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Saturday, December 27, 2008

रफ़िक़ शेख की ग़ज़ल ने ली जबरदस्त बढ़त, छोडा खुशमिजाज़ मिटटी को पीछे

अक्तूबर के अजय वीर गीत हैं फ़िर एक बार आमने सामने, और पहले चरण के तीसरे और अन्तिम समीक्षक की पैनी नज़र है उन पर. देखते हैं कि क्या फैसला उनका-

डरना झुकना छोड़ दे

गीत बेहद प्रभावी है । बोल बढिया हैं । अच्‍छी बात ये है कि ये गीत एक संदेश देता है । संयोजन और गायकी में भी ये गीत एकदम युवा है । क्‍लब मिक्‍स में जो टेक्‍नो इफेक्‍ट्स हैं वो अच्‍छे लगते हैं । लेकिन मुझे लगता है कि पंजाबी तड़का मिक्‍स ज्‍यादा अच्‍छा बन पड़ा है । इसे हम सूफी मिक्‍स कहते तो ज्‍यादा अच्‍छा लगता । अब तक का सर्वश्रेष्‍ठ गीत ।
गीत—पूरे पांच. धुन और संगीत संयोजन-पूरे पॉँच, गायकी और आवाज़-पूरे पांच, ओवारोल प्रस्तुति-पूरे पांच
कुल- २०/२०: १०/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 20.5 / 30

ऐसा नहीं कि आज मुझे चांद चाहिए---

इस ग़ज़ल की शायरी ज़रा कमज़ोर लगी । गायकी और संगीत संयोजन उत्‍तम ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १८/२०: ९/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30


सूरज चांद और सितारे

ये ठीक है कि ये हिंद युग्‍म पर अब तक का सबसे बड़ा ग्रुप है । लेकिन दिक्‍कत ये है कि जिस गीत को चुना गया है वो काफी कमज़ोर है । बोलों और भावों में गहराई नहीं है । गायकी और संगीत-संयोजन अच्‍छा है । मुझे लगता है कि अगर ये बैंड उत्‍कृष्‍ट बोलों वाले गीतों को लेकर प्रस्‍तुत हो तो बहुत संभावनाएं खुल सकती हैं ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १५/२०: ७.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 22.5 / 30


तेरा दीवाना हूं
आवाज़ अच्‍छी है । पर नज़्म कमज़ोर है । नज़्म के कुछ हिस्‍से अच्‍छे बन पड़े हैं । संगीत संयोजन उम्‍दा ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-५
कुल- १९ /२०: ९.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 27 / 30


ओ साहिबां

गीत को सुनते ही पहली पंक्ति में ही एक बात खटकती है । गायक को नुक्‍तों का अंदाज़ा नहीं है । ख़ामख़ां को ‘खामखां’ और ‘ख़ुमारी’ को ‘खुमारी’ गाने से गीत का मज़ा बिगड़ गया है । संगीत औसत है ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, गायकी और आवाज़-३
कुल- १३ /२०: ६.५ /१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30

अक्तूबर के गीतों का पहले चरण की परीक्षा को पार करने का बाद अब तक का समीकरण इस प्रकार है -

तेरा दीवाना हूँ - २७ / ३०.
खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
ओ साहिबा - २४ / ३०
ऐसा नही - २४ / ३०.
सूरज चाँद और सितारे - २२.५ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
डरना झुकना - २०.५ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.



Tuesday, December 23, 2008

जब अक्टूबर के अजय वीर गीत दूसरी बार भिडे...

किन्हीं कारणों वश हम अपनी समीक्षाओं की प्रस्तुति में कुछ पीछे छूट गए थे. पर कोशिश हमारी रहेगी कि जनवरी के पहले सप्ताह के अंत तक हम इस सत्र के सभी गीतों की पहले चरण की समीक्षा और अंक तालिका आपके समुख रख सकें. तो सबसे पहले नज़र करें कि क्या कहते हैं हमारे दूसरे समीक्षक अक्टूबर के अजय वीर गीतों के बारे में -

डरना झुकना छोड दे, सारे बंधन तोड दे..

इस अच्छे गीत की शुरुआत में ही गायकों से हारमोनी के सुरों में गडबड हो गयी है.सुरों की पकड किसी भी सूरत में स्थिर हो नही पाती, जिसकी वजह से आगे चल कर भी गीत प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है. जोगी सुरिंदर और अमनदीप का गला तरल ज़रूर है, मगर इस गफ़लत की वजह से पेरुब द्वारा रचे गये सुरों के इस अज़ीम शाहकार में बॆलेंस नहीं रह पाता.

इसी वजह से पंजाबी तडके में भी स्वाद में उतना जायका नही ले पाता सुनने वाला श्रोता, जो आगे चलकर थोडा सुरीला ज़रूर हो जाता है.मगर कर्णप्रिय या लोकप्रिय होना याने गुणवता में उच्च कोटी का होना यह समीकरण नहीं है, कम से कम मेरे विचार से.सुर और ताल किसी भी गाने के मूल तत्व हैं, और इसमें कमी-बेशी पूरे गीत के स्ट्रक्चर को विकलांग बनाता है.

यूं नहीं की इसमें कोई अच्छाई नहीं है. शुरुआत की संयोजन में हुई कमी के बावजूद गायको के वोईस थ्रो और उर्जा का भंडार असीमित लगता है.गायकों में उम्मीद की किरण नज़र आती है.

मगर एक बात की तारीफ़ किये बगैर समीक्षा पूर्ण नही होगी. सजीव सारथी द्वारा लिखे इस गीत के बोलों में जो आग का, चेतना का प्रस्फ़ुटन हुआ है, उसकी वजह से युवा मन के विद्रोह के स्वर और जोश के तूफ़ान की अभिव्यक्ति अचूक हो पाई है.इस तरह के गीतों से रसोत्पत्ति के माध्यम -संगीत और स्वर का शुद्ध समन्वय हमें सुनने को मिलता है.

इसीलिये,यह गीत खत्म होने के बाद भी मन के पीछे याद के किसी कोने में सहज कर रखा गया और बाद में भी किसी दूसरे कार्य के बीच जुगाली की तरह हमारे कानों के इंद्रियों के समक्ष रिकॊल हो जाता है. चलो ये भी क्या कम है.

गीत - 3.5, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 14.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 10.5/20

ऐसा नही के आज मुझे चांद चाहिये..

शिवानी द्वारा लिखा गया यह गीत बेहद श्रवणीय बन पडा है, इसका पूरा श्रेय संगीतकार ऋषि को जाता है. इस गीत के हर शब्द में छिपी हुई वेदना को प्रतिष्ठा की मासूमियत भरी आवाज़ नें अच्छी तरह से उभारा है.

मगर उनकी आवाज़ के लोच और माधुर्य के साथ साथ स्वर नियंत्रण और सुरों पर ठहरने चलने की सरगम यात्रा का एक सुर से दूसरे पर जाने का सफ़र थोडा़ और सुरीला होता तो इस प्रस्तुति को अधिक अंक मिल सकते थे.गीत को कालजयी बनने में इन सभी का योगदान होता है, तब कहीं जाकर गीत आपके जेहन में हमेशा के लिये कैद हो जाता है.

फ़िर भी ऋषि के स्वरों के और वाद्यों के चयन, इंटरल्युड में हारमोनी के पुट की वजह से मैं तो इसे बार बार सुन रहा हूं, और नारी हृदय के भावों में मन की निश्छलता प्रतिष्ठा जी की आवाज़ से निकल कर सीधे आपके मन की गहराई में जाती है, और आप उसके सुख दुख में एकाकार हो जाते है. चांद की ख्वाहिश ना रख कर विश्वास को प्राधान्यता देना अपने आप में एक बडी बात कह जाती है इस गीत का भावार्थ, जिसके लिये गीतकार को साधुवाद.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 15.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/२०

सूरज चांद और सितारे

कृष्णा पंडित और साथियों द्वारा यह गीत बडे ही जोश और जुनून से गाया है. इस रॊक गीत की शुरुआत से ही जो रिदम की उर्जा का स्रोत फूट पडा है, वह गीत के बोलों को समर्थन करते हुए युवा स्पंदन का प्रतिनिधित्व करता है.

गीत के बोल जिस तरह इस धुन में संजय द्विवेदी नें पिरोये है,या जिस तरह से संगीतकार चैतन्य भट्ट नें इन नई पीढी की भावनाओं के प्रतिबिंब गीतों के बोलों को अपनी गतिवान धुन से चैतन्य बनाया है, दोनो ही बधाई के पात्र है.

मगर गायक समूह इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी इस द्रुत लय के गीत में टेम्पो पकडने में कहीं कहीं पिछड़ जाते है,या फ़िर कहीं कहीं समय पर सम पर पहुंचने के लिये शब्दों को अस्पष्ट या जल्द डिलेवर कर जाते है.

फिर भी धुन की आकर्षकता और ऑवरोल प्रस्तुती इसे पार पहूंचा देती है,और यादगार भी बना देती है.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 4, प्रस्तुति - 3.5, कुल - 15; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/20.

आखरी बार बस.

प्रस्तुत गीत के हर पहलू में एक उत्तमता , उत्तुंगता और गहराई के दीदार होते है, इसमें कोई शक नहीं. मोईन नज़र नें लिखे इस प्रसिद्ध गज़ल के हर शब्द का अपना खुद का वज़्न और सौंदर्य है, जो विरह की इन्तेहां का खूब बयां करता है, साथ ही एक उम्मीद का शेड़ दिखा जाता है. ऐसी गज़ल कृति को स्वर बद्ध कर पाना और निभा जाना कठिन है, जो संगीतकार रफ़ीक शेख़ नें सहजता से और बखूबी निभाया है.

साथ ही उनका गायन गीत को और मेलोडियस,श्रव्य एवं सुकून भरा बना जाता है. उनकी जादुई आवाज़ सधी, नियंत्रित , गज़ल गाने को पूरी तरह मुआफ़िक और मॊड्युलेशन के कणों से भरपूर है. फ़िल्मी संगीत या रेकोर्डेड नॊन फ़िल्मी गीत या गज़ल की सारी खूबियां अपनें में समाये हुए इस गीत की रिपीट वॆल्यु भी साबित होती है जब मन इस गज़ल को सुनने को फिर मांग उठता है.

वैसे इस तरह की तर्ज़ काफ़ी परिभाषित लगती है, और किसी आश्चर्य या अनूठेपन से मरहूम होने से युवाओं के आज की पीढी की मान्यताओं और मांगों को शायद ही पूर्ण कर पायेगी. मगर फ़िर वही बात- कर्णप्रियता या मधुरता में कोई ट्विस्ट की दरकार नही हो सकती. शायद इसीलिये, ऐसी धुनें काल के थपेडों को भी झेल जाती है, और लंबी दूरी का घोडा़ साबित होती है.यकीन ना हो तो फ़िल्मी गीतों का इतिहास पलट कर चेक कर लिजिये.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4.5, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 17; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/20

ओ साहिबा

विश्वजीत एक अच्छे गायक है, और इस गीत में अलग अंदाज़ में अलग जॊनर का गीत बखूबी गाया है. इस गीत का यु एस पी भी यही मुख्त़लिफ़ अंदाज़े बयां है. थोडा और परिश्रम कर स्वरों के ठहराव पर ज़्यादा ध्यान देते तो और चार चांद लग जाते.

सजीव सारथी हमेशा की तरह यहां एक मुख्त़लिफ़ सा विचार लेकर निराला माहौल रचते है. उनके तरकश में शब्दों के तीर भरे हुए है,और सही जगह सही और उचित शब्दों को रखनें में महारत हासिल कर चुके है. उनके बोलों में क्लिष्टता के अभाव की वजह से,और मीटर में घड़न होने की वजह से गेत के गेय बनने के कारण, इस फ़्रंट पर गीत के गायक और संगीतकार को बंदिश में सरलता और तरलता दोनो का लाभ दे जाती है. दिन के जलने का और रात के बुझने का मौलिक खयाल मन मोह लेता है .(कब जले दिन यहां और कब बुझे रातें...) बहूत खूब.

यही बात सुभोजित के बारे में भी कही जा सकती है.गाने के संगीत का एक अपना रिदम है,चैतन्य है.उन्होनें अपनी तरफ़ से से कहीं भी गाने को सुरों द्वारा या वाद्यों द्वारा लाऊड़ नहीं होने दिया है. बेकरारी और खुमारी का चित्रण सुरों के ब्रश से स्ट्रोक देकर रंगा गया है. मन की उहापोह की स्थिति ज़रूर ग्रुप वायोलीन (सिन्थेसाईज़र) के घुमावदार सरगम की मदत से दिखाया है, मगर वह भी नियंत्रित.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 16.5 ; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/२०

Monday, November 17, 2008

अक्तूबर के अजय वीर पहली बार आमने सामने

अक्तूबर के अजय वीर गीतों के पहले चरण की पहली समीक्षा में समीक्षक ने मेलोडी को तरजीह दी है...

गीत # १४ - डरना झुकना छोड़ दे

एकदम सामान्य गीत, पूरा सुन पाना भी मुश्किल... गीत के ३ और गायकी के ३ अंक के अलावा बाकी सारे पक्षों में एक भी नंबर दे पाना मुश्किल।
गीत ३, संगीत ० , गायकी ३, प्रस्तुति ०, कुल ६ / २०.

3/10.

गीत # 15 -ऐसा नही कि आज मुझे चाँद चाहिए

एक और कर्णप्रिय रचना.. गीत बढ़िया संगीत उम्दा , प्रस्तुति भी बढ़िया बस गायकी में (नीचे सुरों में )थोड़ी सी गुंजाईश और हो सकती थी। फिर भी आलओवर बहुत बढ़िया रचना।
गीत ४, संगीत ४, गायकी ३.५, प्रस्तुति ३.५, कुल १५ /२०

7.5/10

गीत # 16 -सूरज चाँद सितारे..

कर्णप्रिय गीत, एक बार सुनने लायक।
गीत ४,संगीत ३.५,गायकी ३.५, प्रस्तुति ४ कुल १५/२०.

7.5/10.


गीत # 17 -आखिरी बार तेरा दीदार ...

बहुत ही सुन्दर गज़ल,सभी पहलूओं पर कलाकारों ने अपना पूरा योगदान दिया। संगीत,गायकी,गीत सब कुछ शानदार। बेहद कर्णप्रिय।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४.५ प्रस्तुति ४.५ कुल १८/२०.

9/10.

गीत # 18 -ओ साहिबा

एक बार फिर सजीव सारथी के मधुर गीत को शुभोजीत ने सुन्दर संगीत में ढ़ाला और उतनी ही सुन्दरता से बिस्वजीत ने इसे गाया। कहीं कहीं साँस लेने की आवाज को बिस्वजीत छुपा नहीं पाये, थोड़ा सा ध्यान देना होगा उन्हें।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४ प्रस्तुति ५ कुल १८ / २०.

9/10.

चलते चलते -

लगता है अब तक समीक्षा के पहले चरण को पार चुके आधे सत्र के गीतों को इन नए गीतों से जबरदस्त टक्कर मिलने वाली है. कुल मिला कर यह सत्र एक उत्तेजना से भरे पड़ाव की तरफ़ बढ रहा है, जहाँ एक से बढ़कर एक गीत एक दुसरे से भिड रहे हैं सरताज गीत की दावेदारी लेकर. संगीत और संगीत प्रेमियों के लिए तो ये सब सुखद ही है

Friday, October 10, 2008

ऐसा नही कि आज मुझे चाँद चाहिए...

दूसरे सत्र के पन्द्रहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज.

आज आवाज़ पर एक बार फ़िर लौटी है शिवानी सिंह और रुपेश ऋषि की जोड़ी और साथ में हैं गायिका प्रतिष्ठा भी, प्रतिष्ठा की आवाज़ को "पहला सुर" एल्बम की ग़ज़ल "ये ज़रूरी नही" में भी हमारे श्रोताओं ने सुनी थी,

वो एक युगल गीत था ये उनका सोलो है, जिसमें उन्होंने खुल कर अपनी आवाज़ में शिवानी के जज़्बात उभारे हैं और शिल्पी हैं एक बार फ़िर रुपेश ऋषि. संयोग से युग्म के सभी महिला श्रोताओं /पाठकों के लिए आने वाले करवा चौथ का तोहफा बन कर आई है ये ग़ज़ल आज, क्योंकि इस ग़ज़ल में जो भाव व्यक्त किए गए हैं वो शायद हर महिला के मन की आवाज़ है, ऐसा हमें लगता है. हम किस हद तक ठीक हैं ये आप सुन कर फैसला दें.

दरअसल ये ग़ज़ल जब रिकॉर्ड हुई थी उन दिनों प्रतिष्ठा डी.ऐ.वी स्कूल में संगीत की अध्यापिका थी,और आल इंडिया रेडियो में उर्दू ग़ज़ल गाती थी. अब दुर्भाग्यवश उनके विवाह उपरांत उनका कोई संपर्क सूत्र नही हो पाने के कारण हम उनकी तस्वीर को आपके रूबरू नही कर पा रहे हैं, पर इस उभरती हुई गायिका की आवाज़ हमें यकीं है आपके दिल में अपनी विशेष जगह बनाने में अवश्य सफल होगी, तो सुनिए इस ताज़ा प्रस्तुति को और अपनी राय / सुझाव टिप्पणियों के माध्यम से हम तक अवश्य पहुंचायें.


बोल / Lyrics

ऐसा नही की आज मुझे चाँद चाहिए,
मुझको तुम्हारे प्यार में विश्वास चाहिए...

मिल न सको मुझे तुम हकीक़त में गर कभी,
जन्नत में बस तुम्हारा मुझे साथ चाहिए...

न की कभी भी ख्वाहिश, मैंने सितारों की,
ख्वाबों में बस तुम्हारा मुझे दीदार चाहिए...

जाओगे दफ्न करने जब मेरे जिस्म को,
बस आखिरी दो पल का मुझे साथ चाहिए...

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SONG # 15, SEASON # 02, "AISA NAHI..." OPENED ON AWAAZ, HIND YUGM ON 10/10/2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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