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Sunday, October 27, 2019

राग गुणकली : SWARGOSHTHI – 440 : RAG GUNAKALI


दीपोत्सव पर सभी पाठकों और श्रोताओं को हार्दिक शुभकामनाएँ 





स्वरगोष्ठी – 440 में आज

भैरव थाट के राग – 6 : राग गुणकली


संजीव अभ्यंकर से राग गुणकली में शास्त्रीय रचना और मुहम्मद रफी से फिल्मी गीत सुनिए




संजीव अभ्यंकर
मुहम्मद रफी
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, दीपावली पर्व पर आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम भैरव थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में भैरव थाट के जन्य राग “गुणकली” पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के पाँचवें अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित संजीव अभ्यंकर से इस राग में निबद्ध एक रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत मुहम्मद रफी के स्वर में सुनवाएँगे। 1954 में प्रदर्शित फिल्म “तुलसीदास” से गोपाल सिंह नेपाली का लिखा और चित्रगुप्त का संगीतबद्ध किया एक गीत – “हे महादेव मेरी लाज रहे...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



राग गुणकली को भैरव थाट जन्य राग माना गया है। इसमें ऋषभ और धैवत कोमल तथा तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होने के कारण इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। कुछ मतानुसार वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज भी माना जाता है। यह भैरव अंग का राग है, जो प्रातःकाल सन्धिप्रकाश के समय गाया-बजाया जाता है। उत्तरांग वादी तथा गायन समय दिन के उत्तर अंग में होने के बावजूद इस राग का चलन पूर्वांग प्रधान होता है और मन्द्र तथा मध्य सप्तकों के पूर्वांग में इसका चलन विशेष रूप होता है। भैरव अंग दिखाने के लिए कभी-कभी शुद्ध गान्धार कण के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग गुणकली की प्रकृति गम्भीर होती है। अब हम आपको सुविख्यात गायक पण्डित संजीव अभ्यंकर के स्वर में राग गुणकली में निबद्ध एक रचना सुनवाते हैं। इस प्रस्तुति में हारमोनियम पर प्रमोद मराठे और तबले पर भरत कामत ने संगति की है।

राग गुणकली : “डमरू हर कर बाजे...” : पण्डित संजीव अभ्यंकर


संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग गुणकली, राग भैरव से अधिक गम्भीर है। मींड़ में मध्यम से ऋषभ स्वर तक जाते समय गान्धार स्वर का जरा सा भी स्पर्श नहीं होना चाहिए। इससे राग जोगिया की छाया आएगी। राग जोगिया में करुण भाव निहित है, जबकि राग गुणकली की प्रवृत्ति गुरु-गम्भीर होती है। मध्यम और कोमल ऋषभ स्वर को मींड़ द्वारा लेने पर गम्भीर भाव कायम होगा। यह पूर्वांग प्रधान राग है। पूर्वांग के स्वरों का प्रयोग गाम्भीर्य भाव की उत्पत्ति के लिए सहायक सिद्ध होता है। इस राग की रचना विलम्बित और मध्यलय उपयुक्त होगी। द्रुतलय की रचना इस राग के भाव में व्यवधान उत्पन्न करेगा। राग गुणकली का गाम्भीर्य डिप्रेशन और चिन्ताविकृति को दूर का रास्ता दिखाएगा और शान्ति कायम करेगा। पीड़ित व्यक्ति को इस राग के श्रवण से अपार शान्ति मिलेगी और वह धीरे-धीरे वह स्वस्थ और सामान्य हो सकता है। अब हम आपको राग गुणकली का स्पर्श करते एक फिल्मी गीत का रसास्वादन करवाते हैं। यह गीत हमने वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म “तुलसीदास” से लिया है। चौताल और कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत को सुविख्यात गायक मुहम्मद रफी ने स्वर दिया है। गीतकार गोपाल सिंह नेपाली ने यह गीत लिखा और इसका संगीत चित्रगुप्त ने दिया है। हिन्दी फिल्मी गीतों में रागों की स्थिति के शोधकर्त्ता के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में मुख्यरूप से राग गुणकली परिलक्षित होता है, किन्तु कहीं-कहीं राग भैरव का स्पर्श भी किया गया है।

राग गुणकली : “हे महादेव मेरी लाज रहे...” : मुहम्मद रफी : फिल्म – तुलसीदास



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 440वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 2 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 442 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 438वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कलिंगड़ा (साथ ही राग भैरव की छाया भी है), दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्य प्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं, जबकि पाली बार पहेली में भाग ले रहे एक प्रतिभागी अरविन्द मिश्र का तीन में से केवल एक उत्तर ही सही होने के कारण इन्हें एक अंक ही दिए जा रहे हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “भैरव थाट के राग” की छठी कड़ी में आज आपने भैरव थाट के जन्य राग गुणकली का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात युवा संगीतज्ञ पण्डित संजीव अभ्यंकर से इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। राग गुणकली के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध गायक मुहम्मद रफी के स्वर में फिल्म “तुलसीदास” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला का शुभारम्भ करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


राग गुणकली : SWARGOSHTHI – 440 : RAG GUNAKALI : 27 अक्तूबर, 2019


Monday, November 20, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 15 || चित्रगुप्त

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 15
Chitragupt


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के १५ वें एपिसोड में सुनिए कहानी सुरों के चितेरे चित्रगुप्त की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Sunday, October 13, 2013

‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ : नवरात्र पर विशेष

स्वरगोष्ठी – 140 में आज

रागों में भक्तिरस – 8

राग यमन में सांध्य-वन्दन के स्वर 

   
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम भारतीय संगीत के सर्वाधिक लोकप्रिय राग कल्याण अर्थात यमन पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए दो रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। पहले आप सुनेंगे 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘गंगा की लहरें’ से शक्तिस्वरूपा देवी दुर्गा की प्रशस्ति करता एक आरती गीत। आज के अंक में यह भक्तिगीत इसलिए भी प्रासंगिक है कि आज पूरे देश में शारदीय नवरात्र पर्व के नवें दिन देवी के मातृ-स्वरूप की आराधना पूरी आस्था के साथ की जा रही है। इसके साथ ही विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का बजाया राग यमन भी हम प्रस्तुत करेंगे। यहाँ यह रेखांकित करना भी आवश्यक है कि बीते 9 सितम्बर को इस महान सरोद-वादक का 69वाँ जन्मदिन मनाया गया।


लता मंगेशकर और चित्रगुप्त 
हिन्दी फिल्म संगीत के समृद्ध भण्डार से यदि राग आधारित गीतों का चयन करना हो तो सर्वाधिक संख्या राग यमन, भैरवी और पहाड़ी पर आधारित गीतों की मिलेगी। राग यमन प्रायः सभी संगीतकारों का प्रिय राग रहा है। आज शारदीय नवरात्र के मातृनवमी के दिन हम आपको राग यमन पर आधारित एक फिल्मी आराधना गीत सुनवा रहे हैं। 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘गंगा की लहरें’ का गीत- ‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ राग यमन पर आधारित है। इसके संगीतकार चित्रगुप्त ने राग यमन के स्वरों को लेकर अत्यन्त सहज-सरल धुन में गीत को बाँधा है। राग यमन गोधूलि बेला अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर के आरम्भ के समय का राग है। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का यह राग कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में इस राग का नाम कल्याण ही बताया गया है। विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में भारत से यह राग पर्शिया पहुँचा, जहाँ इसे यमन नाम मिला। मुगलकाल से इसका यमन अथवा इमन नाम प्रचलित हुआ। दक्षिण भारतीय पद्यति में यह राग कल्याणी नाम से जाना जाता है। राग यमन अथवा कल्याण के आरोह में षडज और पंचम का प्रयोग बहुत प्रबल नहीं होता। निषाद स्वर प्रबल होने और ऋषभ स्वर शुद्ध होने से पुकार का भाव तथा भक्ति और करुण रस की सहज अभिव्यक्ति होती है। जैसा कि उल्लेख किया गया कि इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यदि तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाए तो यह राग बिलावल हो जाता है। अवरोह में यदि दोनों मध्यम का प्रयोग कर दिया जाए तो यह यमन कल्याण राग हो जाता है। यदि राग यमन के शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो राग वाचस्पति की अनुभूति कराता है। राग यमन की स्वर-रचना के कारण ही फिल्म ‘गंगा की लहरें’ के इस गीत में भक्त के पुकार का भाव स्पष्ट रूप से मुखरित होता है। कहरवा ताल के ठेके पर लता मंगेशकर ने इस आराधना गीत को भक्तिरस से परिपूर्ण कर दिया है।


राग यमन : ‘जय जय हे जगदम्बे माता...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गंगा की लहरें 


राग कल्याण अर्थात यमन यद्यपि संगीत शिक्षा का प्रारम्भिक राग माना जाता है किन्तु यह गम्भीर राग है और इसमें कल्पनापूर्ण विस्तार की अनन्त सम्भावना भी उपस्थित है। गायन के साथ ही वाद्य संगीत पर भी राग यमन खूब खिलता है। सरोद जैसे गम्भीर गमकयुक्त वाद्य पर इस राग की सार्थक अनुभूति के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात सरोदवादक उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत राग यमन सुनवाते हैं। यह उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं कि इस सप्ताह 9 अक्तूबर को उस्ताद अमजद अली खाँ का 69वाँ जन्मदिवस था। इस अवसर के लिए हम उन्हें ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं और उनके व्यक्तित्व के कुछ प्रेरक पलों को याद करते हैं।

उस्ताद अमजद अली खाँ 
वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ सरोद-वादकों की सूची में शिखर पर हैं और ‘सरोद-सम्राट’ की उपाधि से विभूषित हैं। 9 अक्तूबर, 1945 को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में जन्म लेने वाले अमजद अली खाँ को संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नाम दिया। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र से ही संगीत की शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में ही उनके एकल सरोद-वादन का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ था। एक छोटे से बालक की अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए थे। युवावस्था तक आते-आते वे एक श्रेष्ठ वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद की वादन-शैली में कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है।

उस्ताद अमजद अली खाँ ने अनेक नये रागों की रचना भी की है। ये नवसृजित राग हैं- किरणरंजनी, हरिप्रिया कान्हड़ा, शिवांजलि, श्यामश्री, सुहाग भैरव, ललितध्वनि, अमीरी तोड़ी, जवाहर मंजरी, और बापूकौंस। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ संगीत जगत के सर्वश्रेष्ठ सरोद-वादक हैं। उनके वादन में इकहरी तानें, गमक, खयाल की बढ़त का काम अत्यन्त आकर्षक होता है। आइए, अब हम आपको सरोद पर खाँ साहब का बजाया राग यमन में भक्तिरस से परिपूर्ण एक मोहक रचना सुनवाते हैं। यह प्रस्तुति सात मात्रा के रूपक ताल में निबद्ध है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : सरोद पर रूपक ताल की रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ 



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्तिपद का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह चौथे सेगमेंट की समापन पहेली है। इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस भक्तिपद के अंश में आपको किस राग के दर्शन हो रहे हैं?

2 – गीत के गायक-स्वर को पहचानिए और हमें उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 142वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 138वें अंक की पहेली में हमने आपको डॉ. एन. राजम् का वायलिन पर गायकी अंग में प्रस्तुत मीरा के एक पद का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मालकौंस और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ‘पग घुँघरू बाँध कर नाची रे...’। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का आज का यह अंक पिछले रविवार को हम प्रस्तुत न कर सके, इसके लिए हमें खेद है। आइए, आज हम उस कड़ी का रसास्वादन करते हैं। जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग यमन के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की नौवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, May 29, 2011

मुझे दर्दे दिल क पता न था....मजरूह साहब की शिकायत रफ़ी साहब की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 666/2011/106

"मजरूह साहब का ताल्लुख़ अदब से है। वो ऐसे शायर हैं जो फ़िल्म इंडस्ट्री में आकर मशहूर नहीं हुए, बल्कि वो उससे पहले ही अपनी तारीफ़ करवा चुके थे। उन्होंने बहुत ज़्यादा गानें लिखे हैं, जिनमें कुछ अच्छे हैं, कुछ बुरे भी हैं। आदमी के देहान्त के बाद उसकी अच्छाइयों के बारे में ही कहना चाहिए। वो एक बहुत अच्छे ग़ज़लगो थे। वो आज हम सब से इतनी दूर जा चुके हैं कि उनकी अच्छाइयों के साथ साथ उनकी बुराइयाँ भी हमें अज़ीज़ है। आर. डी. बर्मन साहब की लफ़्ज़ों में मजरूह साहब का ट्युन पे लिखने का अभ्यास बहुत ज़्यादा था। मजरूह साहब नें बेशुमार गानें लिखे हैं जिस वजह से साहित्य और अदब में कुछ ज़्यादा नहीं कर पाये। उन्हें जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया, तब उन्होंने यह कहा था कि अगर यह पुरस्कार उन्हें साहित्य के लिये मिलता तो उसकी अहमियत बहुत ज़्यादा होती। "उन्होंने कुछ ऐसे गानें लिखे हैं जिन्हें कोई पढ़ा लिखा आदमी, भाषा के अच्छे ज्ञान के साथ ही, हमारे कम्पोज़िट कल्चर के लिये लिख सकता है।" - निदा फ़ाज़ली।

६० के दशक का पहला गीत इस शृंखला का हमनें कल सुना था फ़िल्म 'दोस्ती' का। आज सुनिये इसी दशक का फ़िल्म 'आकाशदीप' का गीत जिसके संगीतकार हैं चित्रगुप्त। इस संगीतकार के साथ भी मजरूह साहब नें बहुत काम किया है। रफ़ी साहब की आवाज़ में यह ग़ज़ल है "मुझे दर्द-ए-दिल का पता न था, मुझे आप किसलिये मिल गये, मैं अकेले युं ही मज़े में था, मुझे आप किसलिये मिल गये"। यह १९६५ की फ़िल्म थी जिसका लता जी का गाया "दिल का दीया जलाके गया" आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पहले सुन चुके हैं। दोस्तों, १९६४-६५ का समय संगीतकार चित्रगुप्त के करीयर का शिखर समय था। पंकज राग लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' में चित्रगुप्त के अध्याय में एक जगह यह लिखा गया है कि चित्रगुप्त के पुत्र आनंद ने एक साक्षात्कार में बताया था कि चित्रगुप्त की व्यस्तता का १९६४ का एक ज़माना वह भी था कि एक दिन आनंद बक्शी उनके घर बगीचे में गीत लिख रहे थे, तो मजरूह कहीं और डटे हुए थे, राजेन्द्र कृष्ण उनके संगीत-कक्ष में लगे थे और प्रेम धवन पिछवाड़े के नारियल के पेड़ के नीचे बैठे लिख रहे थे, और चित्रगुप्त बारी-बारी से एक हेडमास्टर की तरह सबके पास जाकर उनकी प्रगति आँक रहे थे। दोस्तों, है न मज़ेदार! और ऐसे ही न जाने कितने प्रसंग होंगे जो इन स्वर्णिम गीतों और इन लाजवाब फ़नकारों से संबंधित होंगे। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ में हमारी कोशिश और हमारी तलाश यही रहती है कि ऐसी दिलचस्प जानकारियों से हर शृंखला को समृद्ध करें। इसमें आप भी अपना सहयोग दे सकते हैं। अगर आपके पास भी फ़िल्म-संगीत इतिहास की अनोखी जानकारियाँ हैं तो आप उसे एक ईमेल में टाइप कर सूत्रब या संदर्भ के साथ हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर भेज सकते हैं। और आइए अब आनंद लें रफ़ी साहब की आवाज़ में मजरूह-चित्रगुप्त के इस गीत का। गीत फ़िल्माया गया है अभिनेता धर्मेन्द्र पर। चलते चलते मजरूह की इस ग़ज़ल के तमाम शेर पेशे खिदमत है.

मुझे दर्द-ए-दिल का पता न था, मुझे आप किसलिये मिल गये,
मैं अकेले युं ही मज़े में था, मुझे आप किसलिये मिल गये।

युं ही अपने अपने सफ़र में गुम, कहीं दूर मैं कहीं दूर तुम,
चले जा रहे थे जुदा जुदा, मुझे आप किसलिये मिल गये।

मैं ग़रीब हाथ बढ़ा तो दूँ, तुम्हे पा सकूँ कि न पा सकूँ,
मेरी जाँ बहुत है ये फ़ासला, मुझे आप किसलिये मिल गये।

न मैं चांद हूँ किसी शाम का, न चिराग़ हूँ किसी बाम का,
मैं तो रास्ते का हूँ एक दीया, मुझे आप किसलिये मिल गये।



क्या आप जानते हैं...
कि हिंदी शब्दों में मजरूह साहब को कुछ शब्दों में ख़ासा दिलचस्पी थी, जैसे कि "प्यारे" और "दीया"। "दीया" शब्द के प्रयोग वाले गीतों में उल्लेखनीय हैं "दिल का दीया जलाके गया" (आकाशदीप), "क्या जानू सजन होती है क्या ग़म की शाम, जल उठे सौ दीये" (बहारों के सपने), "दीये जलायें प्यार के चलो इसी ख़ुशी में" (धरती कहे पुकार के)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 7/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - फिल्म के निर्देशक कौन थे - ३ अंक
सवाल २ - किस नायिका पर है ये गीत फिल्माया हुआ - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं- १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार टक्कर कांटे की है, अविनाश जी ८ अंक लेकर आगे चल रहे हैं, ६ अंकों पर हैं क्षिति जी, प्रतीक जी हैं ५ अंकों पर शरद जी ३ और हमारी प्रिय इंदु जी हैं २ अंकों पर.....इंदु जी आपको भूलें हमारी इतनी हिम्मत, अवध जी आप यूहीं आकार दिल खुश कर दिया कीजिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, May 11, 2011

इतनी बड़ी ये दुनिया जहाँ इतना बड़ा मेला....पर कोई है अकेला दिल, जिसकी फ़रियाद में एक हँसी भी है उपहास की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 654/2011/94

गान और मुस्कान', इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है यह लघु शृंखला जिसमें हम कुछ ऐसे गीत सुनवा रहे हैं जिनमें गायक-गायिकाओं की हँसी या मुस्कुराहट सुनाई या महसूस की जा सकती है। पिछले गीतों में नायिका की चुलबुली अंदाज़, शोख़ी और रूमानीयत से भरी अदायगी, और साथ ही उनकी मुस्कुराहटें, उनकी हँसी आपनें सुनी। लेकिन जैसा कि पहले अंक में हमनें कहा था कि ज़रूरी नहीं कि हँसी हास्य से ही उत्पन्न हो, कभी कभार ग़म में भी हंसी छूटती है, और वह होती है अफ़सोस की हँसी, धिक्कार की हँसी। यहाँ हास्य रस नहीं बल्कि विभत्स रस का संचार होता है। जी हाँ, कई बार जब दुख तकलीफ़ें किसी का पीछा ही नहीं छोड़ती, तब एक समय के बाद जाकर वह आदमी दुख-तकलीफ़ों से ज़्यादा घबराता नहीं, बल्कि दुखों पर ही हँस पड़ता है, अपनी किस्मत पर हँस पड़ता है। आज के अंक के लिए हम एक ऐसा ही गीत लेकर आये हैं रफ़ी साहब की आवाज़ में। जी हाँ रफ़ी साहब की आवाज़ में अफ़सोस की हँसी। दोस्तों, वैसे तो इस गीत को मैंने बहुत साल पहले एक बार सुना था, लेकिन मेरे दिमाग से यह गीत निकल ही चुका था। और जब मैं रफ़ी साहब की हँसी वाला गीत नेट पर ढूंढ रहा था इस शृंखला के लिए, तो मुझे यकीन था कि शायद कोई ऐसा गीत मिलेगा जिसमें अभिनेता होंगे जॉनी वाकर या कोई और हास्य कलाकार। लेकिन आश्चर्य से मेरे हाथ यह गीत लगा और मुझे ख़ुशी है कि हँसी से इस रूप को भी इस शृंखला में हम शामिल कर सके। यह गीत है फ़िल्म 'तूफ़न में प्यार कहाँ' का। कुछ याद आया कि कितने साल पहले आपने इस गीत को सुना होगा?

'तूफ़ान में प्यार कहाँ' सन् १९६६ की फ़िल्म थी, जिसमें मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, नलिनी जयवंत, शशिकला, जयश्री गडकर और सुंदर प्रमुख। फणी मजुमदार निर्देशित इस फ़िल्म को बॉक्स ओफ़िस पर कामयाबी तो नहीं मिली, लेकिन इसके कम से कम दो गीत मशहूर ज़रूर हुए थे। एक तो लता-रफ़ी का "आधी रात को खनक गया" और दूसरा गीत था रफ़ी की एकल आवाज़ में "इतनी बड़ी दुनिया, जहाँ इतना बड़ा मेला, मगर मैं, हा हा हा, कितना अकेला"। दादामुनि पर फ़िल्माये गये इस गीत नें मेरी एक और ग़लत धारणा को परास्त किया। पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में यह बैठा हुआ था कि इस गीत को दादामुनि नें ही गाया है, यह तो मुझे कल ही पता चला कि इसे रफ़ी साहब नें आवाज़ दी है। लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि रफ़ी साहब नें दादामुनि अशोक कुमार की शख़्सीयत और आवाज़ को ध्यान में रख कर ही इस गीत को गाया होगा। इस फ़िल्म के संगीतकार थे चित्रगुप्त और गीतकार थे प्रेम धवन। चित्रगुप्त और उनके गायकों की बात करें तो अपने करीयर के शुरुआती सालों में उमा देवी, शम्शाद बेगम जैसी गायिकाओं को गवाया। वैसे लता के साथ सम्पर्क में आने के बाद उनके गीतों को नई बुलंदी मिली। लेकिन इससे पहले आशा उनकी प्रमुख गायिका के रूप में नज़र आईं। गायकों में जहाँ वो ख़ुद भी अपनी आवाज़ लगा लिया करते थे, साथ ही किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, और तलत महमूद को भी शुरुआती सालों में गवाया। पर तलत या किशोर कभी उनके प्रमुख गायक नहीं बने। प्रमुख गायक के रूप में रफ़ी और मुकेश ही सामने आये। दूसरे शब्दों में लता, रफ़ी और मुकेश से ही चित्रगुप्त को अपने करीयर के सफलतम गीत मिले। तो आइए आज का यह गीत सुनते हैं, इस गीत में निराशा भरे सु्रों में भी हँसी की एक झलक महसूस कीजिए रफ़ी साहब की आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि बिहार के छपरा ज़िले में जन्में चित्रगुप्त संगीतकार बनने से पहले इकोनोमिक्स और जर्नलिज़्म में पोस्ट-ग्रैजुएशन किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - किन दो कलाकारों पर फिल्माया गया है ये युगल गीत - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
४ सही जवाब एक बार फिर अमित जी, अन्जाना जी, हिन्दुस्तानी जी और प्रतीक जी को बधाई, अमित जी हमारे पास उपलब्ध सबसे विश्वसनीय सोत्र के रूप में गीतकोश है, जिसके अनुसार "अनुभव" फिल्म में गुलज़ार और कपिल कुमार दोनों ने ही गीत लिखे थे, जहाँ कपिल ने "कोई चुपके से आके" और "कहीं कोई फूल खिला" गीत लिखे वहीँ गुलज़ार साहब ने "मेरा दिल जो मेरा होता" और "मेरी जान" के लिए कलम उठायी. इसलिए हम पिछले परिणामों को ही मान्य मानेंगें.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, June 8, 2010

"जय दुर्गा महारानी की" - क्या आपने पहले कभी सुनी है संगीतकार चित्रगुप्त की गाती हुई आवाज़?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 412/2010/112

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कल की कड़ी मे हमने सुनी थी सबिता बनर्जी की गाई हुई एक दुर्लभ फ़िल्मी भजन। आज के गीत का रंग भी भक्ति रस पर ही आधारित है। भारतीय फ़िल्म जगत में सामाजिक फ़िल्मों के साथ साथ धार्मिक और पौराणिक विषयों पर आधारित फ़िल्मों का भी एक जौनर रहा है फ़िल्म निर्माण के शुरुआती दौर से ही। यह परम्परा ९० के दशक में गुल्शन कुमार के निधन के बाद धीरे धीरे विलुप्त हो गई, और आज दो चार धार्मिक गीतों के ऐल्बम के अलावा इस जौनर की कोई कृति ना सुनाई देती है और ना ही परदे पर दिखाई देती है। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर में बनने वाली धार्मिक फ़िल्मों में कुछ गिने चुने फ़िल्मों को छोड़ कर ज़्यादातर फ़िल्में बॊक्स ऒफ़िस पर असफल हुआ करती थी। दरसल धार्मिक फ़िल्मों के निर्माता इन फ़िल्मों का निर्माण ख़ास दर्शक वर्ग के लिए किया करते थे जैसे कि ग्रामीण जनता के लिए, वृद्ध वर्ग के लिए। ऐसे में आम जनता इन फ़िल्मों से कुछ दूर दूर ही रहती आई है। ज़्यादा व्यावसाय ना होने की वजह से ये कम बजट की फ़िल्में होती थीं। ना इन्हे ज़्यादा बढ़ावा मिलता और ना ही इनका ज़्यादा प्रचार हो पाता। ऐसे में इन फ़िल्मों के गानें भी लोगों तक सही रूप से नहीं पहुँच पाते। और यही वजह है कि इन फ़िल्मों के गानें आज दुर्लभ गीतों की श्रेणी में शुमार हो चुका है, जिन्हे कहीं से प्राप्त करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसलिए अगर दुर्लभ गीतों की इस लघु शृंखला में कुछ गानें धार्मिक फ़िल्मों से शामिल हुए हैं, तो इसमें हैरत की कोई बात नहीं है। वैसे धार्मिक फ़िल्मों में तो असंख्य धार्मिक और सामाजिक गानें हुए हैं, तो फिर ऐसा क्या ख़ास बात है आज के प्रस्तुत गीत में? ख़ास बात है इस गीत को गाने वाले गायक में। चित्रगुप्त को हमने हमेशा एक संगीतकार के रूप में जाना है और उनके संगीतबद्ध गानें ही सुनते चले आए हैं। लेकिन आज के गीत में आप सुनने जा रहे हैं उनकी गाती हुई आवाज़। और यह भी आपको बता दें कि इस गीत का संगीत चित्रगुप्त जी ने नहीं बल्कि धार्मिक फ़िल्मों के जाने माने संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी साहब ने तैयार किया है।

"जय जयकार करो माता की, आओ चरण भवानी की, एक बार फिर प्रेम से बोलो, जय दुर्गा महारानी की" - चित्रगुप्त और साथियों की आवाज़ों में यह भक्ति गीत है १९५३ की फ़िल्म 'नव दुर्गा' का। महीपाल और उषा किरण अभिनीत इस फ़िल्म में एस. एन. त्रिपाठी ने ना केवल संगीत दिया था बल्कि अभिनय भी किया था। वैसे उन्होने इस तरह की कई धार्मिक फ़िल्मों में छोटे मोटे किरदार निभाते आए हैं समय समय पर। 'नव दुर्गा' बसंत पिक्चर्स की प्रस्तुति थी जिसका निर्देशन किया था बाबूभाई मिस्त्री ने। आइए आज चित्रगुप्त जी के शुरुआती दिनों की कुछ बातें की जाए। चित्रगुप्त भोजपुर बिहार के एक साहित्यिक कायस्थ परिवार से ताल्लुख़ रखते थे। उस परिवार में किसी को पसंद ना था कि कालेज में एम.ए (अर्थशास्त्र) की पढ़ाई के दौरान दोस्तों को गीत सुनाने वाले चित्रगुप्त एक पार्श्व गायक बनें। अपने चाचा से फ़ारसी एवं उर्दू तथा भाई से संस्कृत पढ़ने के बावजूद वे सन् १९४५ में सिर्फ़ ३६५ दिनों के लिए बम्बई आ पहुँचे यह सोचकर कि यदि संगीत देने का अवसर न मिला तो बिहार लौट जाएँगे। बम्बई आकर वे अपने एक दोस्त मदन सिन्हा के माध्यम से प्रसिद्ध निर्देशक सर्वोत्तम बादामी के सहायक से मिले। उन्ही दिनों नितिन बोस से भी उनकी मुलाक़ात हुई। तत्कालीन हरि प्रसन्न दास (जिनके सहायक के रूप में उन दिनों मन्ना डे कार्य कर रहे थे) के निर्देशन में उन्होने एक समूह गीत भी गाया था। संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी के सहायक के रूप में काम करने के साथ साथ उन्हे 'लेडी रॊबिनहुड' में स्वतंत्र रूप से संगीत देने का अवसर मिला। इस फ़िल्म में उन्होने राजकुमारी के साथ मिल कर कुछ गीत भी गाए। १९५३-५४ से धार्मिक फ़िल्मों में संगीत देने का उनका सिलसिला शुरु हुआ तो उन्होने लगभग १५ फ़िल्मों - नाग पंचमी, शिवरात्रि, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, शिवभक्त, श्री गणेश विवाह, आदि में उन्होने संगीत दिया। (सौजन्य: लिस्नर्स बुलेटिन अंक-८४)। इसी दौरान एस. एन. त्रिपाठी के संगीत में बनी धार्मिक फ़िल्म 'नव दुर्गा' में त्रिपाठी जी ने अपने इस शिष्य से यह आज का प्रस्तुत गीत गवाया। इस गीत को आज बहुत कम लोगों ने याद रखा है। तो लीजिए 'दुर्लभ दस' शृंखला की दूसरी कड़ी में सुनिए संगीतकार चित्रगुप्त की आवाज़ और एस.एन. त्रिपाठी का संगीत। फ़िल्म 'नव दुर्गा' के इस भजन को लिखा है रमेश चन्द्र पाण्डेय ने।



क्या आप जानते हैं...
कि चित्रगुप्त ने बतौर स्वतंत्र संगीतकार सब से पहले, १९४६ में, जिन तीन फ़िल्मों में संगीत दिया था उनके नाम हैं - 'फ़ाइटिंग् हीरो', 'लेडी रॊबिनहुड', तथा 'तूफ़ान क्वीन'। इन फ़िल्मों की नामावली में उनके नाम के साथ उनकी डिग्री एम.ए को जोड़ा गया था, यानी कि "चित्रगुप्त एम.ए"।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस गीत में आवाज़ उस गायिका की है जिसे "गरीबों की लता" कहा जाता है। गायिका का नाम बताएँ। १ अंक।

२. यह एक भोजपुरी फ़िल्म का गीत है जो बनी थी १९६६ में और जिसके मुख्य कलाकार थे सुजीत कुमार और विजया चौधरी। फ़िल्म के शीर्षक में दो शब्द हैं जिसमें से पहला शब्द एक धातु का है और दूसरा शब्द एक उपाधि (सरनेम) है। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।

३. फ़िल्म के संगीतकार पौराणिक और धार्मिक फ़िल्मों में संगीत देने के लिए जाने जाते हैं जिन्होने अपने करीयर की शुरुआत बॊम्बे टॊकीज़ से की थी। संगीतकार का नाम बताएँ। २ अंक।

४. अगर उपर के तीन सूत्रों से आपने फ़िल्म का नाम पहचान लिया है तो फिर जुदाई के दर्द में लिपटा हुआ यह गीत भी बता दीजिए। ३ अंक।

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी आप सदियाँ बाद ओल्ड इस गोल्ड पर आये कल, पर ये क्या आपने तो बहुत बड़ी गलती कर दी...नियम के मुताबिक एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, तो माफ़ी चाहेंगें आपके दोनों जवाब सही हैं पर अंक एक भी नहीं मिल पायेगा. वहीँ पहली बार अवध जी ने शुरूआत में इस बार खाता खोला है, बहुत बधाई....भारतीय नागरिक जी, आपकी पसंद जरूर सुन्वएंगें, पर फिलहाल आपसे पहेली के जवाबों की हमें उम्मीद रहेगी, संगीता जी गीत को पसंद करने का आभार, शरद जी और इंदु नज़र नहीं आये.....????

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, January 22, 2010

बलमा माने ना बैरी चुप ना रहे....चित्रगुप्त का रचा एक और चुलबुला नगमा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 322/2010/22

इंदु जी के पसंद के गीत आजकल ओल्ड इज़ गोल्ड की शान बनें हुए हैं। कल के गीत में रोने रुलाने की बात थी। चलिए आज मूड को ज़रा बदलते हैं और एक ख़ुशनुमा गीत सुनते हैं लता जी की ही आवाज़ में। शास्त्रीय संगीत पर आधारित यह रचना है फ़िल्म 'ओपेरा हाउस' का। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे और चित्रगुप्त के संगीतबद्ध किए इस गीत के बोल हैं "बलमा माने ना बैरी चुप ना रहे, लगी मन की कहे हाए पा के अकेली मोरी बैयाँ गहे"। इंदु जी कहती हैं कि "बचपन में एक म्युज़िक कॊम्पीटिशन में पहला इनाम जीता था इसे गा कर, बस तभी से पसंद है। जब भी सुनती हूँ जैसे बचपन के वो दिन सामने आ जाते हैं। खूबसूरत गीत तो है ही, बी.सरोजा देवी का नृत्य व हाव भाव मनमोहक है, कमाल है।" इंदु जी, चलिए इसी बहाने हम सब को यह पता चल गया कि आप गाती भी हैं। अगर संभव हो तो अपनी आवाज़ में इस गीत को रिकार्ड कर हमें ज़रूर भेजिएगा। जैसा कि आप बता ही चुकी हैं कि यह गीत फ़िल्माया गया है बी. सरोजा देवी पर, इस फ़िल्म के अन्य कलाकार थे अजीत, के. एन. सिंह, ललिता पवार, और बेला बोस प्रमुख।

ए. ए. नडियाडवाला ने 'ओपेरा हाउस' का निर्माण किया था सन् १९६१ में, जिसका निर्देशन किया पी. एल. संतोषी साहब ने। फ़िल्म की कहानी कुछ इस प्रकार की थी कि सरोज (बी. सरोजा देवी) नागपुर में एक ग़रीब ज़िंदगी जी रही होती है अपनी विधवा माँ लीला और छोटी बहन नन्ही के साथ। सरोज को गायिका-नृत्यांगना की नौकरी मिल जाती है, इसलिए वो बम्बई चली जाती है। बम्बई में उसकी मुलाक़ात एक नौजवान लड़के अजीत से होती है, और दोनों को एक दूसरे से प्यार हो जाता है। कुछ समय बाद सरोज को पता चलता है कि अजीत दरअसल उसी ड्रामा-डांस कंपनी के मालिक रणजीत के छोटे भाई हैं। हालात सरोज को वापस नागपुर लौट जाने के लिए मजबूर करती है और वहाँ जा कर वो एक दूसरी ड्रामा कंपनी से जुड़ जाती है जिसके मालिक हैं चुनीलाल। उधर अजीत, जो सरोज से पागलों की तरह मोहब्बत करता है, उसे तलाशता हुआ नागपुर आ पहुँचता है। उसकी सरोज से मुलाक़ात भी होती है, लेकिन तब तक सरोज मैरी डी'सूज़ा बन चुकी होती है। अजीत को एक और राज़ का पता चलता है कि सरोज चुनीलाल के हत्या का चश्मदीद गवाह है और हत्यारा उसे ख़ामोश करने की ताक में है। तो ये है इस फ़िल्म की मूल कहानी। आज के इस प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म का जो सब से हिट गीत रहा, वह है लता और मुकेश का गाया डुएट "देखो मौसम, क्या बहार है, सारा आलम, बेक़रार है"। इस गीत को भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आप भविष्य में ज़रूर सुन पाएँगे, लेकिन आज सुनिए "बलमा माने ना"। इंदु जी को धन्यवाद इस सुरीले बेमिसाल गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकृष्ट करने के लिए, सुनिए...



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

गुनगुना मेरे यार कोई गीत ख़ुशी का,
मुस्कुरा खुल के यूं कि देखे जहाँ सारा,
फिर जगा ख़याल में कोई सोच नयी,
फिर निगाह में चमका ख्वाब का तारा...

अतिरिक्त सूत्र - इस फिल्म में अभिनेत्री थी वहीदा रहमान

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह पदम सिंह जी के रूप में एक नए प्रतिभागी मिले हैं हमें, बधाई आपको और बहुत बहुत स्वागत

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, January 14, 2010

जाग दिल-ए-दीवाना.... चित्रगुप्त के संगीत में जागी है आवाज़ रफ़ी साहब की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 314/2010/14

ज १४ जनवरी है। आज ही के दिन आज से ठीक १० साल पहले १९९१ में हम से बहुत दूर चले गए थे फ़िल्म संगीत के एक और बेहद गुणी संगीतकार जिन्हे हम चित्रगुप्त के नाम से जानते हैं। आज 'स्वरांजली' की चौथी कड़ी में हम अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं चित्रगुप्त जी की पुण्य स्मृति को। चित्रगुप्त एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिन्हे बहुत ज़्यादा ए-ग्रेड फ़िल्मों में संगीत देने का मौका नहीं मिल पाया। लेकिन उनका संगीत हमेशा ए-ग्रेड ही रहा। फ़िल्म के चलने ना चलने से किसी संगीतकार के प्रतिभा का आंकलन नहीं किया जा सकता। लेकिन एक के बाद एक स्टंट, धार्मिक और कम बजट की सामाजिक फ़िल्मों में संगीत देते रहने की वजह से वो टाइप कास्ट हो गए। लेकिन फिर भी कई बार उन्हे बड़ी फ़िल्में भी मिली और उनमें उन्होने साबित कर दिखाया कि वो किसी दूसरे समकालीन बड़े संगीतकार से कुछ कम नहीं हैं। 'गंगा की लहरें', 'ऊँचे लोग', 'आकाशदीप', 'एक राज़', 'मैं चुप रहूँगी', 'औलाद', 'इंसाफ़', 'बैक कैट', 'लागी नाही छूटे राम', और 'काली टोपी लाल रुमाल' जैसी फ़िल्में आज भी सुरीले और हिट संगीत के लिए याद किए जाते हैं। चित्रगुप्त जी के बेटे हैं संगीतकार जोड़ी आनंद और मिलिंद। अपने पिता को याद करते हुए मिलिंद विविध भारती पर कहते हैं, "पापा पोएट्री पे बहुत ज़्यादा ध्यान देते थे। उनका कहना था कि 'words contribute more than 50% of a song'. अगर शब्द अच्छे हों तो गाना भी अच्छा लगता है सुनने में और मुखड़ा अगर अच्छा हो तो गाना भी हिट हो जाता है। कभी कभी तो कॊम्पोज़ करते समय वो ख़ुद ही कुछ बोल रख लेते थे, जिनमें से कभी कभी वही बोल फ़ाइनल गाने में भी रख लिए जाते, पूरा का पूरा नहीं, एक दो लाइन।"

दोस्तों, आज चित्रगुप्त जी के नाम हम जिस गीत को समर्पित कर रहे हैं वह है फ़िल्म 'ऊँचे लोग' से मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा एक बेहद मशहूर गाना "जाग दिल-ए-दीवाना ऋत जागी वस्ल-ए-यार की"। 'ऊँचे लोग' १९६५ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण दक्षिण के सत्यम-नंजुंदन ने किया था। फणी मजुमदार निर्देशित यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी १९ अगस्त के दिन। अशोक कुमार, राजकुमार और फ़ीरोज़ ख़ान इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे। इस गीत के साथ दादामुनि अशोक कुमार की यादें जुड़ी हुई हैं। तभी तो जब वो विविध भारती पर 'जयमाला' पेश करने सन् १९६८ में तशरीफ़ लाए थे, तब इस फ़िल्म को और इस गीत को याद करते हुए कहा था - "एक फ़िल्म बनी थी 'ऊँचे लोग', जिसमें केवल तीन गानें थे और हीरोइन ना के बराबर। फ़िल्म तो नहीं चली पर इसका एक गीत मुझे पसंद है। इस गीत में रिकार्ड को तीन मिनट तक खींचने की कोशिश की गई है, पर ऒर्केस्ट्रेशन अच्छा ज़रूर है। अगली बार चित्रगुप्त जी मिलेंगे तो कहूँगा कि बोल लिखवा लें ताकी यह खींचाव ना हो। सुनिए यह गीत।" दोस्तों, हम कह नहीं सकते कि दादामुनि ने फिर चित्रगुप्त जी को अपनी राय दी होंगी या नहीं, हम तो यही कहेंगे कि पसंद अपनी अपनी ख़याल अपना अपना। आइए सुनते हैं यह सुरीला नग़मा। चित्रगुप्त के स्वरबद्ध किए गीतों को सुनकर सपनें नींद से जाग उठते हैं, उमंगें अँगड़ाइयाँ लेने लगती हैं, और हसरतें गाने लगती हैं, बिल्कुल इसी गीत की तरह, मुलाहिज़ा फ़रमाइए।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

ज़ालिम है बहुत रुकता ही नहीं,
ये वक्त कमबख्त सुनता ही नहीं,
संवार लूं आँखों में जिस्म दमकता,
निहार लूं दो पल हुस्न के जलवे....

अतिरिक्त सूत्र - आज यानी १४ जनवरी को महान शायर की जयंती भी है

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी २ अंक और आपके खाते में जुड़े, बधाई, अवध जी और दिलीप जी आपका भी धन्येवाद.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, October 19, 2009

दगा दगा वई वई वई....चित्रगुप्त और लता ने रचा एक ऐसा गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे, कदम थिरक उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 236

श चोपड़ा की सफलतम फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' के बाद चार या उससे अधिक शब्दों वाले शीर्षक से फ़िल्में बनाने की जैसे एक होड़ सी शुरु हो गई थी फ़िल्मकारों के बीच। लेकिन चार शब्दों वाले फ़िल्मी शीर्षक काफ़ी पहले से ही चले आ रहे हैं। हाँ, ये ज़रूर है कि लम्बे नाम वाले फ़िल्मों की संख्या उस ज़माने में कम हुआ करती थी। ९० के दशक में और इस दशक के पहले भाग में सब से ज़्यादा इस तरह के लम्बे नाम वाले फ़िल्मों का निर्माण हुआ। आज फिर से छोटे नाम वाले फ़िल्में ही ज़्यादा बनने लगी हैं। फ़िल्मी इतिहास में ग़ोते लगाने के बाद मेरे हाथ चार शब्दों वाले नाम का जो सब से पुराना फ़िल्म हाथ लगा (अंग्रेज़ी शीर्षक वाले फ़िल्मों को अलग रखते हुए), वह है सन् १९३६ की फ़िल्म 'ममता और मिया बीवी' जिसका निर्माण बॊम्बे टॊकीज़ ने किया था। उसके बाद १९३९ में बनी थी वाडिया मूवीटोन की फ़िल्म 'कहाँ है मंज़िल तेरी'। ४० के दशक में १९४२ में सौभाग्य पिक्चर्स ने बनाई 'हँसो हँसो ऐ दुनियावालों'। १९४४ में दो फ़िल्में आयीं 'चल चल रे नौजवान' और 'पर्बत पे अपना डेरा'। १९४५ में 'स्वर्ग से सुंदर देश हमारा', १९४६ में 'डा. कोटनिस की अमर कहानी', 'माँ बाप की लड़की', और 'फिर भी अपना है', १९४७ में 'घर घर की कहानी', 'समाज को बदल डालो', १९४८ में 'आज़ादी की राह पर', 'बरसत की एक रात', 'हम भी इंसान हैं', १९४९ में 'मैं अबला नहीं हूँ', १९५२ में 'शिन शिनाकी बब्ला बू', १९५३ में 'जलियाँवाला बाग की ज्योति', और 'तीन बत्ती चार रास्ते'। बस्‍, इसी नाम तक हम पहुँचना चाहते थे। 'तीन बत्ती चार रास्ते' ही वह पहली इस तरह की सफल फ़िल्म थी जिसका शीर्षक एक ट्रेंडसेटर बना। इसके बाद जब भी मौका लगा फ़िल्मकारों ने इस तरह के शीर्षक अपनी फ़िल्मों की रखे। आज हम जिस फ़िल्म का गीत आप को सुनवा रहे हैं उसका नाम है 'काली टोपी लाल रुमाल'। सुनिए इस फ़िल्म से लता मंगेशकर की आवाज़ में एक बड़ा ही चुलबुला सा गीत "दग़ा दग़ा व‍इ व‍इ व‍इ, हो गई उनसे उल्फ़त हो गई"।

१९५९ में बनी थी फ़िल्म 'काली टोपी लाल रुमाल' जिसका निर्देशन तारा हरीश ने किया था। फ़िल्म कम बजट की थी, जिसके मुख्य कलाकार थे चन्द्रशेखर, शक़ीला, आग़ा, मुकरी और के. एन. सिंह। फ़िल्म के संगीतकार थे चित्रगुप्त और गीत लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने। प्रस्तुत गीत शक़ीला और आग़ा पर फ़िल्माया गया है। गीत को सुनते ही दिल और पाँव दोनों ही थिरकने लगते हैं, मचलने लगते हैं। युं तो चित्रगुप्त ने ज़्यादातर पौराणिक, और स्टंट फ़िल्मों में संगीत दिया हैं, लेकिन समय समय पर उन्होंने कई सामाजिक फ़िल्मों में भी संगीत दिया जिनके संगीत ने ख़ूब व्यापार किया। 'काली टोपी लाल रुमाल' एक ऐसी ही फ़िल्म थी। प्रस्तुत गीत के अलावा लता-रफ़ी का गाया "लागी छूटे ना अब तो सनम" एक बेहद हिट गीत रहा है। आशा-रफ़ी का गाया युगल गीत "ओ काली टोपी वाले तेरा नाम तो बता" गीत से ही कहीं प्रेरीत हो कर ९० के दशक में 'आँखें' फ़िल्म का वह गीत "ओ लाल दुपट्टे वाली तेरा नाम तो बता" तो नहीं बना था? ख़ैर, अब आपको गीत सुनवाते हैं, लेकिन उससे पहले जान लीजिए कि विविध भारती के विशेष जयमाला कार्यक्रम में संगीतकार चित्रगुप्त ने बरसों पहले लता जी के बारे में क्या कहा था। "फ़िल्म संगीत के बारे में कोई भी चर्चा लता मंगेशकर को छुए बिना ख़तम नहीं हो सकती। फ़िल्म संगीत का ये दौर भविष्य में लता मंगेशकर के दौर के नाम से जाना जाएगा। एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि क्या हमारे देश में दो ही प्लेबैक सिंगर्स हैं, लता जी और आशा जी? मैने कहा कि, हाँ, प्लेबैक जगत में ये ही दो सिंगर्स हैं जिनकी आवाज़ हर संगीतकार चाहते हैं अपने गीतों में।" तो दोस्तों, सुनते हैं चित्रगुप्त और लता जी की सुरीली जोड़ी का यह थिरकता मचलता नग़मा।



दग़ा दग़ा वै वै वै
दग़ा दग़ा वै वै वै
हो गई तुमसे उल्फ़त हो गई) \-२
दग़ा दग़ा वै वै वै

यूँ ही राहों में खड़े हैं तेरा क्या लेते हैं
देख लेते हैं जलन दिल की बुझा लेते हैं |-२
आए हैं दूर से हम
तेरे मिलने को सनम
चेकुनम, चेकुनम, चेकुनम

दग़ा दग़ा वै वै वै ...

जान जलती है नज़र ऐसे चुराया न करो
हम ग़रीबों के दुखे दिल को दुखाया न करो |-२
आए हैं दूर से हम
तेरे मिलने को सनम
चेकुनम, चेकुनम, चेकुनम

दग़ा दग़ा वै वै वै ...

हम क़रीब आते हैं तुम और जुदा होते हो
लो चले जाते हैं काहे को ख़फ़ा होते हो |-२
अब नहीं आएँगे हम
तेरे मिलने को सनम
चेकुनम, चेकुनम, चेकुनम

दग़ा दग़ा वै वै वै ...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मनमोहन देसाई का निर्देशन था इस फिल्म में.
२. अभिनेत्री निरूपा राय ने इस धार्मिक फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी.
३. इस युगल गीत के मुखड़े की अंतिम पंक्ति में आपके इस प्रिय जाल स्थल का नाम है.

पिछली पहेली का परिणाम -

दिलीप जी ने एकदम सही कहा, वाकई शरद जी का कोई जवाब नहीं, दुबारा शुरुआत करने के बाद भी शरद जी 20 अंकों पर पहुँच गए हैं...बधाई जनाब. पूर्वी जी जाने कहाँ खो गयी है, पता नहीं उन तक हमारा सन्देश पहुंचा भी है या नहीं

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 3, 2009

दो दिल धड़क रहें हैं और आवाज़ एक है....आशा और तलत ने आवाज़ मिलाई आवाज़ से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 191

गायक मुकेश के बाद आज से हम फ़िल्म संगीत की आकाश के उस सितारे पर एक लघु शृंखला शुरु करने जा रहे हैं जिनकी आवाज़ का जादू हर उम्र के सुनने वालों पर गहराई से हुआ है। दिल की गहराई में आसानी से उतर जाने वाली, हर भाव, हर रंग को उजागर करने वाली ये आवाज़ है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोंसले की। आशा भोंसले की आवाज़ की अगर हम तारीफ़ करें तो शायद शब्द भी फीके पड़ जाये उनकी आवाज़ की चमक के सामने। और यह चमक दिन ब दिन बढ़ती चली गयी है अलग अलग रंग बदल कर, ठीक वैसे जैसे कोई चित्रकार अलग अलग रंगों से अपने चित्र को सुंदरता प्रदान करता चला जा रहा हो! ८ सितंबर को आशा जी का जनम दिन है। इसी को केन्द्र करते हुए आज से अगले १० दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनिए आशा जी के गाए युगल गीतों की एक ख़ास लघु शृंखला '१० गायक और एक आपकी आशा'। इसके तहत हम आप को आशा जी के गाए फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग के १० युगल गीत सुनवाएँगे, १० अलग अलग गायकों के साथ गाए हुए। इसमें हम गायिकाओं को शामिल नहीं कर रहे हैं। 'फ़ीमेल डुएट्स' पर हम भविष्य में एक अलग से शृंखला का आयोजन ज़रूर करेंगे। तो दोस्तों, '१० गायक और एक आपकी आशा' की इस पहली कड़ी में हम ने आशा जी के साथ जिस गायक को चुना है, वो हैं मखमली आवाज़ वाले, हर दिल अज़िज़, अपने तलत महमूद साहब। युं तो आशा जी और तलत साहब ने बहुत से युगल गीत गाए हैं, जिनमें से कुछ जाने कुछ अंजाने रह गये हैं, लेकिन सब से पहले जो दो चार गीत झट से ज़हन में आते हैं, वो हैं फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' के "प्यार पर बस तो नहीं है" और "सच बता तू मुझपे फ़िदा", फ़िल्म 'बड़ा भाई' का "चोरी चोरी दिल का लगाना बुरी बात है", फ़िल्म 'अपसरा' का "है ज़िंदगी कितनी हसीन", फ़िल्म '२४ घंटे' का "हम हाल-ए-दिल तुम से कहना है, कहिए", फ़िल्म 'लैला मजनू' का "बहारों की दुनिया पुकारे तू आजा", फ़िल्म 'लाला रुख़' का "प्यास कुछ और भी भड़का दे झलक दिखला के", फ़िल्म 'मेम साहिब' का "कहता है दिल तुम हो मेरे लिए", फ़िल्म 'बहाना' का "तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में रहने को जी चाहता है", फ़िल्म 'एक साल पहले' का "नज़र उठा के ये रंगीं समा रहे न रहे", इत्यादि। आशा जी और तलत साहब के गाए ऐसे तमाम सुमधुर युगल गीतों के समुंदर में से आज हम ने जिस लोकप्रिय गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'इंसाफ़' का, "दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है"।

फ़िल्म 'इंसाफ़' बनी थी सन् १९५६ में केदार कपूर के निर्देशन में। रावजी यु. पटेल निर्मित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अजीत और नलिनी जयवंत। फ़िल्म में संगीत का बीड़ा उठाया चित्रगुप्त ने और गीत लिखे असद भोपाली साहब ने। युं तो उस साल, यानी कि १९५६ में, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में कई फ़िल्में प्रदर्शित हुईं जैसे कि 'बसंत पंचमी', 'बसरे की हूर', 'जयश्री', 'क़िस्मत', 'तलवार की धनी', और 'ज़िंदगी के मेले', लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली, और ना ही उनका संगीत। अगर कुछ चला तो सिर्फ़ फ़िल्म 'इंसाफ़' का प्रस्तुत गीत, जो आज एक सदाबहार नग़मा बन कर रह गया है। बड़ा ही नाज़ुक गाना है यह, जिसमें असद भोपाली ने मोहब्बत के अहसासों को कुछ इस क़दर शब्दों में पिरोया है कि सुन कर दिल ख़ुश हो जाता है। "रंगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है, एक दर्द सा इधर है, एक दर्द सा उधर है, दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है, नग़में जुदा जुदा है मगर साज़ एक है"। इस गीत के रीदम में चित्रगुप्त जी ने 'वाल्ट्ज़' का प्रयोग किया है। अगर आप 'वाल्ट्ज़' की जानकारी रखते हैं तो आप इसे इस गीत में महसूस कर सकते हैं। और अगर आप को इसका पता नहीं है तो कृपया इन गीतों के रीदम को ज़हन में लाने की कोशिश कीजिए, आप ख़ुद ब ख़ुद महसूस कर लेंगे 'वाल्ट्ज़' के रीदम को। नौशाद साहब ने 'वाल्ट्ज़' को हिंदी फ़िल्मी गीतों में लोकप्रिय बनाया था, इसलिए उन्ही के बनाये कुछ ऐसे गीतों की याद आप को दिलाते हैं, फ़िल्म 'दास्तान' का "त र री त र री....ये सावन रुत तुम और हम", फ़िल्म 'अंदाज़' का "तोड़ दिया दिल मेरा", फ़िल्म 'मेला' का "धरती को आकाश पुकारे", वगेरह। ग़ुलाम मोहम्मद के संगीत में फ़िल्म 'लैला मजनू' का गीत "चल दिया कारवाँ" भी 'वाल्ट्ज़' पर ही आधारित है। और सज्जाद साहब के स्वरबद्ध फ़िल्म 'संगदिल' का गीत "दिल में समा गए सजन, फूल खिले चमन चमन" तथा फ़िल्म 'दोस्त' का "बदनाम मोहब्बत कौन करे" में भी वाल्ट्ज़ का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है। तो दोस्तों, आज हमने आप को 'वाल्ट्ज़' की थोड़ी बहुत जानकारी दी, आइए अब सुनते हैं आज का यह प्रस्तुत गीत आशा भोसले और तलत महमूद की आवाज़ में।



गीत के बोल -

आशा : आ आ... हं हं... आ आ...
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2
तलत : नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दोनों : दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2

तलत: रँगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है \-2
आशा: इक दर्द सा इधर, इक दर्द सा उधर है
तलत: दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है

आशा: तड़पाइये न हमको, शर्माइये न हमसे \-2
तलत: दोनों की ज़िंदगी है एक दूसरे के दम से \-2
आशा: हम दो कहानियाँ हैं मगर राज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये है आशा का गाया एक और दोगाना.
२. साथी गायक हैं "हेमंत कुमार".
३. गीतकार हैं एस एच बिहारी और गीत में "बादलों" के आगे जाने की बात की है.

आज की पहेली के साथ जीतिए १० बोनस अंक
आप के हिसाब से हम और किन ८ गायकों को इस शृंखला में शामिल करने जा रहे हैं। अगर आप ने अगले २० घंटे के भीतर बिल्कुल सही जवाब दे दिया तो आप को मिलेंगे बोनस १० अंक, जो आप को आप के ५० अंक तक जल्द से जल्द पहुँचने में बेहद मददगार साबित होंगे। तो यह सुनहरा मौका है आप सभी के लिए और जो श्रोता 'पहेली प्रतियोगिता' पहले से ही जीत चुके हैं, उन्हे भी हम यह मौका दे रहे हैं कि आप भी इस विशेष बोनस सवाल का जवाब दे सकते हैं, आप के अंक सुरक्षित रहेंगे भविष्य के लिए। तो झट से याद कीजिए सुनहरे दौर के गायकों के नाम, जिनके साथ आशा जी ने गीत गाए हैं और आप को लगता है कि हम उन्ही गायकों को शामिल करने वाले हैं। आज आप तलत महमूद को सुन रहे हैं और कल हेमंत कुमार को सुनेंगे। तो फिर आपने बताने हैं कि बाक़ी के ८ गायकों के नाम कौन कौन से हैं?

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई २० अंकों के साथ अब आप पराग जी के बराबर आ चुकी हैं...सभी साथियों का आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, July 16, 2009

दिल का दिया जला के गया ये कौन मेरी तन्हाई में...संगीतकार चित्रगुप्त ने रचा था इस मधुर गीत को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 143

ज 'ओल्ड इस गोल्ड' में संगीतकार चित्रगुप्त के संगीत की बारी। इससे पहले हमने आप को उनके संगीत से सजी भोजपुरी फ़िल्म 'लागी नाही छूटे राम' का लोक रंग में डूबा एक गीत सुनवाया था। आज का गीत लोक संगीत पर तो आधारित नहीं है लेकिन गीत इतना मधुर बन पड़ा है कि बार बार सुनने को जी चाहता है। लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत है फ़िल्म 'आकाशदीप' का, जिसे लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने। "दिल का दीया जलाके गया ये कौन मेरी तन्हाई में, सोये नग़में जाग उठे होठों की शहनाई में"; पहला पहला प्यार किस तरह से नायिका के नाज़ुक दिल पर असर करती है, उसका बेहद बेहद ख़ूबसूरत वर्णन हुआ है इस कोमल गीत में। मजरूह साहब ने क्या ख़ूब लिखा है कि "प्यार अरमानों का दर खटकाये, ख़्वाब जागी आँखों से मिलने को आये, कितने साये डोल पड़े सूनी सी अँगनाई में"। बोल, संगीत और गायकी के लिहाज़ से यह गीत उत्कृष्ट है, उत्तम है। 'आकाशदीप' फ़िल्म आयी थी १९६५ में फणी मजुमदार के निर्देशन में। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे धर्मेन्द्र, नंदा, निम्मी, अशोक कुमार, और महमूद। इस फ़िल्म में धर्मेन्द्र पर फ़िल्माया गया रफ़ी साहब का गाया "मुझे दर्द-ए-दिल का पता न था मुझे आप किसलिए मिल गये" गीत भी चित्रगुप्त की बेहतरीन रचनायों में गिना जाता है।

चित्रगुप्त जी के बेटे आनंद और मिलिंद ने भी बतौर संगीतकार जोड़ी अच्छा नाम कमाया है फ़िल्म जगत में। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, अपने पिता को याद करते हुए और ख़ासकर 'आकाशदीप' फ़िल्म के गीतों को याद करते हुए मिलिंद जी बताते हैं (सौजन्य: विविध भारती) - "मुझे कई बार याद है, हमारे घर में राईटर्स और म्युज़िक डिरेक्टरस की मीटिंगस हुआ करती थी, खाना वाना भी बनता था। एक दिन स्कूल से आया तो देखा कि बक्शी साहब (आनंद बक्शी) बाहर बैठे हैं, उस समय उन्हे ब्रेक नहीं मिला था। अंदर गया तो देखा कि प्रेम धवन बैठे हैं, दूसरे दिन मजरूह सुल्तानपुरी बैठे थे। लता जी से भी मुलाक़ात हुई, उन्हे हम लता दीदी नहीं बल्कि लता आंटी कहते थे। मेरा नाम 'मिलिंद', जो कि महाराष्ट्रीयन नाम है, लता आंटी ने ही रखा है। पिताजी हमेशा यही कहते थे कि जितना मेलडी पर कन्सेन्ट्रेट करोगे, गाना उतना ही अच्छा बनेगा। हम दोनों ने कुछ बनाकर एक दिन जब उनको सुनाया तो उन्होने कहा कि 'यह आप का कलर है, मेरा नहीं, मैं यही चाहता था कि आप के संगीत में मेरा प्रभाव न पड़े, क्यूंकि समय के हिसाब से आप को चलना है'. उनके बहुत से गानें हम दोनों को पसंद है, लेकिन जो 'फ़र्स्ट थौट' पे याद आ जाते हैं वो हैं "जाग दिल-ए-दीवाना", "मुझे दर्द-ए-दिल का पता न था", और "दिल का दीया जलाके गया"। लताजी के गाये इस गीत के बारे में मिलिंद का कहना है "यह गीत दुर्लभ है क्यूंकि लता आंटी ने इसे 'हस्की टोन' में गाया है, 'हस्की सॊफ़्ट टोन' में। इस तरह से उन्होने बहुत कम गाये हैं, उनके गीत ऊँची 'टोन' में होते हैं। तो यह जो 'हस्की फ़ील' थी, बहुत कमाल की थी।" वाक़ई दोस्तों, लता जी की आवाज़ बड़ा ही अनोखा सुनाई देता है इस गीत में। ख़ास कर जब वो गाती हैं कि "काँपते लबों को मैं खोल रही हूँ" तो सचमुच जैसे काँपते हुए लब हमारी आँखों के सामने आ जाते हैं। लता जी ने अपनी आवाज़ और गायकी के ज़रिए इस गीत में जो अभिनय किया है वो शायद बड़ी बड़ी अभिनेत्रियाँ न कर पाये। सुनिये यह गीत, और इसमे अपनी पसंद के साथ साथ मेरी पसंद भी शामिल कर लीजिए, क्युंकि मुझे यह गीत बेहद बेहद बेहद पसंद है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. इस्मत चुगताई की लिखी कहानी पर आधारित थी ये फिल्म.
2. इस गीत के गायक ने इस फिल्म में अभिनय भी किया था. अभिनेत्री थी नूतन.
3. मुखड़े की पहली लाइन में शब्द है -"बस" (कंट्रोल).

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह पराग जी आखिरकार बाज़ी मार ही ली आपने. ८ अंकों के लिए बधाई. कल शरद जी हमारे चूक गए हम तो ये मान बैठे थे कि हमें हमारा पहला विजेता मिल गया, खैर कल नहीं शरद जी आज सही. कल ओल्ड इस गोल्ड की रौनक लौटी बहुत दिनों बाद, हमारा मतलब स्वप्न मंजूषा जी लौटी. ओल्ड इस गोल्ड की पूरी टीम और आवाज़ परिवार उनके पति के शीघ्र स्वस्थ लाभ की दुआ कर रहा है ताकि मोहतरमा जल्दी से वापस एक्टिव हो जाये. मनु जी अब आप भी थोडी फुर्ती दिखाएँ ज़रा...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, April 21, 2009

लागी नाही छूटे रामा...लता तलत का गाया एक मधुर भोजपुरी गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 58

जकल भारी तादाद में भोजपुरी फ़िल्में बन रही हैं। अगर हम ज़रा इतिहास में झांक कर देखें तो पता चलता है कि भोजपूरी फ़िल्मों का इतिहास भी बड़ा पुराना है। 'लागी नाही छूटे राम' एक बहुत ही मशहूर भोजपुरी फ़िल्म रही है जो सन् १९६३ में बनी थी। यह फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' के साथ साथ रिलीज़ होने के बावजूद भी उत्तर और पूर्वी भारत में सुपरहिट रही। १९७७ की फ़िल्म 'नदिया के पार' भी एक कालजयी भोजपुरी फ़िल्म रही है। एक ज़माने में हिन्दी फ़िल्म जगत की बहुत मशहूर हस्तियाँ भोजपूरी सिनेमा से जुड़ी रही हैं। कुंदन कुमार निर्देशित इस फ़िल्म में नायक बने थे नासिर हुसैन साहब। हिन्दी फ़िल्म जगत के ऐसे दो मशहूर संगीतकार उस ज़माने मे रहे हैं जिनका भोजपुरी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये थे एस. एन. त्रिपाठी और चित्रगुप्त। फ़िल्म 'लागी नाही छूटे राम' में चित्रगुप्त का संगीत था। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी फ़िल्म से एक बहुत ही मीठा गाना हम आपके लिए चुनकर लाए हैं। हमें पूरी पूरी उम्मीद है कि इस गीत को सुनने के बाद यह गीत आपके दिलोदिमाग़ में पूरी तरह से घर कर जाएगा, और इसकी मधुरता एक लम्बे अरसे तक आपके कानों में रस घोलती रहेगी। लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ों में यह है मजरूह सुल्तानपूरी की गीत रचना और यह इस फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है। "जा जा रे सुगना जा रे, कही दे सजनवा से, लागी नाही छूटे रामा चाहे जिया जाये, भयी ली आवारा सजनी, पूछ ना पवनवा से, लागी नाही छूटे रामा चाहे जिया जाये".

बिहार के लोक-संगीत में जो मिठास है, जो मधुरता है, उसका एक छोटा सा उदाहरण है यह गीत। दोस्तों, यह तो हमने आपको बता दिया कि इस गीत के संगीतकार हैं चित्रगुप्त, लेकिन क्या आपको यह पता है कि उनके दो संगीतकार बेटे आनंद और मिलिन्द ने जब फ़िल्म संगीत संसार में क़दम रखा तो अपने शुरूआती दौर की मशहूर फ़िल्म 'क़यामत से क़यामत तक' में एक गीत ऐसा बनाया जो हू-ब-हू इस भोजपूरी गीत की धुन पर आधारित था! अगर याद नही आ रहा तो मैं ही याद दिलाये देता हूँ, वह गीत था अल्का याग्निक का गाया "काहे सताये, काहे को रुलाये, राम करे तुझको नींद न आये"। केवल दो मिनट का वह गाना था और वह भी बिना किसी साज़ों का सहारा लेते हुए। कहिये, याद आ गया ना? तो चलिए पिता-पुत्र की संगीत साधना को सलाम करते हुए सुनते हैं आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। यह गीत मुझे भी बेहद पसंद है!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सी रामचंद्र का एक ट्रेंड सेट्टर गीत.
२. फिल्म का शीर्षक एक वाध्य यंत्र पर है जिसे शादियों में ख़ास तौर पर बजाया जाता है.
३. मुखड़े में शब्द है -"मुर्गी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
बेहद मुश्किल था पर मनु जी आपकी याद्दाश्त को सलाम. एक दम सही पकडा आपने....बहुत बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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