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Saturday, August 27, 2016

"एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है...", क्यों इन्दीवर ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 90
 

'एक तू ना मिला ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 90-वीं कड़ी में आज जानिए 1966 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ के मशहूर गीत "एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल इन्दीवर के और संगीत कल्याणजी-आनन्दजी का। 


बात उन दिनों की है जब इन्दीवर जी बम्बई नहीं आए थे। थोड़ी-थोड़ी शोहरत मिल रही थी कवि सम्मेलनों के कारण। मध्य प्रदेश में होने वाले कवि सम्मेलनों में उन्हें ख़ास तौर से बुलाया जाता था। आमदनी भी हो जाती थी, घर चल जाता था। फिर एक ऐसा दौर आया जब इनकी बहन और बहनोई ने इन्दीवर जी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ दबाव डाल कर इनका विवाह झांसी की रहने वाली एक लड़की से करा दिया जिसका नाम था पार्वति। बिल्कुल शादी नहीं करना चाहते थे इन्दीवर जी। इसी वजह से अनमने से रहने लगे पत्नी के साथ। और शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी से पीछा छुड़ाने की मनशा लिए तकरीबन बीस साल की उम्र में बम्बई भाग गए। बम्बई में दो साल तक संघर्षों के साथ भाग्य आज़माने की कोशिशें की। 1946 में फ़िल्म ’डबल फ़ेस’ में इन्दीवर जी के लिखे गीत पहली बार रेकॉर्ड हुए। किन्तु फ़िल्म चली नहीं। परिणाम यह हुआ कि इन्दीवर को जल्दी ही वापस अपने गाँव बरुवा लौट जाना पड़ा। अब भाग्य का खेल देखिए कि जिस पत्नी से पीछा छुड़ाने के लिए वो घर छोड़ कर भागे थे, अब उसी पत्नी से धीरे धीरे उनका लगाव और मोह होने लगा। और इसके चलते उन्होंने मन बना लिया कि वो उसे छोड़ कर कभी वापस नहीं जाएँगे। 

लेकिन उनकी पत्नी पार्वति को पता था कि उनका करीयर यहाँ इस गाँव में नहीं है। उनके हुनर की कद्र तो बम्बई में है। इसलिए धर्मपत्नी पार्वति देवी ने उन्हें वापस बम्बई जाने के लिए प्रेरित करना शुरु कर दिया। बहुत हौसला बढ़ाया। समझाया। बार बार कहा चले जाओ। और अन्त में उन्हें बम्बई लौट जाने के लिए राज़ी भी कर लिया। चले आए बम्बई। धीरे धीरे छोटी फ़िल्मों में गीत लिखने का काम भी मिलता गया। यह सिलसिला लगभग पाँच साल तक चलता रहा। अब इन्दीवर जी ने अपनी धर्मपत्नी पार्वति से गुज़ारिश की कि वो बम्बई आ जाए और साथ रह कर घर-परिवार को आगे बढ़ाए। परन्तु पार्वति देवी ने हमेशा के लिए बम्बई में रहने से इनकार कर दिया। पत्नी के इस इनकार का इन्दीवर जी को बहुत दुख हुआ, झटका लगा। वो पत्नी के ना करने से इतने नाराज़ हो गए कि उन्हें छोड़ दिया। छोड़ कर बम्बई चले आए। संघर्ष रंग लायी और 1951 में लिखे उनके गीत ने धूम मचा दी। फ़िल्म थी ’मलहार’ और गीत के बोल थे "बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी क़सम, प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम"। इन्दीवर जी बुलन्दियों पर पहुँच गए, मगर उनकी पत्नी से उनकी नाराज़गी ख़त्म नहीं हुई। और नतीजा यह हुआ कि वापस लौट कर कभी अपनी पत्नी के पास नहीं गए। 


इन्दीवार जी की नाराज़गी उनकी लिखी एक कविता में फूट पड़ी जब उन्होंने लिखा "जिसके लिए मैंने सब कुछ छोड़ा, वो ही  छोड़ के चल 
दी दिल मेरा तोड़ के चल दी"। जहाँ एक तरफ़ उनकी नाराज़गी रही, वहीं दूसरी तरफ़ शायद उनके मन में एक अपराधबोध भी ज़रूर रहा होगा पत्नी के प्रति अपने कर्तव्यों को ना कर पाने का। तभी उन्होंने कई गीत ऐसे लिखे जो फ़िल्मों की नायिकाओं की ज़ुबान के ज़रिए दुनिया तक पहुँचे। और इन तमाम गीतों में एक वियोगी पत्नी का दर्द छुपा हुआ रहा। एक पत्नी जिसके पति ने उसे बिना किसी ठोस कारण के छोड़ दिया हो, उसके दिल पर क्या बीतती है, उसके मन में कैसे भाव उठते हैं, उन्हें सकार करने की कोशिशें इन्दीवर साहब ने समय समय पर की। 1966 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ के गीत में उन्होंने लिखा "एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है, मेरा दिल ना खिला सारी बगिया खिले भी तो क्या है"। "तक़दीर की मैं कोई भूल हूँ, डाली से बिछड़ा हुआ फूल हूँ, साथ तेरा नहीं संग दुनिया चले भी तो क्या है", इस गीत का एक एक लफ़्ज़ जैसे उनकी पत्नी की तरफ़ ही इशारा करते हैं। संयोग से इसी गीत का एक सुखद संस्करण (happy version) भी लिखा गया था जिसके बोल थे "एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली, खिला जो मेरा दिल तो सारी बगिया खिली"। लेकिन उपहास देखिए कि "एक तू ना मिला" गीत ही ज़्यादा लोकप्रिय हुआ और लोगों के दिलों को ज़्यादा छुआ! 1968 में फ़िल्म ’सरस्वतीचन्द्र’ में इन्दीवर जी ने एक और ऐसा गीत लिखा "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए, प्यार से भी ज़रूरी कई काम है, प्यार सबकुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए"। और उनके ज़िन्दगी के इस घटना से सबसे ज़्यादा मिलता-जुलता गीत रहा 1970 की फ़िल्म ’सफ़र’ का - "हम थे जिनके सहारे वो हुए ना हमारे, डूबी जब दिल की नैया सामने थे किनारे"। ख़ैर, जो भी हुआ बुरा हुआ। ना इन्दीवर जी का परिवार आगे बढ़ पाया, और वो लड़की भी सारी ज़िन्दगी अकेली रही। बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई!!!




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, December 5, 2015

"जाँ की यह बाज़ी आख़िरी बाज़ी खेलेंगे हम..." - क्यों इस गीत की धुन चुराने पर भी अनु मलिक को दोष नहीं दिया जा सकता!


एक गीत सौ कहानियाँ - 71
 

'जाँ की यह बाज़ी आख़िरी बाज़ी खेलेंगे हम...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 71-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ के शीर्षक गीत "जाँ की यह बाज़ी आख़िरी बाज़ी खेलेंगे हम..." के बारे में जिसे अमित कुमार ने गाया था। बोल इंदीवर के और संगीत अनु मलिक का।

अनु मलिक
मेरे पोलैंड का सफ़र जारी है। आज एक आश्चर्यजनक बात हुई। कार्यालय में एक पोलिश कर्मचारी के मोबाइल का रिंग् टोन बज उठते ही मैं चौंक उठा। अरे, यह तो एक हिन्दी फ़िल्मी गीत की धुन है! याद करने में बिल्कुल समय नहीं लगा कि यह 1989 की हिट फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ के शीर्षक गीत की धुन है। बचपन में यह गीत बहुत बार रेडियो पर सुना है। मुझे यक़ीन हो गया कि इस गीत की धुन ज़रूर किसी विदेशी गीत या कम्पोज़िशन से प्रेरित या ’चोरित’ होगा जो अभी-अभी उस रिंग् टोन में सुनाई दी है। कार्यालय से वापस आकर जब गूगल पर खोजने लगा तो हैरान रह गया कि कहीं पर भी इस गीत के किसी विदेशी गीत से प्रेरित होने की बात नहीं लिखी है। ऐसे बहुत से वेबसाइट हैं जिनमें लगभग सभी प्रेरित गीतों की सूची दी गई है, और कहीं कहीं तो संगीतकारों के नाम के अनुसार क्रमबद्ध सूची दी गई है। उसमें अनु मलिक के प्रेरित गीतों की सूची में इस गीत को न पाकर एक तरफ़ हताशा हुई और दूसरी तरफ़ एक रोमांच सा होने लगा यह सोच कर कि एक ऐसे गीत की खोज की है जो विदेशी धुन से प्रेरित है पर किसी को अब तक इसका पता नहीं है, कम से कम इन्टरनेट पर तो नहीं! अब मुश्किल यह थी कि कैसे पता लगाएँ, कहीं कोई सूत्र मिले भी तो कैसे मिले? ’आख़िरी बाज़ी’ के गीत की धुन को लगातार गुनगुनाते हुए अनु मलिक के प्रेरित गीतों की सूची को ध्यान से देख ही रहा था कि एक गीत पे जाकर मेरी नज़र टिक गई। गीत था 1995 की मशहूर फ़िल्म ’अकेले हम अकेले तुम’ का "राजा को रानी से प्यार हो गया..."। चौंक उठा, इस गीत की पहली पंक्ति की धुन भी तो कुछ हद तक ’आख़िरी बाज़ी’ के गीत के धुन से मिलती जुलती है। पाया कि यह गीत प्रेरित है 1972 की फ़िल्म ’The Godfather' के गीत "speak softly, love" से, जिसका एक instrumental version भी है जिसे ’The Godfather Theme' शीर्षक दिया गया है। संगीतकार हैं निनो रोटा।


निनो रोटा
यू-ट्युब पर ’The Godfather Theme' सुनने पर एक और रोचक बात पता चली। फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ का गीत हू-ब-हू इस धुन पर आधारित है, कोई प्रेरणा नहीं, सीधी चोरी है। दूसरी ओर "राजा को रानी से..." गीत में इस धुन से बेशक़ सिर्फ़ प्रेरणा ली गई है, चोरी नहीं। जो गीत हू-ब-हू नकल है (आख़िरी बाज़ी...), उसका कहीं कोई उल्लेख नहीं जबकि एक अच्छी प्रेरणा के उदाहरण (राजा को रानी से...) को लोगों ने चोरी करार दिया है। उसी सूची वाले वेब-पेज पर जब "Godfather" लिख कर खोजा तो पाया कि एक और गीत इसी धुन से प्रेरित है। और वह गीत है वर्ष 2000 की फ़िल्म ’आशिक़’ का गीत "तुम क्या जानो दिल करता तुमसे कितना प्यार...", जिसके संगीतकार हैं संजीव-दर्शन। इस तरह से ’Godfather' के उस धुन पर तीन-तीन हिन्दी फ़िल्मी गीत बन चुके हैं। एक रोचक तथ्य यह भी है कि जिस ’The Godfather Theme' की हम बात कर रहे हैं, वह धुन भी प्रेरित है (या कुछ समानता है) वर्ष 1951 के एक कम्पोज़िशन से। फ़िल्म ’High Noon' में दिमित्री तिओमकिन के संगीत निर्देशन में "Do not forsake me o my darling..." गीत की धुन को अगर ग़ौर से सुनें तो निनो रोटा के कम्पोज़िशन से हल्की समानता महसूस की जा सकती है। दिमित्री को अपने गीत के लिए ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। और निनो को क्या कोई पुरस्कार मिला? इसमें भी एक रोचक कहानी है। निनो रोटा ने ’The Godfather' में जो धुन बनाई थी, उस धुन को एक अलग अंदाज़ में (comedic version) उन्होंने 1958 की फ़िल्म ’Fortunella' के लिए बनाया था। ऑस्कर कमिटी ने शुरू-शुरू में 'The Godfather' की धुन को Best Original Score की श्रेणी के नामांकन में जगह दी थी, पर जैसे ही ’Fortunella' के धुन का सच्चाई सामने आई तो उसे पुरस्कार के अयोग्य ठहराया गया। इसके अगले ही साल जब ’The Godfather Part II' फ़िल्म बनी तो निनो रोटा ने यही धुन फिर एक बार प्रयोग कर एक नई कम्पोज़िशन बनाई। लेकिन इस बार ऑस्कर कमिटी ने न केवल उनकी धुन को नामांकित किया, बल्कि Best Score का पुरस्कार भी दिया।

निनो रोटा की यह धुन इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ समूचे विश्व में कि बहुत से कलाकारों ने इसे अपने-अपने ऐल्बमों में शामिल किया। जहाँ एक तरफ़ कलाकारों ने मूल गीत को ही अपनी आवाज़ में रेकॉर्ड करवाया, बहुत से कलाकार ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी-अपनी भाषाओं के बोलों को इस धुन पर फ़िट किया। अब एक नज़र ऐसे ही कुछ गीतों और भाषाओं पर डालते हैं। 

इटली - "Parla più piano..."
फ़्रांस - "Parle Plus Bas..."
यूक्रेन - "Skazhy scho lyubysh..."
यूगोस्लाविया - "Govori Tiše..."
हंगरी - "Gyöngéden ölelj át és ringass szerelem..."
कम्बोडिया - "Khum Joll Snaeha..."
स्लोवाकिया - "Býval som z tých..."
पोर्तुगल - "Fale Baixinho..."
इरान - "Booye Faryad..."

ये तो थे कुछ ऐसे उदाहरण जिनमें इस धुन पर अलग-अलग भाषाओं के गीत बने। इनके अलावा और भी असंख्य कलाकारों ने अपनी-अपनी साज़ पर इस धुन को instrumental के रूप में रेकॉर्ड करवाया। ऐसे में जहाँ दुनिया भर के कलाकारों ने इस धुन को गले लगाया, तो फिर क्या अनु मलिक या संजीव दर्शन पर इस धुन की चोरी का इलज़ाम लगाना ठीक होगा? फ़ैसला आप पर छोड़ते हैं, फ़िल्हाल सुनते हैं ’The Godfather' की धुन पर आधारित फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ का शीर्षक गीत। 


फिल्म आखिरी बाज़ी : 'जाँ की यह बाज़ी आखिरी बार...' : अमित कुमार : इन्दीवर : अनु मालिक





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, April 18, 2015

"फूल तुम्हें भेजा है ख़त में..." - किस प्रेम-पत्र से मिला था इस गीत को लिखने की प्रेरणा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 57
 

फूल तुम्हें भेजा है ख़त में...’




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 57-वीं कड़ी में आज जानिये 1968 की पुरस्कृत फ़िल्म 'सरस्वतीचन्द्र' के सदाबहार युगल गीत "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया था। 
 
पन्यासों को आधार बना कर बनने वाली फ़िल्मों में 1968 की नूतन और मनीष अभिनीत फ़िल्म ’सरस्वतीचन्द्र’ एक उल्लेखनीय फ़िल्म थी। गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी की इसी शीर्षक से मूल उपन्यास को फ़िल्म के परदे पर उतारा निर्देशक गोविन्द सरय्या ने। 19-वीं सदी की सामन्तवाद के पार्श्व पर लिखी इस उपन्यास के फ़िल्मी संस्करण को उस वर्ष के राष्ट्रीय और फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कारों में ख़ास जगह मिली। जहाँ सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़ी और सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए क्रम से नरिमन इरानी और कल्याणजी-आनन्दजी को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले, वहीं फ़िल्मफ़ेअर में सर्वश्रेष्ठ संवाद के लिए अली रज़ा को पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त फ़िल्मफ़ेअर में इस फ़िल्म के कई पक्षों को नामांकन मिले। फ़िल्म में इन्दीवर के लिखे गीत और कल्याणजी-आनन्दजी का संगीत वाकई यादगार साबित हुआ और फ़िल्म के सभी छह गीत आज तक लोकप्रिय हैं। "चंदन सा बदन चंचल चितवन" के दो संसकर्ण सहित अन्य चार गीत हैं "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए", "मैं तो भूल चली बाबुल का देस", "हमने अपना सब कुछ खोया" और एकमात्र योगल गीत "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है"। 

Lata, Indeevar & Mukesh
आज इस युगल गीत के बनने की दिलचस्प कहानी प्रस्तुत है। आज कलाकारों को उनकी कला की प्रतिक्रिया फ़ेसबूक, ट्विटर, एस.एम.एस, ई-मेल, वाट्स-ऐप आदि के माध्यम से मिल जाते हैं, पर एक ज़माना ऐसा था जब डाक के ज़रिए कलाकारों को ’fan mails'  आते थे। ख़तों के ज़रिए लोग अपने चहीते फ़नकारों को अपने दिल की बात, तारीफ़ें, शिकायतें पहुँचाते थे। कल्याणजी-आनन्दजी को भी ऐसे ख़त ढेरों मिलते थे। इसका एक कारण यह भी था कि लोग जानते थे कि कल्याणजी-आनन्दजी भाई केवल नए गायकों को ही नहीं बक्लि अभिनेताओं, निर्देशकों, लेखक-गीतकारों को भी मौका दिलवा देते हैं। तो एक बार यूं हुआ कि एक ख़त आया उनके घर जिस पर एक सफ़ेद फूल बना हुआ था और एक लिप-स्टिक से सिर्फ़ होंठ बने हुए थे। बस इतना ही था, कुछ और नहीं लिखा हुआ था सिवार "To Dear" के। कल्याणजी और आनन्दजी ने जब यह ख़त देखा तो दुविधा में पड़ गए कि यह प्रेम-पत्र भला किसके लिए आया है! इन्होंने इन्दीवर जी को यह ख़त दिखाया और कहा कि देखो ऐसे-ऐसे ख़त अब आने लगे हैं! इन्दीवर जी बोले कि "यह कौन है, होगी तो कोई लड़की, ये होंठ भी तो छोटे हैं तो लड़की की ही होगी"। उन्होंने पूछा कि किसके नाम पे आया है। आनन्दजी मज़ा लेते हुए कहा कि "To Dear" के नाम से आया है, आप अपना नाम लिख लो, मैं अपने नाम पे लिख लूँ या कल्याणजी भाई के नाम पे लिख देता हूँ। इन्दीवर जी बोले कि "इस पर तो गाना बन सकता है, फूल तुम्हें भेजा है ख़त में फूल नहीं मेरा दिल है, वाह वाह वाह वाह, अरे वाह वाह करो तुम!" आनन्दजी भाई ने कहा "और यह लिपस्टिक?" "भाड में जाए लिप-स्टिक, इसको आगे बढ़ाते हैं", इन्दीवर जी का जवाब था। और इस तरह से उन्होंने यह गाना पूरा लिख डाला।

Kalyanji-Anandji
गाना पूरा हो जाने के बाद बारी आई इसे धुन में पिरोने की। इस बारे में भी आनन्दजी ने अपने एक साक्षात्कार में विस्तृत जानकारी दी है। उन्हीं के शब्दों में पढ़िए इस गीत के रचना प्रक्रिया की आगे की दास्तान। "अब गाना बनने के बाद हुआ कि प, फ, ब, भ, ये आप या तो क्रॉस करके गाइए या लास्ट में आएगा। तो इसके लिए क्या करना पड़ता है, ये मुकेश जी गाने वाले थे, तो जब यह गाना पूरा बन गया तो यह लगा कि ऐसे सिचुएशन पे जो मंझा हुआ चाहिए, वह है कि भाई कोई सहमा हुआ कोई, डिरेक्ट बात भी नहीं की है, "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है, प्रियतम मेरे मुझको लिखना क्या यह तुम्हारे क़ाबिल है", मतलब वो भी एक इजाज़त ले रही है कि आपके लायक है कि नहीं। यह नहीं कि नहीं नहीं यह तो अपना ही हो गया, वो भी पूछ रही है मेरे से। तो ये मुकेश जी हैं तो पहले "फूल", "भूल", "भेजा" भी आएगा। मैंने इन्दीवर जी को बोला कि देखिए ऐसा ऐसा है। बोले कि तुम बनिये के बनिये ही रहोगे, कभी सुधरोगे नहीं तुम। जिसपे गाना हो रहा है, उनको क्या लगेगा? जिसने लिखा है उसको कितना बुरा लगेगा? ऐसे ही रहेगा, तो हमने बोला कि चलो ऐसे ही रखते हैं! तो उसको फिर गायकी के हिसाब से क्या कर दिया, उसमें ’ब्रेथ इनटेक’ डाल दिया, साँस लेके अगर गाया जाए तो "phool" होगा "PHoool" नहीं होगा। "फूल तुम्हें भेजा है..", बड़ा डेलिकेट है कि वह फूल है, बहुत नरम वस्तु। तो उस नरम वस्तु को नरम तरीके से ही गाया जाए! गीत को सुन कर आप महसूस कर सकते हैं कि कितनी नरमी और नाज़ुक तरीक़े से लता जी और मुकेश जी ने "फूल" शब्द को गाया है। तो इस तरह से यह गाना बन गया, और यह गाना आज भी लोगों को पसन्द आता है, क्यों आता है यह समझ में नहीं आता, यह इन्दीवर जी का कमाल है, लोगों का कमाल है, उस माहौल का कमाल है।"

आनन्दजी भाई ने सबकी तारीफ़ें की अपने को छोड़ कर। यही पहचान होती है एक सच्चे कलाकार की। कल्याणजी-आनन्दजी के करीअर का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है ’सरस्वतीचन्द्र’ जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय सम्मान मिला। अभी हाल ही में फ़िल्मकार संजय लीला भनसाली ने ’सरस्वतीचन्द्र’ को छोटे परदे पर उतारा है जिसमें मुख्य चरित्रों में गौतम रोडे और जेनिफ़र विन्गेट ने अभिनय किया। गोविन्द सरय्या की फ़िल्म तो फ़्लॉप रही, और भनसाली का टीवी धारावाहिक भी बहुत ख़ास कमाल नहीं दिखा सकी। कमाल की बात बस यह है कि फ़िल्म ’सरस्वतीचन्द्र’ के गीतों को संगीत रसिक आज तक भूल नहीं पाए हैं और आज भी अक्सर रेडियो चैनलों पर सुनाई दे जाता है "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में"। ख़त शीर्षक पर बनने वाले गीतों में निस्सन्देह यह गीत सर्वोपरि है।  लीजिए अब आप फिल्म 'सरस्वतीचन्द्र' का वही गीत सुनिए। 


फिल्म - सरस्वती चन्द्र : 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' : लता मंगेशकर और मुकेश : कल्याणजी आनंदजी




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र



Saturday, February 7, 2015

"हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." - जानिये, किस भागमभाग में रेकॉर्ड हुआ था यह गाना


एक गीत सौ कहानियाँ - 52
 

हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ- 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 52वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था।


1973 की एक ऑफ़-बीट फ़िल्म थी 'एक मुठी आसमाँ'। निर्माता, निर्देशक व लेखक विरेन्द्र सिन्हा निर्मित व निर्देशित यह एक कम बजट की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे विजय अरोड़ा, योगिता बाली, प्राण, राधा सलूजा, महमूद आदि। वीरेन्द्र सिन्हा मूलत: एक संवाद लेखक थे जिन्होंने 'हिमालय की गोद में', 'दो बदन', 'मिलन', 'कल आज और कल' और 'ज़हरीला इन्सान' जैसी चर्चित फ़िल्मों के संवाद लिखे हैं। बतौर निर्माता उनकी केवल तीन फ़िल्में आयीं - 'बुनियाद', 'ज़हरीला इन्सान' और 'एक मुट्ठी आसमाँ'। किशोर कुमार की आवाज़ के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वीरेन्द्र सिन्हा ने अपनी इन तीनों फ़िल्मों में उन्हें गवाया। 1972 की फ़िल्म 'बुनियाद' के बुरी तरह असफल होने के बाद, 'एक मुट्ठी आसमाँ' के लिए उनका बजट और कम हो गया। इतनी तंग हालत थी कि सोच विचार के बाद यह निर्णय लिया गया कि फ़िल्म में केवल एक ही गीत रखा जायेगा, जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी होगा और किशोर कुमार की आवाज़ में ही होगा। इस गीत के अलग अलग अन्तरे पूरे फ़िल्म में कई बार आते रहेंगे तो गीत की कमी पूरी होती रहेगी। इस एक गीत के लिए गीतकार इन्दीवर और संगीतकार मदन मोहन को कार्यभार सौंपा गया। फ़िल्म की कहानी और अलग-अलग सिचुएशन के हिसाब से इन्दीवर ने गीत के सारे अन्तरे लिखे और जब सारे अन्तरे और इन्टरल्यूड म्युज़िक को जोड़ा गया तो गीत की कुल अवधि बनी करीब करीब 9 मिनट और 25 सेकण्ड। गीत का एक हिस्सा प्राण पर फ़िल्माया गया और बाक़ी नायक विजय अरोड़ा पर। यह गीत बन कर तैयार हो गया, पर इस फ़िल्म से जुड़े सभी को केवल एक गीत वाली बात खटक रही थी। सभी को कम से कम एक डुएट गीत की ज़रूरत महसूस हो रही थी क्योंकि फ़िल्म में एक नहीं दो दो नायिका मौजूद थीं। ऐसे में जब इन्दीवर और मदन मोहन ने "प्यार कभी कम ना करना सनम" जैसा एक श्योर-शॉट हिट गीत बना डाले तो वीरेन्द्र सिन्हा भी इसे रेकॉर्ड और पिक्चराइज़ेशन  करने का फ़ैसला लिया। किशोर दा तो थे ही, पर इस युगल गीत के लिए लता मंगेशकर को गवाने का बजट विरेन्द्र सिन्हा के पास नहीं था। इसलिए वाणी जयराम को इस गीत के लिए चुन लिया गया जिन्होंने हाल ही में 'गुड्डी' में गीत गा कर हिन्दी फ़िल्म इण्डस्ट्री में हलचल पैदा कर दी थी। और यह डुएट फ़िल्माया गया विजय अरोड़ा और राधा सलूजा पर। तो इस तरह से 'एक मुट्ठी आसमाँ' में दो गीत रखे गये।

किशोर कुमार और मदन मोहन
अब ज़िक्र 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत के रेकॉर्डिंग की। मदन मोहन ने किशोर कुमार से रेकॉर्डिंग की बात की, उन्हें रेकॉर्डिंग की तारीख़ बतायी और किशोर कुमार ने उन्हें हाँ भी कर दी। जब रेकॉर्डिंग की तारीख़ करीब आयी तो किशोर कुमार बड़े धर्मसंकट में फँस गये। दरअसल बात यह थी कि रेकॉर्डिंग की जो तारीख़ तय हुई थी, उसी दिन किशोर कुमार को शाम चार बजे की फ़्लाइट से विदेश यात्रा पर जाना था। उन्हें शोज़ के लिए एक ओवरसीस ट्रिप पर जाना था। सिर्फ़ यही बात होती तो सुबह रेकॉर्डिंग ख़त्म करके वो शाम की फ़्लाइट पकड़ सकते थे, पर बात यह थी कि उसी दिन उन्होंने राहुल देव बर्मन को भी रेकॉर्डिंग के लिए सुबह का समय दे रखा था। इतनी बड़ी गड़बड़ किशोर दा ने कैसे की, यह अब बताना मुश्किल है। इतनी टाइट शिड्यूल के बावजूद उन्होंने ना तो मदन मोहन की रेकॉर्डिंग कैंसिल की और ना ही पंचम की। वो किसी को भी निराश नहीं करना चाहते थे और उन्हें पता था कि रेकॉर्डिंग कैंसिल करने का मतलब निर्माता के पैसों की बरबादी करना है, जो वो नहीं चाहते थे। ख़ैर, रेकॉर्डिंग का वह दिन आ गया। मदन मोहन के गाने की रेकॉर्डिंग 'फ़ेमस स्टुडियो' में होनी थी, और पंचम की रेकॉर्डिंग 'फ़िल्म सेन्टर' में। दोनों जगह एक दूसरे से काफ़ी दूर थे। किशोर कुमार को सुबह 11 बजे तक पंचम के साथ रेकोर्डिंग करनी थी और उसके बाद उन्हें मदन जी के रेकॉर्डिंग पर पहुँच जाना था। एयरपोर्ट पर विशेष सन्देश पहुँचाया भी गया था कि उन्हें 'चेक-इन' करने में विलम्ब हो सकता है, तो यह बात ध्यान में रखी जाये। 2 बजे तक रेकॉर्डिंग ख़त्म करके उन्हें सीधे एयरपोर्ट की तरफ़ निकलना था, ऐसी तैयारी के साथ किशोर दा घर से निकले थे। पर सब कुछ योजना के अनुसार कहाँ हो पाता है भला? पंचम की रेकॉर्डिंग शुरू तो समय पर ही हुई थी पर समय लम्बा खींच गया, और किशोर दा भी उसमें ऐसे मगन हो गए कि 11 कब बज गये उन्हें पता ही नहीं चला। नतीजा यह हुआ कि उन्हें मदन मोहन की रेकॉर्डिंग में जाने का ख़याल ही नहीं आया। उधर 'फ़ेमस स्टुडियो' में मदन मोहन रेकॉर्डिंग की सारी तैयारी कर किशोर का इन्तज़ार कर रहे थे। दो घन्टे तक इन्तज़ार करने पर जब किशोर कुमार नहीं आये तो मदन जी का पारा थोड़ा खिसकने लगा। अपने एक सहायक को बुलवाने भेजा। वो शख्स वहाँ पहुँचकर किशोर कुमार को जब बताया कि मदन साहब उनका स्टुडियो में इन्तज़ार कर रहे हैं गुस्से में, तो किशोर कुमार के होश ठिकाने आ गये। दोपहर हो चुकी थी। शाम को फ़्लाइट भी पकड़नी थी। और इधर गाने का कुछ काम बचा हुआ था। अब करें तो क्या करें! तब किशोर कुमार ने सोचा कि पंचम तो दोस्त है, उसे तो वो किसी न किसी तरह सम्भाल ही लेंगे, मगर मदन मोहन को सम्भालना भारी पड़ जायेगा। इसलिए वो पंचम के इधर-उधर होते ही चुपचाप पीछे के दरवाज़े से भागे और सीधे 'फ़ेमस स्टुडियो' पहुँच गये। वहाँ पहुँच कर मदन मोहन जी से माफ़ी माँगी, और रेकॉर्डिंग शुरू की। अब इधर जब पंचम को पता चला कि किशोर स्टुडियो में दिख नहीं रहे हैं तो उन्होंने किशोर की तलाश शुरू कर दी। काफ़ी देर खोजने के बाद पंचम को पता चला कि मदन जी का एक सहायक वहाँ आया था और उन्हें 'फ़ेमस स्टुडियो' ले गये हैं। अब पंचम भागे 'फ़ेमस स्टुडियो'। पहुँच कर देखा कि किशोर कुमार मदन जी का गाना रेकॉर्ड कर रहे थे। अब दोनो म्युज़िक डिरेक्टर्स को एक साथ देख कर किशोर कुमार डर गये। वो तुरन्त पंचम के पास आये और उनसे नुरोध किया कि उन्हें थोड़ा समय दे दो, बस इनका गाना पूरा करते ही तुम्हारे पास आता हूँ और तुम्हारा गाना पूरा करके ही मैं फ़्लाइट पकड़ूंगा। तो इस तरह किशोर ने पंचम को किसी तरह शान्त करके वापस भेज दिया, और मदन मोहन के पास जाकर बोले कि माफ़ कीजिये मैं आपकी रेकॉर्डिंग के बारे में भूल ही गया था और उधर पंचम का गाना भी अधूरा छोड़ कर आया हूँ; अगर हो सके तो थोड़ा जल्दी कर लीजिये ताकि विदेश जाने से पहले उसका गाना भी रेकॉर्ड हो जाये वरना वो अटक जायेगा। तब मदन मोहन ने फ़टाफ़ट रेकॉर्डिंग शुरू की और एक टेक में ही यह इतना लम्बा गीत रेकॉर्ड हो गया, और बन गया किशोर कुमार का एक मास्टरपीस गीत। किशोर वहाँ से फ़टाफ़ट पंचम के पास भागे और उनका गाना भी कम्प्लीट किया। और इस तरह भागमभाग में रेकॉर्ड हुए दो गीत। एक तो था "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ", पर पंचम का वह कौन सा गीत था यह मैं नहीं खोज पाया। क्या आप में से किसी को पता है कि वह दूसरा गीत कौन सा था जो उस दिन पंचम के वहाँ रेकॉर्ड हुआ था? आपको यदि राहुलदेव बर्मन के उस गीत की जानकारी हो तो नीचे दिये गए ई-मेल आई.डी. पर अवश्य सूचित करें। और अब आप 'एक मुट्ठी आसमाँ' का वह गीत सुनिए।

फिल्म एक मुट्ठी आसमाँ : 'हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...' : किशोर कुमार : संगीत मदन मोहन : गीत इन्दीवर 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, May 3, 2014

"आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये...", सच में नाज़िया और बिद्दु ने बात बना दी थी इस गीत में


एक गीत सौ कहानियाँ - 30
 

'आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये तो बात बन जाये...' 





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 30वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'क़ुर्बानी' के गीत "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये..." के बारे में।




नाज़िया हसन
बिद्दु
डिस्को, यूरो-डिस्को और इण्डि-पॉप के नीव रखवाने और इन्हें लोकप्रियता की बुलन्दियों तक पहुँचाने में जिन कलाकारों का नाम लिया जाता है, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है बिद्दु का। बिद्दु अप्पय्या का जन्म कर्नाटक में हुआ। 60 के दशक में उन्होंने अपना करीयर एक म्युज़िक बैण्ड के रूप में यहीं से शुरु किया पर जल्द ही इंग्लैण्ड स्थानान्तरित हो गए और एक म्युज़िक प्रोड्युसर के रूप में कार्य करने लगे। पाँच दशक लम्बे उनके करीयर में उन्होंने संगीतकार, गीतकार, गायक और निर्माता की भूमिकाएँ निभाईं और बेहद चर्चित व सफल रहे। उनके द्वारा स्वरबद्ध "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये..." गीत के बारे में जानने से पहले यह ज़रूरी है कि इस गीत से पहले के उनके संगीत यात्रा पर नज़र डाली जाये। उनके द्वारा निर्मित पहला हिट गीत 1969 में जापानीज़ बैण्ड 'The Tigers' के लिए आया। उसके बाद 1972 में अंग्रेज़ी फ़िल्म 'Embassy' में उनके द्वारा रचा साउण्डट्रैक सराहा गया। इसके बाद उनके शुरुआती डिस्को गीतों ने 70 के दशक के आरम्भिक वर्षों में ब्रिटिश क्लबों में लोकप्रियता हासिल किये। उन्हें पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति मिली 1974 में कार्ल डॉगलस द्वारा गाये "Kung Fu Fighting" गीत से जिसे उन्होंने प्रोड्युस और कम्पोज़ किया। दिलचस्प बात है कि उनके इस कम्पोज़िशन का प्रयोग लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1980 की फ़िल्म 'राम बलराम' में "यार की ख़बर मिल गई" गीत में किया। हैरत में डालने वाली एक और बात यह है कि "Kung Fu Fighting" के बनने के कई वर्ष पहले, 1966 में, तमिल संगीतकार एम. एस. विश्वनाथन ने तमिल फ़िल्म 'नदोदी' के लिए लगभग इसी धुन पर एक गीत कम्पोज़ किया था जिसके बोल थे "उलगम एलुगुम..."। क्या बिद्दु इस गीत से प्रेरित होकर "Kung Fu Fighting" की रचना की थी, कहना मुश्किल है। पर सच यही है कि इस गीत ने बिद्दु को विश्व भर में मशहूर बना दिया। इस गीत के एक करोड़ रेकॉर्ड्स बिके और यह न केवल एक 'all time best-selling singles' के रूप में मशहूर हुआ बल्कि इसने डिस्को संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यूरोप की तरफ़ से अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए यह पहला डिस्को गीत था, और इसने बिद्दु को सबसे ज़्यादा चर्चित ग़ैर-अमरीकी डान्स-म्युज़िक प्रोड्युसर की उपाधि दिला दी।

फिर इसके बाद बिद्दु कामयाबी की नई-नई ऊँचाइयाँ चढ़ते चले गए। बहुत सारे रेकॉर्ड्स बने, जिनमें कई बेस्ट-सेलर्स भी रहे। 70 के ही दशक के अन्त में पाश्चात्य डिस्को एशिया में भी लोकप्रिय होने लगा। भारत में बप्पी लाहिड़ी ने डिस्को को लोकप्रिय बनाया, 'डिस्को डान्सर' फ़िल्म इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण उदाहरण है। पर उस दौरान भारत में ऐसा कोई कलाकार नहीं था जिसे "डिस्को स्टार" कहा जा सके। और यही वजह 1979 में फ़िल्मकार फ़िरोज़ ख़ान को इंगलैण्ड ले गया बिद्दु के पास। फ़िरोज़ ख़ान चाहते थे कि उनकी अगली फ़िल्म 'कुर्बानी' में एक ऐसा गीत रहे जिसे सुनते ही लोग उससे जुड़ जाये और ज़ुबाँ-ज़ुबाँ पर फ़ौरन चढ़ जाये। फ़िल्म के मुख्य संगीतकार के रूप में कल्याणजी-आनन्दजी काम कर रहे थे, पर फ़िरोज़ ख़ान को जिस गीत की तलाश थी वो नहीं मिल पा रही थी। शुरु-शुरु में बिद्दु किसी हिन्दी फ़िल्मी गीत कपोज़ करने के लिए तैयार नहीं थे, पर सोच विचार के बाद फ़िरोज़ ख़ान के इस ऑफ़र को स्वीकारते हुए कहा कि शायद इससे मेरी माँ, जो कि भारत में है, ख़ुश हो जायेगी। बिद्दु को "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये" तैयार करने में समय नहीं लगा। इस गीत की धुन उनकी पहली कई धुनों से मेल खाती है। ख़ास कर 1976 की टिना चार्ल्स का हिट गीत "Dance Little Lady Dance" से इस गीत का स्वरूप काफ़ी हद तक मेल खाता है।


नाज़िया और ज़ोहेब
फिरोज खान
इन्हीं दिनो फ़िरोज़ ख़ान के एक दोस्त ने उनकी मुलाक़ात 15-वर्षीया नाज़िया हसन से करवाई लंदन की किसी पार्टी में। जिस तरह से बिद्दु मूल रूप से भारतीय थे, वैसे ही नाज़िया हसन पाक़िस्तानी मूल की थीं, और इंग्लैण्ड में पल-बढ़ रही थीं। 70 के दशक में नाज़िया ने पाक़िस्तान में बतौर बाल-गायिका कई गीत गा चुकी थीं। तो उस पार्टी में ख़ान साहब ने नाज़िया को गाते हुए सुना, उनकी आवाज़ उन्हें पसन्द आई, और नाज़िया से कहा कि वो बिद्दु के पास जा कर एक ऑडिशन दे आये। "आप जैसा कोई..." गीत के लिए जिस आवाज़ की ज़रूरत थी, वह आवाज़ नाज़िया के गले में बिद्दु ने पायी, और फ़ौरन इस गीत के लिए उन्हें चुन लिया। नाज़िया ने यह प्रस्ताव हाथों-हाथ ग्रहण किया। इन्दीवर के लिखे लगभग 3 मिनट 45 सेकण्ड्स अवधि के इस गीत को फ़िल्म में एक आइटम नंबर के रूप में दर्शाया गया और इसे ज़ीनत अमान पर फ़िल्माया गया है। नाज़िया हसन की आवाज़ नैज़ल थी। बिद्दु ने इको ईफ़ैक्ट के लिए इसे बैकट्रैक करने की सोची। लंदन में इस गीत की रेकॉर्डिंग हुई और फ़िल्म-संगीत इतिहास का यह वह पहला गीत था जिसकी रेकॉर्डिंग कुल 24 ट्रैक पर हुई। 1980 में रिलीज़ हुई 'क़ुर्बानी'। फ़िल्म सुपर-डुपर हिट हुई, और इसके गानें भी उतने ही लोकप्रिय हुए। "लैला ओ लैला" और "आप जैसा कोई" गीतों को सर्वाधिक लोकप्रियता मिली। नाज़िया हसन रातों-रात मशहूर हो गईं। सिर्फ़ भारत में ही नहीं, समूचे दक्षिण एशिया में इस गीत ने हलचल पैदा कर दी। उस वर्ष 'बिनाका गीतमाला' के वार्षिक काउण्टडाउन में 'क़ुर्बानी' के कुल चार गीत शामिल थे। 26 और 27 पायदान पर "अल्लाह को प्यारी है क़ुर्बानी" और "क्या देखते हो सूरत तुम्हारी" थे, 6 पर "लैला मैं लैला" तथा 4 पर रहा "आप जैसा कोई..."। इस गीत ने उस वर्ष कई मशहूर गीतों को पीछे छोड़ दिया जैसे कि "परदेसिया यह सच है पिया", "हमें तुमसे प्यार कितना", "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", "आनेवाला पल जानेवाला है", "जब छाये मेरा जादू" आदि। उस वर्ष फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ गायिका के लिए जिन पाँच गायिकाओं का नामांकन हुआ, वो सभी नई पौध की गायिकायें थीं। "आप जैसा कोई" के लिए नाज़िया तो थीं ही, इसी फ़िल्म की "लैला मैं लैला" के लिए कंचन, 'आप तो ऐसे न थे' फ़िल्म के "तू इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल है" के लिए हेमलता, 'गृहप्रवेश' फ़िल्म के "पहचान तो थी" के लिए चन्द्राणी मुखर्जी और 'प्यारा दुश्मन' फ़िल्म के "हरि ओम हरि" के लिए उषा उथुप के बीच टक्कर थी। और विजेता बनी नाज़िया हसन। नाज़िया न केवल पहली पाक़िस्तानी गायिका थीं जिसने किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गाया, बल्कि 15 वर्ष की आयु में फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार जीतने वाली सबसे कम आयु की गायिका होने का रेकॉर्ड भी कायम किया।

"आप जैसा कोई" की अपार सफलता को देखते हुए बिद्दु ने नाज़िया हसन और उनके भाई ज़ोहेब हसन को लेकर एक उर्दू पॉप ऐल्बम बनाने की सोची। इस तरह का कोई ऐल्बम इससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं आया था। बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब को उस समय के अमरीकी लोकप्रिय भाई-बहन जोड़ी 'The Carpenters' जैसी शक्ल देने की कोशिश की। बिद्दु ने "आप जैसा कोई" की तरह कुछ गीत कम्पोज़ कर 'डिस्को दीवाने' नामक ऐल्बम में जारी किया 1981 में। एशिया, दक्षिण अफ़्रीका और दक्षिण अमरीका के देशों में इसने ख़ूब लोकप्रियता हासिल की। तब तक कि यह एशिया की 'बेस्ट-सेलर' ऐल्बम रही है। हर कलाकार का अपना समय होता है, अपना दौर होता है जब वो आसमान की बुलन्दियों को छूता है। बिद्दु और नाज़िया का भी यह वही समय था। डिस्को की लोकप्रियता भी उस वक़्त सर चढ कर बोल रही थी। आज वह दौर गुज़र चुका है। नाज़िया भी अल्लाह को प्यारी हो चुकी हैं बहुत ही कम उम्र में। लेकिन जब-जब डिस्को के दौर का ज़िक्र होगा, तब-तब बिद्दु और नाज़िया हसन के इन गीतों का ज़िक्र होगा। और इस ज़िक्र में "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये" सबसे उपर आयेगा। बस, इतनी सी है इस गीत की कहानी! अब आप यह गीत सुनिए।



फिल्म - कुर्बानी : 'आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये...' : गायिका - नाज़िया हसन : संगीत - बिद्दू : गीत - इन्दीवर





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