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Wednesday, May 12, 2010

जो खुद को आज़ाद कहे, वो सबसे बड़ा झूठा है... अनीला की आवाज़ में सुनिए क़तील साहब का बेबाकपन

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८३

स महफ़िल में बस गज़ल की बातें होनी चाहिए, हम यह बात मानते हैं, लेकिन आज हालात कुछ ऐसे हैं कि हमसे रहा नहीं जा रहा। भारतीय क्रिकेट टीम ट्वेंटी-ट्वेंटी के विश्व कप से बाहर हो गई... बाहर होना तो एक बात है, यहाँ तो इस टीम ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए। तीनों के तीनों मैच रेत की तरह मुट्ठी से गंवा दिए। सीरिज से पहले तो हज़ार तरह के वादे किए गए थे लेकिन आखिरकार हुआ क्या.. पिछली साल की तरह हीं बेरंग लौट आई यह टीम। एक ऐसे देश में जहाँ क्रिकेट को धर्म माना जाता है, वहाँ धर्म की इस तरह क्षति हो तो एक आस्तिक क्या करे.... उसके दिल को ठेस तो लगेगी हीं। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं। कुछ दिनों तक इस हार को याद रखेंगे फिर उसी जोश उसी खरोश के साथ भारतीय टीम के अगले मैच को देखने के लिए तैयार हो जाएँगे। हम हैं हीं ऐसे... लेकिन इन्हीं कुछ दिनों के दरम्यान जितने भी पल, जितने भी घंटे हैं, हमारे लिए वो तो ग़मगीन हीं गुजरेंगे ना। और फिर इसी दौरान आपको अगर ग़ज़ल की महफ़िल सजानी हो तो माशा-अल्लाह.... आपका तो भगवान हीं मालिक है। हमारी आज की मन:स्थिति सौ फ़ीसदी ऐसी हीं है। समझ नहीं आ रहा कि हार का ग़म व्यक्त करें या फिर आज की गज़ल में छुपे भाव। कहाँ से शुरू करें.... इसका कुछ अता-पता हीं नहीं है। लेकिन बात यह है कि हमारी महफ़िल हमारे जीवन का एक अंग है, इसलिए इसे नज़र-अंदाज़ करने का तो सवाल हीं नहीं उठता। यानि कि महफ़िल सजेगी ज़रूर.. भले हीं आज जोश कुछ कम हो, लेकिन जज्बा कम न होगा। तो चलिए हम इस महफ़िल की विधिवत शुरुआत करते हैं।

आज की महफ़िल जिस नज़्म, जिस नगमा के नाम है, उसे हमने "बियोन्ड लव" एलबम से लिया है। इस एलबम की सारी नज़्मों और गज़लों में संगीत सतीश शर्मा का है। उस्ताद बिलायत खान के सुपुत्र सुप्रसिद्ध सितार-वादक सुजात खान ने इस एलबम में अपनी आवाज़ और सितार का कमाल दिखाया है। इतना होने के बावजूद कुछ ऐसा है, जो इस एलबम को दूसरे एलबमों से अलग करता है। किसी भी कविता-प्रेमी के लिए अजीब और अनूठी बात होती है - एक कवि/कवयित्री की आवाज़ में दूसरे किसी शायर की नज़्मों की रिकार्डिंग। जी हाँ, इस एलबम में ऐसी कई सारी नज़्में हैं, जिसे अमेरिका में रहने वाली पाकिस्तानी लेखिका और कवयित्री अनीला अरशद ने अपनी आवाज़ दी है। आज की नज़्म उन्हीं कई सारी नज़्मों में से एक है। इस नज़्म की बात करने से पहले हम आपको इस एलबम की सारी गज़लों/नज़्मों का ब्योरा देना चाहेंगे।

१) कोई पूछे है - सुजात खान
२) प्यार के काफ़िले - सुजात खान
३) ये तारों भरी रात - सुजात खान, अनीला अरशद
४) पिंजरा कब टूटा है - अनीला अरशद
५) मेरे मचले हुए ख्वाबों का महकता है चमन - सुजात खान
६) ऐ मेरे प्यार की खुशबू - अनीला अरशद
७) जवानी के नगमे - सुजात खान, अनीला अरशद

"एक कवयित्री की आवाज़ में किसी दूसरे शायर की नज़्मे" - यह कहने पर आप समझ हीं गए होंगे कि ये सारी गज़लें/नज़्में अनीला की नहीं हैं.. तो फिर कौन है इस रचनाओं का रचयिता। हमने अब तक इस शायर की लिखी तीन-चार गज़लें महफ़िल में पेश की हैं। ये गज़लें कौन-कौन-सी हैं, यह पता करना आपका काम है। इस बहाने आपका रिवीजन भी हो जाएगा। अहा! कहाँ चले? ढूँढने? अरे भाई.... पहले उस शायर का नाम तो जान लीजिए.. क्या कहा? जानते हैं। सही है.. आप तो हमसे भी आगे निकले। हम्म्म..... इतना खुश मत होईये.. हम जानते हैं कि आपको उस शायर का नाम कहाँ से मालूम हुआ है। हमने हीं तो उनका नाम इस आलेख के शीर्षक में डाला है.. जी हाँ, हम "क़तील शिफ़ाई" की हीं बात कर रहे हैं। "बियोन्ड लव" में सारी की सारी गज़लें/नज़्में इन्हीं की लिखी हुई हैं। अब चूँकि क़तील साहब के बारे में ढेर सारी बातें पहले हीं हो चुकी हैं, इसलिए उन्हें दुहराने से कोई फ़ायदा नहीं। लेकिन हाँ, हम उनका लिखा यह शेर तो देख हीं सकते हैं:

मैनें पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठायेगा
आई इक आवाज़ कि तू जिसका मोहसिन कहलायेगा


क़तील साहब की बातें न होंगी, यह माना, लेकिन अनीला? ये कौन हैं..कहाँ से हैं.... क्या करती हैं....यह तो जाना हीं जा सकता है। आगे की पंक्तियों में हम अनीला के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं। हमने इन पंक्तियों का अनुवाद हिन्दी में करने की कोशिश की, लेकिन हमें ऐसे ढेर सारे शब्द मिलें जिनका हिन्दी में भाषांतरण आसान न था। इसलिए अंतत: हमने यह निर्णय लिया कि क्यों न इसे अंग्रेजी में हीं आपके सामने रख दिया जाए। वैसे भी एक वाक्य अपनी मूल भाषा में हीं ज्यादा सटीक होता है।

Aneela Arshad is a Certified Hypnotherapist, Reiki Master, Teacher and Healer. She owns and operates a Holistic Medical facility in New York where she has, by the grace of God, successfully healed many people suffering from stress, depression, sleep disorders and other related emotional illnesses. She is also an Author, Poet, Playwright and a Screenplay Writer aspiring to spread peace through her writings. Currently, the president of The Arch, a New York based Non-Profit, Cultural Organization; she hopes to reach out to the world through Art and Theatre, thereby bridging the gaps of diversity.

Her first book, The Bounty of Allah was published in 1999 by the Crossroads publishing company. She has written three screenplays, two of which, Where Spirits Soar and The Right and the Wrong, were bought by Nivelli International films. Nightmare at Uch Sharif is in the pre-production phase. She has also produced two plays, Mogul E Azam The Great Mogul and Amir Khusro in 2001 and 2003. She was nominated by the Sub-Continent Peace foundation to receive a proclamation and a Key to the City of Jersey City for her literary endeavors and the passion to address the crimes against women, particularly Muslim women.

THE SILENT LAMEN, her latest work, an anthology of which many poems have been published in various magazines, is a collection of poems based on the true stories of women whose voices have been stifled in a world where being a woman is a curse unto itself. This anthology lays bare the warped reality of women trapped beneath the rubble of a crumbling civilization. It voices the misery of tormented spirits crying out for help.

हमने "बियोन्ड लव" के बारे में जान लिया, अनीला की बातें हो गईं... इस दौरान सुजात खान भी चर्चा का विषय बने.... और तो और हमने क़तील साहब की कातिलाना शायरी भी याद कर ली..... तो फिर आज की नज़्म सुनने-सुनाने में देर करने का कोई कारण नहीं बनता। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है अनीला की झनकार भरी आवाज़ में वह नज़्म, जो क़तील साहब की बेबाकी का बेजोर उदाहरण है:

पिंजरा कब टूटा है,
कैदी कब छूटा है,
जो खुद को आज़ाद कहे,
वो सबसे बड़ा झूठा है।

जहन किसी का उलझा हुआ है,
माज़ी की ज़ंज़ीरों में,
घिरा हुआ है कोई हाल के
रंगारंग जजीरों में,
किसी को मुस्तकबिल के कुछ
सैयादों ने लूटा है।

इन्सानों की मजबूरी
हालात से जब टकराती है,
बहुत बड़ा एक कैदखाना
ये दुनिया बन जाती है,
इस दुनिया के बाग में
शूली जैसा हर ___ है।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "उफ़क/उफ़ुक" और शेर कुछ यूँ था-

दूर् उफ़क पर् चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम

इस शब्द के साथ सबसे पहले महफ़िल में हाज़िर हुए "शरद जी"। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

उफ़क का ज़िक्र ज़माने में जब भी होता है
ज़मीं को देख देख आसमान रोता है ।

शरद जी के बाद महफ़िल की शोभा बनीं शन्नो जी। आपने यह शेर पेश किया:

उफ़ुक के पार एक और जहाँ होता है
जहाँ न कोई जमी न आसमां होता है. (यह शेर शरद जी से थोड़ा-थोड़ा प्रेरित-सा लग रहा है.. है ना? :) )

मंजु जी, उफ़ुक पर जमीं और आसमान के मिलने के सच को आपने इस शेर में बखूबी दर्शाया है:

जमाना वरदान कहे या शाप ,
उफ़ुक-सा हम दोनों का साथ .

नीरज जी, महफ़िल में आने, महफ़िल को पसंद करने और हमें एक गलती से अवगत कराने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। उम्मीद करता हूँ कि आप आगे भी इसी तरह हमारा साथ देते रहेंगे। हाँ, गुमशुदा शब्द पर शेर कहना मत भूलिएगा। :)

सीमा जी, शायद आपको ध्यान में रखकर हीं किसी गीतकार ने यह कहा था -"देर से आई, दूर से आई... वादा तो निभाया।" वादा निभाने का शुक्रिया। ये रहे आपके शेर:

उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की (क़तील शिफ़ाई)

हद-ए-उफ़क़ पे शाम थी ख़ेमे में मुंतज़र
आँसू का इक पहाड़-सा हाइल नज़र में था (वज़ीर आग़ा)

अवनींद्र जी, महफ़िल से कितना भी दूर जाईये, महफ़िल आपको खींच हीं लाएगी :) और आने पर यह शेर..कमाल है!!

तराश ले अपनी रूह को उफक की मानिंद
अँधेरा जहाँ है सवेरा भी वहीँ है !!

अवध जी, गुलज़ार साहब की यह नज़्म याद दिलाने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। कुछ पंक्तियाँ पेश-ए-खिदमत हैं:

मौत तू एक कविता है.
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको.
ज़र्द सा चेहरा लिए जब चाँद उफक तक पहुंचे.
दिन अभी पानी में हो और रात किनारे के करीब.

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, October 6, 2009

रौशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह...इसी दुआ के साथ लता दीदी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५१

पाँच हफ़्तों और दस कड़ियों की माथापच्ची के बाद हम हाज़िर हैं प्रश्न-पहेली के अंकों का हिसाब लेकर। इन प्रश्न-पहेलियों में मुख्यत: ३ लोगों ने हीं भाग लिया(पिछली कड़ी में मंजु जी ने बस एक सवाल का जवाब दिया..इसलिए उन्हें हम मुख्य प्रतिभागियों में नहीं गिनते)। तो ये तीन लोग थे- सीमा जी, शरद जी और शामिख जी। अगर हम ५०वीं कड़ी के अंकों को छोड़ दें तो अंकों का गणित कुछ यूँ बनता था: सीमा जी: २९.५, शरद जी: १८, शामिख जी: १० अंक। तब तक यह ज़ाहिर हो चुका था कि सीमा जी हार नहीं सकतीं और पहली विजेता वहीं हैं। शरद जी और शामिख जी के बीच ८ अंकों का फ़र्क था। और इतनी दूरी को पाटने के लिए कोई चमत्कार की हीं जरूरत थी। ५०वीं कड़ी में हमने जब बोनस प्रश्न और बोनस अंक(५ अंक) जोड़ा तब भी हमें यह ख्याल नहीं था कि इसके सहारे कोई कमाल हो सकता है। लेकिन शामिख जी छुपे रूस्तम साबित हुए। उन्होंने अपना तुरूप का इक्का तभी इस्तेमाल किया जब उसकी जरूरत थी। हर बारे दूसरे या तीसरे स्थान पर आने वाले शामिख साहब इस बार महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुए। उन्होंने न सिर्फ़ नियमित प्रश्नों के सही जवाब दिये बल्कि बोनस प्रश्न का सही जवाब देकर छक्का मार दिया और एक हीं बार में ९ अंक(४+५) हासिल कर लिए। शाबाश शामिख जी... और इस तरह से आपके कुल १९ अंक हो गए। इस कमाल के बाद एक कमाल यह हुआ कि सीमा जी भले हीं एक दिन देर से हाज़िर हुईं लेकिन शरद जी उनसे भी पीछे आए। शरद जी अगर दूसरे नंबर पर आते तो उन्हें २ अंक मिलते और २० अंकों के साथ जीत उन्हीं की होती। लेकिन तीसरे नंबर पर आने के कारण उन्हें बस १ अंक हीं मिले और उनका कुल जोड़ हुआ १९. तो इस तरह अंततोगत्वा हिसाब ये बनता है: प्रथम: सीमा जी(३१.५..निर्विवाद..निर्विरोध), द्वितीय: शरद जी, शामिख जी(१९ अंक)। संयोग देखिए कि पिछली बार की तरह इस बार भी तीनों के तीनों विजयी हुए। अब बात करते हैं गज़लों की। सीमा जी अपनी पसंद की ५ गज़लें और शरद जी एवं शामिख जी ३-३ गज़लें सुन सकते हैं। आप तीनों से आग्रह है कि शुक्रवार तक इन गज़लों/नज़्मों की फ़ेहरिश्त sajeevsarathie@gmail.com पर भेज दें। ध्यान यह रखें कि गज़लें अलग-अलग फ़नकारों की हों(ताकि ज्यादा से ज्यादा जानकारी हम आपसे शेयर कर पाएँ) और हाँ अगर किसी गज़ल/नज़्म को ढूँढने में हमें मुश्किल आई तो हम आपसे उन गज़लों को बदलने का आग्रह भी कर सकते हैं।

आज हम जो गज़ल लेकर इस महफ़िल में हाज़िर हुए हैं,उसके साथ एक ऐसी फ़नकारा का नाम जुड़ा है, जिन्होंने ३६ भाषाओं(जिनमें रूसी, फ़िजीयन और डच भी शामिल है) में २०००० से भी अधिक गाने गाए हैं और जिनका नाम दुनिया भर में सबसे अधिक रिकार्ड की गई गायिका होने के नाते गिनीज बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज है। मजे की बात यह है कि आप हीं ऐसी एकमात्र जीवित व्यक्ति हैं जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। आपके बारे में और भी कुछ कहने से पहले हम आपको गत २८ सितंबर को मनाए गए आपके जन्मदिन की बधाई देना चाहेंगे। ८० साल की हो चलीं लता जी के बारे में अपने मुख से कुछ भी कहना संभव न होगा, इसलिए हमने निर्णय लिया है कि आज की कड़ी में हम आपसे लता जी की हीं कही गई बातें शेयर करेंगे। उससे पहले हम आपको यह बता दें कि लता जी ने पहली बार वसंत जोगलेकर द्वारा निर्देशित एक मराठी फिल्म 'किती हसाल'(कितना हसोगे?)(१९४२) में गाया था। उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता फ़िल्मों के लिये गाये इसलिये इस गाने को फ़िल्म से निकाल दिया गया। लेकिन उनकी प्रतिभा से वसंत जोगलेकर काफी प्रभावित हुये। इसके पाँच साल बाद भारत आज़ाद हुआ और लता मंगेशकर ने हिंदी फ़िल्मों में गायन की शुरूआत की, "आपकी सेवा में" पहली फ़िल्म थी जिसे उन्होंने अपने गायन से सजाया लेकिन उनके गाने ने कोई ख़ास चर्चा नहीं हुई। लता जी को पहली सफ़लता कमाल अमरोही की फिल्म "महल" के "आएगा आने वाला" गीत से मिली जिसे उस दौर की शीर्ष की हिरोईन मधुबाला पर फिल्माया गया था। उस घटना को याद करते हुए लता जी कहती हैं: जब महल फ़िल्म का गाना रिकॉर्ड हो रहा था तो खेम चंद्र प्रकाश जी जो मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करते थे, उन्होंने कहा था कि देखना महल के गाने खूब चलेंगे। फ़िल्म आई और गाने भी खूब बजे, लेकिन खेम चंद्र प्रकाश जी का देहांत हो गया। वो देख ही नहीं पाए कि आएगा आने वाला....इतना चला। उस गाने की शूटिंग तो बहुत ही मज़ेदार रही है। मलाड में बॉम्बे टाकीज़ का बहुत बड़ा स्टूडियो था। स्टूडियो पूरा खाली था। मैंने गाना शुरू किया, लेकिन उनका कहना था कि वो प्रभाव नहीं आ रहा है कि जैसे आवाज़ दूर से आ रही हो। उन्होंने मुझे स्टूडियो के एक कोने में खड़ा करके माइक बीच में रख दिया गया। माइक मुझसे क़रीब 20 फुट दूर रखा था। जो गाने से पहले का शेर था ख़ामोश है जमाना...वो शेर कहते हुए मैं एक-एक कदम आगे बढ़ती थी और गाना शुरू होने तक मैं माइक के पास पहुँच जाती थी। इस गाने पर बहुत मेहनत की मैंने। यकीनन इसी हौसले और इसी मेहनत का फ़ल है कि लता जी ने वह मुकाम हासिल कर लिया,जहाँ पहुँचना आम इंसानों के लिए मुमकिन नहीं है।

लंदन की वृत्तचित्र निर्माता नसरीन मुन्नी कबीर से बातचीत पर आधारित किताब "लता मंगेशकर इन हर ऑन वाइस" में लता जी से जुड़ी कई सारी बातों का खुलासा हुआ है। उनमें से हम दो बातें आपके सामने पेश कर रहे हैं। एक तो यह कि लता जी छद्म नाम से संगीत देती थीं। इस बारे में वे कहती हैं(सौजन्य:बीबीसी): मैं पुरुष छद्म नाम आनंदघन से फिल्मों में संगीत देती थीं। कोई नहीं जानता था कि मैं संगीतकार हूँ, लेकिन जब 'साधी मानस’ ने १९६६ में महाराष्ट्र सरकार के सर्वश्रेष्ठ संगीत समेत आठ पुरस्कार जीते तब समारोह के आयोजकों ने इस बात का खुलासा कर दिया कि आनंदघन कोई और नहीं बल्कि लता मंगेशकर ही हैं। इसके बाद मुझे सार्वजनिक रूप से सामने आकर पुरस्कार लेना पड़ा था। दूसरी घटना दिलीप साहब से जुड़ी है। इस बारे में लता जी का कहना था कि(सौजन्य:खास खबर): यह कोई १९४७ या ४८ की बात है, एक दिन अनिल विश्वास, युसूफ भाई(दिलीप कुमार) और मैं ट्रेन में सफर कर रहे थे। हम एक कंपार्टमेंट में बैठे थे, और युशूफ भाई ने मेरे बारे में पूछा कि ये कौन हूं। अनिल दा ने जवाब दिया यह एक नई गायिका है, जब आप इसे सुनेंगे तो आप भी इसकी आवाज को पसंद करेंगे। जब अनिल दा ने दिलीप साहब को बताया कि लता महाराष्ट्रीयन है, तो उन्होंने कहा कि इसकी उर्दू अच्छी नहीं है, इसका गाया गाना दाल भात जैसा होता होगा। यह सुनकर मैं बहुत दु:खी हुई। मैंने अनिल दा और नौशाद साहब के सहायक शफ़ी मोहम्मद से कहा कि मैं उर्दू का उच्चारण सुधारना चाहती हूँ। उन्होंने मेरी मुलाकात मौलाना महबूब से कराई, जिन्होंने कुछ समय मुझे उर्दू पढाई। बाद में नर्गिस की मां जद्दनबाई ने भी मेरी उर्दू की तारीफ की। मैं इसके लिए दिलीप साहब का शुक्रिया अदा करती हूँ। उन्होंने न टोका होता तो मेरी उर्दू वैसी हीं रहती। सभी जानते हैं कि लता जी और रफ़ी साहब ने तीन साल तक एक-दूसरे के साथ नहीं गाया था। इस बाबत पूछने पर वे कहती हैं(सौजन्य:पुणे/मुंबई मिरर):१९६० में हमारा एक म्युजिसियन्स’ एसोशिएशन था। उसमें मुकेश भैया, तलत महमूद साहब ने फ़नकारों के लिए रोयाल्टी की माँग रखी थी। मैं पहले से हीं रोयाल्टी लेती आ रही थी,इसलिए मैं चाहती थी कि सबको मिले। रफ़ी साहब इसके खिलाफ़ थे। उनका कहना था कि हम जो गाते हैं, उसका पैसा हमें मिल जाता है और बात वहीं खत्म हो जाती है। ऐसे हीं एक मीटिंग में जब उनसे उनकी राय पूछ गई तो उनका कहना था कि "यह महारानी जो कहेगी वही होगा"। मुझे बुरा लगा। मैंने कहा कि "हाँ, मैं महारानी हूँ, लेकिन आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?" इसपर उन्होंने सबके सामने कह दिया कि मैं तुम्हारे साथ अब नहीं गाऊँगा। मैंने कहा कि "ये कष्ट आप क्यों कर रहे हैं? मैं हीं नहीं गाऊँगी आपके साथ।" मैंने वहाँ मौजूद सारे संगीतकारों को भी बता दिया कि अब हमारे लिए कोई साथ में गाना न बनाएँ। उस घटना के बाद लगभग तीन सालॊं तक हमने साथ नहीं गाया। फ़नकारों के साथ ऐसा होता रहता है, वैसे भी फ़नकार तो नाजुक मिजाज के होते हैं। लता जी की फ़नकारी के और भी कई सारे किस्से हमारे पास हैं,लेकिन समय(पढें:जगह) इज़ाज़त नहीं दे रहा। इसलिए अभी आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल के शायर "क़तील शिफ़ाई" साहब को हमने एक पूरी की पूरी कड़ी नज़र की थी, इसलिए अभी हम उनके इस शेर से हीं काम चला लेते हैं:

मेरे बाद वफ़ा का धोखा और किसी से मत करना
गाली देगी दुनिया तुझको, सर मेरा झुक जायेगा।


"क़तील" साहब के इस शेर के बाद लीजिए अब पेश है जगजीत सिंह जी के संगीत से सजी यह गज़ल जिसे हमने "सजदा" एलबम से लिया है:

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह

मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे
रौशन दिल, बेदार नज़र दे या अल्लाह

सूरज-सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह

या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

एक फ़ुर्सते-___ मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के


आपके विकल्प हैं -
a) गुनाह, b) निगाह, c) पनाह, d) फिराक़

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मानूस" और शेर कुछ यूं था -

इतना मानूस न हो ख़िलवतेग़म से अपनी
तू कभी खुद को भी देखेगा तो ड़र जायेगा

कहते हैं ना कि "अपने तो अपने होते हैं"। तो शायद इसी कारण से अहमद फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "शामिख फ़राज़" ने.. फ़राज़-फ़राज़...समझ गए ना :) । आपने मानूस शब्द पर कुछ शेर भी कहे:

तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम
दिल के ख़ूं का एक और बहाना ही न हो (साहिर लुध्यान्वी)

इतना मानूस हूँ सन्नाटे से
कोई बोले तो बुरा लगता है (अहमद नदीम कासमी)

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो (नसिर क़ाज़मी)

शामिख जी के बाद महफ़िल में तशरीफ़ लाए सुमित जी। सुमित जी, चलिए कोई बात नहीं...शेर याद आए न आए, महफ़िल में आते रहिएगा....बीच में न जाने कहाँ गायब थे आप।

मंजु जी, जब कोई गज़ल/नज़्म या फिर हमारे आलेख की तारीफ़ करता है तो एक हौसला मिलता है, आगे बढते रहने का। धन्यवाद आपका। आपने "फ़राज़" साहब के शेर को एक अलग हीं रंग दे दिया है। कमाल है:

ये पेड़,फूल,सागर ही तो मेरे मानूस हैं ,
खिलवत ए गम की दवा जो है।

शन्नो जी, आपका शेर और मायूस :).. वैसे बड़ा हीं खुबसूरत है ये शेर:

देर हो चुकी है बहुत ये मानूस दिल
अपनी कलम से हम दुश्मन बना बैठे.

सीमा जी, महफ़िल की शम्मा बुझे, उससे पहले आप आ गईं। देर से आईं,लेकिन शुक्र है कि आप आईं तो सही। ये रही आपकी पेशकश:

इन राहों के पत्थर भी मानूस थे पाँवों से
पर मैंने पुकारा तो कोई भी नहीं बोला (दुष्यंत कुमार)

मानूस कुछ ज़रूर है इस जलतरंग में
एक लहर झूमती है मेरे अंग-अंग में (आलम खुर्शीद)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, July 31, 2009

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला....... महफ़िल में इक़बाल बानो और क़तील एक साथ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३४

१८वें एपिसोड में हमने आपको "तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे" सुनवाया था जिसे अपनी पुरकशिश आवाज़ से रंगीन किया था मोहतरमा "इक़बाल बानो" ने। उस एपिसोड के ९ एपिसोड बाद यानी कि २७ वें एपिसोड में हम लेकर आए थे "मोहे आई न जग से लाज, मैं इतनी जोर से नाची आज कि घुंघरू टूट गए"। यूँ तो उस नज़्म में आवाज़ थी "रूना लैला" की लेकिन जिसकी कलम ने उस कलाम को शिखर तक पहुँचाया उस शख्स का नाम था "क़तील शिफ़ाई"। तो हाँ आज हम इ़क़बाल बानो और क़तील शिफ़ाई की मिलीजुली मेहनत को सलाम करने के लिए जमा हुए हैं। हम आज जो गज़ल लेकर हाज़िर हुए हैं उसकी फ़रमाईश श्री शरद तैलंग जी ने की थी। जानकारी के लिए बता दें कि अगली कड़ी में हम दिशा जी की फ़रमाईश की हीं गज़ल प्रस्तुत करेंगे। अब चूँकि उनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त हमें देर से हासिल हुई, इसलिए वक्त लगना लाजिमी है। आज की गज़ल इसलिए भी खास है क्योंकि टिप्पणियों के माध्यम से कई बार शरद जी इसकी खूबसूरती का ज़िक्र कर चुके हैं। इतना होने के बावजूद हम इस गज़ल को टालने की सोच रहे थे क्योंकि इक़बाल बानो और क़तील शिफ़ाई के बारे में हम पहले हीं लिख चुके हैं और इक़बाल बानो पर तो एक पूरा का पूरा आलेख आवाज़ पर लिखा जा चुका है, फिर इनके बारे में कुछ नया कहना तो मुश्किल हीं होगा। लेकिन गज़ल की शोखी के सामने हमारी एक न चली और हमें इस गज़ल को सुनवाने पर बाध्य होना पड़ा। फिर हमने सोचा कि क्यों न क़तील शिफ़ाई के बारे में नए सिरे से खोज की जाए। और ढूँढते-ढूँढते हम पहुँच गए प्रकाश पंडित की पुस्तक "क़तील शिफ़ाई और उनकी शायरी" तक। जनाब प्रकाश पंडित से तो आप अब तक परिचित हो हीं गए होंगे। "फ़ैज़" साहब पर प्रस्तुत की गई कड़ी इन्हीं के पुस्तक के कारण मुमकिन हो पाई थी। आज की कड़ी का भी कुछ ऐसा हीं हाल है। वैसे "प्रकाश" साहब इतना बढिया लिखते हैं कि हमें उनका लिखा आप सबके सामने लाने पर बड़ा हीं फ़ख्र महसूस होता है। उम्मीद करते हैं कि हमारा और प्रकाश पंडित का साथ आगे भी इसी तरह बना रहेगा। चलिए अब प्रकाश पंडित की पुस्तक से क़तील शिफ़ाई का परिचय प्राप्त करते हैं।

किसी शायर के शेर लिखने के ढंग आपने बहुत सुने होंगे। उदाहरणतः 'इक़बाल’(मोहम्मद अल्लामा इ़क़बाल) के बारे में सुना होगा कि वे फ़र्शी हुक़्क़ा भरकर पलंग पर लेट जाते थे और अपने मुंशी को शेर डिक्टेट कराना शुरू कर देते थे। ‘जोश’ मलीहाबादी सुबह-सबेरे लम्बी सैर को निकल जाते हैं और यों प्राकृतिक दृश्यों से लिखने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। लिखते समय बेतहाशा सिगरेट फूँकने, चाय की केतली गर्म रखने और लिखने के साथ-साथ चाय की चुस्कियाँ लेने के बाद ,यहाँ तक कि कुछ शायरों के सम्बन्ध में यह भी सुना होगा कि उनके दिमाग़ की गिरहें शराब के कई पैग पीने के बाद खुलनी शुरू होती हैं। लेकिन यह अन्दाज़ शायद ही आपने सुना हो कि शायर शेर लिखने का मूड लाने के लिए सुबह चार बजे उठकर बदन पर तेल की मालिश करता हो और फिर ताबड़तोड़ दंड पेलने के बाद लिखने की मेज पर बैठता हो। यदि आपने नहीं सुना तो सूचनार्थ निवेदन है कि ये शायर ‘क़तील शिफ़ाई’ हैं। इनके शेर लिखने के इस अन्दाज़ को और लिखे शेरों को देखकर आश्चर्य होता है कि इस तरह लंगर–लँगोट कसकर लिखे गये शेरों में कैसे झरनों का-सा संगीत फूलों की-सी महक और उर्दू की परम्परागत शायरी के महबूब की कमर-जैसी लचक मिलती है। अर्थात् ऐसे वक़्त में जबकि इनके कमरे से ख़म ठोकने और पैंतरें बदलने की आवाज़ आनी चाहिए, वहां के वातावरण में एक अलग तरह की गुनगुनाहट बसी होती है। और इसके साथ यदि आपको यह भी मालूम हो जाए कि ‘क़तील शिफ़ाई’ जाति के पठान हैं और एक समय तक गेंद-बल्ले, रैकट, लुंगियाँ और कुल्ले बेचते रहे हैं, चुँगीख़ाने में मुहर्रिरी और बस-कम्पनियों में बुकिंग-क्लर्की करते रहे हैं तो इनके शेरों के लोच-लचक को देखकर आप अवश्य कुछ देर के लिए सोचने पर विवश हो जाएँगे। इन सारी रोचक बातों के बाद ’क़तील शिफ़ाई’ की जि़स बात का ज़िक्र आता है, वह है उनकी असफ़ल प्रेम कहानी। किस तरह एक परंपरागत गज़लें लिखने वाला इंसान यथार्थ के धरातल पर कदम रखने को मजबूर हो गया, इसका बड़ा हीं बढिया तरीके से इस पुस्तक में वर्णन किया हुआ है।

पहली नज़र में वह इंसान जो भी नज़र आता हो, दो-चार नज़रों या मुलाक़ातों के बाद बड़ी सुन्दर वास्तविकता खुलती है-कि वह डकार लेने के बारे में नहीं, अपनी किसी प्रेमिका के बारे में सोच रहा होता है-उस प्रेमिका के बारे में जो उसे विरह की आग में जलता छोड़ गई, या उस प्रेमिका के बारे में जिसे इन दिनों वह पूजा की सीमा तक प्रेम करता है। प्रेम और पूजा की सीमा तक प्रेम उसने अपनी हर प्रेमिका से किया है और उसकी हर प्रेमिका ने वरदान-स्वरूप उसकी शायरी में निखार और माधुर्य पैदा किया है, जैसे ‘चन्द्रकान्ता’ नाम की एक फिल्म ऐक्ट्रेस ने किया है जिससे उसका प्रेम केवल डेढ़ वर्ष तक चल सका और जिसका अन्त बिलकुल नाटकीय और शायर के लिए अत्यन्त दुखदायी सिद्ध हुआ। चन्द्रकान्ता से प्रेम और विछोह से पहले ‘क़तील शिफ़ाई’ आर्तनाद क़िस्म की परम्परागत शायरी किया करते थे और ‘शिफ़ा’ कानपुरी नाम के एक शायर से अपने कलाम पर इस्लाह लेते थे (इसी सम्बन्ध से वे अपने को ‘शिफ़ाई’ लिखते हैं)। फिर उन्होंने अहमद नदीम क़ासमी से मैत्रीपूर्ण परामर्श लिये। लेकिन किसी की इस्लाह या परामर्श तब तक किसी शायर के लिए हितकर सिद्ध नहीं हो सकते जब तक कि स्वयं शायर के जीवन में कोई प्रेरक वस्तु न हो। चन्द्रकान्ता उन्हें छोड़ गई लेकिन उर्दू शायरी को एक सुन्दर विषय और उस विषय के साथ पूरा-पूरा न्याय करने वाला शायर ‘क़तील’ शिफ़ाई दे गई। अपने व्यक्तिगत गम और गुस्से के बावजूद तब ‘क़तील’ ने चन्द्रकान्ता को अपना काव्य-विषय बनाया-एक ऐसी नारी को जो अपना पवित्र नारीत्व खो चुकी थी और खो रही थी। चन्द्रकान्ता के प्रेम और विछोह के बाद उन पर यह नया भेद खुला कि काव्य की परम्पराओं से पूरी जानकारी रखने, शैली में वृद्धि करने तथा नए विचार और नए शब्द देने के साथ-साथ केवल वही शायरी अधिक अपील कर सकती हैं जिसमें शायर का व्यक्तित्व या ‘मनोवृत्तान्त’ विद्यमान हों। मुहब्बत की नाकामी ने ‘क़तील’ को सोचने की प्रेरणा दी। समय, अनुभव और साहित्य की प्रगतिशील धारा से सम्बन्धित होने के बाद जिस परिणाम पर वे पहुँचे, उनकी आज की शायरी उसी की प्रतीक है। इस तरह प्रकाश पंडित को पढने के बाद हमें क़तील के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है। अपनी पुस्तक में इन्होंने क़तील साहब के बारे में और भी बहुत कुछ लिखा है, लेकिन वो सब आगे कभी। वैसे एक बात जो ’क़तील’ साहब की सबको बहुत भाती है, वह है उनका मज़ाकिया लहज़ा। ’मोहे आई न जग से लाज’ के बारे में वे कहते हैं: जब तक भारत और पाकिस्तान का कोई भी गायक इस गीत को गा नहीं लेता वो गवैया नहीं कहलाता। आप माने या ना माने लेकिन इस बात में सच्चाई तो है...लगभग सभी गायकों ने इस नज़्म पर अपनी आवाज़ साफ की है। क़तील साहब की यही तो खासियत है, कुछ ऐसा लिख जाते हैं जो चाहने से भी नहीं छूटता। इसी बात पर क्यों ना उन्हीं का लिखा एक शेर देख लिया जाए जो आजकल के इश्क़ पर फिट बैठता है:

हौसला किसमें है युसुफ़ की ख़रीदारी का
अब तो महंगाई के चर्चे है ज़ुलैख़ाओं में।


क़तील शिफ़ाई एक ऐसे शख्स हैं जिनपर जितना लिखा जाए उतना कम है। इन्हें नज़र-अंदाज़ करना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है और इसीलिए हम यह फ़ैसला करते हैं कि कुछ हीं दिनों में इनकी अगली गज़ल/नज़्म लेकर जरूर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए इक़बाल बानो की दर्दभरी आवाज़ में इस गज़ल का लुत्फ़ उठाया जाए:

उल्फ़त की नयी मंज़िल को चला तू बाहें डाल के बाहों में
दिल तोड़ने वाले देख के चल, हम भी तो पड़े हैं राहों में

क्या-क्या न जफ़ाएं दिल पे सहीं, पर तुमसे कोई शिक़वा न किया
इस जुर्म को भी शामिल कर लो मेरे मासूम ग़ुनाहों में

जब चांदनी रातों में तूने, ख़ुद हम से किया इक़रार-ए-वफ़ा
फिर आज हैं क्यों हम बेगाने, तेरी बे-रहम निग़ाहों में

हम भी हैं वही तुम भी हो वही ये अपनी-अपनी क़िस्मत है
तुम खेल रहे हो खुशियों से, हम डूब गये हैं आहों में




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

__ को दर्द मिला, दर्द को ऑंखें न मिली,
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं...


आपके विकल्प हैं -
a) रूह, b) दिल, c) होश, d) इश्क

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "बला" और शेर कुछ यूं था -

ये दुनिया भर के झगड़े घर के किस्‍से काम की बातें
बला हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ।

इस शेर का सबसे पहले संधान शरद जी ने किया। और अगले हीं क्षण बला पर एक शेर दाग दिया-

बला कैसी भी हो अपने को उसके पास रखता हूँ
तभी तो लोग कहते हैं हुनर कुछ ख़ास रखता हूँ ।

दिशा जी कहाँ कम थीं। उन्होने एक नहीं बल्कि दो-दो स्वरचित शेर डाले। दो में से एक यह था-

बला छू न सके उनको,जिनका हाफिज हो खुदा
इस सच का एहसास लेकर मैं तेरे दर से उठा

निर्मला जी आपको हमारी महफ़िल और हमारे लिखने का अंदाज़ अच्छा लग रहा है, इसके लिए हम आपका तहे-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन यह क्या आपकी तरफ़ से कोई भी शेर नहीं। अगर अपना कोई ध्यान नहीं आ रहा तो किसी दूसरे शायर का हीं डाल दें। चलिए अगली बार आप से उम्मीद रहेगी।

मंजु जी हमेशा से हीं हमारी श्रोता/पाठिका रही हैं। आगे भी इसी तरह हम पर अपना स्नेह डालती रहेंगी, यही दुआ है।

मनु जी, आखिरकार आपने हमारा पोस्ट पढ हीं लिया :) आपको गज़ल पसंद आई तो इसी फ़नकार की दूसरी गज़ल (बदकिस्मती से उनकी दो हीं गज़लें उपलब्ध हैं) लेकर हम ज़ल्द हीं महफ़िल-ए-गज़ल पर हाज़िर होंगे, इस बात का आपको हम यकीन दिलाते हैं।

शामिख जी, धीरे-धीरे आप हमारे लिए गज़लों का एक स्रोत होते जा रहे हैं। आप अपनी टिप्पणियों के माध्यम से हमें कई सारी गज़लों की जानकारी देते हैं, जो हमारे लिए लाभप्रद साबित होता है। आपने ना सिर्फ़ "जावेद अख्तर" साहब के इस शेर को पकड़ा बल्कि उनकी एक और गज़ल हमें मुहैया करा दी। साथ-साथ मनु जी के बड़े चाचा (मिर्ज़ा ग़ालिब) के इस शेर से महफ़िल को रंगीन भी कर दिया:

क़हर हो या बला हो, जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिये होते

कुलदीप जी आपकी बात सोलह आने सच है कि अगर मास्टर मदन कुछ दिन/साल और जीते तो भारतीय संगीत का रंग हीं अलहदा होता। आप इस शेर के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए:

बला की खूबसूरती जब सफ़ेद ताज पे नौश फरमाती है .
क्या कहें तब तो जन्नत से मुमताज़ की चांदनी भी उतर आती है .

निकलते-निकलते कुलदीप जी भी ग़ालिब के रंग में रंग गए। ये रही बानगी:

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब्-ऐ-गम बुरी बला है
मूझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

मनु जी, यह क्या आपके रहते एक और शब्दकोष :) ...वैसे हमारे लिए अच्छा है, ज्यादा से ज्यादा लोग गज़लों का मज़ा लें तो हमें और क्या चाहिए....

इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए दीजिये इजाज़त, खुदा हाफिज़ !!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, July 7, 2009

इश्क ने ऐसा नचाया कि घुंघरू टूट गए........"लैला" की महफ़िल में "क़तील"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२७

धीरे-धीरे महफ़िल में निखार आने लगा है। भले हीं पिछली कड़ी में टिप्पणियाँ कम थीं,लेकिन इस बात की खुशी है कि इस बार बस "शरद" जी ने हीं भाग नहीं लिया, बल्कि "दिशा" जी ने भी इस मुहिम में हिस्सा लेकर हमारे इस प्रयास को एक नई दिशा देने की कोशिश की। "दिशा" जी ने न केवल अपनी सहभागिता दिखाई, बल्कि "शरद" जी से भी पहले उन्होंने दोनों सवालों का जवाब दिया और सटीक जवाब दिया, यानी कि वे ४ अंकों की हक़दार हो गईं। "शरद" जी को उनके सही जवाबों के लिए ३ अंक मिलते हैं। इस तरह "शरद" जी के हुए ७ अंक और दिशा जी के ४ अंक। "शरद" जी, आपने "इक़बाल बानो" की जिस गज़ल की बात की है, अगर संभव हुआ तो आने वाले दिनों में वह गज़ल हम आपको जरूर सुनवाएँगे। चूँकि किसी तीसरे इंसान ने अपने दिमागी नसों पर जोर नहीं दिया, इसलिए २ अंकों वाले स्थान खाली हीं रह गए। चलिए कोई बात नहीं, एक एपिसोड में हम ४ अंक से ३ अंक तक पहुँच गए तो अगले एपिसोड यानी कि आज के एपिसोड में हमें २ अंक पाने वाले लोग भी मिल हीं जाएंगे। वैसे "मज़रूह सुल्तानपुरी" साहब का एक शेर भी हैं कि "मैं अकेला हीं चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।" अब जब इस मुहिम की शुरूआत हो गई है तो एक न एक दिन सफ़लता मिलेगी हीं। इसी दृढ विश्वास के साथ आज की पहेलियों का दौर आरंभ करते हैं। उससे पहले- हमेशा की तरह इस अनोखी प्रतियोगिता का परिचय : २५ वें से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) महज़ "नौ" साल की उम्र में "महाराज हरि सिंह" के दरबार की शोभा बनने वाली एक फ़नकारा जो "अठारह" साल की उम्र में चुपके से महल से इस कारण भाग आई ताकि वह महाराज के "हरम" का एक हिस्सा न बन जाए।
२) एक फ़नकार जिन्हें जनरल "अयूब खान" ने "तमगा-ए-इम्तियाज", जनरल "ज़िया-उल-हक़" ने "प्राइड औफ़ परफारमेंश" और जनरल "परवेज मु्शर्रफ़" ने "हिलाल-ए-इम्तियाज" से नवाजा। इस फ़नकार की नेपाल के राजदरबार से जुड़ी एक बड़ी हीं रोचक कहानी हमने आपको सुनाई थी।


सवालों का पुलिंदा पेश करने के बाद महफ़िल की और लौटने में जो मज़ा है, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। वैसे आज की महफ़िल की बात हीं कुछ अलग है। न जाने क्यों कई दिनों से ये शायर साहब मेरे अचेतन मस्तिष्क में जड़ जमाए बैठे थे। यहाँ तक कि पिछली महफ़िल में हमने जो शेर डाला था, वो भी इनका हीं था। शायद यह एक संयोग है कि शेर डालने के अगले हीं दिन हमें उनकी पूरी की पूरी नज़्म सुनने को नसीब हो रही है। दुनिया में कई तरह के तखल्लुस देखे गए हैं, और उनमें से ज्यादातर तखल्लुस औरों पर अपना वर्चस्व साबित करने के लिए गढे गए मालूम होते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी शायर हुए हैं, जो अपने तखल्लुस के बहाने अपने अंदर बसे दर्द की पेशगी करते हैं। ऐसे हीं शायरों में से एक शायर हैं जनाब "क़तील शिफ़ाई"। क़तील का अर्थ होता है,वह इंसान जिसका क़त्ल हुआ हो। अब इस नाम से हीं इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायर साहब अपनी ज़िंदगी का कौन-सा हिस्सा दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं।२४ दिसम्बर १९१९ को पाकिस्तान के "हरिपुर" में जन्मे "औरंगजेब खान" क़तील हुए अपनी शायरी के कारण तो "शिफ़ाई" हुए अपने गुरू "हक़ीम मोहम्मद शिफ़ा" के बदौलत। बचपन में पिता की मौत के कारण इन्हें असमय हीं अपनी शिक्षा का त्याग करना पड़ा। रावलपिंडी आ गए ताकि किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पाल सकें। ६० रूपये के मेहनताने पर एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी कर ली। १९४६ में लाहौर के "अदब-ए-लतिफ़" से जब असिसटेंट एडिटर के पद के लिए न्यौता आया तो खुद को रोक न सके , आखिर बचपन से हीं साहित्य और शायरी में रूचि जो थी। इनकी पहली गज़ल "क़मर जलालाबादी" द्वारा संपादित साप्ताहिक पत्रिका "स्टार" में छपी। इसके बाद तो इनका फिल्मों के लिए रास्ता खुल गया। इन्होंने अपना सबसे पहला गाना जनवरी १९४७ में रीलिज हुई फिल्म "तेरी याद" के लिए लिखा। १९९९ में रीलिज हुई "बड़े दिलवाला" और "ये है मुंबई मेरी जान" तक इनके गानों का दौर चलता रहा। "क़तील" साहब की कई सारी नज़्में और गज़लें आज भी मुशायरों में गुनगुनाई जाती हैं , मसलन "अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको", "उल्फ़त की नई मंज़िल को चला तू", "जब भी चाहे एक नई सूरत बना लेते हैं लोग", "तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं" और "वो दिल हीं क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे"। क़तील साहब से जुड़ी और भी बातें हैं,लेकिन सब कुछ एकबारगी खत्म कर देना अच्छा न होगा, इसलिए बाकी बातें कभी बाद में करेंगे, अभी आज की फ़नकारा की ओर रूख करते हैं।

"मल्लिका पुखराज" और "फ़रीदा खानुम" के बाद आज हम जिन फ़नकारा को लेकर आज हाज़िर हुए हैं, गज़ल और नज़्म-गायकी में उनका भी अपना एक अलग रूतबा है। यूँ तो हैं वे बांग्लादेश की, लेकिन पाकिस्तान और हिंदुस्तान में भी उनके उतने हीं अनुपात में प्रशंसक हैं,जितने अनुपात में बांग्लादेश में हैं। अनुपात की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि हिंदुस्तान की जनसंख्या पाकिस्तान और बांग्लादेश से कहीं ज्यादा है, इसलिए प्रशंसकों की संख्या की तुलना बेमानी होगी। ७० के दशक में जब उन्होंने "दमादम मस्त कलंदर" गाया तो हिंदुस्तानी फिल्मी संगीत के चाहने वालों के दिलों में एक हलचल-सी मच गई। १९७४ में रीलिज हुई "एक से बढकर एक" के टाईटल ट्रैक को गाकर तो वे रातों-रात स्टार बन गईं। कई लोगों को यह भी लगने लगा था कि अगर वे बालीवुड में रूक गई तो मंगेशकर बहनों (लता मंगेशकर और आशा भोंसले) के एकाधिकार पर कहीं ग्रहण न लग जाए। लेकिन ऐसा न हुआ, कुछ हीं फ़िल्मों में गाने के बाद उन्होंने बंबई को छोड़ दिया और पाकिस्तान जा बसीं। वैसे बप्पी दा के साथ उनकी जोड़ी खासी चर्चित रही। "ई एम आई म्युजिक" के लिए इन दोनों ने "सुपर-रूना" नाम की एक एलबम तैयार की, जिसे गोल्ड और प्लैटिनम डिस्कों से नवाज़ा गया। पाकिस्तान के जानेमाने संगीत निर्देशक "नैयर" के साथ उनकी एलबम "लव्स आफ़ रूना लैला" को एक साथ दो-दो प्लैटिनम डिस्क मिले। अब तक तो आप समझ हीं गए होंगे कि हम किन फ़नकारा की बात कर रहे हैं। जी हाँ, हम "रूना लैला" की हीं बात कर रहे हैं, जिन्होंने आज तक लगभग सत्रह भाषाओं में गाने गाए हैं और जिन्हें १५० से भी ज्यादा पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। "रूना लैला" संगीत के क्षेत्र में कैसे उतरीं, इसकी बड़ी हीं मज़ेदार दास्तां है। "रूना" के लिए संगीत बस इनकी बड़ी बहन "दिना" की गायकी तक हीं सीमित था। हुआ यूँ कि जिस दिन "दिना" का परफ़ार्मेंस था,उसी दिन उनकी आवाज़ बैठ गई। आयोजन विफ़ल न हो जाए, इससे बचने के लिए "रूना" को उनकी जगह उतार दिया गया। उस समय "रूना" इतनी छोटी थीं कि सही से "तानपुरा" पकड़ा भी नही जा रहा था। किसी तरह जमीन का सहारा देकर उन्होंने "तानपुरा" पर राग छेड़ा और एक "ख्याल" पेश किया। एक छोटी बच्ची को "ख्याल" पेश करते देख "दर्शक" मंत्रमुग्ध रह गए। बस एक शुरूआत की देर थी ,फिर उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। आज वैसा हीं कुछ मनमोहक अंदाज लेकर हमारे सामने आ रही हैं "रूना लैला"। उस नज़्म को सुनने से पहले क्यों न हम आज के शायर "क़तील शिफ़ाई" का एक प्यारा-सा शेर देख लें:

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है
इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है


चलिए अब थोड़ा भी देर किए बिना आज की नज़्म से रूबरू होते हैं। इस नज़्म को संगीत से सजाया है "साबरी ब्रदर्स" नाम से प्रसिद्ध भाईयों की जोड़ी में से एक "मक़बूल साबरी" ने। "मक़बूल" साहब और "साबरी ब्रदर्स" की बातें किसी अगली कड़ी में। अभी तो बस ऐसा रक्श कि घुंघरू टूट पड़े:

वाइज़ के टोकने पे मैं क्यों रक्श रोक दूँ,
उनका ये हुक्म है कि अभी नाचती रहूँ।

मोहे आई न जग से लाज,
मैं इतनी जोर से नाची आज,
कि घुंघरू टूट गए।

कुछ मुझपे नया जोबन भी था,
कुछ प्यार का पागलपन भी था,
एक पलक पलक बनी तीर मेरी,
एक जुल्फ़ बनी जंजीर मेरी,
लिया दिल साजन का जीत,
वो छेडे पायलिया ने गीत
कि घुंघरू टूट गए।

मैं बसी थी जिसके सपनों में,
वो गिनेगा मुझको अपनों में,
कहती है मेरी हर अंगड़ाई,
मैं पिया की नींद चुरा लाई,
मैं बनके गई थी चोर,
कि मेरी पायल थी कमजोर
कि घुंघरू टूट गए।

धरती पर न मेरे पैर लगे,
बिन पिया मुझे सब गैर लगे,
मुझे अंग मिले परवानों के,
मुझे पंख मिले अरमानों के,
जब मिला पिया का गाँव,
तो ऐसा लचका मेरा पाँव
कि घुंघरू टूट गए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

रूह बेचैन है एक दिल की अजीयत क्या है,
दिल ही __ है तो ये सोज़े मोहब्बत क्या है...

आपके विकल्प हैं -
a) शोला, b) दरिया, c) शबनम, d) पत्थर

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"समुन्दर" और शेर कुछ यूं था-

मैं समुन्दर भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको...

दिशा जी ने यहाँ भी बाज़ी मारी. बहुत बहुत बधाई सही जवाब के लिए, आपका शेर भी खूब रहा -

इश्क का समंदर इतना गहरा है
जो डूबा इसमे समझो तैरा है...

वाह....

शरद जी ने भी अपने शेर से खूब रंग जमाया -

अपनी बातों में असर पैदा कर
तू समन्दर सा जिगर पैदा कर
बात इक तरफा न बनती है कभी
जो इधर है वो उधर पैदा कर ।

रचना जी ने फरमाया -

समंदर न सही समंदर सा हौसला तो दे
ज़िन्दगी से रिश्ता हम को निभाना तो है

तू लिखता चल किनारे पर नाम उनका
समंदर की मौजों को उनसे टकराना तो है

तो सुमित जी ने कुछ त्रुटी के साथ ही सही एक बढ़िया शेर याद दिलाया -

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे, जो समंदर मेरी तलाश में है....

मनु जी पधारे इस शेर के साथ -

समंदर आज भी लज्ज़त को उसके याद करता है
कभी इक बूँद छूट कर आ गिरी थी, दोशे -बादल से...

वाह...कुलदीप अंजुम जी ने तो समां ही बांध दिया ऐसे नायाब शेर सुनकर -

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मैं मूझे डूब कर मार जाने दो

गुडियों से खेलती हुयी बच्ची की आंख में
आंसू भी आ गया तो समंदर लगा हमें

और

बड़े लोगो से मिलने में हमेशा फासला रखना
मिले दरिया समंदर में कभी दरिया नहीं रहता....

पर दोस्तों आप हमसे मिलने में कभी कोई फासला मत रखियेगा.....जो भी दिल में हो खुलकर कहियेगा....इसी इल्तिजा के साथ अगली महफिल तक अलविदा....

अहा! आपसे विदा लेने से पहले पूजा जी की टिप्पणी पर टिप्पणी करना भी तो लाज़िमी है। पिछली बार की उलाहनाओं के बाद पूजा जी ने शेर तो फरमाया, लेकिन यह क्या शब्द हीं गलत चुन लिया । सही शब्द पूजा जी अब तक जान हीं चुकी होंगी।

यह देखिए, पूजा जी ने मनु जी की खबर ली तो मनु जी एक नए शेर के साथ फिर से हाज़िर हो गए, शायद इसी को लाईन हाज़िर होना कहते हैं :) । वैसे मुझे लगता है कि मनु जी को भूलने की बीमारी लग गई है, हर बार अगला शेर डालने समय वे पिछले शेर को भूल चुके होते हैं और हर बार हीं उनका कहना होता है कि "ये भी नहीं के ये शे'र मैंने कब सुनाये हैं"...मनु जी सुधर जाईये........या फिर पता कीजिए कि आपके नाम से शेर कौन डाल जाता है।

चलिए अब बहुत बातें हो गईं। अगली कड़ी तक के लिए "खुदा हाफ़िज़"..
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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