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Thursday, February 18, 2010

मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार...गुजरे ज़माने के एक मस्त मस्त गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 349/2010/49

साल १९४८ की शुरुआत भी अच्छी नहीं रही। ३० जनवरी १९४८ की सुबह महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे एक बार फिर से छिड़ गए और देश की अवस्था और भी नाज़ुक हो गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजली स्वरूप गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने उन पर एक गीत लिखा जिसे हुस्नलाल भगतराम के संगीत में मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया। "सुनो सुनो ऐ दुनियावालों बापु की यह अमर कहानी" एक बेहद लोकप्रिय गीत साबित हुआ। ब्रिटिश राज के समाप्त हो जाने के बाद देश भक्ति फ़िल्मों के निर्माण पर से सारे नियंत्रण हट गए। ऐसे में फ़िल्मिस्तान लेकर आए 'शहीद', जो हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति फ़िल्मों में गिनी जाती है। जहाँ एक तरफ़ दिलीप कुमार की अदाकारी, वहीं दूसरी तरफ़ मास्टर ग़ुलाम हैदर के संगीत में "वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हों" गीत ने तो पूरे देश को जैसे देश प्रेम के जज़्बे से सम्मोहित कर लिया। उधर हैदर साहब ने ही फ़िल्म 'मजबूर' में लता को अपना पहला हिट गीत दिया "दिल मेरा तोड़ा"। संगीत की दृष्टि से १९४८ की कुछ प्रमुख फ़िल्मों के नाम हैं 'अनोखी अदा', 'मेला', 'आग़', 'अनोखा प्यार', 'ज़िद्दी', 'प्यार की जीत' वगेरह। एक तरफ़ सुरैय्या, शमशाद बेग़म, जी. एम. दुर्रनी, ज़ोहराबाई, अमीरबाई जैसे गायक चमक रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ लता मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, गीता रॊय, जैसे गायक अपने क़दम मज़बूत करने के प्रयास में जुटे हुए थे। दोस्तों, हमने उपर जो फ़िल्मों की फेहरिस्त दी है, या जिन फ़िल्मों का ज़िक्र किया है, आज का गीत उनमें से किसी भी फ़िल्म का नहीं है। बल्कि आज हम लेकर आए हैं एक ऐसा गीत जिसमें एक बेहद कमचर्चित गायिका की आवाज़ है। लेकिन साथ में रफ़ी साहब भी हैं। अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि फ़िल्म 'नदिया के पार' का यह गीत है "मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार"। ललिता देओलकर और रफ़ी साहब की आवाज़ें, सी. रामचन्द्र का संगीत और गीतकार बी. ए. मोती के बोल। फ़िल्म 'नदिया के पार' के मुख्य कलाकार थे दिलीप कुमार और कामिनी कौशल (इन दोनों ने फ़िल्म 'शहीद' में भी साथ साथ काम किया था)। जिन्हे मालूम नहीं है, उनके लिए हम यहाँ बता दें कि आगे चल कर ललिता देओलकर संगीतकार सुधीर फड़के की धर्मपत्नी बनीं थीं।

दोस्तों, आज जब सी. रामचन्द्र और ललिता देओलकर की बातें एक साथ हो रही हैं, इसलिए मैंने एक ऐसा इंटरव्यू खोज निकाला है जिसमें प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रिकार्ड कलेक्टर डॊ. प्रकाश जोशी बता रहे हैं सी. रामचन्द्र से संबंधित एक क़िस्से के बारे में जिसे उन्हे बताया था ललिता जी ने। यह इंटरव्यू विविध भारती पर स्वर्णजयंती शृंखला 'जुबिली झंकार' के अंतरगत ३ जनवरी २००८ को प्रसारित किया गया था। डॊ जोशी ने बताया: "मुझे अभी भी याद है जब सुधीर फड़के और ललिता फड़के, ललिता देओलकर को हमारे यहाँ फ़ेलिसिटेट किया था, जिनका सत्कार किया था, तो उन्होने सी. रामचन्द्र जी के बारे में बहुत सी बातें बताई। जैसा 'नदिया के पार' करके एक फ़िल्म थी, तो उस ज़माने में रिकार्डिंग् जब होता था, तो वो कहती हैं कि रामचन्द्र जी को नोटेशंस बहुत अच्छा याद रहता था, और 'he was a quick music director', उनके जैसा 'fast music director' और कोई नहीं था। और वो जहाँ जहाँ जाते थे, मेले में अथवा कोई प्रोग्राम में, अच्छी कोई लोक धुन सुनी या अच्छा कोई टुक़आ मिला तो अपनी डयरी में नोटेशन तुरंत लिख के रखते थे। और एक रिकार्डिंग् था जब, बता रहीं थीं ललिता जी, कि वो बहुत अपसेट थे, वह रिकार्डिंग् जैसे तैसे पूरा किया, लेकिन गाना सुनने के बाद वो बिल्कुल गुमसुम बैठे रहे। तो ललिता जी रिकार्डिंग् के बाद गईं उनके पास कि 'अन्ना, हुआ क्या, आज इतना अपसेट क्यों हैं, तबीयत तो ठीक है ना?' ये सब उन्होने पूछा तो बेचारे रोने लगे और बताया कि आज किसी ने मेरी जेब काट दिया। बोले कि कितने भी नोट मेरे जाते, १०००, २०००, ५०००, मुझे कोई ग़म नहीं था, लेकिन मेरी नोटेशन वाली नोटबुक गई उसमें।" दोस्तों, इस तरह की कितनी ही नायाब और अनमोल जानकारियाँ विविध भारती के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिए इन जानकारियों को हम इंटरनेट से जुड़े लोगों तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास हम कर रहे हैं। आशा है आप इनसे लाभांवित हो रहे होंगे। आइए लोक रंग में रंगा हुआ यह गीत सुना जाए और सलाम करें १९४८ के उस सुरीले साल को।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

रुत मिलन की आई,
दिन चमकीले हुए,
धुप चमके खिल खिलाकर,
तेरा साथ पाकर महकी बहार...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. इस गीत के दो संस्करण थे, दोनों में गायक एक हैं उनका नाम बताएं -सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. इस युगल गीत के एक संस्करण में सुरय्या की आवाज़ है, दूसरे में किस गायिका की आवाज़ है बताएं - २ अंक.
4. कौन है इस गीत के संगीतकार - सही जवाब के मिलेंगें १ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ३ अंक और आपके खाते में सुरक्षित, हैरानी है कि आपने गायिका का नाम दे दिया बावजूद इसके अन्य धुरंधर सही गीत नहीं खोज पाए.
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 24, 2009

अब कोई जी के क्या करे जब कोई आसरा नहीं...दर्द में डूबी लता की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 212

"कुछ लोगों के बारे में कहा जाता है कि फ़लाना व्यक्ति इतनी भाग्यशाली है कि मिट्टी को भी हाथ लगाए तो वह सोना बन जाती है। कुमारी लता मंगेशकर के लिए यह बात शत प्रतिशत सही बैठती है। कितनी ही नगण्य संगीत रचना क्यों न हो, लता जी की आवाज़ उसे ऊँचा कर देती है।" दोस्तों, ये अल्फ़ाज़ थे गुज़रे दौर के बहुत ही प्रतिभाशाली और सुरीले संगीतकार एस. एन त्रिपाठी साहब के। 'मेरी आवाज़ ही पहचान है' शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का हम हार्दिक स्वागत करते हैं। दोस्तों, अगर मदन मोहन और लता जी के साथ की बात करें तो आम धारणा यही है कि मदन साहब ने लता जी को पहली बार सन् १९५० की फ़िल्म 'अदा' में गवाया था और तभी से उनकी जोड़ी जमी। जी हाँ यह बात सच ज़रूर है, लेकिन क्या आपको पता है कि सन् १९४८ में लता जी और मदन मोहन ने साथ साथ एक युगल गीत रिकार्ड करवाया था? चलिए आप को ज़रा तफ़सील से आज बताया जाए। हुआ युं कि मास्टर विनायक ने लता को काम दिलाने के लिए संगीतकार ग़ुलाम हैदर साहब के पास ले गए। हैदर साहब लता की आवाज़ और गायकी के अंदाज़ से इतने प्रभावित हुए कि वो उसे अपनी अगली फ़िल्म 'शहीद' में गवाने की ख़ातिर फ़िल्मिस्तान के एस. मुखर्जी के पास ले गए। लेकिन मुखर्जी साहब ने यह कह कर लता को रीजेक्ट कर दिया कि उसकी आवाज़ बहुत पतली है उस ज़माने की वज़नदार गायिकाओं के सामने। उसी वक़्त सब के सामने मास्टर ग़ुलाम हैदर ने यह घोषणा की थी कि एक दिन यही पतली आवाज़ इस इंडस्ट्री पर राज करेगी। उनकी यह भविष्यवाणी पत्थर की लक़ीर बन कर रह गई। ख़ैर, हैदर साहब लता को फ़िल्म 'शहीद' में तो नहीं गवा सके, और 'शहीद' के गाने चले गए सुरिंदर कौर, ललिता देयोलकर और गीता राय के खाते में। लेकिन हैदर साहब ने इस फ़िल्म के लिए लता और मदन मोहन की आवाज़ों में एक युगल गीत रिकार्ड किया जो कि भाई बहन के रिश्ते पर आधारित था। एस. मुखर्जी ने इस गीत को फ़िल्म में रखने से इंकार कर दिया और इसलिए फ़िल्म के ग्रामोफ़ोन रिकार्ड पर भी यह गीत जारी नहीं हुआ।

चाहते हुए भी ग़ुलाम हैदर 'शहीद' में लता को नहीं गवा पाए, लेकिन उन्हे बहुत ज़्यादा इंतज़ार भी नहीं करना पड़ा। उसी साल, यानी कि १९४८ में बौम्बे टाकीज़ ने बनाई फ़िल्म 'मजबूर'। और इसमें बात बन गई। ग़ुलाम हैदर के संगीत में लता के गाए इस फ़िल्म के गानें नज़रंदाज़ नहीं हुए, और लता को मिला अपना पहला लोकप्रिय गीत गाने का मौका। याद है ना आपको इस फ़िल्म का "दिल मेरा तोड़ा, हाए कहीं का न छोड़ा तेरे प्यार ने"! हिंदू-मुसलिम प्रेम कहानी पर आधारित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे श्याम और मुनव्वर सुल्ताना। नई नई आज़ादी का जश्न मनाते हुए इस फ़िल्म में लता और मुकेश ने गाए "अब डरने की बात नहीं अंग्रेज़ी छोरा चला गया"। यह गीत भी पसंद की गई। लेकिन दोस्तों, क्योंकि यह शृंखला है लता जी के कुछ बेहद दुर्लभ और भूले बिसरे गीतों को सुनने का, इसलिए हम आज इस 'मजबूर' फ़िल्म से चुन लाए हैं एक ऐसा गीत जिसे बहुत कम सुना गया और आज तो बिल्कुल नहीं सुनाई देता है कहीं से भी। यह गीत है "अब कोई जी के क्या करे जब कोई आसरा नहीं, दिल में तुम्हारी याद है और कोई इल्तिजा नहीं"। गीतकार नज़ीम पानीपती ने इस गीत को लिखा था। इससे पहले की आप यह गीत सुनें, क्यों ना अमीन सायानी द्वारा लता जी के लिए उस इंटरव्यू का एक अंश पढ़ लें जिसमें लता जी ने मास्टर ग़ुलाम हैदर से उनकी पहली मुलाक़ात का ज़िक्र किया था। "मैं १९४५ में बम्बई आयी, मैं नाना चौक में, एक जगह है जहाँ हम लोग रहने लगे। हमारी कंपनी में एक कैमरामैन थे, वो मेरे पास आए, कहने लगे कि एक म्युज़िक डिरेक्टर हैं जिन्हे नई सिंगर की ज़रूरत है। तो तुम अगर गाना चाहो तो चलो। हरिशचंद्र बाली उनका नाम था। उनको मैने गाना सुनाया तो उनको बहुत अच्छा लगा। जब उनके गाने मैं रिकार्ड कर रही थी तब एक एक्स्ट्रा सप्लायर होते हैं ना हमारी फ़िल्मों में, वो एक आया, उसने मुझे आ के कहा कि कल तुम फ़िल्मिस्तान में आना, मास्टर ग़ुलाम हैदर आए हैं, उन्होने तुमको बुलाया है। जब मै मास्टर जी को मिलने गई तो उन्होने कहा कि तुम गाना सुनाओ। मैने एक गाना उनका सुनाया, उनकी ही पिक्चर का का कोई गाना। ग़ुलाम हैदर से मैने एक बात सीखी थी कि बोल बिल्कुल साफ़ होनी चाहिए और दूसरी बात यह कि जहाँ पर 'बीट' आता है, थोड़ा सा ज़ोर देना ताकी गाना एक दम उठे।" तो दोस्तों आज की इस कड़ी में लता जी के साथ साथ मास्टर ग़ुलाम हैदर, मदन मोहन, एस. एन. त्रिपाठी, और थोड़ी बहुत हरिशचंद्र बाली की भी बातें हो गईं, तो चलिए अब इस दुर्लभ गीत को सुना जाए, जिसे हमें उपलब्ध करवाया नागपुर के अजय देशपाण्डे जी ने, जिनके हम बेहद आभारी हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ३ अंकों की बढ़त पाने के लिए बूझिये लता का एक और दुर्लभ गीत.
२. गीतकार हैं मुल्कराज भाकरी.
३. हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में बने इस गीत को "चुप चुप खड़े हो" वाले अंदाज़ में बुना गया है.

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी वाह एक दम सही जवाब ...३ अंक जुड़े आपके खाते में, पराग जी आपने जिस गीत की याद दिलाई वो भी गजब का है

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, September 22, 2009

ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं....."बख्शी" साहब और "अनवर" की अनोखी जुगलबंदी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४७

मूमन तीन या चार कड़ियों से हमारी प्रश्न-पहेली का हाल एक-सा है। तीन प्रतिभागी (नाम तो सभी जानते हैं) अपने जवाबों के साथ इस पहेली का हिस्सा बनते हैं, उनमें से हर बार "सीमा" जी प्रथम आती हैं और बाकी दो स्थानों के लिए शामिख जी और शरद जी में होड़ लगी होती है। भाईयों बस दूसरे या तीसरे स्थान के लिए हीं होड़ क्यों है, पहले पर भी तो नज़र गड़ाईये। इस तरह तो बड़े हीं आराम से सीमा जी न जाने कितने मतों (यहाँ अंकों) के साथ विजयी हो जाएँगी और आपको बस दूसरे स्थान से हीं संतोष करना होगा। अभी भी ४ कड़ियाँ बाकी हैं (आज को जोड़कर),इसलिए पूरी ताकत लगा दीजिए। इस उम्मीद के साथ कि आज की पहेली में काँटे की टक्कर देखने को मिलेगी, हम पिछली कड़ी के अंकों का खुलासा करते हैं: सीमा जी: ४ अंक, शामिख जी: २ अंक और शरद जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की, तो कमर कस लीजिए। ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) एक शायर जिसने अपने एक मित्र के लिए कहा था "आज तेरी एक नज़्म पढी"। जवाब में उस मित्र ने भी उस शायर से अपना पहचान जन्मों का बताया और कहा "कहीं पहले मिले हैं हम"। शायर के साथ-साथ उसके मित्र का भी नाम बताएँ।
२) एक गायिका जिसके साथ ८ जुलाई १९९० को कुछ ऐसा हुआ कि उसने गायकी से तौबा कर ली। उस गायिका का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि हमने उसकी जो गज़ल सुनवाई थी(साथ में एक और गायक थे), उसे किसने लिखा था?


आज हम जिस गज़ल को लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं, उस गज़ल के गायक को पहचानने में कई बार लोग गलती कर जाते हैं। ज्यादातर लोगों का यह मानना है कि इस गज़ल को मोहम्मद रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ से सजाया है और लोगों का यह मानना इसलिए भी जायज है क्योंकि एक तो आई०एम०डी०बी० पर उन्हीं का नाम दर्ज है और फिर इस गज़ल के गायक की आवाज़ मोहम्म्द रफ़ी साहब से हुबहू नहीं भी तो कमोबेश तो जरूर मिलती है। वैसे बता दें कि यह गज़ल जिस फ़िल्म (हाँ यह गैर-फ़िल्मी रचना नहीं है, लेकिन चूँकि यह गज़ल इतनी खुबसूरत है कि हमें इसे अपनी महफ़िल में शामिल करने का फ़ैसला करना पड़ा) से ली गई है वह रीलिज़ हुई थी १९८४ में और रफ़ी साहब १९८० में सुपूर्द-ए-खाक हो गए थे, इसलिए इस गज़ल के साथ उनका नाम जोड़ना इस तरह भी बेमानी साबित होता है। तो चलिए, हम इतना तो जान गए कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं गाया तो फिर कौन है इसका असली गायक? आप लोगों ने फिल्म "नसीब" का "ज़िंदगी इम्तिहान लेती है" या फिर "अर्पण" का "मोहब्बत अब तिज़ारत बन गई है" तो ज़रूर हीं सुना होगा...तो इस गज़ल को भी उन्होंने हीं गाया है जिन्होने उन गीतों में अपनी आवाज़ की जान डाली थी यानि कि अनवर (पूरा नाम: अनवर हुसैन)। "मेरे ख्यालों की रहगुजर से" - इस गज़ल को लिखा है हिन्दी फिल्मी गीतों के बेताज़ बादशाह "आनंद बख्शी" ने तो संगीत से सजाया है उस दौर की जानी मानी संगीतकार जोड़ी "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" ने। एल०-पी० के बारे में "ओल्ड इज गोल्ड" पर तो बातें होती हीं रहती हैं, इसलिए उनके बारे में हम यहाँ कुछ भी नया नहीं कह पाएँगे। बक्शी साहब के बारे में हम पिछली दो कड़ियों में बहुत कुछ कह चुके हैं। हमें मालूम है कि उतना पर्याप्त नहीं है,लेकिन चूँकि अनवर हमारे लिए नए हैं, इसलिए आज हम इन्हें मौका दे रहे हैं। अनवर का जन्म १९४९ में मुंबई में हुआ था। उनके पिता जी संगीत निर्देशक "गुलाम हैदर" के सहायक हुआ करते थे। अनवर बहुत सारे कंसर्ट्स में गाया करते थे। ऐसे हीं एक कंसर्ट में जनाब "कमल राजस्थानी" ने उन्हें सुना और उन्हें फिल्म "मेरे ग़रीब नवाज़" के लिए "कसमें हम अपनी जान की" गाने का अवसर दिया। कहते हैं कि इस गाने को सुनकर रफ़ी साहब ने कहा था कि "मेरे बाद मेरी जगह लेने वाला आ गया है"। अनवर ने इसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता, हीर-राँझा, विधाता, प्रेम-रोग, चमेली की शादी जैसी फ़िल्मों के लिए गाने गाए। यह सच है कि अनवर के नाम पर बहुत सारे सफ़ल गाने दर्ज हैं लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि रफ़ी साहब की बात सच न हो सकी।

कहा जाता है कि जनता हवलदार और अर्पण के गीतों से मिली अपार लोकप्रियता ने उन्हें न केवल घमंडी बना दिया था, बल्कि वे नशे के आदी भी हो गए थे, इसलिए म्यूजिक डायरेक्टरों ने उनसे किनारा करना शुरू कर दिया। हालांकि अनवर इन आरोपों को सिरे से नकारते हैं। इस बारे में वे कहते हैं(सौजन्य: जागरण): न तो कामयाबी ने मुझे मगरूर बनाया, न ही मैं नशे का आदी हुआ! इसे मेरी बदकिस्मती कह सकते हैं कि तमाम सुरीले गीत गाने के बावजूद प्लेबैक में मेरा करियर बहुत लंबा नहीं खिंच सका! जहां तक मेरे घमंडी और शराबी होने की बात है, तो इसके लिए मैं एक अखबार नवीस को जिम्मेदार ठहराता हूँ। हुआ ये कि एक बार एक मित्र ने हमारा परिचय एक फिल्म पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार से कराया। उसके काफी समय बाद सॅलून में उस पत्रकार से मेरी मुलाकात हुई, तो उन्हें मैं नहीं पहचान सका। बस, इसी बात का उन्हें बुरा लग गया और उन्होंने अपनी पत्रिका में मेरे बारे में अनाप-शनाप लिखना शुरू कर दिया। चूंकि उस दौर में उस पत्रिका का काफी नाम था, इसलिए उस लेख के प्रकाशन के बाद लोगों के बीच मेरी खराब इमेज बन गई। सच बताऊं, तो काफी हद तक उस पत्रकार महोदय ने भी मेरा काफी नुकसान किया। मेरे कैरियर में उतार-चढ़ाव के लिए इन अफवाहों के साथ म्यूजिक इंडस्ट्री में आया बदलाव भी एक हद तक जिम्मेदार है। महेश भट्ट की फिल्म आशिकी ने फिल्म म्यूजिक को एक अलग दिशा दी, लेकिन उसके बाद कॉपी वर्जन गाने वाले गायकों को इंडस्ट्री सिर पर बिठाने लगी और इसीलिए मौलिक गायक हाशिये पर चले गए। ऐसे में मुझे भी काम मिलने में दिक्कत हो रही थी। अच्छे गीत नहीं मिल रहे थे, जबकि विदेशों में शो के मेरे पास कई ऑफर थे। कुछ अलग करने के इरादे से ही मैं कैलीफोर्निया (अमेरिका) चला गया और वहां शो करने लगा। वहां के लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं वहीं का हो गया। मैं व्यवसाय के कारण भले ही अमेरिका में रहता हूं, लेकिन दिल हमेशा अपने देश में ही रहता है। ऐसे में जब यहां के लोग कुछ अलग और नए की फरमाइश करते हैं, तो मन मारकर रह जाता हूं। म्यूजिक कंसर्ट और शो में ही काफी बिजी रहने के कारण मेरी रुचि अब प्लेबैक में नहीं रही। हालांकि अच्छे ऑफर मिलने पर मैं प्लेबैक से इंकार नहीं करूँगा, लेकिन खुद इसके लिए पहल मैं कतई नहीं करने वाला। पहले भी काम मांगने किसी के पास नहीं गया था और आज भी मैं उस पर कायम हूं। हां, यदि पहले की तरह अच्छे गीत मिलें और म्यूजिक डायरेक्टर मेरे साथ काम करना चाहें, तो उन्हें निराश नहीं करूंगा। तो इस तरह हम वाकिफ़ हुए उन घटनाओं से जिस कारण अनवर को फिल्मों में गायकी से मुँह मोड़ना पड़ा। चलिए अब हम आगे बढते हैं आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं। उससे पहले "आनंद बख्शी" का लिखा एक बड़ा हीं खुबसूरत शेर पेश-ए-खिदमत है:

ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है,
तू जो चाहे तो दिन निकलता है तू जो चाहे तो रात होती है।


और यह रही आज़ की गज़ल:

मेरे ख़यालों की रहगुज़र से वो देखिए वो गुज़र रहे हैं,
मेरी निगाहों के आसमाँ से ज़मीन-ए-दिल पर उतर रहे हैं।

ये कैसे मुमकिन है हमनशीनो कि दिल को दिल की ख़बर न पहुंचे,
उन्हें भी हम याद आते होंगे कि जिन को हम याद कर रहे हैं।

तुम्हारे ही दम क़दम से थी जिन की मौत और ज़िंदगी अबारत,
बिछड़ के तुम से वो नामुराद अब न जी रहे हैं न मर रहे हैं।

इसी मोहब्बत की रोज़-ओ-शब हम सुनाया करते थे दास्तानें,
इसी मोहब्बत का नाम लेते हुए भी हम आज डर रहे हैं।

चले हैं थोड़े ही दूर तक बस वो साथ मेरे 'सलीम' फिर भी,
ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं।


इस गज़ल के "मकते" में तखल्लुस के रूप में "सलीम" को पढकर कई लोग इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि इस गज़ल को किसी "सलींम" नाम के शायर ने लिखा है। लेकिन सच ये है कि "ये इश्क़ नहीं आसान" फिल्म में "ऋषि कपूर" का नाम "सलींम अहमद सलीम" था। अब चूँकि नायक शायर की भूमिका में था, इसलिए उसकी कही गई गज़ल में उसके नाम को "तखल्लुस" के रूप में रखा गया है। यह बात अच्छी तो लगती है, लेकिन हमारे अनुसार ऐसा और कहीं नहीं हुआ। यह तो "बख्शी" साहब का बड़प्पन है कि उन्होंने ऐसा करना स्वीकार किया। क्या कहते हैं आप?



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

वो मेरा ___ है मैं उसकी परछाई हूँ,
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन....


आपके विकल्प हैं -
a) अक्स, b) सरमाया, c) हमसाया, d) आईना

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "इम्तिहाँ" और शेर कुछ यूं था -

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही,
इम्तिहाँ और भी बाकी हो तो ये भी न सही..

जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर को सबसे पहले सही पकड़ा सीमा जी ने। सीमा जी ने ग़ालिब के शेरों से महफ़िल को खुशगवार बना दिया, लगता है कि आप कई दिनों से ग़ालिब का हीं इंतज़ार कर रहीं थीं। ये रहे आपके पेश किए शेर:

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में यारब
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना (ग़ालिब )

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यों हो (ग़ालिब )

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं (मोहम्मद इक़बाल) यह तो बड़ा हीं मशहूर शेर है...शुक्रिया कि आपने इसे यहाँ रखा।

सीमा जी के बाद महफ़िल में इंट्री हुई शामिख जी की। आपने भी कुछ लुभावने शेर पेश किए। ये रही बानगी:

थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ
दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी (श्रद्धा जी..मतलब कि हमारी दीदी)

इम्तिहाँ से गुज़र के क्या देखा
इक नया इम्तिहान बाक़ी है (राजेश रेड्डी)

यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

इनके बाद महफ़िल में एक तरतीब में हाज़िर हुए शरद जी, शन्नो जी और मंजु जी। आप तीनों के नाम हम एक साथ इसलिए लिखते हैं क्योंकि जब भी स्वरचित शेरों की बात आती है तो आपका हीं नाम आता है। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर(क्रम से):

किसी राह चलती को छेडो न यारो
अभी इस के आगे जहाँ और भी हैं
ये जूतों की बारिश तो है पहली मन्ज़िल
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं । (क्या बात है!! )

कितने ही इम्तहान ले चुकी है जिन्दगी
खुदा जाने और भी कितने बाकी हैं.

जीवन इम्तहाँ का है नाम,
कोई होता फ़ेल तो कोई पास।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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