संगत किया है चेलो पर बैरी फ़िलिप्स्, शहनाई पर अश्वनी शंकर और तबले पर अरुप चट्टोपाध्याय ने।  




सितार : “सारे जहाँ से अच्छा...” : वादक: गौरव मजुमदार, संगीत : पंडित रवि शंकर



आशा भोसले और एन. दत्ता
"सारे जहाँ से अच्छा" गीत के फ़िल्मी संस्करणों की अगर बात करें तो सबसे लोकप्रिय संस्करण 1959 की फ़िल्म ’भाई बहन’ में सुनने को मिलता है। संगीतकर दत्ता नाइक, जिन्हे हम एन. दत्ता के नाम से जानते हैं, ने राग पहाड़ी में इस गीत को एक नया जामा पहनाया, और आशा भोसले की सुरीली आवाज़ में ढल कर यह गीत सीधे श्रोताओं के कानों से होते हुए दिल में उतर गया। वैसे इस संस्करण में "सारे जहाँ से अच्छा" मूल गीत का केवल मुखड़ा ही लिया गया है। अन्तरे लिखे हैं फ़िल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने। इसलिए इस गीत में गीतकार का नाम इक़बाल नहीं बल्कि साहिर लुधियानवी दिया गया है। फ़िल्मांकन में बेबी नाज़ नज़र आते हैं स्कूली छात्र-छात्राओं के साथ, और उनमें डेज़ी इरानी भी शामिल हैं।  भारतीय संगीत के कई रागों का उद्गम लोक संगीत से हुआ है। इन्हीं में से एक है राग पहाड़ी, जिसकी उत्पत्ति भारत के पर्वतीय अंचल में प्रचलित लोक संगीत से हुई है। यह राग बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग पहाड़ी में मध्यम और निषाद स्वर बहुत अल्प प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग की जाति का निर्धारण करने में इन स्वरों की गणना नहीं की जाती और इसीलिए इस राग को औड़व-औड़व जाति का मान लिया जाता है। राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका चलन चंचल है और इसे क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, गीत, ग़ज़ल आदि रचनाएँ खूब मिलती हैं। आम तौर पर गायक या वादक इस राग को निभाते समय रचना का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए विवादी स्वरों का उपयोग भी कर लेते हैं। मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली से बचाने के लिए राग पहाड़ी के अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। मन्द्र धैवत पर न्यास करने से राग पहाड़ी स्पष्ट होता है। इस राग के गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का पहला प्रहर माना जाता है। राग पहाड़ी के स्वरूप को स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए अब आप इसी राग पर आधारित फ़िल्म ’भाई बहन’ की वह रचना सुनिए आशा भोसले की आवाज़ में।





गीत : "सारे जहाँ से अच्छा...", फ़िल्म: भाई बहन  (1959), गायक: आशा भोसले


संगीत पहेली के महाविजेताओं के लिए सूचना 

वर्ष 2020 में ’स्वरगोष्ठी’ में पूछे गए पहेलियों में भाग लेकर पाँच प्रतियोगी महाविजेता बने हैं। स्वर्गीय कृष्णमोहन जी के अचानक निधन से हम उन पाँच महाविजेताओं की पहचान पूरी तरह से कर पाने में अब तक असमर्थ रहे हैं। परन्तु हमें पता चला है कृष्णमोहन जी ने उन सभी पाँच प्रतियोगियों को ई-मेल द्वारा उनके प्रथम पाँच विजेताओं में होने की सूचना दी थी। इनमें से कुछ नामों की जानकारी हमें पिछले दिनों प्राप्त हुई है, पर अब भी कुछ नामों की जानकारी हमें नहीं मिल पायी है। हम चाहते हैं कि ’स्वरगोष्ठी’ के 500-वें अंक में हम पाँचों महाविजेताओं के नामों की घोषणा एक साथ करें जिसके लिए हम आप से सहयोग की आशा करते हैं। आपसे अनुरोध है कि कृष्णमोहन जी द्वारा आपको भेजे गए उस ईमेल को आप हमें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर भेज दें। इस तरह से 500-वें अंक में हम पाँचों महाविजेताओं की घोषणा कर सकेंगे।  


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पीलू और पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 498 : RAG PILU & PAHADI : 24 जनवरी, 2021 



रविवार, 17 जनवरी 2021

राग गुजरी तोड़ी : SWARGOSHTHI – 497 : RAG GUJARI TODI

  




स्वरगोष्ठी – 497 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 2 

"वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवाँ होगा"... देशभक्ति के करुण स्वर, राग गुजरी तोड़ी में




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। जब देशभक्ति गीतों की बात चलती है, तब सबसे पहले ऐसे जोशीले गाने याद आते हैं जो हमारे अन्दर देशभक्ति का जस्बा पैदा करते हैं, जिन्हें सुनते हुए हमारा ख़ून गर्म हो जाता है। पर बहुत से देशभक्ति गीत ऐसे भी हैं जो तीव्र लय वाले जोशीले रंग के नहीं, बल्कि ऐसे दिल को छू लेने वाली धुनों से सजे हैं कि जिन्हें सुनते हुए ना केवल देशभक्ति की लहर हमारी रगों में उमड़ने लगती हैं बल्कि इन गीतों के करुण पक्ष की वजह से ये हमारी आँखें भी नम कर जाती हैं। देशभक्ति के सुमधुर सुरों में ढले ऐसे कई गीत हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और ऐसे ही राग आधारित देशभक्ति गीतों से सजी है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला - ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने चर्चा की थी राग आसावरी पर आधारित गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" की। आज इसकी दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है फ़िल्म ’फूल बने अंगारे’ के गीत "वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवाँ होगा" से सम्बन्धित जानकारी। यह गीत आधारित है राग गुजरी तोड़ी पर। साथ ही सुनिए राग गुजरी तोड़ी में सारंगी पर उस्ताद सुल्तान ख़ाँ की बजायी हुई एक सुमधुर रचना।


कल्याणजी-आनन्दजी के साथ मोहम्मद रफ़ी
1962
 में भारत-चीन युद्ध के समाप्त होने पर हमारे कई फ़िल्मकारों ने युद्ध की पार्श्वभूमि पर फ़िल्में बनाईं। ’स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत की जो हमने चर्चा की थी, यह गीत पहली बार 27 जनवरी 1963 को गाया गया था। और इसी वर्ष फ़िल्म आयी ’फूल बने अंगारे’ जो देशभक्ति के रंग से रंगी हुई थी। गीतकार आनन्द बक्शी ने फ़िल्म के लिए ऐसा कोई शीर्षक गीत तो नहीं लिखा कि जिसके मुखड़े में फ़िल्म का शीर्षक आता हो, पर इस फ़िल्म के लिए लिखे देशभक्ति गीत "वतन पे जो फ़िदा होगा" के एक अन्तरे में बड़ी ख़ूबसूरती से उन्होंने लिखा है - "चमन वालों की ग़ैरत को है सय्यादों ने ललकारा, उठो हर फूल से कहदो के बन जाए वो अंगारा..."। सरल शब्दों में गहरीबात कहने की कला में माहिर थे आनन्द बक्शी। बक्शी साहब कभी फ़ौज में रहे थे और एक सिपाही की कर्मठता और उसके देश प्रेम को बहुत करीब से जाना था उन्होंने। और जब कभी उन्हें देशभक्तिपूर्ण गीत लिखने का मौका मिला, उन्होंने इस जस्बे को भी बहुत प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया। और यह गीत मिसाल है इसी जस्बे का। एक रेडियो कार्यक्रम में बक्शी साहब फ़ौजियों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, "साथियों, यह तो होने वाली बात थी कि आज बजाय संगीन के मेरे हाथ में कलम है। इस फ़िल्मी दुनिया में भी आप (फ़ौजियों) का सिखाया हुआ सबक भुलाया नहीं है।
मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में, संगीतकार कल्याणजी-आनन्दजी की धुनों में पिरो कर जब आनन्द बक्शी के ये दिल को छू लेने वाले बोल गूंज उठे तो जैसे सुनने वालों की रगों में देशप्रेम की लहरें मचलने लगीं। फ़िल्म में भले छ: गीत रहे हों, पर इनमें से बस दो गीत ही सही मायनों में लोकप्रिय हुए। मुकेश की आवाज़ में "चाँद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे" और दूसरा आज का प्रस्तुत देशभक्ति गीत। जहाँ एक ओर "चाँद आहें भरेगा" गीत को कल्याणजी-आनन्दजी ने राग भैरवी के स्वरों से सजाया, वहीं दूसरी तरफ़ शहीदों को सलाम करता, बल्कि देश के नौजवनों को शहादत के लिए प्रोत्साहित करता गीत "वतन पे जो फ़िदा होगा" को उन्होंने सजाया राग गुजरी तोड़ी में। गुजरी तोड़ी राग एक गम्भीर राग है और इस गीत की गम्भीरता और करुण रस को ध्यान में रखते हुए इस राग का प्रयोग सार्थक बन पड़ा है। इसी तरह से एक और प्रचलित गम्भीर रचना है 1968 की फ़िल्म ’आशीर्वाद’ में, "एक था बचपन, बचपन के एक बाबूजी थे..."। संगीतकार वसन्त देसाई ने इस गीत को इसी राग पर आधारित किया था। "वतन पे जो..." और "एक था बचपन..." गीतों के बीच एक और समानता यह भी है कि दोनों गीत दादरा ताल में निबद्ध है।  यूं तो राग तोड़ी पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीत बहुत से हैं, राग गुजरी तोड़ी पर आधारित फ़िल्मी गीतों की संख्या अधिक नहीं है।


1963 में ’फूल बने अंगारे’ के बाद दो वर्ष के ही अन्दर, 1965 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ में भी कल्याणजी-आनन्दजी ने राग गुजरी तोड़ी पर आधारित एक गीत की रचना की थी जिसे ख़ूब सुना गया और आज भी रेडियो पर अक्सर सुनने को मिल जाता है। मुकेश की दर्द भरी आवाज़ में यह गीत है "मैं तो इक ख़्वाब हूँ, इस ख़्वाब से तू प्यार ना कर"। जैसा कि हमने ऊपर कहा है कि गुजरी तोड़ी एक गम्भीर प्रकृति का राग है, इसलिए इस राग में दर्द और भक्ति रस के गाने अधिक निखर कर सामने आते हैं। "मैं तो इक ख़्वाब हूँ" में जहाँ दर्द छुपा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ़ इसी राग पर आधारित अनुप जलोटा के गाये प्रसिद्ध भजन "वो काला एक बांसुरी वाला" भक्ति रस से ओतप्रोत है। और जब दर्द और भक्ति, दोनों को एक साथ पिरोने की बात आती है, तब कल्याणजी-आनन्दजी की रचनात्मकता जन्म देती है "वतन पे जो फ़िदा होगा" जैसे गीत को, जिसमें शहादत का "दर्द" भी है और देश के प्रति "भक्ति" भी। निस्संदेह इस फ़िल्म के सिचुएशन में इस गीत के माध्यम से जिस भाव को उजागर करने की कोशिश की गई है, वह भाव गुजरी तोड़ी में ढल कर और भी सशक्त हो गया है। लीजिए नीचे दिए हुए लिंक पर क्लिक करके इस गीत को सुनिए और फ़िल्मांकन को देखते हुए महसूस कीजिए कि किस तरह से राग गुजरी तोड़ी के सुरों ने गीत में छुपे देशभक्ति और दर्द के भावों को उजागर किया है। एक तरफ़ फ़ौजी युद्ध पर जाने को तैयार है, उसके अन्दर देशभक्ति मचल रही है, और दूसरी तरफ़ उसकी पत्नी उसे विदा कर रही हैं। फ़ौजी की देशभक्ति और उसकी पत्नी का दर्द, ये ही दो भाव यह गीत उजागर कर रहा है। यह गीत आज के दौर के गायकों को भी प्रेरित करता है। जानेमाने गायक जावेद अली कहते हैं, "मुझे अगर कहा जाए कि देशभक्ति गाना गाओ, तो सबसे पहले यह गाना गाता हूँ। यह गाना मुझे इतना पसन्द है। और इतनी ख़ूबसूरते के साथ इसे गाया है रफ़ी साहबने कि तारीफ़ के लायक शब्द नहीं है मेरे पास, और उतना ही ख़ूबसूरत म्युज़िक है कल्याणजी-आनन्दजी भाई का इसमें।"





गीत : “वतन पे जो फ़िदा होगा...” : फ़िल्म: फूल बने अंगारे, गायक : मोहम्मद रफ़ी


उस्ताद सुल्तान ख़ाँ
राग गुजरी तोड़ी को गुर्जरी तोड़ी भी कहा जाता है। इसकी शुरूआत गुजरात में होने की वजह से ऐसा नाम पड़ा है। ऐसी भी मान्यता है कि ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर की गूजरी रानी मृगनयनी ने इस राग की रचना की थी जिस वजह से इसका नाम गुर्जरी तोड़ी पड़ा। 
राग तोड़ी की अपेक्षा इस राग में कोमल रिषभ को दीर्घ रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसमें र, ग, ध कोमल और म स्वर तीव्र लगता है। इस राग में प नहीं लगता। इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों में किया जा सकता है। इस राग का गायन व वादन समय दिन का दूसरा प्रहर है। अगर अन्य रागों से गुजरी तोड़ी की समानता की बात करें तो यह राग मियां की तोड़ी और बहादुरी तोड़ी के करीब है। राग गुजरी तोड़ी एक प्राचीन राग है जिसे समय-समय पर बहुत से दिग्गजों ने गाया है, बजाया है। उदाहरण स्वरूप, मेवाती घराने के वरिष्ठतम कलाकार पंडित जसराज, जयपुर अतरौली घराने की बेहद सम्मानीय कलाकार अश्विनी भीड़े देशपांडे और भारत रत्न से सम्मानित शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का राग गुर्जरी तोड़ी प्रसिद्ध है। पर आज हम यहाँ आपको गुजरी तोड़ी का जो रूप सुनवा रहे हैं, उसे सारंगी पर बजाया गया है। कलाकार हैं उस्ताद सुल्तान ख़ाँ। तो आप यह सुमधुर रचना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 




राग  गुजरी तोड़ी : सारंगी : उस्ताद सुल्तान ख़ाँ


संगीत पहेली के महाविजेताओं से क्षमा याचना

"स्वरगोष्ठी" के 495 और 496 वें अंक में वर्ष 2020 के महाविजेताओं के नामों की घोषणा के साथ-साथ महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ सम्मिलित की जानी थीं। अंक 495 में चौथे और पाँचवें महाविजेताओं की घोषणा भी हो चुकी थी। परन्तु कृष्णमोहन मिश्र जी के अचानक निधन की वजह से पहले, दूसरे और तीसरे महाविजेताओं के नाम अज्ञात् ही रह गए। पूरे वर्ष में पूछी गईं पहेलियों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों की तालिका और आंकड़ें कृष्णमोहन जी के कम्प्युटर पर होने की वजह से ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ टीम इन्हें प्राप्त नहीं कर पायी है। अत: हमें खेद है कि हम वर्ष 2020 के प्रथम तीन महाविजेताओं के नामों की घोषणा कर पाने में असमर्थ हैं। आशा है आप सभी हमारी विवशता को समझेंगे और हमें इस बात के लिए क्षमा करेंगे। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग गुजरी तोड़ी : SWARGOSHTHI – 49े7 : RAG GUJARI TODI : 17 जनवरी, 2021 



The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ