Showing posts with label meera bhajan. Show all posts
Showing posts with label meera bhajan. Show all posts

Sunday, May 20, 2018

राग तोड़ी और मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 370 : RAG TODI & MULTANI





स्वरगोष्ठी – 370 में आज


दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 9 : तोड़ी थाट


विदुषी मालिनी राजुरकर से राग तोड़ी में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी मालिनी राजुरकर
उस्ताद अमीर खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से नौवाँ थाट तोड़ी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे तोड़ी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग तोड़ी में निबद्ध खयाल रचना विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही तोड़ी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग मुल्तानी के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आज बारी है थाट और राग ‘तोड़ी’ से परिचय प्राप्त करने की। श्रृंखला की अभी तक की कड़ियों में हमने उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित थाट प्रणाली को रेखांकित करने का प्रयास किया है। आज की कड़ी में हम दक्षिण भारतीय संगीत में प्रचलित प्राचीन थाट व्यवस्था पर चर्चा करेंगे। दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति के विद्वान पण्डित व्यंकटमखी ने थाटों की संख्या निश्चित करने के लिए गणित को आधार बनाया और पूर्णरूप से गणना कर थाटों की कुल संख्या 72 निर्धारित की। इनमें से उन्होने 19 व्यावहारिक थाटों का चयन किया। व्यंकटमखी की थाट संख्या को दक्षिण भारतीय संगीतज्ञों ने तो अपनाया, किन्तु उत्तर भारत के संगीत पर इसका विशेष प्रभाव नहीं हुआ। उत्तर भारतीय संगीत के विद्वान पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने रागों के वर्गीकरण के लिए 10 थाट प्रणाली को अपनाया और रागों का वर्गीकरण किया, जो आज तक प्रचलित है। थाट का उद्देश्य मात्र राग के शुद्ध और विकृत स्वरों को चिह्नित करना है। चूँकि एक थाट के गठन के लिए सप्तक के सातों स्वरों का होना आवश्यक है, अतः यह भी आवश्यक है कि थाट सम्पूर्ण हो।

आइए आज आपका परिचय ‘तोड़ी’ थाट से कराते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग॒, म॑, प, ध॒, नि अर्थात ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। इस थाट का आश्रय राग ‘तोड़ी’ ही कहलाता है। राग ‘तोड़ी’ एक सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसके आरोह में- सा, रे॒, ग॒, म॑प, ध॒, नि, सां स्वरों का तथा अवरोह में- सां, नि, ध॒, प, म॑, ग॒, रे॒, सा स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है तथा राग के गायन-वादन का समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। अब हम आपको राग तोड़ी की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन कराते हैं। द्रुत तीनताल में प्रस्तुत इस खयाल रचना के बोल हैं- ‘कान्ह करत मोसे रार ऐ री माई...’। इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, मालिनी जी के स्वरों में सुनिए राग तोड़ी की यह बन्दिश।

राग तोड़ी : ‘कान्ह करत मोसे रार...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर


तोड़ी थाट के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं, मधुवन्ती, मुल्तानी, कोकिलापंचमी, गुर्जरीतोड़ी, हेमवन्ती, रुद्रमंजरी, श्रीवन्ती आदि। राग मुल्तानी, तोड़ी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर का प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। इस राग में ऋषभ, गान्धार तथा धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। आज हम आपको राग मुल्तानी में निबद्ध एक फिल्मी गीत सुनवाते है। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के संगीतकार नौशाद ने सुविख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ से यह गीत गवाया था। इससे पूर्व वर्ष 1952 में नौशाद ने उस्ताद अमीर खाँ से फिल्म ‘बैजू बावरा’ में दो गीत गवा कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया था। उस्ताद अमीर खाँ जैसे दिग्गज गवैये नौशाद की प्रतिभा के ऐसे कायल हुए कि आगे चल कर जब भी उन्हें नौशाद ने बुलाया, अपनी सहमति और सहयोग प्रदान किया। रागदारी संगीत के प्रति नौशाद की ऐसी अगाध श्रद्धा थी कि इस विषय पर प्रायः फिल्म के निर्माता-निर्देशक के साथ उनकी मीठी नोकझोक भी हो जाती थी। एक साक्षात्कार में नौशाद ने फ़िल्मकार ए.आर. कारदार के हवाले से जिक्र किया भी था कि फिल्म में राग आधारित गीत रखने के सवाल पर कैसे उन्हें चुनौती मिली थी। उस्ताद अमीर खाँ को नौशाद साहब ने दोबारा याद किया, 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के लिए। इस फिल्म के अन्य गीतों के लिए मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार थे, किन्तु उस्ताद अमीर खाँ से उन्होने राग मुल्तानी के स्वरों में मीरा का एक पद- ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल...’ गवाया। यह राग दिन के चौथे प्रहर के परिवेश को यथार्थ रूप से अनुभूति कराता है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मुल्तानी : ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - शबाब


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 370वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 1985 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस विद्वान गायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 मई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 372वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 368वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" के एक रागाधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल - तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर - उस्ताद अमीर खाँ और साथी।

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; मुम्बई, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की नौवीं कड़ी में आपने तोड़ी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग तोड़ी में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही तोड़ी थाट के जन्य राग मुल्तानी में निबद्ध फिल्म “शबाब” का एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी अगली श्रृंखला में आपको विभिन्न रागों से रोगों के उपचार का तरीका बताया जाएगा। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग तोड़ी और मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 370 : RAG TODI & MULTANI : 20 मई, 201

Sunday, November 15, 2015

डॉ. एन. राजम् की संगीत साधना : SWARGOSHTHI – 244 : DR. N. RAJAM




स्वरगोष्ठी – 244 में आज

संगीत के शिखर पर – 5 : विदुषी एन. राजम्

डॉ. राजम् के वायलिन तंत्र बजते ही नहीं गाते भी हैं



  रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में हम तंत्रवाद्य वायलिन अर्थात बेला की विश्वविख्यात साधिका विदुषी डॉ. एन. राजम् के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे और गायकी अंग में उनके वायलिन वादन के कुछ उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे। आज के अंक में हम डॉ. राजम् द्वारा प्रस्तुत राग जोग में खयाल, राग भैरवी का दादरा और अन्त में एक मीरा भजन का रसास्वादन गायकी अंग में करेंगे।


क बेहद सुरीला गज-तंत्र वाद्य वायलिन और इस वाद्य की स्वर-साधिका डॉ. एन. राजम् के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आज आपसे चर्चा होगी। डॉ. राजम् वायलिन जैसे पाश्चात्य वाद्य पर उत्तर भारतीय संगीत पद्यति को गायकी अंग में वादन करने वाली प्रथम महिला स्वर-साधिका हैं। उनकी वायलिन पर अब तक जो कुछ भी बजाया गया है, उसका प्रारम्भ स्वयं उन्हीं से हुआ है। गायकी अंग में वायलिन-वादन की शैली उनकी विशेषता भी है और उनका अविष्कार भी। डॉ. राजम् के पिता नारायण अय्यर कर्नाटक संगीत पद्यति के सुप्रसिद्ध वायलिन वादक और गुरु थे। वायलिन की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुई। बाद में सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से उन्हें उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में शिक्षा मिली। इस प्रकार शीघ्र ही उन्हें संगीत की दोनों पद्यतियों में कुशलता प्राप्त हुई। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर अपने प्रदर्शन-कार्यक्रमों में एन. राजम् को वायलिन संगति के लिए बैठाया करते थे। संगति के दौरान उनका यही प्रयास होता था कि उनके गुरु जो क्रियाएँ कण्ठ से करते हों, उन्हें यथावत वायलिन के तंत्रों पर उतारा जाए। इस साधना के बल पर मात्र 17 वर्ष की आयु में एन. राजम् गायकी अंग में वायलिन-वादन में दक्ष हो गईं। उस दौर के संगीतविदों ने गायकी शैली में वायलिन-वादन को एक नया आविष्कार माना और इसका श्रेय एन. राजम् को दिया गया। उनके गायकी अंग के वादन में जैसी मिठास और करुणा है, उसे सुन कर ही अनुभव किया जा सकता है। उनके वादन में कोई चमत्कारिक लटके-झटके नहीं, बल्कि सादगी और तन्मयता है। सुनने वालों को ऐसा प्रतीत होता है, मानो वायलिन के तंत्र बजते नहीं बल्कि गा रहे हों। लीजिए, डॉ. एन. राजम् के वायलिन को राग जोग का गायन करते हुए, आप भी सुनें और इस राग की पारम्परिक बन्दिश- ‘साजन मोरे घर आए...’ को साथ-साथ गुनगुनाते रहें। यह रचना द्रुत लय तीनताल में निबद्ध है।

राग – जोग : द्रुत लय तीनताल में खयाल रचना : डॉ. एन. राजम्




  एन. राजम् की प्रारम्भिक संगीत शिक्षा दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत पद्यति में हुई थी। उन दिनों दक्षिण भारत में वायलिन प्रचलित हो चुका था, किन्तु उत्तर भारतीय संगीत में इस वाद्य का पदार्पण नया-नया ही हुआ था। एन. राजम् की आयु उस समय मात्र 12 वर्ष थी। अपने गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मार्गदर्शन में उन्होने वायलिन को गायकी अंग में बजाने का निश्चय किया। स्वर और लय का ज्ञान तो उन्हें पहले से ही था, गुरु जी की स्वरावली का अनुसरण करते-करते वादन में भाव, रस और माधुर्य उत्पन्न करने की कठोर साधना उन्होने की। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि गायन की सभी विधाओं की बारीकियों का गहन अध्ययन कर वायलिन पर साध लिया। उन दिनों अधिकतर वादको ने तंत्रकारी अंग में ही वायलिन को अपनाया था। परन्तु एन. राजम् का मानना था कि सारंगी की भाँति वायलिन भी गायकी अंग के निकट है। आइए अब सुनते हैं डॉ. एन. राजम् से भैरवी में निबद्ध दादरा।

राग – भैरवी : दादरा की एक पारम्परिक रचना : डॉ. एन. राजम्




पुत्री संगीता शंकर और नातिनें नन्दनी व रागिनी के साथ एन. राजम्
  विदुषी एन. राजम् के गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ग्वालियर घराने के थे, इसलिए स्वयं को इसी घराने की शिष्या मानतीं हैं। घरानॉ के सम्बन्ध में उनका मत है कि कलाकार को किसी एक ही घराने में बाँध कर नहीं रखा जा सकता। संगीत के कलाकार को हर घराने की अच्छाइयों का अनुकरण करना चाहिए। घरानों की प्राचीन परम्परा के अनुसार तीन पीढ़ियों तक यदि विधा की विशेषता कायम रहे तो प्रथम पीढ़ी के नाम से घराना स्वतः स्थापित हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आने वाले समय में राजम् जी के नाम से भी यदि एक नए घराने का नामकरण हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। डॉ. राजम् को प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता पण्डित नारायण अय्यर से मिली। उनके बड़े भाई पण्डित टी.एन. कृष्णन् कर्नाटक संगीत पद्यति के प्रतिष्ठित और शीर्षस्थ वायलिन-वादक रहे हैं। डॉ. राजम् की एक भतीजी विदुषी कला रामनाथ वर्तमान में विख्यात वायलिन-वादिका हैं। राजम् जी की सुपुत्री और शिष्या संगीता शंकर अपनी माँ की शैली में ही गायकी अंग में वादन कर रहीं हैं। यही नहीं संगीता की दो बेटियाँ अर्थात डॉ. राजम् की नातिनें- नन्दिनी और रागिनी भी अपनी माँ और नानी के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। और अब इस अंक को विराम देने से पूर्व हम आपको विदुषी डॉ. एन. राजम् द्वारा वायलिन पर प्रस्तुत मीरा का एक लोकप्रिय भजन- ‘पायो जी मैंने रामरतन धन पायो...’ सुनवाते हैं। इस प्रस्तुति में आपको राग पहाड़ी की छाया भी मिलेगी। आप वायलिन पर यह भजन सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

मीरा भजन : “पायो जी मैंने रामरतन धन पायो...” की धुन : डॉ. एन. राजम्


 



संगीत पहेली 


  ‘स्वरगोष्ठी’ के 244वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत के एक उस्ताद गायक की आवाज़ में प्रस्तुत कण्ठ-संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग में निबद्ध है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उनका नाम बताइए।

  आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 246वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


  ‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 242 की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- जत ताल (सोलह मात्रा का ठेका), और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात 


  मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह पाँचवाँ अंक था। इस अंक में हमने सुविख्यात विदुषी एन. राजम् के व्यक्तित्व और उनके वायलिन वादन पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, September 6, 2015

राग भीमपलासी और पीलू : SWARGOSHTHI – 234 : RAG BHIMPALASI & PILU



स्वरगोष्ठी – 234 में आज 

रागों का समय प्रबन्धन – 3 : दिन के तीसरे प्रहर के राग 

राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।  उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के तृतीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के राग पीलू की एक ठुमरी सुविख्यात गायिका गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया राग भीमपलासी पर आधारित, फिल्म ‘बावरे नैन’ का एक गीत गायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। 


भारतीय संगीत के प्राचीन विद्वानों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले रस व भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। उन्होने राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। पिछले अंक में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वरसिद्धान्त’ पर चर्चा की थी, जिसके अन्तर्गत राग के मध्यम स्वर से रागों के पूर्वार्द्ध या उत्तरार्द्ध समय का निर्धारण किया गया है। आज के अंक में हम वादी और संवादी स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण के सिद्धान्त पर चर्चा कर रहे हैं। जिस प्रकार चौबीस घण्टे की अवधि को दो भागों, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, में बाँट कर रागों के समय निर्धारण कर सकते हैं, उसी प्रकार सप्तक के भी दो भाग, उत्तरांग और पूर्वांग, में विभाजित कर रागों का समय निर्धारित किया जाता है। संख्या की दृष्टि से सप्तक के प्रथम चार स्वर, अर्थात षडज, ऋषभ, गान्धार और मध्यम पूर्वांग तथा पंचम, धैवत, निषाद और अगले सप्तक का षडज मिल कर उत्तरांग कहलाते हैं। शास्त्रकारों ने यह नियम बनाया कि जिन रागों का वादी स्वर पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर है उस राग को दिन के पूर्वार्द्ध में अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच तथा जिन रागों का वादी स्वर उत्तरांग के स्वरों में से कोई एक स्वर हो तो उसे दिन के उत्तरार्द्ध में अर्थात मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जा सकता है। इस नियम की रचना से कुछ राग अपवाद रह गए। उदाहरण के रूप में राग भीमपलासी का उल्लेख किया जा सकता है। इस राग में वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। उपरोक्त नियम से राग का वादी और संवादी सप्तक के पूर्वांग में आ जाता है। राग का एक प्रमुख नियम है कि अगर वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में होगा तो संवादी स्वर उत्तरांग में और यदि वादी स्वर उत्तरांग में होगा तो संवादी स्वर पूर्वांग में होना चाहिए। इस दृष्टि से राग भीमपलासी और भैरव उपरोक्त नियम के प्रतिकूल हैं। इस नियम के अनुसार भीमपलासी के समान भैरवी भी पूर्वांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु भैरवी प्रातःकालीन राग है। इन अपवादों के चलते उपरोक्त नियम में संशोधन किया गया। संशोधन के अनुसार सप्तक के दोनों अंगों का दायरा बढ़ा दिया गया, अर्थात सप्तक के पूर्वांग में षडज से पंचम तक के स्वर और उत्तरांग में मध्यम से तार सप्तक के षडज तक के स्वर हो सकते हैं। इस नियम के अनुसार राग का वादी स्वर यदि सप्तक के पूर्वांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के पूर्व अंग में होगा और यदि वादी स्वर उत्तरांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के ऊतर अंग में किया जाएगा।

आज हम आपसे दिन के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न 12 से अपराह्न 3 बजे के बीच का समय। इस प्रहर के रागों का का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग के स्वर, अर्थात षडज से पंचम स्वर में से कोई एक स्वर होता है। इस प्रहर का एक बेहद लोकप्रिय राग पीलू है। राग पीलू में उपशास्त्रीय रचनाएँ खूब निखरती हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक ठुमरी विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में सुनवाते हैं। पीलू काफी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप, शुद्ध और कोमल प्रयोग किये जाते हैं। अब आप राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’ सुनिए, जिसे विदुषी गिरिजा देवी ने गाया है।


राग पीलू ठुमरी : “पपीहरा पी की बोल न बोल...” : विदुषी गिरिजा देवी




राग पीलू के अलावा दिन के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- धनाश्री, पटमंजरी, प्रदीपकी या पटदीपकी, भीमपलासी, मधुवन्ती, हंसकंकणी, हंसमंजरी आदि। अब हम आपको दिन के तीसरे प्रहर के एक और राग, भीमपलासी का रसास्वादन कराते हैं। राग भीमपलासी भी काफी थाट का राग है। इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। राग में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग होता है, शेष सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आइए, भक्त कवयित्री मीरा का एक पद अब राग भीमपलासी पर आधारित सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इस भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। श्रृंखला के पिछले अंक में आपने यही पद राग तोड़ी में सुना था। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण राग भीमपलासी के स्वरों में सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म – नौबहार





संगीत पहेली - 234


‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 60 के दशक की फिल्म का राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।

1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश मे गायक और गायिका के युगल स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 12 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 236वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपसे फिल्म ‘मीरा’ से मीराबाई के एक पद का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका वाणी जयराम। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

‘स्वरगोष्ठी’ की इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (पहेली क्रमांक 221 से 230 तक) के विजेताओं के प्राप्तांकों की गणना के जा चुकी है। प्राप्तांक के अनुसार प्रथम और द्वितीय स्थान पर दो-दो प्रतिभागी हैं। 20-20 अंक के साथ पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। दूसरे स्थान पर वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी हैं। इन दोनों प्रतिभागियों को 18-18 अंक प्राप्त हुए हैं। तीसरे स्थान पर 4 अंक के साथ रायपुर, छत्तीसगढ़ की राजश्री श्रीवास्तव रहीं। इन सभी पाँच प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह तीसरा अंक था। अगले अंक में हम दिन के चौथे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, December 22, 2013

मीरा का एक और पद : विविध धुनों में


स्वरगोष्ठी – 147 में आज


रागों में भक्तिरस – 15


‘श्याम मने चाकर राखो जी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पन्द्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री के एक पद- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम मीराबाई के साहित्य और संगीत पर चर्चा जारी रखते हुए एक और बेहद चर्चित पद- ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ सुनवाएँगे। इस भजन को विख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी, वाणी जयराम, लता मंगेशकर और चौथे दशक की एक विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। इन चारो गायिकाओं ने मीरा का एक ही पद अलग-अलग धुनों में गाया है। आप इस भक्तिगीत के चारो संस्करण सुनिए और स्वरों के परिवर्तन से गीत के भाव में होने वाले आंशिक बदलाव का प्रत्यक्ष अनुभव कीजिए। 


तिहासकारों के अनुसार भक्त कवयित्री मीराबाई का जन्म विक्रमी संवत 1561 अर्थात 1504 ई. के श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि को हुआ था। अजमेर के लेखक श्री ओमप्रकाश ने अपनी पुस्तक ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ की भूमिका में मीरा की भक्ति रचनाओं का विवेचन करते हुए लिखा है- “सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों में मुगल आक्रमणकारियों से भयाक्रान्त समाज को मीरा ने भक्ति का सम्बल दिया। पूरे भारतवर्ष के कोने-कोने में भक्ति आन्दोलन चल रहे थे। मीरा ने भी उसी संस्कृति के भक्ति-प्रवाह को परिपुष्ट किया। ‘नारी भोग्या नहीं, माँ है’ की जीवन-दृष्टि देकर नारी को नव प्रतिष्ठा दी। समाज की सुव्यवस्था हेतु कुरीतियों का उन्मूलन कर, चिर विद्रोहिणी की भूमिका निभाते हुए समाज-सुधार का कर्तव्य निभाया।”

आज के अंक में हमने मीरा का वह पद चुना है जिसमें वह अपने आराध्य श्रीकृष्ण से आग्रह कर रही हैं कि ‘हे श्याम मुझे अपना चाकर बना लो’। सबसे पहले आप यह भक्तिगीत सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनेगे। मीरा के व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन दर्शन पर 1947 में चन्द्रप्रभा मूवीटोन द्वारा निर्मित फिल्म ‘मीरा’ के गीतों में उन्होने स्वयं अपना स्वर दिया था। यह फिल्म पहले तमिल में और फिर हिन्दी में भी बनी थी। विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी ने इस फिल्म में न केवल गीत गाये, बल्कि मीरा की भूमिका में अभिनय भी किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक एस.वी. वेंकटरमन, जी. रामनाथन् और नरेश भट्टाचार्य थे। फिल्म में मीरा का यह पद एक अप्रचलित राग बिहारी के स्वरों में निबद्ध है। मीरा-भजन के इस संस्करण के बाद आप इसका दूसरा संस्करण भी सुनेगे। भजन- ‘मने चाकर राखो जी...’ का यह संस्करण चौथे दशक में सक्रिय किन्तु वर्तमान में विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। गायिका सती देवी चर्चित पार्श्वगायक किशोर कुमार की पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता (गांगुली) की माँ थीं। चौथे और पाँचवें दशक में गाये गए इस मीरा-भजन के इन दोनों संस्करणों का आप रसास्वादन कीजिए।


मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : एम.एस. शुभलक्ष्मी : फिल्म मीरा (1947)




मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : सती देवी : गैर फिल्मी भजन



भक्त कवयित्री मीरा के पद ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ पर हमारी यह चर्चा जारी है। मीरा के जीवन दर्शन पर एक और फिल्म ‘मीरा’ 1979 में गीतकार गुलजार के निर्देशन में बनी थी। इस फिल्म में भी मीरा के अन्य पदों के साथ-साथ ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ भी शामिल था, जिसे वाणी जयराम ने अपना स्वर दिया था। फिल्म के संगीत निर्देशक विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर थे। उन्होने इस भजन को राग भैरवी के स्वर दिये। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले कई अंकों में हम राग भैरवी की चर्चा करते रहे हैं। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। मीरा का यह पद पहले आप राग भैरवी के स्वरो में सुनेगे और फिर उसके बाद यही पद राग बागेश्री के स्वरो पर आधारित प्रस्तुत करेंगे। यह संस्करण हमने 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘तूफान और दीया’ से लिया है। भजन के स्थायी की पंक्ति में श्याम के स्थान पर गिरधारी शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे और इस भजन को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। गीत में राग बागेश्री की स्पष्ट झलक मिलती है। बेहद लोकप्रिय राग है, बागेश्री। कुछ लोग इसे बागेश्वरी नाम से भी सम्बोधित करते हैं, किन्तु वरिष्ठ गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के अनुसार इस राग का सही नाम बागेश्री ही होना चाहिए। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग कर्नाटक संगीत के नटकुरंजी राग से काफी मिलता-जुलता है। राग बागेश्री में पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग होता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। कुछ विद्वान आरोह में पंचम का प्रयोग न करके औड़व-सम्पूर्ण रूप में इस राग को गाते-बजाते हैं। इसमें गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राधा का सर्वप्रिय राग माना जाता है। आप मीरा के पद- ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ को पहले राग भैरवी और फिर राग बागेश्री के स्वरों में सुनिए और मुझे श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : वाणी जयराम : फिल्म मीरा (1979)




राग बागेश्री : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म तूफान और दीया




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 149वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रविशंकर द्वारा स्वरबद्ध और वाणी जयराम की आवाज़ में प्रस्तुत मीरा के एक भजन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सात मात्रा का रूपक ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। क्षिति जी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर भक्त कवयित्री मीरा के एक और पद पर चर्चा की। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि महात्मा कबीर की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 15, 2013

विविध रागों में निबद्ध मीरा का एक भक्तिपद


स्वरगोष्ठी – 146 में आज

रागों में भक्तिरस – 14

‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम कुछ बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। आज हम आपको भक्त कवयित्री मीराबाई का एक भजन प्रस्तुत करेंगे जिसे अलग-अलग गायिकाओं के स्वरों में और विभिन्न रागों में पिरोया गया है। हम आपको मीरा का यह कृष्णभक्ति से परिपूर्ण पद क्रमशः गायिका वाणी जयराम, लता मंगेशकर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ों में सुनवाएँगे। एक ही भजन को चार अलग-अलग आवाज़ों और धुनों में सुन कर आपको भजन की भावभिव्यक्ति और रस की ग्राह्यता में अन्तर करने का अवसर भी मिलेगा।   



भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा रही है। इस संगीत परम्परा में जड़ता नहीं है। यह तो गोमुख से निरन्तर निकलने वाली वह पवित्र धारा है जिसके मार्ग में अनेक धाराएँ मिलती है और इस मुख्य धारा में विलीन हो जाती हैं। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। परन्तु भक्तिरस की धारा जो वैदिक युग में समाहित हुई, वह अविच्छिन्न रूप से आज भी जारी है। आज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। 15वीं और 16वीं शताब्दी में संगीत के विकास में भक्त कवियों का भरपूर योगदान था। इस काल में सूरदास, मीराबाई, गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, पुण्डरीक विट्ठल आदि ऐसे भक्तकवि हुए जिन्होने भक्तिकाल में साहित्य के साथ-साथ संगीत को भी प्रतिष्ठित किया। इनका प्रभाव आज भी साहित्य और संगीत के क्षेत्र में कायम है। इनमें से आज हम भक्त कवयित्री मीराबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। मीरा का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्ति धारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमे आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’। इस पद के चार संस्करण हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले प्रस्तुत है, गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग तोड़ी के स्वरों का चयन किया था। राग तोड़ी की चर्चा से पहले आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना रूपक ताल में निबद्ध है।


राग तोड़ी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : वाणी जयराम ; फिल्म मीरा 



अभी आपने मीरा के इस पद की रसानुभूति राग तोड़ी के स्वरों में किया। अब थोड़ी चर्चा राग तोड़ी के विषय में कर ली जाए। राग तोड़ी इसी नाम के थाट तोड़ी से सम्बन्धित माना जाता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके साथ मध्यम स्वर तीव्र और निषाद स्वर शुद्ध प्रयोग होता है। इसके आरोह और अवरोह, दोनों में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार है। राग तोड़ी के गायन-वादन का सबसे उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। करुण और भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए यह उपयुक्त राग है।
आइए, मीरा का यही पद अब एक भिन्न रूप में सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इसी भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया था। राग भीमपलासी काफी थाट से सम्बन्धित है। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण भी सुनिए।


राग भीमपलासी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म नौबहार



मीरा के इसी पद का तीसरा संस्करण 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘जोगन’ में प्रयोग किया गया था। फिल्म में इस भक्तिपद का उपयोग काफी द्रुत लय में कीर्तन शैली में किया गया है। फिल्म के मुख्य कलाकार दिलीप कुमार, नरगिस, प्रतिमा देवी, पूर्णिमा, तबस्सुम आदि थे। अभिनेता राजेन्द्र कुमार की यह पहली फिल्म थी। भजन के इस संस्करण को सुनते समय कई रागों की झलक मिलती है। स्थायी में राग सिन्दूरा तो अन्तरे में राग झिंझोटी के दर्शन भी होते हैं। सामान्य रूप से इस गीत को राग मिश्र झिंझोटी पर आधारित कहा जा सकता है। फिल्म ‘जोगन’ में शामिल मीरा के इस पद को बुलो सी. रानी ने संगीतबद्ध किया था और गायिका गीता दत्त ने स्वर दिया था। इस प्रस्तुति के बाद इसी पद का चौथा स्वरूप भी आप सुनेगे। यह एक गैर फिल्मी संस्करण है, जिसे गायिका सुमन कल्याणपुर ने स्वर दिया है। मीरा के पारम्परिक अन्तरों के साथ इसे कृपशंकर तिवारी ने स्वरबद्ध किया है। इस प्रस्तुति में राग जोग की स्पष्ट झलक मिलती है। भारतीय संगीत का राग जोग भक्तिरस के साथ वैराग्य भाव का सृजन भी करता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग नट इसके समतुल्य राग होता है। सम्पूर्ण जाति का यह राग पूर्वांग प्रधान होता है। आरोह में केवल शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध और कोमल, दोनों गान्धार का प्रयोग किया जाता है। राग जोग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय माना जाता है। सुमन कल्याणपुर की इस प्रस्तुति में आपको मीरा के इसी पद में एक अन्य भाव का सृजन भी परिलक्षित होगा। आप मीरा के एक ही पद के इन संस्करणों की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र झिंझोटी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : गीता दत्त : फिल्म जोगन




राग जोग : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : सुमन कल्याणपुर : गैर फिल्मी भजन





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना के स्वरों को ध्यान से सुनिए और हमे गायिका का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 144वीं कड़ी में हमने आपको विदुषी कला रामनाथ के वायलिन वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वायलिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी के साथ-साथ हमारे एक नए पाठक/श्रोता चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको राग तोड़ी, भीमपलासी, मिश्र झिंझोटी और जोग पर आधारित मीराबाई के एक पद का रसास्वादन कराया। आगामी अंक में आप मीरा के ही एक अन्य पद की अलग-अलग स्वरों में की गई प्रस्तुति का रसास्वादन कर सकेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की पन्द्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ