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Sunday, April 5, 2015

टप्पा गीतों का लालित्य : SWARGOSHTHI – 213 : TAPPA



स्वरगोष्ठी – 213 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 11 : टप्पा

ऊँटों के काफिले के सौदागरों से उपजी टप्पा गायकी 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हमने भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत किया है, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली पिछली तीन कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘ठुमरी’ शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपको ठुमरी के साथ-साथ विकसित हुई गीत शैली, टप्पा पर चर्चा करेंगे और उसका रसास्वादन भी करा रहे हैं। आज हम इस गोष्ठी में विख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर और उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया टप्पा प्रस्तुत कर रहे हैं। 


पंजाब की धरती पर विकसित संगीत शैली ‘टप्पा’ भी एक श्रृंगाररस प्रधान गायकी है। इस शैली में खयाल और ठुमरी, दोनों की विशेषताएँ उपस्थित रहती है। टप्पा गायन के लिए खयाल और ठुमरी, दोनों शैलियों का प्रशिक्षण और अभ्यास आवश्यक है। इसका विकास चूँकि पंजाब और सिन्ध के पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ है, अतः अधिकतर टप्पा पंजाबी भाषा में मिलता है। सिन्ध क्षेत्र में ‘टप्पे’ नामक एक लोकगीत शैली का प्रचलन रहा है। यह लोकगीत आज भी पंजाब में सुनने में आता है। रागदारी संगीत के अन्तर्गत गाया जाने वाला टप्पा, ‘टप्पे’ लोकगीत से काफी भिन्न होता है। कुछ विद्वानों के मतानुसार पंजाब के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में ऊँटों पर अपना व्यापारिक सामान ढोने वाले सौदागरों द्वारा जो लोकगीत गाया जाता था, उनमें रागों का रंग भर कर टप्पा गायन शैली का विकास हुआ। इसे विकसित करने का श्रेय शोरी मियाँ को दिया जाता है। शोरी मियाँ का वास्तविक नाम गुलाम नबी था और ये सुप्रसिद्ध खयाल गायक गुलाम रसूल के पुत्र थे। शोरी मियाँ अठारहवीं शताब्दी में लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समकालीन थे। उनका कण्ठ खयाल गायकी के अनुकूल नहीं थी, इसीलिए उन्होने अपने गले के अनुकूल टप्पा गायकी को विकसित किया। काफी समय तक पंजाब प्रान्त में रहने के कारण पंजाबी भाषा और उस क्षेत्र के लोक संगीत का उन्हें ज्ञान हो गया था। शोरी मियाँ के पंजाबी भाषा में रचे अनेक टप्पा गीत आज भी गाये जाते हैं। शोरी मियाँ के पंजाब से लखनऊ आने के बाद टप्पा गायन का प्रचार-प्रसार लखनऊ संगीत जगत में भी हुआ। आगे चल कर पूरे उत्तर भारत में टप्पा गाया जाने लगा। पंजाब और लखनऊ के अलावा बनारस और ग्वालियर के प्रमुख खयाल गायकों ने टप्पा को अपना लिया।

अब हम प्रस्तुत करते हैं, ग्वालियर परम्परा में टप्पा गायन का एक उदाहरण, देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, उनके मधुर स्वर में सुनिए, राग भैरवी और अद्धा त्रिताल में निबद्ध एक पारम्परिक टप्पा।


टप्पा राग भैरवी : ‘लाल वाला जोबन मियाँ...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




शोरी मियाँ के प्रमुख शिष्य मियाँ गम्मू और ताराचन्द्र थे। इन्होने भी टप्पा गायकी का भरपूर प्रचार किया। मियाँ गम्मू के पुत्र शादी खाँ भी टप्पा गायन में दक्ष थे और तत्कालीन काशी नरेश के दरबारी गवैये थे। लखनऊ, बनारस और ग्वालियर के ख्याल गायन पर भी टप्पा का प्रभाव पड़ा। नवाब वाजिद अली खाँ के समय में तो टप्पा अंग से खयाल गाना, गायक की एक विशेष योग्यता मानी जाती थी। टप्पा अंग से खयाल गायकी को लोकप्रियता मिलने के कारण एक नई गायन शैली का चलन हुआ, जिसे ‘ठप्प खयाल’ कहा जाने लगा। टप्पा की प्रकृति चंचल, लच्छेदार ताने, मुर्की, खटका आदि के प्रयोग के कारण खयाल और ठुमरी की गम्भीरता से दूर है। टप्पा गायन में शुरू से ही छोटी-छोटी दानेदार तानों से सजाया जाता है। स्वरों में किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती। बोल आलाप का प्रयोग नहीं किया जाता। खयाल की तरह टप्पा गायन के घराने नहीं होते, किन्तु विभिन्न स्थानों पर विकसित टप्पा गायकी की प्रस्तुतियों में थोड़ा अन्तर मिलता है। ग्वालियर में प्रचलित टप्पा गायकी में खयाल का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है। इसी प्रकार बनारस में गेय टप्पा पर ठुमरी का प्रभाव परिलक्षित होता है। टप्पा का साहित्य श्रृंगाररस प्रधान होता है और ठुमरी की तरह अधिकतर खमाज, भैरवी, काफी, झिंझोटी, तिलंग, पीलू, बरवा आदि रागों में गायी जाती है। इसी प्रकार अधिकतर टप्पा पंजाबी, अद्धा त्रिताल, सितारखानी जैसे सोलह मात्रा के तालों में निबद्ध मिलता है। अब हम आपको रामपुर सहसवान घराने के सुविख्यात गायक उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। आप इस टप्पा गायकी का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : आ जा गले लग जा...’ : उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 213वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक घरानेदार गायक की आवाज़ में खयाल गायन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक स्वर पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 11 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और पहली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 211वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायिका विदुषी रसूलन बाई के स्वरों में प्रस्तुत की गई ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्नों के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचन्दी। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

इसके अलावा ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली क्रमांक 201 से 210, अर्थात दस अंकों की पहली श्रृंखला में उपरोक्त तीनों प्रतिभागियों- जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने सभी प्रश्नों के सही उत्तर देकर 20-20 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से एक बार पुनः बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे टप्पा शैली पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू कर रहे है। इस श्रृंखला में हम उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित दस प्रकार के थाट पर चर्चा करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। पिछले दिनों हमारी एक नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘I would like more students be exposed to this kind of Quizes. It's a good exercise to review the subject and hope you can spread this message to all music lovers. I am doing it only for the fun and enjoy it too. I appreciate very much what you are doing in service to classical music and hope there will be some more ways to add to your website for this purpose’.
विजया जी के प्रति हम आभार प्रदर्शित करते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



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