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Wednesday, August 18, 2010

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले.. ज़िंदगी और मौत के बीच उलझे ज़ौक़ को साथ मिला बेग़म और सहगल का

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९७

नाज़ है गुल को नज़ाक़त पै चमन में ऐ ‘ज़ौक़’,
इसने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाक़त वाले

इस तपिश का है मज़ा दिल ही को हासिल होता
काश, मैं इश्क़ में सर-ता-ब-क़दम दिल होता

यूँ तो इश्क़ और शायर/शायरी में चोली-दामन का साथ होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी शायर होते हैं जो इश्क़ को बखूबी समझते हैं और हर शेर लिखने से पहले स्याही को इश्क़ में डुबोते चलते हैं। ऐसे शायरों का लिखा पढने में दिल को जो सुकूं मिलता है, वह लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता। ज़ौक़ वैसे हीं एक शायर थे। जितनी आसानी ने उन्होंने "सर-ता-ब-कदम" दिल होने की बात कही है या फिर यह कहा है कि गुलशन के फूलों को जो अपनी नज़ाकत पे नाज़ है, उन्हें यह मालूम नहीं कि यह नाज़-ओ-नज़ाकत उनसे बढकर भी कहीं और मौजूद है .. ये सारे बिंब पढने में बड़े हीं आम मालूम होते हैं ,लेकिन लिखने वाले को हीं पता होता है कि कुछ आम लिखना कितना खास होता है। मैंने ज़ौक़ की बहुत सारी ग़ज़लें पढी हैं.. उनकी हर ग़ज़ल और ग़ज़ल का हर शेर इस बात की गवाही देता है कि यह शायर यकीनन कुछ खास रहा है। फिर भी न जाने क्यों, हमने इन्हें भुला दिया है या फिर हम इन्हें भुलाए जा रहे हैं। इस गु़स्ताखी या कहिए इस गलती की एक हीं वज़ह है और वह है ग़ालिब की हद से बढकर भक्ति। अब होता है ये है कि जो भी सुखनसाज़ या सुखन की कद्र करने वाला ग़ालिब को अपना गुरू मानने लगता है, उसके लिए यक-ब-यक ज़ौक़ दुश्मन हो जाते हैं। उन लोगों को यह लगने लगता है कि ज़ौक़ की हीं वज़ह से ग़ालिब को इतने दु:ख सहने पड़े थे, इसलिए ज़ौक़ निहायत हीं घटिया इंसान थे। इस सोच का जहन में आना होता है कि वे सब ज़ौक़ की शायरी से तौबा करने लगते हैं। मुझे ऐसी सोच वाले इंसानों पे तरस आता है। शायर को उसकी शायरी से मापिए, ना कि उसके पद या ओहदे से। ज़ौक़ ज़फ़र के उस्ताद थे और उनके दरबार में रहा करते थे.. अगर दरबार में रहना गलत है तो फिर ग़ालिब ने भी तो दरबार में रहने के लिए हाथ-पाँव मारे थे। तब तो उन्हें भी बुरा कहा जाना चाहिए, पथभ्रष्ट कहा जाना चाहिए। सिर्फ़ ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन होने के कारण ज़ौक़ से नाक-भौं सिकोड़ना तो सही नहीं। मुझे मालूम है कि हममें से भी कई या तो ज़ौक़ को जानते हीं नहीं होंगे या फिर जानकर भी अनजान रहना हीं पसंद करते होंगे। अपने वैसे मित्रों के लिए मैं "प्रकाश पंडित" जी के खजाने से "ज़ौक़" से ताल्लुक रखने वाले कुछ मोती चुनकर लाया हूँ। इसे पढने के बाद यकीनन हीं ज़ौक़ के प्रति बरसों में बने आपके विचार बदलेंगें।

प्रकाश जी लिखते हैं:
उर्दू शायरी में ‘ज़ौक़’ का अपना खास स्थान है। वे शायरी के उस्ताद माने जाते थे। आखिरी बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र के दरबार में शाही शायर भी थे।

बादशाह की उस्तादी ‘ज़ौक़’ को किस क़दर महंगी पड़ी थी, यह उनके शागिर्द मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद की ज़बानी सुनिए:
"वह अपनी ग़ज़ल खुद बादशाह को न सुनाते थे। अगर किसी तरह उस तक पहुंच जाती तो वह इसी ग़ज़ल पर खुद ग़ज़ल कहता था। अब अगर नयी ग़ज़ल कह कर दें और वह अपनी ग़ज़ल से पस्त हो तो बादशाह भी बच्चा न था, 70 बरस का सुख़न-फ़हन था। अगर उससे चुस्त कहें तो अपने कहे को आप मिटाना भी कुछ आसान काम नहीं। नाचार अपनी ग़ज़ल में उनका तख़ल्लुस डालकर दे देते थे। बादशाह को बड़ा ख़याल रहता था कि वह अपनी किसी चीज़ पर ज़ोर-तबअ़ न ख़र्च करें। जब उनके शौक़े-तबअ़ को किसी तरफ़ मुतवज्जह देखता जो बराबर ग़ज़लों का तार बांध देता कि तो कुछ जोशे-तबअ़ हो इधर ही आ जाय।"

शाही फ़रमायशों की कोई हद न थी। किसी चूरन वाले की कोई कड़ी पसंद आयी और उस्ताद को पूरा लटका लिखने का हुक्म हुआ। किसी फ़क़ीर की आवाज़ हुजूर को भा गयी है और उस्ताद पूरा दादरा बना रहे हैं। टप्पे, ठुमरियां, होलियां, गीत भी हज़ारों कहे और बादशाह को भेंट किये। खुद भी झुंझला कर एक बार कह दिया :

ज़ौक मुरत्तिब क्योंकि हो दीवां शिकवाए-फुरसत किससे करें
बांधे हमने अपने गले में आप ‘ज़फ़र’ के झगड़े हैं


"ज़ौक़" के काव्य के स्थायी तत्वों की व्याख्या के पहले उनके बारे में फैली हुई कुछ भ्रांतियों का निवारण आवश्यक मालूम होता है। पहली बात तो यह है कि समकालीन होने के लिहाज़ से उन्हें ‘ग़ालिब’ का प्रतिद्वंद्वी समझ लिया जाता है और चूंकि यह शताब्दी ‘ग़ालिब’ के उपासकों की है इसलिए ‘ज़ौक़’ से लोग खामखाह ख़ार खाये बैठे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि समकालीन महाकवियों में कुछ न कुछ प्रतिद्वंद्विता होती ही है और ‘ज़ौक़’ ने भी कभी-कभी मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की छेड़-छाड़ की बादशाह से शिकायत कर दी थी, लेकिन इन दोनों की प्रतिद्वंद्विता में न तो वह भद्दापन था जो ‘इंशा’ और ‘मसहफ़ी’ की प्रतिद्वंद्विता में था, न इतनी कटुता जो ‘मीर’ और ‘सौदा’ में कभी-कभी दिखाई देती है। असल में उनके बीच प्रतिद्वंद्विता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। ‘ग़ालिब’ नयी भाव-भूमियों को अपनाने में दक्ष थे और वर्णन-सौंदर्य की ओर से उदासीन; ‘ज़ौक़’ का कमाल वर्णन-सौंदर्य में था और भावना के क्षेत्र में बुजुर्गों की देन ही को काफ़ी समझते थे। जैसा कि हर ज़माने के समकालीन महाकवि एक दूसरे के कमाल के क़ायल होते हैं, यह दोनों बुजुर्ग भी एक-दूसरे के प्रशंसक थे। ग़ालिब ‘ज़ौक़’ के प्रशंसक थे और अपने एक पत्र में उन्होंने ‘ज़ौक़’ के इस शे’र की प्रशंसा की है :

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर गये पर न लगा जी तो किधर जायेंगे।


और उधर ‘ज़ौक़’ भी मुंह-देखी में नहीं बल्कि अपने दोस्तों और शागिर्दों मैं बैठकर कहा करते थे कि मिर्ज़ा (ग़ालिब) को खुद अपने अच्छे शे’रों का पता नहीं है और उनका यह शे’र सुनाया करते थे:

दरियाए-मआ़सी तुनुक-आबी से हुआ खुश्क
मेरा सरे-दामन भी अभी तक न हुआ था।

ज़ौक़ की असली सहायक उनकी जन्मजात प्रतिभा और अध्ययनशीलता थी। कविता-अध्ययन का यह हाल कि पुराने उस्तादों के साढ़े तीन सौ दीवानों को पढ़कर उनका संक्षिप्त संस्करण किया। कविता की बात आने पर वह अपने हर तर्क की पुष्टि में तुरंत फ़ारसी के उस्तादों का कोई शे’र पढ़ देते थे। इतिहास में उनकी गहरी पैठ थी। तफ़सीर (कुरान की व्याख्या) में वे पारंगत थे, विशेषतः सूफी-दर्शन में उनका अध्ययन बहुत गहरा था। रमल और ज्योतिष में भी उन्हें अच्छा-खासा दख़ल था और उनकी भविष्यवाणियां अक्सर सही निकलती थीं। स्वप्न-फल बिल्कुल सही बताते थे। कुछ दिनों संगीत का भी अभ्यास किया था और कुछ तिब्ब (यूनानी चिकित्सा-शास्त्र) भी सीखी थी। धार्मिक तर्कशास्त्र (मंतक़) और गणित में भी वे पटु थे। उनके इस बहुमुखी अध्ययन का पता अक्सर उनके क़सीदों से चलता है जिनमें वे विभिन्न विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के इतने हवाले देते हैं कि कोई विद्वान ही उनका आनंद लेने में समर्थ हो सकता है। उर्दू कवियों में इस कोटि के विद्वान कम ही हुए हैं।

‘ज़ौक़’ १२०४ हि. तदनुसार १७८९ ई. में दिल्ली के एक ग़रीब सिपाही शेख़ मुहम्मद रमज़ान के घर पैदा हुए थे। शेख़ रमज़ान नवाब लुत्फअली खां के नौकर थे। शेख़ इब्राहीम (ज़ौक़ का असल नाम) इनके इकलौते बेटे थे। इस कमाल के उस्ताद ने १२७१ हिजरी (१८५४ ई.) में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया। मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था:

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत करे

ग़ालिब और ज़ौक़ के बीच शायराना नोंक-झोंक और हँसी-मज़ाक के कई सारे किस्से मक़बूल हैं। मुझे याद नहीं कि मैंने यह वाक्या ग़ालिब के लिए सजी महफ़िल में सुनाया था या नहीं, अगर सुनाया हो, तब भी दुहराए देता हूँ। बात एक गोष्ठी की है । मिर्ज़ा ग़ालिब मशहूर शायर मीर तक़ी मीर की तारीफ़ में कसीदे गढ़ रहे थे । शेख इब्राहीम ‘जौक’ भी वहीं मौज़ूद थे । ग़ालिब द्वारा मीर की तारीफ़ सुनकर वे बैचेन हो उठे । वे सौदा नामक शायर को श्रेष्ठ बताने लगे । मिर्ज़ा ने झट से चोट की- “मैं तो आपको मीरी समझता था मगर अब जाकर मालूम हुआ कि आप तो सौदाई हैं ।” यहाँ मीरी और सौदाई दोनों में श्लेष है । मीरी का मायने मीर का समर्थक होता है और नेता या आगे चलने वाला भी । इसी तरह सौदाई का पहला अर्थ है सौदा या अनुयायी, दूसरा है- पागल।

ज़ौक़ कितने सौदाई थे या फिर कितने मीरी... इसका निर्धारण हम तो नहीं कर सकते, लेकिन हाँ उनके लिखे कुछ शेरों को पढकर और उन्हें गुनकर अपने इल्म में थोड़ी बढोतरी तो कर हीं सकते हैं:

आँखें मेरी तलवों से मल जाए तो अच्छा
है हसरत-ए-पा-बोस निकल जाए तो अच्छा

ग़ुंचा हंसता तेरे आगे है जो गुस्ताख़ी से
चटखना मुंह पे वहीं बाद-सहर देती है

आदमीयत और शै है, इल्म है कुछ और शै
कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा

वाँ से याँ आये थे ऐ 'ज़ौक़' तो क्या लाये थे
याँ से तो जायेंगे हम लाख तमन्ना लेकर


चलिए अब इन शेरों के बाद उस मुद्दे पर आते हैं, जिसके लिए हमने महफ़िल सजाई है। जानकारियाँ देना हमारा फ़र्ज़ है, लेकिन ग़ज़ल सुनना/सुनवाना तो हमारी ज़िंदगी है.. फ़र्ज़ के मामले में थोड़ा-बहुत इधर-उधर हो सकता है, लेकिन ज़िंदगी की गाड़ी पटरी से हिली तो खेल खत्म.. है ना? तो आईये.. लगे हाथों हम आज की ग़ज़ल से रूबरू हो लें। आज हम जो ग़ज़ल लेकर महफ़िल में हाज़िर हुए हैं उसे ग़ज़ल-गायिकी की बेताज बेगम "बेगम अख्तर" की आवाज़ नसीब हुई है। इतना कह देने के बाद क्या कुछ और भी कहना बचा रह जाता है। नहीं ना? इसलिए बिना कुछ देर किए, इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाया जाए:

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल्लगी चले

कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बद-क़िमार
जो चाल हम चले सो निहायत बुरी चले

हो उम्रे-ख़िज़्र भी तो भी कहेंगे ब-वक़्ते-मर्ग
हम क्या रहे यहाँ अभी आये अभी चले

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो युँ ही जब तक चली चले

नाज़ाँ न हो ख़िरद पे जो होना है वो ही हो
दानिशतेरी न कुछ मेरी दानिशवरी चले

जा कि हवा-ए-शौक़ में हैं इस चमन से 'ज़ौक़'
अपनी ___ से बादे-सबा अब कहीं चले




वैसे तो हम एक महफ़िल में एक हीं गुलुकार की आवाज़ में ग़ज़ल सुनवाते हैं। लेकिन इस ग़ज़ल की मुझे दो रिकार्डिंग्स हासिल हुई थी.. एक बेग़म अख्तर की और एक कुंदन लाल सहगल की। इन दोनों में से मैं किसे रखूँ और किसे छाटूँ, मैं यह निर्धारित नहीं कर पाया। इसलिए बेगम की आवाज़ में ग़ज़ल सुनवा देने के बाद हम आपके सामने पेश कर रहे हैं "सहगल" साहब की बेमिसाल आवाज़ में यही ग़ज़ल एक बार फिर:



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "उम्र" और शेर कुछ यूँ था-

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

आह को चाहिये इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक (ग़ालिब)

सर्द रातों की स्याही को चुराकर हमने
उम्र यूँ काटी तेरे शहर में आकर हमने (आशीष जी)

उम्रभर तलाशा था हमने जिस हंसी को
आज वो खुद की ही दीवानगी पे आई है (अवनींद्र जी)

उनके बच्चे भी सोये हैं भूखे
जिनकी उम्र गुजरी है रोटियाँ बनाने में (नीलम जी की प्रस्तुति.. शायर का पता नहीं)

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इन्तज़ार में । (बहादुर शाह ज़फ़र)

ता-उम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क़ की,
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफर लेके आ गया। (सुदर्शन फ़ाकिर)

उम्र हो गई तुम्हें पहचानने में ,
अभी तक न जान पाई हमदम मेरे ! (मंजु जी)

दिल उदास है यूँ ही कोई पैगाम ही लिख दो
अपना नाम ना लिखो तो बेनाम ही लिख दो
मेरी किस्मत में गम-ए-तन्हाई है लेकिन
पूरी उम्र ना सही एक शाम ही लिख दो. (शन्नो जी की पेशकश.. शायर का पता नहीं)

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर शब्-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं (ख़ामोश देहलवी) .. नीलम जी, आपके शायर का नाम गलत है।

पिछली महफ़िल की शान बने आशीष जी। इस उपलब्धि के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ। मुझे पिछली महफ़िल इसलिए बेहद पसंद आई क्योंकि उस महफ़िल में अपने सारे मित्र मौजूद थे, बस सीमा जी को छोड़कर। न जाने वो किधर गायब हो गई हैं। सीमा जी, आप अगर मेरी यह टिप्पणी पढ रही हैं, तो आज की महफ़िल में टिप्पणी देना न भूलिएगा :) मनु जी, आपको ग़ज़ल पढने में अच्छी लगी, लेकिन सुनने में नहीं। चलिए हमारी आधी मेहनत तो सफल हुई। जहाँ तक सुनने-सुनाने का प्रश्न है और गुलुकार के चयन का सवाल है तो अगर मैं चाहता तो मेहदी हसन साहब या फिर गुलाम अली साहब की आवाज़ में यह ग़ज़ल महफ़िल में पेश करता, लेकिन इनकी आवाज़ों में आपने "पत्ता-पत्ता" तो कई बार सुनी होगी, फिर नया क्या होता। मुझे हरिहरण प्रिय हैं, मुझे उनकी आवाज़ अच्छी लगती है और इसी कारण मैं चाहता था कि बाकी मित्र भी उनकी आवाज़ से रूबरू हो लें। दक्षिण भारत से संबंध रखने के बावजूद उर्दू के शब्दों को वो जिस आसानी से गाते हैं और जितनी तन्मयता से वो हर लफ़्ज़ के तलफ़्फ़ुज़ पर ध्यान देते हैं, उतनी मेहनत तो हिंदी/उर्दू जानने वाला एक शख्स नहीं करता। मेरे हिसाब से हरिहरण की ग़ज़ल सुनी जानी चाहिए.. हाँ, आप इनकी ग़ज़लों की तुलना मेहदी हसन या गुलाम अली से तो नहीं हीं कर सकतें, वे सब तो इस कला के उस्ताद हैं, लेकिन यह कहाँ लिखा है कि उस्ताद के सामने शागिर्द को मौका हीं न मिले। मेरी ख्वाहिश बस यही मौका देने की थी... कितना सफल हुआ और कितना असफल, ये तो बाकी मित्र हीं बताएँगे। अवनींद्र जी और शन्नो जी, आप दोनों ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमें शुभकामनाएँ दीं, हमारी तरफ़ से भी आप सभी स्वजनों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.. मराठी में कहें तो "शुभेच्छा".. महाराष्ट्र में रहते-रहते यह एक शब्द तो सीख हीं गया हूँ :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, April 7, 2010

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल.. अपने शोख कातिल से ग़ालिब की इस गुहार के क्या कहने!!

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७८

देखते -देखते हम चचा ग़ालिब को समर्पित आठवीं कड़ी के दर पर आ चुके हैं। हमने पहली कड़ी में आपसे जो वादा किया था कि हम इस पूरी श्रृंखला में उन बातों का ज़िक्र नहीं करेंगे जो अमूमन हर किसी आलेख में दिख जाता है, जैसे कि ग़ालिब कहाँ के रहने वाले थे, उनका पालन-पोषण कैसे हुआ.. वगैरह-वगैरह.. तो हमें इस बात की खुशी है कि पिछली सात कड़ियों में हम उस वादे पर अडिग रहे। यकीन मानिए.. आज की कड़ी में भी आपको उन बातों का नामो-निशान नहीं मिलेगा। ऐसा कतई नहीं है कि हम ग़ालिब की जीवनी नहीं देना चाह्ते... जीवनी देने में हमें बेहद खुशी महसूस होगी, लेकिन आप सब जानते हैं कि हमारी महफ़िल का वसूल रहा है- महफ़िल में आए कद्रदानों को नई जानकारियों से मालामाल करना, ना कि उन बातों को दुहराना जो हर गली-नुक्कड़ पर लोगों की बातचीत का हिस्सा होती है। और यही वज़ह है कि हम ग़ालिब का "बायोडाटा" आपके सामने रखने से कतराते हैं।

चलिए..बहुत हुआ "अपने मुँह मियाँ-मिट्ठु" बनना.. अब थोड़ी काम की बातें कर ली जाएँ!! तो आज की कड़ी में हम ग़ालिब पर निदा फ़ाज़ली साहब के मन्त्वय और ग़ालिब की हीं किताब "दस्तंबू" से १८५७ के दौरान की घटनाओं के बारे में जानेंगे।

ग़ालिब के बारे में निदा साहब कहते हैं:

ग़ालिब अपने युग में आने वाले कई युगों के शायर थे, अपने युग में उन्हें इतना नहीं समझा गया जितना बाद के युगों में पहचाना गया. हर बड़े दिमाग़ की तरह वह भी अपने समकालीनों की आँखों से ओझल रहे.

भारतीय इतिहास में वह पहले शायर थे, जिन्हें सुनी-सुनाई की जगह अपनी देखी-दिखाई को शायरी का मैयार बनाया, देखी-दिखाई से संत कवि कबीर दास का नाम ज़हन में आता है- तू लिखता है कागद लेखी, मैं आँखन की देखी. लेकिन कबीर की आँखन देखी और ग़ालिब की देखी-दिखाई में थोड़ा अंतर भी है. कबीर सर पर आसमान रखकर धरती वालों से लड़ते थे और आखिरी मुगल के दौर के मिर्ज़ा ग़ालिब दोनों से झगड़ते थे, इसी लिए सुनने और पढ़ने वाले उनसे नाराज़ रहते थे. लालकिले के एक मुशायरे में, ख़ुद उनके सामने उनपर व्यंग किया गया.

कलामे मीर समझे या कलामे मीरज़ा समझे
मगर इनका कहा यह आप समझें या ख़ुदा समझे

मीर और मीरज़ा से व्यंगकार की मुशद ग़ालिब से पहले के शायर मीर तकीमीर और मीरज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा थी. ग़ालिब को इस व्यंग्य ने परेशान नहीं किया. उन्होंने इसके जवाब में ऐलान किया:

न सताइश (प्रशंसा) की तमन्ना, न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी (अर्थ) न सही
(हमारे हिसाब से यह शेर इस महफ़िल में अब तक तीन बार उद्धृत किया जा चुका है.. लेकिन क्या करें, शेर है हीं कुछ ऐसा कि हर कोई इसे याद कर जाता है)

मिर्ज़ा ग़ालिब का यह आत्मविश्वास उनकी महानता की पहचान है.

ग़ालिब शब्दों और भावों से खेलना बखूबी जानते हैं, तभी तो जहाँ एक ओर यह कहे जाने पर कि उनके शेरों में कोई अर्थ नहीं होता, उन्हें अपने बचाव में जवाब देना पड़ता है वहीं दूसरी ओर वे खुलेआम इस बात को कुबूल करते हैं कि उनके खत (जो उन्होंने अपनी माशूका को लिखे है) बे-मायने होते हैं। यह ग़ालिब की कला नहीं तो और क्या है:

ख़त लिखेंगे, गर्चे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के


ये तो सभी जानते हैं कि १८५७ के गदर ने ग़ालिब पर खासा असर किया था। कुछ लोग इस गलतफ़हमी के शिकार हैं कि ग़ालिब ने उस दौरान अंग्रेजों का पक्ष लिया था। इसी बात को गलत साबित करने के लिए मशहूर शायर मख़मूर सईदी ने ग़ालिब की किताब ‘दस्तंबू’ और उनके खतों के हवाले से १८५७ की कहानी को ब्यान किया है. इस किताब की भूमिका में उन्होंने ‘दस्तंबू’ के हवाले से ग़ालिब पर की जाने वाली आलोचनाओं का जवाब और जवाज़ (औचित्य) पेश किया है। (सौजन्य: मिर्ज़ा बेग़.. अहदनामा ब्लाग से):

दस्तंबू में लिखी कुछ घटनाओं के आधार पर कुछ लोगों ने ग़ालिब पर अंग्रेज़-दोस्ती का इल्ज़ाम लगाया है लेकिन जिस चीज़ को लोगों ने अंग्रेज़-दोस्ती का नाम दिया है वह दरअसल मिरज़ा ग़ालिब की इंसान-दोस्ती थी. बाग़ी भड़के हुए थे इस लिए बहुत से बेगुनाह अंग्रेज़ मर्द औरतें भी उनके ग़ुस्से का निशाना बने. मिर्ज़ा ग़ालिब ने उन बेगुनाहों के मारे जाने पर दुख प्रकट किया लेकिन उन्होंने उस दुख पर भी परदा नहीं डाला जो अंग्रेज़ों की तरफ़ से बेक़सूर हिंदुस्तानी नागरिकों पर ढ़ाए गए.

११ मई १८५७ से ३१ जुलाई १८५८ की घटनाओं पर आधारित "दस्तंबू" में ग़ालिब ने अपने गद्य का झंडा गाड़ने का दावा भी किया है और कहा है कि यह किताब पुरानी फ़ारसी में लिखी गई है और इसमें एक शब्द भी अरबी भाषा का नहीं आने दिया गया है सिवाए लोगों के नामों के क्योंकि उन को बदला नहीं जा सकता था. उन्होंने इसका नाम ‘दस्तंबू’ इस लिए रखा है कि यह लोगों में हाथों हाथ ली जाएगी जैसा कि उस ज़माने में बड़े लोग ताज़गी और ख़ुशबू के लिए दस्तंबू अपने हाथों में रखा करते थे.

ग़ालिब के नज़दीक पीर यानी सोमवार का दिन बड़ा मनहूस है, बाग़ी सोमवार को ही दिल्ली में दाख़िल हुए थे, सोमवार के दिन ही उनकी हार शुरू हुई थी, जब गोरे सिपाही ग़ालिब को पकड़ कर ले गए वह भी सोमवार था और फिर जिस दिन ग़ालिब के भाई का देहांत हुआ वह भी सोमवार था. ग़ालिब ने इस बारे में लिखा है : “१९ अक्तूबर को वही सोमवार का दिन जिसका नाम सपताह के दिनों कि सूचि में से काट देना चाहिए एक सांस में आग उगलने वाले सांप की तरह दुनिया को निगल गया”

ग़ालिब ने अंग्रेज़ अफ़्सरों और फ़ौजियों की रक्तपाति प्रतिक्रिया पर पर्दा नहीं डाला और साफ़ साफ़ लिख गए:

“शाहज़ादों के बारे में इससे अधिक नहीं कहा जा सकता कि कुछ बंदूक़ की गोली का ज़ख़्म खा कर मौत के मुंह में चले गए और कुछ की आत्मा फांसी के फंदे में ठिठुर कर रह गई. कुछ क़ैदख़ानों में हैं और कुछ दर-बदर भटक रहे हैं. बूढ़े कमज़ोर बादशाह पर जो क़िले में नज़र बंद हैं मुक़दमा चल रहा है. झझ्झर और बल्लभगढ़ के ज़मीनदारों और फ़र्रुख़ाबाद के हाकिमों को अलग-अलग विभिन्न दिनों में फांसी पर लटका दिया गया. इस प्रकार हलाक किया गया कि कोई नहीं कह सकता कि ख़ून बहाया गया.... जानना चाहिए कि इस शहर में क़ैदख़ाना शहर से बाहर है और हवालात शहर के अंदर, उन दोनों जगहों में इस क़दर आदमियों को जमा कर दिया गया कि मालूम पड़ता है कि एक दूसरे में समाए हुए हैं. उन दोनों क़ैदख़ानों के उन क़ैदियों की संख्या को जिन्हें विभिन्न समय में फांसी दी गई यमराज ही जानता है...”

मीर मेहदी के नाम लिखे ख़त में ग़ालिब लिखते हैं. “क़ारी का कुआं बंद हो गया. लाल डुगी के कुएं एक साथ खारे हो गए. ख़ैर खारा पानी ही पीते, गर्म पानी निकलता है. परसों मैं सवार होकर कुएं का हाल मालूम करने गया था. जामा मस्जिद से राज घाट के दरवाज़े तक बे-मुबालग़ा (बिना अतिश्योक्ति) एक ब्याबान रेगिस्तान है... याद करो मिर्ज़ा गौहर के बाग़ीचे के उस तरफ़ को बांस गड़ा था अब वह बाग़ीचे के सेहन के बराबर हो गया है.... पंजाबी कटरा, धोबी कटरा, रामजी गंज, सआदत ख़ां का कटरा, जरनैल की बीबी की हवेली, रामजी दास गोदाम वाले के मकानात, साहब राम का बाग़ और हवेली उनमें से किसी का पता नहीं चलता. संक्षेप में शहर रेगिस्तान हो गया.... ऐ बन्दा-ए-ख़ुदा उर्दू बाज़ार न रहा, उर्दू कहां, दिल्ली कहां? वल्लाह अब शहर नहीं है, कैम्प है, छावनी है. न क़िला, न शहर, न बाज़ार, न नहर.”

एक और ख़त में लिखते हैं. “भाई क्या पूछते हो, क्या लिखूं ? दिल्ली की हस्ती कई जश्नों पर थी. क़िले, चांदनी चौक, हर रोज़ का बाज़ार जामा मस्जिद, हर हफ़्ते सैर जमना के पुल की, हर साल मेला फूल वालों का, ये पांचों बातें अब नहीं. फिर कहो दिल्ली कहां....?”

कुछ खुशियाँ, कुछ मज़ाक, कुछ हँसी-ठिठोली और बहुत सारी ग़म की बातों के बाद अब वक्त है आज की गज़ल से रूबरू होने का। आज हम जो गज़ल आपके सामने लेकर आए हैं, उसमें भी ग़ालिब के ज़ख्मों का ज़िक्र है, इसलिए यह कह नहीं सकता कि लुत्फ़ उठाईये। हाँ इस बात की दरख्वास्त कर सकता हूँ कि "निघत अक़बर" जी ने अपनी आवाज़ के माध्यम से जिस दर्द को जीने की कोशिश की है, उस दर्द का एक छोटा-सा हिस्सा आप भी अपनी नसों में उतार लीजिये। दर्द उतरेगा तो सीसे की तरफ़ चुभेगा ज़रूर लेकिन आपको इस बात का फ़ख्र होगा कि आपने ग़ालिब के ग़मों पे अपनी गलबहियाँ डाली हैं। (कुछ ज्यादा हीं हो गया ना :) क्या कीजियेगा ..मेरी बोलने की आदत नहीं जाती, इसलिए आप अगर मुझसे छुटकारा चाहते हैं तो तुरंत हीं गज़ल सुनने में तल्लीन हो जाएँ) तो आपके सामने पेश-ए-खिदमत है यह गज़ल:

तस्कीं को हम न रोएं, जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
हूरान-ए-ख़ुल्द में तेरी सूरत मगर मिले

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यों तेरा घर मिले

तुमसे तो कुछ कलाम नहीं, लेकिन ऐ ___
मेरा सलाम कहियो, अगर नामाबर मिले

ऐ साकिनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना
तुमको कहीं जो ग़ालिब-ए-आशुफ़्ता-सर मिले




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तबाही" और शेर कुछ यूँ था-

तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
इसमें कुछ शाइबा-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर भी था

सही शब्द पहचान कर महफ़िल में पहला कदम रखा "सीमा" जी ने। सीमा जी.. ये रहे आपके तुनीर के तीर:

ज़िक्र जब होगा मुहब्बत में तबाही का कहीं
याद हम आयेंगे दुनिया को हवालों की तरह (सुदर्शन फ़ाकिर)

जो हमने दास्‍तां अपनी सुनाई आप क्‍यूं रोए
तबाही तो हमारे दिल पे आई आप क्‍यूं रोए (राजा मेहंदी अली खान)

सजीव जी, मनीष जी का आशीर्वाद मुझ तक पहुचाने के लिए आपका तहे-दिल से आभार। अब आप मेरे भी नामाबर हो जाईये और मेरी तरफ़ से धन्यवाद-ज्ञापन कर आईये... क्या कहते हैं? :)

शरद जी, क्या बात कह दी आपने! दिल में एक टीस-सी उभर आई...

मुझे तो अपनी तबाही की कोई फ़िक्र नहीं
यही ख्वाहिश है ये इल्ज़ाम तुम पे आए नहीं। (स्वरचित)

मंजु जी, इन आतंकियों के सामने हर चेतावनी छोटी पड़ जाती है, फिर भी इन्हें इनकी औकात तो बताई जानी चाहिए। शब्द अच्छे हैं, आपने अगर इन्हें सही से संवारा होता तो हमारे सामने एक मुकम्मल शेर होता। इसलिए शेर के बजाय मैं इसे छंद हीं कहूँगा:

अरे आतंकी !मत दिखा मेरे मुल्क में तबाही का मंजर ,
तेरे को खत्म करने के लिए आएगा कोई राम -कृष्ण -गाँधी बन कर .(स्वरचित )

नीलम जी, एक शेर तो आपने पेश किया. आपसे हमें और भी शेरों की दरकार है। खैर तब तक के लिए यही सही:

जब से हम तबाह हो गए ,
तुम जहाँपनाह हो गए

एक और बात...आपको अगर शायरी सीखनी हो तो "सुबीर संवाद सेवा" पर हमारे गुरू जी "पंकज सुबीर" की कक्षा में दाखिला ले लें। बहुत फ़ायदा होगा।

शन्नो जी, किस बात का दु:ख है आपको... हँसिए, मुस्कुराईये और महफ़िल में माहौल बनाईये। वैसे ये शेर तो बड़ा हीं वज़नदार रहा:

किसी रकीब ने भी कुछ कहा अगर तो उसे वाह-वाही मिली
हमने जो जहमत उठाई कुछ कहने की तो हमें तबाही मिली

सुमित जी, ऐसे नहीं चलेगा। आप कुछ देर के लिए आते हैं और वही शेर कह जाते हैं जो सीमा जी ने कहा है। शेर कहने से पहले बाकी की टिप्पणियों पर भी तो नज़र दौड़ा लिया करें। :)

अवनींद्र जी, हमारी महफ़िल अच्छे शेरों और गुणी शायरों का कद्र करना जानती है। और इस नाते हमारी नज़रों में आपका कद बेहद ऊँचा है। आपको पढकर लगता है कि लिखने से पहले आप दिल को मथ डालते हैं। हैं ना? ये रहे प्रमाण:

एहसास जब सीने मैं तबाह होता हैं
अश्क तेरी चाहत का गवाह होता है

उसने अपनी तबाही मैं मुझे शामिल ना किया
क्या ये सबब कम हे मेरी तबाही के लिए?

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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