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Sunday, August 16, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और आपकी पसंद के गीत (13)

"है नाम ही काफी उनका और क्या कहें, कुछ लोग तआर्रुफ के मोहताज नहीं होते" गुलजार उन्ही चंद लोगों में से एक हैं जिन्हें किसी परिचय की जरुरत नहीं है. गुलज़ार एक ऐसा नाम है जो उत्कृष्ट और उम्दा साहित्य का पर्याय बन गया है. आज अगर कही भी गुलज़ार जी का नाम आता है लोगों को विश्वास होता है कि हमें कुछ बेहतरीन ही पढ़ने-सुनने को मिलेगा. आवाज हो या लेखन दोनों ही क्षेत्रों में गुलजार जी का कोई सानी नहीं. गुलजार लफ्जों को इस तरह बुन देते है कि वो आत्मा को छूते हैं. शायद इसीलिए वो बच्चों, युवाओं और बूढों में समान रूप से लोकप्रिय है. गुलज़ार जी का स्पर्श मात्र ही शब्दों में प्राण फूँक देता है और ऐसा लगता है जैसे शब्द किसी कठपुतली की तरह उनके इशारों पर नाचने लगे है. उनकी कल्पना की उडान इतनी अधिक है कि उनसे कुछ भी अछूता नहीं रहा है. वो हर नामुमकिन को हकीकत बना देते हैं. उनके कहने का अंदाज बिलकुल निराला है. वो श्रोता और पाठक को ऐसी दुनिया में ले जाते है जहां लगता ही नहीं कि वो कुछ कह रहे है ऐसा प्रतीत होता है जैसे सब कुछ हमारे आस-पास घटित हो रहा है. कभी-कभी सोचती हूँ, गुलजार जी कोई एक व्यक्ति नहीं वरन उनमें कई गुलज़ार समाये हुए हैं. उनके बारे में कुछ कहने में शब्द कम पड़ जाते है. गुलजार जी के शब्द और आवाज ही उनकी पहचान है. जिसके कान में भी एक बार गुलजार जी के लेखनी से निकले शब्द और आवाज पड़ते है वो उनके बारे में जानने के लिए बेचैन हो उठता है. जब गुलज़ार जी इतने श्रेष्ठ हैं तो जाहिर है उनके चाहने वाले भी ऐसे-वैसे नहीं होंगे. आइये अब में आपको गुलज़ार जी के ऐसे रसिया जी से मिलाती हूँ जिनका परिचय गुलज़ार जी से सबसे पहले उनके शब्दों द्वारा हुआ था. मैं बात कर रही हूँ हमारे साथी विश्व दीपक तनहा जी की, जो गुलज़ार जी द्वारा लिखे शब्दों के वशीभूत होकर ही गुलज़ार जी तक पहुचे थे. चलिए उनकी कहानी उन्हीं ही जुबानी जान लेते है. ....

"गुलजार जी से मेरी पहली पहचान फिजा फिल्म के गीतों से हुई. पहली बार इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उनके लिखे गीत तो मैंने पहले भी सुने थे लेकिन तब मैं उनके नाम से परिचित नहीं था. चूँकि आठवीं कक्षा से हीं मैने लिखना शुरू कर दिया था इसलिए शब्दों की अहमियत जानने लगा था। अच्छे शब्द पसंद आते थे। विविधभारती पर जो भी गाना सुनता, हर बार यही कोशिश रहती कि गाने का अर्थ जानूँ। ऐसा हीं कुछ हुआ जब मैने "फ़िज़ा" फिल्म गाना का "आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में" सुना, उदित नारायण और अल्का याज्ञिक की आवाज़ों के अलावा जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था शब्दों का प्रवाह। "चल रोक लें सूरज छिप जाएगा, पानी में गिर के बुझ जाएगा" - गीत के बोलों ने मुझे झकझोर दिया और मैं इसी सोच में रहने लगा की आखिर कोई इस तरह का कैसे सोच सकता है। इस गाने की कशिश मुझे सिनेमा हाल तक खींच ले गयी, इसी फिल्म के एक और गीत "मैं हवा हूँ फ़िज़ा हूँ जमीं की नहीं..... मैंने तिनके उठाए हुए हैं परों पे, आशियाना नहीं है मेरा....फ़िज़ा" ने मुझे अन्दर तक छू लिया. मुझे फिल्म के गीतकार के बारे में जानने की एक धुन लग गयी. फिल्म देखकर लौटने के बाद उसी शाम कैसेट की दुकान पर जाकर कैसेट कवर का मुआयना किया तो पता चला कि इन साहब के कई गाने तो मैंने पहले भी सुने हैं. धीरे-धीरे यादों की गलियों से "छैंया-छैंया", "दिल से" ," ऐ अजनबी", "सतरंगी रे", "चप्पा-चप्पा चरखा चले", "छोड़ आए हम वो गलियाँ" और भी न जाने कितने सारे गाने जो मेरे हमेशा से हीं खास रहे हैं की , मधुर गूँज सुनाई देने लगी । लेकिन तब इनके गीतकार का नाम मुझे नहीं पता था, लेकिन वो अजनबी आज अपना-सा लगने लगा था. फिर तो मैने गुलजार जी के लिखे पुराने गानों की तरफ़ रूख किया। गुलजार जी के प्रति मेरी जानकारी का दायरा तब और बड़ा जब १२वीं के बाद मैं पटना की गलियों में दाखिल हुआ । उस दौरान बंदिनी का "मोरा गोरा रंग लेई ले" सुना तो बड़ा हीं आश्चर्य लगा कि एक पंजाबी शायर( कवि या गीतकार भी कह सकते हैं) ब्रज भाषा के आसपास की किसी भाषा में भी इतना खूबसूरत लिख सकता है, फिर कहीं पढा कि यह गाना उनका पहला गाना है (हाल हीं में अंतर्जाल पर यह पढने को मिला था कि यह उनका पहला गाना नहीं है, लेकिन चूँकि ज्यादातर लोग इस गाने को हीं उनका पहला गाना मानते हैं इसलिए मेरी भी अब तक यही मान्यता है) । गुलज़ार जी के एक अन्य गीत "मेरा कुछ सामना तुम्हारे पास पड़ा है" से मुझे और बारीकियां जानने को मिली फिर क्या था मैं खुद को गुलज़ार जी का प्रशंसक बनने से रोक नहीं पाया। मानो मेरे गुलज़ार-प्रेम को पंख लग गए। इंटरनल लैन(LAN) पर सारे गाने और सारी जानकारियाँ आसानी से उपलब्ध हो जाने लगीं । फिर तो मैने उनके लिखे सारे हीं गानों को खंगाल डाला। (इस प्रेम का एक कारण यह भी था कि उसी दौरान मैने भी प्रेम के कुछ स्वाद चखे थे..... ) उसके आगे का क्या कहूँ, तब से उनके प्रति मेरी दीवानगी चलती हीं आ रही है। अब तो मैने उनको सुनने के साथ-साथ उनको पढना भी शुरू कर दिया है। "रात पश्मीने की", "पुखराज" , "मिर्ज़ा ग़ालिब" ये तीन किताबें अब तक मैने पढ ली हैं और बाकियों को अंतर्जाल पर पढता हीं रहता हूँ। लेकिन कोशिश यही है कि धीरे-धीरे उनकी सारी किताबें मेरे दराज में मौजूद हो जाएँ।
मुझे मालूम है कि "गुलज़ार" साहब की झोली में एक से बढकर एक कई सारे गाने हैं लेकिन चूँकि "आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में..... आजा माहिया" वह गीत है जिसने मुझे गुलज़ार-जगत से रूबरू कराया , इसलिए मैं आज के दिन उसी गाने को सुनना पसंद करूँगा
।"

देखा दोस्तों गुलज़ार जी की लेखनी का जादू विश्व दीपक जी क्या हम भी उस जादू से बंधे हैं. चलिए अब मैं भी आपकी पसंद पूरी करने वाली छडी घुमाती हूँ और सुनवाती हूँ आपका पसंदीदा गीत...

आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में



गुलजार जी की बात जहां हो वो महफिल उनके जिक्रभर से ही चमक उठती है. उनके लिए तो "कायनात में लफ्ज ही नहीं तारीफ ये भी तो कुछ कम ही है" यह बोल निकलते हैं. गुलज़ार जिस तरह से शब्दों से खेलते है वो कोई और नहीं कर सकता इसीलिए हर शख्स उनका मुरीद हो जाता है. गुलज़ार की लेखनी से घायल एक और दीवानी की बात करते हैं. ये हैं हमारी महफिल की साथी रंजना जी. रंजना जी गुलज़ार जी के प्रति कुछ इस तरह से अपने भावों को बयाँ करती है......

"इतने लोगो में ,कह दो आंखो को
इतना ऊँचा न ऐसे बोला करे
लोग मेरा नाम जान जाते हैं !!

अब इतने कम लफ्जों में इस से ज्यादा खूबसूरत बात गुलजार जी के अलावा कौन लिख सकता है. उन्होंने अपनी कही नज्मों में गीतों में ज़िंदगी के हर रंग को छुआ है . कुदरत के दिए हर रंग को इस बारीकी से अपनी कलम द्वारा कागज में उतारा है कि हर शख्स को वह सब अपना कहा और दिल के करीब लगता है. चाहे फिल्मों में हो या फिर साहित्य में, कुदरत से इतना जुडाव बहुत कम रचना कार कर पाये हैं.

गुलजार सादगी और अपनी ही भाषा में सरलता से हर बात कह देते हैं कि लगता है कोई अपनी ही बात कर रहा है. उनकी यह लेखन की सादगी जैसे रूह को छू लेती है ..गुलजार जी का सोचा और लिखा आम इंसान का लिखा- उनके द्वारा कही हुई सीधी सी बात भी आँखों में एक सपना बुन देता है ..जिस सहजता व सरलता से वे कहते हैं वो इन पंक्तियों में दिखाई देती है--—

‘बहुत बार सोचा यह सिंदूरी रोगन/जहाँ पे खड़ा हूँ/वहीं पे बिछा दूं/यह सूरज के ज़र्रे ज़मीं पर मिले तो/इक और आसमाँ इस ज़मीं पे बिछा दूँ/जहाँ पे मिले, वह जहाँ, जा रहा हूँ/मैं लाने वहीं आसमाँ जा रहा हूँ।’

उनके सभी गीत ज़िन्दगी से गहरे जुड़े हैं और हर गीत जैसे अपने ऊपर ही बात करता हुआ लगता है ...गुलज़ार जी के कहे लिखे गीत इस तरह से जहन में छाए रहते है कि जब कभी भी ज़िन्दगी की किसी मीठी भूली बिसरी बात का ज़िक्र होता है तो वह गीत बरबस याद आ जाता है ...इजाजत फिल्म का "मेरा कुछ समान तुम्हारे पास पड़ा है" का यह गीत यूँ लगता है जैसे ज़िन्दगी से ज़िन्दगी कुछ कहना चाहती है या अपना दिया कुछ उधार वापस चाहती है, जैसे कुछ कहीं फिर से छूट गया है और एक कसक तथा कुछ पाने की एक उम्मीद शब्दों में ढल जाती हैं . मैं इजाजत फिल्म का गीत मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पडा है सुनना चाहती हूँ.
"

सच ही तो है कि हर किसी का अंदाज-ए-बयां अलग होता है. आइये अब हम सुनते है गुलज़ार जी के एक अलग अंदाज को ...

भीगी मेहँदी की खुशबु वो झूठ मूठ के वादे ...बहुत कुछ कह जाता है यह गीत .."



गुलज़ार जी ने एक से बढ़कर एक गीत लिखे है और जन-जन के हृदय के तारों को छेड़ दिया है. उन्होंने फिल्मी गंगा को समृद्ध किया है. "खुशबू, आंधी, किनारा, देवता, घर, गोलमाल,ख़ूबसूरत, नमकीन, मासूम, इजाजत और लिबास" आदि फिल्मों में गुलज़ार जी के लेखन कौशल का जलवा देखने को मिलता है. उनका लेखन ही नहीं निर्देशन भी कमाल का है. गुलज़ार जी ने कई प्रसिद्द फिल्मों में पटकथा व संवाद भी लिखे है. उनके लेखन की धारा को बांधा नही जा सकता. वो एक स्वछंद पंछी कि तरह कल्पना के आकाश में उड़ान भरते रहते है. गुलज़ार जी की कल्पना के हजारों शिकार हुए है, इनमें एक नाम है हमारे साथी निखिल आनंद गिरी जी का. निखिल जी अपने आप को गुलज़ार जी के शब्दजाल में फंसा पाते है और लिखते है कि---

गुलजार के कई रूप हैं. कभी वो नीली हंसी, पीली हंसी वाले गुलज़ार हैं तो कभी फूलों को चड्डी पहनाने वाले गुलज़ार...सिर्फ गुलज़ार ही हैं जो कुछ भी कर सकते हैं.....उनके ज़ेहन में शब्दों की कुश्ती चलती है...वो किसी भी शब्द को कहीं भी फिट कर सकते हैं....चांद को छत पर टांग सकते हैं, उसे रोटी भी कह सकते हैं..... यू-ट्यूब पर उनके यूएस के किसी कवि सम्मेलन का जिक्र है.....'छोटी (या नई) बहू को सारी चीज़े क्लीशे(clieshed) लगती हैं....' इतना बेहतर गुलज़ार ही लिख सकते हैं और कोई नहीं....
इजाज़त फिल्म की नज़्म " मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, वो लौटा दो...." तो मेरी साँसों में दोड़ती है. वाह क्या कहने एकदम लाजवाब....."गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो," क्या कहा जाए इस पर... गुलजार जी कुछ कहने लायक ही नहीं छोड़ते है. हर पहलू को छूते हैं गुलज़ार

"सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली, सरहद पर कल रात, कुछ ख्वाबों का खून हुआ है.....आह....कितना सुन्दर .

वही गुलज़ार जब मस्ती में लिखते हैं तो कोई और लगते हैं.....आसमान को कूटते गुलज़ार......इश्क का नमक लगाते गुलज़ार......क्या-क्या चर्चा की जाए....अजी चर्चा क्या कई बार तो बहस भी हो जाती है गुलजार जी के लिए. साहित्यकार कमलेश्वरजी के नाती अनंत त्यागी मेरे साथ जामिया में थे.....अक्सर चर्चा होती कि गुलज़ार जी बेहतर या जावेद अख्तर.....वो हमेशा जावेद अख्तर जी पर अड़ जाते....बहस में कुछ निकलता तो नहीं मगर गुलज़ार के जी ढेरों गाना ताज़ा हो जाते....

गुलज़ार जी की रेंज इतनी ज़्यादा है कि बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को बराबर भाते हैं.....
बहरहाल, कौन-कौन से गाने पसंद है इसका गुलज़ारी जवाब यही हो सकता है कि मुझे गुलज़ार की छींक से खर्राटे तक सब कुछ पसंद है....आज मैं अपने दोस्त और मेरी पसंद का "शाम से आंख में नमी सी है..."गीत सुनना चाहता हूँ.


गुलज़ार जी के लेखन की बारीकियों को समझने के लिए बहुत ही गहरी सोच चाहिए. और गहन सोच के लिए जरुरी है कि हम गुलज़ार जी के लिखे गीतों को सुन उनकी गहराइयों में उतरें. तो सुनते है निखिल जी और उनके दोस्त की की ये ग़ज़ल -

"शाम से आँख में नमी सी है "



गुलजार जी के गीतों की फहरिस्त इतनी लम्बी है कि कभी ख़त्म ही न होगी. या यूँ कहें कि हम भी यही चाहते है कि यह सिलसिला इसी तरह चलता रहे. उनके लिखे ख़ास गीतों में से "आने वाला पल जाने वाला है, हजार राहें मुड़कर देखीं, तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूँ मैं, मेरा कुछ सामान तुमारे पास पडा है, यारा सिली-सिली विरहा कि रात का जलना, चल छैयां-छैयां- छैयां-छैयां, साथिया-साथिया तथा सबसे अधिक प्रसिद्द कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना" है. इन सभी गीतों के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरुस्कार मिला है जिसके वो सही मायनो में हकदार भी है. अभी तो गुलजार जी की कल्पना के कई और रंग देखने बांकी हैं. हम इश्वर से प्रार्थना करेंगे की गुलजार जी अपनी लेखनी का जादू इसी तरह बिखेरते रहे. वो चाँद को कुछ भी कहें, और रात को कोई भी नाम दे दें लेकिन उनके सभी चाहने वाले उनकी हर कल्पना में एक सुखद एहसास की अनुभूति करते है और करते रहेंगे.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Tuesday, March 17, 2009

जगजीत सिंह ‘The Pied Piper’

रेडियो पर जगजीत सिंह की गजल बज रही है और मुझे याद आ रहा है, वो नब्बे का दशक जब हमारी उम्र रही होगी तीस के ऊपर(कितनी ऊपर हम नहीं बताने वाले…:)) पतिदेव काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे। जब जब वो बाहर जाते दिन तो रोज की दिनचर्या में गुजर जाता लेकिन रातों को हमें अकेले डर के मारे नींद न आती। अब क्या करते? ऐसे में पूरी पूरी रात जगजीत सिंह की आवाज हमारा सहारा बनती।

मेरी पंसद के एक दो गीत हो जाएं,क्या कहते हैं आप ?

परेशां रात सारी हैं सितारों तुम तो सो जाओ...


मेरी तन्हाइयों तुम भी लगा लो मुझको सीने से कि मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो रो के जीने से


आप कहेगें नब्बे का दशक? लेकिन जगजीत सिंह और चित्रा सिंह( उनकी धर्मपत्नी) की जोड़ी तो 1976 में ही अपनी पहली एलबम “The Unforgettables” से ही लोकप्रिय हो गये थे। जी हां जानते हैं, जानते हैं, हम भी उसी युवा वर्ग से थे जो उनकी पहली एल्बम से ही उनकी आवाज का दिवाना हो गया था, इसी लिए तो अपने संगीत के खजाने में से सिर्फ़ उनके ही कैसेट निकाल कर सुने जाते थे। भई तब सी डी का रिवाज नहीं था न्। अब जब कोई आप को इतना प्रभावित करे तो उसके बारे में सब कुछ जान लेने का मन करता ही है। हमने भी जितनी हो सकी उतनी जानकारी उनके बारे में हासिल करने की कौशिश की। मुझे मालूम है आप में से भी कई जगजीत जी के दिवाने होगें तो आइए बात करें कुछ उनकी कुछ अपनी।

तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेगें

आठ फ़रवरी 1941 में सरकारी मुलाजिम सरदार अमर सिंह धीमन और सरदारनी बच्चन कौर को चार लड़कियों और दो लड़कों के बाद, जब वाहे गुरु की नेमत के रूप में एक और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो न जाने क्या सोच कर उन्हों ने उसका नाम रख दिया ‘जगजीत सिंह’,यानी की जग को जीतने वाला। इस नाम में ही शायद आने वाले भविष्य का आगाज छुपा था। हर माता पिता की तरह सरदार अमर सिंह जी ने भी सपने देखे थे कि उनका बेटा बड़ा हो कर आई ए एस की सीढ़ी पार करते हुए किसी ऊंचे सरकारी औहदे पर आसीन होगा। लेकिन खुदा को तो कुछ और ही मंजूर था। जगजीत सिंह जिन्हें उनके घर के लोग प्यार से ‘जीत’ बुलाते थे गंगानगर से दसवीं पास कर कॉलेज की पढ़ाई करने जलंधर आ गये। दसवीं तक तो साइंस लिया हुआ था लेकिन उनका मन सांइस में न लगता था, इस लिए बी ए इतिहास ले कर किया। साथ ही साथ् पंडित छगल लाल शर्मा और बाद में उस्ताद जमाल खां साहब से गायिकी की तालीम लेते रहे। ग्रेजुएशन होते होते जगजीत साहब ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद जैसी विधाओं में परांगत हो गये। 1965 में उन्हों ने बम्बई आकर संगीत की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने का फ़ैसला कर लिया। उनके पिता जी स्वाभाविक है कि इस बात से खुश नहीं थे, उनके भविष्य की चिंता उन्हें खाये जा रही थी। पर जगजीत सिंह जी दृढ़ निश्चय कर चुके थे और वो बम्बई आ गये। अब जैसा कि हर नवोदित कलाकार के साथ होता है वो उनके साथ भी हुआ। बम्बई सपनों की नगरी मानी जाती है, जो भी यहां आखों में सपने ले कर आता है उसे अपने सपने पूरे करने का मौका जरूर देती है, लेकिन राह इतनी आसां भी नहीं होती। ये कड़ी मेहनत, कई निराशा भरे दिनों से गुजरने के बाद ही सफ़लता का सेहरा किसी के सर पर रखती है। जगजीत जी के साथ भी यही हुआ। शुरु शुरु में उन्हें शादियों में गाना पड़ा, कई इश्तहारों के जिंगल्स गाने पड़े। उसी जमाने में उनकी मुलाकात हुई चित्रा जी से। चित्रा जी खुद एक अच्छी गायिका थी और हैं। पहले पहल तो वो उनसे जरा भी प्रभावित न थीं, उन्हें लगता था कि जगजीत सिंह जी बहुत ही आलसीराम है जो न जगह देखते हैं न मौका, बस जरा मौहलत मिली नहीं कि लगे खर्राटे मारने। सोते ही रह्ते हैं, सोते ही रहते हैं। लेकिन धीरे धीरे जगजीत जी की गायकी का जादू उन पर भी चढ़ने लगा और वो उनकी ऐसी कायल हुई कि साठ का दशक ख्तम होते होते वो उनकी धर्मपत्नी बन गयीं। आज लगभग चालीस साल बाद भी वो जगजीत सिंह जी की गायकी के जादू से सम्मोहित हैं और मानती हैं कि जगजीत सिंह जी की आवाज कानों से सीधे दिल में उतर जाती है। ये बात वो तो क्या सारी दुनिया मानती है। हम भी पिछले चालिस सालों से जगजीत सिंह जी की आवाज के ऐसे दिवाने हैं कि सुनते ही खिचे चले जाते हैं जैसे पाइड पाइपर के पीछे बच्चे चल दिए थे।

1976 में भारत की संगीत की दुनिया में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह पहले गजल गायक दंपत्ति के रूप में उतरे और ऐसे लोकप्रिय हुए कि दूसरे कई गायक दंपत्तियों के लिए मिसाल बन गये।

जगजीत जी की आवाज तो उन्हें ईश्वर से आशीष के रूप में मिली है पर उसे अपनी मेहनत और लगन से मांजा है जगजीत जी ने खुद्। वो न सिर्फ़ अच्छे गायक है उनकी दुरदर्शिता भी बेमिसाल है। सत्तर का दशक वो दशक था जब गजल की दुनिया में कई महारथी पहले से मौजूद थे जैसे मैंहदी हसन, पंकज मलिक,तलत महमूद, गुलाम अली, बेगम अख्तर, नूरजंहा आदि आदि। ऐसे में जगजीत जी के लिए अपनी जगह बना पाना काफ़ी टेढ़ी खीर थी। म्युजिक कंपनियां जो अपने नफ़े के प्रति बड़ी सतर्क रहती हैं आसानी से किसी नये गायक पर पैसा लगा कर खतरा नहीं उठाना चाह्तीं, अगर वो गायक न चला तो नुकसान तो होगा ही, प्रतिष्ठित गायकों की नाराजगी का भी खतरा रहता है।

दूरदर्शी जगजीत सिंह

जगजीत जी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अपने लिए मुकाम हासिल करने की सोची सेमी क्लासिकल में। जब उनकी पहली एलबम आयी तो समीक्षकों ने काफ़ी आलोचना की लेकिन जनता ने अपना फ़ैसला सुना दिया था। उनकी एलबम की बिक्री ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये। उनका नाम संगीत की दुनिया के प्रतिष्ठित हस्तियों में शुमार हो गया। जगजीत सिंह दंपत्ति ने एक के बाद एक मधुर आत्मा में उतर जाने वाले एलबम देने शुरु कर दिए। जगजीत जी बड़ी आसानी से जनता की नब्ज पर हाथ धर लेते हैं। अगर आप ने ध्यान दिया हो तो उनकी ज्यादातर एलबम के नाम अंग्रेजी में हैं और गजलों का चुनाव उम्दा शायरी की मिसाल्।

जगजीत जी समाज के हर तबके तक पहुंचना चाह्ते थे। अंग्रेजी में नाम रखने से आज का युवा वर्ग (जो पॉप म्युजिक और हिप हॉप का दिवाना है) खुद को उनके संगीत से जुदा नहीं पाता और दिल में उतरती उम्दा शायरी प्रौढ़ वर्ग को दिवाना बना देती है। जैसे उनकी कुछ एलबमस के नाम हैं Ecstasies, A Sound Affair, Passions, Beyond Time, Mirage, Visions, Love is Blind, पर इसी के साथ देखे तो मिर्जा गालिब उनकी बेहतरीन एलबम में से एक हैं। हम तो यहां तक कह सकते हैं कि मिर्जा गालिब ने जहां दिल को छूने वाली गजले लिखीं उनमें आत्मा डाली जगजीत सिंह की आवाज और अंदाज ने।

जगजीत सिंह् जी न सिर्फ़ गैर फ़िल्मी बल्कि फ़िल्मी संगीत की दुनिया के भी नामी गिरामी सितारे बन गये, कई फ़िल्में उनके गाये गानों की वजह से आज तक जेहन से नहीं उतरती जैसे अर्थ, साथ साथ, प्रेमगीत, तुम बिन, सरफ़रोश, दुश्मन, तरकीब और भी न जाने कितनी। किस किस के नाम गिनाऊं?



मां का दर्द

जिन्दगी बहुत ही जालिम है, इसमें खुशी और गम दोनों से कोई अछूता नहीं रह पाया। सब अच्छा चल रहा था जब नब्बे के दशक में एक हादसे ने जगजीत सिंह दंपत्ति की दुनिया ही बदल कर रख दी। उनका 21 वर्षीय इकलौता बेटा विवेक एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। जिस दिन हमने अखबार में ये खबर पढ़ी थी दिल धक्क से रह गया था। जगजीत सिंह जी ने तो फ़िर भी इस झटके को अपनी छाती पर खाया और डटे रहे लेकिन चित्रा सिंह बिचारी क्या करतीं , वो मां इतना ढाढस कहां से लाती कि अपने जवान बेटे को जिसे घोड़ी चढ़ाने के सपने देख रही थी उसे अर्थी पर चढ़ा देखती। उन्हें ऐसा झटका लगा कि चौदह साल तक उनकी आवाज गमों के अंधेरों में कैद हो गयी और वो घर पर भी कभी भूले से कुछ गुनगुना भी न पायीं, बाहर गाना तो बहुत दूर की बात थी। बड़ी मुश्किल से जगजीत जी के बहुत समझाने पर उन्हों ने अपनी अंतिम एलबम पर काम किया जो उन दोनों ने अपने बेटे की याद को समर्पित की थी। उस एलबम का नाम था “Somewhere Some one” । जाहिर है कि इस एलबम में उन दोनों का पूरा दर्द उभर कर सामने आया और ऐसा आया कि हर सुनने वाले को आज भी रुलाता है।

चित्रा जी अपने गम में ऐसी डूबीं कि उन्होने खुद को अपने घर की चार दिवारी में कैद कर लिया और सिर्फ़ बेटे की यादों में लिपटी रहीं। जगजीत जी किसी तरह संभले और जिन्दगी को दोबारा पटरी पर लाने की कौशिश की। उन्होने पहली बार लता मंगेशकर जी के साथ एलबम बनायी ‘सजदा’ ये एलबम भी सुपर हिट रही, मेरी भी पंसदीदा एलबम में से ये एक हैं इसी का एक गाना जो मुझे बहुत पंसद है आप भी सुनिए………

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी


इसकी दूसरी किश्त पढ़ें
प्रस्तुति - अनीता कुमार

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