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Friday, May 12, 2017

गीत अतीत 12 || हर गीत की एक कहानी होती है || पूरी कायनात || पूर्णा || राज पंडित

Geet Ateet 12

Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Poori Qayanat
Poorna
(Salim Sulaiman, Amitabh Bhattacharya, Vishal Dadlani)
Raj Pandit- Singer

कुछ गीत अपने आप में इतने गहरे और इतने मुक्कमल होते हैं कि उनके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, बस सुनकर महसूस किया जा सकता है, आज बारी एक ऐसे ही गीत की. जीवन को नयी ऊर्जा और प्रेरणा से भरने वाला ये गीत है फिल्म "पूर्णा" से - 'है पूरी कायनात तुझमें कहीं, सवालों का जवाब खुद है तू ही', बोल लिखे हैं अमिताभ भट्टचार्य ने, संगीत है सलीम सुलेमान का और गाया है राज पंडित और विशाल ददलानी ने, आज रेडिओ प्लेबैक पर इसी गीत की कहानी गायक राज पंडित की जुबानी  

डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

Friday, April 18, 2014

दुल्हन को मैचिंग दूल्हा लाये हैं शंकर एहसान लॉय 'हुलारे' में

ताज़ा सुर ताल  -2014-17

करन जौहर और साजिद नाडियाडवाला लाये हैं चेतन भगत की कहानी पर आधारित 2 States. अलिया भट्ट और अर्जुन कपूर अभिनीत ये फिल्म आज यानी १८ अप्रैल को प्रदर्शन आरंभ कर रही है. फिल्म कैसी है ये आप लोग देख कर हमें बताएगें. फिलहाल हम इस फिल्म का एक और गीत आज सुनने जा रहे है, जो है पूरी तरह मस्ती से भरा और कदम थिरकाने वाला. 

फिल्म की संगीत जोड़ी है अमिताभ भट्टाचार्य और शंकर एहसान लोय की तिकड़ी का. शादी के माहौल का ये गीत एक बार फिर 'सेल' तिकड़ी की मशहूर छाप लिए हुए है. ढोल का सुन्दर प्रयोग है. पार्श्व गायन है खुद शंकर के साथ सिद्धार्थ महादेवन और रसिका शेखर का. तो लीजिये झूमने को कमर कस लें इस गीत के साथ. 

  

Friday, April 11, 2014

खूबसूरत शब्दों से बुना एक गीत

ताज़ा सुर ताल -२०१४-१५

तुझ बिन सूरज में आग नहीं रे, तुझ बिन कोयल में राग नहीं रे, चंदनिया तो बरसे , फिर क्यों मेरे हाथ अँधेरे लग ले ने ....अमिताभ भट्टाचार्य के लिखे इस खूबसूरत मगर दर्द भरे गीत में एक अलग सी मिठास है. शंकर एहसान लॉय के जाने पहचाने अंदाज़ का है ये गीत, जिसे उतनी ही दिलकश आवाज़ में गाया निभाया है मोहन ने. मोहन, शंकर एहसान लॉय के बेहद चहेते गायक हैं, और हो भी क्यों न....मोहन की आवाज़ और अदायगी में गजब की रवानगी है. वैसे ये गीत एक युगल है जहाँ मोहन को साथ मिला है यशिता शर्मा ने. इस गीत में सबसे बड़ा कमाल रहा है गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य का, जो शायद इस संगीतकार तिकड़ी के साथ पहली बार जुड़े हैं इस फिल्म में, जिसका नाम है २ स्टेस्ट्स . 

२ स्टेट्स  चेतन भगत के इसी नाम के मशहूर उपन्यास पर आधारित है, जहाँ दक्षिण की नायिका को पंजाब के नायक से प्यार हो जाता है. ये बिलकुल उसके उलट है जैसा कि दर्शक सुपर हिट एक दूजे के लिए  में देख चुके हैं. अगर आपने चेतान का उपन्यास पढ़ा है तो आप जानते होंगें कि कहानी में बहुत से दिलचस्प मौके हैं जो बड़े परदे पर भी आपको भायेगें. थ्री इडियट्स , और काई पो छे  के बाद चेतन की लिखी कहानी पर आधारित ये तीसरी फिल्म है. वैसे वन नाईट अट काल सेण्टर  पर आधारित सुपर फ्लॉप हेल्लो  को भी जोड़ दिया जाए तो ये संख्या ४ हो जाएगी. फिल्म के लिए पहली पसंद थे शाहरुख़ खान और आसीन पर बात नहीं बनी तो निर्माता ने रणबीर कपूर और सैफ अली खान तक बात पहुंचाई. अंततः अर्जुन कपूर पर आकर बात जम गयी, और अलिया भट्ट को चुना गया दक्षिण की नायिका के रोल के लिए. फिल्म में अमृता सिंह और रेवती की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं. तो चलिए, फिर आप भी आनंद लें इस दमदार गीत का.   

                 

Friday, February 21, 2014

आईये घूम आयें बचपन की गलियों में इन ताज़ा गीतों के संग

ताज़ा सुर ताल - 2014 -07 - बचपन विशेष 

जेब (बाएं) और हनिया 
ताज़ा सुर ताल की एक और कड़ी में आपका स्वागत है, आज जो दो नए गीत हम चुनकर लाये हैं वो यक़ीनन आपको आपके बचपन में लौटा ले जायेगें. हाईवे  के संगीत की चर्चा हमने पिछले अंक में भी की थी, आज भी पहला गीत इसी फिल्म से. दोस्तों बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक होती है माँ की मीठी मीठी लोरियाँ जिसे सुनते हुए कब बरबस ही नींद आँखों में समा जाती थी पता भी नहीं चलता था. इन दिनों फिल्मों में लोरियाँ लौट सी आई है, तभी तो राऊडी राठोड  जैसी जबरदस्त व्यवसायिक फिल्मों में भी लोरियाँ सुनने को मिल जाती हैं. पर यकीन मानिये हाईवे की ये लोरी अब तक की सुनी हुई सब लोरियों से अल्हदा है, इस गीत में गीतकार इरशाद की मेहनत खास तौर पे कबीले तारीफ है. सुहा यानी लाल, और साहा यानी खरगोश, माँ अपने लाडले को लाल खरगोश कह कर संबोधित कर रही है, शब्दों का सुन्दर मेल इरशाद ने किया है उसका आनंद लेने के लिए आपको गीत बेहद ध्यान से सुनना पड़ेगा. रहमान की धुन ऐसी कि सुन कर उनके कट्टर आलोचक भी भी उनकी तारीफ किये बिना नहीं रह पायेगें. आखिर यूहीं तो नहीं उन्हें देश का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार कहा जाता है. एक और आश्चर्य है अलिया भट्ट की मधुर आवाज़, ये नटखट सी दिखने वाली लड़की इतना सुरीला भी गा सकती है यकीन नहीं होता, वैसे गीत में प्रमुख आवाज़ है पाकिस्तानी गायिका जेब की. ज़बुनिषा बंगेश, हनिया असलम के साथ मिलकर एक संगीत बैंड चलाती है, और उनकी आवाज़ की खनक वाकई बेमिसाल है. मैंने तो जब से ये गीत सुना है मेरे मोबाईल पर यही गीत इन दिनों लूप में चलता रहता है, मुझे यकीन है कि आप को भी ये गीत बचपन की बाहों में ले जायेगा, जहाँ माँ की लोरी में दुनिया समाती थी और बेफिक्र नींदों पलकों पे तारी हो जाया करती थी. लीजिए सुनिए - सुहा साहा...  


प्रीतम 
चलिए आगे बढते हैं बचपन के सपनों की तरफ, जो कुछ चुलबुले से होते हैं तो कुछ बवाले से. शादी के साईड एफ्फेक्ट्स  में दो बहुत ही प्रतिभाशाली और लीक से अलग चलने वाले फरहान अख्तर और विध्या बालन एक साथ आ रहे हैं. फिल्म में संगीत है हिट मशीन प्रीतम दा का. गीत लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने. वैसे इस गीत का एक संस्करण मोहित चौहान की आवाज़ में भी है पर हम आपके लिए लेकर आये हैं नन्हीं गायिका डीवा का गाया ये बच्चों वाला संस्करण, जो बहुत ही प्यारा और मधुर है. गीतकार स्वानंद किरकिरे ने हाल में दिए एक साक्षात्कार में बताया है कि इस गीत को लिखते हुए वो खुद भी रो पड़े थे. वैसे स्वानंद और सपनों का रिश्ता यूँ भी पुराना है. बावरा मन फिर से  चला सपने देखने  ... तो लीजिए आनंद लीजिए इस ताज़ा गीत का भी.  

Friday, February 14, 2014

बॉलीवुड में उतरी नूरां बहनें तो शेखर रव्जिवानी भी पहुंचें माईक के पीछे

ताज़ा सुर ताल # 2014-06


खुद गायक सोनू निगम मानते हैं कि संगीतकार विशाल ओर शेखर न सिर्फ एक बहतरीन संगीतकार जोड़ी है बल्कि दोनों ही बहुत बढ़िया गायक भी है. विशाल तो अन्य बड़े संगीतकारों जैसे शंकर एहसान लॉय और विशाल भारद्वाज के लिए भी गायन कर चुके हैं. आज हम सुनेगें, इस जोड़ी के दूसरे संगीतकार की रूमानी गायिकी. दोस्तों क्या आप जानते हैं कि विशाल दादलानी और शेखर रव्जिवानी को प्यार में कभी कभी  के लिए अलग अलग तौर पर संगीतकार चुना गया था, चूँकि दोनों एक दूसरे से परिचित थे तो इन्होने अपनी अपनी धुनों को एक दूसरे के साथ बांटा और इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि वो मिलकर कुछ बड़ा धमाल कर सकते हैं. यहीं से शुरुआत हुई विशाल शेखर की ये जोड़ी. ओम शान्ति ओम  के बाद वो शाहरुख के पसंदीदा संगीतकारों में आ गए, और पिछले ही साल चेन्नई एक्सप्रेस  की कामियाबी ने इस समीकरण को और मजबूत कर दिया. शाहरुख के साथ साथ निर्देशक करण जौहर भी उनके खास मुरीद रहे हैं, करण द्वारा निर्मित बहुत सी फिल्मों में विशाल शेखर सुरों का जादू चला चुके हैं. इसी कड़ी की ताज़ा पेशकश है हँसी तो फँसी  जहाँ विशाल शेखर के साथ जुड़े हैं गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य. शेखर ने इस रोमांटिक गीत के लिए अमिताभ से एक कैची शब्द की फरमाईश की. अमिताभ ने उन्हें शब्द दिया बेतहाशा, मगर तभी उन्हें एक और शब्द भी याद आया जहेनसीब , इस शब्द के आस पास जब शेखर ने धुन संवारी तो उन्होंने बेतहाशा को भी मुखड़े में रखा, क्योंकि अमिताभ का सुझाया ये पहला शब्द भी उन्हें बेहद पसंद आया था. तो लीजिए सुनिए जेहनसीब जिसे गाया है खुद शेखर ने, साथ दिया है चिन्मई श्रीपदा ने.
     

आज के एपिसोड का दूसरा गीत वो है जिसका बहुत दिनों से इन्तेज़ार था, तब से, जब से इरशाद कामिल ने फेसबुक पर इस गीत की रिकॉर्डिंग की खबर दी और नूरां बहनों की तारीफ की थी. नूरां बहनें यानी ज्योति और सुल्ताना नाम की दो कमसिन उम्र गायिकाएं, जिनकी आवाज़ और अदायगी बड़े बड़े सूफी गायकों को भी हैरत में डाल चुकी है. ऐसा लगता है जैसे ये आवाजें कई जन्मों से खलाओं में गूँज रही थी, और सदियों का रियाज़ इन्हें कुदरती तौर पर नसीब हो गया हो. एम् टी वी पर जुगनी  गाकर मशहूर हुई नूरां बहनें सीधे ही रहमान के स्टूडियो में दाखिल हुई और पटखा गुडिये  जैसा अनूठा गीत श्रोताओं के लिए तैयार हो गया. ये है फिल्म हाईवे  के लिए रहमान और इरशाद कामिल का तोहफा. वैसे आपको बताते चलें कि पहले इम्तियाज़ अली की इस नई फिल्म के लिए संगीत के नाम पर सिर्फ पार्श्व संगीत तक सीमित रहने का ही इरादा था, पर सौभाग्य से फिल्म की टीम ने इस फैसले को बदल दिया और अब इस एल्बम में है ९ एकदम ताज़े गीत, जिनका जिक्र हम आगे भी करेगें, फिलहाल सुनिए सूफी संगीत का ये जादू. 


Friday, June 28, 2013

सुरीला जादू चला कर दिल लूट गया "लुटेरा"

पने पूरे शबाब पर चल रहे संगीतकार अमित त्रिवेदी एक बार फिर हाज़िर हैं, एक के बाद एक अपने स्वाभाविक और विशिष्ट शैली के संगीत की बहार लेकर. पिछले सप्ताह हमने जिक्र किया घनचक्कर  का, आज भी अमित हैं अपनी नई एल्बम लूटेरा  के साथ, इस बार उनके जोडीदार हैं उनके सबसे पुराने साथ अमिताभ भट्टाचार्य. अमिताभ बेशक इन दिनों सभी बड़े संगीतकारों के साथ सफल जुगलबंदी कर रहे हैं पर जब भी उनका साथ अमित के साथ जुड़ता है तो उनमें भी एक नया जोश, एक नई रवानगी आ जाती है. 

लूटेरा  की कहानी ५० के दशक की है, और यहाँ संगीत में भी वही पुराने दिनों की महक आपको मिलेगी. पहले गीत संवार लूँ  को ही लें. गीत के शब्द, धुन और गायिकी सभी सुनहरे पुराने दिनों की तरह श्रोताओं के बहा ले जाते हैं. गीत के संयोजन को भी पुराने दिनों की तरह लाईव ओर्केस्ट्रा के साथ हुआ है. मोनाली की आवाज़ का सुरीलापन भी गीत को और निखार देता है. आपको याद होगा मोनाली इंडियन आईडल में एक जबरदस्त प्रतिभागी बनकर उभरी थी, वो जीत तो नहीं पायी थी मगर प्रीतम के लिए ख्वाब देखे (रेस) गाकर उन्होंने पार्श्वगायन की दुनिया में कदम रखा. अमित ने इससे पहले उन्हें अगा बाई (आइय्या) में मौका दिया था, पर वो एक युगल गीत था. वास्तव में मोनाली का ये पहला गीत है जहाँ उनकी प्रतिभा उभरकर सामने आई है. संवार लूँ  एक बेहद खूबसूरत गीत है जिसे हर उम्र के श्रोताओं का भरपूर प्यार मिलेगा ऐसी हमें पूरी उम्मीद है. 

एक  अच्छे गीत के बाद एक और अच्छा गीत....और यकीन मानिये एल्बम का ये अगला गीत एक मास्टरपीस है. अनकही  में आवाज़ है स्वयं गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य की और क्या खूब गाया है उन्होंने. शब्द जैसे एक सुन्दर चित्र हो और अमित की ये कम्पोजीशन उनकी सबसे बहतरीन रचनाओं में से एक है. आने वाले एक लंबे अरसे तक श्रोता इस गीत को भूल नहीं पायेंगें. ख्वाबों का झरोखा , सच है या धोखा....

और ऐसे ही सच और धोखे के बीच झूलता है अगला गीत भी. शिकायतें  में आवाजें हैं मोहन कानन और अमिताभ की. एक और सोफ्ट रोक्क् गीत जहाँ शब्द गहरे और दिलचस्प हैं. नाज़ुक से शब्द और मोहन की अलहदा गायिकी इस गीत को भी एक यादगार गीत में बदल देते हैं.....मगर रुकिए, क्योंकि  मोंटा रे  सुनने के बाद आप स्वाभाविक ही बाकी सब भूल जायेंगें. आवाज़ है एक और गीतकार स्वानंद किरकिरे की. गीत बांग्ला और हिंदी में है, दिशाहारा  कोइम्बोका मोंटा रे  के मायने होते हैं कि 'मेरा दिशाहीन दिल कितना पागल है'. बेहद बेहद सुन्दर गीत. ये शायद पहला गीत होगा जहाँ दो गीतकारों ने पार्श्वगायन किया हो. बधाई पूरी टीम को.

खुद  अमित त्रिवेदी की दमदार आवाज़ में दर्द की पराकाष्ठा है जिन्दा  में....एक बार फिर अमिताभ ने सरल मगर कारगर शब्द जड़े हैं. इन सभी गीतों की खासियत ये है कि इनमें पार्श्व में कम से कम वाध्यों का इस्तेमाल हुआ है, बस सब कुछ नापा तुला, उतना ही जितना जरूरी हो.....अंतिम गीत मन मर्जियाँ  में शिल्पा राव के साथ  अमिताभ किसी भी अन्य प्रोफेशनल गायक की तरह ही सुनाई देते हैं. एल्बम का एकमात्र युगल गीत रोमांटिक कम और थीमेटिक अधिक है.

वास्तव में ये हमारी राय में इस साल की पहली एल्बम है जिसमें सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं. अमित और अमिताभ का एक और मास्टरपीस. हमारी सलाह मानिये तो आज ही इन गीतों को अपनी संगीत लाईब्रेरी का हिस्सा बनायें और बार बार सुनें. 

एल्बम के बहतरीन गीत - 
अनकही , संवार लूँ, जिंदा, मोंटा रे, शिकायतें 

हमारी  रेटिंग  - ४.९ / ५ 

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी 

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Monday, June 24, 2013

रिचा शर्मा के 'लेजी लेड' ताने से बिदके 'घनचक्कर'

मिर  और नो वन किल्ल्ड जस्सिका  के बाद एक बार फिर निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने अपनी नई फिल्म के संगीत का जिम्मा भी जबरदस्त प्रतिभा के धनी अमित त्रिवेदी को सौंपा है. इमरान हाश्मी और विद्या बालन के अभिनय से सजी ये फिल्म है -घनचक्कर . फिल्म तो दिलचस्प लग रही है, आईये आज तफ्तीश करें कि इस फिल्म के संगीत एल्बम में श्रोताओं के लिए क्या कुछ नया है. 

पहला गीत लेजी लेड अपने आरंभिक नोट से ही श्रोताओं को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है. संगीत संयोजन उत्कृष्ट है, खासकर बीच बीच में जो पंजाबी शब्दों के लाजवाब तडके दिए गए हैं वो तो कमाल ही हैं. बीट्स भी परफेक्ट है. अमिताभ के बोलों में नयापन भी है और पर्याप्त चुलबुलापन भी. पर तुरुप का इक्का है रिचा शर्मा की आवाज़. उनकी आवाज़ और गायकी ने गीत को एक अलग ही मुकाम दे दिया है. एक तो उनका ये नटखट अंदाज़ अब तक लगभग अनसुना ही था, उस पर एक लंबे अंतराल से उन्हें न सुनकर अचानक इस रूप में उनकी इस अदा से रूबरू होना श्रोताओं को खूब भाएगा. निश्चित ही ये गीत न सिर्फ चार्ट्स पर तेज़ी से चढेगा वरन एक लंबे समय तक हम सब को याद रहने वाला है. बधाई पूरी टीम को. 

आगे बढ़ने से पहले आईये रिचा के बारे में कुछ बातें आपको बताते चलें. फरीदाबाद, हरियाणा में जन्मी रिचा ने गन्धर्व महाविद्यालय से गायन सीखा. उनकी पहचान कीर्तनों में गाकर बननी शुरू हुई, बॉलीवुड में उन्हें पहला मौका दिया रहमान ने फिल्म ताल  में. नि मैं समझ गयी  गीत बेहद लोकप्रिय हुआ. उनकी प्रतिभा के अलग अलग चेहरे हमें दिखे माहि वे (कांटे), बागबाँ रब है (बागबाँ), और निकल चली रे (सोच)  जैसे गीतों में. पर हमारी राय में उनकी ताज़ा गीत लेजी लेड  उनका अबतक का सबसे बहतरीन गीत बनकर उभरा है. 

वापस लौटते हैं घनचक्कर  पर. अगला गीत है अल्लाह मेहरबान  जहाँ गीत के माध्यम से बढ़िया व्यंग उभरा है अमिताभ ने, कव्वाली नुमा सेट अप में अमित ने धुन में विविधता भरी है. दिव्या कुमार ने अच्छा निभाया है गीत को. एक और कबीले तारीफ गीत. 

घनचक्कर बाबू  जैसा कि नाम से जाहिर है कि शीर्षक गीत है, एक बार फिर अमिताभ ने दिलचस्प अंदाज़ में फिल्म के शीर्षक किरदार का खाका खीचा है और उतने ही मजेदार धुन और संयोजन से अपना जिम्मा संभाला है.अमित ने. गीत सिचुएशनल है और परदे पर इसे देखना और भी चुटीला होगा. 

अंतिम गीत झोलू राम   से अमित बहुत दिनों बाद मायिक के पीछे लेकर आये हैं ९० के दशक में तुम तो ठहरे परदेसी  गाकर लोकप्रिय हुए अल्ताफ राजा को. हालाँकि ये प्रयोग उतना सफल नहीं रहा जितना रिचा वाला है, पर एक लंबे समय के अंतराल के बाद अल्ताफ को सुनना निश्चित ही अच्छा लगा, .पर गीत साधारण ही है जिसके कारण अल्ताफ की इस वापसी में अपेक्षित रंग नहीं उभर पाया. 

एल्बम के बहतरीन गीत - 
लेजी लेड, अल्लाह मेहरबान 

हमारी रेटिंग - ३.७   

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

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Monday, May 13, 2013

चुलबुले गीतों का चुटीला अंदाज़ खनक रहा है नए दौर की जवानी दीवानी में

प्लेबैक वाणी -45 - संगीत समीक्षा - ये जवानी है दीवानी


हमारे फिल्मकारों की राय में जवानी हमेशा से ही दीवानी रही है, फिर चाहे ज़माना राज कपूर का हो, ऋषि कपूर का या फिर आज के रणबीर कपूर का, जवानी की दीवानगी में मोहब्बत की नादानियाँ फ़िल्मी परदे पर दर्शकों को लुभाती रहीं हैं. निर्देशक आयन मुखर्जी की नयी पेशकश ये जवानी है दीवानी में संगीत है प्रीतम का और गीतकार हैं अमिताभ भट्टाचार्य. बर्फी की आपार सफलता के बाद प्रीतम और रणबीर का संगम क्या नया गुल खिला रहा है, आईये देखें फिल्म की एल्बम को सुनकर.

पहला गीत बदतमीज़ दिल एक रैप गीत है, रेट्रो अंदाज़ का. इस पे भूत कोई चढा है ठहराना जाने न....गीत की इन पंक्तियों की ही तरह ये गीत भी कहीं रुकता हुआ प्रतीत नहीं होता. एक सांस में इसे गाया है बेनी दयाल ने और उनके साथ है शेफाली अल्वारिस, पर गीत पूरी तरह बेनी का कहा जाना चाहिए. तेज रिदम और चुटकीले शब्द गीत को मजेदार बनाते हैं. पर कहीं न कहीं कुछ कमी से खलती है शायद नयेपन की, जो गीत पूरी तरह दिल को छू नहीं पाता.

अगला गीत बालम पिचकारी की शुरुआत बहुत दिलचस्प अंदाज़ में देसी ठाठ से होती है. ये एक होली गीत है जैसा कि नाम से ही जाहिर है. मस्त नशीला ये गीत विशेषकर अमिताभ के चुलबुले शब्दों की वजह से भी श्रोताओं को खूब पसंद आना चाहिए. ढोलक की थाप कदम थिरकाने वाली हैं. विशाल ददलानी और श्यामली खोलगडे की आवाज़ में ये शरारती गीत आने वाली होली में सबकी जुबाँ पे चढ सकता है.

दो नटखट अंदाज़ के गीतों के बाद एल्बम का तीसरा गीत इलाही एक बेहद अलहदा मिजाज़ का है. गिटार की सुरीली तान पर मोहित की आवाज़ जादू सी उतरती है, बड़ा ही दिलचस्प गीत है ये और सफर में निकले किसी मुसाफिर के लिए तो जैसे एकदम सटीक है. फिल्म के तेज ताल वाले गीतों से परे इस गीत की एक अलग ही पहचान है. प्रीतम और अमिताभ की ये जुगलबंदी जबरदस्त रही है.

कबीरा गीत के दो मुक्तलिफ़ संस्करण हैं. रेखा भारद्वाज की रेतीली आवाज़ के साथ तोचि रैना की बेस भरी आवाज़ अच्छा आकर्षण पैदा करती है. ऑंखें बंद करके सुनिए इस गीत को तो बड़े ही शानदार विजुअल जेहन में उभरते हैं. इस थीम पर कोई गीत बहुत दिनों बाद किसी एल्बम में सुनाई दिया है (याद कीजिये फकीर चल चला चल और एक रास्ता है जिंदगी आदि). दूसरा संस्करण अधिक भारतीय है, कह सकते हैं, जिसमें हर्षदीप के लोक स्वरों को अरिजीत सिंह की आवाज़ का सुन्दर साथ मिलता है. बस यहाँ किरदारों के चेहरे बदल गए हैं. दोनों ही संस्करण अपनी अपनी खास पहचान बनाने कामियाब हैं. अमिताभ के शब्द एक बार फिर प्रभावी रहे हैं. अरिजीत की आवाज़ में आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा है.

अरिजीत और सुनिधि की आवाज़ में दिल्ली वाली गर्लफ्रेंड गीत फिर से तेज रिदम का है, पर ऊपर बताये गीतों को सुनने के बाद ये गीत प्रीतम के चिरपरिचित अंदाज़ का सा लगता है. बस इतना कहेंगें की बुरा नहीं है ये गीत भी और डिस्को शादियों में जम कर बज सकता है.

सुभान अल्लाह एक प्रीतम मार्का रोमांटिक गीत है श्रीराम की आवाज़ में. सुन्दर और सुरीला भी है ये गीत मगर एक बार फिर हमें प्रीतम के इमरान हाश्मी सरीखे प्रेम गीतों की बरबस की याद आ जाती है. लंबे समय तक ये गीत श्रोताओं को याद रहेगा ऐसा होना मुश्किल ही है.

अंतिम गीत घाघरा रेखा भारद्वाज और विशाल ददलानी का गाया नौटंकी सरीखा है. देसी कलेवर के इस गीत में हारमोनियम के स्वरों का गजब इस्तेमाल है. गीत के अंतरे बहुत खूबसूरत बुने गए हैं (कहीं कहीं अनजाना के वो कौन है गीत की याद आती है पर फिर भी कानों को बेहद सुरीला लगता है). एक और हिट चार्टबस्टर की तमाम खूबियां है इस गीत में.

ये जवानी...एल्बम एक चुटकीली पेशकश है जिसमें प्रीतम ने अपने सभी चिर परिचित रंगों के साथ साथ कुछ बेहद नए जलवे भी समेटे हैं. अमिताभ के शब्द एल्बम की जान हैं, गायकों का चुनाव भी उत्तम है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है एल्बम को ४ की रेटिंग ५ में से.    


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Monday, April 29, 2013

सिनेमा के शानदार 100 बरस को अमित, स्वानंद और अमिताभ का संगीतमय सलाम

प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - बॉम्बे टा'कीस


सिनेमा के १०० साल पूरे हुए, सभी सिने प्रेमियों के लिए ये हर्ष का समय है. फिल्म इंडस्ट्री भी इस बड़े मौके को अपने ही अंदाज़ में मना या भुना रही है. १०० सालों के इस अद्भुत सफर को एक अनूठी फिल्म के माध्यम से भी दर्शाया जा रहा है. बोम्बे  टा'कीस  नाम की इस फिल्म को एक नहीं दो नहीं, पूरे चार निर्देशक मिलकर संभाल रहे हैं, जाहिर है चारों निर्देशकों की चार मुक्तलिफ़ कहानियों का संकलन होगी ये फिल्म. ये चार निर्देशक हैं ज़ोया अख्तर, करण जोहर, अनुराग कश्यप और दिबाकर बैनर्जी. अमित त्रिवेदी का है संगीत तथा गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे और अमिताभ भट्टाचार्य. चलिए देखते हैं फिल्म की एल्बम में बॉलीवुड के कितने रंग समाये हैं. 

पहला  गीत बच्चन  हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को समर्पित है...जी हाँ सही पहचाना वही जो रिश्ते में सबके बाप  हैं. शब्दों में अमिताभ भट्टाचार्य ने सरल सीधे मगर असरदार शब्दों में हिंदी फिल्मों पर बच्चन साहब के जबरदस्त प्रभाव को बखूबी बयाँ किया है. अमित की तो बात ही निराली है, गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. एकतारा का जबरदस्त प्रयोग गीत को वाकई इस दशक में पहुंचा देता है जब हिंदी सिनेमा का पर्याय ही अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. बीच बीच में उनके मशहूर संवादों से गीत का मज़ा दुगुना हो जाता है. सुखविंदर की आवाज़ में बहुत दिनों बाद ऐसा दमदार गीत निकला है. खैर हम भी इस गीत के साथ अपनी इडस्ट्री और बच्चन साहब की ऊंची शख्सियत को सलाम करते हैं, और आगे बढते हैं अगले गीत की तरफ.

अक्कड बक्कड बोम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ बरस का हुआ, ये खिलाड़ी न बूढा हुआ.....वाह स्वानंद साहब ने खूब बयाँ किया है सिनेमा के सौ बरसों का किस्सा. हालाँकि अमित की धुन इंग्लिश विन्गलिश  के कैसे जाऊं मैं पराये देश  से कुछ मिलती जुलती लगती है शुरुआत में, पर धीरे धीरे गीत अपनी लय पकड़ लेता है, सबसे बढ़िया बात ये है कि गीत अपनी रवानी में कहीं भी कमजोर नहीं पड़ता, और श्रोताओं को झूमने की वजह देता रहता है. मोहित की आवाज़ भी खूब जमी है गीत में....

मुर्रब्बा  गीत के दो संस्करण हैं, आमतौर पर अमित के इन ट्रेडमार्क गीतों में शिल्प राव की आवाज़ जरूरी सी होती है, पर इस गीत में महिला स्वर है कविता सेठ की जिनका साथ दिया है खुद अमित ने. छोटा सा मगर बेहद प्रभावी गीत है ये भी. एक बार फिर संगीत संयोजन गीत की जान है. गीत ऐसा नहीं है जो जुबाँ पर चढ जाए पर अच्छा सुनने के शौक़ीन इसे अवश्य पसंद करेंगें .गीत का एक संस्करण जावेद बशीर की आवाज़ में भी है. 

शीर्षक गीत बोम्बे टा'कीस  एक बार फिल्मों के प्रति दर्शकों की दीवानगी को समर्पित है.कैलाश खेर और रिचा शर्मा की आवाजों में ये एक रेट्रो गीत है. स्वानंद के शब्द दिलचस्प हैं. पर मुझे इसका दूसरा संस्करण जिसमें ढेरों गायकों की आवाज़ समाहित है. शान और उदित की आवाजों के साथ कुछ अन्य गीतों की झलक में मिला जुला ये संस्करण अधिक फ़िल्मी लगता है. 

वाकई इन सौ बरसों में फिल्मों के कितने चेहरे बदले पर सौ बरसों के बाद आज भी लगता है जैसे बस अभी तो शुरुआत ही है. फिल्मों का ये कारवाँ यूहीं चलता चले और मनोरंजन के इस अद्भुत लोक में दर्शकों को भरपूर आनंद मिलता रहे यही हम सब की कामना है. एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४ की रेटिंग ५ में से. 

एक सवाल श्रोताओं के लिए -
प्रस्तुत एल्बम में एक गीत एक फ़िल्मी नायक को समर्पित है, क्या आपको कोई अन्य गीत याद आता है जो किसी फ़िल्मी व्यक्तित्व पर केंदित है ?


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:

Monday, October 15, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (२०) आइय्या , और आपकी बात-- बोल्ड थीम के अनुरूप ही बोल्ड है "आइय्या" का संगीत


संगीत समीक्षा -  आइय्या

दोस्तों पिछले सप्ताह हमने बात की थी अमित त्रिवेदी के “इंग्लिश विन्गलिश” की और हमने अमित को आज का पंचम कहा था. अमित दरअसल वो कर सकते हैं जो एक श्रोता के लिहाज से शायद हम उनसे उम्मीद भी न करें. उन्होंने हमें कई बार चौंकाया है. लीजिए तैयार हो जाईये एक बार फिर हैरान होने के लिए.

जी हाँ आज हम चर्चा कर रहे उनकी एक और नयी फिल्म “आइय्या” का, जिसमें वो लौटे हैं अपने प्रिय गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य के साथ. मुझे लगता है कि अमिताभ भी अमित के साथ जब मिलते हैं तो अपने श्रेष्ठ दे पाते हैं. आईये जानें की क्या है आइय्या के संगीत में आपके लिए.

हाँ वैधानिक चेतावनी एक जरूरी है. दोस्तों ये संगीत ऐसा नहीं है कि आप पूरे परिवार के साथ बैठ कर सुन सकें. हाँ मगर अकेले में आप इसका भरपूर आनंद ले सकते हैं. वैसे बताना हमारा फ़र्ज़ था बाकी आप बेहतर जानते हैं.

खैर बढते हैं अल्बम के पहले गीत की तरफ. ८० के डिस्को साउंड के साथ शुरू होता है “ड्रीमम वेकपम” गीत, जो जल्दी ही दक्षिण के रिदम में ढल जाता है. पारंपरिक नागास्वरम और मृदंग मिलकर एक पूरा माहौल ही रच डालते हैं. ये गीत आपको हँसता भी है गुदगुदाता भी है और कुछ श्रोता ऐसे भी होंगें जो इसे सुनकर सर पीट लेंगें. पर हमारी राय में तो ये गीत बहुत सुनियोजित तरीके से रचा गया है जिसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन है. शब्दों में जम कर जम्पिन्गम- पम्पिन्गम किया है अमिताभ ने. गायिका सौम्या राव की आवाज़ और अदायगी जबरदस्त है. यकीनन तारीफ के लायक. शरारती शब्द, जबरदस्ती गायकी और उत्कृष्ट संगीत संयोजन इस गीत को तमाम अटकलों के बावजूद एक खास पहचान देते हैं.

अगला गीत सवा डॉलर कुछ हद तक शालीन है, इसे आप अपने बच्चों के साथ बैठकर भी सुन सकते हैं...पर देखा जाए तो ये अल्बम का सबसे “आम” गीत लगता है, सरल लावनी धुन पर थिरकती सुनिधि की आवाज़. “ड्रीमम वेक्पम” के अनूठे अंदाज़ के बाद ये अच्छा और साफ़ सुथरा गीत कुछ कमजोर सा लगता है.

अगले ही गीत से अमित – अमिताभ की ये जोड़ी पूरे जोश खरोश के साथ अपने शरारतों में लौट आते हैं. ये फिल्म का शीर्षक गीत है. फिर एक बार चेता दें बच्चों से दूर रखें इस गीत को....मगर दोस्तों क्या जबरदस्त संयोजन है अमित त्रिवेदी का. एक एक पीस सुनने लायक है. “अगा बाई” गीत में न सिर्फ अमिताभ के शब्द चौंकते हैं, श्यामली खोलगडे और मोनाली ठाकुर की आवाजों में गजब की ऊर्जा और उत्तेजना है जो अश्लील नहीं लगती कहीं भी. निश्चित ही ये गायिकाएं श्रेया और सुनिधि को जबरदस्त टकर देने वाली हैं. अगा बाई एक मस्त मस्त गीत है...एकदम लाजवाब.

अगला गीत “महक भी” में अमित लाये शहनाई के स्वर. गीत शुरू होने से पहले ही अपने सुन्दर वाध्य संरचना से आपको खुद से बाँध लेते हैं. श्रेया की मखमली आवाज़ और पार्श्व में बजती शहनाई...वाह एक बेहद खूबसूरत गीत, मधुर और सुरीला.

 अब देखिये, फिर एक बार सुरीली फुहार के बाद लौटते हैं अमित और अमिताभ अपने शरारत भरी एक और रचना लेकर. यक़ीनन इसे सुनकर आप हँसते हँसते पेट पकड़ लेंगें. इस गीत में कुछ अश्लील सी कोमेडी है, स्नेह कंवलकर और खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने बेहद चुटीले अंदाज़ में निभाया है इस गीत को. अब आप को लिज्जत पापड़ के विज्ञापन को देखकर हँसी आये तो इल्जाम दीजियेगा इस गीत को. और क्या कहें.... 

“वाकडा” अलबम का अंतिम गीत है जो दक्षिण के दुल्हे और महाराष्ट्रीयन दुल्हन के मेल के आंकड़े का वाकडा समझा रहा है. गीत सामान्य है मगर शब्द सुनने को प्रेरित करते हैं अमिताभ के. कुल मिलकर “आइय्या” का संगीत बेहद अलग किस्म का है. या तो आप इसे बेहद पसदं करेंगें या बिल्कुल नहीं.

रेडियो प्लेबैक इंडिया इसे इसके नयेपन के लिए दे रहा है ४.३ की रेटिंग.


एक सवाल - गीत "व्हाट टू डू" की थीम पर कुछ वर्षों पहले एक और गीत आया था, वो भी काफी हिलेरियस था, रितेश देखमुख पर फिल्माया वो गीत कौन सा था याद है आपको ? बताईये हमें अपनी टिप्पणियों में 

और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Friday, May 20, 2011

दबंग सलमान खान "रेड्डी" हैं प्रीतम के साथ एक और संगीत धमाके के लिए

Taaza Sur Taal (TST) - 13/2011 - REDDY

दोस्तों एक बार फिर से मैं हाज़िर हूँ एक और नयी फिल्म के संगीत पर अपनी राय लेकर. आज हम बात करेंगें "दबंग" सलमान खान की आने वाली फिल्म – रेड्डी की. टी सिर्रिस के भूषण कुमार ने इस फिल्म के लिए विश्वास जताया है अपने दोस्त प्रीतम पर. और जाहिर प्रीतम ने उन्हें निराश नहीं किया है एक बार फिर, बल्कि अपने पेट्ट गायकों को लेकर शायद इस साल की सबसे बड़ी हिट अल्बम देने में भी कामियाब हुए हैं. चलिए बात करते हैं इस अल्बम के गीतों की.

कैरक्टर ढीला अल्बम का पहला गीत है, नीरज श्रीधर और अमृता काक की आवाजों में. अभी हाल ही में अनु मालिक ने इस फूट टेप्पिंग गीत के अंतरे की धुन अपने एक पुराने गीत से मिलता जुलता बताया था. खैर वो ९० का दशक था अनु मालिक का और अब जब प्रीतम की तूती बोल रही हो तो अनु की आवाज़ कौन सुने. खैर गीत का फिल्माकन देख कर लगता है कि सलमान इस गीत के माध्यम से राज कपूर, दिलीप कुमार और धमेन्द्र को टारगेट कर रहे हैं. पर यही तीन कलाकार ही क्यों कोई समझे तो कृपया बताएं. अमिताभ भट्टाचार्य के शब्द कुछ बहत प्रभावी नहीं लगे मुझे पर संगीत बीट्स और संयोजन इतना जबरदस्त है कि आपके कदम खुद बा खुद थिरकने लगेंगें.

अगला गीत अल्बम का सबसे मधुर गीत है, के के और तुलसी कुमार की युगल आवाजों के इस गीत में गजब का सुकून है. एक ट्रेंड की तरह अंग्रेजी पंक्तियाँ का इस्तेमाल यहाँ भी है, जिसे शायद नीरज ने निभाया है. टिपिकल बोलीवुड रोमांटिक गीत है ये, जिसे मेलोडी के कद्रदान अवश्य पसंद करेंगें. अगला गीत "धिन का चिका" जबरदस्त है और जब से इसके प्रोमो छोटे परदे पर दिख रहे हैं इस गीत ने करेक्टर ढीला से भी अधिक लोकप्रियता हासिल कर ली है. और क्यों न हो, इतना जबरदस्त फिल्मांकन किसी भी गीत का बहुत दिनों बाद देखने को मिला है. पूरी तरह से भारतीय अंदाज़ के इस गीत में मिका ने जैसे जान डाल दी है. अमृता काक के लिए उनकी बराबरी करना मुश्किल तो था ही पर फिर भी उन्होंने अच्छा साथ दिया है. ९० के दशक की एक और फिल्म "ख़ामोशी द म्युसिकल" के एक गीत "बाजा" से प्रेरित है ये गीत पर इसमें इसकी अपनी ओरिजेनलिटी भी है और इसके मूल संगीतकार देवी श्री प्रसाद निश्चित ही इस गीत पर फक्र महसूस कर सकते हैं. वैसे मेरी बधाई गीत के कोरियोग्राफ़र को भी जिन्होंने इस गीत इतना शानदार फिल्मांकन दिया. यहाँ बोल लिखे हैं आशीष पंडित ने.

अल्बम का चौथा और अंतिम ओरिजिनल गीत एक पंजाबी शादी वाला है जिसमें राहत साहब की आवाज़ सुनियी देती है, साथ है तुलसी कुमार. गीत एक और टिपिकल बोलीवुड सरीखा पंजाबी गीत है जिसमें बेशक कुछ नयापन नहीं है पर एनर्जी खूब है. कुल मिलकर रेड्डी के संगीत में पकड़ है, मसाला है और एक हिट अल्बम होने के सभी गुण मौजूद हैं. ऊपर से सलमान का एक्स फेक्टर जो किसी भी फिल्म के लिए एक बूस्ट है, आपको याद होगा कि दबंग के गीत भी (मुन्नी के आलावा) फिल्म के प्रदर्शन के बाद अधिक लोकप्रिय हुए थे, और यहाँ भी अगर ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

श्रेष्ठ गीत – "हमको प्यार हुआ", "धिनका चिका"
आवाज़ रेटिंग – ७.५/१०

फिल्म के गीत आप यहाँ सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, December 7, 2010

सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे.. "नो वन किल्ड जेसिका" के संगीत की कमान संभाली अमित-अमिताभ ने

सुजॉय जी की अनुपस्थिति में एक बार फिर ताज़ा-सुर-ताल की बागडोर संभालने हम आ पहुँचे हैं। जैसा कि मैंने दो हफ़्ते पहले कहा था कि गानों की समीक्षा कभी मैं करूँगा तो कभी सजीव जी। मुझे "बैंड बाजा बारात" के गाने पसंद आए थे तो मैंने उनकी समीक्षा कर दी, वहीं सजीव जी को "तीस मार खां" ने अपने माया-जाल में फांस लिया तो सजीव जी उधर हो लिए। अब प्रश्न था कि इस बार किस फिल्म के गानों को अपने श्रोताओं को सुनाया जाए और ये सुनने-सुनाने का जिम्मा किसे सौंपा जाए। अच्छी बात थी कि मेरी और सजीव जी.. दोनों की राय एक हीं फिल्म के बारे में बनी और सजीव जी ने "बैटन" मुझे थमा दिया। वैसे भी क्रम के हिसाब से बारी मेरी हीं थी और "मन" के हिसाब से मैं हीं इस पर लिखना चाहता था। अब जहाँ "देव-डी" और "उड़ान" की संगीतकार-गीतकार-जोड़ी मैदान में हो, तो उन्हें निहारने और उनका सान्निध्य पाने की किसकी लालसा न होगी।

आज के दौर में "अमित त्रिवेदी" एक ऐसा नाम, एक ऐसा ब्रांड बन चुके हैं, जिन्हें परिचय की कोई आवश्यकता नहीं। अगर यह कहा जाए कि इनकी सफ़लता का दर (सक्सेस-रेट), सफ़लता का प्रतिशत... शत-प्रतिशत है, तो कोई बड़बोलापन न होगा। "आमिर" से हिन्दी-फिल्म-संगीत में अपना पदार्पण करने वाले इस शख्स ने हर बार उम्मीद से बढकर (और उम्मीद से हटकर) गाने दिए हैं। इनके संगीत से सजी अमूमन सारी हीं फिल्में चली हैं, लेकिन अगर फिल्म फ़्लॉप हो तब भी इनके गानों पर कोई उंगली नहीं उठती, गाने तब भी उतने हीं पसंद किए जाते हैं। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों ने "एडमिशन्स ओपन" नाम की फिल्म देखी है... मैंने नहीं देखी, लेकिन इसके गाने ज़रूर सुने हैं और ये मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इस फिल्म के गाने कई सारी बड़ी (और सफ़ल) फिल्मों के गानों से बढकर हैं। ऐसा कमाल है इस इंसान के सुर-ताल में... इसके वाद्य-यंत्रों में..

जहाँ लोग "अमित त्रिवेदी" के नाम से इस कदर परिचित हैं, वहीं एक शख्स है (अमिताभ भट्टाचार्य), जो हर बार अमित के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता रहा है, अब भी चल रहा है, लेकिन उसे बहुत हीं कम लोग जानते हैं। इतना कम कि अंतर्जाल पर इनके बारे में कहीं भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है (विकिपीडिया भी मौन है)। यह वो इंसान है, जिसने देव-डी का "नयन तरसे" लिखा, "इमोसनल अत्याचार" के रूप में युवा-पीढी को उनका ऐंथम दिया, जिसने उड़ान के सारे गाने लिखे ("आज़ादियाँ", "उड़ान", "नया कुछ नया तो ज़रूर है", "कहानी खत्म है"), जिसने अमित के साथ मिलकर "आमिर" में उम्मीदों की "एक लौ" जलाई, जिसने "वेक अप सिड" में रणबीर का दर्द अपने शब्दों और अपनी आवाज़ के जरिये "इकतारा" से कहवाये... (ऐसे और भी कई उदाहरण हैं)। बुरा लगता है यह जानकर कि इस इंसान को कुछ गिने-चुने लोग हीं पहचानते हैं। कहीं इसकी वज़ह ये तो नहीं कि "यह इंसान" एक गीतकार है.. संगीतकार या गायक होता तो लोग इसे हाथों-हाथ लेते... गाने में एक गीतकार का महत्व जाने कब जानेंगे लोग!!

अमित और अमिताभ की बातें हो गईं.. अब सीधे चला जाए आज की फिल्म और आज के गानों की ओर। मुझे उम्मीद है कि हमारे सभी पाठक और श्रोता "जेसिका लाल हत्याकांड" से वाकिफ़ होंगे, किस तरह उनकी हत्या की गई थी, किस तरह उनकी बहन शबरीना ने मीडिया का सहयोग लेकर न्याय पाने के लिए एंड़ी-चोटी एक कर दी और किस तरह आखिरकार न्यायपालिका ने हत्याकांड के मुख्य आरोपी "मनु शर्मा" को अंतत: दोषी मानते हुए कठिनतम सज़ा का हक़दार घोषित किया। ये सब हुआ तो ज़रूर, लेकिन इसमें दसियों साल लगे.. इस दौरान कई बार शबरीन टूटी तो कई बार मीडिया। "केस" के शुरूआती दिनों में जब सारे गवाह एक के बाद एक मुकर रखे थे, तब खुन्नस और रोष में "टाईम्स ऑफ़ इंडिया" ने यह सुर्खी डाली थी- "नो वन किल्ड जेसिका"। राजकुमार गुप्ता" ने यही नाम चुना है अपनी अगली फिल्म के लिए।

चलिए तो इस फिल्म का पहला गाना सुनते हैं। अदिति सिंह शर्मा, श्रीराम अय्यर और तोची रैना की अवाज़ों में "दिल्ली, दिल्ली"। "परदेशी" के बाद तोची रैना अमित के लिए नियमित हो गए हैं। अदिति सिंह शर्मा भी देव-डी से हीं फिल्मों में नज़र आनी शुरू हुईं। अमित की "दिल्ली-दिल्ली" रहमान की "ये दिल्ली है मेरे यार" से काफी अलग है। "मेरा काट कलेजा दिल्ली.. अब जान भी ले जा दिल्ली" जहाँ दिल्ली में रह रहे एक इंसान का दर्द बयान करती है (भले हीं तेवर थोड़े मज़ाकिया हैं), वहीं "ये दिल्ली है मेरे यार" में दिल्ली (विशेषकर दिल्ली-६) की खूबियों के पुल बाँधे गए थे। संगीत के मामले में मुझे दोनों गाने एक जैसे हीं लगे.. "पेप्पी".. जिसे आप गुनगुनाए बिना नहीं रह सकते। "दिल्ली.. दिल्ली" आप ज्यादा गुनगुनाएँगे क्योंकि इसके शब्द जमीन से अधिक जुड़े हैं.. दिल्ली की हीं भाषा में "दिल्ली-दिल्ली" के शब्द गढे गए हैं (दिल्ली-६ में प्रसून जोशी दिल्ली का अंदाज़ नहीं ला पाए थे)। इस गाने का एक "हार्डकोर वर्सन" भी है, जिसमें संगीत को कुछ और झनकदार (चटकदार) कर दिया गया है। मुझे इसके दोनों रूप पसंद आए। आप भी सुनिए:

दिल्ली


दिल्ली हार्डकोर


अमिताभ भट्टाचार्य जब भी लिखते हैं, उनकी पूरी कोशिश रहती है कि वे मुख्यधारा के गीतकारों-सा न लिखें। वे हर बार अपना अलग मुकाम बनाने की फिराक में रहते हैं और इसी कारण "अन-कन्वेशनल" शब्दों की एक पूरी फौज़ उनके गानों में नज़र आती है। "बैंड बाजा बारात" के सभी गाने उनकी इसी छाप के सबूत हैं। मुमकिन है कि दूसरे संगीतकारों के साथ काम करते वक़्त उन्हें इतनी आज़ादी न मिलती हो, लेकिन जब अमित त्रिवेदी की बात आती है तो लगता है कि उनकी सोच की सीमा हीं समाप्त हो गई है। "जहाँ तक और जिस कदर सोच को उड़ान दे सकते हो, दे दो" - शायद यही कहना होता है अमित का, तभी तो "आली रे.. साली रे", जैसे गाने हमें सुनने को नसीब हो रहे हैं। "भेजे में कचूंबर लेकिन मुँह खोले तो गाली रे", "राहु और केतु की आधी घरवाली रे".. और ऐसे कितने उदाहरण दूँ, जो मुझे अमिताभ का मुरीद बनने पर बाध्य कर रहे हैं। यहाँ अमित की भी दाद देनी होगी, जिस तरह से उन्होंने गाने को "ढिंचक ढिंचक" से शुरू किया है और कई मोड़ लेते हुए "पेपर में छपेगी" पर खत्म किया है.. एक साथ एक हीं गाने में इतना कुछ करना आसान नहीं होता। मुझे इस गाने में "सुर्खियों से बुनती है मकड़ी की जाली रे" ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। चूँकि यह गाना रानी मुखर्जी पर फिल्माया गया है जो एक "न्यूज़ रिपोर्टर" का किरदार निभा रही हैं तो वह रिपोर्टर "सुर्खियों" (सुर्खियों में...) से हीं अपने आस-पास की दुनिया बुनेगी। है ना?

आली रे


चलिए अब तीसरे गाने की ओर चलते हैं। इस गाने को अपनी आवाज़ें दी हैं जानेमाने लोकगायक "मामे खान" और जानेमाने रॉकस्टार "विशाल दादालनी" ने। इन दोनों का साथ दिया है रॉबर्ट ओमुलो (बॉब) ने। लोकगायक और रॉकस्टार एक साथ..कुछ अजीब लगता है ना? इसी को तो कहते हैं प्रयोग.. मैं पक्के यकीन के साथ कह सकता हूँ कि अमित इस प्रयोग में सफ़ल हुए हैं। अंग्रेजी बोलों के साथ रॉबर्ट गाने की शुरूआत करते हैं, फिर विशाल "पसली के पार हुआ ऐतबार", "चूसे है खून बड़ा खूंखार बन के" जैसे जोशीले और दर्दीले शब्दों को गाते हुए गाने की कमान संभाल लेते हैं और अंत में "दिल ऐतबार करके रो रहा है.. " कहते-कहते मामे खान गाने को "फ़ोक" का रंग दे देते हैं। गाने में वो सब कुछ है, जो आपको इसे एकाधिक बार सुनने पर मजबूर कर सकता है। तो आईये शुरूआत करते हैं:

ऐतबार


फिल्म का चौथा गाना है अमिताभ भट्टाचार्य, जॉय बरुआ, मीनल जैन (इंडियन आईडल फेम) और रमन महादेवन की आवाज़ों में "दुआ"। ये अलग किस्म की बेहतरीन दुआ है। "खोलो दिल की चोटों को भी" .. "खुदा के घर से, उजालें न क्यों बरसे" जैसे बेहद उम्दा शब्दों के सहारे "अमित-अमिताभ" ने लोगों से ये अपील की है कि रास्ते रौशन हैं, तुम्हें बस आगे बढने की ज़रूरत है, अपने दिल के दर्द को समझो, हरा करो और आगे बढो। और अंत में "मीनल जैन" की आवाज़ में "दुआ करो - आवाज़ दो" की गुहार "सोने पे सुहागा" की तरह काम करती है। आईये हम सब मिलकर यह दुआ करते हैं:

दुआ


देखते-देखते हम अंतिम गाने तक पहुँच गए हैं। "आमिर" के "एक लौ" की तरह हीं शिल्पा राव "ये पल" लेकर आई हैं। "एकल गानों" में शिल्पा राव का कोई जवाब नहीं होता। यह बात ये पहले भी कई बार साबित कर चुकी हैं। इसलिए मेरे पास नया कुछ कहने को नहीं है। अमित और अमिताभ का कमाल यहाँ भी नज़र आता है। "मृगतृष्णा" जैसे शब्दों का इस्तेमाल लोग विरले हीं गानों में करते हैं। "रेंगते केंचुओं से तो नहीं थे".. अमिताभ इस गाने में भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं। अमित का "हूँ हूँ" गाने को एक अलग हीं लेवल पर ले जाता है। इस तरह से, एक पल क्या... हर पल में उसी शांति, उसी चैन का माहौल तैयार करने में ये तीनों कामयाब हुए हैं।

ये पल


तो इस तरह से मुझे "अमित-अमिताभ" की यह पेशकश बेहद अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। नमस्कार!

Tuesday, November 23, 2010

सुजॉय जी को शादी का तोहफ़ा देने आ गए हैं सलीम-सुलेमान और अमिताभ भट्टाचार्य "बैंड बाजा बारात" के साथ

अभी वक़्त है अपने नियमित ताज़ा सुर ताल का.. ताज़ा सुर ताल यानि कि टी एस टी, जिसके मेजबान मुख्य रूप से सुजॉय जी हुआ करते हैं। मुख्य रूप से इसलिए कहा क्योंकि हर मंगलवार के दिन समीक्षा के दौरान उनसे बातचीत होती है, अब ये बातचीत मैं करूँ या फिर सजीव जी करें... पिछली मर्तबा ये बागडोर सजीव जी ने संभाली थी और उसके पहले कई हफ़्तों तक बातचीत का वो सिरा मेरे हाथ में था.. लेकिन दूसरा सिरा हमेशा हीं सुजॉय जी थामे रहते हैं। आज के दिन और आज के बाद दो-तीन और हफ़्तों तक स्थिति अलग-सी रहने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुजॉय जी घर गए हुए हैं.. अपनी ज़िंदगी के उस सिरे को संभालने जिसका दूसरा सिरा उनकी अर्धांगिनी के हाथों में है। जी हाँ, कल हीं सुजॉय जी की शादी थी। शादी बड़ी धूमधाम से हुई और होती भी क्यों नहीं, जब हम सब दोस्तों और शुभचिंतकों की दुआएँ उनके साथ थीं। हम सब तक की तरफ़ से सुजॉय जी को शादी की शुभकामनाएँ, बधाईयाँ एवं बहुत-बहुत प्यार .. (बड़ों की तरफ़ से आशीर्वाद भी).. हम नहीं चाहते थे कि इन मंगल घड़ियों में उन्हें थोड़ा भी तंग किया जाए, इसलिए कुछ हफ़्तों तक ताज़ा सुर ताल मैं अकेले हीं (या फिर कभी-कभार सजीव जी के साथ) हीं संभालने वाला हूँ। आपसे उसी प्रोत्साहन की उम्मीद रहेगी, जो सुजॉय जी को हासिल होती है। धन्यवाद! चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का शुभारंभ करते हैं।

इसे इत्तेफ़ाक़ हीं कहेंगे कि शादी की बातें करते-करते हम जिस फिल्म की समीक्षा करने जा रहे हैं, वह फिल्म भी शादियों को हीं ध्यान में रख कर बनी है। यशराज बैनर्स के तहत आने वाली इस फिल्म का निर्देशन किया है मनीष शर्मा ने, कहानी भी उन्हीं की है, जबकि पटकथा लिखी है हबीब फैजल ने। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह। फिल्म १० दिसम्बर २०१० को रीलिज होने वाली है। इस फिल्म में संगीत है पार्श्व-संगीत के दम पर हिन्दी-फिल्मों में अपनी पहचान बनाने वाले "सलीम-सुलेमान" बंधुओं का और गीत लिखे हैं "अमित त्रिवेदी" के खासम-खास "अमिताभ भट्टाचार्य" ने (देव-डी, उड़ान)।

फिल्म का पहला गाना है "ऐं वैं.. ऐं वैं".. आवाज़ें हैं सलीम मर्चैंट और सुनिधि चौहान की। गाने की धुन ऐसी है कि पहली बार में हीं आपके मन पर छा जाए और संयोजन भी कमाल का है। गीत सुनकर डान्स-फ्लोर पर उतरने को जी करने लगता है। चूंकि गाने के माध्य्म से पंजाबी माहौल तैयार किया गया है, इसलिए पार्श्व में बैंजो और बांसुरी को आराम से महसूस किया जा सकता है। अमिताभ के बोल बाकी नियमित पंजाबी गानों (भांगड़ा) से काफी अलग हैं। "चाय में डुबोया बिस्किट हो गया" या फिर "गुड़ देखा, मक्खी वहीं फिट हो गया".. जैसी पंक्तियाँ विरले हीं सुनने को मिलती है। मुझे यह गाना बेहद भाया। इस गाने का एक "दिल्ली क्लब मिक्स" भी है, जिसमें मास्टर सलीम ने सलीम मर्चैंट का स्थान लिया है। मास्टर सलीम के आने से "माँ दा लाडला" वाली फिलिंग आ जाती है। थोड़ी कोशिश करने पर आप आवाज़ में इस परिवर्तन को महसूस कर सकते हैं। दोनों हीं गाने अच्छे हैं।

गीत - ऐं वैं


गीत - ऐं वैं (दिल्ली क्लब मिक्स)


अब बढते हैं अगले गाने की ओर। यह गाना है "तरकीबें", जिसे गाया है बेन्नी दयाल ने और उनका बेहतरीन तरीके साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। सलीम-सुलेमान और बेन्नी दयाल की जोड़ी "पॉकेट में रॉकेट" के बाद एक बार फिर साथ आई है। कहीं कहीं यह गाना उसी गाने का एक्सटेंशन लगता है। बेन्नी दयाल एक बार फिर सफल हुए हैं, अपनी आवाज़ का जादू चलाने में। लेकिन मेरे हिसाब से इस गाने की सबसे खूबसूरत बात है, इसके बोल। "अनकन्वेशनल राईटिंग" की अगर बात आएगी, तो इस गाने को उसमें जरूर शुमार किया जाएगा। "कंघी हैं तरकीबें" या फिर "हौसलें सेंक ले" जैसे विचार आपको सोचने पर और सोचकर खुश होने पर मजबूर करते हैं।

गीत - तरकीबें


अगला गाना है "श्रेया घोषाल" की आवाज़ में "आधा इश्क़"। आजकल यह कहावत चल पड़ी है कि श्रेया कभी गलत नहीं हो सकती और श्रेया का गाया गाना कभी बुरा नहीं हो सकता। तो फिर "आधा इश्क़" को खूबसूरत होना हीं है। कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि "आधा इश्क़" भी कुछ होता है क्या?.. उन लोगों को शायद यह पता नहीं कि एकतरफ़ा इश्क़ तो आधा हीं हुआ ना.. यह मेरा ख्याल है, लेकिन ख्याल कोई भी हो.. जब ज़िंदगी "दस ग्राम" की हो सकती है तो इश्क़ "आधा" क्यों नहीं हो सकता। क्या कहते हैं आप लोग?

गीत - आधा इश्क़


चलिए तो बात को आगे बढागे हुए एलबम के चौथे गाने की ओर आते हैं। यह गाना है बेन्नी दयाल और हिमानी कपूर की आवाज़ो में "दम-दम"। इस गाने को सुनने के बाद मुझे यही लगा कि सलीम-सुलेमान ने "दम" भरे गाने के लिए बेन्नी को चुनकर गलती कर दी। गाने में जब तक अंतरा नहीं आता, तब तक दम जैसी कोई बात हीं नज़र नहीं आती। अब जबकि इस गाने को एक आईटम सॉंग जैसा होना है तो आवाज़ से भी वो जोश झलकना चाहिए ना। अंतरे के पहले (यानि कि मुखरे में) धुन भी थोड़ी सुस्त है। अंतरे में यह गाना जोर पकड़ता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। "दम-दम" में दम नहीं है मेरे भाई!! "दम-दम" का एक सूफ़ी-मिक्स है जिसे सुखविंदर ने गाया है.. सभी जानते हैं कि "जोश" का दूसरा नाम है "सुखविंदर" और ऊपर से मिक्स यानि कि "पेसी ट्युन" तो सूफ़ी-मिक्स हर मामले में बढिया है "दम-दम" से। मेरी यही चाहत है कि फिल्म में "सूफ़ी-मिक्स" हो, तभी मज़ा आएगा।

गीत - दम दम


गीत - दम दम (सूफ़ी मिक्स)


अगले गाने "मितरा" में गायकी की कमान संभाली है खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने और उनका साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। यह गाना हर मामले में बेहतरीन है। इस गाने में "अमित त्रिवेदी" की झलक मिलती है, शायद इसीलिए अमिताभ भी माईक के पीछे आने को राजी हुए हैं। सलीम की आवाज़ हर तरह के गाने में काम करती है, इसलिए वे यहाँ भी अपना असर छोड़ जाते हैं। मितरा के बाद बारी है एक नियमित भांगड़े की, जो हर पंजाबी शादी के लिए एक रस्म-सा माना जाता है। लेकिन यह भांगड़ा दूसरे पंजाबी भांगड़ों से थोड़ा अलग है। इस भांगड़े का नाम यूँ तो "बारी बरसी" हीं है, लेकिन इसमें "खट के" कोई हीर या रांझा नहीं लाते, बल्कि "पिज़्ज़ा" , "गोंद" और "खजूर" लाते हैं। इस गाने को सुनकर आप अपने पेट और मुँह पर हाथ रखकर "हँसी" रोकने की कोशिश करेंगे तो वहीं अपनी कदमों को काबू में रखकर यह कोशिश करेंगे कि कहीं "नाच न निकल जाए"। चूँकि यह गाना मस्ती के लिए बना है और एक नियमित पैटर्न पर बना है, इसलिए इसे अच्छा या खराब निर्धारित करने का कोई तुक नहीं बनता। चलिए तो अब सुनते हैं "मितरा" और "बारी बरसी"।

गीत - मितरा


गीत - बारी बरसी


कुल मिलाकर मुझे "सलीम-सुलेमान" की यह पेशकश अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। चलते-चलते इस फिल्म का "थीम सॉंग" सुन लेते हैं, जिसे गाया है सलीम मर्चैंट और श्रद्धा पंडित ने। छोटा-सा गाना है, लेकिन चूँकि यह थीम है तो मेरे हिसाब से फिल्म में एक से ज्यादा बार बजेगा जरूर।



आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: तरकीबें और मितरा

लुंज-पुंज गीत: दम-दम

Tuesday, September 7, 2010

अंजाना अंजानी की कहानी सुनाकर फिर से हैरत में डाला है विशाल-शेखर ने.. साथ है गीतकारों की लंबी फ़ौज़

ताज़ा सुर ताल ३४/२०१०

विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' में आज उस फ़िल्म की बारी जिसकी इन दिनों लोग, ख़ास कर युवा वर्ग, बड़ी बेसबरी से इंतज़ार कर रहे हैं। रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा अभिनीत फ़िल्म 'अंजाना अंजानी', जिसमें विशाल शेखर के संगीत से लोग बहुत कुछ उम्मीदें रखे हुए हैं।

सुजॊय - और अक्सर ये देखा गया है कि जब इस तरह के यूथ अपील वाले रोमांटिक फ़िल्मों की बारी आती है, तो विशाल शेखर अपना कमाल दिखा ही जाते हैं। और इस फ़िल्म के निर्देशक सिद्धार्थ आनंद हैं जिनकी पिछली तीन फ़िल्मों - सलाम नमस्ते, ता रा रम पम, बचना ऐ हसीनों - में विशाल शेखर का ही संगीत था, और इन तीनों फ़िल्मों के गानें हिट हुए थे।

विश्व दीपक - ये तीनों फ़िल्में, जिनका ज़िक्र आपने किया, ये यश राज बैनर की फ़िल्में थीं, लेकिन 'अंजाना अंजानी' के द्वारा सिद्धार्थ क़दम रख रहे हैं यश राज के बैनर के बाहर। यह नडियाडवाला की फ़िल्म है, और इस बैनर ने भी 'हाउसफ़ुल', 'हे बेबी', 'कमबख़्त इश्क़' और 'मुझसे शादी करोगी' जैसी कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में दी हैं। इसलिए 'अंजाना अंजानी' से लोगों की बहुत उम्मीदें हैं।

सुजॊय - विशाल शेखर की पिछली फ़िल्म थी 'आइ हेट लव स्टोरीज़'। फ़िल्म तो ख़ास नहीं चली, लेकिन फ़िल्म के गानें पसंद किए गए और उन्हें हिट का दर्जा दिया जा चुका है। देखते हैं 'अंजाना अंजानी' उससे भी आगे निकल पाते हैं या नहीं। 'अंजाना अंजानी' की बातें आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत - "अंजाना अंजानी की कहानी"।

गीत - अंजाना अंजानी की कहानी


विश्व दीपक - निखिल डी'सूज़ा और मोनाली ठाकुर की आवाज़ों में यह गाना था। इस गीत के बारे में कम से कम शब्दों में अगर कुछ कहा जाए तो वो है 'पार्टी मटिरीयल'। गीटार, ड्रम्स, ब्रास, रीदम, और गायन शैली, सब कुछ मिलाकर ७० के दशक के "पंचम" क़िस्म का एक डान्स नंबर है यह, जो आपकी क़दमों को थिरकाने वाला है अगले कुछ दिनों तक। हिंग्लिश में लिखा हुआ यह गीत नीलेश मिश्रा के कलम से निकला हुआ है। निखिल और मोनाली, दोनों ही नए दौर के गायक हैं। मोनाली ने इससे पहले फ़िल्म 'रेस' में "ज़रा ज़रा टच मी" और 'बिल्लू' में "ख़ुदाया ख़ैर" जैसे हिट गीत गा चुकी हैं। आज कल वो 'ज़ी बांगला' के 'स रे गा मा पा लिट्ल चैम्प्स' शो की जज हैं।

सुजॊय - और इस गीत में विशाल शेखर की शैली गीत के हर मोड़ पे साफ़ झलकती है। और अब 'अंजाना अंजानी' के टीम मेम्बर्स के नाम। साजिद नडियाडवाला निर्मित और सिद्धार्थ राज आनंद निर्देशित इस फ़िल्म में रणबीर और प्रियंका के अलावा ज़ायेद ख़ान ने भी भूमिका अदा की है। संगीतकार तो बता ही चुके है, गानें लिखे हैं नीलेश मिश्रा, विशाल दादलानी, शेखर, अमिताभ भट्टाचार्य, अन्विता दत्तगुप्तन, कुमार , इरशाद कामिल और कौसर मुनीर। और गीतकारों की तरह गायकों की भी एक पूरी फ़ौज है इस फ़िल्म के साउण्डट्रैक में - निखिल डी'सूज़ा, मोनाली ठाकुर, लकी अली, शेखर, कारालिसा मोण्टेरो, मोहित चौहान, श्रुति पाठक, विशाल दादलानी और शिल्पा राव।

विश्व दीपक - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गीत सुना जाए लकी अली की आवाज़ में।

गीत - हैरत


सुजॊय - पहले गीत ने जिस तरह से हम सब के दिल-ओ-दिमाग़ के तारों को थिरका दिया था, "हैरत" की शुरुआत तो कुछ धीमी लय में होती है, लेकिन एक दम से अचानक इलेक्ट्रॊनिक गीटार की धुनें एक रॊक क़िस्म का आधार बन कर सामने आती है। लकी अली की आवाज़ बहुत दिनों के बाद सुनने को मिली, और कहना पड़ेगा कि ५१ वर्ष की आयु में भी उनकी आवाज़ में उतना ही दम अब भी मौजूद है। 'सुर' और 'कहो ना प्यार है' में उनके गाए गानें सब से ज़्यादा मशहूर हुए थे, हालाँकि उन्होंने कई और फ़िल्मों में भी गानें गाए हैं।

विश्व दीपक - इस गीत को लिखा था ख़ुद विशाल दादलानी ने, और अच्छा लिखा है। इससे पहले भी वे कई गानें लिख चुके हैं। विशाल के बोल और लकी अली की आवाज़ के कॊम्बिनेशन का यह पहला गाना है, शायद इसी वजह से इस गीत में एक ताज़गी है। इस गीत के प्रोमो आजकल टीवी पर चल रहे हैं और इस गीत के फ़िल्मांकन को देख कर ऐसा लग रहा है कि इस गीत की तरह फ़िल्म भी दमदार होगी।

सुजॊय - तो कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि लकी अली और विशाल-शेखर की "हैरत" ने हमें "हैरत" में डाल दिया है। और इस गीत से जो नशा चढ़ा है, उसे बनाए रखते हुए अब सुनते हैं तीसरा गीत राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में। एक और बेहतरीन गायक, एक और बेहतरीन गीत।

गीत - तू ना जाने आस-पास है ख़ुदा


विश्व दीपक - आजकल राहत साहब एक के बाद एक फ़िल्मी गीत गाते चले जा रहे हैं और कामयाबी की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। उनका गाया हर गीत सुनने में अच्छा लगता है। अभी पिछले ही दिनों फ़िल्म 'दबंग' में उनका गाया "तेरे मस्त मस्त दो नैन" आपको सुनवाया था, और आज ये गीत आप सुन रहे हैं। लेकिन एक बात ज़रूर खटकती है कि राहत साहब से हर संगीतकार एक ही तरह के गीत गवा रहे हैं। ऐसे तो भई राहत साहब बहुत जल्दी ही टाइपकास्ट हो जाएँगे!

सुजॊय - हाँ, और हमारे यहाँ लोग आजकल की फ़ास्ट ज़िंदगी में किसी एक चीज़ को बहुत ज़्यादा दिनों तक पसंद नहीं करते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि राहत फ़तेह अली ख़ान अपनी मौलिकता को बनाए रखते हुए अलग अलग तरह के गीत गाएँ, तभी वो एक लम्बी पारी फ़िल्म संगीत में खेल पाएँगे। इस गीत के बारे में यही कहेंगे कि एक टिपिकल "राहत" या "कैलाश खेर" टाइप का गाना है।

विश्व दीपक - सूफ़ी आध्यात्मिकता लिए हुए इस गीत को लिखा है विशाल दादलानी और शेखर रविजानी ने। इसी गाने का एक 'अनप्लग्ड' वर्ज़न भी है जिसमें श्रुति पाठक की आवाज़ भी मौजूद है। बहरहाल आइए सुनते हैं 'अंजाना अंजानी' का अगला गीत शेखर और कारालिसा मोण्टेरो की आवाज़ों में।

गीत - तुमसे ही तुमसे


सुजॊय- विशाल दादलानी और शेखर, दोनों अच्छे गायक भी हैं। जहाँ एक तरफ़ विशाल की आवाज़ में बहुत दम है, रॊक क़िस्म के गानें उनकी आवाज़ में ख़ूब जँचते हैं, उधर दूसरी तरफ़ शेखर की आवाज़ में है नर्मी। बहुत ही प्यारी आवाज़ है शेखर की और ये जो गीत अभी आपने सुना, उसमें भी उनका वही नरम अंदाज़ सुनने को मिलता है। कारालिसा ने अंग्रेज़ी के बोल गाए हैं और गीत की आख़िर में उनकी गायकी गीत में अच्छा इम्पैक्ट लाने में सफल रही है। कुल मिलाकर यह गीत एक कर्णप्रिय गीत है और मुझे तो बहुत अच्छा लगा।

विश्व दीपक - हाँ, और इस गीत में भी एक ताज़गी है और एक अलग ही मूड बना देता है। बस अपनी आँखें मूंद लीजिए और अपने किसी ख़ास दोस्त को याद करते हुए इस गीत का आनंद लीजिए। इस गीत के अंग्रेज़ी के बोल कारालिसा ने ख़ुद ही लिखे है। हिन्दी के बोल अन्विता दत्त गुप्तन और अमिताभ भट्टाचार्य की कलमों से निकले हैं। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं। श्रुति पाठक और मोहित चौहान की आवाज़ों में यह एक और ख़ूबसूरत गीत है इस फ़िल्म का - "तुझे भुला दिया फिर", आइए सुनते हैं।

गीत - तुझे भुला दिया फिर


विश्व दीपक - एक हौंटिंग प्रील्युड के साथ गीत शुरु हुआ और श्रुति के गाए पंजाबी शब्द सुनने वाले के कान खड़े कर देते हैं। और ऐसे में मोहित की अनोखी आवाज़ (कुछ कुछ लकी अली के अंदाज़ की) आकर गीत को हिंदी में आगे बढ़ाती है। बिना रीदम के मुखड़े के तुरंत बाद ही ढोलक के ठोकों का सुंदर रीदम और कोरस के गाए अंतरे "तेरी यादों में लिखे जो...", इस गीत की चंद ख़ासियत हैं। यह तरह का एक्स्पेरीमेण्ट ही कह सकते हैं कि एक ही गीत में इतने सारे अलग अलग प्रयोग। कुल मिलाकर एक सुंदर गीत।

सुजॊय - जी हाँ, ख़ास कर धीमी लय वाले मुखड़े के बाद इंटरल्युड में क़व्वाली शैली के ठेके और कोरस का गायन एक तरह का फ़्युज़न है क़व्वाली और आधुनिक गीत का। आपको बता दें कि इस गीत को विशाल दादलानी ने लिखा है, लेकिन क़व्वाली वाला हिस्सा लिखा है गीतकार कुमार ने। यह गीत सुन कर एक "फ़ील गुड" का भाव मन में जागृत होता है।

विश्व दीपक - "फ़ील गूड" की बात है, तो अब जो अगला गाना है उसके बोल ही हैं "आइ फ़ील गुड"। एक रॊक अंदाज़ का गाना है विशाल दादलानी और शिल्पा राव की आवाज़ों में, आइए इसे सुनते हैं।

गीत - आइ फ़ील गुड


सुजॊय - विशाल और शिल्पा के रॊक अंदाज़ से हम सभी वाकिफ़ हैं। वैसे शिल्पा से अब तक संगीतकार दबे हुए गीत ही गवाते आ रहे हैं, सिर्फ़ "वो अजनबी" ही एक ऐसा गीत था जिसमें उनकी दमदार आवाज़ सामने आई थी। "आइ फ़ील गुड" में भी उनकी आवाज़ खुल के बाहर आई है। और इसके बाद शायद अनुष्का मनचंदा की तरह उन्हें भी इस तरह के और गानें गाने के अवसर मिलेंगे।

विश्व दीपक - इस गीत को भी विशाल ने ही लिखा है, लेकिन अगर फ़ील गुड की बात करें तो पिछला गाना इससे कई गुना ज़्यादा बहतर था। ख़ैर, अब हम आ पहुँचे हैं आज के अंतिम गीत पर। और इसे भी विशाल और शिल्पा ने ही गाया है। "अंजाना अंजानी" फ़िल्म का एक और शीर्षक गीत, इस बार सॊफ़्ट रॊक शैली में, जिसे लिखा है कौसर मुनीर ने। वैसे इस गीत का मुखड़ा इरशाद कामिल ने लिखा है। सिद्धार्थ आनंद की हर फ़िल्म में इस क़िस्म का एक ना एक रोमांटिक युगल गीत ज़रूर होता है, जैसे 'सलाम नमस्ते' का "माइ दिल गोज़ म्म्म्म", 'ता रा रम पम' का "हे शोना", या फिर "ख़ुदा जाने" 'बचना ऐ हसीनों' का।

सुजॊय - भई मुझे तो इस गीत में "सदका किया" की छाप मिलती है। चलिए, जो भी है, गाना अच्छा है, अपने श्रोताओं को भी सुनवा देते हैं।

गीत - अंजाना अंजानी


सुजॊय - इन तमाम गीतों को सुनने के बाद फिर एक बार वही बात दोहराउँगा कि ये गानें कुछ ऐसे बनें हैं कि अगर फ़िल्म चल पड़ी तो ये गानें भी चलेंगे। और फ़िल्म पिट गई तो चंद रोज़ में ही ये भी गुमनामी में खो जाएँगे। 'बचना ऐ हसीनों' फ़िल्म नहीं चली थी, लेकिन "ख़ुदा जाने" गीत बेहद मक़बूल हुआ और आज भी सुना जाता है। लेकिन "ख़ुदा जाने" वाली बात मुझे इस फ़िल्म के किसी भी गाने में नज़र नहीं आई, लेकिन सभी गाने अपनी अपनी जगह पे अच्छे हैं। मुझे जो दो गीत सब से ज़्यादा पसंद आए, वो हैं "तुमसे ही तुमसे" और "तुझे भुला दिया फिर"। मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३ की रेटिंग, और 'अंजाना अंजानी' की पूरी टीम को इस फ़िल्म की कामयाबी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैं आपकी बातों से सहमत भी हूँ और असहमत भी। सहमत इसलिए कि मुझे भी वही दो गाने सबसे ज्यादा पसंद आए जो आपको आए हैं और असहमत इसलिए कि मुझे बाकी गाने भी अच्छे लगे इसलिए मेरे हिसाब से इस फिल्म के गाने इतनी आसानी से गुमनामी के गर्त में धंसेंगे नहीं। इस फिल्म के सभी गानों में विशाल-शेखर की गहरी छाप है, हर गाने में उनकी मेहनत झलकती है। इसलिए मैं अपनी तरफ़ से विशाल-शेखर को "डबल थंब्स अप" देते हुए आपके दिए हुए रेटिंग्स में आधी रेटिंग जोड़कर इसे साढे तीन बनाने की गुस्ताखी करने जा रहा हूँ। संगीतकार के बाद गीतकार की बात करते हैं। सच कहूँ तो मैंने और किसी फिल्म में गीतकारों की इतनी बड़ी फौज़ नहीं देखी थी। ७ गानों के लिए नौ गीतकार.. जबकि विशाल चार गीतों में खुद मौजूद हैं गीतकार की हैसियत से। मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि एक गीत तीन गीतकार मिलकर कैसे लिख सकते हैं। "तुमसे हीं तुमसे" के अंग्रेजी बोलों के लिए कारालिसा की जरूरत पड़ी, यह बात तो पल्ले पड़ती है, लेकिन यह बात मुझे अचंभित कर रही है कि बाकी बचे हिन्दी के कुछ लफ़्ज़ों के लिए अन्विता दत्त गुप्तन और अमिताभ भट्टाचार्य जैसे दिग्गज मैदान में उतर गए। "तुझे भुला दिया फिर" और "अंजाना अंजानी हैं मगर" ये दो ऐसे गीत हैं, जिनका मुखरा एक गीतकार ने लिखा है और अंतरे दूसरे ने.. ये क्या हो रहा है भाई? जहाँ कभी पूरी फिल्म के गाने एक हीं गीतकार लिखा करते थे, वहीं एक गीत में हीं दो-दो, तीन-तीन गीतकार .. तब तो कुछ दिनों में ऐसा भी हो सकता है कि एक-एक पंक्ति एक-एक गीतकार की हो.. एक गीतकार के लिए उससे बुरा क्षण क्या हो सकता है! अगर ऐसा हुआ तो हम जैसे भावी गीतकारों का भविष्य अधर में हीं समझिए :) खैर, कितने गीतकार रखने हैं और कितने संगीतकार- यह निर्णय तो निर्माता-निर्देशक का होता है.. हम कुछ भी नहीं कर सकते.. बस यही कर सकते हैं कि जितना संभव हो सके, अच्छे गाने चुनते और सुनते जाएँ। तो चलिए इन्हीं बातों के साथ हम आज की समीक्षा को विराम देते हैं। अगली बार हम एक लीक से हटकर एलबम के साथ हाज़िर होंगे.. नाम जानने के लिए आप अगली कड़ी का इंतज़ार करें।

आवाज़ रेटिंग्स: अंजाना अंजानी: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १००- कौसर मुनीर का लिखा वह कौन सा युगल गीत है जिस फ़िल्म में सैफ़ अली ख़ान थे और जिस गीत में एक आवाज़ महालक्ष्मी की है?

TST ट्रिविया # १०१- राहत फ़तेह अली ख़ान ने हिंदी फ़िल्म जगत में सन्‍ २००४ में क़दम रखा था और उस साल फ़िल्म 'पाप' में "लागी तुमसे मन की लगन" गीत मक़बूल हुआ था। इसी साल एक और फ़िल्म में भी उन्होंने गीत गाया था, बताइए उस फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # १०२- विशाल-शेखर के शेखर ने इससे पहले भी एक गीत गाया था जो परेश रावल पर फ़िल्माया गया था। क्या आप बता सकते हैं वह गीत कौन सा था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "कुछ मेरे दिल ने कहा" (तेरे मेरे सपने)
२. मधुश्री
३. 'पद्म शेशाद्री हायर सेकण्डरी स्कूल'।

एक बार फिर सीमा जी ने तीनों सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, July 13, 2010

पाँव की बेड़ियों से आज़ादी लेकर संगीत के नाव के सहारे एक लंबी "उड़ान" भरी है अमित और अमिताभ ने

ताज़ा सुर ताल २६/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' मे सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार, और विश्व दीपक जी आपको भी।

विश्व दीपक - सभी को मेरा भी नमस्कार, और सुजॊय जी आपको भी।

सुजॊय - फ़िल्मी गीत फ़िल्म की कहानी, किरदार, और सिचुएशन के मुताबिक ही बनाने पड़ते हैं। यानी कि फ़िल्मी गीतों के कलाकारों को एक दायरे में बंधकर ही अपने कला के जोहर दिखाने पड़ते हैं। और अगर फ़िल्म की कहानी ऐसी हो कि जो फ़ॊरमुला फ़िल्मों की कहानी से बिल्कुल हट के हो, अगर उसमें हीरो-हीरोइन वा्ला कॊनसेप्ट ही ना हो, और फ़िल्म के निर्देशक और संगीतकार प्रयोगधर्मी हों, तब ऐसे फ़िल्म के संगीत से हम कुछ ग़ैर पारम्परिक उम्मीदें ही कर सकते हैं। है ना विश्व दीपक जी?

विश्व दीपक - सही कहा, और आज हम ऐसी ही एक लीक से बाहर की फ़िल्म 'उड़ान' के गीतों को लेकर उपस्थित हुए हैं। यह फ़िल्म अनुराग कश्यप की है, जिसे निर्देशित किया है विक्रमादित्य मोटवाणी ने। ये वही विक्रमादित्य हैं जिन्होंने "देव-डी" की कहानी लिखी थी। अनुराग की पिछली फ़िल्मों की तरफ़ अगर एक नज़र दौड़ा ली जाए तो 'देव-डी', 'ब्लैक फ़्राइडे' और 'गुलाल' के प्रयोगधर्मी संगीत की तरह 'उड़ान' के संगीत से भी हम कुछ नए की उम्मीदें लगा ही सकते हैं। आज इस स्तंभ में बजने वाले गीतों को सुनने के बाद हम सभी ये अंदाजा लगा पाएँगे कि संगीतकार अमित त्रिवेदी और गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य वाक़ई लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं या नही।

सुजॊय - तो चलिए गीतों का सिलसिला शुरु किया जाए, सुनते हैं पहला गीत।

गीत: आँखों के परदों पे


विश्व दीपक - जॉय बरुआ और नोमान पिंटो का गाया हुआ यह गाना था। "आँखों के परदों पे प्यारा सा जो था वो नज़ारा, धुआँ सा बन कर उड़ गया अब न रहा, बैठे थे हम तो ख़्वाबों की छाँव तले, छोड़ के उनको जाने कहाँ को चले, कहानी ख़त्म है या शुरुआत होने को है, सुबह है ये नई या फिर रात होने को है"। इन बोलों को सुन कर मतलब साफ़ है कि फ़िल्म के दो नायक अपने भविष्य को लेकर कुछ संशय में हैं। उन्हे यह नहीं पता कि जो हो रहा है वो अच्छे के लिए या ग़लत हो रहा है। दर-असल इन बोलों के साथ आज का हर युवा अपने आप को कनेक्ट कर सकेगा। अक्सर ऐसा होता है आजकल कि बच्चा कुछ बनने का सपना देखता है, जिसमें उसकी रूचि है, लेकिन कभी हालात की वजह से, कभी माँ-बाप के सपनों की वजह से, या फिर किसी और वजह से उसे ज़बरदस्ती ऐसे क्षेत्र में करीयर बनाना पड़ता है जिसमें उसे सफलता तो मिलती है लेकिन उसमें उसकी रूचि नहीं है। यह गीत उन सभी युवाओं के दिल को छू जाएगा ऐसा मेरा विचार है।

सुजॊय - आपने कहा कि फ़िल्म के दो नायकों के मन में संशय है, तो यहाँ पर इस फ़िल्म की कहानी की थोड़ी सी भूमिका मैं देना चाहूँगा। यह विक्रमादित्य मोटवाणे निर्देशित फ़िल्म है जिसकी कहानी एक युवक के सपनों की कहानी है, सपनों को पूरा करने की कहानी है। और इस युवक की भूमिका अदा की है रजत बरमेचा ने। साथ में हैं रोनित रॉय, आयान बोराडिआ, राम कपूर, मनजोत सिंह, आनंद तिवारी, सुमन मस्तकर और राजा हुड्डा। 'उड़ान' ६३-वीं कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भारत की एकमात्र एंट्री है। और शायद इसी वजह से इस फ़िल्म की तरफ़ सब की निगाहें टिकी हुई हैं।

विश्व दीपक - इस गीत का जहाँ तक सवाल है, गीत केवल साढ़े तीन मिनट अवधि की है, और उसमें भी शुरुआती १:२० मिनट प्रील्युड म्युज़िक है जिसमें गीटार का सुंदर इस्तेमाल है। मुखड़े के दूसरे हिस्से से गीत में सॊफ़्ट रॊक शैली समा जाती है। गीत भले ही छोटा है लेकिन इसकी छाप गहरी पड़ने वाली है। और अब आगे बढ़ते हैं दूसरे गीत की तरफ़।

गीत: गीत में ढलते लफ़्ज़ों में .... कुछ नया तो ज़रूर है


सुजॊय - अमित त्रिवेदी और अमिताभ भट्टाचार्य की आवाज़ें थी इस गीत में। और बड़ी दिलचस्प बात है कि इस गीत को गीतकार-संगीतकार जोड़ी ने गाया है। मुझे नहीं लगता पहले कभी ऐसा हुआ है कि कोई युगल गीत हो और उसमें दो आवाज़ें उसी फ़िल्म के गीतकार और संगीतकार की हो। वाक़ई कुछ नया तो ज़रूर है! गीत के रीदम को सुनते हुए 'देव-डी' के "एक हलचल सी" की याद आ ही जाती है।

विश्व दीपक - और साथ ही बोलों को सुनते हुए फ़िल्म 'इक़बाल' का "आशाएँ खिले दिल की" गीत की भी याद आती है। जो पहला गीत था उसमें संशय था आशा और निराशा का, लेकिन इस गीत में आशावादी भाव ही उभर कर सामने आया है। और धुन भी अमित ने ऐसा बनाया है कि जल्दी ही दिल को छू लेता है। सॊफ़्ट रॊक शैली का इस्तेमाल इसमें भी हुआ है और ७० के दशक का टीपिकल रीदम जिसमें ईलेक्ट्रिक गीटार, किक ड्रमिंग और परक्युशन्स का इस्तेमाल हुआ है।

सुजॊय - अब अगला गीत लोक संगीत और पश्चिमी ऒरकेस्ट्रेशन का फ़्युज़न है। अगर आपको 'देव-डी' का "ढोल यारा" याद है तो आपको यह भी याद होगा कि इस गीत को कितनी सरहना मिली थी उस प्रयोग के लिए। अब 'उड़ान' में ऐसा ही गीत है "नाव - चढ़ती लहरें लांघ ना पाए"। आवाज़ गायक मोहन की है। इस गीत के लिए जिस तरह की रस्टीक वॊयस की ज़रूरत थी, मोहन ने वैसे ही इसे गाया है। मोहन के बारे में जिन लोगों को जानकारी नहीं है, उन्हें बता दें कि ये वही गायक हैं जिन्होंने "लंदन ड्रीम्स" का "खानाबदोश" गाया था। मोहन "अग्नि" बैंड से ताल्लुक रखते हैं। जहाँ तक इस गाने की बात है तो "नाव" कैलाश खेर वाले अंदाज़ का गाना है जिसको मोहन ने अच्छा अंजाम दिया है। तो आइए सुनते हैं यह गाना:

गीत: नाव


विश्व दीपक - वाक़ई कैलाश खेर की याद आ गई! और अब 'उड़ान' के शीर्षक गीत की बारी। इस फ़िल्म के लगभग सभी गीत प्रेरणादायक हैं, इंसपिरेशनल हैं। पता नहीं क्यों, बार बार फ़िल्म 'इक़बाल' की याद आ रही है! "नदी में तलब है कहीं जो अगर, समंदर कहाँ दूर है,... एक उड़ान कब तलक युं क़ैद रहेगी, रोको न छोड़ दो इसे" - एक और आशावादी और प्रेरणादायक गीत, और इस बार आवाज़ें अमित त्रिवेदी, जॉय बरुआ और नोमान पिंटो की। संगीत में वही रॉक अंदाज़। गीत का रीदम धीरे धीरे तेज़ होता जाता है जिससे जोश बढ़ता जाता है जो गीत के भाव को और ज़्यादा पुख़्ता करता जाता है।

सुजॊय - इस गीत का संगीत संयोजन लगभग पहले के तीन गीतों जैसा ही है, लेकिन इन सभी गीतों को सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे एक सामंजस्य है, एक सूत्र है जो इन सभी गीतों को आपस में जोड़े रखता है, संगीत के लिहाज़ से भी, और शब्दों के लिहाज़ से भी। हमने आपने तो यह गीत सुन लिया है, आइए अब हम अपने श्रोताओं को भी यह गीत सुनवाएँ।

विश्व दीपक - जी क्यों नहीं!

गीत: एक उड़ान कब तलक क़ैद रहेगी


विश्व दीपक - और अब आज की इस प्रस्तुति का अंतिम गीत। एक और आशावादी गीत - "पैरों की बेड़ियाँ ख़्वाबों को बांधे नहीं रे, कभी नहीं रे, मिट्टी की परतों को नन्हे से अंकुर भी चीरें, धीरे धीरे , इरादे हरे हरे जिनके सीनों में घर करे, वो दिल की सुने, करे, ना डरे"। अमित त्रिवेदी, नोमान पिंटो, निखिल डी'सूज़ा और अमिताभ भट्टाचार्य की समूह स्वरों में यह सॉफ़्ट नंबर एक बार फिर से कुछ नया कर दिखाने का जुनून लिए हुए है। गीत का शीर्षक रखा गया है "आज़ादियाँ", जो गीत शुरु होने के २:५० मिनट बाद गीत में आता है। और इस गीत को उसी अंदाज़ में बनाया गया है जैसा कि पहला गीत "आँखों के परदों पे" को बनाया गया है। इन सभी गीतों का इस्तेमाल थीम सॉँग के हैसीयत से फ़िल्म में किया गया होगा!

सुजॊय - सितार की ध्वनियाँ गीत के एक इंटरल्युड में सुनाई देती है और एक सुकून सा दे जाती है। वैसे गीत का जो मूड है, जो म्युज़िक अरेंजमेण्ट है, वह किसी रॊक कॊनसर्ट के लिए परफ़ेक्ट है। इतने सारे गायकों के आवाज़ों के संगम की वजह से इस गीत में एक कॊलेज कैम्पस जैसा फ़ील आया है। एक बात जो इस फ़िल्म के गीतों में कोई भी गायिका की आवाज़ मौजूद नहीं है। यह पूरी तरह से मेल डॊमिनेटेड ऐल्बम है। आइए आज का यह आख़िरी गीत सुन लेते हैं।

गीत: आज़ादियाँ


"उड़ान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - हाँ, तो इन तमाम गीतों को सुनने के बाद मेरी व्यक्तिगत राय यही है कि अमित त्रिवेदी और अमिताभ भट्टाचार्य ने जो उड़ान भरी है, वह सुरक्षित लैण्ड करेगी श्रोताओं के दिलों में। हालाँकि इस ऐल्बम वह वैरायटी नहीं है जो 'देव-डी' में थी, हो सकता है कि इसका कारण फ़िल्म की स्टोरी-लाइन हो, जो भी है, हम इस फ़िल्म की पूरी टीम को अपनी शुभकामनाएँ देते हैं। अमित त्रिवेदी ने 'आमिर', 'देव-डी' और 'वेक अप सिड' के लिए जो तारीफ़ें बटोरी थी, उससे भी ज़्यादा मक़बूलियत इस फ़िल्म से वो हासिल करें। और आख़िर में अमिताभ भट्टाचार्य को भी सलाम करता हूँ इतने अच्छे बोल इन धुनों में पिरोने के लिए। पिछले कुछ हफ़्तों से 'ताज़ा सुर ताल' प्रस्तुत करते हुए मुझे ऐसा लगने लगा है कि अच्छे बोल, स्तरीय बोल, एक बार फिर से फ़िल्मी गीतों में धीरे धीरे वापस आ रही है।

विश्व दीपक - अमित त्रिवेदी से मेरी उम्मीदें हमेशा हीं खास रहती हैं और अच्छी बात है कि वे कभी भी निराश नहीं करते। आपने "आमिर" ,"देव-डी" और "वेक अप सिड" का ज़िक्र किया, ये सारी बड़ी और नामी-गिरामी फिल्में थी, लेकिन अमित ने तो "एडमिशन्स ओपन" जो कि कुछ भी नाम न कर सकी में भी ऐसा बढिया संगीत दिया था, जिसका एक-दहाईं संगीत भी बड़े-बड़े संगीतकार बड़ी-बड़ी फिल्मों में नहीं दे पाते। अमित रहमान को अपना आदर्श मानते हैं लेकिन दूसरे भक्तों की तरह ये रहमान की नकल नही करते.. यह अमित की सबसे बड़ी खासियत है। अमित और अमिताभ की जोड़ी अभी तक कमाल करती आई है और इस जोड़ी ने हमेशा हीं अलग तरह का माहौल तैयार किया है अपने गानों से। इस फिल्म के गानों में भी वही बात है इसलिए पसंद न करने का कोई सवाल हीं नहीं उठता। चलिए तो इस तरह आज की समीक्षा समाप्त हुई। हाँ, यह भी बताते चलें कि अगली बार हमारे साथ होगी "आयशा" और उसे भी संजाने-संवारने का काम "अमित" ने हीं किया है। तो अगली कड़ी में हम फिर से साथ होंगे अमित के। तब तक के लिए "खुदा हाफ़िज़"!

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७६- 'उड़ान' शीर्षक से किसी ज़माने में दूरदर्शन पर एक लोकप्रिय धारावाहिक हुआ करता था जो एक लड़की के अपने सपनों को पूरा करने की कहानी थी। बताइए उस लड़की का चरित्र किस कलाकार ने निभाया था?

TST ट्रिविया # ७७- गायक जॉय बरुआ ने साल २००६ की एक फ़िल्म में भी गीत गाया था, बताइए फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # ७८- फ़िल्म 'देव-डी' का मशहूर गीत "इमोसनल अत्याचार" गाया था बैण्ड मास्टर्स रंगीला और रसीला ने (क्रेडिट्स के अनुसार)। लेकिन यह हक़ीक़त नहीं है। क्या आप बता सकते हैं कि इस गीत को किन दो गायकों ने गाया था जिनका नाम क्रेडिट्स पर नहीं आया?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "साथिया" का "चोरी पे चोरी"
२. "आई ऐम इन लव" यह पंकित तीनों फिल्मों के किसी न किसी गाने में थी
३. "द किलर" का "फिरता रहूँ दर-ब-दर"

सीमा जी आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

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