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रविवार, 18 अक्तूबर 2009

रविवार सुबह की कॉफी और फीचर्ड एल्बम "जूनून" पर बात, दीपाली दिशा के साथ (१८)

कहते हैं कि संगीत एक नशा है, जादू है, जो सर चढ़ के बोलता है. यही नहीं संगीत आत्मा की आवाज है जो इंसान में जोश और जूनून पैदा कर देता है और लोगों तक शान्ति तथा सदभाव पहुँचाने का जरिया भी है. शायद कुछ इसी मकसद से पाकिस्तानी गायकों ने अपने बैंड का नाम ’जूनून’ रखा होगा. खैर उनका मकसद जो भी रहा हो लेकिन उनके संगीत में जूनून नजर आता है जो लोगों में भी एक भाव पैदा कर देता है. ’जूनून’ पाकिस्तान का एक प्रसिद्ध बैंड है. यूं तो पाकिस्तान के कई बैंड यहाँ हिन्दुस्तान में आये हैं लेकिन ’जूनून’ ने काफी ख्याति पायी है. पिछले दस सालों में जूनून बैंड की पाँच एल्बम आयीं हैं जिनमें से सभी ने धूम मचायी है. यह पाकिस्तान के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध बैंड है.

’जूनून’ बैंड के सदस्यों में सलमान अहमद, अली अज़मत और ब्रायन ओ शामिल हैं. ’तलाश’, ’इंकलाब’, आज़ादी, ’परवाज़’ और ’दीवार’ इनकी अब तक की एल्बमें है. जूनून ग्रुप की ’आज़ादी’ एल्बम ने सबसे ज्यादा धूम मचायी थी. इसके प्रसिद्ध होने का मुख्य कारण जूनून बैंड का सूफी के साथ रॉक का संगम होना है. ’आजादी’ का संगीत व गानों को सुनकर लगता है कि जूनून बैंड पूर्वी संगीत से प्रभावित है. इस एल्बम में तबला मुख्य रूप से प्रयुक्त हुआ है. इस एल्बम में जूनून बैंड ने अमेरिका के रिकार्डिंग एवं मिक्सिंग इंजीनियर जोन एली रॊबन्सन की सहायता से स्पेशल इफैक्ट डलवाये. जोन ही इस एल्बम के को-प्रड्यूसर भी हैं.

अल्बम के प्रसिद्ध गीतों में से एक "खुदी को कर" इकबाल की शायरी को रॉक स्टायल में पेश किया गया है. सभी शेरों को अच्छे अन्दाज में पिरोया गया है. शेरों को अपने हिसाब से फेर-बदल करने की वजह से उनकी संवेदना घट गयी है.अन्यथा संगीत अच्छा है. दिल में जोशो-जूनून भरने में बेहद असरदार है ये गीत.



’मेरी आवाज सुनो’ एक कव्वाली है. इसमें तम्बूरे के साथ गिटार का प्रयोग किया गया है यह गाने को कर्णप्रिय बना देता है. संगीत संयोजन गजब का है, और बोल ख़ास ध्यान आकर्षित करते हैं. "तेरे संग ज़माना सारा, खुदा है मेरे संग जालिम....". बेस गिटार का सुन्दर इस्तेमाल अंत में बेहद प्रभावित करता है.



’यार बिना’ भी एक कव्वाली ही है.तबले का जोरदार प्रयोग इस गीत को उत्साही बना देता है. इस गीत को सुनकर मजा आता है. गायकों ने पूरी उर्जा के साथ गीत को निभाया है, कुछ गीत कुछ धुन ऐसी होती है जिनकी प्रतिलिपियाँ आप बरसों से सुनते आ रहे हों, पर फिर भी उनका नशा कभी कम नहीं होता, ये भी कुछ उसी तरह का गीत है.



’सैयो नी’ इस एल्बम का सबसे प्रसिद्ध गीत है जो लोगों द्वारा बहुत पसंद किया गया. इस गीत का सूफीयाना अन्दाज बहुत आकर्षित करता है. एक शेर में एक अलग और उंडा बात कही गयी है, सूफी रॉक में ऐसा परफेक्ट संयोग जहाँ शब्द संगीत और गायिका तीनों का उत्कृष्ट मिलन हुआ हो बहुत कम सुना गया है. बेहतरीन गीत.

"क्या बशर की बिसात,
आज है कल नहीं..."
और

"छोड़ मेरी खता,
तू तो पागल नहीं..."

सुनिए -



’मुक गये’ गीत औसत है. कई जगह संगीत आवाज पर हावी हो जाता है जिससे बोल समझने में मशक्कत करनी पड़ती है. शब्द और गायिकी से विरह की पीडा जो सूफी गीतों का एक अहम् घटक भी है, को उभरने की अच्छी कोशिश की गयी है.



अंत में यही कहेंगे के एल्बम सुनने लायक है. बार-बार तो नहीं लेकिन परिवर्तन के लिये अच्छी है. ज्यादातर गीतों का संगीत व लय एक सा लगता है. संगीत कई-कई जगह हावी हो जाता है जिससे गायकों की आवाज दब जाती है. ’सैयो नी’ गीत के लिये इस एल्बम को जरूर सुनना चाहिए.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

रविवार, 20 सितंबर 2009

रविवार सुबह की कॉफी और एक फीचर्ड एल्बम पर बात, दीपाली दिशा के साथ (१६)

"क्या लिखूं क्या छोडूं, सवाल कई उठते हैं, उस व्यक्तित्व के आगे मैं स्वयं को बौना पाती हूँ" लताजी का व्यक्तित्व ऐसा है कि उनके बारे में लिखने-कहने से पहले यही लगता है कि क्या लिखें और क्या छोडें. वो शब्द ही नहीं मिलते जो उनके व्यक्तित्व की गरिमा और उनके होने के महत्त्व को जता सकें. 'सुर सम्राज्ञी' कहें, 'भारत कोकिला' कहें या फिर संगीत की आत्मा, सब कम ही लगता है. लेकिन मुझे इस बात पर गर्व है कि लता जी जैसा रत्न भारत में उत्पन्न हुआ है. लता जी को 'भारत रत्न' पुरूस्कार का मिलना इस पुरूस्कार के नाम को सत्य सिद्ध करता है. उनकी प्रतिभा के आगे उम्र ने भी अपने हथियार डाल दिए हैं. लता जी की उम्र का बढ़ना ऐसा लगता है जैसे कि उनके गायन क्षमता की बेल दिन-प्रतिदिन बढती ही जा रही है. और हम सब भी यही चाहते हैं कि यह अमरबेल कभी समाप्त न हो, इसी तरह पीढी दर पीढी बढती ही रहे-चलती ही रहे.

वर्षों से लताजी फिल्म संगीत को अपनी मधुर व जादुई आवाज से सजाती आ रही हैं. कोई फिल्म चली हो या न चली हो परन्तु ऐसा कोई गीत न होगा जिसमें लताजी कि आवाज हो और लोगों ने उसे न सराहा हो. लता, एक ऐसा नाम और प्रतिभा है जो बीते ज़माने में भी मशहूर था, आज भी है और आने वाले समय में भी वर्षों तक इस नाम कि धूम मची रहेगी. उनके गाये गीतों को गाकर तथा उन्हीं को अपना आदर्श मानकर न जाने कितने ही लोगों ने गायन क्षेत्र में अपना सिक्का जमाया है और आज भी सैकडों बच्चे बचपन से ही उनके गाये गीतों का रियाज करते हैं तथा अपने कैरियर को एक दिशा प्रदान करने की कोशिश में लगे हैं.

लताजी ने अपनी जिंदगी में इतना मान सम्मान पाया है कि उसको तोला नहीं जा सकता. कितनी ही उपाधियाँ और कितने ही पुरुस्कारों से उनकी झोली भरी हुई है. लेकिन अब तो लगता है कोई पुरुस्कार, कोई सम्मान उनकी प्रतिभा का मापन नहीं कर सकता. लता जी इन सब से बहुत आगे हैं. पुरूस्कार देना या उनकी प्रतिभा को आंकना 'सूरज को दिया दिखाने' जैसा है. शोहरत की बुलंदियों पर विराजित होने के बावजूद भी घमंड और अकड़ ने उन्हें छुआ तक नहीं है. कहते हैं की 'फलदार वृक्ष झुक जाता है' यह कहावत लताजी पर एकदम सटीक बैठती है. उन्होंने जितनी सफलता पायी है उतनी ही विनम्रता और शालीनता उनके व्यक्तित्व में झलकती है. वह सादगी की मूरत हैं तथा उनकी आवाज के सादेपन को हमेशा से लोगों ने पसंद किया है.

फ़िल्मी गीतों के अलावा लता जी ने बीच बीच में कुछ ग़ज़लों की एल्बम पर भी काम किया है, "सादगी" इस श्रेणी में सबसे ताजा प्रस्तुति है. लताजी का मानना है कि जिंदगी में सरल व सादी चीजें ही सभी के दिल को छूती हैं, और इस एल्बम में उन्हीं लम्हों के बारे में बात कही गयी है, इसीलिए इस एल्बम का नाम 'सादगी' रखा गया है. यह एल्बम 'वर्ल्ड म्यूजिक डे' पर प्रख्यात गायक जगजीत सिंह द्वारा जारी किया गया. पूरे १७ वर्षों बाद लता जी का कोई एल्बम आया है. इस एल्बम के संगीत निर्देशक मयूरेश हैं तथा ज्यादातर ग़ज़लें लिखी हैं जावेद अख्तर, मेराज फैजाबादी, फरहत शहजाद, के साथ चंद्रशेखर सानेकर ने. एल्बम में शास्त्रीय संगीत तथा लाईट म्यूजिक के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश की गयी है. इसमें कुल आठ गजलें हैं. 'मुझे खबर थी' और 'वो इतने करीब हैं दिल के' गजल पहली बार सुनने पर ही असर करती हैं. दिल को छूती हुई रचनायें है. बाकी की गजलों का भी अपना एक मजा है लेकिन उन्हें दिल तक पहुंचने में दो तीन बार सुनने तक का समय लगेगा. एल्बम में ज्यादातर परंपरागत संगीत वाद्य यंत्रों का प्रयोग हुआ है तथा सेक्सोफोन, गिटार और पश्चिमी धुन का भी प्रयोग सुनाई पड़ता है.

चलते-चलते यही कहेंगे कि लता जी की आवाज में नदी की तरह ठहराव और शांति का भाव समाहित है. एक मधुर और भावपूर्ण संगीतमय तोहफे के लिए हम उनके आभारी है. ईश्वर करे वो आने वाले दशकों तक हमें संगीत की सौगातें देती रहे और हम इस सरिता में यूं ही डुबकी लगाते रहे.

मुझे खबर थी - फरहत शहजाद


इश्क की बातें - जावेद अख्तर


रात है - जावेद अख्तर


चाँद के प्याले से - जावेद अख्तर


अंधे ख्वाबों को - मेराज फैजाबादी


जो इतने करीब हैं - जावेद अख्तर


मैं कहाँ अब जिस्म हूँ - चंद्रशेखर सानेकर


फिर कहीं दूर से - मेराज फैजाबादी


ये ऑंखें ये नम् ऑंखें - गुलज़ार


प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

रविवार, 23 अगस्त 2009

रविवार सुबह की कॉफी और एक फीचर्ड एल्बम पर बात दीपाली "दिशा" के साथ

सफलता और शोहरत किसी उम्र की मोहताज नहीं होती. अगर हमारी मेहनत और प्रयास सच्चे व सही दिशा में हों तो व्यक्ति किसी भी उम्र में सफलता और शोहरत की बुलंदियों को छू सकता है. सोनू निगम एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने सफलता के कई पायदान पार किये हैं. उन्होंने अपने बहुमुखी व्यक्तित्व को प्रर्दशित किया है. गायन के साथ-साथ सोनू निगम ने अभिनय व माडलिंग भी की है. यद्यपि अभिनय में उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली, किन्तु गायन के क्षेत्र में वह शिखर पर विराजित हैं. उन्होंने गायकी छोड़ी नहीं है. वो आज भी संगीतकारों की पहली पसंद हैं. उनकी आवाज में कशिश व गहराई है. वह कई बार गाने के मूड के हिसाब से अपनी आवाज में बदलाव भी लाते हैं जो उनके हरफनमौला गायक होने का परिचय देता है. अपनी पहली एल्बम 'तू' के जरिये वो युवा दिलों के सरताज बन गए थे. उसके बाद उनकी एल्बम 'दीवाना' और 'यादें' आयीं, जिनके गीतों और गायकी की छाप आज भी हमारे जहन में है. अगर सोनू निगम द्वारा गाये गीतों की सूची बनाएं तो पायेंगे कि उन्होंने अपने बेहतरीन अंदाज से सभी गीतों में जान डाल दी है. ऐसा लगता है कि वो गीत सोनू की आवाज के लिए ही बने थे. एक-एक गीत उनकी गायन प्रतिभा को दर्शाता है, और सफलतम गीतों की श्रेणी में अंकित हैं. सोनू की आवाज में 'दर्द, रोमांस, जोश' आदि सभी तत्व मिलते हैं. उनकी आवाज में शास्त्रीय शैली की झलक भी मिलती है. उनकी शास्त्रीय गायन की प्रतिभा को प्रदर्शित करती एक नयी एल्बम आ रही है जिसका नाम है "क्लासिकली माइल्ड" . क्लासिकली माइल्ड रागों पर आधारित एल्बम है. हालांकि सोनू जी का कहना है कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत में कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली है. अगर हम इस बात को ध्यान में रखें तो यह बहुत ही बढ़िया और मधुर एल्बम है जो सोनू की प्रतिभा को बखूबी दर्शाती है. इस एल्बम में आठ गीत है और सभी के बोल बहुत अच्छे हैं. अजय जिन्गारान हैं एल्बम के गीतकार और संगीत तैयार किया है दीपक पंडित ने.

सोचता हूँ मैं
यह एल्बम का पहला गीत है और राग सिंध भैरवी पर आधारित है. इस गाने में फिलोसिफी नजर आती है. बहुत ही सरल शब्दों में गायक ने जीवन से जुड़े प्रश्नों को कहा है 'तन पर उम्र का घेरा क्यों है? सदियों से यह राज छुपा है.' जो सभी को सोचने के लिए विवश करते हैं. ड्रम्स, गिटार तथा पियानो का प्रयोग शास्त्रीय संगीत को आधुनिक ढंग से प्रस्तुत करते है.


भीगे भीगे
यह गाना बहुत ही परम्परागत लगता है. इसमें सोनू निगम ने कई स्थान पर आलाप लिए है जो बहुत ही अच्छे सुनाई देते है. यह एक सुन्दर रोमांटिक गाना है जो राग अहीर भैरव, पुरिया धनश्री और ललित पर आधारित है. पूरे गीत में गिटार और पियानो का प्रयोग है बीच में हारमोनियम का प्रयोग इसे और आकर्षक बना देता है.


सूना सूना
एक बहुत ही भावपूर्ण गीत जो देश से दूर गए व्यक्ति को लौट आने का सन्देश देता है. कहता है की देश की हवाएं, मिटटी सब तुझे बुला रही है तेरे बिना सब कुछ सूना है. पहली बार सुनने में शायद यह गीत किसी को न भाये लेकिन दो या तीन बार में जब भाव समझ आने लगता है तो गीत दिल के करीब लगता है. यह गीत राग देश, जैजैवंती और मिश्र पटदीप के मिश्रित रूप पर आधारित है. इस गीत में ड्रम के साथ मृदंग का प्रयोग भी किया गया है. अपने आप में जिंदगी से भरा हुआ गीत लगता है.


सुरतिया मतवाली
यह गीत राग काफी पर आधारित है. इस गीत में गायकी, संगीत, बोल आदि सभी कुछ बहुत बढ़िया है. यह गाना एक भाव उत्पन्न करता है. सभी वाद्य यंत्रों का बहुत सुन्दरता से प्रयोग किया गया है. पियानो और बांसुरी की जुगलबंदी मधुर सुनाई देती है.


छलकी छलकी
यह एक बहुत ही रोमांटिक गीत है साथ ही एक सुन्दर कल्पना को जन्म देता हुआ प्रतीत होता है. बेमिसाल गायकी का प्रदर्शन है. सोनू निगम ने एक ही लाइन को अलग जगह पर अलग तरह से गाया है जो उनके प्रतिभाशाली होने का सबूत है. गीत के बोल 'छलकी छलकी चांदनी में, गाती है दीवानगी. बीते जो बाँहों में तेरे, वोह पल है जिंदगी' मन के तारों को छेड़ जाते हैं उस पर सोनू की गायकी का अंदाज गीत की कल्पना और रोमांस को और बड़ा देता है. यह गीत राग मिश्र सारंग, मिश्र खमाज और बिहाग पर आधारित है. गीत के बोल परंपरागत होते हुए भी आधुनिक संगीत और संसार से जुड़े दिखते हैं.


धन्य धन्य
यह एक बहुत ही मधुर और भावपूर्ण गीत है. इस गीत द्वारा नारी के विभिन्न रूपों को को तथा उसके त्याग को प्रस्तुत किया गया है. बोल और संगीत दोनों ही बेजोड़ हैं. इस गीत को सुन शायद सभी नारियां भावुक हो जाएँ. यह गीत राग मांड पर आधारित है. गाने की शुरुवात और अंत में शहनाई का प्रयोग बेमिसाल है.


लम्हा लम्हा
इस गीत को भी हम मधुर और मन को छूने वाले गीतों में शामिल कर सकते हैं. गीत सन्देश पूर्ण है जो जीने की राह दिखाता है. इसके बोल 'आओ यह पल महकाएं और जीवन को जीना सिखलाएँ' उपदेशात्मक से लगते हैं. यह गीत राग बिलावल पर पर आधारित है और इसमें हिन्दुस्तानी तथा कर्नाटक शैली की मिश्रित झलक दिखती है.


ऐ दिल मत रो
इस गीत के बोल से ही पता लगता है की यह एक दुख भरा गीत है. सोनू की आवाज में दर्द साफ झलकता है. यह गीत राग लोग कौंस पर आधारित है और ग़ज़ल का एहसास भी देता है. सोनू की गायकी बढ़िया है.


सोनू निगम की यह खासियत है की वो अपनी आवाज के साथ प्रयोग करते है और सफल भी होते है. हो सकता है 'क्लासिकली माइल्ड' एल्बम उन लोगों को कम समझ आये जिन्हें शास्त्रीय संगीत का ज्ञान नहीं या जिन्होनें सोनू को सिर्फ रोमांटिक और लाइट गीत गाते सुना है. वैसे यह एल्बम पूरी तरह शास्त्रीय संगीत पर आधारित नहीं है. इसमें हम शास्त्रीय और आधुनिक दोनों संगीतों का सुन्दर समायोजन पायेंगे. यह एल्बम पहली बार सुनने में आपको न छू पाए लेकिन दो बार, तीन बार सुनने पर इसका असर शुरू होता है जो गहरा है.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

सोमवार, 29 जून 2009

रूप कुमार राठोड और साधना सरगम के युगल स्वरों का है ये -"वादा"

बात एक एल्बम की (10)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


बात एक एल्बम की में इस माह हम चर्चा कर रहे हैं चार बड़े फनकारों से सजी एल्बम "वादा' के बारे में. गीतकार गुलज़ार और संगीतकार उस्ताद अमजद अली खान साहब के बारे में हम बात कर चुके हैं, आज जिक्र करते हैं इस एल्बम के दो गायक कलाकारों का. इनमें से एक हैं शास्त्रीय संगीत के अहम् स्तम्भ माने जाने वाले पंडित चतुर्भुज राठोड के सुपुत्र और श्रवण राठोड (नदीम श्रवण वाले) और विनोद राठोड के भाई, जी हाँ हम बात कर रहे हैं गायक और संगीतकार रूप कुमार राठोड की. अपने पिता (जिन्हें इंडस्ट्री में कल्याणजी आनंदजी और गायक अनवर के गुरु भी कहा जाता है) के पदचिन्हों पर चलते हुए रूप ने तबला वादन सीखने से अपना संगीत सफ़र शुरू किया. पंकज उधास और अनूप जलोटा के साथ उन्होंने संगत की. श्याम बेनेगल की "भारत एक खोज" में भी उन्होंने तबला वादन किया. १९८४ में अपने इस जूनून को एक तरफ रख उन्होंने गायन की दुनिया में खुद को परखने का अहम् निर्णय लिया ये एक बड़ा "यु-टर्न" था उनके जीवन का. उस्ताद नियाज़ अहमद खान से तालीम लेकर उन्होंने ग़ज़ल गायन से शुरुआत की. पार्श्व गायन में उन्हें लाने का श्रेय जाता है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को, जिन्होंने शशि लाल नायर की फिल्म "अंगार" में उन्हें गाने का मौका दिया. पर असली सफलता उन्हें मिली फिल्म "बॉर्डर" के साथ. अनु मालिक के संगीत निर्देशन में "तो चलूँ" और "संदेसे आते हैं" गीतों ने उन्हें कमियाबी का असली स्वाद चखाया, अनु के साथ उसके बाद भी उन्होंने बहुत बढ़िया और लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया. "ले चले डोलियों में तुम्हें", "मौला मेरे" और "तुझमें रब दिखता है" उनकी आवाज़ में ढले कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि इन्हें इतना सुंदर कोई और गायक गा ही नहीं सकता था. प्राइवेट अल्बम्स में भी उन्होंने जम कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है. हमारी फीचर्ड एल्बम "वादा" भी इसका अपवाद नहीं है. यकीन न हो तो सुनिए हलकी फुल्की शरारतों और छेड़ छाड़ से गुदगुदाता ये नगमा -

चोरी चोरी की वो झाँखियाँ...


और ये सुनिए मखमली एहसासों से सजे गुलज़ार साहब के "ट्रेड मार्क" शब्दों में गुंथे इस गीत को -
ये सुबह साँस लेगी....


एल्बम वादा से रूप कुमार की आवाज़ में ये नायाब गीत भी हैं -

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...
डूब रहे हो और बहते हो...
रोजे-अव्वल से ही आवारा हूँ....

बढ़ते हैं इस एल्बम के चौथे फनकार की तरफ. इससे पहले की हम उनके बारे में कुछ कहें सुनिए इसी एल्बम से उनकी आवाज़ में ये दर्द भरी ग़ज़ल -

आँखों की हिचकी रूकती नहीं है,
रोने से कब गम हल्का हुआ है...

सीने में टूटी है चीज़ कोई,
खामोश सा एक खटका हुआ है....


वाह.... सुनिए आँखों में सावन अटका हुआ है.....


ये मधुर और चैन से भरी आवाज़ है साधना सरगम की. एक ऐसी गायिका जिनकी आवाज़ और कला का हमारी फिल्म इंडस्ट्री में कभी भी भरपूर इस्तेमाल नहीं हुआ. पंडित जसराज की इस शिष्या में गजब की प्रतिभा है और उनके कायल संगीतकार ए आर रहमान भी हैं. एक ताज़ा साक्षात्कार में रहमान में स्वीकार किया कि वही एकमात्र भारतीय गायिका हैं जो हमेशा उन्हें उम्मीद से बढ़कर परिणाम देती है अपने हर गीत में. इन पक्तियों के लेखक की राय में भी लता मंगेशकर की गायन विरासत को यदि कोई गायिका निभा पायी है तो वो साधना सरगम ही है. फिल्म "लगान" के गीत "ओ पालनहारे" एल्बम में लता की आवाज़ में है पर फिल्म के परदे पर नायिका के लिए साधना की आवाज़ का इस्तेमाल हुआ है, और देखिये लता जी गाये मुखड़े के बाद साधना की आवाज़ में अंतरा आता है और लगता है जैसे दोनों आवाजें एक दूजे में घुल-मिल ही गयी हों. रहमान ने उस साक्षात्कार में यह भी कहा कि वो हर बार अपनी गायिकी से मुझे चौका देती है. वो दिए हुए निर्देशों से भी बढ़कर हर गीत में कुछ ऐसा कर जाती है कि गीत एक स्तर और उपर हो जाता है. चलिए सुनते हैं साधना की आवाज़ में एक और गीत इसी एल्बम से -

सारा जहाँ चुप चाप है....


और अब सुनिए रूप कुमार और साधना सरगम की युगल आवाजों में ये शानदार गीत -
हर बात पे हैरान है....(उस्ताद अमजद अली खान साहब ने इस गीत में एक कश्मीरी लोक धुन का खूबसूरत सामंजस्य किया है)


एल्बम वादा के अन्य गीत यहाँ सुनें -

दिल का रसिया...
ऐसा कोई -(सरोद पर)



"बात एक एल्बम की" एक मासिक श्रृंखला है जहाँ हम बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

सोमवार, 8 जून 2009

रोज़-ए-अव्वल ही से आवारा हूँ, आवारा रहूंगा...गुलज़ार साहब का ऐलान उस्ताद अमजद अली खान के संगीत में.

बात एक एल्बम की (9)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


एल्बम "वादा" से अब तक आप तीन रचनायें सुन चुके हैं. आज आपको सुनवाते हैं दो और नायाब गीत इसी एल्बम से. गुलज़ार साहब पर हम आवाज़ पर पहले भी काफी विस्तार से चर्चा कर चुके हैं- मैं इस जमीन पर भटकता रहा हूँ सदियों तक और गुलज़ार - एक परिचय जैसे आलेखों में. महफ़िल-ए-ग़ज़ल में जब भी उनका जिक्र छिड़ा, तख्लीक-ए-गुलज़ार और परवाज़-ए-गुलज़ार से फिजा गुलज़ार नुमा हो गयी. फिल्मों में उनके लिखे ढेरों गीत हमेशा हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज़ करेंगें पर ये भी एक सच है कि उन्होंने ढेरों गैर फिल्म संगीत एल्बम को अपनी कलम से प्रेरणा दी. उनके साथ काम कर चुके ढेरों कलाकारों ने जब भी कभी फिल्मों से इतर अपनी कला का मुजाहरा करने का मन बनाया गुलज़ार साहब की कविताओं/ ग़ज़लों ने उन्हें अपने प्रेम पाश में बाँध लिया. फिर चाहे वो भूपेंद्र सिंह हो, सुरेश वाडेकर, भूपेन हजारिका, विशाल भारद्वाज हो या फिर जगजीत सिंह, कोई भी उनकी कविताओं के नर्मो-नाज़ुक जादू से बच नहीं पाया. गुलज़ार साहब खुद जिन फनकारों के मुरीद रहे उनके काम को जन जन तक पहुंचाने में भी उनकी अहम् भूमिका रही. मिर्जा ग़ालिब और अमृता प्रीतम के नाम इनमें प्रमुख हैं. अमृता प्रीतम की कविताओं को जिस एल्बम के माध्यम से गुलज़ार ने नयी सांसें दी उस एल्बम का भी हम आवाज़ पर ज़िक्र कर चुके हैं.

अब इसे दुर्भाग्य ही कहिये कि उनके बहुत से उन्दा काम पर्याप्त प्रचार और स्टार वेल्यू के अभाव में उतनी कमियाबी को नहीं पा सके जिसके कि वो हक़दार थे. "बूढे पहाडों पर" और "वादा" उनकी ऐसी ही कुछ अल्बम्स हैं. हाँ पर उनके दीवानों की कहीं कोई कमी नहीं है, जो हर उस एल्बम को अपने संग्रह का हिस्सा बनाते हैं जिनसे उनका नाम जुड़ जाता है. अक्सर उनकी कवितायें गहरे भाव और सरल शब्दों में गुंथी होने के कारण संगीतकारों को उन्हें स्वरबद्ध करने के लिए प्रेरित करती ही है. विशाल ने उनकी कविता "यार जुलाहे" को बहुत खूबसूरत रूप से स्वरबद्ध किया था. ऐसे में उस्ताद अमजद अली खान साहब भी कहाँ पीछे रहते भला. वादा एल्बम में भी गुलज़ार साहब के लिखे कुछ बेहद गहरे उतरते शब्दों को खान साहब ने बहुत प्यार से सुरों में पिरो कर पेश किया है.

"रोजे-अव्वल ही से आवारा हूँ आवारा रहूँगा..." कहानी है एक अनजाने अजनबी खला में भटकते यायावर की. गीत से पहले और बीच बीच में गुलज़ार साहब की आवाज़ में कुछ पंक्तियाँ है, संगीत ऐसा है कि यदि ऑंखें बंद सुनेंगें तो आप खुद को इतना हल्का महसूस करेंगे कि कहीं अन्तरिक्ष की खलाओं में भ्रमण करते हुए पायेंगें, जहाँ गुलज़ार साहब आपको चेताते मिलेंगें -"उल्काओं से बच के गुजरना, कॉमेट हो तो पंख पकड़ना..." तो चलिए हमारे साथ आज इस सफ़र में सुनिए ये गीत एल्बम "वादा" से.



अब सुनिए एक और डूबता गीत, जो पहले गीत से बिलकुल अलग रंग का है. रूप कुमार राठोड के गाये बहतरीन गीतों में इसका शुमार है. सुनिए इसी एल्बम से -"डूब रहे हो और बहते हो..." जहाँ गुलज़ार साहब लिखते हैं - "याद आते हैं वादे जिनके, तेज़ हवा में सूखे तिनके, उनकी बातें क्यों कहते हो....."



(जारी....)



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

बुधवार, 3 जून 2009

"ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था..."- उस्ताद अमजद अली खान के संगीत का सतरंगी वादा

बात एक एल्बम की (८)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.

"बात एक एल्बम की" का एक नया महीना है और हम हाज़िर हैं एक नयी एल्बम के साथ. इस माह की एल्बम में हैं चार दिग्गज फनकार, जो सभी के सभी अपने अपने क्षेत्र में महारत रखते हैं. जहाँ संगीतकार हों उस्ताद अमजद अली खान जैसे, गीतकार हों गुलज़ार साहब जैसे, गायक हों रूप कुमार राठोड और गायिका हों साधना सरगम जैसी तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एल्बम किस स्तर की होगी. जी हाँ ये एल्बम है -"वादा". सच्चे और अच्छे संगीत का वादा ही तो है ये नायाब एल्बम जिसका एक एक गीत हमारा दावा है, आपके अन्तर्मन में कुछ यूं उतर जायेगा कि उसका खुमार उम्र भर नहीं उतरेगा.

दरअसल इस पूरी टीम में जो नाम सबसे ज्यादा चौंकाता है वो निसंदेह उस्ताद अमजद अली खान साहब का ही है. अपने सरोद वादन से लगभग ४० सालों से भी अधिक समय से दुनिया भर के संगीत के कद्रदानों को मंत्रमुग्ध करने वाला ये महान फनकार एक व्यावसायिक एल्बम का हिस्सा बने, जरा विचित्र लगता है. पर खान साहब के क्या कहने, इतने मधुर संगीत से सजाया है पूरी एल्बम को जैसे मोती चुन लाये हो अपने सुरों के अद्भुत लोक से. खुद उन्हीं के शब्दों में -"कोई मूलभूत फर्क नहीं है शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत में. संगीत संगीत है. मेरा मकसद अपने श्रोताओं से जुड़ना है...". ग्वालियर के हाफिज़ अली खान के शिष्य रहे खान साहब ने ६ साल की उम्र में पहली बार मंच पर सरोद वादन किया था, कितने लोगों को उस वक़्त ये ख़्याल आया होगा कि ये बालक एक दिन सरोद को हिमालय सी ऊँच्चाईयों पर पहुंचा देगा. देश विदेश में जाने कितने कंसर्ट, जाने कितने सम्मान (जिसमें पद्म विभूषण भी शामिल है), ढेरों नए प्रयोग, इस बात पे शायद ही कोई शक होगा कि खान साहब ने अफगान के घोडों के व्यापारी मोहम्मद हाशमी खान बंगेश द्वारा हिंदुस्तान लाये गए इस वाध्य को जन जन तक पहुँचाने में अहम् भूमिका निभाई है, जिस परंपरा को उनको दोनों सुपत्र बहुत खूबी से आगे ले जा रहे हैं.

उस्ताद पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर फिलहाल हमारा मकसद है उनके सगीत से सजे इस एल्बम से कुछ गीत आपको सुनवाना. तो चलिए शुरुआत करते हैं इस शीर्षक गीत से. गुलज़ार साहब के शब्दों को स्वर दिया है रूप कुमार राठोड ने. "ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था....". आनंद लीजिये इतना सार्थक आरंभिक संगीत(prelude) बहुत कम गीतों में सुनने को मिलता है-



दूसरी आवाज़ है इस एल्बम में साधना सरगम की. उनकी आवाज़ में सुनिए एक बेहद खूबसूरत सा गीत इस लाजवाब एल्बम से. जहाँ पहले गीत में दर्द और तन्हाईयों की असीम गहराईयाँ थी वहीँ इस गीत एक मीठा सा चुलबुलापन है, साधना की आवाज़ में ये गीत बार बार सुनने जाने लायक है. "दिल का रसिया और कहाँ होगा..."



और अब सुनिए इन दोनों गीतों को खान साहब के सरोद पर. स्वरों की मधुर स्वरलहरियों में गोते खाईये और डूब जाईये उस्ताद के बेमिसाल सरोद वादन के सुर सागर में -



(जारी....)



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बुधवार, 27 मई 2009

शहर के दुकानदारों को जावेद अख्तर की सलाह - एल्बम संगम से नुसरत साहब की आवाज़ में

बात एक एल्बम की # 07

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर

आलेख प्रस्तुतीकरण - सजीव सारथी


जैसा कि आप जानते हैं हमारे इस महीने के फीचर्ड एल्बम में दो फनकारों ने अपना योगदान दिया है. नुसरत साहब के बारे में हम पिछले दो अंकों में बात कर ही चुके हैं. आज कुछ चर्चा करते हैं अल्बम "संगम" के गीतकार जावेद अख्तर साहब की. जावेद अख्तर एक बेहद कामियाब पठकथा लेखक और गीतकार होने के साथ साथ साहित्य जगत में भी बतौर एक कवि और शायर अच्छा खासा रुतबा रखते हैं. और क्यों न हों, शायरी तो कई पीढियों से उनके खून में दौड़ रही है. वे गीतकार/ शायर जानिसार अख्तर और साफिया अख्तर के बेटे हैं, और अपने दौर के रससिद्ध शायर मुज़्तर खैराबादी जावेद के दादा हैं. उनकी परदादी सयिदुन निसा "हिरमां" उन्नीसवी सदी की जानी मानी उर्दू कवियित्री रही हैं और उन्हीं के खानदान में और पीछे लौटें तो अल्लामा फजले हक का भी नाम आता है, अल्लामा ग़ालिब के करीबी दोस्त थे और "दीवाने ग़ालिब" का संपादन उन्हीं के हाथों हुआ है, जनाब जावेद साहब के सगड़दादा थे.

पर इतना सब होने के बावजूद जावेद का बचपन विस्थापितों सा बीता. नन्हीं उम्र में ही माँ का आंचल सर से उठ गया और लखनऊ में कुछ समय अपने नाना नानी के घर बिताने के बाद उन्हें अलीगढ अपने खाला के घर भेज दिया गया जहाँ के स्कूल में उनकी शुरूआती पढाई हुई. लड़कपन से उनका रुझान फ़िल्मी गानों में, शेरो-शायरी में अधिक था. हमउम्र लड़कों के बजाये बड़े और समझदार बच्चों में उनकी दोस्ती अधिक थी. वालिद ने दूसरी शादी कर ली और कुछ दिन भोपाल में अपनी सौतेली माँ के घर रहने के बाद भोपाल शहर में उनका जीवन दोस्तों के भरोसे हो गया. यहीं कॉलेज की पढाई पूरी की, और जिन्दगी के नए सबक भी सीखे. ४ अक्टूबर १९६४ को जावेद ने मुंबई शहर में कदम रखा. ६ दिन बाद ही पिता का घर छोड़ना पड़ा और फिर शुरू हुई संघर्ष की एक लम्बी दास्ताँ. जेब में फ़क़त 27 नए पैसे थे पर जिंदगी का ये "लडाका" खुश था कि कभी 28 नए पैसे भी जेब में आ गए तो दुनिया की मात हो जायेगी.

५ मुश्किल सालों के थका देने वाला संघर्ष भी जावेद का सर नहीं झुका पाया. उन्हें यकीन था कि कुछ होगा, कुछ जरूर होगा, वो युहीं मर जाने के लिए पैदा नहीं हुए हैं. इस दौरान उनकी कला उनका हुनर कुछ और मंझ गया. शायद यही वजह थी कि जब कमियाबी बरसी तो कुछ यूँ जम कर बरसी कि चमकीले दिनों और जगमगाती रातों की एक सुनहरी दास्तान बन गयी. एक के बाद एक लगातार बारह हिट फिल्में, पुरस्कार, तारीफें.....जैसे जिंदगी भी एक सिल्वर स्क्रीन पर चलता हुआ ख्वाब बन गयी, पर हर ख्वाब की तरह इसे भी तो एक दिन टूटना ही था. जब टूटा तो टुकडों में बिखर गयी जिंदगी. कुछ असफल फिल्में, हनी (पत्नी) से अलग होना पड़ा, सलीम के साथ लेखनी की जोड़ी भी टूट गयी. जावेद शराब के आदी हो गए.

१९७६ में जब जानिसार अख्तर खुदा को प्यारे हुए तो अपनी आखिरी किताब औटोग्राफ कर जावेद को दे गए जिस पर लिखा था -"जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे". ये बुलावा था अपने बागी और नाराज़ बेटे के लिए एक शायर पिता का, एक सन्देश था छुपा हुआ कि लौट चलो अब अपनी जड़ों को. शायरी से रिश्ता तो पैदाइशी था ही, दिलचस्पी भी हमेशा थी, 1979 में पहली बार शेर लिखते हैं जावेद और सुलह कर लेते हैं अपनी विरासत और मरहूम वालिद से.यहाँ साथ मिलता है मशहूर शायर कैफी आज़मी की बेटी शबाना का और जन्म होता है एक नए रिश्ते का. फिल्मों में उनकी शायरी सराही गयी, "साथ साथ" के खूबसूरत गीतों में. "सागर", "मिस्टर इंडिया", के बाद "तेजाब" में उनके लिखे गीतों को बेहद लोकप्रियता मिली, फिर आई "१९४२- अ लव स्टोरी" जिसके गीतों ने उन्हें इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. आज उनका बेटा फरहान और बेटी जोया दोनों ही फिल्म निर्देशन में हैं, ये भी एक विडम्बना है कि जावेद हमेशा से ही किसी फिल्म का निर्देशन करना चाहते थे, पर कभी साहस न कर पाए. पर अपने बच्चों की सफलता में उनका योगदान अमूल्य है. शबाना आज़मी कितनी सफल अभिनेत्री हैं ये बताने की ज़रूरत नहीं है, फरहान और जोया की वालिदा हनी ईरानी भी एक स्थापित पठकथा लेखिका हैं.

अनेकों फिल्म फेयर, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान पाने वाले जावेद अपने संघर्ष के मुश्किल दिनों को याद कर अपनी पुस्तक "तरकश" में एक जगह लिखते हैं - "उन दिनों मैं कमाल स्टूडियो (अब नटराज स्टूडियो) के एक कमरे में रहता था, यहाँ मीना कुमारी के फिल्म "पाकीजा" में इस्तेमाल होने वाले कपडे आदि अलमारियों में भरे थे. एक दिन मैं अलमारी का खाना खोलता हूँ तो पड़े मिलते हैं -मीना कुमारी के जीते हुए तीन फिल्म फेयर अवार्ड्स भी. मैं उन्हें झाड़ पोंछकर अलग रख देता हूँ, मैंने जिंदगी में पहली बार किसी फिल्म अवार्ड को छुआ है. रोज रात को कमरा अन्दर से बंद कर वो ट्राफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खडा होता हूँ और सोचता हूँ कि जब ये ट्राफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूंजते हुए हॉल में बैठे दर्शकों की तरफ मैं किस तरह मुस्कराऊंगा और कैसे हाथ हिलाऊंगा...". जावेद साहब की कविताओं, नज्मों, ग़ज़लों का का बहुत सा संकलन गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया में भी उपलब्ध है. उनकी पुस्तक तरकश खुद उनकी अपनी आवाज़ में ऑडियो फॉर्मेट में उपलब्ध है. जगजीत से उनकी बहुत सी ग़ज़लों और नज्मों को अपनी आवाज़ दी है, शंकर महादेवन, अलका याग्निक, आदि फनकारों ने उनके साथ टीम अप कर बहुत सी कामियाब एल्बम की हैं. नुसरत साहब की पहली पसंद भी वही थे. तो चलिए लौटते हैं अपनी फीचर्ड एल्बम "संगम" की तरफ. तीन रचनाएँ आप अब तक सुन चुके हैं....आज सुनिए तीन और शानदार ग़ज़ल/गीत इसी नायाब एल्बम से.

शहर के दुकानदारों....(उन्दा शायरी और रूहानी आवाज़ का जादूई मेल)


जिस्म दमकता (एक अनूठा प्रयोग है इस ग़ज़ल में, सुनिए समझ जायेंगे..)


और अंत में सुनिए ये लाजवाब गीत "मैं और मेरी आवारगी"


एल्बम "संगम" अन्य गीत यहाँ सुनें -

आफरीन आफरीन...
आपसे मिलके हम...
अब क्या सोचें...



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


मंगलवार, 12 मई 2009

वाइस ऑफ़ हेवन - कोई बोले राम-राम, कोई खुदाए........नुसरत फ़तेह अली खान.

बात एक एल्बम की # 06

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर

आलेख प्रस्तुतीकरण - नीरज गुरु "बादल"

आज फिर नुसरत जी पर लिखने बैठा हूँ, समझ नहीं आता है कि क्या करूँ जो इस शख्स का नशा मुझ पर से उतर जाए. इनका हर सुर खुमारी का वो आलम लेकर आता है कि बस आँखें बंद हो जाती हैं, शरीर के कस-बल ढीले पड़ जाते हैं और एक गहरी ध्यान-मुद्रा में चला जाता हूँ. फिर लगता है कि कोई भी मुझे छेड़े नहीं. पर यह दुनिया है बाबा.....वो मुझे नहीं छोड़ती और यह नुसरत साहब मुझसे नहीं छूटते हैं. आज यही कशमकश मैं आपके साथ बाँटने निकला हूँ.

आज जिस नुसरत साहब को हम जानते हैं, उन्हें पाकिस्तानी मौसिकी का रत्न कहा जाता है, बात बड़ी लगती है-सही भी लगती है, पर मेरी नज़र में उन्हें विश्व-संगीत की अमूल्य धरोहर कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी. सूफियाना गायन ऐसा है कि कोई भी उसका दीवाना हो जाए, पर यह दीवानगी पैदा करने के लिए ही उस खुदा ने नुसरत जी को हमारे बीच भेजा था. उन्होंने क़व्वाली के ज़रिये, इस सूफियाना अंदाज़ को, जो इस भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्सों में ही मक़बूल था, दुनिया भर को दीवाना बनाने का काम किया है. उनकी क़व्वाली गायन का अंदाज़ ऐसा कि सुनने वाला तो नशे में खो ही जाता है, और जो उन्हें सामने गाता हुआ देखता है, तो यह नशा उसके साथ ता-उम्र के लिए ही ठहर जाता है. फिर आप लाख कोशिशे कर लें, नशा न उतरता है - न कहीं जाता है.

आम तौर पर क़व्वाली के बारे में माना जाता है कि यह सूफी संतों की मज़ारों पर गायी जाने वाली भक्ति गायन की एक विधा है, जिसका एक सीमित दायरा है. इसका एक खास तबका है और असर भी वहीँ तक सीमित है. यह ठीक भी है और एक हद तक सही भी था, पर १९३१ में फिल्मों के आगमन ने क़व्वाली की शक्ल ही बदल दी, अब क़व्वाली खुदा-ए-आलम, खुदा-ए-इश्क से बाहर आकर और भी नए मायने लिए अपने एक खास तबके से आगे निकल कर अन्य लोगों की भी हो गई. नए साज, नए उपकरण, नया माहौल, नए प्रयोगों ने क़व्वाली की दशा-दिशा ही बदल दी.

उसी दौर में एक शख्स ने बड़े चुपचाप अपना परिचय दिया, नुसरत फतह अली खान, पहले तो अपने पिता की शागिर्दी की फिर पिता के बाद अपने चचा उस्ताद मुबारक अली खान की शागिर्दी की, पहली बार मंच चचा ने ही दिया, पर १९७१ में चचा उस्ताद मुबारक अली खान की म्रत्यु के बाद जब नुसरत जी ने अपनी क़व्वाली पार्टी बनाई तो जैसे क़व्वाली के एक नए युग की शुरुआत हुई. इस पार्टी का नाम रखा गया,"नुसरत फ़तेह अली खान-मुजाहिद मुबारक अली खान एंड पार्टी".मुजाहिद उनके चचा के सुपुत्र. इस पार्टी ने अपना पहला कार्यक्रम, रेडियो पाकिस्तान के वार्षिक संगीत समारोह,"जश्न-ए-बहारा" के लिए दिया और क़व्वाली अपने घर से निकलकर दुनिया को अपना बनाने के लिए चल पड़ी.

बाद में ८० के दशक में बर्मिंघम-इंग्लैंड की कम्पनी -ओरियंटल स्टार ऐजेंसी ने नुसरत जी को साइन किया तो जैसे उनके लिए दुनिया के दरवाज़े खुल गए या और भी बेहतर कहूँ तो कह सकता हूँ कि उन्होंने अपने दरवाज़े दुनिया में संगीत के दीवानों के लिए खोल दिए. पीटर ग्रेबियल के "द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट" ने उन्हें पश्चिम के घर-घर तक पहुंचा दिया. उसके बाद तो जैसे ख्याल-ध्रुपद में रचे-बसे सुरों की बरसात ही शुरू हो गई हो,"रियल वर्ल्ड","मस्त-मस्त","स्टार राईस","द प्रेयर सायकल"......और फिर आप गिनते जाइये-गुनगुनाते जाइये. गिनिस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड के मुताबिक उनके क़व्वाली पर १२५ एल्बम हैं, इनमें उनके इस दुनिया-ए-फानी से रूखसती के बाद जारी एल्बम शामिल नहीं हैं. आप नशे का अन्दाज़ा लगा सकते हैं.

हिंदी फिल्मों में उन्होंने,"और प्यार हो गया",जिसमें वह खुद रूबरू थें,"कच्चे धागे", और विशेषकर "धड़कन" जिसकी क़व्वाली में "...धड़कन-धड़कन-धड़कन" का आरोह-अवरोह आप अपनी रूह तक महसूस कर सकते हैं. एक बेहद सतही फिल्म में इतना उच्च कोटी का गायन, संगीत रसिज्ञों को चौका देता है. दरअसल यही है नुसरत जी का कमाल. उन्होंने अपनी गायकी पर - क़व्वाली पर ढेरों प्रयोग किये, दुनिया के हर साज़ और मौसिकी के हर रंग को उन्होंने अपने लिए इस्तेमाल किया,पर कभी भी उसके चलते किसी भी कमतरी से कोई समझौता नहीं किया. इस फिल्म का यह गायन इसका सर्वश्रेष्ठ उदहारण है. तब जब उन्हें कोई "बाब मेर्लो ऑफ़ पाकिस्तान" या "एल्विस ऑफ़ ईस्ट" कहाता है तो मुझे बड़ा दुःख होता है.नुसरत जी, नुसरत जी हैं, उन्हें वही रहने दो, तुलना ज़रूरी है क्या?

हाँ,जब कोई उन्हें "वाइस ऑफ़ हेवन" कहता है तो बड़ा ही सुखद लगता है. खुदा की इस आवाज़ को और क्या कहेगें आप. एक लम्बी सूची है, उनके सुर-स्वर से सजी रचनाओं की. सोचता हूँ इस पर बात करूँ या उस पर बात करूँ. सब एक से बढ़कर एक धुनें हैं, राग हैं, ख्याल है, ध्रुपद हैं, उर्दू है, पंजाबी है, कहीं-कहीं अरबी-फ़ारसी भी है, दुनिया भर की लोक धुनों पर किये गए प्रयोग हैं, परम्परा और आधुनिक वाद्यों का संगम है, कई बार लगता है कि अरे, ऐसा भी है. सुनते-सुनते मुहँ से बेसाख्ता निकल पड़ता है तो सिर्फ एक ही लफ्ज़ - वाह. अगर आपने नुसरत जी के पापुलर एल्बम ही सुने हैं तो मेरी गुजारिश है कि और भी ढूंढे इस महान गायक की गायकी को और अपना जीवन धन्य बना लें, आखिर यह आवाज़ है जन्नत की-उस परवरदिगार की, जिसे कहा गया है -"वाइस ऑफ़ हेवन".

चलिए लौटते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ जहाँ नुसरत साहब का साथ दे रहे हैं गीतकार जावेद अख्तर. इसी "संगम" का रचा "आफरीन आफरीन" हम सुन चुके हैं, आज सुनिए दो और शानदार ग़ज़लें -

अब क्या सोचें क्या होना है....(इस ग़ज़ल में नुसरत साहब ने एक ऐसा माहौल रचा है जो आज की अनिश्चिताओं से भरी दुनिया में निर्णय लेने वाले हर शख्स के मन में पैदा होती है. ये गायिकी बेमिसाल है)



और अब सुनिए इसके ठीक विपरीत प्यार के उस पहले दौर की दास्ताँ इस गीत में -
आप से मिलके हम कुछ बदल से गए....



आने वाले सप्ताह में बातें करेंगे इस एल्बम के दूसरे फनकार जावेद अख्तर साहब की और सुनेंगें कुछ और रचनाएँ इसी एल्बम से. तब तक के लिए इजाज़त.


"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार नीरज गुरु. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


मंगलवार, 5 मई 2009

आफ़रीन आफ़रीन...कौन न कह उठे नुसरत साहब की आवाज़ और जावेद साहब को बोलों को सुन...

बात एक एल्बम की # 05

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर



उन दिनों मैं राजस्थान की यात्रा पर था, जहाँ एक बस में मैंने उसके घटिया ऑडियो सिस्टम में खड़खड़ के बीच, "आफरीन-आफरीन.." सुना था. ज़्यादा समझ में नहीं आया पर धुन कहीं अन्दर जाकर समां गई- वहीँ गूँजती रही. फिर जब उदयपुर की एक म्यूजिक शाप पर फिर उसी धुन को सुना जो अबकी बार कहीं ज़्यादा बेहतर थी तो एक नशा-सा छा गया. यह आवाज़ थी जनाब नुसरत फतह अली भुट्टो साहब की. क्या शख्सियत, आवाज़ में क्या रवानगी, क्या खनकपन, क्या लहरिया, क्या सुरूर और क्या अंदाज़ गायकी का, जैसे खुदा खुद ज़मी पर उतर आया हो.

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब नुसरत साहब गाते होगें, खुदा भी वहीँ-कहीं आस-पास ही रहता होगा, उन्हें सुनता हुआ मदहोश-सा. धन्य हैं वो लोग, जो उस समय वहां मौजूद रहें होगें. उनकी आवाज़-उनका अंदाज़, उनका वो हाथों को हिलाना, चेहरे पर संजीदगी, संगीत का उम्दा प्रयोग, यह सब जैसे आध्यात्म की नुमाइंदगी करते मालूम देते हैं. दुनिया ने उन्हें देर से पहचाना, पर जब पहचाना तो दुनिया भर में उनके दीवानों की कमी भी नहीं रहीं. १९९३ में शिकागो के विंटर फेस्टिवल में वो शाम आज भी लोगो को याद हैं जहाँ नुसरत जी ने पहली बार राक-कंसर्ट के बीच अपनी क़व्वाली का जो रंग जमाया,लोग झूम उठे-नाच उठे, उस 20 मिनिट की प्रस्तुति का जादू ता-उम्र के लिए अमेरिका में छा गया. वहीं उन्होंने पीटर ग्रेबियल के साथ उनकी फिल्म्स को अपनी आवाज़ दी और उनके साथ अपना अल्बम "शहंशाह" भी निकाला. नुसरत साहब की विशेषता थी पूर्व और पश्चिम के संगीत का संगम करके उसे सूफियाना अंदाज़ में पेश करना. क़व्वाली को उन्होंने एक नया मुकाम दिया. संगीत की सभी शैलियों को आजमाते हुए भी उन्होंने सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और न ही कोई छेड़-छाड़ की खुद से. दुनिया यूँ ही उनकी दीवानी नहीं है. क़व्वाली के तो वे बे-ताज बादशाह थे.

कव्वालों के घराने में 13 अक्तूबर 1948 को पंजाब के फैसलाबाद में जन्मे नुसरत फतह अली को उनके पिता उस्ताद फतह अली खां साहब जो स्वयं बहुत मशहूर और मार्रुफ़ कव्वाल थे, ने अपने बेटे को इस क्षेत्र में आने से रोका था और खानदान की 600 सालों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना चाहा था पर खुदा को कुछ और ही मंजूर था, लगता था जैसे खुदा ने इस खानदान पर 600 सालों की मेहरबानियों का सिला दिया हो, पिता को मानना पड़ा कि नुसरत की आवाज़ उस परवरदिगार का दिया तोहफा ही है और वो फिर नुसरत को रोक नहीं पाए और आज इतिहास हमारे सामने है.

जब नुसरत जी गुरु नानक की वाणी,"कोई कहे राम-राम,कोई खुदाए...."को अपनी आवाज़ देते हैं तो तो सुनने वाला मदहोशी में डूब जाता है. ऐसा निराला अंदाज़, दुनिया भर में जो लोग पंजाबी-उर्दू और क़व्वाली नहीं भी समझ पाते थें, पर उनकी आवाज़ और अंदाज़ के दीवानें थें. उन्हीं दीवानों में से एक -"गुडी", जो स्वयं एक मशहूर कम्पोजर और निर्माता रहे हैं, ने नुसरत जी को समझने के लिए अनुवादक का सहारा लिया और इस गायक को समझा. फिर दोनों दीवानों ने मिलकर एक अल्बम."डब क़व्वाली" के नाम से भी निकाला. गुडी ने नुसरत साहब के काम को दुनिया भर में फैलाया.गुडी बड़ी विनम्रता से कहते हैं,"यह उनके लिए बड़े भावनात्मक पल रहे हैं." इसी अल्बम में "बैठे-बैठे,कैसे-कैसे...." सुनिए,शुरुआती ३० सेकेण्ड ही काफी हैं, नशे में डूब जाने के लिए. पूर्व और पश्चिम में के आलौकिक फ्यूजन में भी उन्होंने अपना पंजाबीपन और सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और फ्यूजन को एक नई परिभाषा दी. उन्होंने सभी सीमाओं से परे जाकर गायन किया. खाने के बेहद शौकीन नुसरत जी ने सिर्फ इस मामले में अपने डाक्टरों की कभी नहीं सुनी. जी भरकर गाया और जी भरकर खाया. महान सूफी संत और कवि रूमी की कविता को नुसरतनुमा अंदाज़ में क़व्वाली की शक्ल में सुनना, दावे से कहता हूँ कि बयां को लफ्ज़ नहीं मिलेगें. जिबरिश करने को जी चाहेगा. नुसरत और रूमी, मानो दो रूह मिलकर एक हो गई हों. बस आप सुनते चले जाएँ और कहीं खोते चले जाए.

मैं लिखता चला जाऊं और आप इस गायक को सुनते चले जाएँ और सब सुध-बुध खो बैठे, ऐसा हो सकता है.सुनिए,"मेरा पिया घर आया....","पिया रे-पिया रे.....","सानु एक पल चैन...","तेरे बिन.....","प्यार नहीं करना...." "साया भी जब साथ छोड़ जाये....","साँसों की माला पे...."और न जाने ऐसे कितने गीत हैं, ग़ज़ल हैं, कव्वालियाँ है, दुनिया भर का संगीत खुद में समेटे हुए, इस गायक को यदि नहीं सुना हो सुनने निकलिए, हिंदी फिल्मों से, पंजाबी संगीत से, सूफी संगीत से, फ्यूजन से कहीं भी चले जाइए, यह गायक, नुसरत फतह अली भुट्टो, आपको मिल जायेगा, आपको मदहोश करने के लिए-आपको अध्यात्मिक शांति दिलाने के लिए.....हर जगह -हर रूप में मौजूद है नुसरत साहब. इन्हें आप किसी भी नामी म्यूजिक -शाप में "वर्ल्ड-म्यूजिक" की श्रेणी में ही पायेगें. 16 अगस्त १९९७ को जब नुसरत साहब ने दुनिया-ए-फानी को अलविदा कहा, विश्व-संगीत में एक गहरा शोक छा गया. पश्चिम ने शोक में डूबकर कहा, पाकिस्तान ने दुनिया को जो अनमोल रत्न दिया था, आज हम उसे खो बैठे हैं और उनके पूर्व वालों की जैसे सिसकियाँ ही नहीं टूट रहीं हो, उन्हें लगा जैसे उनके बीच से खुदा की आवाज़ ही चली गई है.

नुसरत साहब पर और बातें होंगीं पर फिलहाल बढ़ते हैं इस माह के फीचर्ड अल्बम की तरफ. अपने पाकिस्तानी अल्बम्स से भारत में धूम मचाने के बाद नुसरत साहब को जब बॉलीवुड में फिल्म का न्योता मिला तो उन्होंने शायर के मामले में अपनी पसंद साफ़ कर दी कि वो काम करेंगें तो सिर्फ जावेद अख्तर साहब के साथ. इसी जोड़ी ने एक बहतरीन अल्बम में भी एक साथ काम किया, जिसे शीर्षक दिया गया - "संगम", दो मुल्कों के दो बड़े फनकारों का संगम और क्या आश्चर्य जो इस अल्बम का एक एक गीत अपने आप में एक मिसाल बन जाये तो...

तो चलिए शुरुआत करते हैं "संगम" के सबसे हिट गीत "अफरीन अफरीन" से. क्या बोल लिखे हैं जावेद साहब ने और अपनी धुन और गायिकी से नुसरत साहब ने इस गीत को ऐसी रवानगी दी है कि गीत ख़तम होने का बाद भी इसका नशा नहीं टूटता. "आफरीन-आफरीन" सूफी कलाम में एक बड़ा मुकाम रखती है. इसे ऑडियो में सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव से गुजरना होता है तो विजुअल में देखना एक आलौकिक अनुभव से गुजरना होता है. एक ही तर्ज़ के दो अनुभव, लिखने को शब्द नहीं मिलते हैं, कहने को कुछ बचता नहीं है. तो बस सुनते हैं हमारी फीचर्ड एल्बम संगम से ये पहला तराना -



साप्ताहिक आलेख - नीरज गुरु "बादल"



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार नीरज गुरु. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

आलसी सावन बदरी उडाये...भूपेन दा के स्वरों में

बात एक एल्बम की # 04

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


बतौर संगीतकार अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'आरोप' (1974) साईन में उन्होंने लता से 'नैनों में दर्पण है' गवाया. इस गाने के बारे में भूपेन दा बताते है "एक दिन जब मैं रास्ते से गुजर रहा था तब एक पहाड़ी लडके को गाय चराते हुए इस धुन को गाते सुना इस गाने से मै इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उसी समय इस गाने की टियून को लिख लिया. हालांकि मैंने उसकी हू -बहू नक़ल नही किया मगर उसका प्लाट वही रखा ताकि उसकी आत्मा जिन्दा रहे.

और एक लम्बे अंतराल के बाद हिंदी में आई उनकी फिल्म "रुदाली" में एक बार फिर लता ने स्वर दिया उस अमर गीत को. 'दिल हूँ हूँ करे..." इस फिल्म में आशा ने अपनी आवाज़ से एक सजाया था बोल थे ...."समय धीरे चलो...". १९९२ में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वापस आते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ. "मैं और मेरा साया" में मूल असामी बोलों को हिंदी में तर्जुमा किया गुलज़ार साहब ने. गुलज़ार साहब ने इन सुंदर गीतों को हिंदी भाषी श्रोताओं को पेश कर बहुत उपकार किया है. इस एल्बम से गुजरना यानी भूपेन दा के मधुर स्वरों और शब्दों के असीम आकाश में विचरना. सच में एक अनूठा अनुभव है ये. आज इस अंतिम कड़ी में सुनिए ये तीन गीत -

ये किसकी सदा है ....


आलसी सावन बदरी उडाये....


और अंत में ये शीर्षक गीत - मैं और मेरा साया....


एल्बम "मैं और मेरा साया" के अन्य गीत यहाँ सुनें -

डोला रे डोला...
एक कली दो पत्तियां...
उस दिन की बात है रमैया...
हाँ आवारा हूँ...
कितने ही सागर....

भूपेन दा हिंदी फिल्म "एक पल" के सभी गीतों को सुनने के लिए यहाँ जाएँ -
दुर्लभ गीत फिल्म "एक पल" के

साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

जेहन को सोच का सामान भी देते हैं भूपेन दा अपने शब्दों और गीतों से

बात एक एल्बम की # 03

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


असम का बिहू, बन गीत और बागानों के लोकगीत को राष्ट्रीय फ़लक पे स्थपित करने का श्रेय हजारिका को ही जाता है. उनके शब्द आवाम की आवाज़ को सुन कर उन्ही के मनोभावों और एहसासों को गीत का रूप दे देते हैं और बहुत ही मासूमियत से फिर दादा पूछते हैं - 'ये किसकी सदा है'. भूपेन दा ने बतौर संगीतकार पहली असमिया फ़िल्म 'सती बेहुला' (१९५४) से अपना सफ़र शुरू क्या.

भूपेन दा असमिया फ़िल्म में काम करने के बाद अपना रुख मुंबई की ओर किया वहाँ इनकी मुलाकात सलिल चौधरी और बलराज सहानी से हुई। इनलोगों के संपर्क में आ कर भूपेन दा इंडियन पीपल थियेटर मोवमेंट से जुड़े. हेमंत दा भी इस थियेटर में आया करते थे. हेमंत दा और भूपेन दा की कैमेस्ट्री ऐसी जमी कि भूपेन दा उनके घर में हीं रहने लगे. एक दिन अचानक हेमंत दा हजारिका को लता जी से मुलाकात करवाने ले गए. लता से उनकी ये पहली मुलाकात थी भूपेनदा खासा उत्साहित थे.जब लता जी से मुलाकात हुई तब आश्चर्य से बोली कि 'आप ही भूपेन हो जितना आपका नाम है उतनी तो आपकी उम्र नही है!' भूपेन दा ने लता जी को बातो ही बातो में ये इकारानाम भी करवा लिए कि जब भी कोई हिन्दी फ़िल्म बनाऊंगा तब आप मेरे लिए गायेंगी ।

किसी गीत के सरल माध्यम से एक सशक्त सन्देश कैसे दिया जाता है ये कोई भूपेन दा से सीखे. एल्बम "मैं और मेरा साया" में भी उन्होंने कुछ ऐसे ही विचारों को उद्देलित करने वाले गीत रचे हैं, उदाहरण के लिए सुनिए आसाम के बागानों में गूंजती ये सदा..एक कली दो पत्तियां...नाज़ुक नाज़ुक उँगलियाँ....



सुनिए एक और कहानी इस गीत के माध्यम से, आवाज़ में ऐसा दर्द भूपेन दा के अलावा और कौन भर सकता है...




साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



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मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

बहता हूँ बहता रहा हूँ...एक निश्छल सी यायावरी है भूपेन दा के स्वर में

बात एक एल्बम की # 02

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


भूपेन दा का जन्म १ मार्च १९२६ को नेफा के पास सदिया में हुआ.अपनी स्कूली शिक्षा गुवाहाटी से पूरी कर वे बनरस चले आए और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीती शास्त्र से स्नातक और स्नातकोत्तर किया. साथ में अपना संगीत के सफर को भी जारी रखा और चार वर्षों तक 'संगीत भवन' से शास्त्रीय संगीत की तालीम भी लेते रहे। वहां से अध्यापन कार्य से जुड़े रहे इन्ही दिनों ही गुवाहाटी और शिलांग रेडियो से भी जुड़ गए. जब इनका तबादला दिल्ली आकाशवाणी में हो गया तब अध्यापन कार्य छोड़ दिल्ली आ गए ।

भूपेन दा के दिल में एक ख्वाहिश थी की वे एक जर्नलिस्ट बने. इन्ही दिनों इनकी मुलाकात संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष नारायण मेनन से हुई. भूपेन दा की कला और आशावादिता से वे खासा प्रभावित हुए और उन्हें सलाह दी के वे विदेश जा कर पी.एच.डी. करें भूपेन दा ने उनकी सलाह मान ली और कोलंबिया विश्वविद्यालय में मॉस कम्युनिकेशंस से पी.एच डी करने चले गए. मेनन साहब ने स्कालरशिप दिलाने में काफी मदद की. कोलंबिया में पढ़ाई के साथ -साथ होटल में काम किया और कुछ मैगजीन और लघु फिल्मों में संवाद भी बोले. इन सब कामो से वे लगभग २५० डालर कमा लेते थे जिससे उनके शौक भी पूरे हो जाया करते. इन्ही दिनों इनकी मुलाकात राबर्ट स्टेन्स और राबर्ट फेल्हरती से हुई जिनके संपर्क में इन्हे फिल्मो के बारे में काफी कुछ सीखने का मौका भी मिला. जगह -जगह के लोक संगीत को संग्रह करना और सीखना भूपेन साहब के शौको में सबसे उपर. एक दिन दादा एक सड़क से हो कर गुजर रहे थे तभी अमेरिका के मशहुर नीग्रो लोकगायक पॉल रॉबसन गाते हुए देखा वे गाये जा रहे थे 'ol 'man river,you dont say nothing ,you just keep rolling along' पॉल के साथ मात्र एक गिटार वादक था और एक ड्रम और कोई इंस्ट्रूमेंट नही.पॉल की आवाज और उनका गाया यह गाना भूपेन दा को इतना अच्छा लगा कि उससे प्रेरित हो कर 'ओ गंगा तुम बहती हो क्यूँ' रचना का सृजन किया. पॉल से से इनकी जान पहचान भी हो गई और पॉल से ये नीग्रो लोकगायकी के गुर भी सीखने लगे मगर पॉल की दोस्ती थोडी महंगी पड़ी और 7 दिनों के लिए पॉल के साथ जेल की हवा खानी पड़ी .बहरहाल हजारिका अपनी शिक्षा पूरी कर भारत लौट आए।

चलिए आगे का किस्सा अगले सप्ताह अब सुनते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम "मैं और मेरा साया" से भूपेन के गाये ये दो गीत.
हाँ आवारा हूँ ..यायावर दादा के चरित्र को चित्रित करता है ये मधुर गीत-




कुछ इसी भाव का है ये दूसरा गीत भी. कितने ही सागर, कितने ही धारे...बहते हैं बहता रहा हूँ....वाह... सुनिए और इस आनंद में सागर में डूब जाईये -



साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार उज्जवल कुमार. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

मैं और मेरा साया - भूपेन दा का एक नायाब एल्बम.

बात एक एल्बम की # ०१

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - भूपेन हजारिका.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - मैं और मेरा साया, - भूपेन हजारिका (गीत अनुवादन - गुलज़ार)


दोस्तों आज बात एक ऐसी शख्सियत की हो रही है जिनके बारे में कुछ कहने में ढेरों मुश्किलों से साक्षत्कार होना पड़ता है. इस एक शख्स में कई शख्सियत समायी हुई है ।बुद्धिजीवी संगीतकार, उत्कृष्ट गायक, सवेदनशील कवि, अभिनेता, लेखक, निर्देशक, समाज सेवक और न जाने कितने रूप. दोस्तों मै दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मानित डॉक्टर भूपेन हजारिका के बारे में बात कर रहा हूँ .जब भी हिन्दी सिने जगत में लोकसंगीत की बात आएगी तो भूपेन दा के का नाम शीर्ष पर रहेगा. उन्होंने अपने संगीत के जरिये आसाम की मिट्टी की सोंधी खुश्बू कायनात में घोल दी है.


बचपन में पिता शंकर देव का उपदेश ज्यादातर गेय रूप में प्राप्त होता था. उन्ही दिनों उनके मन में संगीत ने अपना घर बना लिया और वे ज्योति प्रसाद अग्रवाल, विष्णु प्रसाद शर्मा और फणी शर्मा जैसे संगीतविदों के संपर्क में आकर लोकगीत की तालीम लेने लगे।

भूपेन दा के आवाज़ में वह बंजारापन है जो उस्तादों से लेकर आम जन -जन को अपने गिरफ्त में ले लेता हैं और अपनी आवाज़ को सबकी आवाज़ बना देता हैं। भूपेन दा की रचनाओं की वेदना की गहराई का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है जब वे एक दफ़ा नागा रिबेल्स से बात करने गए तो आपनी एक रचना 'मानुहे मनोहर बाबे' को वहां के एक नागा युवक को उन्हीं कि अपनी भाषा में अनुवाद करने को कहा और जब उन लोगों ने इस गीत को सुना तो सभी के आंखों में आँसू आ गए। भूपेन दा के इस गीत के बंगला अनुवाद 'मानुष मनुषेरे जन्में', को बी.बी.सी.की तरफ़ से 'सॉंग ऑफ द मिलेनियम,के खिताब से नवाजा गया. इस गीत के जरिये भूपेन दा का कवि रूप का चिंतन हमारे सामने आता है.

हमारे फीचर्ड आर्टिस्ट भूपेन दा पर होंगी और बातें अगले मंगलवार, फिलहाल सुनते हैं इस महीने की फीचर्ड एल्बम, "मैं और मेरा साया" से भूपेन हजारिका की आवाज़. भूपेन दा के मूल गीत का हिंदी अनुवाद किया है गुलज़ार साहब ने.



साप्ताहिक आलेख - उज्जवल कुमार



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