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Wednesday, June 17, 2009

आओ हुजूर तुमको सितारों में ले चलूँ....चलिए घूम आये हम और आप भी "आशा" के साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 114

१९६८ में कमल मेहरा की बनायी फ़िल्म आयी थी 'क़िस्मत'। मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म 'क़िस्मत' की क़िस्मत बुलंद थी। फ़िल्म तो कामयाब रही ही, फ़िल्म के गीतों ने भी खासी धूम मचाई । अपनी दूसरी फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी ओ. पी. नय्यर ने यह सिद्ध किया कि ६० के दशक के अंत में भी वो नयी पीढ़ी के किसी भी लोकप्रिय संगीतकार को सीधी टक्कर दे सकते हैं। उन दिनों नय्यर साहब और रफ़ी साहब के रिश्ते में दरार आयी थी जिसके चलते इस फ़िल्म के गाने महेन्द्र कपूर से गवाये गये। घटना क्या घटी थी यह हम आपको बाद में किसी दिन बतायेंगे जब रफ़ी साहब और नय्यर साहब के किसी गाने की बारी आयेगी। तो साहब, महेन्द्र कपूर ने रफ़ी साहब की कमी को थोड़ा बहुत पूरा भी किया, हालाँकि नय्यर साहब महेन्द्र कपूर को बेसुरा कहकर बुलाते थे। इस फ़िल्म का वह हास्य गीत तो आपको याद है न "कजरा मोहब्बतवाला", जिसमें शमशाद बेग़म ने विश्वजीत का प्लेबैक किया था! फ़िल्म की नायिका बबिता के लिये गीत गाये आशा भोंसले ने। इस फ़िल्म में नय्यर साहब की सबसे ख़ास गायिका आशाजी ने कई अच्छे गीत गाये जिनमें से सबसे लोकप्रिय गीत आज हम इस महफ़िल के लिए चुन लाये हैं। तो चलिये हुज़ूर, देर किस बात की, आपको सितारों की सैर करवा लाते हैं आज!

"आयो हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ, दिल झूम जाये ऐसी बहारों में ले चलूँ", यह एक पार्टी गीत है, जिसे नायिका शराब के नशे मे गाती हैं। और आपको पता ही है कि इस तरह के हिचकियों वाले नशीले गीतों को आशाजी किस तरह का अंजाम देती हैं। तो साहब, यह गीत भी उनकी गायिकी और अदायिगी से अमरत्व को प्राप्त हो चुका है। इस गीत के बारे में लिखते हुए मुझे ख़याल आया कि आम तौर पर शराब के नशे में चूर होकर गीत नायक ही गाता है, लेकिन कुछ ऐसी फ़िल्में भी हैं जिनमें नायिका शराब पी कर महफ़िल में गाती हैं। दो गीत जो मुझे अभी के अभी याद आये हैं वो हैं लताजी के गाये हुए फ़िल्म 'ज़िद्दी' का "ये मेरी ज़िंदगी एक पागल हवा" और फ़िल्म 'आस पास' का "हम को भी ग़म ने मारा, तुमको भी ग़म ने मारा"। आप भी कुछ इस तरह के गीत सुझाइये न! ख़ैर, वापस आते हैं 'किस्मत' के इस गीत पर। इस गीत में बबिता का मेक-अप कुछ इस तरह का था कि वो कुछ हद तक करिश्मा कपूर की ९० के दशक के दिनों की तरह लग रहीं थीं। तो चलिये सुनते हैं यह गीत। अरे हाँ, एक ख़ास बात तो हमने बताई ही नहीं! इस फ़िल्म के सभी गीत एस. एच. बिहारी साहब ने लिखे थे सिवाय इस गीत के जिसे एक बहुत ही कमचर्चित गीतकार नूर देवासी ने लिखा था। दशकों बाद १९९४ में ओ.पी. नय्यर के संगीत से सजी एक फ़िल्म आयी थी 'ज़िद' जिसमें नूर देवासी साहब ने एक बार फिर उनके लिए गीत लिखे, जिसे मोहम्मद अज़ीज़ ने गाया था "दर्द-ए-दिल की क्या है दवा"। तो दोस्तों, सुनिये आशाजी की आवाज़ में "आयो हुज़ूर" और बिन पिये ही नशे में डूब जाइये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. एक खूबसूरत युगल गीत.
२. लता मंगेशकर और हेमंत कुमार की आवाजें.
३. हसरत के लिखे इस गीत की शुरुआत इस शब्द से होती है -"आ..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न मंजूषा जी आप ४ अंकों के साथ पराग जी के बराबर आ गयी हैं, शरद जी अभी भी कोसों दूर है. शरद जी आपका सुझाव अपनी जगह बिल्कुल सही है, पर कुछ मजबूरियां हमारी भी है कोशिशें जारी है कोई समाधान निकालने की. बस थोडा सा सब्र रखिये :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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