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Friday, January 11, 2013

मासिक पत्रिका ‘आहा! ज़िंदगी’ का संगीत विशेषांक है बेहद खास


मासिक पत्रिका ‘आहा! ज़िंदगी’ का दिसम्बर, 2012 अंक : एक टिप्पणी



मासिक पत्रिका ‘आहा! ज़िंदगी’ का दिसम्बर, 2012 अंक पढ़ा, संगीतमय हो गया। वास्तव में भास्कर को आलोकजी और प्रकाशमान कर रहे हैं। ‘एक धुन ज़िंदगी की’ एवं ‘जीवन संगीत सुनें’ शीर्षक मोहक बन पड़े हैं। इस अंक ने मुझे दो-तीन लेखों की ओर आकर्षित किया। ‘धरा-मेरु सब डोलिहैं, तानसेन की तान’ और ‘बहती रही है सुर सरिता’ – दोनों लेख के लेखक बधाई के पात्र हैं। पढ़ने पर लगा कि उन्हें तथ्य जुटाने में कितना अध्ययन और परिश्रम करना पड़ा होगा। भाई विनोद पाठक के लेख द्वारा मालूम हुआ कि प्रचलित (कुछ परिवर्तन के उपरान्त) गणेश वन्दना के मूल रचयिता संगीत सम्राट तानसेन थे। परन्तु यह पढ़कर आश्चर्य हुआ कि राग मेघ मल्हार एक धोबन ने गाया था। कुछ पुस्तकों में मैंने यह पढ़ा है कि तानी नामक महिला ने यह राग गाया था। ये तथ्य किंवदंतियों पर आधारित है, अतः इनमे धारणाएँ भिन्न हो सकती हैं। तानसेन के बारे में इस लेख के माध्यम से मेरी जानकारी में वृद्धि हुई है। भाई कृष्णमोहन मिश्र के लेख ‘बहती रही है सुर सरिता’ में संगीत की यात्रा को एक पुरातत्ववेत्ता की दृष्टि से विवेचित किया गया है। अथक परिश्रम द्वारा लिखा गया ऐसा खोजपूर्ण लेख कभी-कभी ही पढ़ने को मिलता है। डा. राधिका उमड़ेकर बुधकर ने भी लुप्त होते वाद्यों का सचित्र और विस्तृत परिचय दिया, साधुवाद। इस अंक में भारतीय रागदारी संगीत पर ही नहीं, बल्कि अन्य प्रचलित संगीत शैलियों पर भी सामग्री दी गई है। फिल्म संगीत के सुनहरे अतीत का दिग्दर्शन कराता सुजोय चटर्जी का लेख ‘कहाँ गई वो धुन, वो नगमें’, युनूस खान का लेख ‘कुछ ऐसे आए परदे पर गीत’ और सजीव सारथी का लेख ‘आवाज़ की दुनिया के दोस्तों...’ खोजपूर्ण हैं। इस अंक में उन सभी कलाकारों के चित्र भी प्रस्तुत किए गए हैं जिन्हें आज की युवा पीढ़ी सम्भवतः केवल नाम से ही जानती है। वास्तव में ‘आहा! ज़िंदगी’ का यह अंक संग्रहणीय है।

‘आहा! ज़िंदगी’ के अनेक विषयों पर अंक-विशेषांक प्रकाशित हुए, हो रहे है और होते भी रहेंगे। क्या कभी हास्य विशेषांक और व्यंग्य विशेषांक भी प्रकाशित होंगे? आज मानव अपनी व्यस्तता के कारण हँसना भूल सा गया है। इन विषयों पर विशेषांक पढ़ कर मन हल्का होगा और मैं अनुगृहीत।
वरिष्ठ रंगकर्मी और संगीत समीक्षक श्री एम.एन. गुर्जर (वाराणासी) की इस टिपण्णी के बाद किसी भी संगीत प्रेमी के मन में कोई संदेह नहीं बचा होगा कि उनके लिए 'अहा जिंदगी' का ये संगीत विशेषांक किस हद तक सहेज कर रखने योग्य है। रेडियो प्लेबैक इण्डिया के श्रोताओं के लिए इस अंक की एक और उल्लेखनीय बात ये है कि इस अंक में रेडियो प्लेबैक के तीन संस्थापक सदस्यों के भी आलेख मौजूद हैं। खैर पूरा अंक तो आप खरीद कर पढेंगें ही, अभी के लिए आप को छोड़ते हैं इन अंक में प्रकाशित इन तीन आलेखों के साथ। ये चित्र फोर्मेट में हैं आप इन्हें डाउनलोड कर व्यू का साइज़ बढाकर पढ़ पायेंगें।

आवाज़ की दुनिया के दोस्तों (सुनने सुनाने का सुरीला सिलसिला ) 
















कहाँ गयी वो धुन वो नगमें 




बहती रही है सुर-सरिता








Saturday, June 16, 2012

प्लेबैक वाणी (3) -शंघाई, टोला और आपकी बात

संगीत समीक्षा - शंघाई



खोंसला का घोंसला हो या ओए लकी लकी ओए हो, दिबाकर की फिल्मों में संगीत हटकर अवश्य होता है. उनका अधिक रुझान लोक संगीत और कम लोकप्रिय देसिया गीतों को प्रमुख धारा में लाने का होता है. इस मामले में ओए लकी का संगीत शानदार था, तू राजा की राजदुलारी और जुगनी संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा ताज़े रहेंगें जाहिर है उनकी नयी फिल्म शंघाई से भी श्रोताओं को उम्मीद अवश्य रहेगी. अल्बम की शुरुआत ही बेहद विवादस्पद मगर दिलचस्प गीत से होती है जिसे खुद दिबाकर ने लिखा है. भारत माता की जय एक सटायर है जिसमें भारत के आज के सन्दर्भों पर तीखी टिपण्णी की गयी है. सोने की चिड़िया कब और कैसे डेंगू मलेरिया में तब्दील हो गयी ये एक सवाल है जिसका जवाब कहीं न कहीं फिल्म की कहानी में छुपा हो सकता है, विशाल शेखर का संगीत और पार्श्व संयोजन काफी लाउड है जो टपोरी किस्म के डांस को सप्पोर्ट करती है. विशाल ददलानी ने मायिक के पीछे जम कर अपनी कुंठा निकाली है. अल्बम का दूसरा गीत एक आइटम नंबर है मगर जरा हटके. यहाँ इशारों इशारों में एक बार फिर व्यंगात्मक टिप्पणियाँ की गयी है, जिसे समझ कर भरपूर एन्जॉय किया जा सकता है.  इम्पोर्टेड कमरिया का नौटकी नुमा अंदाज़ श्रोताओं को रास आ सकता है. गीतकार कुमार ने अच्छे शब्द बुने हैं दुआ गीत के लिए वहीँ नंदनी श्रीकर की आवाज़ अच्छी जमी है भरे नैना गीत में. खुदाया अल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत प्रतीत होता है. इस सूफी अंदाज़ के गीत में श्रोताओं को काफी गहराई नज़र आएगी. मोर्चा गीत संभवता फिल्म के क्लाईमेक्स में आता होगा जहाँ, क्रांति का बिगुल है और अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का जज्बा दिखाता रोष है, ये गीत अन्ना और उनकी टीम को निश्चित ही प्रेरित करेगा. भगवान विष्णु के १००० नामों की ध्वनि है मंत्र विष्णु सहस्र्नामम में, जिसको प्रमुख धारा की एक बॉलीवुड अल्बम में शामिल करना वाकई हिम्मत का काम है. विशाल शेखर यहाँ कहानी वाला जादू तो यहाँ नहीं रच पाए मगर निराश भी नहीं करते. कुल मिलाकर शंघाई के संगीत को रेडियो प्लेबैक की और से दी जा रही है २.८ की रेटिंग  


पुस्तक चर्चा - टोला




पिकरेस्क (picaresque) यानी कि स्लमडोग मिलेनियर सरीखी कहानियों का चलन हर भाषा के साहित्य में मिलता है. ऐसा ही एक उपन्यास है रमेश दत्त दुबे लिखित "टोला". यहाँ ये कहानी इस श्रेणी की अन्य कहानियों जैसे निराला की "बिल्लेसुर बकरिहा" और "कुल्लीभाट" या फिर केदारनाथ अग्रवाल की "पतिया" जैसे उपन्यासों से अलग इस मामले में भी है कि ये व्यक्ति केंद्रित न होकर समूह केंद्रित अधिक है. बकौल कांति कुमार जैन रमेश के टोले में रहने वाले वो लोग हैं जो समाज के सबसे निचले स्तर पर है या कहें कि हाशिए पर हैं, उनके होने न होने से किसी को कुछ फरक नहीं पड़ता, वो बीडी और अवैध शराब बनाते हैं, गर्भपात करवाते हैं, स्त्रियां जंगल से लकड़ी बीन कर लाने, देह व्यापार करने, लड़ने झगडने और पति की मार खाने के लिए ही जन्म लेती है यहाँ. बाढ़, सूखा और महामारी में कभी पूरा का पूरा टोला खतम हो जाता है मगर कुछ दिनों बाद फिर से बस भी जाता है. किसी बेहतर जीवन का न कोई वादा, न कोई यकीं, न कोई उम्मीद...मगर लेखक इन घुप्प अंधेरों में भी कहीं मानवीय संवेदना तलाश रहा है. दमयंती और मर्दन के प्रेम में जैसे कोई दबी हुई आस टिमटिमा रही है. लेखक ने अपने रियलिस्टिक अप्रोच से पाठकों को बाँध कर रखा है. पृथ्वी का टुकड़ा और गांव का कोई इतिहास नहीं होता जैसे काव्य संग्रह रचने वाले रमेश दत्त दुबे का ये उपन्यास अँधेरी गलियों में जिंदगी के सहर की तलाश है, जो कुछ अलग किस्म का साहित्य पढ़ने को इच्छुक पाठकों को पसंद आ सकती है. उपन्यास के प्रकाशक हैं राधाकृष्ण प्रकाशन और कुल १०७ पृष्ठों की इस उपन्यास की कीमत है १५० रूपए मात्र    


और अंत में आपकी बात, अमित और दीपा तिवारी के साथ

 

Wednesday, May 30, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (1) -इश्क्जादे और बंद कमरा

संगीत समीक्षा 
अल्बम - इश्क्जादे 
संगीत - अमित त्रिवेदी






पुस्तक चर्चा 
पुस्तक - बंद कमरा 
मूल लेखिका - सरोजिनी साहू
अनुवाद - दिनेश माली 






आपकी बात - अमित तिवारी के साथ 




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