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Sunday, April 5, 2020

राग बहार : SWARGOSHTHI – 463 : RAG BAHAR







स्वरगोष्ठी – 463 में आज

काफी थाट के राग – 7 : राग बहार

उस्ताद राशिद खाँ से राग बहार में एक खयाल और कुन्दनलाल सहगल के जन्मदिन पर उनसे फिल्मी गीत सुनिए




कुन्दनलाल सहगल
उस्ताद राशिद खाँ
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वर का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग बहार पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की सातवीं कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ से राग बहार में निबद्ध खयाल का रसास्वादन करा रहे हैं और फिर इसी राग पर आधारित 1943 में प्रदर्शित फिल्म “तानसेन” से एक गीत कुन्दनलाल सहगल के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसी सप्ताह 11 अप्रैल को सहगल की जयन्ती है। फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश हैं।


राग बहार का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इस राग के आरोह में ऋषभ स्वर और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग की जाति षाडव-षाडव होती है। इसमें गान्धार कोमल तथा दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। मध्यरात्रि में राग बहार के गाने-बजाने की परम्परा है। किन्तु यह ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में यह राग किसी भी समय गाया या बजाया जा सकता है। राग बहार में निबद्ध गीतों में बसन्त ऋतु का वर्णन मिलता है। इस राग का उल्लेख किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में नहीं मिलता। वस्तुतः इस राग की रचना मध्यकाल में हुई है। वास्तव में यह राग तीन रागों; बागेश्री, अड़ाना और मियाँ मल्हार के मिश्रण से बना है। स्वयं भातखण्डे जी ने “क्रमिक पुस्तक माला” के चौथे भाग में राग बहार के लक्षण गीत में लिखा है; “बागेश्री, मल्हार सुम्मिलत...सुर अड़ाना बीच चमकत...”। राग बहार उत्तरांग प्रधान राग है। इसका चलन अधिकतर सप्तक के उत्तर अंग में तथा तार सप्तक में होता है। इसके आरोह में पंचम तथा अवरोह में गान्धार स्वर वक्र होते है। इस राग की प्रकृति चंचल है, अतः इसमें बड़ा खयाल तथा मसीतखानी गते कम सुनने को मिलती है। राग बहार के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में इस राग में निबद्ध तीन ताल की एक रचना सुनवा रहे हैं, जिसके बोल हैं; “मतवारी कोयलिया डार डार...”। इसे हम "यूट्यूब" के सौजन्य से वीडियो माध्यम में प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग बहार : “मतवारी कोयलिया डार डार...” : उस्ताद राशिद खाँ


उपरोक्त रचना में बसन्त ऋतु का चित्रण है। इस सप्ताह 11 अप्रैल को सुविख्यात गायक / अभिनेता कुन्दनलाल सहगल (के.एल. सहगल) की जयन्ती है। उनका जन्म इसी दिन वर्ष 1904 में हुआ था। उन्हीं के गाये गीतों में से राग बहार पर आधारित एक गीत हमने चुना है। इस गीत का चयन करने और उसे उपलब्ध कराने में हमे “फिल्म संगीत में रागों का योगदान” विषयक शोधकर्ता व संगीत के कई पुस्तकों के लेखक कन्हैयालाल पाण्डेय (के.एल. पाण्डेय) का सहयोग प्राप्त हुआ है। 1943 में सहगल के अभिनय और गायकी से सजी एक उल्लेखनीय फिल्म “तानसेन” का प्रदर्शन हुआ था। फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी लिखते है; “रणजीत मूवीटोन’ के बैनर तले निर्मित ‘तानसेन’ ने न केवल खेमचन्द प्रकाश की प्रतिभा पर स्वर्णमुहर लगायी बल्कि संगीत सम्राट तानसेन के व्यक्तित्व और सुरसाधना को साकार करने में पूरा-पूरा न्याय किया। ध्रुवपद शैली और राजस्थानी लोक-संगीत, इन दोनों का प्रयोग करते हुए खेमचन्द ने इस फ़िल्म के गीतों की रचना की जिनमें राग-रागिनियों की सुमधुर छटा सुनने को मिली। शंकरा, मेघ मल्हार, दीपक, सारंग, दरबारी, तिलक कामोद और मियाँ मल्हार जैसे रागों का प्रयोग कर एक ऐसा सुरीला समा बाँधा जो आज तक बन्धा हुआ है अच्छे संगीत के रसिकों के मन में। तानसेन के किरदार को साकार करने के लिए कुन्दनलाल सहगल से बेहतर उस समय के नायकों में और कौन हो सकता था! एक तरफ़ सहगल तो उनकी नायिका बनीं एक और श्रेष्ठ गायिका-अभिनेत्री ख़ुर्शीद। हालाँकि फ़िल्म में कुल 12 गीत थे, पर केवल एक ही गीत इन दोनों ने युगल स्वरों में गाया। फ़िल्म के गीत लिखे पण्डित इन्द्र और डी. एन. मधोक ने। सहगल के एकल स्वर में गाये राग शंकरा आधारित “रुमझुम रुमझुम चाल तिहारी”, राग दीपक आधारित “दीया जलाओ जगमग जगमग”, राग कल्याण में उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ की बन्दिशों पर आधारित “सप्त सुरन तीन ग्राम, साधो सब गुनी जन”, राग पीलू आधारित “काहे गुमान करे री गोरी”, राग बहार पर आधारित “बाग लगा दूँ सजनी तोरे नयनन में” जैसे गीत सर्वसाधारण के होठों पर लम्बे समय तक फिरते रहे। उधर ख़ुर्शीद भी पीछे नहीं थीं। राग मेघ मल्हार आधारित “बरसो रे बरसो रे काले बदरवा”, राग सारंग आधारित “घटा घनघोर मोर मचावे शोर”, “अब राजा भये मोरे बालम” और “हो दुखिया जियरा रोते नैना” जैसे ख़ुर्शीद के गाए गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाया। ‘हमराज़ गीत कोश’ में यह जानकारी दी गई है कि संगीतकार बुलो. सी. रानी के अनुसार “हो दुखिया जियरा” की संगीत रचना वास्तव में उन्होंने की थी पर रेकॉर्ड पर उनका नाम नहीं आया। ख़ुर्शीद और सहगल का गाया फ़िल्म का एकमात्र युगल गीत “मोरे बालापन के साथी छैला भूल जैहो ना” भी उतना ही लोकप्रिय हुआ था जो तिलक कामोद पर आधारित था। संगीतकार नौशाद, जो खेमचन्द प्रकाश को अपना गुरु मानते थे, उन्होंने एक बार यह कहा था कि उन्होंने अपनी फ़िल्म ‘बैजू बावरा’ (1952) में ‘तानसेन’ जैसा जादू जगाना चाहा, पर वो उत्कृष्टता की उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच सके जहाँ पर उनके गुरु ‘तानसेन’ में पहुँचे थे।” आप सहगल का गाया तीनताल में निबद्ध यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बहार : “बाग लगा दूँ सजनी...” : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – तानसेन




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 463वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में निर्मित किन्तु अप्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 11 अप्रैल, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 465 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 461वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म “अनारकली” से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर।

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, कोरोना वायरस से बचाव के लिए स्वैच्छिक लॉकडाउन पर हैं। बस अब कुछ हे दिन शेष बचे हैं। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि लॉकडाउन कि स्थिति में शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में ही सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी’ की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की सातवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग बहार का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने आज पहले हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ से राग बहार में निबद्ध एक खयाल का रसास्वादन कराया और फिर इसी राग पर आधारित 1943 में प्रदर्शित एक फिल्म “तानसेन” से ऋतु प्रधान एक गीत कुन्दनलाल सहगल के स्वर में प्रस्तुत किया। गीतकार पण्डित इन्द्र हैं और फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
  राग बहार : SWARGOSHTHI – 463 : RAG BAHAR : 5 अप्रैल, 2020 

Sunday, November 19, 2017

ठुमरी हेमन्त : SWARGOSHTHI – 344 : THUMARI HEMANT




स्वरगोष्ठी – 344 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 1 : ठुमरी हेमन्त

विरह व्यथा की अभिव्यक्ति के लिए चाँद-दूत की परिकल्पना – “चन्दा देश पिया के जा...”




अमीरबाई कर्नाटकी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हम फिल्मी ठुमरियों की चर्चा कर रहे हैं, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की फिल्मों में शामिल ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हमने आपके लिए 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” से एक फिल्मी ठुमरी का चयन किया है। इस ठुमरीनुमा गीत को पण्डित इन्द्र ने लिखा है, संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश ने इसे राग हेमन्त के स्वर में बाँधा है और इसे गायिका-अभिनेत्री अमीरबाई कर्नाटकी ने गाया है।


ठुमरी गीतों में “रस निष्पत्ति” एक प्रमुख तत्व होता है। नौ रसों में “श्रृंगार रस” ठुमरी गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। श्रृंगार रस के दो पक्ष; संयोग और वियोग होते हैं। आज के ठुमरी गीत में श्रृंगार रस के वियोग पक्ष को रेखांकित किया गया है। नायिका अपनी विरह-व्यथा को नायक तक पहुँचाने के लिए वही मार्ग अपनाती है, जैसा कालिदास के "मेघदूत" में अपनाया गया है। "मेघदूत" का यक्ष जहाँ अपनी विरह वेदना की अभिव्यक्ति के लिए मेघ को सन्देश-वाहक बनाता है, वहीं आज के ठुमरी गीत की नायिका अपनी विरह व्यथा की अभिव्यक्ति के लिए चाँद को दूत बनने का अनुरोध कर रही है।

ठुमरी एक भाव-प्रधान, चपल-चाल वाला गीत है। मुख्यतः यह श्रृंगार प्रधान गीत है; जिसमें लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का श्रृंगार मौजूद होता है। इसीलिए ठुमरी में लोकगीत जैसी कोमल शब्दावली और अपेक्षाकृत हलके रागों का ही प्रयोग होता है। अधिकतर ठुमरियों के बोल अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रज भाषा में होते हैं। नृत्य में प्रयोग की जाने वाली अधिकतर ठुमरी कृष्णलीला प्रधान होती हैं। शान्त, गम्भीर अथवा वैराग्य भावों की सृष्टि करने वाले रागों के बजाय चंचल रागों; जैसे पीलू, काफी, जोगिया, खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, गारा, पहाड़ी, तिलंग आदि में ठुमरी गीतों को निबद्ध किया जाता है। सम्भवतः हलके या कोमल रागों में निबद्ध होने के कारण ही पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपनी पुस्तक "क्रमिक पुस्तक मालिका" में ठुमरी को "क्षुद्र गायन शैली" कहा है। आज की ठुमरी में राग हेमन्त की झलक है। ठुमरी गायन में त्रिताल, चाँचर, दीपचन्दी, जत, दादरा, कहरवा आदि तालों का प्रयोग होता है।

आपके लिए आज हमने जो ठुमरी गीत चुना है; वह 1944 की फिल्म "भर्तृहरि" से है। यह फिल्म उत्तर भारत में बहुप्रचलित 'लोकगाथा' पर आधारित है। इस लोकगाथा के नायक ईसापूर्व पहली शताब्दी में उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के राजा भर्तृहरि हैं। यह लोकगाथा भी फिल्म निर्माताओं का प्रिय विषय रहा है। इस लोकगाथा पर पहली बार 1922 में मूक फिल्म बनी थी। इसके बाद 1932, 1944 और 1954 में हिन्दी में तथा 1973 में गुजराती में भी इस लोकगाथा पर फ़िल्में बन चुकी हैं। 1944 में बनी फिल्म "भर्तृहरि" की नायिका सुप्रसिद्ध अभिनेत्री मुमताज शान्ति थीं और इस फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे; जिन्होंने उस समय तेजी से उभर रहीं पार्श्वगायिका अमीरबाई कर्नाटकी को इस ठुमरी गीत को गाने के लिए चुना। 1906 में बीजापुर, कर्नाटक में जन्मीं अमीरबाई कर्नाटकी ने 1934 में अपनी बड़ी बहन और प्रसिद्ध अभिनेत्री गौहरबाई के सहयोग से फिल्मों में प्रवेश किया था। इसी वर्ष उन्हें पहली बार फिल्म "विष्णुभक्ति" में अभिनय करने का अवसर मिला। 1934 से 1943 के बीच अमीरबाई ने अभिनय और गायन के क्षेत्र में कड़ा संघर्ष किया। अन्ततः 1943 में उनकी किस्मत तब खुली जब उन्हें 'बोम्बे टाकीज' की फिल्म "किस्मत" में गाने का अवसर मिला। इस फिल्म के गीतों से अमीरबाई को खूब प्रसिद्धि मिली। उन्हें प्रसिद्ध करने में फिल्म के संगीतकार अनिल विश्वास का बहुत बड़ा योगदान था। अमीरबाई कर्नाटकी ने फिल्मों में अभिनय और पार्श्वगायन के अलावा संगीत निर्देशन भी किया था। 1948 में बहाव पिक्चर्स की सफल फिल्म "शाहनाज़" में अमीरबाई ने संगीत निर्देशन किया था। अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में जो ठुमरी गीत हम आपके लिए प्रस्तुत करने जा रहे हैं; वह ऋतु प्रधान राग "हेमन्त" और कहरवा ताल में निबद्ध है। राग हेमन्त पूर्वी थाट का राग है। इस राग के आरोह में पाँच और अवरोह में सात प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग होता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम है। यह ऋतु प्रधान राग होता है, अतः हेमन्त ऋतु में किसी भी समय और अन्य समय में सूर्यास्त के समय (सन्धिप्रकाश के समय) गाया-बजाया जा सकता है। इस राग में श्रृंगार का विरह पक्ष और तड़प का भाव खूब उभरता है। गायिका अमीरबाई कर्नाटकी ने नायिका की विरह-व्यथा को अपने स्वरों के माध्यम से किस खूबी से अभिव्यक्त किया है; यह आप यह ठुमरी गीत सुन कर सहज ही अनुभव कर सकते हैं। यह परम्परागत ठुमरी नहीं है; इसके गीतकार हैं पं. इन्द्र; जिनकी 'चाँद-दूत' परिकल्पना को अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों ने सार्थक किया है।


राग हेमन्त : “चन्दा देश पिया के जा...” : अमीरबाई कर्नाटकी : फिल्म – भर्तृहरि





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 344वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1947 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म से एक ठुमरीनुमा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष के अन्तिम अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 25 नवम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 346वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 342वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – विदुषी गिरिजा देवी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की पहली कड़ी में आपने 1944 में प्रदर्शित फिल्म “भर्तृहरि” के ठुमरीनुमा गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा करेंगे जिसमें ठुमरी शैली के दर्शन होंगे। आज आपने जो गीत सुना, उसमें राग हेमन्त की छाया है। इस नई श्रृंखला में भी हम आपसे फिल्मी ठुमरियों पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर भी चर्चा करेंगे तथा सम्बन्धित रागों तथा इस संगीत शैली पर आधारित रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी वर्तमान और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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