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Sunday, May 22, 2011

जब उसने गेसु बिखराये...एक अदबी शायर जो दशक दर दशक रचता गया फ़िल्मी गीतों का कारवाँ भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 661/2011/101

"वो तो है अलबेला, हज़ारों में अकेला"। फ़िल्म 'कभी हाँ कभी ना" के गीत के ये शब्द ख़ुद उन पर भी लागू होते हैं जिन्होंने इसे लिखा है। १९४६ से लेकर अगले पाँच दशकों तक एक से एक कामयाब, लाजवाब, सदाबहार गीत देने वाले इस फ़िल्मी गीतकार का शुमार अदबी शायरों में भी होता है। और केवल लेखन ही नहीं, हकीम शास्त्र में भी पारंगत इस लाजवाब शख़्स को हम सब जानते हैं मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से। आगामी २४ मई को मजरूह साहब की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य पर आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु हो रही है उनके लिखे दस अलग अलग संगीतकारों की स्वरबद्ध फ़िल्मी रचनाओं पर आधारित हमारी नई लघु शृंखला '...और कारवाँ बनता गया'। १९४५ में साबू सिद्दिक़ी इंस्टिट्युट में आयोजित एक मुशायरे में भाग लेने के लिये मजरूह साहब बम्बई तशरीफ़ लाये थे। वहाँ उनकी ग़ज़लों और नज़्मों का श्रोताओं पर गहरा असर हुआ और इन श्रोताओं में फ़िल्मकार ए. आर. कारदार भी शामिल थे। कारदार साहब नें फिर जिगर मोरादाबादी को सम्पर्क किया जिन्होंने उनकी मुलाक़ात मजरूह से करवा दी। लेकिन मजरूह साहब नें फ़िल्मों के लिये लिखने से मना कर दिया क्योंकि फ़िल्म में लिखने को वो ऊँचा काम नहीं मानते थे। लेकिन जिगर साहब के अनुरोध और यह समझाने पर कि फ़िल्मों के लिये गीत लिखने से उन्हें अच्छे पैसे मिल सकते हैं जिससे वो अपने परिवार का अच्छा भरन-पोषण कर सकते हैं, मजरूह साहब मान गये। कारदार साहब मजरूह को लेकर सीधे नौशाद साहब के पास गये जो उन दिनों 'शाहजहाँ' फ़िल्म के गीत रच रहे थे। नौशाद नें मजरूह को एक धुन सुनाई और उनसे कहा कि उस मीटर पर कुछ लिखे। और मजरूह साहब की क़लम से निकले "जब उसने गेसु बिखराये, बादल आये झूम के"। नौशाद साहब को पसंद आई और इस तरह से ख़ुमार बाराबंकवी के साथ मजरूह भी बन गये फ़िल्म 'शाहजहाँ' का हिस्सा।

तो दोस्तों, आइए मजरूह साहब के लिखे इस पहले पहले गीत से ही इस शृंखला का शुभारंभ किया जाये। शम्शाद बेगम की आवाज़ में है यह गीत "जब उसने गेसु बिखराये"। इसी फ़िल्म के सहगल साहब के गाये तीन गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं, इसलिए आज के इस अंक में हम सहगल साहब के गाये गीतों की चर्चा नहीं करेंगे। बस इतना ही कहेंगे कि नौशाद साहब की तरह मजरूह साहब को भी बस इसी एक फ़िल्म में सहगल साहब से अपने गीत गवाने का मौका मिला था। लेकिन कुंदनलाल सहगल से लेकर कुमार सानू तक, लगभग सभी गायकों नें उनके लिखे गीत गाये और अपार शोहरत हासिल की। आज क्योंकि नौशाद साहब की रचना हम आप तक पहूँचा रहे हैं, तो गीत सुनने से पहले ये रहे चंद शब्द जो नौशाद साहब नें कहे थे मजरूह साहब की शान में - "मजरूह सिर्फ़ उर्दू के शायर ही नहीं थे, वो तो हाफ़िज़-ए-क़ुरान थे साहब! कोई मसला पूछना हो तो वो अरबी-फ़ारसी से रेफ़्रेन्स दिया करते थे। जहाँ तक उनकी शायरी का सवाल है, वो एक मुकम्मल शायर थे। उनकी शायरी में कोई झोल नहीं था। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के साथी थे, तरक्की पसंद शायरी की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी, उस वक़्त वे जैल में थे। उनकी जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है। मुझे इस बात का फ़क्र है कि मैंने ही उनको मुशायरे से उठाकर फ़िल्म लाइन में ले आया। भिंडी बाज़ार की पंजाबी शायरी में मैं उनसे मिला था। शक़ील, ख़ुमार और मजरूह, इन तीनों को मैंने ही मुशायरे से कारदार स्टुडिओज़ ले गया था। फ़नकार कभी मरता नहीं है, अपने फ़न से वो हमेशा ज़िंदा रहता है और मजरूह अपने गीतों के ज़रिये अमर रहेंगे।" आइए मजरूह साहब के लिखे गीतों का कारवाँ शुरु करते हैं शमशाद बेगम के गाये इस गीत के साथ।



क्या आप जानते हैं...
कि शक़ील बदायूनी और नौशाद साहब का साथ शुरु होने से लेकर शक़ील साहब की मृत्यु तक केवल एक ऐसी फ़िल्म बनी जिसमें नौशाद साहब नें मजरूह के लिखे गीतों को स्वरबद्ध किया था, और यह फ़िल्म थी 'अंदाज़' (१९४९)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - प्रदीप कुमार नायक थे फिल्म के.
सवाल १ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका कौन है - ३ अंक
सवाल ३ - गायिका बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी और अनजाना जी आप दोनों के फैसले के हम सम्मान करते हैं, इसलिए आज पहली काफी आसान दे रखी है देखते हैं कौन कौन आगे आते हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, April 29, 2010

जब गायक मुकेश ने याद किया राज कपूर की पहली फिल्म को

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०९

मशाद बेग़म की आवाज़ में ४० के दशक का वह गीत याद है ना "काहे कोयल शोर मचाए रे, मोहे अपना कोई याद आए रे"? आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में इसी गीत की बारी। गीत सुनने से पहले ये हैं गायक मुकेश के उदगार राज कपूर की इस पहली पहली फ़िल्म के बारे में। "जिस मोती के बारे मे मै आज ज़िक्र कर रहा हूँ अमीन भाई, उस मोती का नाम है राज कपूर। और मैं राज के ज़िंदगी से ही तीन हिस्से पेश करूँगा। बिल्कुल साफ़ है अमीन भाई, पहले हिस्से को कहूँगा 'आग', दूसरे को 'बरसात से संगम', और तीसरे को 'जोकर से बौबी'। मैं उस ज़माने की बात कर रहा हूँ जब रणजीत स्टूडियो के अंदर हम लोग 'ट्रेनिंग्' किया करते थे। राज कपूर को लेकर चंदुलालजी के पास आये पापाजी। पापाजी यानी कि पृथ्वीराज साहब। और कहने लगे कि 'देखिये, यह मेरे साहबज़ादे हैं, यह फ़िल्म मे जाना चाहता है, और मै चाहूँगा कि यह 'फ़िल्म-मेकिंग्' के हर एक 'ब्रांच' को सीखे और कूली के काम से शुरु करे'। अमीन भाई, ऐसा है कि पापाजी ने राज मे कुछ गुण तो देख ही लिये थे पृथ्वी थियटर्स मे काम करते वक़्त, तो वो चाहते थे कि जब यह फ़िल्म मे जा ही रहा है तो पूरी पूरी तरह से सारा काम सीखे। तो वो बन गये वहाँ किदार शर्मा साहब के सहायक। वह क्या था कि शर्मा जी ने सहायक के अंदर 'हीरो' भी देख लिया, और शर्माजी ने उन्हे 'नीलकमल' मे 'हीरो' बना दिया। अमीन भाई, एक दिन हम रणजीत स्टूडियो मे बैठे थे। हज़रत के पास एक टूटी-फूटी फ़ोर्ड गाड़ी हुआ करती थी उन दिनों। तो उसमे बिठाया हमें और ले गये बहुत दूर एक जगह। वहाँ ले जाकर अपना फ़ैसला सुनाया कि 'हम एक फ़िल्म 'आग' बनाना चाहते हैं'। तो कुछ 'सीनस्' भी सुनाये। 'सीनस्' तो पसंद आये ही थे मगर मुझे जो ज़्यादा बात पसंद आयी, वह थी कि जिस जोश के संग वो बनाना चाहते थे 'आग' को।" लेकिन 'आग' बनाते समय राज कपूर को काफ़ी तक़लीफ़ों का सामना करना पड़ा था, इस सवाल पर मुकेश कहते हैं - "काफ़ी तकलीफ़ें, अमीन भाई कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। पैसे की तकलीफ़ें, डेटों की तकलीफ़ें, यानी कि फ़िल्म बनाते समय जो जो तकलीफ़ें आ सकती हैं एक 'प्रोड्युसर' को। वह इम्तिहान था राज कपूर का। फ़िल्म बन भी गयी तो कोई ख़रीदार नहीं। ख़रीदार आये तो हमारा मज़ाक उड़ाया करे। एक ने तो यहाँ तक भी कहा कि 'राज साहब, अगर 'आग' आप ने बनायी है तो अपना थियटर भी बना लीजिये, ताकी आग लगे तो आप ही की थियटर मे लगे।' और आग की जलन मिटाने के लिए फिर 'बरसात' बनी। 'आग' के फ़ेल हो जाने के बावजूद राज कपूर पास हो गये।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - काहे कोयल शोर मचाये...
कवर गायन - पारसमणी आचार्य




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Thursday, April 1, 2010

उड़न खटोले पर उड़ जाऊं.....बचपन के प्यार को अभिव्यक्त करता एक खूबसूरत युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 391/2010/91

युगल गीतों की जब हम बात करते हैं, तो साधारणत: हमारा इशारा पुरुष-महिला युगल गीतों की तरफ़ ही होता है। मेरा मतलब है वो युगल गीत जिनमें एक आवाज़ गायक की है और दूसरी आवाज़ किसी गायिका की। लेकिन जब भी युगल गीतों में ऐसे मौके आए हैं कि जिनमें दोनों आवाज़ें या तो पुरुष हैं या फिर दोनों महिला स्वर हैं, ऐसे में ये गानें कुछ अलग हट के, या युं कहें कि ख़ास बन जाते हैं। आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं पार्श्वगायिकाओं के गाए हुए युगल गीतों, यानी कि 'फ़ीमेल डुएट्स' पर आधारित हमारी लघु शृंखला 'सखी सहेली'। इस शूंखला में हम १० फ़ीमेल डुएट्स सुनेंगे, यानी कि १० अलग अलग गायिकाओं की जोड़ी के गाए गीतों का आनंद हम उठा सकेंगे। ४० से लेकर ७० के दशक तक की ये जोड़ियाँ हैं जिन्हे हम शामिल कर रहे हैं, और हमारा विश्वास है कि इन सुमधुर गीतों का आप खुले दिल से स्वागत करेंगे। तो आइए शुरुआत की जाए इस शूंखला की। पहली जोड़ी के रूप में हमने एक ऐसी जोड़ी को चुना है जिनमें आवाज़ें दो ऐसी गायिकाओं की हैं जो ४० और ५० के दशकों में अपनी वज़नदार और नैज़ल आवाज़ों की वजह से जाने जाते रहे। ४० का दशक इस तरह की वज़नदार आवाज़ों का दशक था और उस दशक में कई इस तरह की आवाजें सुनाई दीं। तो साहब, आज जिन दो आवाज़ों को हम आज शामिल कर रहे हैं वो हैं ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म। युं तो इन दोनों ने साथ साथ कई युगल गीत गाए हैं, लेकिन मेरे ख़याल से इस जोड़ी का जो सब से मशहूर गीत रहा है वह है फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का, और जिसके बोल हैं "उड़न खटोले पे उड़ जाऊँ, तेरे हाथ ना आऊँ"। दो बाल कलाकारों पर फ़िल्माया हुआ यह गाना है। १९४६ की यह फ़िल्म, तनवीर नक़वी का गीत और नौशाद अली का संगीत। युं तो इस फ़िल्म के दो और गीत हम आप तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पहुँचा चुके हैं, और फ़िल्म की तमाम बातें भी कह चुके हैं, इसलिए क्यों ना आज कुछ और बातें की जाए!

पार्श्वगायिकाओं की इस जोड़ी की अगर हम बात करें तो शम्शाद बेग़म जी के बारे में तो आप सभी को तमाम बातें मालूम होंगी, लेकिन बहुत कम ही ऐसे लोग होंगे जिन्हे ज़ोहराबाई अम्बालेवाली के बारे में अधिक जानकारी हो। इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना आज के इस अंक के बहाने हम ज़ोहराबाई से आपका परिचय करवाएँ! 'ज़ोहरा जान ऒफ़ अम्बाला' नाम से सन् १९३७-३८ में ऒल इण्डिया रेडियो के दिल्ली, लाहौर, पेशावर केन्द्रों से गायन जीवन प्रारम्भ करने वाली ज़ोहराबाई से सन् १९३८ में संगीतकार अनिल बिस्वास ने सब से पहले सागर मूवीटोन कृत 'ग्रामोफ़ोन सिंगर' फ़िल्म के लिए गीत गवाया था। उसके बाद 'हम तुम और वह ('३८), 'बहूरानी' ('४०), 'हिम्मत' ('४१), 'रिटर्ण ऒफ़ तूफ़ान मेल' ('४२), 'तलाश' ('४३), 'विजयलक्ष्मी' ('४३) आदि फ़िल्मों में गीत गाए, लेकिन उन्हे असली कामयाबी जिस फ़िल्म से मिली, वह फ़िल्म थी 'रतन'। इस फ़िल्म का "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके" गीत सब से ज़्यादा कामयाब रहा, जिसे हमने आपको इसी महफ़िल में भी सुनवाया था। नौशाद साहब ने 'रतन' के बाद भी अपनी कई फ़िल्मों में ज़ोहराबाई से गानें गवाए जैसे कि 'जीवन' ('४४), 'पहले आप' ('४४), 'सन्यासी' ('४५), 'अनमोल घड़ी' ('४६), 'एलान' ('४७), 'नाटक' ('४७) और 'मेला' ('४८)। हरमंदिर सिंह 'हमराज़' के प्रसिद्ध 'गीत कोश' के मुताबिक ज़ोहराबाई ने ४० के दशक में कुल १२२९ गीत गाए हैं। इस दशक के अधिकाँश ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स पर गीत गाने वाले पार्श्वगायकों के सही दिए जाने के बजाए पात्र का नाम दिए जाने की प्रथा लागू थी। अत: अनुमान है कि ज़ोहराबाई ने लगभग १५०० गीत गाए होंगे। उनके गाए गीतों की अनुमानित संख्या उन सभी पार्श्वगायिकाओं के गाए गीतों से अधिक हैं जो उस समय मशहूर थीं। दोस्तों, ये तमाम जानकारियाँ हमने बटोरी है 'लिस्नर्स बुलेटिन' अंक ८१ से, जो प्रकाशित हुआ था मई १९९० में। आप को यह भी बता दें कि ज़ोहराबी का २१ फ़रवरी १९९० को ६८ वर्ष की आयु में बम्बई में निधन हो गया था। तो चलिए दोस्तों, ज़ोहराबाई और शमशाद बेग़म के साथ साथ हम भी उड़न खटोले की सैर पे निकलते हैं और सुनते हैं यह यादगार गीत जो हमें याद दिलाती है उस पुराने दौर की जब ऐसी वज़नदार और नैज़ल आवाज़ वाली गायिकाओं का राज था।



क्या आप जानते हैं...
कि १९५३ की फ़िल्म 'तीन बत्ती चार रास्ते' के एक सहगान में जब ज़ोहराबाई अम्बालेवाली को केवल एकाध लाइन गाने का अवसर दिया गया तो उन्होने फ़िल्म जगत से सन्यास लेने में ही भलाई समझी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"चाँद", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिकाओं ने जिन्होंने इस गीत को गाया है सुरैया और _____, बताएं कौन हैं ये- २ अंक.
3. ए आर कारदार निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं-२ अंक.
4. नौशाब साहब का था संगीत, गीतकार बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी, पाबला जी, इंदु जी, और पदम् जी को बधाई.....अवध जी आपका अंदाजा एकदम सही है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, May 11, 2009

मेरी नींदों में तुम...कहा शमशाद बेगम ने किशोर दा से इस दुर्लभ गीत में...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 77

दोस्तों, कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं जिन्हे परदे पर देखते ही जैसे गुदगुदी सी होने लगती है। और कुछ अभिनेत्रियाँ ऐसी हैं जिनका नाम दर्द और संजीदे चरित्रों का पर्याय है। अब अगर ऐसे एक हास्य अभिनेता के साथ ऐसी कोई संजीदे और दर्दीले चरित्र निभानेवाली अभिनेत्री की जोड़ी किसी फ़िल्म में बना दी जाए तो कैसा हो? जी हाँ, किशोर कुमार और मीना कुमारी की जोड़ी भी एक ऐसी ही जोड़ी रही है और ये दोनो साथ साथ नज़र आए थे १९५६ में के. अमरनाथ की फ़िल्म 'नया अंदाज़' में। १९५६ में संगीतकार ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी कुल ८ फ़िल्में आयीं - भागमभाग, सी. आई. डी, छूमंतर, ढाके की मलमल, हम सब चोर हैं, मिस्टर लम्बु, श्रीमती ४२०, और नया अंदाज़। हालाँकी नय्यर साहब और किशोर कुमार का साथ बहुत ज़्यादा नहीं रहा है, बावजूद इसके इन दोनो ने एक साथ कई यादगार फ़िल्में की हैं और तीन फ़िल्में तो इसी साल यानी कि १९५६ में ही आयी थी - भागमभाग, ढाके की मलमल, और नया अंदाज़। इससे पहले इन दोनो ने साथ साथ १९५२ की फ़िल्म 'छम छमा छम' और १९५५ में 'बाप रे बाप' में काम किया था। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में ओ. पी. नय्यर और किशोर कुमार के इसी अदभुत जोड़ी को सलाम करते हुए 'नया अंदाज़' फ़िल्म का एक युगल-गीत पेश है "मेरी नींदों में तुम मेरे ख़्वाबों में तुम, हो चुके हम तुम्हारी मोहब्बत में गुम"।

अभी अभी हमने इस बात का ज़िक्र किया था कि किस तरह से किशोर कुमार और मीना कुमारी एक दूसरे से बिल्कुल विपरित शैली के अभिनेता होते हुए भी इस फ़िल्म में साथ साथ नज़र आये। ठीक इसी तरह से इस गीत को गानेवाले कलाकारों की जोड़ी भी बड़ी अनोखी है। किशोर कुमार और शमशाद बेग़म, जी हाँ, इन दोनो ने साथ साथ इतने कम गाने गाये हैं कि इन दोनो को एक साथ गाते हुए सुनना भी एक अनोखा अनुभव है। विविध भारती के 'दास्तान-ए-नय्यर' कार्यक्रम में जब नय्यर साहब से यह पूछा गया कि "यह जो 'काम्बिनेशन' है किशोर कुमार और शमशाद बेग़म का, बिल्कुल 'इम्पासिबल' सा लगता है", तो उन्होने कहा, "सुनने में फिर कैसे 'पासिबल' लगता है! साहब, यही बस 'काम्पोसर' के पैंतरें हैं, और पंजाबी में कहते हैं कि "लल्लु करे क़व्वालियाँ रब सिद्धियाँ पाये", तो हम तो भगवान के लल्लु पैदा हुए हैं, उसने जो कराया करा दिया।" तो लीजिये सुनिए गीतकार जाँ निसार अख्तर का लिखा रूमानियत से भरपूर यह नरमोनाज़ुक दोगाना। गाने में 'पियानो' का बड़ा ही ख़ूबसूरत इस्तेमाल किया है नय्यर साहब ने। 'पियानो' से याद आया कि नय्यर साहब अपने गीतों की धुनें हमेशा 'पियानो' पर बैठकर ही बनाया करते थे।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. तलत - लता का एक नायाब युगल गीत.
२. संगीतकार हैं हंसराज बहल.
३. मुखड़े में शब्द युगल है - "सपने सुहाने".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
सुमित जी इस बार आप चूक गए, आपने जिस गीत का जिक्र किया वो तो अमित कुमार ने गाया है....एक बार फिर पराग जी ने बाज़ी मारी...बहुत बहुत बधाई...विजय तिवारी जी आपका भी महफिल में स्वागत है...गजेन्द्र जी, आप ई-चिट्ठी का इंतज़ार न कर भारतीय समयानुसार शाम 6 से 7 बजे के बीच सीधे आवाज़ पहुँच जाया करें, तब आप भी पहले विजेता हो सकते हैं...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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