Tuesday, December 27, 2011

प्यार ज़िन्दगी है....आईये आज की शाम समर्पित करें अपने अपने प्यार के नाम


फ़िल्म के प्रस्तुत गीत की बात करें तो यह गीत सिर्फ़ इस वजह से ही ख़ास बन जाता है कि इसमें लता और आशा, दोनों की आवाज़ें मौजूद हैं, और दोनों की अदायगी का कॉन्ट्रस्ट भी बड़ा ख़ूबसूरत लगता है। एक तरफ़ आशा किसी क्लब डान्सर का प्लेबैक कर रही है और पाश्चात्य शैली में "लाहल्ला लाहल्ला हो या अल्लाह" गाती हैं, जबकि लता की आवाज़ सज रही है राखी पर जो एक अच्छे घर की सीधी-सादी, साड़ी पहनने वाली भारतीय नारी का रूप है। कोई ऐसी लड़की अगर इस गीत में अपनी आवाज़ मिलाएगी तो जिस तरह का अंदाज़ होगा, बिल्कुल वैसा ही लता जी नें गाया है।

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 818/2011/258

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! इन दिनों इस स्तंभ में जारी है लघु शृंखला 'आओ झूमे गाएं', जिसके अन्तर्गत हम १० ऐसे गीत सुन रहे हैं जिनमें बातें हैं जीवन दर्शन की, झूमने-गाने की, मौज-मस्ती करने की, यानी कि ख़ुश रहने की। दोस्तों, ख़ुश रहने को सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है? यह सवाल फ़िल्म 'किंग् अंकल' के एक गीत में भी पूछा गया था जिसमें जवाब था "ख़ुशी तो मिलती है जब मिले किसी का प्यार"। यही बात कल के गीत से भी हमने जाना, "जीना क्या अजी प्यार बिना"। और भी बहुत से गीत हैं जिनमें प्यार को ज़िन्दगी करार दिया गया है। ऐसा ही एक गीत आज हम लेकर आए हैं आपको सुनवाने के लिए, फ़िल्म है 'मुकद्दर का सिकन्दर', आवाज़ें हैं आशा भोसले, लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर की, और गीत के बोल हैं "प्यार ज़िन्दगी है, प्यार बन्दगी है, प्यार से प्यार करो ये उम्र प्यार की है"। 'मुक़द्दर का सिकन्दर' बिग-बी अमिताभ बच्चन की एक सदाबहार और ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन प्रकाश मेहरा नें किया था। बिग-बी और प्रकाश मेहरा नें साथ में कई फ़िल्में की और सभी सुपरहिट हुईं जैसे कि 'ज़ंजीर', 'हेरा-फेरी', 'ख़ून पसीना', 'मुक़द्दर का सिकन्दर', 'लावारिस', 'नमक हलाल', 'शराबी' और 'जादूगर'। 'मुक़द्दर का सिकन्दर' १९७८ की फ़िल्म थी जिसमें अमिताभ के साथ राखी, रेखा और विनोद खन्ना नें अभिनय किया। ७० के दशक की यह सर्वोच्च व्यापार करने वाली प्रथम तीन फ़िल्मों में से एक थी। हालाँकि इस फ़िल्म को फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के लिए कई नामांकन मिले (सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का भी नामांकन मिला), पर किसी भी श्रेणी में जीत हासिल नहीं कर सकी। १९८० में इस फ़िल्म का तेलुगू में पुनर्निर्माण हुआ 'प्रेम तरंगलु' के नाम से।

फ़िल्म के प्रस्तुत गीत की बात करें तो यह गीत सिर्फ़ इस वजह से ही ख़ास बन जाता है कि इसमें लता और आशा, दोनों की आवाज़ें मौजूद हैं, और दोनों की अदायगी का कॉन्ट्रस्ट भी बड़ा ख़ूबसूरत लगता है। एक तरफ़ आशा किसी क्लब डान्सर का प्लेबैक कर रही है और पाश्चात्य शैली में "लाहल्ला लाहल्ला हो या अल्लाह" गाती हैं, जबकि लता की आवाज़ सज रही है राखी पर जो एक अच्छे घर की सीधी-सादी, साड़ी पहनने वाली भारतीय नारी का रूप है। कोई ऐसी लड़की अगर इस गीत में अपनी आवाज़ मिलाएगी तो जिस तरह का अंदाज़ होगा, बिल्कुल वैसा ही लता जी नें गाया है। "लाहल्ला लाहल्ला" की जगह महेन्द्र कपूर "यल्ला यल्ला" गाते हैं और लता जी कुछ शर्माते हुए "हो या अल्लाह" गाती हैं। महेन्द्र कपूर नें फ़िल्म में विनोद खन्ना का पार्श्वगायन किया था और उन पर फ़िल्माया हुआ यह फ़िल्म का एकमात्र गीत था। बाक़ी गीत किशोर कुमार नें गाए जो अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माए गए थे। 'मुक़द्दर का सिकन्दर' के संगीतकार थे कल्याणजी-आनन्दजी और गीतकार थे अंजान। यह गीत प्यार-मोहब्बत की शान में गाया गया है और पूरे गीत में केवल प्यार ही प्यार की बातें की गई हैं। आइए इस थिरकते नग़मे का आनन्द लिया जाए लता, आशा और महेन्द्र के स्वरों में। संगीत संयोजन भी कमाल का किया है कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों नें।



मित्रों, ये आपके इस प्रिय कार्यक्रम "ओल्ड इस गोल्ड" की अंतिम शृंखला है, ८०० से भी अधिक एपिसोडों तक चले इस यादगार सफर में हमें आप सबका जी भर प्यार मिला, सच कहें तो आपका ये प्यार ही हमारी प्रेरणा बना और हम इस मुश्किल काम को इस अंजाम तक पहुंचा पाये. बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम सदा अपनी यादों में सहेज कर रखेंगें. पहले एपिसोड्स से लेकर अब तक कई साथी हमसे जुड़े कुछ बिछड़े भी पर कारवाँ कभी नहीं रुका, पहेलियाँ भी चली और कभी ऐसा नहीं हुआ कि हमें विजेता नहीं मिला हो. इस अंतिम शृंखला में हम अपने सभी नए पुराने साथियों से ये गुजारिश करेंगें कि वो भी इस श्रृखला से जुडी अपनी कुछ यादें हम सब के साथ शेयर करें....हमें वास्तव में अच्छा लगेगा, आप सब के लिखे हुए एक एक शब्द हम संभाल संभाल कर रखेंगें, ये वादा है.

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें +91-9811036346 (सजीव सारथी) या +91-9878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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