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Sunday, June 7, 2009

जयशंकर प्रसाद की कविता का सुरबद्ध और संगीतबद्ध रूप (परिणाम)

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-1: अरुण यह मधुमय देश हमारा

पिछले महीने जब महान कवियों की कविताओं को सुरबद्ध और संगीतबद्ध करने का विचार बना था, तो हमारे मन एक डर था कि बहुत सम्भव है कि इसमें प्रतिभागिता बहुत कम हो। क्योंकि यह प्रतियोगिता कविता प्रतियोगिता जितनी सरल नहीं है। इसमें एक ही कविता को कई बार गाकर, रिकॉर्ड करके साधना होता है। लेकिन आपको भी यह जानकर आश्चर्य होगा कि गीतकास्ट प्रतियोगिता के पहले ही अंक में 12 प्रतिभागियों ने भाग लिया। जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' को 12 अलग धुनों में पिरोया गया। इतना ही नहीं, हमने बहुत से प्रतिभागियों से जब यह कहा कि रिकॉर्डिंग और उच्चारण में कुछ कमी रह गई है, तो उन्होंने दुबारा, तिबारा रिकॉर्ड करके भेजा।

गीतकास्ट प्रतियोगिता के माध्यम से हमारी कोशिश है कि पॉडकास्टिंग की रचनात्मक परम्परा हिन्दी में जुड़े। इस शृंखला में हम पहला प्रयोग या प्रयास छायावाद के चार स्तम्भ कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध/सुरबद्ध करके करना चाहते हैं। पाठकों, श्रोताओं, गायकों और संगीतकारों की पूर्ण सहभागिता के बिना यह सफल नहीं हो पायेगा। छायावाद के कवियों की कविताओं के संगीत-संयोजन की पहली कड़ी गीतकास्ट प्रतियोगिता की पहली कड़ी है, जिसमें हमने जयशंकर प्रसाद की कविता को संगीतबद्ध/सुरबद्ध करवाया है। अगली कड़ी सुमित्रानंदन पंत की कविता की होगी, जिसकी उद्‍घोषणा 10 जून 2009 को की जायेगी।

जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्राप्त कुल 12 प्रविष्टियों से श्रेष्ठ प्रविष्टि चुनने के लिए दो चरणों में निर्णय कराया गया। पहले चरण में तीन निर्णयकर्ता रखे गये। यहाँ से 6 प्रविष्टियों को अंतिम निर्णयकर्ता आदित्य प्रकाश को भेजा गया। आदित्य प्रकाश पहले और दूसरे स्थान की प्रविष्टि में उलझ गये। बहुत सोचा कि किसे प्रथम रखूँ, किसे द्वितीय? यह तय कर पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा था क्योंकि एक प्रविष्टि में कविता की आत्मा पूरी तरह से मुखरित हो रही थी तो दूसरे में संगीत का नया प्रयोग नवपीढ़ियों को लगभग 100 साल पुरानी कविता से जोड़ पा रहा था। एक में आवाज़ की मधुरता मन मोह रही थी तो दूसरे में संगीत की विविधता थिरका रही थी। तो आखिरकार आदित्य प्रकाश ने यह निर्णय लिया कि दोनों को प्रथम स्थान दिया जाय और रु 1000 का नग़द इनाम दोनों को ही दिया जाय। मतलब कुल रु 2000 का नगद इनाम पहले स्थान के लिए।

ये दोनों कौन हैं और इन्होंने कैसा गाया है आप खुद पढ़ लें और सुन लें।

स्वप्न मंजूषा 'शैल'

24 अगस्त को राँची में जन्मी स्वप्न मंजूषा 'शैल' कविमना हैं। कला के प्रति रुझान बचपन से रहा, नाटक और संगीत में भरपूर रूचि होने के कारण आकाशवाणी और दूरदर्शन से लम्बे समय तक जुड़ी रहीं, टी-सीरिज में गाने का सौभाग्य मिला और प्रोत्साहन भी, संगीत की बहुत सारी प्रतियोगिताओं में भाग लिया और पुरस्कृत हुईं। आकाशवाणी रांची और दिल्ली के कई नाटकों में आवाज़ दी, जैसे महाभारत में रामायण, एक बेचारा शादी-शुदा इत्यादि। इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय में, सॉफ्टवेर इंजिनियर के पद पर ५ वर्षों तक कार्यरत होने के बाद, मॉरीसस ब्रोडकास्टिंग कारपोरेशन के लिए २ वर्षों तक टेलिविज़न पर प्रोग्राम प्रस्तुत किया, मॉरीसस में, हिंदी को टेलिविज़न के माध्यम से लोकप्रिय, बनाने की शुरुआत में, पति संतोष शैल और इन्होंने एक छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पिछले कई वर्षों से कनाडा में हैं और कनाडियन गवर्नमेंट के विभिन्न विभागों ( HRDC, PWGSC, National Defence, Correctional Services of Canada ) में सिस्टम्स अनालिस्ट के पद पर कार्यरत रह चुकी हैं। अब पेशे से प्रोजेक्ट मैनेजेर हैं, हाल ही में Ethiopian Govenment की Educational Television Program production का प्रोजेक्ट जिसमें ४५० फिल्में मात्र ३ महीने में बनायीं गई, कि प्रोजेक्ट मैनेजेर ये ही थीं।
२००४ में कनाडा में Chin Radio पर हिंदी में "आरोही " प्रोग्राम ९७.९ FM की शुरुआत की और उसे लोगों के दिलों तक पहुँचाया, इस कार्यक्रम ने लोकप्रियता का नया कीर्तमान ओटावा कि भूमि पर स्थापित किया।
बचपन से ही कविता लिखने का शौक़ रहा, इनकी २ कवितायेँ पुरस्कृत हुई हैं "गुमशुदा" और 'एकादशानन' ।
कई कविताएँ 'काव्यालय', 'अभिव्यक्ति', 'अनुभूति', 'गर्भनाल', जैसी साइट्स पर छप चुकीं हैं, इनकी एक पुस्तक भी छपी है, जिसका नाम है 'काव्य मंजूषा'।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 1000 का नग़द इनाम
विशेष- भारतीय समयानुसार 8 जून 2009 की सुबह 7:30 बजे डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के 'कवितांजलि' कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-
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कृष्ण राज कुमार

एक नौजवान संगीतकार और गायक हैं। कृष्ण राज कुमार जो मात्र २२ वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले १४ सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 1000 का नग़द इनाम
विशेष- भारतीय समयानुसार 8 जून 2009 की सुबह 7:30 बजे डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के 'कवितांजलि' कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-

64kbps

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अब हम बात करते हैं तीसरे स्थान के विजेता की, जिन्होंने संगीतबद्ध तो नहीं किया, लेकिन सुरबद्ध ज़रूर किया है।

धर्मेंद्र कुमार सिंह

हिंदी-भोजपुरी के युवा गायक हैं. स्टेज, रेडियो, दूरदर्शन और विभिन्न चैनलों पर कार्यक्रम पेश कर चुके हैं, लेकिन अभी भी एक ऐसा प्लेटफार्म मिलना बाकी है जो इन्हें मुकाम तक पहुँचा सके। आजकल भोजपुरी के स्तरीय गीतों और गज़लों को आवाज देने में लगे हैं।

पुरस्कार- तृतीय पुरस्कार, रु 500 का नग़द इनाम
विशेष- भारतीय समयानुसार 15 जून 2009 की सुबह 7:30 बजे डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के 'कवितांजलि' कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-
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128kbps



इसके अतिरिक्त हमारी टीम को मनोहर लेले की प्रविष्टि भी सराहनीय लगी। हम वह प्रविष्टि भी अपने श्रोताओं के समक्ष रख रहे हैं।



विभा झालानी, लतिका भटनागर, कमल किशोर सिंह, रमेश धुस्सा, पूजा अनिल, कमलप्रीत सिंह, मुकेश सोनी और अम्बरीष श्रीवास्तव के भी आभारी हैं जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। इन सभी प्रतिभागियों की प्रविष्टियों में भी कविता को अलग ढंग से सुनने का अपना आनंद है, लेकिन कविता और रिकॉर्डिंग दोनों की तकनीकी और कलात्मक खूबियों और ख़ामियों के मद्देनज़र हमारी टीम ने उपर्युक्त निर्णय लिया है। हम उम्मीद करते हैं कि सभी प्रतिभागी इसे सकारात्मक लेंगे और गुजारिश करते हैं कि अगली बार भी गीतकास्ट आयोजन में ज़रूर भाग लें।

इस कड़ी के प्रायोजक रेडियो सलाम नमस्ते के उद्‍घोषक, कवि, वैज्ञानिक और हिन्दीकर्मी आदित्य प्रकाश हैं। यदि आप भी इस आयोजन को स्पॉनसर करता चाहते हैं तो hindyugm@gmail.com पर सम्पर्क करें।

Wednesday, May 13, 2009

जयशंकर प्रसाद की कविता गाइए और जीतिए रु 2000 के नग़द इनाम

हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के माध्यम से हिन्दी में लिखने-पढ़ने वालों का प्रोत्साहन पिछले 29 महीनों से करने का प्रयास कर रहा है। हिन्दी को आवाज़ की दुनिया से जोड़ने की स्थाई शुरूआत 4 जुलाई 2008 को 'आवाज़' के माध्यम से हुई थी। आज हम पॉडकास्टिंग को प्रोत्साहित करने के लिए 'गीतकॉस्ट' प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं।

इसमें भाग लेने के लिए आपको जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध देशगान 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' को अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके हमें भेजना होगा। गीत को केवल पढ़ना नहीं बल्कि गाकर भेजना होगा। हर प्रतिभागी इस गीत को अलग-अलग धुन में गाकर भेजे (कौन सी धुन हो, यह आपको खुद सोचना है)।

1) गीत को रिकॉर्ड करके भेजने की आखिरी तिथि 31 मई 2009 है। अपनी प्रविष्टि podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल करें।
2) इसे समूह में भी गाया जा सकता है। यह प्रविष्टि उस समूह के नाम से स्वीकार की जायेगी।
3) इसे संगीतबद्ध करके भी भेजा जा सकता है।
4) श्रेष्ठ तीन प्रविष्टियों को आदित्य प्रकाश की ओर से क्रमशः रु 1000, रु 500 और रु 500 के नग़द इनाम दिये जायेंगे।
5) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को डलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो स्टेशन रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम 'कवितांजलि' में बजाया जायेगा। इस प्रविष्टि के गायक/गायिका से आदित्य प्रकाश (कार्यक्रम के संचालक) कार्यक्रम में सीधे बातचीत करेंगे, जिसे दुनिया में हर जगह सुना जा सकेगा।
6) अन्य 2 प्रविष्टियों को भी कवितांजलि में बजाया जायेगा।
7) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को 'हिन्दी-भाषा की यात्रा-कथा' नामक वीडियो/डाक्यूमेंट्री में भी बेहतर रिकॉर्डिंग के साथ इस्तेमाल किया जायेगा।
8) श्रेष्ठ प्रविष्टि के चयन का कार्य आवाज़-टीम द्वारा किया जायेगा। अंतिम निर्णयकर्ता में आदित्य प्रकाश का नाम भी शामिल है।
9) हिन्द-युग्म का निर्णय अंतिम होगा और इसमें विवाद की कोई भी संभावना नहीं होगी।

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित देशगान

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।

हम समय-समय पर इस तरह का आयोजन करते रहेंगे। आप भी अपनी ओर से हिन्दी के स्तम्भ कवियों की कविताओं को सुरबद्ध करने के काम को प्रोत्साहित करना चाहते हों, अपनी ओर से इनाम देना चाहते हों, तो संपर्क करें।

रिकॉर्डिंग संबंधी सहायता यहाँ उपलब्ध है।


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