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Saturday, July 19, 2014

"मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों?" वाक़ई कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ हमारे आसपास है...


एक गीत सौ कहानियाँ - 36
 

‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी जिन्दगी से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 36वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' की ग़ज़ल "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." के बारे में



माल अमरोही निर्देशित 1983 की फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से पिटी पर हेमा मालिनी-धर्मेन्द्र अभिनीत इस फ़िल्म को इसकी पटकथा, संवाद और निर्देशन के लिए आज भी याद किया जाता है और याद किया जाता है इस फ़िल्म के सुमधुर गीतों और ग़ज़लों को भी। ख़य्याम द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म के गीतों को लिखने का कार्यभार जाँनिसार अख़्तर को सौंपा गया था, पर सभी गीत पूरे होने से पहले ही वो चल बसे जिस वजह से फ़िल्म के शेष दो गीत शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली से लिखवाये गये। लता मंगेशकर का गाया "ऐ दिल-ए-नादान..." सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा इस फ़िल्म का, जो कि ख़य्याम साहब की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है और लता जी के पसन्दीदा गीतों में भी इसका शुमार होता है। लता की ही आवाज़ में "जलता है बदन..." भी काफ़ी सुना गया, पर "ख़्वाब बन कर कोई आयेगा..." ज़्यादा चर्चा में नहीं रहा। अन्य दो गीत "हरियाला बन्ना आया रे..." (आशा भोसले, जगजीत कौर) और "ऐ ख़ुदा शुक्र तेरा..." (महेन्द्र कपूर, भूपेन्द्र) भी ज़्यादा ध्यान आकर्षित नहीं कर पाए। पर इस फ़िल्म में दो ग़ज़लें ऐसी थीं जिनमें एक अलग ही बात थी। अलग बात इसलिए कि इनके गायक थे कब्बन मिर्ज़ा जिन्हें उस समय कोई नहीं जानता था और उनकी अलग हट कर आवाज़ ने इन दो ग़ज़लों को एक अलग ही जामा पहनाया। "आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे..." और "तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है..." गाकर कब्बन मिर्ज़ा ने बहुत वाह-वाही लूटी। निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखे फ़िल्म के दो गीत थे "हरियाला बन्ना आया रे..." और "तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है..."। 

कब्बन मिर्ज़ा
अब आते हैं कब्बन मिर्ज़ा पर। आख़िर कौन थे ये जनाब? इनकी आवाज़ तो इससे पहले किसी ने नहीं सुनी। और न ही इसके बाद फिर कभी सुनाई दी। कहाँ से आये और कहाँ ग़ायब हो गये पता ही नहीं चला। इन्टरनेट पर इनके बारे में बस यही लिखा गया है कि ये 'विविधभारती' के उद्‍घोषक हुआ करते थे। इसलिए कब्बन मिर्ज़ा के जीवन से जुड़ी और भी कुछ बातें मालूम करने के लिए जब मैंने 'विविधभारती' के वर्तमान लोकप्रिय उद्‍घोषक यूनुस ख़ान का सहारा लिया तो कब्बन साहब के बारे में कुछ और बातें जानने को मिली। कब्‍बन मिर्जा का ताल्‍लुक लखनऊ से था। वो 'विविधभारती' में उदघोषक नहीं बल्कि 'प्रोग्राम असिस्‍टेन्‍ट' थे। और आवाज़ अच्छी होने की वजह से प्रोग्राम भी करते थे। 'संगीत सरिता' से वो शुरूआत से जुड़े रहे थे। मुहर्रम में मर्सिए वग़ैरह गाते थे। 'विविधभारती' में उनका सबसे अहम योगदान रहा 'संगीत सरिता' का शुरूआती स्‍वरूप और उसे लोकप्रियता देना, जिसमें पहले किसी राग के बारे में बताया जाता, फिर उसका चलन, और फिर उस पर आधारित शास्‍त्रीय और फिल्‍मी रचना। ये क्‍लासिकल स्‍वरूप उन्‍हीं ने बनाया। बाद में इसे इंटरव्‍यू बेस्‍ड कर दिया गया। वो अस्‍सी के दशक के दौरान विविधभारती से रिटायर हुए। और फिर मुंबई के उपनगर मुंब्रा में रहते रहे। उनके एक (या शायद दोनों) बेटे सऊदी अरब के एक मशहूर रेडियो स्‍टेशन से जुड़े हैं। इन्टरनेट पर उनका जन्म 1937-38 बताया गया है। उन्हें गले का कैन्सर हो गया था पर उनकी मृत्यु के बारे में ठीक-ठीक कहीं कुछ लिखा नहीं गया है, पर कुछ वेबसाइट में 'Late Kabban Mirza' कह कर उल्लेख है।

ख़य्याम
अब सवाल यह है कि फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के इन दोनो ग़ज़लों को गाने के लिए कब्बन मिर्ज़ा कैसे चुने गये। 'रज़िया सुल्तान' फ़िल्म दिल्ली की एकमात्र महिला सुल्तान रज़िया सुल्तान (1205-1240) के जीवन पर आधारित थी और इसमें शामिल है उनके ऐबिसिनियन ग़ुलाम जमाल-उद्दीन याकुत (धर्मेन्द्र द्वारा निभाया चरित्र) के साथ प्रेम-सम्बन्ध भी। जमाल एक बहुत बड़ा सिपहसालार है, जो जब भी कभी वक़्त मिलता है, थोड़ा गा लेता है अपनी मस्ती में, पर वो कोई गायक नहीं है। ऐसे किरदार के पार्श्वगायन के लिए कमाल अमरोही ने ख़य्याम के सामने अपनी फ़रमाइश रख दी कि उन्हें ये दो ग़ज़लें किसी ऐसे गायक से गवानी है जो गायक नहीं है पर थोड़ा बहुत गा लेता है। ऐसे में ख़य्याम साहब के लिए बड़ी कठिनाई हो गई कि उन्हें कोई इस तरह का गायक न मिले। अब यह हुआ कि पूरे हिन्दुस्तान से 50 से भी ज़्यादा लोग आये और सब आवाज़ों में यह हुआ कि लगा कि वो सब मंझे हुए गायक हैं। किसी की भी आवाज़ में वह बात नज़र नहीं आयी जिसकी कमाल अमरोही को तलाश थी। ऐसे ही कब्बन मिर्ज़ा भी आये अपनी आवाज़ को आज़माने। ख़य्याम, उनकी पत्नी और गायिका जगजीत कौर और कमाल अमरोही, तीनो ने उन्हें सुना। जब कब्बन मिर्ज़ा से यह पूछा गया कि उन्होंने कहाँ से गायन सीखा, तो उनका जवाब था कि उन्होंने कहीं से नहीं सीखा। किस तरह के गाने आप गा सकते हैं, पूछने पर कब्बन साहब लोकगीत सुनाते चले जा रहे थे। वो तीनों मुश्किल में पड़ गये क्योंकि उनकी ज़रूरत थी एक ऐसे शख्स की जो गायक न हो पर ग़ज़ल गा सके! अत: कब्बन मिर्ज़ा भी रिजेक्ट हो गये। पर अगली सुबह कमाल साहब का ख़य्याम साहब को टेलीफ़ोन आया कि आप फ़्री हैं तो अभी आप तशरीफ़ लायें। नाश्ता उनके साथ हुआ। नाश्ता हुआ तो कमाल साहब कहने लगे कि रात भर मुझे नींद नहीं आई, यह जो आवाज़ है जो हमने कल सुनी कब्बन मिर्ज़ा की, यही वह आवाज़ है जिसकी तलाश मैं कर रहा था। ख़य्याम चौंक कर बोले, "कमाल साहब, लेकिन उनको गाना तो आता नहीं!" तो कमाल अमरोही ने ख़य्याम का हाथ पकड़ कर बोले, "ख़य्याम साहब, आप मेरे केवल मौसीकार ही नहीं हैं, आप तो मेरे दोस्त भी हैं। प्लीज़ आपको मेरे लिए यह करना है, मुझे इन्ही की आवाज़ चाहिये।" फिर क्या था, शुरू हुई कब्बन मिर्ज़ा की संगीत शिक्षा। ख़य्याम साहब ने उन्हे तीन-चार महीने स्वर और ताल का ज्ञान दिलवाया और उसके बाद गाने की रेकॉर्डिंग शुरू हुई। अक्सर यह होता है कि रेकॉर्डिंग के वक़्त म्युज़िक डिरेक्टर रेकॉर्डिंग करवाता है अपने रेकॉर्डिस्ट से, और असिस्टैण्ट जो होते हैं वो ऑरकेस्ट्रा संभालते हैं। पर उस दिन क्योंकि कब्बन मिर्ज़ा नये थे, गा नहीं पा रहे थे, इसलिए ख़य्याम साहब ने जगजीत कौर को भेजा रेकॉर्डिंग पर, असिस्टैण्ट को भी अन्दर भेजा, और ख़ुद कंडक्ट किया। इस तरह से रेकॉर्ड हुआ कब्बन मिर्ज़ा का गाया "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..."।

निदा फ़ाज़ली
शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली के लिए भी यह ग़ज़ल उतनी ही महत्वपूर्ण थी। उन्हीं के शब्दों में - "देखिये, पटना, बिहार, अज़ीमाबाद के एक शायर हुए हैं शाद अज़ीमाबादी। उनकी एक लाइन है कि "मैं ख़ुद आया नहीं, लाया गया हूँ"। जैसा कि मैंने पहले कहा कि चॉयस का इख़्तियार ज़िन्दगी में होता नहीं है। जहाँ आप पैदा हुए, वह आपका परिवार, उस परिवार की जो भाषा वही आपकी भाषा, वह परिवार जिस मोहल्ले में, वही आपका मोहल्ला, वह मोहल्ला जिस नगर में, वह आपका नगर; मेरे साथ भी यही हुआ कि बिना पूछे पैदा कर दिया गया, और मैं ये तमाम बोझ लिए गधे की तरह ज़िन्दगी के सफ़र में घूमता रहा। जब घर छीना गया तो घर की तलाश में पूरे देश में भटकता रहा, यह भी बेवकूफ़ी थी। मालूम पड़ा एक पड़ाव बम्बई आया है, उस ज़माने में धरमवीर भारती एक यहाँ थे, उनके 'धर्मयुग' में लिखना शुरू कर दिया। फिर 'ब्लिट्ज़' में लिखना शुरू कर दिया। एक दिन बेघर एक शख़्स जिसका नाम निदा फ़ाज़ली था, उसके लिए मैसेज रखी हुई थी हर जगह, जहाँ वह काम कर रहा था थोड़ा-थोड़ा, कहीं 'धर्मयुग' में पड़ी हुई है, कहीं 'ब्लिट्ज़' में पड़ी हुई है, कहीं किसी रेडियो स्टेशन में पड़ी हुई है, और उस मैसेज में लिखा हुआ था "मैं आप से मिलना चाहता हूँ, आप मुझसे आ कर मिलिये, मुझे आप से कुछ काम लेना है - कमाल अमरोही"। मैंने सोचा कि मेरा कमाल अमरोही से क्या काम हो सकता है! मैं उनसे मिलने चला गया। कमाल साहब मिले करीब 2 बजे, वो स्टाइलिश आदमी थे कमाल साहब, वो एक लफ़्ज़ अंग्रेज़ी का नहीं बोलते थे, और वो भाषा बोलते थे जो आज से 50 साल पहले अमरोहा में बोली जाती थी। मैं वह भाषा बम्बई आकर भूल गया। मैंने कहा, "कमाल साहब, आदाब अर्ज़ है, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है"। बोले, "तशरीफ़ रखिये, मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है कि मुझे एक मुकम्मल शायर की ज़रूरत है"। मैंने कहा कि मैं हाज़िर हूँ और इस इज़्ज़त-अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया कि आप मुझे मुकम्मल शायर समझ रहे हैं। बोले, "जी, मुझे आप से कुछ नग़मात तहरीर करवाने है"। मैं कहा कि मैं हाज़िर हूँ साहब, आप बताइये कि कैसा गाना है, क्या लिखना है। बोले कि इससे पहले कि आप गाना लिखें, एक बात मैं जाहिर कर देना चाहता हूँ कि इल्मी शायरी अलग होती है और फ़िल्मी शायरी अलग होती है, और फ़िल्मी शायरी लिखने के लिए आपको मेरी मिज़ाज की शिनाख़्त बहुत ज़रूरी है; जाँ निसार अख़्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गये थे, अल्लाह को प्यारे हो गये। मैंने कहा कि मैं यह शर्त तो पूरी नहीं करने वाला, कोशिश करूंगा कि आपके मिज़ाज का कुछ लिखूँ। तो उन्होंने सिचुएशन सुनाई, अपनी ज़ुबान में सुनाई तो थोड़ी देर के लिए मैं भी हिल गया। कहने लगे, "हमारी दास्तान उस मुकाम पर आ गई जहाँ मलिका-ए-आलिआ रज़िया सुल्तान, यानी हेमा मालिनी, सियाहा लिबास में ख़रामा-ख़रामा चली आ रही है, जिसे देख कर हमारा आलेया कासी ख़ैरमक़दम के लिए आगे बढ़ा। मैं थोड़ी देर बैठा रहा, फिर उनके असिस्टैन्ट ने कहा कि इसका मतलब यह है कि हेमा मालिनी सफ़ेद घोड़े पर काले लिबास पहने आ रही हैं, और आलेया कासी यानी कैमरा उनकी तरफ़ मूव हो रहा है। तो मैंने आख़िर के दो गीत उस फ़िल्म के लिए लिखे।" 

"तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." ग़ज़ल में कुछ ऐसी बात है कि जिसे एक बार सुनने के बाद एक और बार सुनने का मन होता है। कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में एक ऐसा आकर्षण है कि जो सीधे दिल में उतर जाता है। यह उपहास ही है कि ऐसी मोहक आवाज़ के धनी कब्बन मिर्ज़ा गले के कैन्सर से आक्रान्त हो कर इस दुनिया से चल बसे। पर जैसा कि इस ग़ज़ल की दूसरी लाइन में कहा गया है कि "मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है", वैसे ही कब्बन मिर्ज़ा भले इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी गायी हुई 'रज़िया सुल्तान' की इन दो ग़ज़लों ने उनकी आवाज़ को अमर कर दिया है, जो हमेशा हमारे साथ रहेगी। बस इतनी सी थी यह दास्तान। लीजिए, कब्बन मिर्जा की आवाज़ में वह गाना आप भी सुनिए।

फिल्म - राजिया सुल्तान : "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." : स्वर - कब्बन मिर्ज़ा : संगीत - खय्याम : गीतकार - निदा फाजली  





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Tuesday, August 10, 2010

तेरा हिज्र मेरा नसीब है... जब कब्बन मिर्ज़ा से गवाया खय्याम साहब और कमाल अमरोही ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 458/2010/158

'रज़िया सुल्तान' कमाल अमरोही की एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी, लेकिन बदक़िस्मती से फ़िल्म असफल रही। हाँ फ़िल्म के गानें बेहद सराहे गए और आज इस फ़िल्म को केवल इसके गीतों और ग़ज़लों की वजह से ही याद किया जाता है। 'सेहरा में रात फूलों की' शृंखला में आज सुनिए हेमा मालिनी व धर्मेन्द्र अभिनीत सन् १९८३ की इसी फ़िल्म से एक ग़ज़ल कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में। ख़य्याम साहब का संगीत और निदा फ़ाज़ली का क़लाम। दोस्तों, आज मैं ख़ुद कुछ नहीं बोलूँगा, आज बातें होंगी वो जो इस ग़ज़ल के बारे में आपको बताएँगे ख़ुद ख़य्याम और निदा साहब। पहले ख़य्याम साहब को मौका देते हैं। "कमाल अमरोही साहब, उनकी फ़रमाइश थी कि हमारा जो हीरो है, बहुत बड़ा वारियर, सिपह सालार है, वो कभी कभी, जब उसको वक़्त मिलता है, अकेला होता है, तब वो अपनी मस्ती में गाता है। और ये ऐसा है कि वो सिंगर नहीं है। तो बड़ी कठिन बात हो गई कि सिंगर ना मिले कोई। अब ये हुआ कि पूरे हिंदुस्तान से ५० से उपर लोग आए और सब आवाज़ों में ये हुआ कि लगा कि वो सब सिंगर हैं। ऐसे ही कब्बन मिर्ज़ा भी आए। हम सब ने सुना उन्हे। मैं, जगजीत जी, कमाल साहब। फिर उनसे पूछा कि आपने कहाँ सीखा? उन्होने कहा कि मैंने कभी नहीं सीखा। कौन से गानें गा सकते हैं? तो वो सब लोक गीत सुना रहे थे। तो हम लोग मुश्किल में पड़ गए कि भई ये तो बड़ा कठिन काम है! तो हम लोगों ने उन्हे रिजेक्ट कर दिया था। अगले दिन कमाल साहब का टेलीफ़ोन आया कि आप फ़्री हैं तो अभी आप तशरीफ़ लाएँ। नाश्ता उनके साथ हुआ। नाश्ता हुआ तो कहने लगे कि रात भर मुझे नींद नहीं आई। कमाल साहब, क्या हुआ? ये जो आवाज़ है जो हमने कल सुनी कब्बन मिर्ज़ा की, यही वो आवाज़ है। मैंने कहा 'कमाल साहब, लेकिन उनको गाना तो आता नहीं'। तो कहने लगे 'ख़य्याम साहब, आप मेरे केवल मौसीकार ही नहीं हैं, आप तो मेरे दोस्त भी हैं। प्लीज़ आपको मेरे लिए यह करना है, मुझे इन्ही की आवाज़ चाहिए'। तो फिर इनको कुछ ३-४ महीने स्वर और ताल का ज्ञान दिलवाया, और उसके बाद गाने की रेकॊर्डिंग् शुरु हुई। अक्सर हम लोग ये करते हैं कि रेकॊर्डिंग् के वक़्त म्युज़िक डिरेक्टर रेकॊर्डिंग् करवाता है अपने रेकॊर्डिस्ट से। तो ऐसिस्टैण्ट जो होते हैं वो ऒरकेस्ट्रा सम्भालते हैं। तो उस दिन वो नए थे, गा नहीं पा रहे थे, तो मैंने जगजीत जी को यहाँ भेजा, रेकॊर्डिंग में, और ऐस्टैण्ट को बोला अंदर जाओ, और कण्डक्टिंग् मैंने की। युं गाना हुआ ये और इसे आप सुनाइए" (सौजन्य: संगीत सरिता, विविध भारती)। दोस्तों, लेकिन जैसा कि हमने आप से वादा किया था, पहले निदा साहब से भी तो उनके ख़यालात जान लें इस ग़ज़ल से जुड़ी हुई!

"बात दरअसल है कि जब घर से बेघर हो गया तो हर शहर एक सा हो गया। और मैं भटकता रहा। और उस वक़्त मसला, न सियासत था, न तासूत था, ना मुल्की तफ़सीम थी, सिर्फ़ मसला था रोटी की, कपड़ों की, और सर पे छत का। आम हिंदुस्तानी की ज़िंदगी में हर चीज़ बड़ी लेट आती है। मेरे साथ भी यही हुआ। जब मैं यहाँ बम्बई आया, तो ले दे के एक ही काम आता था कि क़लम से लिखना और अख़्बारों में छपवाना। मालूम पड़ा कि उस पीरियड में जगह जगह मैसेज मिलती था कि 'Mr Kamal Amrohi wants to meet Nida Fazli'। तो मैं सोच नहीं पाता था कि कमाल अमरोही, इतने मशहूर डिरेक्टर मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं। बहरहाल मैं ज़रूरतमंद था और वो ज़रूरतें पूरी करने वाले डिरेक्टर थे। मैं पहुँच गया और जब पहुँचा तो मालूम पड़ा कि वो खाना खाने के बाद आधा घंटा आराम फ़रमाते हैं। बहरहाल उनके ऐसिस्टैण्ट ने मुझे इंतेज़ार करने को कहा। मैं गया तो ज़ाहिर है कि मैंने कहा कि 'अमरोही साहब, मैं हाज़िर हूँ, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है, आप ने मुझे याद किया'। बोले 'जी, तशरीफ़ रखिए, आप से कुछ नग़मात तहरीर करवाना है'। तो ऐसे नस्तारीख़ ज़बान, जो मैं पढ़ता था किताबो में, बम्बई में आके भूल गया था, तो उनके जुमले से। मैंने कहा मैं हाज़िर हूँ। उन्होने कहा कि एक बात का ख़याल रखिये, कि मुझे मुक़म्मल शायर की ज़रूरत है, लेकिन इस शर्त के साथ कि अदबी शायरी और होती है और फ़िल्मी शायरी और। अदबी शायरी के आपको मेरे मिज़ाज की शिनाख़्त बहुत ज़रूरी है। जाँ निसार अख़्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गए थे, अल्लाह को प्यारे हो गए। मैंने कहा मैं यह शर्त पूरी करने वाला नहीं हूँ, लेकिन कोशिश करूँगा कि आपके मिज़ाज के मुताबिक़ गीत लिख सकूँ। मैंने वो ग़ज़ल लिखी थी "तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है"।

तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है,
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है।

मेरे वास्ते तेरे नाम पर, कोई हर्फ़ आए नहीं नहीं,
मगर मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है, मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है।

तेरा वस्ल ऐ मेरी दिलरुबा, नहीं मेरी क़िस्मत तो क्या हुआ,
मेरी महजबीं यही कम है क्या, तेरी हसरतों का तो साथ है।


तेरा इश्क़ मुझ पे है महरबाँ, मेरे दिल को हासिल है दो जहाँ,
मेरी जान-ए-जाँ इसी बात पर, मेरी जान जाए तो बात है।



क्या आप जानते हैं...
कि कब्बन मिर्ज़ा किसी ज़माने में विविध भारती के उद्घोषक हुआ करते थे और उनकी गम्भीर और अनूठी आवाज़ दूसरे उद्घोषकों के मुक़ाबले बिलकुल अलग सुनाई पड़ती थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये संगीतकार भी कल पहली बार तशरीफ लायेगें ओल्ड इस गोल्ड की महफ़िल पर, नाम बताएं - ३ अंक.
२. शायर कौन हैं इस गज़ल के - २ अंक.
३. मुकुल आनंद निर्देशित और डिम्पल कपाडिया अभिनीत इस फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
४. आशा भोसले का साथ किस गायक ने दिया है इस युगल गज़ल में - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी क्या बात है फिर से चूक गए, पर प्रतिभा जी, किशोर जी और नवीन प्रसाद जो शायद पहली बार पधारे हैं पहेली में, सही जवाब दिया है, इंदु जी खता माफ, अंक मिल जायेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, May 24, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (6)

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत के नए अंक में आपका स्वागत है. आज जो गीत मैं आपके लिए लेकर आया हूँ वो बहाना है अपने एक पसंदीदा संगीतकार के बारे आपसे कुछ गुफ्तगू करने का. "फिर छिडी रात बात फूलों की..." जी हाँ इस संगीतकार की धुनों में हम सब ने हमेशा ही पायी है ताजे फूलों सी ताजगी और खुशबू भी.

१९५२-५३ के आस पास आया एक गीत -"शामे गम की कसम...". इस गीत में तबला और ढोलक आदि वाध्य यंत्रों के स्थान पर स्पेनिश गिटार और इबल बेस से रिदम लेना का पहली बार प्रयास किया गया था. और ये सफल प्रयोग किया था संगीतकार खय्याम ने. खय्याम साहब फिल्म इंडस्ट्री के उन चंद संगीतकारों में से हैं जिन्होंने गीतों में शब्दों को हमेशा अहमियत दी. उन्होंने ऐसे गीतकारों के साथ ही काम किया जिनका साहित्यिक पक्ष अधिक मजबूत रहा हो. आप खय्याम के संगीत कोष में शायद ही कोई ऐसा गीत पायेंगें जो किसी भी मायने में हल्का हो. फिल्म "शोला और शबनम" के दो गीत मुझे विशेष पसंद हैं - "जाने क्या ढूंढती रहती है ये ऑंखें मुझे में..." और "जीत ही लेंगें बाज़ी हम तुम...". राज कपूर और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म "फिर सुबह होगी" के उन यादगार गीतों को भला कौन भूल सकता है -"चीनो अरब हमारा...", "आसमान पे है खुदा..." और इस फिल्म का शीर्षक गीत साहिर और खय्याम को जोड़ी के अनमोल मोती हैं. वो रफी साहब का गाया "है कली कली के लब पर..." हो या लता के जादूई स्वरों में वो खनकती सदा "बहारों मेरा जीवन भी संवारों..." खय्याम साहब के संगीत में सचमुच इतनी मधुरता इतना नयापन था कि शायद इन गीतों को लोग आज से सौ सालों बाद भी सुनेंगें तो भी इतना ही मधुर और नया ही पायेंगें.

खय्याम का मूल नाम सआदत हुसैन था. उन्होंने संगीत की तालीम पंडित अमरनाथ जी से हासिल की. ७० के दशक में व्यावसायिक रूप से उन्हें एक बड़ी सफलता मिली यश चोपडा की फिल्म "कभी कभी" से. इस फिल्म के गीतकार भी साहिर ही थे. यश जी के अलावा उनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल किया निर्देशक कमाल अमरोही साहब ने. "शंकर हुसैन" नाम की फिल्म के वो यादगार गीत भला कौन भूल सकता है , -"कहीं एक नाज़ुक...", "आप यूँ फासलों से..." और "आपने आप रातों में...". क्या लाजवाब गीत हैं ये. नूरी, बाज़ार, त्रिशूल , थोडी सी बेवफाई, और उमराव जान जैसी फिल्मों में उनका संगीत बेमिसाल है. "ये क्या जगह है दोस्तों...." "इन आँखों की मस्ती के..." जैसी ग़ज़लें फिल्म संगीत के खजाने की अनमोल धरोहर हैं. ग़ज़लों के बारे में खुद खय्याम साहब ने एक बार फ़रमाया था -"ग़ज़ल बड़ी हसीं और नाज़ुक चीज़ है. यहाँ भी मैंने ट्रडिशनल ग़ज़ल से हटकर कुछ कहने की कोशिश की. शायर ने क्या कहा है शेर के किस लफ्ज़ पर स्ट्र्स देना है. छोटी छोटी तान मुरकी हो लेकिन शेर खराब न हो आदि ख़ास मुद्दों पर ध्यान दिया.ग़ज़ल जैसी हसीं चीज़ में "क्रूड" ओर्केस्ट्रा का इस्तेमाल ज़रूरी नहीं इसलिए मैंने सितार, सारंगी, बांसुरी, तानपुरा स्वरमंडल के साथ धुनें बांधी.".

खय्याम साहब ने बहुत कम फिल्मों में काम किया है पर जितना भी किया गजब का किया. गैर फ़िल्मी संगीत का भी एक बड़ा खजाना है खय्याम के सुर संसार में. इन पर हम महफिले-ग़ज़ल में हम विस्तार से चर्चा करते रहेंगें. आज तो हम आपके लिए कुछ और लेकर आये हैं. उपर दी गयी सूची में यदि आप गौर से देखें तो एक नाम "मिस्सिंग" है. वैसे तो जानकार उमराव जान को उनका सबसे बेहतर काम मानते हैं पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनके "रजिया सुलतान" के गाने सबसे अधिक पसंद हैं. कोई ख़ास कारण नहीं है, क्योंकि खय्याम साहब के लगभग सभी गीत मेरे प्रियकर हैं, पर पता नहीं क्यों रजिया सुलतान के गीतों में एक अलग सा ही नशा मिलता है, हर बार जब भी इन्हें सुनता हूँ. लता जी की दिव्य आवाज़ के अलावा एक "चमकती हुई तलवार" सी आवाज़ भी है इन गीतों में, जी हाँ आपने सही पहचाना- ये हैं कब्बन मिर्जा साहब.

कब्बन मिर्जा साहब मुंबई ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े हुए थे, जब कमाल अमरोही साहब ने उन्हें रजिया सुलतान में गायक चुना. पर जाने क्या वजह रही कि कब्बन के बहुत अधिक गीत उसके बाद नहीं सुनने को मिले. बहरहाल रजिया सुलतान में उनके गाये दोनों ही गीत संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा ताजे रहेंगे. रजिया सुलतान के "ए दिले नादान" और "जलता है बदन" तो आप अक्सर सुनते ही रहते हैं. आज सुनिए कब्बन मिर्जा की आवाज़ में वो दो गीत जो कहीं रेडियो आदि पर भी बहुत कम सुनने को मिलता है. "आई जंजीर की झंकार..." और "तेरा हिज्र मेरा नसीब है...." दो ऐसे गीत हैं, जो कलेजे को चीर कर गुजर जाते हैं. उस पर कब्बन की आवाज़ जैसे दूर सहराओं से कोई दिल निकालकर सदा दे रहा हो. एक और गीत है इसी फिल्म में लता की आवाज़ में "ख्वाब बन कर कोई आएगा तो नीद आयेगी...." वाह...क्या नाज़ुक मिजाज़ है....बिलकुल वैसे ही है इस गीत का संयोजन जैसा कि "कहीं एक नाज़ुक सी लड़की..." का है. कोई भी वाध्य अतिरिक्त नहीं. सब कुछ नापा तुला....और भी दो गीत हैं इस फिल्म में जो यकीनन आपने बहुत दिनों से नहीं सुना होगा. दोनों ही उत्तर भारत के लोक धुनों पर आधारित विवाह के गीत हैं -"हरियाला बन्ना आया रे..." और "ए खुदा शुक्र तेरा...शुक्र तेरा..".

तो चलिए दोस्तों इस रविवार सुबह की कॉफी का आनंद खय्याम साहब और कब्बन मिर्जा के साथ लें, फिल्म रजिया सुलतान के इन गीतों को सुनकर -

आई ज़ंजीर की झंकार....(कब्बन मिर्जा)


तेरा हिज्र मेरा नसीब है...(कब्बन मिर्जा)


ख्वाब बन कर कोई आएगा... (लता)


ए खुदा शुक्र तेरा...


हरियाला बन्ना आया रे...




"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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