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मंगलवार, 22 सितंबर 2009

ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं....."बख्शी" साहब और "अनवर" की अनोखी जुगलबंदी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४७

मूमन तीन या चार कड़ियों से हमारी प्रश्न-पहेली का हाल एक-सा है। तीन प्रतिभागी (नाम तो सभी जानते हैं) अपने जवाबों के साथ इस पहेली का हिस्सा बनते हैं, उनमें से हर बार "सीमा" जी प्रथम आती हैं और बाकी दो स्थानों के लिए शामिख जी और शरद जी में होड़ लगी होती है। भाईयों बस दूसरे या तीसरे स्थान के लिए हीं होड़ क्यों है, पहले पर भी तो नज़र गड़ाईये। इस तरह तो बड़े हीं आराम से सीमा जी न जाने कितने मतों (यहाँ अंकों) के साथ विजयी हो जाएँगी और आपको बस दूसरे स्थान से हीं संतोष करना होगा। अभी भी ४ कड़ियाँ बाकी हैं (आज को जोड़कर),इसलिए पूरी ताकत लगा दीजिए। इस उम्मीद के साथ कि आज की पहेली में काँटे की टक्कर देखने को मिलेगी, हम पिछली कड़ी के अंकों का खुलासा करते हैं: सीमा जी: ४ अंक, शामिख जी: २ अंक और शरद जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की, तो कमर कस लीजिए। ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) एक शायर जिसने अपने एक मित्र के लिए कहा था "आज तेरी एक नज़्म पढी"। जवाब में उस मित्र ने भी उस शायर से अपना पहचान जन्मों का बताया और कहा "कहीं पहले मिले हैं हम"। शायर के साथ-साथ उसके मित्र का भी नाम बताएँ।
२) एक गायिका जिसके साथ ८ जुलाई १९९० को कुछ ऐसा हुआ कि उसने गायकी से तौबा कर ली। उस गायिका का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि हमने उसकी जो गज़ल सुनवाई थी(साथ में एक और गायक थे), उसे किसने लिखा था?


आज हम जिस गज़ल को लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं, उस गज़ल के गायक को पहचानने में कई बार लोग गलती कर जाते हैं। ज्यादातर लोगों का यह मानना है कि इस गज़ल को मोहम्मद रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ से सजाया है और लोगों का यह मानना इसलिए भी जायज है क्योंकि एक तो आई०एम०डी०बी० पर उन्हीं का नाम दर्ज है और फिर इस गज़ल के गायक की आवाज़ मोहम्म्द रफ़ी साहब से हुबहू नहीं भी तो कमोबेश तो जरूर मिलती है। वैसे बता दें कि यह गज़ल जिस फ़िल्म (हाँ यह गैर-फ़िल्मी रचना नहीं है, लेकिन चूँकि यह गज़ल इतनी खुबसूरत है कि हमें इसे अपनी महफ़िल में शामिल करने का फ़ैसला करना पड़ा) से ली गई है वह रीलिज़ हुई थी १९८४ में और रफ़ी साहब १९८० में सुपूर्द-ए-खाक हो गए थे, इसलिए इस गज़ल के साथ उनका नाम जोड़ना इस तरह भी बेमानी साबित होता है। तो चलिए, हम इतना तो जान गए कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं गाया तो फिर कौन है इसका असली गायक? आप लोगों ने फिल्म "नसीब" का "ज़िंदगी इम्तिहान लेती है" या फिर "अर्पण" का "मोहब्बत अब तिज़ारत बन गई है" तो ज़रूर हीं सुना होगा...तो इस गज़ल को भी उन्होंने हीं गाया है जिन्होने उन गीतों में अपनी आवाज़ की जान डाली थी यानि कि अनवर (पूरा नाम: अनवर हुसैन)। "मेरे ख्यालों की रहगुजर से" - इस गज़ल को लिखा है हिन्दी फिल्मी गीतों के बेताज़ बादशाह "आनंद बख्शी" ने तो संगीत से सजाया है उस दौर की जानी मानी संगीतकार जोड़ी "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" ने। एल०-पी० के बारे में "ओल्ड इज गोल्ड" पर तो बातें होती हीं रहती हैं, इसलिए उनके बारे में हम यहाँ कुछ भी नया नहीं कह पाएँगे। बक्शी साहब के बारे में हम पिछली दो कड़ियों में बहुत कुछ कह चुके हैं। हमें मालूम है कि उतना पर्याप्त नहीं है,लेकिन चूँकि अनवर हमारे लिए नए हैं, इसलिए आज हम इन्हें मौका दे रहे हैं। अनवर का जन्म १९४९ में मुंबई में हुआ था। उनके पिता जी संगीत निर्देशक "गुलाम हैदर" के सहायक हुआ करते थे। अनवर बहुत सारे कंसर्ट्स में गाया करते थे। ऐसे हीं एक कंसर्ट में जनाब "कमल राजस्थानी" ने उन्हें सुना और उन्हें फिल्म "मेरे ग़रीब नवाज़" के लिए "कसमें हम अपनी जान की" गाने का अवसर दिया। कहते हैं कि इस गाने को सुनकर रफ़ी साहब ने कहा था कि "मेरे बाद मेरी जगह लेने वाला आ गया है"। अनवर ने इसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता, हीर-राँझा, विधाता, प्रेम-रोग, चमेली की शादी जैसी फ़िल्मों के लिए गाने गाए। यह सच है कि अनवर के नाम पर बहुत सारे सफ़ल गाने दर्ज हैं लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि रफ़ी साहब की बात सच न हो सकी।

कहा जाता है कि जनता हवलदार और अर्पण के गीतों से मिली अपार लोकप्रियता ने उन्हें न केवल घमंडी बना दिया था, बल्कि वे नशे के आदी भी हो गए थे, इसलिए म्यूजिक डायरेक्टरों ने उनसे किनारा करना शुरू कर दिया। हालांकि अनवर इन आरोपों को सिरे से नकारते हैं। इस बारे में वे कहते हैं(सौजन्य: जागरण): न तो कामयाबी ने मुझे मगरूर बनाया, न ही मैं नशे का आदी हुआ! इसे मेरी बदकिस्मती कह सकते हैं कि तमाम सुरीले गीत गाने के बावजूद प्लेबैक में मेरा करियर बहुत लंबा नहीं खिंच सका! जहां तक मेरे घमंडी और शराबी होने की बात है, तो इसके लिए मैं एक अखबार नवीस को जिम्मेदार ठहराता हूँ। हुआ ये कि एक बार एक मित्र ने हमारा परिचय एक फिल्म पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार से कराया। उसके काफी समय बाद सॅलून में उस पत्रकार से मेरी मुलाकात हुई, तो उन्हें मैं नहीं पहचान सका। बस, इसी बात का उन्हें बुरा लग गया और उन्होंने अपनी पत्रिका में मेरे बारे में अनाप-शनाप लिखना शुरू कर दिया। चूंकि उस दौर में उस पत्रिका का काफी नाम था, इसलिए उस लेख के प्रकाशन के बाद लोगों के बीच मेरी खराब इमेज बन गई। सच बताऊं, तो काफी हद तक उस पत्रकार महोदय ने भी मेरा काफी नुकसान किया। मेरे कैरियर में उतार-चढ़ाव के लिए इन अफवाहों के साथ म्यूजिक इंडस्ट्री में आया बदलाव भी एक हद तक जिम्मेदार है। महेश भट्ट की फिल्म आशिकी ने फिल्म म्यूजिक को एक अलग दिशा दी, लेकिन उसके बाद कॉपी वर्जन गाने वाले गायकों को इंडस्ट्री सिर पर बिठाने लगी और इसीलिए मौलिक गायक हाशिये पर चले गए। ऐसे में मुझे भी काम मिलने में दिक्कत हो रही थी। अच्छे गीत नहीं मिल रहे थे, जबकि विदेशों में शो के मेरे पास कई ऑफर थे। कुछ अलग करने के इरादे से ही मैं कैलीफोर्निया (अमेरिका) चला गया और वहां शो करने लगा। वहां के लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं वहीं का हो गया। मैं व्यवसाय के कारण भले ही अमेरिका में रहता हूं, लेकिन दिल हमेशा अपने देश में ही रहता है। ऐसे में जब यहां के लोग कुछ अलग और नए की फरमाइश करते हैं, तो मन मारकर रह जाता हूं। म्यूजिक कंसर्ट और शो में ही काफी बिजी रहने के कारण मेरी रुचि अब प्लेबैक में नहीं रही। हालांकि अच्छे ऑफर मिलने पर मैं प्लेबैक से इंकार नहीं करूँगा, लेकिन खुद इसके लिए पहल मैं कतई नहीं करने वाला। पहले भी काम मांगने किसी के पास नहीं गया था और आज भी मैं उस पर कायम हूं। हां, यदि पहले की तरह अच्छे गीत मिलें और म्यूजिक डायरेक्टर मेरे साथ काम करना चाहें, तो उन्हें निराश नहीं करूंगा। तो इस तरह हम वाकिफ़ हुए उन घटनाओं से जिस कारण अनवर को फिल्मों में गायकी से मुँह मोड़ना पड़ा। चलिए अब हम आगे बढते हैं आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं। उससे पहले "आनंद बख्शी" का लिखा एक बड़ा हीं खुबसूरत शेर पेश-ए-खिदमत है:

ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है,
तू जो चाहे तो दिन निकलता है तू जो चाहे तो रात होती है।


और यह रही आज़ की गज़ल:

मेरे ख़यालों की रहगुज़र से वो देखिए वो गुज़र रहे हैं,
मेरी निगाहों के आसमाँ से ज़मीन-ए-दिल पर उतर रहे हैं।

ये कैसे मुमकिन है हमनशीनो कि दिल को दिल की ख़बर न पहुंचे,
उन्हें भी हम याद आते होंगे कि जिन को हम याद कर रहे हैं।

तुम्हारे ही दम क़दम से थी जिन की मौत और ज़िंदगी अबारत,
बिछड़ के तुम से वो नामुराद अब न जी रहे हैं न मर रहे हैं।

इसी मोहब्बत की रोज़-ओ-शब हम सुनाया करते थे दास्तानें,
इसी मोहब्बत का नाम लेते हुए भी हम आज डर रहे हैं।

चले हैं थोड़े ही दूर तक बस वो साथ मेरे 'सलीम' फिर भी,
ये बात मैं कैसे भूल जाऊँ कि हम कभी हमसफ़र रहे हैं।


इस गज़ल के "मकते" में तखल्लुस के रूप में "सलीम" को पढकर कई लोग इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि इस गज़ल को किसी "सलींम" नाम के शायर ने लिखा है। लेकिन सच ये है कि "ये इश्क़ नहीं आसान" फिल्म में "ऋषि कपूर" का नाम "सलींम अहमद सलीम" था। अब चूँकि नायक शायर की भूमिका में था, इसलिए उसकी कही गई गज़ल में उसके नाम को "तखल्लुस" के रूप में रखा गया है। यह बात अच्छी तो लगती है, लेकिन हमारे अनुसार ऐसा और कहीं नहीं हुआ। यह तो "बख्शी" साहब का बड़प्पन है कि उन्होंने ऐसा करना स्वीकार किया। क्या कहते हैं आप?



चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

वो मेरा ___ है मैं उसकी परछाई हूँ,
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन....


आपके विकल्प हैं -
a) अक्स, b) सरमाया, c) हमसाया, d) आईना

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "इम्तिहाँ" और शेर कुछ यूं था -

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही,
इम्तिहाँ और भी बाकी हो तो ये भी न सही..

जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर को सबसे पहले सही पकड़ा सीमा जी ने। सीमा जी ने ग़ालिब के शेरों से महफ़िल को खुशगवार बना दिया, लगता है कि आप कई दिनों से ग़ालिब का हीं इंतज़ार कर रहीं थीं। ये रहे आपके पेश किए शेर:

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में यारब
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना (ग़ालिब )

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यों हो (ग़ालिब )

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं (मोहम्मद इक़बाल) यह तो बड़ा हीं मशहूर शेर है...शुक्रिया कि आपने इसे यहाँ रखा।

सीमा जी के बाद महफ़िल में इंट्री हुई शामिख जी की। आपने भी कुछ लुभावने शेर पेश किए। ये रही बानगी:

थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ
दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी (श्रद्धा जी..मतलब कि हमारी दीदी)

इम्तिहाँ से गुज़र के क्या देखा
इक नया इम्तिहान बाक़ी है (राजेश रेड्डी)

यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

इनके बाद महफ़िल में एक तरतीब में हाज़िर हुए शरद जी, शन्नो जी और मंजु जी। आप तीनों के नाम हम एक साथ इसलिए लिखते हैं क्योंकि जब भी स्वरचित शेरों की बात आती है तो आपका हीं नाम आता है। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर(क्रम से):

किसी राह चलती को छेडो न यारो
अभी इस के आगे जहाँ और भी हैं
ये जूतों की बारिश तो है पहली मन्ज़िल
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं । (क्या बात है!! )

कितने ही इम्तहान ले चुकी है जिन्दगी
खुदा जाने और भी कितने बाकी हैं.

जीवन इम्तहाँ का है नाम,
कोई होता फ़ेल तो कोई पास।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे..और आज के एल पी तक...एक सुनहरा अध्याय


३७ लंबे वर्षों तक श्रोताओं को दीवाना बनाकर रखने वाले इस संगीत जोड़ी को अचानक ही हाशिये पर कर दिया गया. आखिर ऐसा क्यों हुआ. ५०० से भी अधिक फिल्में, अनगिनत सुपरहिट गीत, पर फ़िर भी संगीत कंपनियों ने और मिडिया ने उन्हें नई पीढी के सामने उस रूप में नही रखा जिस रूप में कुछ अन्य संगीतकारों को रखा गया. गायक महेंद्र कपूर ने एक बार इस मुद्दे पर अपनी राय कुछ यूँ रखी थी- "उनका संगीत पूरी तरह से भारतीय था, जहाँ लाइव वाद्यों का भरपूर प्रयोग होता था. चूँकि उनके अधिकतर गीत मेलोडी प्रधान हैं उनका रीमिक्स किया जाना बेहद मुश्किल है और संगीत कंपनियाँ अपने फायदे के लिए केवल उन्हीं को "मार्केट" करती हैं जिनके गीतों में ये "खूबी" होती है." ये बात काफ़ी हद तक सही प्रतीत होती है. पर अगर हम बात करें हिट्स की तो किसी भी सच्चे हिन्दी फ़िल्म संगीत के प्रेमी को जो थोड़ा बहुत भी बीते सालों पर अपनी नज़र डालने की जेहमत करें वो बेझिझक एल पी के बारे में यह कह सकेगा - "बॉस" कौन था मालूम है जी...

चलिए इस बात को कुछ तथ्यों के आधार पर परखें -

हिन्दी फिल्मों कि स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने एल पी के संगीत निर्देशन में सबसे अधिक (करीब ७००) गीत गाये. कुछ ऐसा था ये गठबंधन कि जैसे एल पी जानते हो कि क्या जचेगा लता जी की आवाज़ में और लता दी भी समझती हों कि क्या है एल पी के किसी ख़ास गीत के गहरे छुपे भाव. तभी तो इस टीम ने सालों साल एक से बढ़कर एक गीत दिए, वो भी विविधता से भरे हुए, बानगी देखिये "अखियों को रहने दे" (बॉबी), "एक प्यार का नग्मा है" (शोर), "जाने क्यों लोग.."(महबूब की मेहंदी), "चलो सजना" (मेरे हमदम मेरे दोस्त), गुडिया (दोस्ती)....ये सूची बहुत बहुत लम्बी है. बहरहाल तर्क ये है कि लता दी की आवाज़ का हर रंग हर रूप देखा दुनिया ने, एल पी के निर्देशन में.

गायक/गायिका की मार्केट पोजीशन से अलग हट कर वो ये देखते थे कि उनके गीतों पर किसकी आवाज़ जचेगी. रफी साहब एक "सूखे" दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उन्हें "अमर अकबर अन्थोनी" का सुपर हिट गीत "परदा है परदा" दिया. इसी फ़िल्म में उन्होंने हिन्दी फिल्मों के चार सबसे बड़े गायकों को एक साथ गवाया. "हम को तुमसे..." गीत में लता के साथ स्वर मिलाया रफी साहब, किशोर दा और मुकेश के स्वरों ने. मुकेश साहब भी अपने कैरियर के मुश्किल दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उनसे "मिलन" के गीत गवाए, जिसके लिए उन्हें फ़िल्म के निर्माता -निर्देशक को बहुत समझाना-मनाना भी पड़ा था.

फ़िल्म फेयर पुरस्कारों की बात करें तो एल पी ने ये सम्मान ७ बार जीता. जिसमें ४ बार लगातार (१९७७ से १९८० तक) इस सम्मान के विजेता होने का रिकॉर्ड भी है. बहुत सी "बी" ग्रेड और गैर सितारों से सजी फिल्मों को भी उन्होंने अपने संगीत के दम पर उंचाईयां दी. यहाँ तक कि इंडस्ट्री के दो बड़े गायकों (मोहम्मद रफी और किशोर कुमार) पर बिना निर्भर रहे भी उन्होंने "रोटी कपड़ा और मकान","बॉबी", "एक दूजे के लिए", "हीरो", "उत्सव", और "सुर संगम" जैसी फिल्मों में ढेरों हिट गीत दिए. पर बड़े गायकों में भी उन्होंने एक सामंजस्य बनाये रखा गीतों की संख्या के मामले में रफी साहब ने लगभग ३७० गीत गाये तो किशोर दा ने करीब ३९९ गीतों को आवाज़ दी उनके संगीत निर्देशन में. आशा जी ने २५० गीत गाये तो मुकेश ने ८० गीतों में योगदान दिया. हेमंत कुमार, मन्ना डे, तलत महमूद, महेंद्र कपूर से लेकर सुरेश वाडकर, मनहर उधास, पंकज उधास, सुदेश भोंसले, सोनू निगम, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति, अलका याग्निक, साधना सरगम, अनुराधा पौडवाल, सुखविंदर, अलीशा, उदित नारायण, रूप कुमार राठोड.... कौन सा ऐसा गायक है जिसे उन्होंने मौका नही दिया और जिसने उनके संगीत निर्देशन में गाकर ख़ुद को खुशकिस्मत न महसूस किया हो.

एल पी की कमियाबी का सबसे बड़ा राज़ था, उत्कृष्ट आपसी समन्वय, काम का उचित बंटवारा, एक दूसरे के काम में दखल न देने की आदत, सरल और गुनगुनाने लायक धुन, अकॉस्टिक वाद्यों का अधिक इस्तेमाल, इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों का भी सही मात्र में उपयोग, और इन सब से बढ़कर दोनों की भारतीय और पाश्चात्य संगीत की और वाद्यों की विशाल और विस्तृत जानकारी. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे और लक्ष्मी प्यारे से एल पी, संगीत का एक विशाल अध्याय है ये सफर जिसकी शुरूआती कहानी भी कम दिलचस्प नही है, जिसका जिक्र हम करेंगें कल साथ ही आपको मिलवायेंगें प्यारेलाल जी से,फिलहाल सुनते हैं एल पी के कुछ और यादगार नग्में.





सोमवार, 8 दिसंबर 2008

निर्माता-निर्देशकों के लिए सफलता की गैरंटी था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत


बात होती है सदी के नायक की, नायिका की, पर अगर हम बात करें बीती सदी के सबसे सफलतम संगीतकार की, तो बिना शक जो नाम जेहन में आता है वो है - संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का. १९६३ में फ़िल्म "पारसमणी" से शुरू हुआ संगीत सफर बिना रुके चला अगले चार दशकों तक. बदलते समय के साथ ख़ुद को बदलकर हर पीढी के मिजाज़ को ध्यान में रख ये संगीत के महारथी चलते रहे अनथक और लिखते रहे निरंतर कमियाबी की नयी इबारतें. पल पल रंग बदलती, हर नए शुक्रवार नए रूप में ढलती फ़िल्म इंडस्ट्री में इतने लंबे समय तक चोटी पर अपनी जगह बनाये रखने की ये मिसाल लगभग असंभव सी ही प्रतीत होती है. और किस संगीतकार की झोली में आपको मिलेंगी इतनी विविधता. शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत, लोक गीतों में ढले ठेठ भारतीय गीत, पाश्चात्य संगीत में बसे गीत, भजन, मुजरा, डिस्को -जैसा मूड वैसा संगीत, और वो भी सरल, सुमधुर, "कैची" और "क्लास".परफेक्शन ऐसा कि कोई ढूंढें भी तो कोई कमी न मिले. आम आदमी की जुबान पर तो उनके गीत यूँ चढ़ जाते थे जैसे बस उन्हीं के मन की धुन हो कोई. मेलोडी ही उनके गीतों की आत्मा रही. सहज धुन में सरल सी बात और संयोजन (जो अमूमन प्यारेलाल जी का होता था) सौ प्रतिशत बेजोड़.

३७ सालों तक उनका नाम रजत पटल पर इस शान से आता था जैसे उनका संगीत ही फ़िल्म का तुरुप का इक्का हो, कभी कभी तो फ़िल्म के निर्माता नायक नायिका से बढ़कर इस बात का प्रचार करते थे कि फ़िल्म में संगीत एल पी का है. वो एक ऐसा नाम थे जो सफलता की गैरंटी का काम करते थे. तभी तो हर नए पुराने निर्माता निर्देशकों की वो पहली पसंद हुआ करते थे. शायद ही कोई ऐसा बड़ा बैनर हो फ़िल्म जगत में जिनके साथ उनका रिश्ता न जुडा हो. राजश्री फ़िल्म, राज खोंसला, राज कपूर, सुभाष घई, जे ओम् प्रकाश, मनमोहन देसाई, मोहन कुमार, मनोज कुमार आदि केवल कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनके साथ एल पी का बेहद लंबा और बेहद कामियाब रिश्ता रहा है. अब ज़रा इस सूची में शामिल निर्देशकों की फिल्मों पर एक नज़र डालते हैं -

राज खोंसला ने एस डी, ओ पी नय्यर और रवि के साथ काम करने के बाद फ़िल्म "अनीता" में पहले बार एल पी को आजमाया. सामाजिक विषयों पर फ़िल्म बनाने वाले राज ने "मेरा गाँव मेरा देश", "मैं तुलसी तेरे आंगन की", "दो रास्ते" और "दोस्ताना" जैसी फिल्में बनायीं जिनके लिए एल पी तुम बिन जीवन, सोना ले जा रे, हाय शरमाऊं, ये रेशमी जुल्फें, बिंदिया चमकेगी, दिल्लगी ने दी हवा, जैसे सरल और मिटटी से जुड़े गीत दिए. राज खोंसला ने एक बार एक सभा में कहा था कि यदि आपके पास एल पी है तो आपको और कुछ नही चाहिए. सदी के सबसे बड़े शो मैन कहे जाने वाले राज कपूर ने शंकर जयकिशन के साथ बहुत लंबा सफर तय किया. पर एक समय ऐसा भी आया जब राज साहब की महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की असफलता के बाद पहली बार राज साहब अपनी नई फ़िल्म "बॉबी" को लेकर शंकित थे. फ़िल्म नई पीढी को टारगेट कर बनाई जानी थी तो संगीत में भी उस समय का "फील" मिलना चाहिए था. राज साहब ने चुनाव किया एल पी का, जो उनका सबसे बढ़िया निर्णय साबित हुआ. फ़िल्म का एक एक गीत श्रोताओं के दिलो जहेन पर छा गया. ज़रा गौर फरमायें फ़िल्म इन गीतों में बसे मुक्तलिफ़ रंगों की. एक ही फ़िल्म में बुल्ले शाह का सूफी अंदाज़ "मैं नई बोलना", मस्ती भरा शोख "हम तुम एक कमरे में बंद हो", युवाओं की बोलचाल वाला "मुझे कुछ कहना है", गोवा के संगीत का जायका "गे गे गे साहिबा", पहली मोहब्बत का पहला सरूर "मै शायर तो नही" और टूटे दिल की दर्द भरी सदा "अखियों को रहने दे". क्या नही दिया उस फ़िल्म में एल पी ने. राज साहब के साथ फ़िर आई "सत्यम शिवम् सुन्दरम" और "प्रेम रोग" दोनों ही बेहद अलग कैनवस की फ़िल्म थी और देखिये वहां भी बाज़ी मार गए एल पी हर बार की तरह.

फ़िल्म "दोस्ती" से शुरू हुआ राजश्री फिल्म्स के साथ उनका सफर ८ सालों तक चला. कुछ लोग मानते हैं कि इस बैनर के साथ एल पी हमेशा अपना "सर्वश्रेष्ट" काम दिया. जे ओम् प्रकाश की रोमांटिक फिल्मों के लिए उन्होंने ऐसा समां बांधा कि आज भी संगीत प्रेमी उन फिल्मों में लता रफी के गाये दोगानों के असर से मुक्त नही हो पाये. मनोज कुमार की देशभक्ति और भावनाओं से ओत प्रेत फिल्मों (शोर, रोटी कपड़ा और मकान, और क्रांति) के लिए एल पी ने एक प्यार का नग्मा, पानी रे पानी, महंगाई मार गई, जिन्दगी की न टूटे लड़ी जैसे आम आदमी के मन को छूने वाले गीत दिए. तो वहीँ सुभाष घई की फिल्में जो बहुत बड़े स्तर पर निर्मित होती थी और जहाँ संगीत में मेलोडी की गुंजाईश बहुत होती थी वहां भी एल पी अपना भरपूर जलवा दिखाया. "हीरो", "मेरी ज़ंग", और "खलनायक" में उनका फॉर्म जबरदस्त रहा तो वहीँ "क़र्ज़" में घई को आर डी के फ्लेवर का संगीत चाहिए था और उन्हें शक था कि क्या एल पी एक पॉप सिंगर के जीवन पर आधारित इस विषय में जहाँ संगीत का सबसे अहम् रोल था, न्याय कर पायेंगें या नही. पर एल पी सारे कयासों को एक तरफ़ कर "ओम् शान्ति ओम्", "पैसा ये पैसा", जैसे थिरकते गीत दिए तो रफी साहब के गाये "दर्दे दिल" के साथ पहली बार उन्होंने ग़ज़ल को पाश्चात्य फॉर्म में ढाल कर दुनिया के सामने रखा. "एक हसीना थी..." (ख़ास तौर पर वो गीटार का पीस)को क्या कोई संगीत प्रेमी कभी भूल सकता है. इस मूल गीत को आज भी सुनें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. (किशोर दा को भी सलाम).

फार्मूला फिल्मों के शिल्पी मनमोहन देसाई की नाटकीय फिल्मों में भी एल पी का संगीत पूरे शबाब पर दिखा. तो मोहन कुमार की फिल्में तो कह सकते हैं कि उनके संगीत के बल पर ही आज तक याद की जाती हैं. इसके अलावा भी एल पी ने महेश भट्ट, रामानंद सागर, यश चोपडा, बी आर चोपडा, फिरोज खान, जे पी दत्ता, जैसे निर्देशकों के साथ भी लाजावाब काम किया. दक्षिण के निर्देशकों की भी वही पहली पसंद रहे हमेशा. एल वी प्रसाद से लेकर टी रामाराओ तक जिस किसी ने भी उनका साथ थामा वो उन्ही के होके रह गए...ऐसा कौन सा जादू था एल पी के संगीत में, ये हम आपको बताएँगे इस शृंखला की अगली कड़ी में. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इन यादगार नग्मों की बाँहों में.




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