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Tuesday, April 27, 2010

बुल्ले शाह के "रांझा-रांझा" को "रावण" के रंग में रंग दिया रहमान और गुलज़ार ने... साथ है "बीरा" भी

ताज़ा सुर ताल १६/२०१०

सुजॊय - ताज़ा सुर ताल' के एक नए अंक के साथ हम सभी श्रोताओं व पाठकों का हार्दिक स्वागत करते हैं। पिछले हफ़्ते किसी कारण से 'टी.एस.टी' की यह महफ़िल सज नहीं पाई थी। दोस्तों, सजीव जी इन दिनों छुट्टियों के मूड में हैं, इसलिए आज मेरे साथ 'ताज़ा सुर ताल' में उनकी जगह पर हैं विश्व दीपक तन्हा जी। विश्व दीपक जी, वैसे तो आप 'आवाज़' में नए नहीं हैं, लेकिन इस स्तंभ में आप पहली बार मेरे साथ हैं। इसलिए मैं आपका स्वागत करता हूँ।

विश्व दीपक - शुक्रिया सुजॊय जी! मुझे भी बेहद आनंद आ रहा है इस स्तंभ में शामिल हो कर। वैसे मैं एक बार आपकी अनुपस्थिति में फ़िल्म 'रण' के गीत संगीत की चर्चा कर चुका हूँ इसी स्तंभ में। इसलिए यह कह सकते हैं कि यह दूसरी मर्तबा है कि मैं इस स्तंभ में शामिल हूँ बतौर होस्ट और जिस तरह का सजीव जी का मूड है, उस हिसाब से मुझे लगता है कि अगले एक-डेढ महीने तक मैं आपके साथ रहूँगा। खैर यह बताईये कि आज किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने का इरादा है?

सुजॊय - देखिए इन दिनों जिन फ़िल्मों के प्रोमोज़ और गीतों की झलकियाँ दिखाई व सुनाई दे रहीं हैं, उनमें कुछ नाम हैं 'बदमाश कंपनी', 'हाउसफ़ुल', 'मुस्कुराकर देख ज़रा'। लेकिन इन सब से बिल्कुल अलग हट कर जो फ़िल्म आनेवाली है और जिसके प्रति लोगों की उत्सुक्ता दिन ब दिन बढ़ती सी दिखाई दे रही है, वह फ़िल्म है 'रावण'। ऐसे में इस फ़िल्म की चर्चा इस स्तंभ में अनिवार्य हो जाता है।

विश्व दीपक - बिल्कुल ठीक कहा। मणिरत्नम निर्मित एवं निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय, विक्रम, गोविंदा, प्रियामणि, रविकिशन और निखिल द्विवेदी ने। गुलज़ार के गीत हैं और संगीत ए. आर. रहमान का।

सुजॊय - यानि कि पूरी की पूरी एक ज़बरदस्त टीम। देखना है कि अभिषेक-ऐश के साथ रहमान की तिकड़ी क्या वही कमाल दिखाती है जो कमाल फ़िल्म 'गुरु' में हुआ था!

विश्व दीपक - सिर्फ़ अभि-ऐश के साथ ही क्यों, मणिरत्नम और रहमान की ऐतिहासिक जोड़ी शुरु हुई थी १९९२ में 'रोजा' से। उसके बाद 'बॊम्बे', 'दिल से', 'साथिया', 'युवा' और 'गुरु' जैसी यादगार फ़िल्में। ऐसे में अगर लोगों को 'रावण' के म्युज़िक से उम्मीदें हैं तो वो जायज़ हीं हैं। तो चलिए शुरू करते हैं गीतों का सिलसिला। सुनते हैं पहला गीत और फिर चर्चा आगे बढ़ाते हैं।

गीत: बीरा बीरा


सुजॊय - दरअसल यह गीत फ़िल्म के मुख्य पात्र बीरा (अभिषेक बचन) से संबंधित है। जैसा कि आपने सुना कि गीत की धुन और रीदम ट्राइबल अंदाज़ का है। विजय प्रकाश, मुस्तफ़ा कुटोन और कीर्ति सगठिया का गाया यह गीत हो सकता है कि अलग से सुन कर बहुत ज़्यादा अपील ना करे, लेकिन फ़िल्म की कहानी, पात्र और सिचुयशन के मुताबिक ज़रूर सटीक होगी!

विश्व दीपक - और इस गीत की अवधि भी इतनी कम है कि जब तक इसकी रीदम और धुन ज़हन में चढ़ती है, तब तक गीत समाप्त हो चुका होता है। वैसे इसी तरह का एक गीत गुलज़ार साहब ने "ओंकारा" में भी लिखा था। वहाँ भी मुख्य नायक के इंट्रोडक्शन के लिए एक विशेष गीत की ज़रूरत थी। अलग बात यह है कि वहाँ पर गाने में दो अंतरे थे, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहब को अपनी बात एक हीं अंतरे में कहनी थी। और मेरे हिसाब से वो इसमें सफ़ल हुए हैं। सुजोय जी, शायद आपने यह ध्यान न दिया हो लेकिन इस गीत में रहमान की भी आवाज़ है, भले हीं उनका नाम सीडी कवर पर नहीं दिखता। यह तो आपको मानना हीं पड़ेगा कि अलग किस्म का संगीत है इसमें और हाँ कुछ-कुछ अफ़्रीकन तो कुछ-कुछ चाईनीज अफ़ेक्ट भी है।

सुजॊय - जी.. मुस्तफ़ा कुटोन का इस्तेमाल रहमान ने शायद इसी कारण से किया है। क्योंकि उनकी आवाज़ में एक्ज़ोटिक टच है।

विश्व दीपक - बहुत हद तक संभव है। चलिए अब आगे बढ़ते हैं और आ जाते है दूसरे गीत पर। पहले गीत से बिल्कुल अलग यह गीत है "बहने दे मुझे बहने दे"। इस गीत को सुनते हुए फ़िल्म 'दिल से' के "सतरंगी रे" की याद आ ही जाती है।

सुजॊय - हाँ, ख़ास कर "बहने दे" "सतरंगी रे" के अंतरे "थोड़ा थोड़ा उन्स हुआ... मुझे मौत की गोद में सोने दे" से कुछ कुछ मिलता जुलता है। और इन दोनों गीतों में रहमान का स्टाइल साफ़ झलकता है। "सतरंगी" सोनू निगम की आवाज़ में था, और यह गीत गाया है कार्तिक ने। कार्तिक से रहमान ने फ़िल्म 'गजनी' में "बहका मैं बहका" गवाया था।

विश्व दीपक - कार्तिक ने हिंदी में बहुत कम गानें गाए हैं, लेकिन जो भी दो चार गानें इन्होने गाए हैं, सभी अच्छे हैं। उन्हे और ज़्यादा मौके मिलने चाहिए। इस गीत में बहुत सी अलग-अलग ध्वनियों का सहारा लिया गया है। कई उतार चढ़ाव को पार करते हुए ६ मिनट के इस गीत में कार्तिक एक ऐसे शख़्स के दिल की ख़्वाहिशें बयान करते हैं जो सारे बंधनों को तोड़ कर एक ज़िंदगी जीना चाहता है जो उसकी उसूलों पर हो।

गीत: बहने दे


सुजॊय - 'रावण' फ़िल्म का तीसरा गीत एक बार फिर "बीरा बीरा" के अंदाज़ का है। सुखविंदर सिंह की आवाज़ में एक ऐटिट्युड है, जो उन्होने कई गीतों में समय समय पर दिखाया है। इस गीत में भी उनकी गायकी का वही ऐटिट्युड भरा अंदाज़ सुनाई देता है। यह गीत है "ठोक दे किल्ली"

विश्व दीपक - इस गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है। ढोलक, पार्श्व में कोरस, शहनाई, और इलेक्ट्रिक गिटार, इन सब के फ़्युज़न से यह गीत एक प्रयोगधर्मी गीत बन गया है, और उस पर गुलज़ार साहब के ग़ैर पारंपरिक बोलों से गीत अनूठा बन गया है। लेकिन यह बात भी सच है कि इस तरह के गानें पूरी तरह से सिचुयशनल होते हैं जो फ़िल्म के परदे पर ही फ़िट बैठते हैं। आम जनता की ज़ुबाँ पर ये गानें मुश्किल से ही चढ पाते हैं।

सुजॊय - दरअसल यह फ़िल्म पर निर्भर करता है कि उसका संगीत किस तरह का होना चाहिए। अगर कहानी और प्लॊट अनुमति नहीं दे रहे हैं, तो संगीतकार भी कुछ ख़ास नहीं कर पाता। कुछ फ़िल्में संगीत के बलबूते पर चलती है और कुछ कहानी, अभिनय के बलबूते। उम्मीद करता हूँ कि यह फिल्म दोनों मायनों में सफ़ल हो।

विश्व दीपक - सुजोय जी, मैं आपकी बातों से इत्तेफ़ाक रखता हूँ। और वैसे भी कोई गाना कितना भी सिचुएशनल क्यों न हो, अगर उस गाने में रहमान और गुलज़ार साहब के नाम जुड़ जाते है, तो उस गाने का असर दूसरे सिचुएशनल गानों से कहीं ज्यादा होता है। जैसे कि इसी गाने को ले लीजिए... गुलज़ार साहब ने बड़े हीं आसान शब्दों (किल्ली, बिल्ली, खिल्ली, दिल्ली... ) में बहुत हीं बड़ी कह दी है.. उदाहरण के लिए यह पंक्ति "अबकी बार हिसाब चुका ले, छिन के ले ले अपना हिस्सा.. अपना खून भी लाल हीं होगा... खोल के देख ले खाल की झिल्ली"।

गीत: ठोक दे किल्ली


विश्व दीपक - चौथा गीत है "रांझा रांझा ना कर हीरे जग बदनामी होये"। रेखा भारद्वाज, जावेद अली और अनुराधा श्रीराम के गाए इस गीत से आपको सुभाष घई की फ़िल्म 'ताल' के संगीत की याद न आ जाए तो कहिएगा। लोक शैली पर बना यह गीत जोशीला भी है, सेन्शुयल भी है, और सूफ़ियाना अंदाज़ का है। लोक संगीत के साथ में मोडर्न बीट्स और गिटार का सुंदर फ़्युज़न किया गया है इस गाने में।

सुजॊय - अनुराधा श्रीराम की आवाज़ बहुत दिनों के बाद सुनने में आई है। गुलज़ार साहब के लोकशैली के बोल बेहद असरदार हैं। वैसे गीत के शुरुआती बोलों(रांझा-रांझा करदी वे मैं आप्पे रांझा होई.. रांझा-रांझा सद्दो नी मैनु हीर न आंके कोई) का क्रेडिट सूफ़ी कवि बाब बुल्ले शाह को दिया गया है। मेरा ख़याल है इस साल के टॊप-१० गीतों में यह गीत शोभा पाएगी, देखते हैं क्या होता है!

विश्व दीपक - जी हाँ, मुझे भी इस गीत से पुरी उम्मीद है। "रेखा भारद्वाज" अपनी आवाज़ से ऐसा मायाजाल बुनती हैं कि उससे बाहर निकलना हम जैसे संगीत के साधकों के लिए संभव नहीं। "रांझा-रांझा" कहते समय उनकी आवाज़ का "हस्कीनेस" चरम पर मालूम पड़ता है। जावेद अली रहमान के पसंदीदा गायक होते जा रहे हैं और इस गाने में रेखा भारद्वाज के साथ इन्हें मौका देकर (जबकि इन दोनों की गायन-शैली पूरी अलग है) रहमान ने जावेद अली में अपना यकीन दर्शाया है। वैसे मैं यह सोच रहा था कि अगर जावेद अली की जगह कैलाश खेर होते तो गाने का सूफ़ियाना असर कमाल का होता। हो सकता है कि रहमान ने कुछ और सोचा हो। चलिए हम यह गाना सुन लेते हैं।

गीत: रांझा रांझा


सुजॊय - 'रावण' का साउंडट्रैक विविधता से भरा है। अब जो पाँचवा गीत हम सुनने जा रहे हैं, वह एक बहुत ही नर्म और कर्णप्रिय गीत है रीना भारद्वाज की आवाज़ में। यह गीत है "खिली रे"। यह एक उपशास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत है। इसमें नवीन कुमार की बांसुरी और असद ख़ान का बजाया सितार सुनने को मिलता है। तबले का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

विश्व दीपक - रीना भारद्वाज की आवाज़ बहुत ही मीठी है, पता नहीं उन्हे गायन के ज़्यादा मौके क्यों नहीं मिल पाए हैं। रीना जी ने जितने भी गानें गाए है, वो ज़्यादातर रहमान के लिए ही हैं। फिर एक बार सिचुयशनल गीत होने की वजह से इसकी लोकप्रियता पर प्रशचिन्ह लग जाता है। इस गीत को ऐश्वर्य राय पर फ़िल्माया गया होगा और रीना जी की आवाज़ उन पर बहुत ही फ़िट बैठी है। यानी कि अच्छा प्लेबैक!!

गीत: खिली रे


विश्व दीपक - 'रावण' एल्बम का आख़िरी गीत एक समूहगान है "कटा कटा बकरा"। दरसल यह एक हास्य रस का गीत है। सिचुयशन है कि एक आदमी की शादी हो रही है और उसके दोस्त लोग उसका मज़ाक उड़ाते हुए गा रहे हैं "कटा कटा बकरा"। समूह स्वरों में आप इला अरुण, सपना अवस्थी और कुणाल गांजावाला की आवाज़ें भी महसूस कर सकते हैं।

सुजॊय - इतना हीं नहीं इन तीनों के अलावा इस गाने में आठ और आवाज़े हैं.. लगता है कि रहमान बैकिंग वोकल्स में भी कोई समझौता नहीं करना चाहते। जहाँ तक इला अरुण और सपना अवस्थी की गायकी का सवाल है तो इन दोनों की आवाज़ों में बहुत हद तक समानता है, लेकिन इससे पहले ये दोनों कभी साथ में सुनाई नहीं दी थीं।

विश्व दीपक -इस गीत का मूल भाव कुछ-कुछ फ़िल्म 'रोजा' के "रुकमणि रुकमणि" जैसा लगता है। सुनने मे आया है कि "कटा कटा" गीत के लिए मणिरत्नम ने ५०० डान्सर्स का सहारा लिया है और इस गीत की शूटिंग ५ दिनों में पूरी की गई है। बहुत सारे ड्रम, ढोलक, तालियों की थापें, और शहनाई से इस गाने का संयोजन किया गया है। इसके लिए श्रेय जाता है मशहूर संगीत संयोजक रंजीत बारोट को। क्या आपको इसमें 'जोधा अकबर' के "अज़ीम-ओ-शान शहन्शाह" की झलक मिलती है?

गीत: कटा कटा


"रावण" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - तो विश्व दीपक जी, इस सभी ६ गीतों को सुनने के बाद मेरा रवैय्या इस फ़िल्म के साउंडट्रैक के बारे में यह बनता है कि रहमान ने नए क़िस्म का संगीत और संगीत संयोजन हमें दिया है, लेकिन सभी गीत सिचुयशनल होने की वजह से जनता की ज़ुबान पर चढ़ पाना मुश्किल सा लगता है। मेरी व्यक्तिगत पसंद है "रांझा रांझा" गीत। इस फ़िल्म को मेरी तरफ़ से शुभकामनाएँ!!!

विश्व दीपक - आपका अंदेशा बेबुनियाद नहीं है। हो सकता है कि ये गाने फिल्म रीलिज होने के बाद हीं लोगों को पसंद आएँ। लेकिन मेरा हमेशा हीं यह व्यक्तिगत मत रहा है कि रहमान के गाने लोगों की समझ और लोगों की ज़हन पर धीरे-धीरे चढते हैं। इन दिनों रहमान हर फिल्म में कोई नया प्रयोग कर रहे हैं और इस कारण संगीत की मामूली या नहीं के बराबर समझ रखने वाले लोगों को रहमान के ये प्रयोग अटपटे-से लगते हैं। फिर भी मैं हर किसी से यह गुजारिश करूँगा कि बस एक बार(या एक बार भी नहीं) सुनकर इन गानों को खारिज़ न करें। गानों को आप पर असर करने का समय दें, फिर देखना कि आप कैसे इन गानों के दिवाने हो जाते हैं।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ४६- रीना भारद्वाज ने अपना पहला गीत रहमान की धुन पर ही गाया था। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४७- अनुराधा श्रीरम की गायकी में लोक शैली की झलक हम इससे पहले अनिल कपूर आभिनीत एक फ़िल्म में सुन चुके हैं। फ़िल्म और गीत बताइए।

TST ट्रिविया # ४८- यह अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्य राय की एक फ़िल्म का युगलगीत है। इस गीत के पुरुष गायक ने हृतिक रोशन के करीयर के पहली सुपरहिट फ़िल्म में भी एक धमाकेदार गीत गाया था। गीत के अंतरे में एक लाइन है "जीता था पहले भी मगर युं था लगता, सीने में शायद तेरी कुछ कमी है"। बताइए हम किस गीत की बात कर रहे हैं, फ़िल्म का नाम क्या है, और गायक कौन हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. इन तीनों फ़िल्मों में अभिनेताओं ने गीत गाए हैं, 'जोश' में शहरुख़ ख़ान (अपुन बोला तू मेरी लैला), 'हेल्लो ब्रदर' में सलमान ख़ान (चांदी की डाल पर सोने का मोर), और 'काइट्स' में हृतिक रोशन।
२. फ़िल्म 'अनुभव' के लिए राजेश रोशन ने गाया था "बाहों में आजा, सीने से मेरे तू लग जा सनम, दिल मेरा है बेक़रार"।
३. हृतिक ने ६ वर्ष की आयु में जीतेन्द्र - रीना रॊय अभिनीत फ़िल्म 'आशा' में पहली बार अभिनय किया था।

सीमा जी, आपका जवाब सही है। बधाई स्वीकारें।

Friday, October 24, 2008

तेरा दीवाना हूँ...मेरा ऐतबार कर...

दूसरे सत्र के सत्रहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज -

अपनी पहली ग़ज़ल "सच बोलता है..." गाकर रफ़ीक शेख ने ग़ज़ल गायन में अपनी पकड़ साबित की थी. आज वो लेकर आए हैं एक ताज़ी नज़्म -"आखिरी बार बस...". यह नज़्म रफ़ीक साहब की आवाज़ का एक नया अंदाज़ लिए हुए है, उनकी अब तक की तमाम ग़ज़लों से अलग इस नज़्म की नज़ाकत को उन्होंने बहुत बखूबी से निभाया है.रफ़ीक साहब की एक और खासियत ये है कि वो हमेशा नए शायरों की रचनाओं को अपनी आवाज़ में सजाते हैं. इस तरह वो हमारे मिशन में मददगार ही साबित हो रहे हैं. उनकी पिछली ग़ज़ल के शायर अज़ीम नवाज़ राही भी किसी ऐसे स्थान पर रहते हैं जहाँ इन्टरनेट आदि की सुविधा उपलब्ध नहीं है, यही कारण है कि हमें अब तक उनकी तस्वीर और अन्य जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हो पायी हैं. लेकिन इस बार के रचनाकार मोइन नज़र के विषय में हमारे बहुत से श्रोता पहले से ही परिचित होंगे। मोइन नज़र वही शायर हैं जिनका कलाम 'इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊँगा, अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाऊँगा' गाकर ग़ज़ल गायक गुलाम अली ने दुनिया में अपना परचम फहराया। मोइन नज़र साहब रेलवे में चाकरी करते हैं और फिलहाल मुम्बईवासी हैं। कहते हैं फनकार का काम बोलता है, तो आप भी सुनिए मोईन साहब ने क्या खूब बोल लिखे हैं यहाँ. अपने विचार देकर रफ़ीक शेख और नये शायर मोईन नज़र की हौसलाफजाई अवश्य करें.

नज़्म को सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें-



Here comes song no.17 for the season 2. "Akhiri baar bas..." is composed and rendered by Rafique Sheikh, and penned by a new writer Moin Nazar. This sad romantic nazm will surely touch your heart, so hear it and share your thoughts about it. Your valuable comments will help us to improvise.

To listen,please click on the player below -



बोल - Lyrics

आखिरी बार बस, तेरा दीदार कर,
मैं चला जाऊँगा, छोड़कर ये शहर,

अपनी चिलमन से बाहर निकल के ज़रा,
दुनिया वालों से छुप के संभल के ज़रा,
दो कदम आ मेरी सिम्त चल के ज़रा,
बैठ पहलु में मेरे, तू मचल के ज़रा,
तेरा दीवाना हूँ, तेरा दीवाना हूँ,
मेरा ऐतबार कर .....

तेरे जलवे चुरा लूँ, इन निगाहों में आ,
मैं तेरे हुस्न को, भर लूँ बाहों में आ,
साए में ताज के, चांदनी रात में,
दुधिया जिस्म को ले पनाहों में आ,
देख लूँ मैं तुझे, देख लूँ मैं तुझे,
आज भर के नज़र....

फ़िर उसके बाद मुलाकात न होगी शायद,
धड़कते दो दिलों में बात न होगी शायद,
जमीन प्यार की बंज़र मेरे हो जायेगी,
बरसों इन आँखों से बरसात न होगी शायद,
साथ मेरे तू चल, साथ मेरे तू चल,
ये सनम बाम पर...

SONG # 17, SEASON # 02, "AKHIRI BAAR BAS..." OPENED ON 24/10/2008 ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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