मंगलवार, 31 जनवरी 2012

ब्लोग्गर्स चोईस में आज रश्मि प्रभा के साथ हैं उड़न तश्तरी वाले समीर लाल

चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है मशहूर ब्लौगर, सहज व्यक्तित्व वाले समीर जी. भारत से कनाडा, कनाडा से भारत - जीने की अदभुत क्षमता है इनमें. नेट एक नशा है लोगों के लिए... इनके लिए है नेट भारत से जुड़े रहने का सुखद एहसास. मित्रों की भरमार, हितैषियों की भरमार, चाहनेवालों की भरमार. बहुत कुछ कहती है इनकी कलम, आज इनकी पसंद के गीत बहुत कुछ कहेंगे ... ५ गीतों का चयन लाखों गीतों में से आसान तो नहीं ही है...आसान बस इतना है कि जो पहले कौंध जाए. कौंधने में भी जीवन के हर मुकाम हैं -

आइये बैठ जाइये घेरकर, सुनते हैं समीर जी की पसंद ..............


जिन्दगी के अलग अलग अनुभवों से गुजरते, समय बेसमय तरह तरह के आयाम उस वक्त विशेष से एक गीत को पसंद करवाते रहे और आज उन्हीं प्यारे नगमों को सुन उन वक्तों और लम्हों को याद करना दिल को खठ्ठी मीठी यादों की तराई में ले जाकर एक अहसास छोड़ जाता है. जिन्दगी यूँ भी कभी खुशी कभी गम है...मगर ये मुए गम, देर तक भुलाये नहीं भूलते और छा जाते हैं खुशियों भरी यादों पर कोहरा बन कर......यही तो खेल है असल जिन्दगी का. लीजिये सुनिए मेरी ५ पसंद -


शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा...
अब हमें आपके पहलू में ही रहना होगा...


-फिल्म ’पड़ोसन’


जाईये आप कहाँ जायेंगे, ये नजर लौट के फ़िर आयेगी

दूर तक आप के पीछे, पीछे

मेरी आवाज चली जायेगी...

फ़िल्म :ये रात फिर ना आएगी


नीला आसमान सो गया.....
आँसूओं में रात भीगी....
फिल्म ’सिलसिला’ अमिताभ बच्चन


"युं ही तुम मुझसे बात करती हो
या कोई प्यार का इरादा है
, ....फिल्म ’सच्चा झूठा’ लता जी/रफी साः..


गंगा बहती हो क्यूँ....भूपेन हजारीका


-समीर लाल ’समीर’

३१ जनवरी- आज का गाना


गाना: ये दुनिया वाले पूछेंगे

चित्रपट:महल
संगीतकार:कल्याणजी आनंदजी
गीतकार: आनंद बक्षी
गायिका,गायक:आशा भोंसले, किशोर कुमार





ये दुनिया वाले पूछेंगे
ये दुनिया वाले पूछेंगे
मुलाक़ात हुई क्या बात हुई
ये बात किसी से ना कहना

ये दुनिया वाले पूछेंगे
मुलाक़ात हुई क्या बात हुई
ये बात किसी से ना कहना

ये दुनिया वाले पूछेंगे

हो,ये बात अगर कोई पूछे
क्यों नैन तेरे झुक जाते हैं
तुम कहना इनकी आदत है
ये नैन यूँ ही शरमाते हैं
तुम लोगों से ये ना कहना
साँवरिया से लागे नैना
साँवरिया से लागे नैना

ये दुनिया वाले पूछेंगे

हो,मैं तो ये राज़ छुपा लूंगी
तुम कैसे दिल को सम्भालोगे
दिल क्या तुम तो दीवारों पे
मेरी तस्वीर बना लोगे
देखो ये काम नहीं करना
मुझको बदनाम नहीं करना
मुझको बदनाम नहीं करना

ये दुनिया वाले पूछेंगे
मुलाक़ात हुई क्या बात हुई
ये बात किसी से ना कहना

ये दुनिया वाले पूछेंगे

हो,ये पूछेंगे वो कौन है जो
चुपके सपनों में आता है
ये पूछेंगे वो कौन है जो
मेरे दिल को तड़पाता है
तुम मेरा नाम नहीं लेना
सर पे इल्ज़ाम नहीं लेना
सर पे इल्ज़ाम नहीं लेना

ये दुनिया वाले पूछेंगे
मुलाक़ात हुई क्या बात हुई
ये बात किसी से ना कहना

ये दुनिया वाले पूछेंगे


सोमवार, 30 जनवरी 2012

सिने-पहेली # 5

सिने-पहेली # 5 (30 जनवरी 2012)

रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, 'सिने-पहेली' की पाँचवी कड़ी लेकर मैं हाज़िर हूँ। यह स्तंभ आज एक महीना पूरा कर रहा है, और जिस तरह से आप सब नें इसमें भागीदारी निभाई है, हम तहे दिल से आप सभी के आभारी हैं। हम यही समझते हैं कि कोई भी स्तंभ उसके पाठकों के सहयोग और योगदान के बिना सफल नहीं हो सकता। आगे भी इसी तरह से इस स्तंभ में हिस्सा लेते रहिएगा, चाहे जवाब मालूम हो या न हो, कम से कम कोशिश तो आप ज़रूर कर सकते हैं, और यही एक सच्चे खिलाड़ी की असली पहचान है। और फिर चलिए तैयार हो जाइए आज का खेल खेलने के लिए। शुरु करते हैं आज की सिने पहेली!!!


जैसा कि अब तक आप समझ ही चुके होंगे इस प्रतियोगिता को, फिर भी अपने नये श्रोता-पाठकों के लिए बता दूँ कि इसमें हर सप्ताह हम पाँच सवाल पूछते हैं, जिनका जवाब आपको हमें लिख भेजने होते हैं cine.paheli@yahoo.com के ईमेल आइडी पर। हर सप्ताह पिछले सप्ताह में पूछे गए सवालों के सही जवाबों के साथ-साथ कम से कम एक सही जवाब लिख भेजने वाले सभी प्रतियोगियों के नाम घोषित किए जाते हैं। ५० अंकों के बाद सबसे ज़्यादा अंक पाने वाले महाविजेता को 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से एक आकर्षक पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। प्रतियोगिता में भाग लेने के नियम सवालों के बाद नीचे दिए गए हैं।

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सवाल-1: गोल्डन वॉयस

गोल्डन वॉयस में आज हम आपको जो ऑडियो क्लिप सुनवा रहे हैं उसमें आवाज़ है फ़िल्म-संगीत के पहले दौर की एक मशहूर गायिका-अभिनेत्री की। गीत के इस अंश को सुन कर पहचाइए आवाज़ को....



सवाल-2: पहचान कौन!

दूसरे सवाल के रूप में आपको हल करने हैं एक चित्र पहेली का। नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए। यह एक फ़िल्म का पोस्टर है, जिसमें फ़िल्म का नाम हमनें छुपा दिया है। आपको बताना है कि यह किस फ़िल्म का पोस्टर है।



सवाल-3: सुनिये तो...

'सुनिये तो'.... में आज हम आपको सुनवा रहे हैं आशा भोसले और किशोर कुमार के गाए एक मशहूर युगल गीत का शुरुआती संगीत। पहचानिए इस गीत को। बहुत आसान है, है न?



सवाल-4: भूले बिसरे

और अब चौथा सवाल। आज ३० जनवरी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की पुण्यतिथि है जो 'शहीद दिवस' के रूप में पालित होता है। बताइए वह कौन सी एकमात्र हिन्दी फ़िल्म है जो बापू नें थिएटर में जाकर देखी थी?

सवाल-5: आख़िरी सवाल!

और अब पाँचवा और आज का आख़िरी सवाल। सवाल क्या, यह एक पहेली है। ध्यान से पढ़िए और बूझिए... "वेद के संगीत में जब यह ग़ज़ल लिखी गई तो रेखा के होठों से निकलते हुए इसने इसके संगीतकार से ही जैसे पूछा कि इतने दिनों आप कहाँ थे?" बताइए किस फ़िल्मी ग़ज़ल की हम बात कर रहे हैं?


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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचों सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

२. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

३. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 5" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

४. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 3 फ़रवरी तक मिल जाने चाहिए।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा।

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और अब 23 जनवरी को पूछे गए 'सिने-पहेली # 4' के सवालों के सही जवाब---

१. पहले सवाल 'गोल्डन वॉयस' में हमने आपको दो आवाज़ें सुनवाई, और वो आवाज़ें थीं मुहम्मद रफ़ी और मोहनतारा तलपडे की। और यह गीत था १९४७ की 'आपकी सेवा में', जिसमें लता मंगेशकर नें पहली बार पार्श्वागायन किया था।

२. 'चित्र-पहेली' में दिखाए गए चित्र में जिस फ़िल्म का दृश्य दिखाया गया था, वह था नेताजी सुभाषचन्द्र बोस पर बनी श्याम बेनेगल की महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'Bose - The Forgotten Hero'।

३. 'सुनिये तो' में जो आवाज़ हमने सुनाई, वह आवाज़ थी मशहूर गायिका-अभिनेत्री सुरैया की, और वह विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश था।

४. 'भूले-बिसरे' में हमारा सवाल था - लता मंगेशकर का गाया हुआ एक भूला बिसरा गीत है "हंसी हंसी न रही, ख़ुशी ख़ुशी न रही"। बताइये यह गीत किस फ़िल्म का है। इसके साथ ही आपको एक ऐसा गीत और उसकी फ़िल्म का नाम भी बताना है जिसके मुखड़े में उपर्युक्त गीत की फ़िल्म का नाम आता है। तो सही हवाब है फ़िल्म 'सिपहिया', और "सिपहिया" शब्द वाला एक गीत है "बलमा सिपहिया हाय रे तेरी दम्बूक से डर लागे"।

५. 'आख़िरी सवाल' के रूप में हमने पूछा था कोई ऐसी फ़िल्म का नाम जिस फ़िल्म में शाहरूख़ ख़ान और जॉन एब्रहम, दोनों नें अभिनय किया हो। ऐसी फ़िल्में हैं 'कभी अलविदा न कहना' (जिसमें जॉन अतिथी कलाकार थे) और 'काल' (जिसमें शाहरूख़ ख़ान केवल फ़िल्म के शीर्षक गीत में नज़र आए थे)। एक फ़िल्म बन रही है 'बॉम्बे वेलवेट' के नाम से और कुछ अफ़वाह चल पड़ी है कि इसमें आमिर ख़ान और शाहरूख़ ख़ान, दोनों नज़र आयेंगे, और साथ में होंगे जॉन एब्रहम। पर अभी तक कोई भी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है इस बारे में। इसलिए हमारे सवाल के जवाब में इस फ़िल्म का नाम स्वीकार्य नहीं होगा।

और अब 'सिने पहेली # 4' के विजेताओं के नाम ये रहे -----

१. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- ४ अंक
२. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- ४ अंक
३. क्षिति तिवारी, इन्दौर --- ३ अंक
४. शरद तैलंग, कोटा --- ३ अंक
५. निशान्त अहलावत, गुड़गाँव --- १ अंक
६. सी. अभिलाश, बेंगलुरू --- १ अंक
७. अमित चावला, दिल्ली --- १ अंक
८. अमूल्य चन्द्र बरुवा, गुवाहाटी --- १ अंक


आप सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आप को किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। जिन पाठकों नें इसमें भाग लिया पर सही जवाब न दे सके, उनका भी हम शुक्रिया अदा करते हैं और अनुरोध करते हैं कि अगली पहेली में भी ज़रूर भाग लीजिएगा। तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह आपसे इसी स्तंभ में दोबारा मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

३० जनवरी- आज का गाना


गाना: दे दी हमें आज़ादी

चित्रपट:जागृति
संगीतकार:हेमंत कुमार
गीतकार: कवि प्रदीप
गायिका:आशा भोंसले





दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई
दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

शतरंज बिछा कर यहाँ बैठा था ज़माना
लगता था मुश्किल है फ़िरंगी को हराना
टक्कर थी बड़े ज़ोर की दुश्मन भी था ताना
पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना
मारा वो कस के दांव के उलटी सभी की चाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े
मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े
हिंदू और मुसलमान, सिख पठान चल पड़े
कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े
फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

मन में थी अहिंसा की लगन तन पे लंगोटी
लाखों में घूमता था लिये सत्य की सोंटी
वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी
लेकिन तुझे झुकती थी हिमालय की भी चोटी
दुनिया में भी बापू तू था इन्सान बेमिसाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

जग में जिया है कोई तो बापू तू ही जिया
तूने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया
माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया
अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया
जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
रघुपति राघव राजा राम


रविवार, 29 जनवरी 2012

पुण्य तिथि पर पण्डित विष्णु गोविन्द (वी.जी.) जोग को एक स्वरांजलि

स्वरगोष्ठी – ५५ में आज
जुगलबन्दी के बादशाह वायलिन वादक पण्डित जोग  


भारतीय संगीत के प्रातःकालीन रागों में एक बेहद मधुर और भक्तिरस से सराबोर राग है- अहीर भैरव। हिन्दी फिल्मों में इस राग का प्रयोग बहुत अधिक तो नहीं हुआ किन्तु जिन संगीतकारो ने इस राग का उपयोग किया, उन्होने फिल्म-संगीत-जगत को अपने सदाबहार गीतों से समृद्ध कर दिया। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में सुप्रसिद्ध वायलिन वादक पण्डित वी.जी. (विष्णु गोविन्द) जोग का अत्यन्त प्रिय राग अहीर भैरव ही था। ३१ जनवरी को पण्डित जी की आठवीं पुण्यतिथि है। इस अवसर पर आज के अंक में हम उनके प्रिय राग अहीर भैरव के माध्यम से उन्हें स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं।    

स्वरगोष्ठी में एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों की बैठक में उपस्थित हुआ हूँ। दोस्तों, आज की बैठक में हम सुप्रसिद्ध वायलिन वादक पण्डित वी.जी. जोग के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके प्रिय राग अहीर भैरव के माध्यम से चर्चा करेंगे। परन्तु चर्चा की शुरुआत हम दो ऐसे फिल्मी गीत से करेंगे, जिन्हें राग अहीर भैरव के स्वरों में पिरोया गया है। १९६३ में संगीतकार सचिनदेव बर्मन द्वारा स्वरबद्ध गीतों से सजी फिल्म मेरी सूरत तेरी आँखें प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का एक सदाबहार गीत- पुछो न कैसे मैंने रैन बिताई...., राग अहीर भैरव पर आधारित था। फिल्मों में इस गीत के अलावा इसी राग पर आधारित कई गीत रचे गए, किन्तु जो लोकप्रियता फिल्म मेरी सूरत तेरी आँखें के गीत को प्राप्त हुई, वह अन्य गीतों को न मिल सकी। कुछ समय पूर्व मुझे गायक येशुदास के स्वरों में एक अचर्चित गीत- चलो मन जाएँ घर अपने... सुनने का अवसर मिला, जिसमें राग अहीर भैरव के स्वरों का प्रयोग बड़ी शुद्धता से किया गया है। किसी फिल्मी गीत में राग के स्वरों का इतना सटीक निर्वहन बहुत कम मिलता है। पड़ताल करने पर ज्ञात हुआ कि यह गीत १९९४ में निर्मित और १९९५ में प्रदर्शित फिल्म स्वामी विवेकानन्द का है और इसे सलिल चौधरी ने संगीतबद्ध किया था। यह सलिल चौधरी की अन्तिम फिल्म थी, जिसका प्रदर्शन उनके निधन के बाद हुआ था। आइए सुनते हैं, येशुदास के स्वरों में, राग अहीर भैरव पर आधारित गुलज़ार लिखित यह गीत-

फिल्म – स्वामी विवेकानन्द : ‘चलो मन जाएँ घर अपने...’ : संगीत – सलिल चौधरी


राग अहीर भैरव सुप्रसिद्ध वायलिन वादक पण्डित विष्णु गोविन्द (वी.जी.) जोग का प्रिय राग रहा है। ३१ जनवरी को इस महान संगीतज्ञ की आठवीं पुण्यतिथि है। इस अवसर पर हम उन्हें श्रद्धा से नमन करते हैं। २२ फरवरी, १९२२ को उनका जन्म मुम्बई में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें पं. शंकरराव आठवले और गणपतराव पुरोहित से मिली। बाद में उन्होने लखनऊ आकर मैरिस म्युजिक कालेज (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) के तत्कालीन प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातञ्जंकर से न केवल संगीत-शिक्षा प्राप्त की बल्कि १९५२ तक इसी कालेज में वायलिन शिक्षक के रूप में कार्य भी किया। वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय के गिटार शिक्षक डॉ. सुनील पावगी, पण्डित जोग के न केवल शिष्य रहे हैं, बल्कि अपने गुरु के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध भी किया है। श्री पावगी ने अपने गुरु पण्डित जोग के संगीत सीखने के जुनून के बारे मे एक रोचक प्रसंग सुनाया। लखनऊ में सीखने और सिखाने के दौर में ही वे एक बार जोग साहब बिना किसी को बताए, अचानक गायब हो गए। उनके गुरु डॉ. रातञ्जंकर के साथ-साथ घर के लोग चिन्तित हो गए। दो मास बाद मालूम हुआ की वे मैहर पहुँच कर बाबा अलाउद्दीन खाँ से संगीत सीख रहे हैं। जब बाबा को मालूम हुआ कि उनका यह शिष्य बिना किसी को बताए मैहर आ गया है, तो उन्होने तत्काल जोग साहब को वापस लखनऊ भेजा। आइए अब हम आपको पण्डित जोग का बजाया उनका प्रिय राग अहीर भैरवसुनवाते हैं। तबला संगति उस्ताद शेख दाऊद ने की है।
वायलिन वादन : वी.जी. जोग : राग – अहीर भैरव : मध्य व द्रुत तीनताल



डॉ. पावगी से जब पण्डित जोग के वादन की विशेषताओं पर चर्चा हुई तो उन्होने बताया कि जोग साहब जुगलबन्दी के बादशाह थे। उन्होने देश-विदेश के अनेक ख्यातिप्राप्त कलासाधकों के साथ वायलिन की जुगलबन्दी की है, किन्तु जो प्रसिद्धि उन्हें उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई के साथ जुगलबन्दी करके मिली वह अन्यत्र दुर्लभ था। इन दोनों कलासाधकों ने प्रथम बार १९४६ में कोलकाता के लाला बाबू संगीत सम्मेलन में जुगलबन्दी की थी। अपने समय के प्रायः सभी संगीतज्ञों के साथ पण्डित जी की जुगलबन्दी के रिकार्ड, संगीत-प्रेमी आज भी सुनते और सराहते हैं। उस्ताद इनायत खाँ (सितार), पण्डित रामनारायण (सारंगी), पण्डित रविशंकर (सितार), पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया (बांसुरी), उस्ताद अमजद अली खाँ (सरोद), पण्डित शिवकुमार शर्मा (संतूर), पण्डित ब्रजभूषण काबरा (गिटार) और पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष (हारमोनियम) के साथ जोग साहब की जुगलबन्दियाँ अविस्मरणीय रहीं हैं। उन्होने कई दक्षिण भारतीय वायलिन वादकों और पाश्चात्य संगीत के प्रसिद्ध पियानो वादकों के साथ भी अपनी वायलिन की जुगलबन्दी की है। आइए अब हम आपको पण्डित वी.जी. जोग और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की वायलिन और शहनाई जुगलबन्दी सुनवाते हैं। दोनों महान कलासाधकों ने राग पीलू – कहरवा ताल में एक पूरबी धुन का वादन किया है।
वायलिन-शहनाई जुगलबन्दी : पं. वी.जी. जोग – उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ : राग पीलू धुन        


एक सवाल आपसे
मित्रों, अभी आपने पण्डित वी.जी. जोग और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा प्रस्तुत जुगलबन्दी के अन्तर्गत राग पीलू की एक धुन सुनी। इसे सुन कर क्या आपको एक पुराने फिल्म का गीत याद आ रहा है? यदि हाँ, तो गीत का मुखड़ा और फिल्म का नाम हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर लिख भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’के ५७वें अंक में सम्मान के साथ प्रकाशित करेंगे।
इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सब के बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज भेज सकते हैं। अगले रविवार को हमारी-आपकी सांगीतिक बैठक पुनः आयोजित होगी।

आपकी बात
‘स्वरगोष्ठी’ के ५३वें अंक में हमने आपसे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सर्वाधिक चर्चित प्रतिबन्धित गीत के बारे में आपसे प्रश्न किया था, जिसका सही उत्तर है- वन्देमातरम्, और सही उत्तर दिया है इन्दौर की क्षिति तिवारी जी ने। उन्हें रेडियो प्लेबैक इंडिया की ओर से बधाई।    
झरोखा अगले अंक का

दोस्तों, आपने मौसम मे बदलाव का अनुभव किया होगा। दरअसल कल ही ऋतुराज बसन्त ने अपने आगमन की दस्तक दे दी है। अगले अंक में हम राग आधारित फिल्म संगीत के बहाने, बसन्त ऋतु के रागों से ऋतुराज का स्वागत करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० बजे हमारी-आपकी पुनः सांगीतिक बैठक आयोजित होगी। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

२९ जनवरी- आज का गाना


गाना: मिल गए मिल गए आज मेरे सनम

चित्रपट:कन्यादान
संगीतकार:शंकर जयकिशन
गीतकार: हसरत जयपुरी
गायिका:लता मंगेशकर





मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम

मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम

ऐ नज़रों ज़रा काम इतना करो
ऐ नज़रों ज़रा काम इतना करो
तुम मेरी मांग में आज मोती भरो
तुम मेरी मांग में आज मोती भरो

एक उजाला हुआ ढल गई शाम-ए-ग़म
एक उजाला हुआ ढल गई शाम-ए-ग़म
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम

मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम

वो कहाँ छुप रहे थे मैं हैरान थी
वो कहाँ छुप रहे थे मैं हैरान थी
मेरी सदियों से उनसे ही पहचान थी
मेरी सदियों से उनसे ही पहचान थी

ऐसे किस्से ज़माने में होते हैं कम
ऐसे किस्से ज़माने में होते हैं कम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम

मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम

उम्र भर की तड़प को करार आ गया
उम्र भर की तड़प को करार आ गया
उनसे ऑंखें मिलीं मुझको प्यार आ गया
उनसे ऑंखें मिलीं मुझको प्यार आ गया

याद करती रही मैं उनको दम-बदम
याद करती रही मैं उनको दम-बदम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम

मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
मिल गए मिल गए आज मेरे सनम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम
आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम


शनिवार, 28 जनवरी 2012

रेडियो प्लेबैक आर्टिस्ट ऑफ द मंथ - कुहू गुप्ता

कुहू गुप्ता 

कवर गीतों से लेकर ढेरों ओरिजिनल गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया है कुहू ने, इन्टरनेट पर सक्रिय अनेकों संगीतकारों की धुनों में अपनी आवाज़ का रंग भरने वाली गायिका कुहू गुप्ता है रेडियो प्लेबैक की आर्टिस्ट ऑफ द मंथ...अपने अब तक के करियर के कुछ यादगार गीत और गायन के अपने खट्टे मीठे अनुभव बाँट रही है आपके साथ गायिका कुहू गुप्ता.

२८ जनवरी- आज का गाना


गाना: वो शाम कुछ अजीब थी

चित्रपट:ख़ामोशी
संगीतकार:हेमंत कुमार
गीतकार: गुलज़ार
गायक:किशोर कुमार






वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है

वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है

झुकी हुई निगाह में, कहीं मेरा ख़याल था
दबी दबी हँसीं में इक, हसीन सा सवाल था
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
न जाने क्यूँ लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो

वो शाम कुछ अजीब थी

मेरा ख़याल हैं अभी, झुकी हुई निगाह में
खिली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो

वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है



शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

अकबर के नवरत्न - इब्ने इंशा की लघुकथा

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने सलिल वर्मा की आवाज़ में गिरिजेश राव की एक कहानी "भूख" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं इब्ने इंशा की लघुकथा "अकबर के नवरत्न", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

 कहानी "अकबर के नवरत्न" का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 19 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस कथा का टेक्स्ट बैरंग पर उपलब्ध है।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का। ~ इब्ने इंशा (1927-1978)

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अकबर अनपढ़ था। (इब्ने इंशा की "अकबर के नवरत्न" से एक अंश)

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#Third Story, Akbar Ke Navaratna: Ibne Insha/Hindi Audio Book/2012/3. Voice: Anurag Sharma

२७ जनवरी- आज का गाना


गाना: वादा रहा सनम

चित्रपट:खिलाड़ी
संगीतकार:जतिन-ललित
गीतकार: अनवर सागर
गायक,गायिका:अभिजीत, अलका याग्निक






आ हा हा हा हा, आ हा हा हा हा
आ आ आ हा हा हा हा हा
वादा रहा सनम, होंगे जुदा ना हम
चाहे ना चाहे ज़माना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना

कैसी उदासी तेरे चेहरे पे छायी
क्या बात है जो तेरी आँख भर आई
कैसी उदासी तेरे चेहरे पे छायी
क्या बात है जो तेरी आँख भर आई
देखो तो क्या नज़ारे हैं
तुम्हारी तरह प्यारे हैं
हंसो ना मेरे लिए तुम
सभी तो ये तुम्हारे हैं ओ जाने जान
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना

वादा रहा सनम, होंगे जुदा ना हम
चाहे ना चाहे ज़माना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना

इन वादियों में यूँ ही मिलते रहेंगे
दिल में वफ़ा के दिए जलते रहेंगे
इन वादियों में यूँ ही मिलते रहेंगे
दिल में वफ़ा के दिए जलते रहेंगे
यह माँगा है दुआओं में
कमी ना हो वफाओं में
रहें तेरी निगाहों में
लिखो ना ये फिजाओं में ओ साजना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना

वादा रहा सनम, होंगे जुदा ना हम
चाहे ना चाहे ज़माना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना
हमारी चाहतों का मिट ना सकेगा फ़साना



गुरुवार, 26 जनवरी 2012

शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट.. बाबा नागार्जुन की हुंकार के साथ आईये करें गणतंत्र दिवस का स्वागत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल ०२


बचपन बीत जाता है, बचपना नहीं जाता। बचपन की कुछ यादें, कुछ बातें साथ-साथ आ जाती हैं। उम्र की पगडंडियों पर चलते-चलते उन बातों को गुनगुनाते रहो तो सफ़र सुकून से कटता है। बचपन की ऐसी हीं दो यादें जो मेरे साथ आ गई हैं उनमें पहली है कक्षा सातवीं से बारहवीं तक (हाँ मेरे लिए बारहवीं भी बचपन का हीं हिस्सा है) पढी हुईं हिन्दी कविताएँ और दूसरी है साल में कम-से-कम तीन दिन देशभक्त हो जाना। आज २६ जनवरी है तो सोचा कि इन दो यादों को एक साथ पिरोकर एक ऐसे कवि और उनकी ऐसी कविताओं का ताना-बाना बुना जाए जिससे महफ़िल की पहचान बढे और आज के लिए थोड़ी बदले भी (बदलने की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आज की महफ़िल में उर्दू की कोई ग़ज़ल नहीं, बल्कि हिन्दी की कुछ कविताएँ हैं)



मैंने बचपन की किताबों में कईयों को पढा और उनमें से कुछ ने अंदर तक पैठ भी हासिल की। ऐसे घुसपैठियों में सबसे आगे रहे बाबा नागार्जुन यानि कि ग्राम तरौनी, जिला दरभंगा के वैद्यनाथ मिश्र। अभी तक कंठस्थ है मुझे "बादल को घिरते देखा है"।


शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल 
मुखरित देवदारु कनन में, 
शोणित धवल भोज पत्रों से 
छाई हुई कुटी के भीतर, 
रंग-बिरंगे और सुगंधित 
फूलों की कुंतल को साजे, 
इंद्रनील की माला डाले 
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में, 
कानों में कुवलय लटकाए, 
शतदल लाल कमल वेणी में, 
रजत-रचित मणि खचित कलामय 
पान पात्र द्राक्षासव पूरित 
रखे सामने अपने-अपने 
लोहित चंदन की त्रिपटी पर, 
नरम निदाग बाल कस्तूरी 
मृगछालों पर पलथी मारे 
मदिरारुण आखों वाले उन 
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की 
मृदुल मनोरम अँगुलियों को 
वंशी पर फिरते देखा है।


एक साँस में इतना कुछ लिख और पढ जाना मेरे लिए नामुमकिन के बराबर था(है)। और ऊपर से... सारे बिंब अतुलनीय। "कहाँ गया धनपति कुबेर वह, कहाँ गई उसकी वह अल्का.. नहीं ठिकाना कालिदास के व्योमप्रवाही गंगाजल का"... ईमानदारी से कहूँ तो यह बाबा नागार्जुन हीं थे जिन्होंने मुझे कालिदास से जोड़ा। मेरे हिसाब से वे कालिदास के मुँहलग्गु थे.. तभी तो उन्होंने कालिदास से सीधे-सीधे पूछ लिया कि:


वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका 
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का 
देख गगन में श्याम घन-घटा 
विधुर यक्ष का मन जब उचटा 
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर 
चित्रकूट से सुभग शिखर पर 
उस बेचारे ने भेजा था 
जिनके ही द्वारा संदेशा 
उन पुष्करावर्त मेघों का 
साथी बनकर उड़ने वाले 
कालिदास! सच-सच बतलाना 
पर पीड़ा से पूर-पूर हो 
थक-थककर औ' चूर-चूर हो 
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर 
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे? 
रोया यक्ष कि तुम रोये थे!


ये दो कविताएँ महज कविताएँ नहीं मेरे लिए हिन्दी साहित्य का मुख्यद्वार थीं। साहित्य में मेरी अभिरूचि पैदा हुई तो बाबा की दूसरी कविताओं को ढूँढ कर पढना शुरू किया। और अब जो बाबा मेरे सामने मौजूद थे, वे पहले के बाबा से निपट उल्टे थे। भारी-भरकम संस्कृतमय हिन्दी के शब्दों को गूंथने वाले बाबा को मैंने जब यह कहते सुना कि:


आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी, 
यही हुई है राय जवाहरलाल की 


इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको? 
सत्ता की मस्ती में, भूल गई बाप को?


या फिर "भाई मोरारजी" को श्रद्धांजलि देती हुई ये पंक्तियां पढीं:


हाय तुम्हारे बिना लगेगा सूना यह संसार जी, 
गिरवी कौन रखेगा हमको सात समंदर पार जी


तो मालूम चला कि बाबा का असल रूप यही है। "खिचड़ी विप्लव देखा हमने" नाम के कविता-संग्रह में उन्होंने इंमरजेंसी के पक्ष और विपक्ष दोनों की जो बघ्घियां उधेड़ी हैं, उसका सानी कहीं नहीं.. कोई नहीं। न यकीन आए तो "जाने तुम कैसी डायन हो" और "तुनुक मिजाजी नहीं चलेगी" नाम की ये दो कविताएँ देखें। बाबा किसी एक विचारधारा से बंधे ने थे, वे जनवादी थे, जनता के लिए लिखते थे और हमेशा जनता के साथ खड़े होते थे। तभी तो इमरजेंसी के खिलाफ हुए "संपूर्णक्रांति आंदोलन" में जेल जाने के बावजूद जब उन्हें लगा कि आंदोलन दिशाहीन हो रहा है तो उन्होंने "जयप्रकाश नारायण" को संबोधित करते हुए कहा कि:


खिचड़ी विप्लव देखा हमने, 
भोगा हमने क्रांति विलास,
अब भी खत्म नहीं होगा क्या
पूर्णक्रांति का भ्रांति विलास?


बाबा अपने जीवनकाल में हर अन्याय के खिलाफ मुखर रहे। अपनी बातों को व्यंग्य के रूप में पेश करने में उनका कोई जवाब न था। उनके मन में जो आया,  उन्होंने सो लिखा। आज हम आपके लिए उनकी ऐसी हीं एक रचना लेकर आए हैं जो क्रांति, शांति, भाषण, प्रवचन और घोषणाओं जैसे हर एक गोरखधंधे पर कुठाराघात करती है।


भागलपुर के सुलतानगंज में जन्मे संजय झा की एक अदना-सी कोशिश थी "स्ट्रिंग्स.. बाउंड बाई फेथ" नाम की फिल्म। कुंभ मेले पर आधारित यह फिल्म कुंभ के साधुओं के विरोध के कारण रीलिज तो नहीं हो पाई, लेकिन इस फिल्म के एक गाने ने बाबा के विध्वंसक शब्दों की वज़ह से सबका (कम से कम मेरा) ध्यान खींचा। इस गाने को अपने अलहदा और हुंकारमय संगीत से सजाया है ज़ुबिन गर्ग ने और आवाज़ें हैं खुद ज़ुबिन, सौरन रॉय चौधरी और आजकल पापोन के नाम से लोकप्रिय अंगरंग महंता की।


ॐ के आह्वान के साथ "हमेशा-हमेशा राज करेगा मेरा पोता" (इशारा तो समझ हीं रहे होंगे) जैसा व्यंग्य, "शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट" जैसी हुंकार और "इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा" जैसा विषाद महसूस करते चलें तो आज के दिन बाबा को याद करने/कराने की मेरी कोशिश सफल हो जाएगी।

ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..
ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द
ॐ प्रण‌व‌, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें
ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌गार्, ॐ घोष‌णाएं
ॐ भाष‌ण‌...
ॐ प्रव‌च‌न‌...
ॐ हुंकार, ॐ फ‌टकार्, ॐ शीत्कार
ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्कार, ॐ चीत्कार
ॐ आस्फाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इशारे
ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ
ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं
ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग
ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग
ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के पात
ॐ डाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट बात
ॐ कोय‌ला-इस्पात-पेट्रोल‌
ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, बाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌मान्नं, इमा आपः इद‌म‌ज्यं, इदं ह‌विः
ॐ य‌ज‌मान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ क‌विः
ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्वंक्रांतिः
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः स‌र्व‌ग्यं शांतिः
ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्वं भ्रांतिः
ॐ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ
ॐ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ
ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ॐ निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल, ॐ
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌

ॐ काली काली काली म‌हाकाली म‌हकाली
ॐ मार मार मार वार न जाय खाली
ॐ अप‌नी _________
ॐ दुश्म‌नों की पामाली
ॐ मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले का हार
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ॐ ह‌म च‌बायेंगे तिल‌क और गाँधी की टाँग
ॐ बूढे की आँख, छोक‌री का काज‌ल
ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, गंगाज‌ल
ॐ शेर के दांत, भालू के नाखून‌, म‌र्क‌ट का फोता
ॐ ह‌मेशा ह‌मेशा राज क‌रेगा मेरा पोता
ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट
ॐ श‌त्रुओं की छाती पर लोहा कुट
ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली
ॐ बंदूक का टोटा, पिस्तौल की न‌ली
ॐ डॉल‌र, ॐ रूब‌ल, ॐ पाउंड
ॐ साउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड

ॐ ॐ ॐ
ॐ ध‌रती, ध‌रती, ध‌रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌
ॐ अष्ट‌धातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे
ॐ म‌हाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे
ॐ दुर्गा, दुर्गा, दुर्गा, तारा, तारा, तारा
ॐ इसी पेट के अन्द‌र स‌मा जाय स‌र्व‌हारा
ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त, ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त‌


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खेल महफ़िल का:

जो भी महफ़िल-ए-ग़ज़ल के पुराने श्रोता हैं वो यह जानते होंगे कि गायब शब्द का मतलब क्या है। जो नए हैं उन्हें बता दें कि हम हर कड़ी में पेश की गई ग़ज़ल/नज़्म/कविता से एक शब्द हटा दिया करेंगे, जिसको लेकर पाठकों को या तो खुद से कुछ लिखना है या किसी नामचीन ग़ज़लगो/कवि की वे पंक्तियाँ टिप्पणी में डालनी हैं जिसमें यह शब्द मौजूद हो। तो अब आपकी बारी है..... खेल शुरू किया जाए!!!



पुराना हिसाब:

सही शब्द:  क़तरा
बधाईयाँ:  रीतेश जी
चंद शेर:

तुझको एक क़तरा भी न ग़म मिले,
अपना हक़ तमाम लिया है इसलिए - रीतेश जी

इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना,
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना - चचा ग़ालिब


तो चलिए गिरता है आज की महफ़िल का परदा।

साक़ी-ए-महफ़िल-  विश्व दीपक

छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम...

वन्देमातरम्गीत के रचनाकार 
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय 

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में बलिदानी क्रान्तिकारियों और आन्दोलनकारियों के हम सदैव ऋणी रहेंगे, परन्तु  इस दौर में कलम के सिपाहियों का योगदान भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम कुछ ऐसे कवियों और शायरों का स्मरण करने जा रहे हैं, जिनकी कलम ने तलवार का रूप धारण कर ब्रिटिश हुकूमत के छक्के छुड़ा दिये। इन गीतों के उग्र तेवर से भयभीत होकर तत्कालीन सरकार ने इन्हें प्रतिबन्धित तक कर दिया।




स्वरगोष्ठी – ५४ में आज – गणतन्त्र दिवस विशेषांक

स्वतन्त्रता संग्राम के प्रतिबन्धित गीतों पर एक चर्चा

आज गणतन्त्र दिवस के अवसर पर ‘स्वरगोष्ठी’ के इस विशेष अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके बीच उपस्थित हूँ। मित्रों, आज हम आपसे किसी फिल्म संगीत, राग, ताल या किसी वरिष्ठ कलासाधक पर चर्चा नहीं, बल्कि कुछ ऐसे दुर्लभ गीतों पर चर्चा करेंगे, जिन्हें भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान लिखे और गाये गए। इन गीतों के रचनाकारों ने कलम को तलवार बना कर गीतों से जनमानस को उद्वेलित कर दिया। आज की गोष्ठी में हम ऐसे ही कुछ गीतों पर चर्चा करेंगे।

वर्ष १९९७ में पूरे देश में स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती मनाई गई थी। इस विशेष अवसर के लिए राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगठन ‘संस्कार भारती’ ने मुझे स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान जब्तशुदा,प्रतिबन्धित गीतों पर शोध का दायित्व सौंपा था। लगभग एक वर्ष के दौरान मैंने ऐसे साढ़े तीन सौ कविताओं और गीतों का संग्रह किया था। इनमें से अधिकतर कविता के रूप में हैं। लगभग ७०-७५ रचनाएँ लोकगीत के रूप में और लगभग ५० गीत विधिवत छन्दबद्ध हैं। इस संकलन में एक ऐसा भी गीत है जिसकी रचना १८५७ में की गई थी। १८५७ के प्रथम क्रान्ति के सेनानियों में एक प्रमुख नाम अज़ीमुल्ला खाँ का है। ये अज़ीमुल्ला खाँ नाना साहब पेशवा के वकील थे। इस क्रान्ति की पूरी योजना इन्हीं की बनाई हुई थी। १८५७ क्रान्ति के दौरान अज़ीमुल्ला खाँ ने ‘पयाम-ए-आज़ादी’ नामक पत्र निकाला। इस पत्र में उन्हीं का रचा एक झण्डा गीत प्रकाशित हुआ था, जिसकी आरम्भिक पंक्तियाँ हैं- ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा...’। क्रान्तिकारी अखबार में यह गीत प्रकाशित होते ही स्वतन्त्रता सेनानियों को एक नया हथियार मिल गया और अंग्रेजों की नींद हराम हो गई। इस गीत में एक ओर जहाँ जनचेतना जगाने की शक्ति थी, वहीं अंग्रेजों को दी गई सीधी चुनौती भी। भयभीत होकर तत्कालीन हुकूमत ने गीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया। जिसके पास इस अखबार की प्रति मिलती या जो कोई भी इस गीत को गाते-गुनगुनाते पाया जाता उसे कठोर यातनाएँ दी जाती थी। आइए, आज हम आपको स्वतन्त्रता संग्राम का यही प्रतिबन्धित गीत सुनवाते हैं।

प्रतिबन्धित गीत : ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा...’ : रचना – क्रान्तिवीर अज़ीमुल्ला खाँ


उन्नीसवीं शताब्दी का एक और बेहद लोकप्रिय किन्तु प्रतिबन्धित गीत रहा है, ‘वन्देमातरम्’। इस कालजयी गीत की रचना १८७५ में सुप्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने की थी। १८८२ में जब उनके उपन्यास ‘आनन्दमठ’ का प्रकाशन हुआ, तब यह गीत उसमें शामिल किया गया था। यह उपन्यास अंग्रेज़ शासकों के शोषण और अकाल जैसे प्रकृतिक प्रकोप से मर रही जनता को जागृत करने के लिए अचानक उठ खड़े संन्यासी विद्रोह पर आधारित है।‘आनन्दमठ’ उपन्यास में यह गीत भवानन्द नामक संन्यासी ने गाया है। ‘वन्देमातरम्’ गीत के प्रकाशन के बाद बंगाल में आयोजित होने वाले स्वतन्त्रता आन्दोलनों में गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया कि तत्कालीन सरकार भयभीत हो उठी। १८९६ में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया, जिसे यदुनाथ भट्टाचार्य ने संगीतबद्ध किया था। १९०१ में कलकत्ता में ही हुए एक अन्य अधिवेशन में चरणदास ने और १९०५ के बनारस अधिवेशन में सरलादेवी चौधरानी ने यह गीत गाया। अब तक ‘वन्देमातरम्’गीत मात्र एक नारा नहीं बल्कि मंत्र बन चुका था। इसका उच्चारण करते हुए स्वतन्त्रता सेनानी लाठी, गोली सह लेते। इस मंत्र का उच्चारण करते हुए अनेक बलिदानी हँसते हुए फाँसी पर झूल गए। इस गीत की शक्ति से घबरा कर ब्रिटिश सरकार ने अन्ततः इसे प्रतिबन्धित कर दिया। प्रतिबन्ध लगते ही कवियों और गीतकारों ने गीत को जीवित रखने का एक दूसरा रास्ता अपनाया। इन्होने ‘वन्देमातरम्’ की प्रशस्ति में एक छन्द विशेष में गीत-रचना शुरू कर दिया। १९२९ में देहारादून के अभय प्रेस से ‘चिंगारी’ नामक गीत संग्रह प्रकाशित हुआ था, जिसमें विश्वनाथ शर्मा का गीत ‘कौम के खादिम की है जागीर वन्देमातरम...’ शामिल था। इससे पूर्व इसी छन्द में पण्डित कन्हैयालाल दीक्षित ‘इन्द्र’ ने ‘वन्देमातरम्’ पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के बाद गीत लिखा था- ‘छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्...’। इसके अलावा शोध के दौरान मुझे इसी छन्द में कुछ ऐसे गीत मिले थे, जिनके रचनाकारों के नाम अज्ञात रहे। आगे चल कर ये सभी गीत भी प्रतिबन्धित हुए। अब आप सुनिए, ‘वन्देमातरम्’ गीत की प्रशस्ति में रचे गएप्रतिबन्धित गीतों में से एक-एक अन्तरे को मिला कर प्रस्तुत यह गीत-

गीत - ‘छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्...’ : रचना - विश्वनाथ शर्मा,कन्हैयालाल दीक्षित एवं दो अज्ञात गीतकार


तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद बंकिम बाबू की यह कालजयी रचना क्रान्तिकारियों के साथ-साथ अहिंसक आन्दोलनकारियों का भी मंत्र बना हुआ था। इस मंत्र का प्रयोग विभिन्न आन्दोलनों के अलावा अन्य महत्त्वपूर्ण अवसरों पर भी किया जाता रहा। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस अखबार का प्रकाशन आरम्भ किया था, उसका नाम ‘वन्देमातरम्’ रखा गया। अंग्रेजों की गोली से घायल होकर दम तोड़ने वाली मातंगिनी हाज़रा ने मरते समय ‘वन्देमातरम्’ का ही उदघोष किया था। १९०७ में मैडम भीखाजी कामा ने स्टुट्गार्ट, जर्मनी में जो तिरंगा झण्डा फहराया,उसके मध्य में ‘वन्देमातरम्’ शब्द अंकित था। आर्य प्रिंटिंग प्रेस, लाहौर और भारतीय प्रेस,देहरादून से १९२९ में प्रकाशित पुस्तक ‘क्रान्ति गीतांजलि’ का पहला गीत ‘वन्देमातरम्’ था, जिसेब्रिटिश सरकार ने प्रतिबन्धित कर दिया था।

आज़ादी के बाद बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय रचित ‘वन्देमातरम्’ गीत के प्रारम्भिक दो अन्तरों को संविधान सभा ने राष्ट्रगान ‘जन गण मन...’ के समतुल्य मान्यता दी। २४जनवरी, १९५० को डॉ.राजेन्द्रप्रसाद ने संविधान सभा में निम्नलिखित प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था। The composition consisting of words and music known as ‘Jan Gana Mana…’ is the Natonal Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song ‘Vandemataram…’, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with ‘Jan Gana Mana…’ and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)
1907 में मैडम भीखाजी कामा द्वारा
स्टुट्गार्ट
, जर्मनी में फहराया गया झण्डा

हमारे संविधान ने आज हमें ‘वन्देमातरम्’ गीत गाने की आज़ादी दी है। विधानसभा और लोकसभा के सत्रों का आरम्भ ‘वन्देमातरम्’ गायन से ही होता है। आकाशवाणी केन्द्रों की पहली सभा का आरम्भ इसी गीत से होता है। १५अगस्त, १९४७ को देश के रेडियो केन्द्रो का आरम्भ सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में प्रस्तुत ‘वन्देमातरम्’ के स्वर में किये गए सजीव प्रसारण से हुआ था। पण्डित जी ने गीत के सभी अन्तरे राग ‘देस’ में निबद्ध कर प्रस्तुत किया था। लीजिये आप भी सुनिए ‘वन्देमातरम्’ गीत का यह दुर्लभ संस्करण- और इसी के साथ अब हम आज के इस विशेष अंक को यहीं विराम देते हैं।

‘वन्देमातरम...’ : स्वर – पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर : राग – देस


आपकी बात
‘स्वरगोष्ठी’ में संस्कार गीत श्रृंखला पर हमारे एक पाठक Shri Dockhem Singh ने अपने २२ दिसम्बर के सन्देश में लिखा है- Can you give live, if possible from Aladin langa, Noor mohamad langa sumer mohamad langa presentation. I used to hear in childhood on akashvani, jodhpur, now missing , thanks. श्री सिंह की फरमाइश का सम्मान करते हुए हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि स्वरगोष्ठी के भावी किसी अंक में राजस्थान के लंगा जाति की इस लोक संगीत शैली को अवश्य प्रस्तुत करेंगे।
इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सब के बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं। अगले रविवार को हमारी-आपकी सांगीतिक बैठक पुनः आयोजित होगी।

झरोखा अगले अंक का
१९६३ में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ का एक गीत है- ‘पुछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...’, जिसे मन्ना डे के स्वर में अपार लोकप्रियता मिली थी। यह गीत जिस राग पर आधारित है, अगले अंक में हम उसी राग पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही विख्यात वायलिन वादक पण्डित वी.जी. जोग के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी चर्चा करेंगे, जिनकी पुण्यतिथि ३१ जनवरी को है।


एक सवाल आपसे
यदि आप फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आँखें’ के गीत- ‘पुछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...’,का राग पहचान कर हमें उसका नाम लिख भेजेंगे तो अगले अंक में हम आपको विजेता घोषित करेंगे। राग का नाम हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर लिख भेजें। 

कृष्णमोहन मिश्र 

२६ जनवरी- आज का गाना


गाना: जहाँ डाल डाल पर

चित्रपट:सिकंदर-ए-आज़म
संगीतकार:हंसराज बहल
गीतकार:राजिंदर कृशन
गायक:मोहम्मद रफी







जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा

जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा

ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला
जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला
जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा

अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले
कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले
जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा
वो भारत देश है मेरा

जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले
जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले
प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा


बुधवार, 25 जनवरी 2012

"ऐ मेरे वतन के लोगों" - इस कालजयी देशभक्ति गीत को न गा पाने का मलाल आशा भोसले को आज भी है


कालजयी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" के साथ केवल पंडित नेहरू की यादें ही नहीं जुड़ी हुई हैं, बल्कि इस गीत के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। आज गणतन्त्र दिवस की पूर्वसंध्या पर इसी गीत से जुड़ी कहानियाँ सुजॉय चटर्जी के साथ 'एक गीत सौ कहानियाँ' की चौथी कड़ी में...


एक गीत सौ कहानियाँ # 4

देशभक्ति गीतों की बात चलती है तो कुछ गीत ऐसे हैं जो सबसे पहले याद आ जाते हैं, चाहे वो फ़िल्मी हों या ग़ैर-फ़िल्मी। लता मंगेशकर की आवाज़ में एक ऐसी ही कालजयी रचना है "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा करो क़ुर्बानी"। कवि प्रदीप के लिखे और सी. रामचन्द्र द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को जब भी सुनें, रोंगटे खड़े हुए बिना नहीं रहते, आँखें नम हुए बिना नहीं रहतीं, हमारे वीर शहीदों के आगे नतमस्तक हुए बिना हम नहीं रह पाते। इस गीत को १९६२ के भारत-चीन युद्ध के शहीदों को समर्पित किया गया था। कहते हैं कि रेज़ांग् ला के प्रथम युद्ध में १३ - कुमाऊं रेजिमेण्ट, सी-कंपनी के आख़िरी मोर्चे में परमवीर मेजर शैतान सिंह भाटी के दुस्साहस और बलिदान से प्रभावित होकर कवि प्रदीप नें इस गीत की रचना की थी। २६ जनवरी १९६३ के दिन नई दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित गणतन्त्र दिवस समारोह में गायिका लता मंगेशकर नें इस गीत को पहली बार प्रस्तुत कर मौजूद जनता को मन्त्रमुग्ध कर दिया था। गीत का ऐसा असर हुआ था कि वहाँ पर मौजूद जनता बिल्कुल शान्त, हर एक की आँखें नम, यहाँ तक कि पण्डित नेहरू गीत के समाप्त होने पर मंच में आकर अपनी आँखें पोंछते हुए लता से कहा, "बेटी, तूने मुझे रुला दिया"। उसी समारोह में इस गीत की एक प्रति (साउण्डट्रैक स्पूल) पं नेहरू को भेंट में दी गई थी। प्रसिद्ध फ़िल्म पत्रिका 'स्क्रीन' में प्रकाशित लेख में इस गीत के बारे में लिखा गया था - "The lyrics of the song not only reflected Kavi Pradeep's sentiments but his nationalistic thinking of the country at large. With singer Lata Mangeshkar and composer C Ramchandra, he brought tears to every eye including Nehru's."

सुनने में आता है कि इस गीत से जुड़े हर कलाकार - गायक-वृंद, म्युज़िशियन्स, संगीतकार, रेकॉर्डिंग् स्टुडियो, साउण्ड रेकॉर्डिस्ट - सभी ने इस गीत से मिलने वाली रॉयल्टी का एक-एक अंश 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करवा दी थी। जहाँ इस गीत के लिए गायिका लता मंगेशकर नें अपार शोहरत हासिल की, कवि प्रदीप की तरफ़ लोगों का ध्यान कम ही गया। वैसे कवि प्रदीप को इस गीत के रॉयल्टी संबंधी कई ऑफ़र मिले, पर इस सच्चे देशभक्त नें इस गीत से कभी पैसा कमाना नहीं चाहा। यह तो उनकी एक श्रद्धांजली थी इस देश के वीर सपूतों के नाम, फिर इस गीत के लिए पैसे कैसे ले सकते थे? अत: उन्होंने इस गीत से मिलने वाली पूरी रॉयल्टी 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने के लिए Saregama HMV को लिखित निर्देश दिया। पर अफ़सोस की बात कि इस कंपनी नें रॉयल्टी की इस राशि को 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में कभी जमा नहीं करवाया। बरसों बरस बाद, २५ अगस्त २००५ के दिन, बॉम्बे हाइ कोर्ट नें HMV को सख़्त निर्देश दिया १० लाख रुपये ऐरीयर के रूप में 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने का। उधर लता मंगेशकर नें आज से कुछ ही वर्ष पहले एक कॉन्सर्ट में सार्वजनिक रूप से कवि प्रदीप का इस गीत के लिए आभार प्रकट किया, और उन्होंने भी यह कबूल किया कि जिस गीत नें उन्हें अपार शोहरत दिलाई, उसके गीतकार को नज़रन्दाज़ कर दिया गया। कवि प्रदीप का सम्मान करते हुए लता जी नें उन्हें १ लाख रुपये की राशी प्रदान की। उस समय के प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपयी नें भी कवि प्रदीप को मुंबई के मलाड में आयोजित एक कार्यक्रम में सम्मानित किया।

अब आते हैं इस गीत के बनने की कहानी पर जो विवादों से घिरी रही। उन दिनों किसी मनमुटाव या व्यक्तिगत कारणों से लता मंगेशकर और सी. रामचन्द्र साथ में काम नहीं कर रहे थे। ऐसे में जब कवि प्रदीप नें "ऐ मेरे वतन..." की रचना की और सी. रामचन्द्र को सुनाया, तो अन्ना नें इस गीत का रिहर्सल आशा भोसले से करवानी शुरु कर दी। प्रदीप को इस बात का पता नहीं था। अब यहाँ से इस कहानी के दो रुख़ सुनने में आते हैं। पहली धारणा यह है कि जब कवि प्रदीप को पता चला कि अन्ना गाने का रिहर्सल आशा से करवा रहे हैं, तब उन्होंने यह साफ़ कह दिया कि वो यह गाना तभी देंगे अगर लता गायेंगी तो (यह बात लता नें साक्षात्कार में भी बताया है)। और दूसरी धारणा यह कहती है कि जब लता को पता चला कि दिल्ली में पंडित नेहरू के सामने गाये जाने वाले गीत को आशा गा रही है, तो सी. रामचन्द्र से अपनी अन-बन को भुला कर प्रदीप के ज़रिये उन्हें ख़बर भिजवाया कि इस गीत को वो गाना चाहती हैं। और क्योंकि प्रदीप भी यही चाहते थे और अन्ना भी मन ही मन लता को ही पसन्द करते थे, इस तरह से लता इस गीत से जुड़ गईं। अब इन दोनों धारणाओं को एक कर दिया जाये तो निश्कर्ष यही निकलता है कि लता के लिए "ऐ मेरे वतन..." का मार्ग खुलने लगा। क्योंकि आशा को इस गीत का ऑफ़र दिया जा चुका था और वो इसका रिहर्सल भी कर रही थीं, प्रदीप और अन्ना नें यह तय किया कि इसे लता और आशा, दोनों की युगल आवाज़ों में प्रस्तुत किया जाए। लेकिन रहस्यमय तरीक़े से आशा का पत्ता साफ़ कर दिया गया और यह गीत लता का एकल गीत बन गया। आशा को दरकिनार करने के पीछे किसका हाथ था, यह जाने बिना यहाँ टिप्पणी करना सही नहीं, पर समझदारों के लिए इसका अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं। जो भी हुआ आशा के साथ, अच्छा नहीं हुआ। यह आशा भोसले की महानता ही कहेंगे कि उन्होंने इस गीत को न गा पाने का मलाल अपने दिल में दबाये तो रखा पर कभी किसी के ख़िलाफ़ उंगली भी नहीं उठाई। पारिवारिक कारणों से वो मंगेशकर परिवार से अलग-थलग तो हो ही चुकी थीं, इस घटना के बाद आशा अपनी बड़ी बहन से और भी ज़्यादा दूर चली गईं।

"ऐ मेरे वतन के लोगों" के बनने की कहानी जितनी विवादास्पद रही, आगे चलकर भी विवाद ख़त्म नहीं हुआ। ७० के दशक में बम्बई के ब्रेबोर्ण स्टेडियम में आयोजित एक शो में लता मंगेशकर इस गीत को गाने वाली थीं। उन्हें और इस गीत की भूमिका देने के लिए मंच पर मौजूद थे दिलीप कुमार। अपनी ड्रामाई अंदाज़ में उन्होंणे इस गीत के बारे में बताना शुरु किया। हालाँकि यह गीत किसी तारूफ़ का मोहताज नहीं, फिर भी दिलीप साहब नें इस गीत के बनने की कहानी, कवि प्रदीप के बारे में, पंडित नेहरू के रोने के बारे में बताया जहाँ वो ख़ुद भी मौजूद थे १९६३ के उस जलसे में। उन्होंने इस गीत के बारे में सबकुछ बताया सिवाय इसके संगीतकार सी. रामचन्द्र के बारे में। दिलीप कुमार की परिचित कूटनीति का यह एक उदाहरण था। बैकस्टेज पर जब वो आये तो वहाँ सी. रामचन्द्र खड़े थे और उन्होंने ग़ुस्से से पूछा कि उन्होंने उनका नाम क्यों नहीं लिया? दिलीप कुमार अपनी मासूमियत बरक़रार रखते हुए कहा कि उन्हें यह मालूम ही नहीं था कि अन्ना नें इस गीत की धुन बनाई है। अन्ना नें कहा, "झूठ मत बोलो यूसुफ़! तुम्हे अच्छी तरह पता है कि मैंने इस गीत को कम्पोज़ किया है। तुम्हे ज़रूर उस औरत (लता) नें कहा होगा!" दिलीप कुमार का जवाब था, "कोई भी दिलीप कुमार को टर्म्स डिक्टेट नहीं कर सकता"। अन्ना का तुरन्त जवाब था, "वो दिन गए यूसुफ़। एक समय था जब सी. रामचन्द्र को भी टर्म्स डिक्टेट करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता था। अब दोनों को ही डिक्टेट करते हैं।"

चाहे इस गीत के साथ कितनी भी विवाद, कितने भी मनमुटाव जुड़े रहे हों, सच्चाई यही है कि यह भारत के सर्वश्रेष्ठ १० देशभक्ति गीतों में एक है, और आज भी इसे सुनते हैं तो कलेजा चीर के रख देता है।


"ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, आपको यह स्तंभ कैसा लग रहा है, ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में, और अगर किसी ख़ास गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तो हमें ज़रूर सूचित कीजिएगा। अब अनुमति दीजिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, फिर मुलाक़ात होगी अगले सप्ताह, नमस्कार!

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