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Saturday, June 4, 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 44 - 'उषा मंगेशकर से ट्विटर पर छोटी सी मुलाक़ात और उनके गाये चंद असमीया फ़िल्मी गीत'

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, शनिवार विशेषांक के साथ मैं, आपका दोस्त सुजॉय, हाज़िर हूँ। पिछले दिनों 'हिंद-युग्म' नें मुझे 'लोकप्रिय गोपीनाथ बार्दोलोई हिंदी सेवी सम्मान' से जब सम्मानित किया था, तो मेरी ख़ुशी की सीमा न थी। यह ख़ुशी सिर्फ़ इस बात की नहीं थी कि मैं पुरस्कृत हो रहा था, बल्कि इस बात की भी थी कि यह पुरस्कार उस महान शख़्स के नाम पर था जो उसी जगह से ताल्लुख़ रखते थे जहाँ से मैं हूँ। जी हाँ, आसाम की सरज़मीं। आसाम, जहाँ मेरा जन्म हुआ, जहाँ से मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की, और जहाँ से मेरी नौकरी जीवन की शुरुआत हुई। उस रोज़ मैं उस पुरस्कार को ग्रहण करते हुए यह सोच रहा था कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिये मुझे यह पुरस्कार दिया गया है, तो क्यों न 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक विशेषांक असमीया फ़िल्म संगीत को लेकर की जाये! तभी मुझे याद आया कि पिछले साल, जून के महीने में, जब तीनों मंगेशकर बहनों का ट्विटर पर आगमन हुआ, उस वक़्त मैंने लता जी और उषा जी से कुछ सवाल पूछे थे, जिनमें से कुछ के उन दोनों ने जवाब भी दिये थे। आपको याद होगा लता जी से की हुई बातचीत को हमनें इसी साप्ताहिक स्तंभ में प्रस्तुत किया था। आइए आज उषा जी से की हुई बातचीत की चर्चा करते हैं।

दोस्तों, फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर में लता जी और आशा जी सूरज और चांद की तरह चमक रहे थे। ऐसे में दूसरी प्रतिभा-सम्पन्न गायिकाओं की आवाज़ें भी टिमटिमाते तारों की तरह कहीं खो सी जा रही थी। जो गायिकाएँ इसी राह पर संघर्ष करती रहीं, उनकी यात्रा ज़्यादा दूर तक नहीं तय हो सकी। और जिन गायिकाओं नें अपने रुख़ को प्रादेशिक फ़िल्म संगीत की तरफ़ मोड़ लिया, उनमें से कई आवाज़ें प्रादेशिक जगत में चमक उठीं। और इन्हीं आवाज़ों में एक आवाज़ लता और आशा की ही बहन उषा की थी। जी हाँ, उषा मंगेशकर नें मराठी फ़िल्मों में तो बेशुमार सफल गीत गाये ही, साथ ही नेपाली और असमीया गीतों की भी लिस्ट काफ़ी लम्बी है। आइए आज उषा जी के गाये कुछ बेहद लोकप्रिय असमीया गीतों की चर्चा करें और उन्हें सुनें।

गीत - सिनाकी मूर मोनोर मानूह (फ़िल्म: खोज)


फ़िल्म 'खोज' का यह एक हॉंटिंग् नंबर था, जिसमें संगीत था डॉ. भूपेन हज़ारिका का। इस गीत के लिये उषा जी को आसाम सरकार प्रदत्त पुरस्कार भी मिला था। उषा जी के गाये असमीया गीतों की सफलता का राज़ है उनका असमीया उच्चारण जो आसाम के लोगों तक को भी हैरत में डाल देता था। भूपेन दा ही वो संगीतकार थे जिन्होंने उषा जी से ही नहीं, बल्कि लता जी और आशा जी से भी असमीया फ़िल्मों के गीत गवाये। लता जी से फ़िल्म 'एरा बाटोर सुर' में तथा आशा जी से 'चिकमिक बिजुली' में गवाये गीत बेहद लोकप्रिय रहे। उषा जी पर वापस आते हैं, ये रहा मेरा पहला ट्वीट उषा जी के नाम:

soojoi_india@ushamangeshkar उषा जी, नमस्कार! आपको ट्विटर में देख कर बहुत अच्छा लग रहा है। मैं आसाम का रहने वाला हूँ, और आपनें असमीया में बहुत सारे गीत गाये हैं। मुझे आपके तमाम असमीया गीत बहुत पसंद हैं, जैसे कि "सिनाकी मूर मोनोर मानूह", "पौलाखोरे रौंग", और 'चमेली मेमसाब', 'अपरुपा' और 'मोन प्रोजापोती' के गानें भी।

इसके जवाब में उषा जी नें लिखा:

ushamangeshkar@soojoi_india I love Assam, the Assamese people & Assamese music tremendously! Bhupen da is one of my all-time favourite composers! (मैं आसाम से प्यार करती हूँ, मुझे आसाम के लोगों से बहुत प्यार है और असमीया संगीत मेरे दिल के बहुत करीब है! भूपेन दा मेरे पसंदीदा संगीतकारों में से हैं।)

तो दोस्तों, इसी बात पर आइए उषा जी और भूपेन दा के संगम से उत्पन्न एक और असमीया गीत सुनते हैं। यह है सुपरहिट फ़िल्म 'चमेली मेमसाब' का सुपरहिट गीत जो आधारित है आसाम के चाय-बागानों के लोक-संगीत पर।

गीत - औख़ोम देख़ौर बागीसार सोवाली (फ़िल्म: चमेली मेमसाब)


फ़िल्म 'चमेली मेमसाब' को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और भूपेन हज़ारिका को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इस फ़िल्म में दो और गीत उषा जी के ख़ूब मशहूर हुए थे - "जौबोनेर अंगनाय उड़े गेन्दाफूल गो", जिसे उन्होंने भूपेन हज़ारिका के साथ मिल कर गाया था और दूसरा गीत उनका एकल था "सुटु हौये ओ नगर..."। ख़ैर, आगे मैंने उषा जी को यह ट्वीट किया:

soojoi_india@ushamangeshkar उषा जी, 'चमेली मेमसाब' और 'खोज' फ़िल्मों के अलावा आपनें भूपेन दा के साथ और भूपेन दा के लिये फ़िल्म 'पौलाखोरे रौंग' में भी गाया था। मैं आपको बताना चाहूँगा कि इस फ़िल्म का शीर्षक गीत आज भी आकाशवाणी के गुवाहाटी केन्द्र से प्रसारित फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम 'कल्पतरु' में आये दिन बजता रहता है, और लोग आज भी बड़ी तादाद में इस गीत की फ़रमाइश भेजते हैं।

उषा जी का जवाब था:

ushamangeshkar@soojoi_india Yes, it's a beautiful song. I sang it under Bhupenda's personal supervision. (हाँ, यह एक सुंदर गीत है। मैंने इसे भूपेन दा की निजी देखरेख में रह कर गाया था।)

दोस्तों, ज़रा आप भी तो सुनिये इस ख़ूबसूरत गीत को।

गीत - पौलाखोरे रौंग (फ़िल्म: पौलाखोरे रौंग)


उषा जी से असमीया गीतों के संदर्भ में और आगे बातचीत तो नहीं हो सकी, और आजकल वो ट्विटर पर ज़्यादा सक्रीय भी नहीं हैं, इसलिये मुझे इतने से ही संतुष्ट होना पड़ा। लेकिन उनके गाये हुए गीतों का ख़ज़ाना तो हमारे पास है न! उषा जी के गाये तीन गीत हमनें सुनें तीन अलग अलग फ़िल्मों से। एक और गीत मैं आपको सुनवाऊँगा, लेकिन उससे पहले उषा जी और भूपेन दा की कुछ बातें हो जाये! भूपेन हज़ारिका नें उषा मंगेशकर को केवल असमीया फ़िल्मों में ही नहीं, अपनी हिंदी फ़िल्म 'एक पल' में भी गवाया था। भूपेन्द्र और उषा जी के साथ भूपेन दा नें इस फ़िल्म के गीत "ज़रा धीरे ज़रा धीमे लेके ज‍इहो डोली" में अपनी आवाज़ मिलायी थी। हिंदी में उनकी संगीतबद्ध पहली फ़िल्म 'आरोप' (१९७४) में उन्होंने आशा भोसले और उषा मंगेशकर से एक डुएट गवाया था "सब कुछ मिला" जो एक क्लब शैली का गीत था। कहा जाता है कि लता मंगेशकर नें ही उषा को भूपेन दा से मिलवाया था जब वो उनके लिये 'एरा बाटोर सुर' फ़िल्म के लिये "जोनाकोरे राती" गीत गा रही थीं। फिर उषा जी से पहली मुलाक़ात में ही भूपेन दा नें उन्हें कुछ असमीया गीत गाने का न्योता दे दिया और उषा जी नें यह मौका हाथों हाथ ग्रहण किया।

अभी कुछ वर्ष पहले, साल २००८ में उषा मंगेशकर को आसाम के नगाँव में आयोजित 'नाट्यप्रबर शिल्पप्राण' के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में निमंत्रित किया गया था। आसाम के प्रति उनके अगाध प्रेम की वजह से उन्होंने यह आतिथ्य ग्रहण की, और अपनी भाषण में उन्होंने आसाम और वहाँ के लोगों के साथ उनके "ईमोशनल क्लोज़नेस' का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि असमीय संस्कृति बहुत ही उच्च श्रेणी की है और वो चाहती हैं कि इसका सही तरीके से संरक्षण हो। उन्होंने इस राह में नई पीढ़ी को सामने आने का आहवान किया। उसी भाषण में उन्होंने अपने बीते दिनों को याद किया कि किस तरह से उन दिनों भूपेन दा नें उन्हें और उनकी दीदी लता जी को असमीया गीत सिखाया करते थे। अंत में उन्होंने अपनी मशहूर असमीया गीत "सिनाकी सिनाकी मूर मोनोर मानूह" गा कर उपस्थित जनता को मंत्रमुग्ध कर दिया।

अपनी उस आसाम यात्रा में कार्यक्रम ख़त्म हो जाने के बाद वह रात उन्होंने नगाँव के सर्किट हाउस में बितायी। रात्री भोज में जब उन्हें उनकी पसंदीदा व्यंजन "कालदिलोर तरकारी" परोसा गया तो वो एक बार फिर से बीते समय में पहुँच गईं। उन्होंने कहा कि बिलकुल वही भोजन उन्होंने भूपेन दा के साथ कई साल पहले किया था, जिसमें था टमाटर और नींबू में बनी खट्टी मछली। इसलिए जब अगले दिन वो काज़ीरंगा गईं तो वहाँ पर उनके इसी मनपसंद मछली से उनका स्वागत किया गया। काज़ीरंगा जाते समय वो केलीडेन चाय बागान में भी गईं और चाय-पत्ती निर्माण की समस्त पद्धतिओं से अपने आप को अवगत किया। चाय बागान में सैर करते हुए वो गुनगुना उठीं "औख़ोम देख़ोर बागीसार सोवाली... लोक्स्मी नौहौय मोरे नाम सामेली" ('चमेली मेमसाब' फ़िल्म का यह गीत चायबागान के पार्श्व पर बना था)। वापस जाते समय उन्होंने पत्रकारों को बताया कि उनकी दिली तमन्ना है कि अपने गाये असमीया गीतों को वो एक ऐल्बम के रूप में फिर से रेकॉर्ड करें। और दोस्तों, हम भी उषा जी को इस मिशन के लिये शुभकामनाएँ देते हुए यहाँ पर उनका गाया एक और असमीया फ़िल्मी गीत सुनते हैं। इस बार सुनिये फ़िल्म 'राधापुरोर राधिका' से यह मशहूर गीत।

गीत - राधाचुड़ार फूल (फ़िल्म: राधापुरोर राधिका)


तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष', जिसमें हमनें पार्श्व-गायिका उषा मंगेशकर के गाये असमीया गीतों का आनंद लिया और आसाम से उनके जुड़ाव के बारे में जाना। आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसंद आई होगी, ज़रूर लिखिएगा, अब आज के लिये अनुमति दीजिये, नमस्कार!

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