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Wednesday, May 20, 2009

पतझर सावन बसंत बहार...अनुराग शर्मा के काव्य संग्रह पर पंकज सुबीर की समीक्षा


पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा
पुस्तक - पतझर सावन बसंत बहार (काव्य संग्रह)
लेखक - अनुराग शर्मा और साथी (वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया)
समीक्षक - पंकज सुबीर


पिट्सबर्ग अमेरिका में रहने वाले भारतीय कवि श्री अनुराग शर्मा का नाम वैसे तो साहित्‍य जगत और नेट जगत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है । किन्‍तु फिर भी यदि उनकी कविताओं के माध्‍यम से उनको और जानना हो तो उनके काव्‍य संग्रह पतझड़, सावन, वसंत, बहार को पढ़ना होगा । ये काव्‍य संग्रह छ: कवियों वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया और अनुराग शर्मा की कविताओं का संकलन है । यदि अनुराग जी की कविताओं की बात की जाये तो उन कविताओं में एक स्‍थायी स्‍वर है और वो स्‍वर है सेडनेस का उदासी का । वैसे भी उदासी को कविता का स्‍थायी भाव माना जाता है । अनुराग जी की सारी कविताओं में एक टीस है, ये टीस अलग अलग जगहों पर अलग अलग चेहरे लगा कर कविताओं में से झांकती दिखाई देती है । टीस नाम की उनकी एक कविता भी इस संग्रह में है ’’एक टीस सी उठती है, रात भर नींद मुझसे आंख मिचौली करती है ।‘’

अनुराग जी की कविताओं की एक विशेषता ये है कि उनकी छंदमुक्‍त कविताएं उनकी छंदबद्ध कविताओं की तुलना में अधिक प्रवाहमान हैं । जैसे एक कविता है ‘जब हम साथ चल रहे थे तक एकाकीपन की कल्‍पना भी कर जाती थी उदास’ ये कविता विशुद्ध रूप से एकाकीपन की कविता है, इसमें मन के वीतरागीपन की झलक शब्‍दों में साफ दिखाई दे रही है । विरह एक ऐसी अवस्‍था होती है जो सबसे ज्‍यादा प्रेरक होती है काव्‍य के सृजन के लिये । विशेषकर अनुराग जी के संदर्भ में तो ये और भी सटीक लगता है क्‍योंकि उनकी कविताओं की पंक्तियों में वो ‘तुम’ हर कहीं नजर आता है । ‘तुम’ जो कि हर विरह का कारण होता है । ‘तुम’ जो कि हर बार काव्‍य सृजन का एक मुख्‍य हेतु हो जाता है । ‘घर सारा ही तुम ले गये, कुछ तिनके ही बस फेंक गये, उनको ही चुनता रहता हूं, बीते पल बुनता रहता हूं ‘ स्‍मृतियां, सुधियां, यादें कितने ही नाम दे लो लेकिन बात तो वही है । अनुराग जी की कविताओं जब भी ‘तुम’ आता है तो शब्‍दों में से छलकते हुए आंसुओं के कतरे साफ दिखाई देते हैं । साफ नजर आता है कि शब्‍द उसांसें भर रहे हैं, मानो गर्मियों की एक थमी हुई शाम में बहुत सहमी हुई सी मद्धम हवा चल रही हो । जब हार जाते हैं तो कह उठते हैं अपने ‘तुम’ से ‘ कुछेक दिन और यूं ही मुझे अकेले रहने दो’ । अकेले रहने दो से क्‍या अभिप्राय है कवि का । किसके साथ अकेले रहना चाहता है कवि । कुछ नहीं कुछ नहीं बस एक मौन सी उदासी के साथ, जिस उदासी में और कुछ न हो बस नीरवता हो, इतनी नीरवता कि अपनी सांसों की आवाज को भी सुना जा सके और आंखों से गिरते हुए आंसुओं की ध्‍वनि भी सुनाई दे ।

एक कविता में एक नाम भी आया है जो निश्चित रूप से उस ‘तुम’ का नहीं हो सकता क्‍योंकि कोई भी कवि अपनी उस ‘तुम’ को कभी भी सार्वजनिक नहीं करता, उसे वो अपने दिल के किसी कोने में इस प्रकार से छुपा देता है कि आंखों से झांक कर उसका पता न लगाया जा सके । "पतझड़ सावन वसंत बहार" संग्रह में अनुराग जी ने जो उदासी का माहौल रचा है उसे पढ़ कर ही ज्‍यादा समझा जा सकता है । क्‍योंकि उदासी सुनने की चीज नहीं है वो तो महसूसने की चीज है सो इसे पढ़ कर महसूस करें ।

इसी संग्रह से पेश है कुछ कवितायें, पंकज सुबीर और मोनिका हठीला के स्वरों में -
एक टीस सी उठती है...


जब हम चल रहे थे साथ साथ...


मेरे ख़त सब को पढाने से भला क्या होगा...


जब तुम्हे दिया तो अक्षत था...


कुछ एक दिन और...


जिधर देखूं फिजा में रंग मुझको....


साथ तुम्हारा होता तो..


पलक झपकते ही...


कितना खोया कितना पाया....




Friday, January 9, 2009

"अमृता - इमरोज़"- रंजना भाटिया की नज़र में


पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा (अंक २)

अमृता इमरोज
लेखिका – उमा त्रिलोक
मूल्य – 120
प्रकाशक – पेंगुइन बुक्स इंडिया प्रा. लि. भारत
आईएसबीएन नं. – 0-14-309993-0


उमा त्रिलोक की किताब को पढ़ना मुझे सिर्फ़ इस लिए अच्छा नही लगा कि यह मेरी सबसे मनपसंद और रुह में बसने वाली अमृता के बारे में लिखी हुई है ..बल्कि या मेरे इस लिए भी ख़ास है कि इसको इमरोज़ ने ख़ुद अपने हाथो से हस्ताक्षर करके मुझे दिया है ...उमा जी ने इस किताब में उन पलों को तो जीवंत किया ही है जो इमरोज़ और अमृता की जिंदगी से जुड़े हुए बहुत ख़ास लम्हे हैं साथ ही साथ उन्होंने इस में उन पलों को समेट लिया है जो अमृता जी की जीवन के आखरी लम्हे थे. और उन्होंने हर पल उस रूहानी मोहब्बत के जज्बे को अपनी कलम में समेट लिया है

फ़िर सुबह सवेरे
हम कागज के फटे हुए टुकडों की तरह मिले
मैंने अपने हाथ में उसका हाथ लिया
उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया

और फ़िर हम दोनों एक सेंसर की तरह हँसे
और फ़िर कागज को एक ठंडी मेज पर रख कर
उस सारी नज़्म पर लकीर फेर दी !

मैंने इस किताब को पढ़ते हुए इसके हर लफ्जे को रुह से महसूस किया एक तो मैं उनके घर हो कर आई थी यदि कोई न भी गया हो तो वह इस किताब को पढ़ते हुए शिद्दत से अमृता के साथ ख़ुद को जोड़ सकता है ...उनके लिखे लफ्ज़ अमृता और इमरोज़ की जिंदगी के उस रूहानी प्यार को दिल के करीब ला देते हैं ..जहाँ वह लिखती है इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता जी की कविताओं में, किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ दिखायी देता है ..एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे सामजिक मंजूरी की जरुरत नही पड़ती है ...

मैं एक लोकगीत
बेनाम ,हवा में खड़ा
हवा का हिस्सा
जिसे अच्छा लगूं
वो याद कर ले
जिसे और अच्छा लगूं
वो अपना ले --
जी में आए तो गा भी ले
में एक लोकगीत
जिसको नाम की
जरुरत नही पड़ी...


प्यार के कितने रंग हैं और कितनी दिशाएँ और कितनी ही सीमायें हैं...कौन जान सकता है...

उमा जी का हर बार अमृता जी के यहाँ जाना रिश्तो की दुनिया का एक नया सफर होता...यह उन्होंने न केवल लिखा है बलिक इस को उनके लिखे में गहराई से महसूस भी किया जा सकता है...इस किताब में अमृता का अपने बच्चो के साथ रिश्ता भी बखूबी लिखा है उन्होंने..और इमरोज़ से उनके बच्चो के रिश्ते को बखूबी दर्शाया है लफ्जों के माध्यम से..उमा उनसे आखरी दिनों में मिली जब वह अपनी सेहत की वजह से परेशान थी तब उमा जी जो की रेकी हीलर भी है इस मध्याम से उनके साथ रहने का मौका मिला जिससे वह हर लम्हे को अपनी इस किताब में लिख पायी अपने आखरी दिनों की कविता "मैं तेनु फेर मिलांगी" जो उन्होंने इमरोज़ के लिए लिखी थी उसका अंगेरजी में अनुवाद करने को बोला था

इमरोज़ के भावों को उस आखरी वक्त के लम्हों को बहुत खूबसूरती से उन्होंने लिखा है...सही कहा है उमा जी ने की प्यार में मन कवि हो जाता है वह कविता को लिखता ही नही कविता को जीता है तभी उमा के संवेदना जताने पर इमरोज़ कहते हैं कि एक आजाद रुह जिस्म के पिंजरे से निकल कर फ़िर से आज़ाद हो गई...

अमृता इमरोज़ के प्यार को रुह से महसूस करने वालों के लिए यह किताब शुरू से अंत तक अपने लफ्जों से बांधे रखती है...और जैसे जैसे हम इस के वर्क पलटते जाते हैं उतने ही उनके लिखे और साथ व्यतीत किए लम्हों को ख़ुद के साथ चलता पाते हैं...

आज से कुछ साल पहले अमृता इमरोज़ ने समाज को धता बता कर साथ रहने का फैसला किया था. यह दस्तावेज है उनकी जुबानी उनकी कहानी का..इमरोज़ कहते हैं..."एक सूरज आसमान पर चढ़ता है. आम सूरज सारी धरती के लिए. लेकिन एक सूरज ख़ास सूरज सिर्फ़ मन की धरती के लिए उगता है,इस से एक रिश्ता बन जाता है,एक ख्याल,एक सपना,एक हकीक़त..मैंने इस सूरज को पहली बार एक लेखिका के रूप में देखा था,एक शायरा के रूप में,किस्मत कह लो या संजोग,मैंने इस को ढूंढ़ कर अपना लिया,एक औरत के रूप में,एक दोस्त के रूप में,एक आर्टिस्ट के रूप में,और के महबूबा के रूप में !"

कल रात सपने में एक
औरत देखी
जिसे मैंने कभी नही देखा था
इस बोलते नैन नक्श बाली को
कहीं देखा हुआ है ..

कभी कभी खूबसूरत सोचे
खूबसूरत शरीर भी धारण कर लेती है...




प्रस्तुति -रंजना भाटिया

Thursday, November 27, 2008

नए राग से बांधे अक्सर बिछडे स्वर टूटी सरगम के...

हिन्दी ब्लॉग जगत पर पहली बार - पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा

पुस्तक - साया (काव्य संग्रह)
लेखिका - रंजना भाटिया "रंजू"
समीक्षक - दिलीप कवठेकर


युगों पहले जिस दिन क्रौंच पक्षी के वध के बाद वाल्मिकी के मन में करुणा उपजी थी, तो उनके मन की संवेदनायें छंदों के रूप में उनकी जुबान पर आयी, और संभवतः मानवी सभ्यता की पहली कविता नें जन्म लिया.तब से लेकर आज तक यह बात शाश्वत सी है, कि कविता में करुणा का भाव स्थाई है. अगर किसी भी रस में बनी हुई कविता होगी तो भी उसके अंतरंग में कहीं कोई भावुकता का या करुणा का अंश ज़रूर होगा.

रंजना (रंजू) भाटिया की काव्य रचनायें "साया" में कविमन नें भी यही मानस व्यक्त किया है,कहीं ज़ाहिर तो कहीं संकेतों के माध्यम से. इस काव्यसंग्रह "साया" का मूल तत्व है -

ज़िंदगी एक साया ही तो है,
कभी छांव तो कभी धूप ...


मुझे जब इस कविता के पुष्पगुच्छ को समीक्षा हेतु भेजा गया, तो मुझे मेरे एहसासात की सीमा का पता नहीं था. मगर जैसे जैसे मैं पन्ने पलटता गया, अलग अलग रंगों की छटा लिये कविताओं की संवेदनशीलता से रु-ब-रु होने लगा, और एक पुरुष होने की वास्तविकता का और उन भावनाओं की गहराई का परीमापन करने की अपनी योग्यता, सामर्थ्य के कमी का अहसास हुआ.

जाहिर सी बात है. यह सन्मान, ये खुसूसियत मात्र एक नारी के नाज़ुक मन की गहराई को जाता है.मीठी मीठी मंद सी बयार लिये कोमल संवेदनायें, समर्पण युक्त प्रेम, दबी दबी सी टीस भरी खामोशी की अभिव्यक्ति, स्वप्नों की दुनिया की मासूमियत , इन सभी पहलूओं पर मात्र एक नारी हृदय का ही अधिपत्य हो सकता है. प्रस्तुत कविता की शृंखला ' साया 'में इन सभी विशेषताओं का बाहुल्य नज़र आता है.

कविता हो या शायरी हो, कभी उन्मुक्त बहर में तो कभी गेय बन्दिश में, कभी दार्शनिकता के खुले उत्तुंग आसमान में तो कभी पाठ्यपुस्तक की शैली हो, सभी विभिन्न रंगों में चित्रित यह भावचित्र या कलाकृति एक ही पुस्तक में सभी बातें कह जाती है, अलग अलग अंदाज़ में, जुदा जुदा पृष्ठभूमि में. मीरा का समर्पण है,त्याग की भावना है और साथ ही कमाल की हद तक मीर की अदबी रवानी और रिवायत भी.

आगे एक जगह फ़िर चौंक पडा़, कि सिर्फ़ स्त्री मन का ही स्वर नहीं है, मगर पुरुष के दिल के भीतर भी झांक कर, उसके नज़रीये से भी भाव उत्पत्ति की गई है . ये साबित करती है मानव संबंधों की विवेचना पर कवियत्री की पकड जबरदस्त है. साथ ही में विषयवस्तु पर उचित नियंत्रण और परिपक्वता भी दर्शाती है.

रन्जु जी के ब्लोग पर जा कर हम मूल तत्व की पुष्टि भी कर लेतें है, जब एक जगह हम राधा कृष्ण का मधुर चित्र देखते है, और शीर्षक में लिखा हुआ पाते हैं- मेरा पहला प्यार !!!

उनके प्रस्तुत गीत संग्रह के प्रस्तावना "अपनी बात" में वे और मुखर हो ये लिखती हैं कि:

"जीवन खुद ही एक गीत है, गज़ल है, नज़्म है. बस उसको रूह से महसूस करने की ज़रूरत है. उसके हर पहलु को नये ढंग से छू लेने की ज़रूरत है."

सो ये संग्रह उनके सपनों में आते, उमडते भावों की ही तो अभिव्यक्ति है, जीवन के अनुभव, संघर्ष, इच्छाओं और शब्दों की अभिव्यक्ति है.

मेरा भी यह मानना है, कि हर कवि या कवियत्री की कविता उसके दिल का आईना होती है. या यूं कहें कि कविता के शैली से, या बोलों के चयन से अधिक, कविता के भावों से हम कविहृदय के नज़दीक जा सकते है, और तभी हम साक्षात्कार कर पाते हैं सृजन के उस प्रवाह का, या उसमें छिपी हुई तृष्णा के की सांद्रता का. तब जा कर कवि और कविता का पाठक से एकाकार हो रसोत्पत्ति होती है, और इस परकाया प्रवेश जैसे क्रिया से आनंद उत्सर्ग होता है. व्यक्ति से अभिव्यक्ति का ये रूपांतरण या Personification ही कविता है.

अब ज़रा कुछ बानगी के तौर पर टटोलें इस भावनाओं के पिटारे को:

संवेदना-

दिल के रागों नें,
थमी हुई श्वासों ने,
जगा दी है एक संवेदना......
(Sayaa 7)

अजब दस्तूर-

ज़िन्दगी हमने क्या क्या न देखा,
सच को मौत के गले मिलते देखा
(Saayaa )

जाने किस अनजान डगर से
पथिक बन तुम चले आये...

काश मैं होती धरती पर बस उतनी
जिसके ऊपर सिर्फ़ आकाश बन तुम चल पाते....

ऐसा नहीं है कि यह कविता संग्रह संपूर्ण रूप से मुकम्मल है, या इसमें कोई कमी नहीं है.

जैसा कि इस तरह के प्रथम प्रस्तुतिकरण में अमूमन होता चला आया है, कि रंगों की या रसों की इतनी बहुलता हो जाती है, कि कभी कभी वातवरण निर्मिती नही हो पाती है, और पाठक कविता के मूल कथावस्तु से छिटका छिटका सा रहता है.मगर ये क्षम्य इसलिये है, कि इस तरह के संग्रह को किसी जासूसी नॊवेल की तरह आदि से लेकर अंत तक अविराम पढा़ नहीं जा सकता, वरन जुगाली की तरह संत गति से विराम के क्षणों में ही पढा़ जाना चाहिये.

हालांकि इन कविताओं में काफ़िया मिलाने का कोई यत्न नहीं किया गया है, ना ही कोई दावा है, मगर किसी किसी जगह कविता की लय बनते बनते ही बीच में कोई विवादी शब्द विवादी सुर की मानिंद आ जाता है, तो खटकता है, और कविता के गेय स्वरूप की संभावनाओं को भी नकारता है.

संक्षेप में , मैं एक कवि ना होते हुए भी मुझे मानवीय संवेदनाओं के कोमल पहलु से अवगत कराया, रंजु जी के सादे, सीधे, मगर गहरे अर्थ वाले बोलों नें, जो उन्होने चुन चुन कर अपने अलग अलग कविता से हम पाठकों के समक्ष रखे हैं. वे कहीं हमें हमारे खुदी से,स्वत्व से,या ब्रह्म से मिला देते है, तो कभी हमें हमारे जीवन के घटी किसी सच्ची घटना के अनछुए पहलु के दर्शन करा देते है.क्या यही काफ़ी नही होगा साया को पढने का सबसे बडा़ कारण?

पेश कर रहा हूँ अपनी आवाज़ में इस काव्य संग्रह से कुछ रचनाएँ -

"साया" - एक नर्मो नाज़ुक सा एहसास



अंतर्मन



एहसास



एक टुकडा आसमान




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