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Thursday, June 11, 2009

सुजॉय की यह कोशिश वेब रेडियो की बेहतरीन कोशिश है

सुजॉय चटर्जी एक ऐसा नाम जिससे आवाज़ के सभी नियमित श्रोता अब तक पूरी तरह से परिचित हो चुके हैं. रोज शाम वो ओल्ड इस गोल्ड पर लेकर आते हैं एक सोने सा चमकता नगमा हम सब के लिए, और खोल देते हैं बातों का एक ऐसा झरोखा जहाँ से आती खुशबू घोल देती है सांसों में ढेरों खट्टी मीठी गुजरे दिनों की यादें. ओल्ड इस गोल्ड ने पूरे किये अपने १०० एपिसोड और इस एतिहासिक अवसर पर हमने सोचा कि क्यों न आपके रूबरू लेकर आया जाए आपके इतने प्यारे ओल्ड इस गोल्ड के होस्ट सुजॉय चटर्जी को, तो मिलिए आज सुजॉय से -

हिंद युग्म - सुजॉय स्वागत है आपका, हमारे श्रोता ओल्ड इस गोल्ड के माध्यम से आपको जानते हैं. इतने सारे पुराने गीतों के बारे में आपकी जानकारी देखकर कुछ लोग अंदाजा लगते हैं कि आपकी उम्र कोई ४०-५० साल की होगी. तो सबसे पहले तो श्रोताओं को अपनी उम्र ही बताईये. ?


सुजॉय - वैसे अविवाहित लड़कों से उनकी उम्र पूछनी तो नहीं चाहिए, चलिए फिर भी बता देता हूँ कि मैं ३१ साल का हूँ।

हिंद युग्म - अच्छा अब अपना परिचय भी दीजिये...

सुजॉय - हम लोग बंगाल के रहनेवाले हैं, लेकिन मेरी पिताजी की नौकरी गुवाहाटी, असम में होने की वजह से मेरा जन्म और पूरी पढाई वहीं हुई। इसलिए मैं अपने आप को असम का ही रहनेवाला मानता हूँ। फ़िल्हाल मैं चण्डीगढ़ में नौकरी कर रहा हूँ। पेशे से मैं 'टेलीकाम इंजिनीयर' हूँ, और मेरी दिलचस्पी है हिंदी फ़िल्म संगीत में, फ़ोटोग्राफ़ी में, और खाना बनाने में।

हिंद युग्म - सुजॉय, ये ओल्ड इस गोल्ड का कॉन्सेप्ट कैसे बना ?

सुजॉय - सच पूछिए तो यह कॉन्सेप्ट सजीवजी का है, मैने तो बस उनके इस कॉन्सेप्ट को अंजाम दिया है। एक बात जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के श्रोताओं को शायद ही मालूम हो कि जितने भी गाने आप इसमें सुनते हैं वे सभी सजीवजी के ही चुने हुए होते हैं। एक बार गीतों की लिस्ट मेरे हाथ लगी कि मैं अपना काम शुरु कर देता हूँ उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारियाँ इकट्ठा करने में। कभी कभी बहुत अच्छी बातें हाथ लगती हैं, और कभी कभी थोड़े में ही गुज़ारा करना पड़ता है। लेकिन जो भी है, मुझे बड़ा आनंद आता है इस सीरीज़ के लिए आलेख लिखने में। शायद इसी तरह का कुछ दबा हुआ था मेरे अंदर जो मैं हमेशा से करना चाहता था। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का मंच पाकर ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी उस पराधीन चाहत को आज़ाद कर दिया हो!

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड को बहुत पसंद किया जा रहा है. एक श्रोता ने हिंद युग्म को लिखा कि ओल्ड इस गोल्ड पर आकर वो अपने बीते दिनों को जैसे फिर से जी रहे हैं. कैसा लगता है जब इस तरह के फीडबैक मिलते हैं ?

सुजॉय - बहुत अच्छा लगता है जानकर कि श्रोताओं और पाठकों को यह शृंखला पसंद आ रही है। उससे भी ज़्यादा अच्छा तब लगता है जब लोग आलेख में छुपी हुई ग़लतियों को ढूंढ निकालते हैं। इतने मनयोग से लोगों को पढ़ते हुए देखकर लगता है कि जैसे मेरी मेहनत सफल हुई। यह शृंखला लोगों को अपने बीते दिनों को याद करवाने में सहायक का काम कर रही है जानकर बहुत ख़ुशी हुई। आगे भी ऐसा ही प्रयास रहेगा।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड से पहले से ही आप इन्टरनेट पर विविध भारती समुदाय के माध्यम से बहुत लोकप्रिय थे, कैसे कर पाते हैं इतने सारे कार्यक्रमों को आप अपने जेहन में कैद ?

सुजॉय - शुरु शुरु में 'रेडियो' सुनते हुए ही इन कार्यक्रमों में बोली जा रही ज़रूरी बातों को 'शौर्ट हैंड' की तरह नोट कर लेता था, और फिर बाद में आलेख की शक्ल में लिख लेता था। बाद में जब मेरी 'मोबाइल फ़ोन' की पदोन्नती हुई तो उसमें रिकार्ड करने की क्षमता भी उत्पन्न हुई और तब से इन कार्यक्रमों को उस पर रिकार्ड करके बाद मे लिख लेता हूँ। इसे मेरी हॉबी ही समझिये या पागलपन! शायद ही दुनिया में कोई और इस तरह से रेडियो से रिकार्ड कर कम्प्युटर पर टाइप करता होगा!

हिंद युग्म - और फिर पूरे के पूरे कार्यक्रम को टाइप करना, क्या इन सब में बहुत समय नहीं लगता. ?

सुजॉय - समय तो लगता ही है, आख़िर मेरे भी दो हाथ हैं, और फिर औफ़िस भी जाता हूँ, खाना भी पकाता हूँ। मेरा ऐसा विचार है कि अगर आप किसी काम को शौकिया तौर पर करना चाहें तो आप उसके लिए अपनी व्यस्तता के बावजूद समय निकाल सकते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड में गीतों की प्रस्तुति में आपका विविध भारती का अनुभव कितना काम आता है ?

सुजॉय - बहुत ज़्यादा! बचपन से ही विविध भारती के अलग अलग कार्यक्रम और आकाशवाणी गुवाहाटी से प्रसारित होनेवाली फ़िल्म संगीत पर आधारित 'सैनिक भाइयों का कार्यक्रम' सुनते हुए ही बड़ा हुआ हूँ। लेकिन मैने अपनी तरफ़ से जो अच्छा काम किया वह यह था कि इन कार्यक्रमों को सुनने के साथ साथ इनमें दी जा रही जानकारियों को भी मैं अपनी डायरी में और बाद में अपने कम्प्युटर में संग्रहित करता चला गया। और अब हाल यह है कि ६०० से ज़्यादा रेडियो कार्यक्रमों का आलेख मेरे इस ख़ज़ाने मे क़ैद हो चुका है, जिनका मैं भरपूर इस्तेमाल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिना कंजूसी के कर रहा हूँ। उस वक्त मुझे यह पता भी नहीं था कि एक दिन इन सब का इस्तेमाल यूँ किया जाएगा। मेहनत से किया गया कोई भी काम कभी बेकार नहीं जाता, यह अब मैं मान गया हूँ।

हिंद युग्म - हर गीत की प्रस्तुति से पहले क्या तैयारियां करते हैं ?

सुजॉय - सबसे पहले तो दो चार दिन तक गीतों को मन ही मन मंथन करता हूँ, और उठते बैठते सोते जागते यह सोचता रहता हूँ कि फ़लाना गीत की क्या खासियत है। फिर उसके बाद 'रेडियो' प्रोग्रामों की लिस्ट पे नज़र दौड़ाता हूँ कि कहीं कुछ जानकारियाँ पहले से ही मेरे पास उपलब्ध है या नहीं। फिर उसके बाद इंटर्नेट पर जितना हो सके सर्च करता हूँ, और सारी बातों को आलेख की शक्ल में लिख डालता हूँ। यूँ समझ लीजिए कि १० गीतों का आलेख लिखने के लिए ७ से १० दिन लग ही जाते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड के शतक पूरे करने की एक बार फिर बधाई. आप यूहीं अच्छे अच्छे गीत हम सभी को सुनाते रहें. हिंद युग्म को उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि आप इस खोज और आलेख प्रस्तुतीकरण का भरपूर आनंद ले पा रहे हैं. जारी रहे ये सफ़र...सब श्रोताओं की तरफ से शुभकामनायें स्वीकार करें.

सुजॉय - बहुत धन्यवाद! वैसे शुक्रिया मुझे हिंद युग्म का अदा करनी चाहिए मुझे यह मंच देने के लिए। जो काम मैं हमेशा से करना चाहता था और नहीं कर पा रहा था, हिंद युग्म ने मुझे वह काम करने का मौका दिया, इससे ज़्यादा और मैं हिंद युग्म से क्या माँग सकता हूँ। चलते चलते वही लाइन फिर से कहूँगा जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की हीरक जयंती अंक मे मैने कहा था कि "तुम अगर साथ देने का वादा करो, हम यूँही मस्त नग़में लुटाते रहें"। बहुत धन्यवाद!

ओल्ड इस गोल्ड के श्रोताओं में कुछ ऐसे नाम भी हैं जिन्होंने इस शृंखला के विषय में मीडिया के माध्यम से जानकारी देकर संगीत प्रेमियों को इससे जुड़ने के लिए प्रेरित किया है, मशहूर ब्लॉग "मोहल्ला" के संचालक अविनाश जी भी इन्हीं में से एक हैं जिन पर सुजॉय का जादू जम कर चला है. तभी तो मशहूर साहित्यिक पत्रिका "कथादेश" में उन्होंने अपने "ओल्ड इस गोल्ड" अनुभव को कुछ यूँ व्यक्त किया है. पढिये -

पूरा आलेख पढ़ने के लिए निम्न चित्र पर क्लिक करें


Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Tuesday, January 20, 2009

'कथापाठ- एक विमर्श' कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग

सुनिए गौरव सोलंकी, तेजेन्द्र शर्मा, असग़र वजाहत और श्याम सखा का कहानीपाठ


१५ जनवरी २००९ को हिन्द-युग्म ने गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में 'कथापाठ-एक विमर्श' कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसमें लंदन के वरिष्ठ हिन्दी कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा और भारत के युवा कथाकार गौरव सोलंकी का कहानीपाठ हुआ। संचालन हरियाणा के वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकार डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' ने किया। प्रसिद्ध कहानीकार असग़र वजाहत मुख्य वक्ता के तौर पर उपस्थित थे। युवा कहानीकार अजय नावरिया और अभिषेक कश्यप ने कहानी और कहानीपाठ पर अपने विचार रखे।

जैसाकि हिन्द-युग्म टीम ने उदय प्रकाश की कहानीपाठ और उसपर नामवर सिंह के वक्तव्य के कार्यक्रम को रिकॉर्ड करके सुनवाया था और यह वादा किया था कि इस तरह के कार्यक्रमों को लेकर उपस्थित होता रहेगा, ताकि वे हिन्दी प्रेमी भी लाभांवित हो सकें, जो किन्हीं कारणों से ऐसे कार्यक्रमों में सम्मिलित नहीं हो पाते।

तो सुनिए और खुद तय करिए कि हिन्द-युग्म द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम कैसा रहा?




Thursday, January 15, 2009

उदय प्रकाश का कहानीपाठ और आलाकमान की बातें

९ जनवरी २००९ को हिन्दी अकादमी की ओर से आयोजित कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग


९ जनवरी २००९ को मैं पहली दफ़ा किसी कथापाठ सरीखे कार्यक्रम में गया था। कार्यक्रम रवीन्द्र सभागार, साहित्य अकादमी, दिल्ली में था जिसमें फिल्मकार, कवि, कथाकार उदय प्रकाश का कथापाठ और उनपर प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह का वक्तव्य होना था। जाने की कई वज़हें थीं। हिन्द-युग्म पिछले १ साल से कालजयी कहानियों का पॉडकास्ट प्रसारित कर रहा है। पहले इस आयोजन में हम निरंतर नहीं थे, लेकिन जुलाई से पिट्वबर्गी अनुराग शर्मा के जुड़ने के बाद हम हर शनिवार को प्रेमचंद की कहानियाँ प्रसारित करने लगे। कई लोग शिकायत करते रहे थे (खुले तौर पर न सही) कि कहानियों के वाचन में और प्रोफेशनलिज्म की ज़रूरत है। तो पहली बात तो ये कि मैं उदय प्रकाश जैसे वरिष्ठ कथाकारों को सुनकर यह जानना चाहता था कि असरकारी कहानीपाठ आखिर क्या बला है? हालाँकि इसमें मुझे निराशा हाथ लगी। मुझे लगा कि हिन्द-युग्म के अनुराग शर्मा, शन्नो अग्रवाल और शोभा महेन्द्रू इस मामले में बहुत आगे हैं। लेकिन फिर भी कहानीकार से कहानी सुनने का अपना अलग आनंद है।

दूसरी वजह थी कि यह भी सीखें कि यदि खुद इस तरह का आयोजन करना हो तो किन-किन बातों का ध्यान रखना होता है। चूँकि हिन्द-युग्म ने भी लंदन निवासी हिन्दी कथाकार तेजेन्द्र शर्मा का कथापाठ करवाने का निश्चय किया था। १५ जनवरी को गाँधी शांति प्रतिष्ठान सभागार, नई दिल्ली में। संयोग की बात थी कि इस कार्यक्रम में भी टिप्पणीकार के तौर पर प्रो॰ नामवर सिंह का आना परिकल्पित था। लेकिन राजेन्द्र यादव जी से जब मैं ४ या ५ जनवरी को मिलने गया तो उन्होंने बताया कि ९ जनवरी को भी ऐसा ही कार्यक्रम है जिसमें नामवर जी आ रहे हैं। अतः अपने कार्यक्रम का रूप-रंग बदलना पड़ा।

यह भी देखना चाहता था कि इस तरह के कार्यक्रमों में युवाओं की उपस्थिति क्या है। ४ युवा लेकर तो मैं ही गया था, शेष मीडियाकर्मी थे। शायद सरकारी निकायों द्वारा होने वाले प्रयासों में कहीं न कहीं कोई कमी है। क्योंकि इस तरह के कार्यक्रमों की जानकारी भी वे युवाओं तक नहीं पहुँचाते। भाई मार्केटिंग तो चाहिए ही।

एक ख़ास बात तो जो मैंने महसूस की वह ये कि हमलोगों को छोड़कर वहाँ उपस्थित ज्यादातर लोगों ने उदय प्रकाश का साहित्य उदय प्रकाश से अधिक पढ़ रखा था, इसलिए उनको नया सुनने को कुछ नहीं मिलने वाला था। इसलिए यदि वे कथापाठ के दौरान सो भी गये तो उनकी कोई गलती नहीं थी। लगभग ५० मिनट तक उदय प्रकाश का कथापाठ चलता रहा जिसमें उन्होंने अपनी कुछ लघुकथाएँ और अपनी प्रसिद्ध कहानी 'पीली छतरी वाली लड़की' का एक अंश और अपने उपन्यास 'मोहनदास' का एक हिस्सा सुनाया। इसके बाद जब हिन्दी के आलाकमान ने माइक को लपका और यह कहाँ कि आज मेरे पास बोलने के लिए बहुत कुछ नहीं है, मैं चाहूँगा कि श्रोता सवाल करें, तब लोगों में थोड़ी-बहुत हलचल हुई और लोगों ने सवाल दागना शुरू किया।

आलाकमान नामवर सिंह ने कहा कि हिन्दी साहित्य के १०० वर्षों के इतिहास में तीन ही ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने कविता और कहानी दोनों पर बराबर और समर्थ हस्तक्षेप रखा। पहले जयशंकर प्रसाद, दूसरे अज्ञेय और तीसरे उदय प्रकाश।

अपनी आलोचनाओं के लिए मशहूर नामवर उस दिन केवल प्रसंशा के शब्द इस्तेमाल कर रहे थे। जैसे उन्होंने बैठे-बैठे पिछले १०० वर्षों के १० महान कहानीकारों की एक सूची बनाई थी, जिसमें प्रेमचंद, जैनेन्द्र, यशपाल, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा इत्यादि में उदय प्रकाश का भी नाम था।

मैं एक तीसरा काम भी करने गया था, जिसकी उम्मीद कम से कम हिन्दी अकादमी से तो नहीं की जा सकती। मैंने कार्यक्रम को mp3 रिकॉर्डर से रिकॉर्ड कर लिया ताकि वे लोग भी सुन सकें जो कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाते या नहीं होना चाहते। २ घन्टे की रिकॉर्डिंग को १ घंटा ३३ मिनट का बनाकर और सुनने लायक बनाकर हमने आपके लिए लाया है। सुनें-




mp3 download
श्रोताओं के सवाल रिकॉर्ड नहीं हो पाये हैं, लेकिन उदय प्रकाश के जवाब से आपको अंदाज़ा लग जायेगा कि श्रोताओं ने क्या पूछा है।


आज शाम ५ बजे से हिन्द-युग्म भी इसी तरह का एक कार्यक्रम कर रहा है, जिसमें तेजेन्द्र शर्मा और गौरव सोलंकी का कथापाठ होगा, जिसपर असग़र वजाहत और अजय नावरिया अपने विचार देंगे। आप भी ज़रूर आयें। विवरण यहाँ देखें। इस कार्यक्रम में कम से कम इतना अंतर ज़रूर होगा कि यहाँ सुनने वाला नया होगा, जवान होगा और शायद ज़रूरी भी। ऐसा नहीं है कि वरिष्ठ नहीं होगे। एक तरह का पीढ़ियों का संगम होगा

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