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Thursday, September 25, 2008

जितनी सुरीली हैं ग़ालिब की ग़ज़लें; गाने में दोगुना तप मांगती हैं

आज एक बार फ़िर आवाज़ पर हमारे प्रिय संगीत समीक्षक और जानेमाने चिट्ठाकार संजय पटेल तशरीफ़ लाए हैं और बता रहे हैं लता मंगेशकर की गायकी की कुछ अदभुत ख़ासियतें.हमें उम्मीद है कि इस पोस्ट को पढ़कर संगीत विषय से जुड़े विद्यार्थी,गायक,संगीतकार बहुत लाभान्वित होंगे.आशा है आवाज़ पर जारी सुगम समारोह में सुनी और सराही जा रही ग़ालिब की ग़ज़लों का आनंद बढ़ाने वाली होगी संजय भाई की ये समीक्षा.मुलाहिज़ा फ़रमाएँ......



एक बात को तो साफ़ कर ही लेना चाहिये कि लता मंगेशकर अपने समय की सबसे समर्थ गायिका हैं.मीरा के भजन,डोगरी,मराठी,गुजराती,और दीगर कई भाषाओं के लोकगीत,भावगीत,भक्तिगीत और सुगम संगीत गाती इस जीवित किंवदंती से रूबरू होना यानी अपने आपको एक ऐसे सुखद संसार में ले जाना है जहाँ सुरों की नियामते हैं और संगीत से उपजने वाले कुछ दिव्य मंत्र हैं जो हमारे मानस रोगों और कलुष को धो डालने के लिये इस सृष्टि में प्रकट हुआ हैं.

लता मंगेशकर के बारे में गुलज़ार कहते हैं कि लताजी के बारे में कोई क्या कह सकता है.उनके बारे में कोई बात करने की ज़रूरत ही नहीं है बल्कि उनको एकाग्र होकर सुनने की ज़रूरत है. उनके गायन के बारे में कोई अपनी राय नहीं दे सकता,सिर्फ़ अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है. ख़ाकसार की प्रतिक्रिया है कि लता मंगेशकर दुनिया की सबसे बेहतरीन गायिका तो हैं ही, सबसे अव्वल विद्यार्थी भी हैं. उन्होंने जिस तरह से अपने संगीतकारों को सुना,गुना और गाया है वह कितना सहज और सरल है ; ऐसा कह देना बेहद आसान है लेकिन ज़रा अपने कानों को इन बंदिशों की सैर तो करवाइये,आप जान जाएंगे किस बला का नाम लता है.

ग़ालिब को गाते वक़्त लता मंगेशकर पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर की विद्यार्थी हैं.सुन रहीं है,किस किस लफ़्ज़ पर वज़न देना है,कहाँ कितनी हरकतें है और कहाँ आवाज़ को हौले से साधना है और कहाँ देनी है परवाज़.ज़रा यह भी समझते चलें कि शास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत में हर बार आप नया रच सकते हैं.जैसे बागेश्री गा रहे हैं तो इस बार तानों को थोड़ा छोटा कर लें,विलम्बित को ज़रा जल्द ख़त्म कर द्रुत पर आ जाएं,सरगम लें ही नहीं सिर्फ़ तानों से सजा लें पूरा राग. लोक-संगीत की रचनाओं को किसी सुर विशेष में बांधने की ज़रूरत नहीं,लय-घटाएँ,बढ़ाएँ;चलेगा.लेकिन हुज़ूर ये जो सुगम संगीत नाम की विधा है और ख़ास कर रेकॉर्डिंग का मामला हो तो सुगम से विकट कोई दूसरी आफ़त नहीं है. समय है कि बांध दिया गया है....तीन मिनट में ही कीजिये पूरी ये ग़ज़ल या भजन या गीत.आभूषण सारे चाहिये गायन के प्रस्तुति में.और बंदिश है संगीतकार या कम्पोज़र की कि ऐसा ही घुमाव चाहिये. सबसे बढ़कर यह कि गायकी की श्रेष्ठता के साथ संगीतकार या गीतकार/शायर चाहता है कि जो शब्द लिखे गए हैं उनकी अदायगी स्पष्ट हो,उच्चारण एकदम ख़ालिस हों और गायकी के वैभव के साथ ग़ज़ल या गीत का भाव जैसा लिखा गया है उसे दूगुना करने वाला हो.ये सारी भूमिका मैने इसलिये बांध दी है कि लता मंगेशकर की गायकी पर बहस करना बहुत आसान है ; उन प्रेशर्स को महसूस करना बहुत मुश्किल जो ग़ालिब या दीगर एलबम्स को रेकॉर्ड करते वक़्त लताजी ने जिये हैं.

लता मंगेशकर ने कहा है कि संगीतकार सज्जाद और ह्र्दयनाथ मंगेशकर के कम्पोज़िशन्स गाते हुए वे विशेष रूप से सतर्क हो जाती हैं,बात सही भी है. इन दोनो संगीतकारों ने अपने समय से अलग हटकर संगीत रचा है. आज जो बात मैंने लता मंगेशकर के बारे में कही है वह संभवत: पहली बार आवाज़ के ज़रिये ही कह पाया हूँ और उम्मीद करता हूँ कि ग़ालिब जैसा क्लिष्ट और लीक के हट कर रचा गया एलबम सुनते वक़्त आप मेरी बातों का स्मरण बनाए रखेंगे. तो सुनिए जनाब...लता+हृदयनाथ जुगलबंदी का करिश्मा.......ग़ालिब.

कभी नेकी भी उसके जी में गर....(ये ग़ज़ल आशा ने भी गई बाद में, जो आपको फ़िर कभी सुनवायेंगे)



नक्श फरियादी है...



हजारों ख्वाहिशें ऐसी...



बाज़ीच-ऐ-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे...



फ़िर मुझे दीदा-ऐ-दर याद आया...



रोने से और इश्क में बेबाक हो गए... (इस ग़ज़ल की धुन को हृदयनाथ मंगेशकर ने बरसों बाद फ़िल्म लेकिन में भी इस्तेमाल किया)


एक दुर्लभ चित्र स्मृति :आज आवाज़ पर नज़र आ रहे चित्र में -एक रेकॉर्डिंग के दौरान बतियाते हुए लताजी और उनके संगीतकार अनुज ह्र्दयनाथजी

Sunday, September 21, 2008

ग़ालिब का कलाम और लता का अंदाज़ - क़यामत

लता संगीत उत्सव की एक और पेशकश - लता सुगम समारोह, पढ़ें और सुनें संजय पटेल की कलम का और लता की आवाज़ का जादू 28 सितम्बर तक लता मंगेशकर की ग़ैर-फ़िल्मी रचनाओं के इस सुगम समारोह में.




लता मंगेशकर इस बरस पूरे ८० बरस की हो जाएंगी.सुरों की इस जीती-जागती किंवदंती का हमारे बीच होना हम पर क़ुदरत का एक अहसान है.आवाज़ के आग्रह पर हमारे चिर-परिचित संगीत समीक्षक श्री संजय पटेल ने हमारे लिये लताजी की कुछ ग़ैर-फ़िल्मी रचनाएँ,जिनमें ज़्यादातर उर्दू महाकवि ग़ालिब की ग़ज़लें शुमार हैं पर विशेष समीक्षाएँ की हैं .लताजी की इन रचनाओं पर संजय भाई २८ सितम्बर तक नियमित लिखेंगे.

लता मंगेशकर द्वारा स्वरबध्द और पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर द्वारा संगीतबध्द ग़ालिब की रचनाओं को सुनना एक चमत्कारिक अनुभव है. आज संगीत में जिस तरह का शोर बढ़ता जा रहा है उस समय में इन क्लासिकी ग़ज़लों को सुनना किसी रूहानी अहसास से गुज़रना है. चूँकि यह प्रस्तुतियाँ सुगम संगीत की अनमोल अमानत हैं; हमने इसे लता सुगम समारोह नाम दिया है...... आइये आज से प्रारंभ करते हैं लता सुगम समारोह.
उम्मीद है आवाज़ की ये सुरीली पेशकश आपको पंसद आएगी.


दुर्लभ रचनाओं को सिलसिला : लता सुगम समारोह : पहली कड़ी:


ग़ालिब,लता मंगेशकर और पं.ह्रदयनाथ मंगेशकर यानी सारा मामला ही कुछ अदभुत है.आवाज़ के भाई सजीव सारथी ने जब इस पेशकश पर अपनी बात कहने का इसरार किया तो मन रोमांचित हो उठा.सर्वकालिक महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के प्रभावशाली रचनाकार थे.उन्हें फ़ारसी शायरी पर बहुत फ़ख्र था किंतु उन्हें लोकप्रियता मिली उर्दू शायरी की बदौलत.वे न केवल एक बेजोड़ शायर थे लेकिन एक ज़िन्दादिल इंसान भी.उनके कई शेर ख़ुद अपने आप पर व्यंग्य करते हैं जिनमें वे तत्कालीन शायरी परिदृश्य को भी फ़टकार लगाते नज़र आते हैं.बहादुर शाह ज़फ़र(1854) ग़ालिब से इतने प्रभावित थे कि ज़िन्दगी भर उनको अपना उस्ताद मानते रहे.प्रेम ग़ालिब की शायरी का स्थायी भाव था लेकिन साथ ही तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति और निजी ज़िन्दगी की तल्ख़ियों को भी उन्होनें अपने लेखन में ख़ूबसूरती से शुमार किया.


सत्तर के दशक में पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर ने ग़ालिब एलबम रचा.बता दें कि ह्र्दयनाथ जी उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के गंडाबंद शागिर्द रहे हैं और पूरे मंगेशकर कुटुम्ब के कलाकरों को संगीत का संस्कार अपने दिवंगत पिता पं.दीनानाथ मंगेशकर जी से मिला जो अपने समय के महान रंगकर्मी और गायक थे.जब यह एलबम रचा गया है तब सुगम संगीत की लोकप्रियता के लिये एकमात्र माध्यम आकाशवाणी और विविध भारती थे. संगीत को पत्रिकाओं और अख़बारों में कोई ख़ास जगह नहीं मिलती थी. समझ लीजिये संगीतप्रेमी अपने प्रयत्नों से इस तरह के एलबम्स को जुगाड़ते थे. ये ग़ज़ले विविध भारती के रंग-तरंग कार्यक्रम में ख़ूब बजी हैं और जन जन तक पहुँचीं है.ह्र्दयनाथजी बहुत परिश्रम से इस एलबम पर काम किया है. इनके कम्पोज़िशन्स को एक ख़ास मूड और टेम्परामेंट के हिसाब से रचा गया है जिसमें न केवल सांगीतिक उकृष्टता है बल्कि अठारहवीं शताब्दी के कालखंण्ड की प्रतिध्वनि भी है.राग-रागिनियों का आसरा लेकर ह्र्दयनाथजी ने लताजी से समय के पार का गायन करवा लिया है.सारंगी दरबार की शान हुआ करती थी इसलिये सुगम समारोह में ग़ालिब एलबम से जो भी ग़ज़लें हम सुनेंगे उनमें ये साज़ प्रधानता से बजा है,बल्कि ये भी कह सकते हैं कि लताजी के बाद सारंगी ही सबसे ज़्यादा मुखर हुई है. तबला भी एक ख़ास टोनल क्वालिटी के साथ बजा है और उसे ऊँचे स्वर(टीप) में मिला कर बजवाया गया है.किसी भी एलबम की सफलता में गायक और संगीतकार की आपसी ट्यूनिंग ही कमाल करती है, इस बात को ग़ालिब एलबम सुनकर सहज ही महसूस किया जा सकता है.यह एलबम संगीत की दुनिया का बेशक़ीमती दस्तावेज़ है.

लता मंगेशकर के बारे में अगली पोस्ट्स में तफ़सील से चर्चा करेंगे,लेकिन आज सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा कि लता जी ने संख्या की दृष्टि से कितना गाया यह मह्त्वपूर्ण नहीं , क्या गाया है यह अधिक महत्वपूर्ण है. जो हरक़ते उनके गले से इस एलबम में निकलीं है वे बेमिसाल हैं.इस एलबम को यदि एक बैठक में सुन लिया जाए तो लता जी के आलोचक भी सिर्फ़ ग़ालिब गायन के लिये इस सर्वकालिक महान गायिका को भारतरत्न दे सकते हैं.सत्तर के दशक में लताजी की आवाज़ जैसे एक संपूर्ण गायक की आवाज़ थी.रचना के साथ स्वर का निबाह करना तो कोई लताजी से सीखे.वे इस एलबम को गाते गाते स्वयं ग़ालिब के दौर में पहुँच गईं हैं और अपने सुरों की घड़ावन से ऐसा अहसास दे रही हैं मानो इस एलबम की रेकॉर्डिंग दिल्ली दरबार में ही हुई हो.बिला शक यह कह सकता हूँ कि यदि ग़ालिब भी लता जी को सुन रहे होते तो उनके मुँह से वाह बेटी ;वाह ! सुभानअल्लाह निकल ही जाता ।

आग़ाज़ करते हैं ग़ालिब की इन दो ग़ज़लों से..........

दर्द मिन्नत कशे दवा ना हुआ...



हर एक बात पे कहते हो तुम...

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